Home Blog Page 351

एक चुम्मा जिससे एक राजकुमारी का प्यार ठुकराने की कहानी हो गई वायरल, क्या फुटबॉलर पाब्लो गावी ने गँवा दिया ‘स्पेन का राजा’ बनने का मौका?

गर्लफ्रेंड के साथ खिलाड़ियों का सार्वजनिक तौर पर दिखना नई बात नहीं है। गर्लफ्रेंड को चूमना या गले लगना भी सामान्य है। लेकिन मशहूर फुटबॉलर पाब्लो गावी जैसे ही अपनी गर्लफ्रेंड के साथ दिखे, इसने इंटरनेट पर सनसनी पैदा कर दी। कहा जा रहा है गर्लफ्रेंड एना पेलायो के लिए गावी ने स्पेन की राजकुमारी लियोनोर का प्यार ठुकरा दिया है।

वैसे यह चर्चा काफी समय से रही है कि बार्सिलोना के इस मिडफील्डर की स्पेन की राजकुमारी दीवानी हैं। लेकिन न तो शाही परिवार ने और न ही गावी ने कभी इसकी पुष्टि की। कहा तो यह भी जा रहा है कि गावी यदि राजकुमारी के इश्क को कबूल कर लेते तो वे स्पेन के राजा भी बन सकते थे।

अब जैसे ही मैदान पर गावी अपनी गर्लफ्रेंड के साथ खुलेआम इश्क फरमाते नजर आए, सोशल मीडिया पर फिर से राजकुमारी लियोनोर, उनके क्रश और उनका प्यार ठुकराने की चर्चा होने लगी है। कहा जाता है कि 2022 में राजा फेलिप 4 ने गावी से एक जर्सी पर ऑटोग्राफ लिया था। ये जर्सी छोटी थी, इसलिए माना गया कि ये ऑटोग्राफ प्रिंसेस के लिए ली गई है।

प्रिंसेस को लेकर ये भी अफवाह उड़ी थी कि वो अपनी किताब में गावो का फोटो लेकर घूमती थी। 2024 में प्रिंसेस गावी और फुटबॉलर पाब्लो की मुलाकात हुई थी। माना जाता है कि पाब्लो ने स्पेन की राजकुमारी से शादी से इनकार कर दिया था। अफवाह ये भी है कि अगर ये शादी होती तो फुटबॉलर पाब्लो को अपने पहले ‘प्यार’ यानी फुटबॉल को छोड़ना पड़ता।

फुटबॉलर पाब्लो गावी बार्सिलोना के धाकड़ मिडफिल्डर हैं। 2024-25 में उनका प्रदर्शन जबरदस्त रहा है। चैंपियंस लीग, स्पेनिश सुपर कप, कोपा डेल रे, यूरो कप, ला लीगा समेत कई चैंपियनशिप में जबरदस्त खेल का प्रदर्शन किया। चैंपियंस लीग में पाब्लो की टीम सेमीफाइनल तक पहुँची। मैदान पर उनके खेलने का अंदाज काफी आकर्षक है इसलिए उनकी फैन फॉलोइंग अच्छी खासी है। स्पेन की राजकुमारी भी फुटबॉल देखती हैं और काफी पहले से ही पाब्लो गावी की फैन हैं।

स्पेन ने जब 2024 में यूरो कप जीता था तो गावी के प्रदर्शन की काफी तारीफ हुई थी। इसके बाद पूरी स्पेन की टीम ने जर्जुएला पैलेस में प्रिंसेस से मुलाकात की थी। इस दौरान लियोनोर और पाब्लो गावी को एक-दूसरे से हाथ मिलाते हुए तस्वीर सामने आई थी, जो वायरल हुई थी। अफवाह है कि इस दौरान प्रिंस फेलिप ने अपनी बेटी के मन की इच्छा भी गावी को बताई थी। लेकिन, गावी ने मना कर दिया था क्योंकि शाही परिवार से जुड़ने पर उन्हें फुटबॉल खेलना छोड़ना पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का पत्र ‘स्वस्थ लोकतंत्र’ की निशानी, प्रेसिडेंट-गवर्नर के लिए डेडलाइन तय करने को लेकर पूछे हैं 14 सवाल: जवाब में भी दिखनी चाहिए गंभीरता

हाल ही में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उच्चतम न्यायालय से रेफरेंस भेजकर 14 सवाल पूछे हैं। ये सवाल राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत किए गए हैं। मूलत: ये प्रश्न उच्चतम न्यायालय द्वारा इसी वर्ष 8 अप्रैल को दिए गए फैसले से संबंधित हैं।

इसके अलावा कुछ प्रश्नों का सन्दर्भ एवं दायरा न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की संवैधानिक शक्तियों और कार्यक्षेत्र से संबंधित भी है। राष्ट्रपति के प्रश्न सटीक और समीचीन हैं।उन्होंने कानून निर्माण के सम्बन्ध में राज्यपाल और राष्ट्रपति को संविधानप्रदत्त शक्तियों को न्यायिक आदेश द्वारा सीमित/नियंत्रित किये जाने पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाया है। 

निश्चय ही, उन्होंने अपनी मर्यादा का उल्लंघन और सीमा का अतिक्रमण करने वाली न्यायपालिका को प्रश्नांकित करते हुए उसके द्वारा संवैधानिक व्यवस्थाओं  और प्रावधानों को बदलने से सम्बन्धित सवाल पूछे हैं।

उनके प्रश्न भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अंतर्निहित संवाद की स्वस्थ परम्परा का परिचय और प्रमाण हैं। 8 अप्रैल,2025 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल बनाम तमिलनाडु राज्य नामक वाद का निर्णय दिया था। इस अत्यंत महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाल एवं न्यायमूर्ति  आर महादेवन की दो सदस्यीय न्यायपीठ ने की थी। 

यह मामला तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों से संबंधित था। राज्य सरकार का कहना था कि विधानसभा द्वारा पारित कई विधेयक लंबे समय से राज्यपाल द्वारा लंबित रखे गए हैं। साथ ही, राज्य सरकार ने राज्यपाल द्वारा एक  साथ कई विधेयकों को राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजने पर भी प्रश्न उठाया था।

इन विधेयकों में राज्य द्वारा संचालित  विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति का पदेन दर्जा  मुख्यमंत्री को देने से संबंधित विधेयक भी शामिल है। निश्चय ही, राज्यपाल द्वारा अनिश्चित अवधि तक विधेयकों को लंबित रखना भी संविधान-सम्मत नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने उपरोक्त मामले से सम्बन्धित फैसले में कुछ संवैधानिक पहलुओं को नए सिरे से प्रस्तुत  किया है। ऐसा करते हुए माननीय न्यायालय ने संविधान के कुछ हिस्सों को व्याख्यायित भी किया है।

अगर उच्चतम न्यायालय के उक्त फैसले पर ध्यान दें तो इसके तीन पहलू नजर आते हैं। पहला, राज्यपाल एवं राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों को स्वीकृति प्रदान करने हेतु समय सीमा का निश्चित किया जाना है। यह समय सीमा तीन माह तय की गई है।

दूसरा, अगर समय सीमा के भीतर राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है तो राज्य के अनुरोध पर उच्चतम न्यायालय ‘परमादेश रिट’(Writ of Mandamus) के तहत विधेयक को स्वीकृति प्रदान करने की क्षमता रखता है।

तीसरा, उच्चतम न्यायालय ने स्वयं को संविधान के अनुच्छेद 142  द्वारा प्रदत्त शक्ति का उपयोग करते हुए 10 लंबित विधेयकों को कानून का दर्जा दे दिया है। यह पहला अवसर है जब बिना राष्ट्रपति या राज्यपाल की स्वीकृति के विधेयक कानून बन गये हैं।

इस फैसले ने ‘पॉकेट वीटो’ को भी खारिज कर दिया है। यह न्यायपालिका द्वारा अपनी संवैधानिक शक्तियों और मर्यादा का अतिक्रमण है। इस निर्णय से न्यायपालिका और कार्यपालिका के सम्बन्धों में तनाव और टकराहट बढ़ने की आशंका है।

इस निर्णय की पृष्ठभूमि में संवैधानिक वस्तुस्थिति को समझना अत्यंत आवश्यक है। सर्वप्रथम अनुच्छेद 200 की बात आती है।  इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत विधेयकों के सम्बन्ध में उनके पास मौजूद विकल्पों का विवरण है।

इसके तहत राज्यपाल या तो विधेयक को स्वीकृति देता है या उसे रोक लेता है या वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए प्रेषित कर देता है। राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित विधेयक के लिए एक कसौटी का उल्लेख है।

वह यह है कि ‘राज्यपाल की राय में’ यदि वह (विधेयक) कानून बन जाए तो उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस प्रकार अल्पीकृत करेगा कि वह व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी, जिसे भरने के लिए संविधान द्वारा उस व्यवस्था का निर्माण किया गया है।

ध्यान देने की बात यह है कि यह कसौटी मसौदा अनुच्छेद 175 में संविधान सभा में बहस के पश्चात जोड़ी गई, जो बहस 30 जुलाई, 1 अगस्त और 17 अक्टूबर 1949 को हुई थी। जिसे हम वर्तमान में अनुच्छेद 200 के नाम से जानते हैं। 

उक्त अनुच्छेद में कसौटी के निर्णयन हेतु जिस पद का इस्तेमाल है वह है ‘राज्यपाल की राय में’।  इसके दो अर्थ हो सकते हैं। पहला निहितार्थ यह हो सकता है कि राज्यपाल मंत्री-परिषद् के सहयोग एवं सुझाव से ऐसा करेगा।

अब इसमें सवाल यह उठता है कि मंत्रिपरिषद जो विधानमंडल का हिस्सा है और विधेयक बनाने में शामिल है। आखिर क्योंकर पहले अपने सीमा क्षेत्र से बाहर जाकर विधेयक पारित करेगी और फिर राज्यपाल को परामर्श देकर उसे राष्ट्रपति को भिजवाएगी।

दूसरा निहितार्थ यह हो सकता है कि राज्यपाल अपने ‘विवेकाधिकार’ का प्रयोग करते हुए ऐसा करेगा। बहुत हद तक ऐसा भी संभव है कि ये दोनों अर्थ भी अलग-अलग मामलों में लागू किए जा सकते हैं।

संविधान सभा में हुई बहसों से गुजरने से ऐसा लगता है कि वह राज्यपाल के विवेकाधिकार के दायरे को (विधेयक निर्माण के संदर्भ में) अनियंत्रित और असीमित तो नहीं करना चाहती थी लेकिन एकदम से खारिज भी नहीं करना चाहती थी।

अनुच्छेद 201 दूसरा महत्वपूर्ण अनुच्छेद है, जो इस बहस में सामने आया है। इस अनुच्छेद में राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के  विचारार्थ आरक्षित विधेयक से सम्बन्धित चर्चा है।  इसके तहत राष्ट्रपति या तो विधेयक पर स्वीकृति देता है या उसे रोक देता है। 

साथ ही, वह अपने सुझावों और निर्देश के साथ विधेयक को राज्यपाल के मार्फ़त वापस विधानमंडल को भेज सकता है। तत्पश्चात वह पुन: विधानमंडल से  पारित कराकर  राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु प्रस्तुत किया जाएगा।

इसके आगे राष्ट्रपति उस विधेयक पर क्या फैसला लेते हैं? इस पर संविधान में स्पष्टता नहीं है। गौर करने की बात है कि उक्त अनुच्छेद (मसौदा अनुच्छेद 176, संविधान सभा 1948) बिना किसी बदलाव के संविधान सभा द्वारा स्वीकृत कर लिया गया था।

8 अप्रैल के माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार राज्यपाल अब पहली प्रस्तुति में तीन महीने एवं दूसरी प्रस्तुति में अधिकतम एक महीने तक ही विधेयक को अपने पास रख सकते हैं। 

विधेयक निर्माण प्रक्रिया में राज्यपाल के ‘विवेकाधिकार’ को माननीय उच्चतम न्यायालय ने अब न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत बताया है।  यह पहले से चली आ रही प्रणाली में बहुत बड़ा बदलाव है, जिसमें राज्यपाल के विवेकाधिकार को सीमित किया गया है।

इसके आगे उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 200 एवं 201 के तहत राष्ट्रपति के विचारार्थ प्रेषित विधेयकों को संवैधानिक एवं वैधानिक त्रुटियों से बचाने के लिए राष्ट्रपति को अनुच्छेद 143(1) के तहत उच्चतम न्यायालय के परामर्श क्षेत्राधिकार के आधार पर सुझाव लेने के लिए भी निर्देशित किया है।

न्यायालय का यह मानना है कि ऐसा करने से विधेयक में वैधानिक त्रुटियाँ भी नहीं रहेंगी एवं कानून बनने के बाद उसकी संवैधानिकता पर उठने वाले प्रश्नों से भी बचा जा सकेगा।

सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका के मध्य ‘शक्ति के बंटवारे’ के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है?

‘शक्ति के बंटवारे’ का सिद्धांत संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका के कार्य में सरल रेखीय बंटवारा तो नहीं है, किंतु अगर हम माननीय न्यायालय के फैसले पर ध्यान दें तो राष्ट्रपति को दिए गए निर्देश के मद्देनजर ऐसा प्रतीत होता है कि विधेयक के कानून बनने के पूर्व ही न्यायपालिका का हस्तक्षेप हो रहा है।

किसी भी विधेयक को प्रस्तुत करने एवं उस पर बहस करने का कार्य जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों का ही होता है। विधायिका के इस कार्य में हस्तक्षेप संविधान के बुनियादी ढांचे को चुनौती देता है, जो कि समय-समय पर दिए गए माननीय उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों में भी परिलक्षित होता रहा है।  

यह निर्णय अवांछित ‘न्यायिक सक्रियता’ का एक और उदाहरण है। इस फैसले के बाद एक प्रश्न लगातार चर्चा में है कि क्या संवैधानिक व्याख्या एक संवैधानिक पीठ से इतर किसी अन्य पीठ द्वारा संभव है? संवैधानिक पीठ में न्यूनतम पांच न्यायाधीश होते हैं।

वहीं उक्त फैसला मात्र दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रश्न संख्या 12 में  इस विषय को उठाया है। राज्यपाल एवं राष्ट्रपति न सिर्फ कार्यपालिका के प्रमुख हैं, बल्कि विधायी प्रक्रिया में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान और भूमिका है।

संविधान में उनकी परिकल्पना एकदम बंधे-बँधाये रूप में नहीं की गई है। राज्यपाल या राष्ट्रपति रोबोट या कठपुतली नहीं हैं, न ही होने चाहिए। संविधान द्वारा प्रदत्त ’विवेकाधिकार’ सम्बन्धी शक्ति विशिष्ट कारणों से दी गयी है।

शक्ति-विहीन राज्यपाल या राष्ट्रपति महज सजावटी पद बनकर रह जायेगा। राज्यपाल या राष्ट्रपति सिर्फ कहने के लिए राज्य या संघ का संवैधानिक प्रमुख नहीं होता, बल्कि उसके पास विशेष परिस्थितियों में विशिष्ट शक्तियां होती हैं।

इसीलिए संविधान में दलगत राजनीति से निरपेक्ष विवेक-बुद्धि संपन्न व्यक्ति को इन पदों पर नियुक्त करने का प्रस्ताव है। राज्यपाल को भी केंद्र में सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्त्ता के रूप में आचरण नहीं करना चाहिए।

पिछले कुछ दशकों में मुख्यधारा की राजनीति से रिटायर्ड राजनेताओं को राज्यपाल के रूप में समायोजित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जबकि राज्यपाल साहित्य, कला, विज्ञान, शिक्षा, कानून, पत्रकारिता आदि के क्षेत्र में महनीय उपलब्धियां हासिल करने वाले गैर-राजनीतिक और सम्मानित व्यक्तियों को बनाया जाना चाहिए। 

स्पष्ट है कि उक्त निर्णय से केंद्र एवं राज्य सरकार के सम्बन्ध बदल गए हैं। संघीय व्यवस्था के कारण कई बार केंद्र एवं राज्य सरकार की शक्तियों को स्वतंत्र एवं समान समझने की गलती की जाती है।

जबकि संविधान में ऐसे कई प्रावधान हैं जिनसे केंद्र की वरीय स्थिति सुस्पष्ट है। मसलन, केंद्र की विधायी क्षमता जो कि राज्य सरकार से कहीं ज्यादा विस्तृत एवं प्रभावी है।  बाबासाहेब अंबेडकर ने भी कहा था कि भारत संघीय व्यवस्था के बावजूद केंद्रीय प्रवृत्ति वाला राष्ट्र है।

यह व्यवस्था अलगाव और अराजकता को नियंत्रित करते हुए देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित करती है। उपरोक्त निर्णय की पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवालों के न्यायपालिका द्वारा दिए गए उत्तर से न सिर्फ संघ और राज्य के सम्बन्धों का समीकरण प्रभावित होगा, बल्कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के पारस्परिक सम्बन्ध और कार्यक्षेत्र भी पुनर्परिभाषित होगा।

इसलिए उच्चतम न्यायालय को संविधान की आधारभूत संरचना और अंतर्निहित भावना का ध्यान रखते हुए बहुत सोच-समझकर और सूझ-बूझ के साथ उत्तर देने की आवश्यकता है।

PM राजीव गाँधी ने भारत-पाकिस्तान में सुलह के लिए अमेरिका से माँगी थी मदद, राष्ट्रपति रीगन को लिखा था पत्र: भाजपा MP निशिकांत दुबे ने 1987 का पत्र दिखा पूछे सवाल

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने बुधवार (28 मई 2025) को कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि 1987 में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति समझौता करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अमेरिका से मदद माँगी थी। निशिकांत दुबे ने यह दावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा राजीव गांधी को लिखे एक पुराने पत्र के आधार पर किया है, जिसे अब सार्वजनिक कर दिया गया है।

निशिकांत दुबे ने दिखाया 1987 पत्र

निशिकांत दुबे का कहना है कि 1972 के शिमला समझौते के तहत यह तय हुआ था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी विवाद सिर्फ दोनों देशों के बीच बातचीत से सुलझाया जाएगा, इसमें कोई तीसरा देश शामिल नहीं होगा। ऐसे में राजीव गाँधी का अमेरिकी मदद माँगना इस समझौते का उल्लँघन है।

दुबे ने 25 मार्च, 1987 को अमेरिकी राजदूत द्वारा राजीव गाँधी को भेजे गए एक कथित पत्र का हवाला दिया है। निशिकांत दुबे ने बताया कि इस पत्र में गाँधी ने सीमा पार से होने वाली नशीले पदार्थों की तस्करी पर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिकी विशेषज्ञों की मदद माँगी थी ऐसा लिखा है। रीगन ने कहा था कि अगर भारत और पाकिस्तान की सरकारें मदद माँगती हैं तो उन्हें खुशी होगी।

हालाँकि, रीगन के इस पत्र में सीधे तौर पर 1987 के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में अमेरिका की दखलअंदाजी का कोई संकेत नहीं मिलता है। पत्र में सिर्फ भविष्य के तनाव को कम करने के लिए पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के बीच प्रभावी तरीकों के बारे में कुछ जानकारी देने की बात कही गई है।

यह नया दावा ऐसे समय में आया है जब हाल ही में पहलगाम आतंकवादी हमले और भारत के जवाबी ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ा हुआ है, और तीसरे पक्ष की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।

इंदिरा गाँधी पर सवाल

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने मंगलवार (27 मई 2025) को एक अमेरिकी खुफिया दस्तावेज़ शेयर किया। निशिकांत दुबे ने बताया कि यह दस्तावेज़ 1971 के बांग्लादेश युद्ध से जुड़ा है, जिसमें इंदिरा गाँधी ने संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम के प्रस्ताव को मान लिया था।

दुबे ने पूछा कि क्या भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) को वापस लेने और करतारपुर गुरुद्वारा जैसी जगहों को सुरक्षित करने के बजाय बांग्लादेश बनाने को ज़्यादा अहमियत दी। निशिकांत दुबे ने ‘X’ (पहले ट्विटर) पर लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अमेरिकी दबाव में आकर 1971 का युद्ध रोक दिया था, जबकि उस समय के रक्षा मंत्री जगजीवन राम और सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ इसके खिलाफ थे।

कॉन्ग्रेस का पलटवार

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर निशाना साधा है। जयराम रमेश ने कहा कि जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिका की मदद और किसी ‘तटस्थ जगह’ पर बात करने की बात कही, तो जयशंकर चुप क्यों रहे।

हालाँकि, भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति के उन दावों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने में मदद की। भारत ने अपनी पुरानी नीति को दोहराते हुए साफ किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़ा कोई भी मुद्दा भारत और पाकिस्तान मिलकर ही सुलझाएँगे, इसमें किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी नहीं होगी।

निशिकांत दुबे के इस दावे के बाद भारत द्वारा पूर्व में लिए गए इस फैसलों पर राजनीतिक बहस और तेज़ हो गई है।

सवाल- कितनी लड़कियों से थे रिलेशन, इंदौर के रेपिस्ट कोच मोहसिन खान का जवाब- बहुत सारी लड़की… 25-30 से थे संबंध: पीड़िताओं का कलावा कटवाता था, मुस्लिम बनने का डालता था दबाव

मध्य प्रदेश के इंदौर में लड़कियों को शूटिंग सिखाने वाले कोच मोहसिन खान ने पुलिस जाँच में अपने कांड कबूल किए हैं। उसने माना है कि 25 से 30 लड़कियों का उत्पीड़न किया है। उसके कबूलनामे का वीडियो आया है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो में मोहसिन ये कहते हुए नजर आ रहा है कि इंदौर के अलावा कुछ अन्य जिलों में भी उसने लड़कियों का फायदा उठाया। उसके कई लड़कियों के साथ संबंध भी थे।

इंदौर के अन्नपूर्णा इलाके में शूटिंग कोच मोहसिन खान ड्रीम ओलंपिक एकेडमी चलाता है। उस पर 20 मई 2025 से अब तक 5 FIR दर्ज हो चुकी है। आखिरी शिकायत उसके घर पर काम करने आई लड़की ने सोमवार (26 मई 2025) को दर्ज करवाई है।

पीड़िता ने शिकायत में कहा था कि मोहसिन और उसके दो दोस्तों फैजान और इमरान ने 15 दिनों तक बंधक बना कर उसके साथ रेप किया था। उस समय उसकी उम्र महज 17 साल थी।

मोहसिन को पॉक्सो एक्ट और अन्य धाराओं में पुलिस ने गिरफ्तार कर 7 दिन की रिमांड पर भेजा था। पूरे मामले की जाँच के लिए पुलिस कमिश्नर ने 6 सदस्यीय कमेटी भी गठित की है। पुलिस की जाँच में पता चला है कि आरोपित के मोबाइल में 100 से ज्यादा अश्लील वीडियो हैं।

मोहसिन के साथ पुलिस FIR में नामजद अन्य लोगों की तलाश में भी लगी हुई है। इस कड़ी में बुधवार (28 मई 2025) की सुबह इंदौर के खजराना इलाके में इमरान के फोन की लोकेशन मिली। पुलिस ने दबिश देकर गिरफ्तार कर लिया है।

मोहसिन खान की गिरफ्तारी के बाद से उसका पूरा परिवार फरार है। पुलिस को उसके मामा और दो बड़े भाइयों-इमरान और साजिद की अब भी तलाश है।

पुलिस ने मोहसिन की एकेडमी को सील कर सीसीटीवी फुटेज जब्त कर लिए हैं। लड़कियों द्वारा उपलब्ध साक्ष्य की भी जाँच करवाई जा रही है। साथ ही पुलिस ने एकेडमी में आने वाली 40 से अधिक लड़कियों की सूची तैयार की है। उनसे भी पूछताछ की जाएगी।

अब तक पड़ताल में पता चला है कि मोहसिन खान लड़कियों के हाथ से कलावा खुलवाकर उन्हें गोमांस खिलाता था। फोटो-वीडियो बना लेता था और फिर वायरल करने की धमकी देकर अपने पास बुलाता था। इस केस में भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया है और 7 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

इस मामले को उजागर करने में बजरंग दल ने भी अहम भूमिका निभाई थी। पीड़िताओं में से एक ने बजरंग दल से सहायता माँगी थी। इसके बाद दल ने कई दिनों तक एकेडमी पर नजर रखी और जाँच के दौरान उन्हें कई वीडियो और बयान मिले।

बजरंग दल के जिला मंत्री ने बताया कि मोहसिन के फोन में 150 से भी ज़्यादा हिंदू युवतियों के फोटो और वीडियो मिले हैं। पुलिस उसके फोन से मिले हर एक डेटा की गहन पड़ताल कर रही है। इसके अलावा उसके बैंक खातों की पड़ताल की जा रही है। उसमें लड़कियों की ओर से भेजे गए पैसों के ट्रांजैक्शन मिले हैं। आगे भी जाँच जारी है।

बांग्लादेश में हिंदुओं के घर मुस्लिमों ने फूँके- मोहम्मद यूनुस ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट को माना सत्य, पर वामपंथी मीडिया को ‘मसाला’ देने के फेर में खुद बन गए मजाक

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, खासकर जब से 5 अगस्त 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया। इस बीच मुहम्मद यूनुस की सरकार न सिर्फ इन हमलों को नजरअंदाज कर रही है, बल्कि इन्हें छिपाने और झूठा ठहराने की कोशिश भी कर रही है।

यूनुस ने हाल ही में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट को निशाना बनाया, जिसमें जेसोर जिले के दहार मसिहती गाँव में हिंदू घरों को मुस्लिम भीड़ द्वारा जलाए जाने की बात कही गई थी। लेकिन यूनुस ने इस घटना को सांप्रदायिक हिंसा मानने से इनकार कर दिया और इसे महज ‘बिजनेस विवाद’ करार दिया।

क्या है पूरा घटनाक्रम, क्यों देनी पड़ रही सफाई

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट (बांग्लादेश में हिंदुओं पर फिर टूटा मुस्लिम भीड़ का कहर, घरों में लगाई आग-मचाई लूटमार: इस बार लोकल नेता की मौत को बनाया हिंसा का बहाना) में बांग्लादेशी अखबार प्रोथोम आलो के हवाले से बताया कि 22 मई को दहार मसिहती गाँव में एक मछली पालन के लिए जमीन के विवाद को लेकर बीएनपी की किसान शाखा के नेता तारिकुल इस्लाम की हत्या हो गई। इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने बदले की कार्रवाई में गाँव के 20 से ज्यादा हिंदू घरों को आग के हवाले कर दिया। दो दुकानें जला दी गईं और चार अन्य को तोड़-फोड़ दिया गया। इस हमले में 10 से ज्यादा लोग घायल हुए।

प्रोथोम आलो के पत्रकार ने बताया कि गाँव के हर हिंदू घर को जलाकर राख कर दिया गया। छह वाहन, पाँच बाइक और एक वैन भी नष्ट कर दी गई। हमलावरों ने एक 25 साल के हिंदू युवक सागर बिस्वास को अगवा कर लिया, जिसे बाद में छुड़ाया गया। पीड़ितों ने बताया कि पहले 4-5 लोगों ने हमला किया, फिर 150 से ज्यादा लोग शामिल हो गए और घरों को लूटकर, तोड़-फोड़ कर आग लगा दी।

झूठ बोलकर इस्लामी कट्टरपंथियों का बचाव कर रहे यूनुस

यूनुस ने इस घटना को सांप्रदायिक हिंसा मानने से साफ इनकार किया। उन्होंने बीबीसी और डीडब्ल्यू जैसे वामपंथी मीडिया के हवाले से दावा किया कि यह कोई सांप्रदायिक मामला नहीं, बल्कि तारिकुल की हत्या के बाद ‘गुस्साए ग्रामीणों’ की प्रतिक्रिया थी।

हैरानी वाली बात यह है कि जब तारिकुल की हत्या की बात आई, तो यूनुस ने हत्यारों को ‘हिंदू ग्रामीण’ कहा, लेकिन जब हिंदू घरों को जलाने की बारी आई, तो हमलावर सिर्फ ‘गुस्साए ग्रामीण’ बन गए। यह साफ दिखाता है कि यूनुस का मकसद हिंदुओं को बदनाम करना और मुस्लिम भीड़ को बचाना है।

यूनुस ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर हमला बोला, जिसमें लिखा था, “मुस्लिम भीड़ ने स्थानीय नेता की मौत के बाद हिंदू घरों को आग लगाई, यूनुस के राज में अराजकता जारी।” यूनुस ने इस खबर को गलत ठहराने की कोशिश की, लेकिन ऑपइंडिया की रिपोर्ट में कोई गलती नहीं थी।

यह पूरी तरह प्रोथोम आलो की खबर पर आधारित थी, जिसमें तथ्य साफ थे। यूनुस ने न तो इस रिपोर्ट के तथ्यों को गलत ठहराया, न ही कोई ठोस सबूत दिया। उनकी पूरी कोशिश थी कि ऑपइंडिया और अन्य भारतीय मीडिया, जो हिंदुओं पर हमलों की सच्चाई उजागर कर रहे हैं, उन्हें बदनाम किया जाए।

वामपंथी मीडिया की आड़ में सच्चाई छिपाने की कोशिश

यूनुस ने बीबीसी और डीडब्ल्यू जैसे वामपंथी मीडिया का सहारा लिया, जो हमेशा से हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को कम करके दिखाते हैं। ये मीडिया हाउस ‘फैक्ट-चेक’ के नाम पर सच्चाई को दबाने की कोशिश करते हैं।

इनका पुराना तरीका है- पहले हिंसा को पूरी तरह नकारो, अगर वह न चले तो उसे ‘राजनीतिक विवाद’ बताकर कमजोर कर दो। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले साफ तौर पर सांप्रदायिक हैं, लेकिन यूनुस और उनके वामपंथी मीडिया सहयोगी इसे ‘बिजनेस विवाद’ या ‘राजनीतिक तनाव’ बताकर सच को छिपा रहे हैं।

ऐसा ही इतिहास में हुआ है। जैसे औरंगजेब के मंदिर तोड़ने को कुछ इतिहासकार ‘राजनीतिक कदम’ बताते हैं, न कि धार्मिक असहिष्णुता। कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार को भी ‘राजनीतिक समस्या’ कहा जाता है, जबकि आतंकवादी खुलेआम इसे धार्मिक जंग कहते हैं। बांग्लादेश में भी यही हो रहा है। यूनुस और उनके समर्थक मीडिया हिंदुओं पर हमलों को झूठा या बढ़ा-चढ़ाकर बताया हुआ कहकर बच रहे हैं।

यूनुस की नाकामी और इस्तीफे की खबरें

यूनुस न सिर्फ हिंदुओं पर हमलों को छिपा रहे हैं, बल्कि उनकी सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। उनकी अंतरिम सरकार न तो ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनाव करा पाई है, न ही देश में अमन-चैन ला पाई है। अब खबरें हैं कि बढ़ते असंतोष के बीच यूनुस इस्तीफा दे सकते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, वह अपनी नाकामी छिपाने के लिए भारत विरोधी भावनाएँ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। उनके सहयोगी महमूदुर रहमान मन्ना ने दावा किया कि यूनुस ने देश को ‘भारतीय आधिपत्य’ के खिलाफ एकजुट होने को कहा। यह साफ दिखाता है कि यूनुस अपनी नाकामी का ठीकरा भारत पर फोड़कर अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऑपइंडिया पर हमला कर एक्सपोज हो गए मोहम्मद यूनुस

ऑपइंडिया ने जो बताया, वह पूरी तरह तथ्यों पर आधारित था। उनकी रिपोर्ट प्रोथोम आलो की खबर पर आधारित थी, जिसमें साफ था कि हिंदू घरों को निशाना बनाकर जलाया गया। ऑपइंडिया ने न सिर्फ इस घटना को उजागर किया, बल्कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे लगातार हमलों की सच्चाई को भी सामने लाया।

यूनुस का ऑपइंडिया पर हमला उनकी हताशा दिखाता है, क्योंकि वह नहीं चाहते कि उनकी सरकार की नाकामी और हिंदुओं पर अत्याचार की सच्चाई दुनिया के सामने आए। ऑपइंडिया ने निष्पक्ष पत्रकारिता की है और यूनुस के झूठ को बेनकाब करने में अहम भूमिका निभाई है।

यूनुस की सरकार हिंदुओं पर हो रहे हमलों को न सिर्फ नजरअंदाज कर रही है, बल्कि उन्हें छिपाने और गलत ठहराने की कोशिश भी कर रही है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट पूरी तरह सही थी, जिसे यूनुस ने बिना किसी सबूत के गलत बताने की कोशिश की। वामपंथी मीडिया के साथ मिलकर वह हिंदुओं पर हमलों को ‘बिजनेस विवाद’ या ‘राजनीतिक तनाव’ बताकर सच को दबा रहे हैं। लेकिन सच को ज्यादा देर तक छिपाया नहीं जा सकता। ऑपइंडिया और अन्य भारतीय मीडिया ने बांग्लादेश में हिंदुओं की दुर्दशा को सामने लाकर सराहनीय काम किया है। यूनुस को अपनी नाकामी छिपाने की बजाय हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लेख का भावानुवाद किया है श्रवण शुक्ल ने।)

तुर्क ऐसा है, तुर्क वैसा है… ये केवल बॉलीवुड की फिल्मों का बकवास है, असल में नंबर वन ‘चमन’ मुल्क है तुर्की: पाकिस्तानी गधों से भी हैं गए गुजरे

तुर्की के लोग पाकिस्तान की जनता से भी ज़्यादा मूर्ख और बुद्धू हैं। 2015 में तुर्की ने रूस के लड़ाकू विमान सुखोई को मार गिराया था। उसके बाद रूस में लोगों ने तुर्की के दूतावास के सामने प्रदर्शन और तोड़फोड़ की। स्वाभाविक रूप से, इसका जवाब तुर्की ने देने की सोची।

तुर्की के लोगों ने जवाब में रूसी झंडे जलाने का कार्यक्रम भी शुरू किया। लेकिन ये मूर्ख रूस और नीदरलैंड के झंडों में अंतर नहीं कर पाए और रूसी झंडे की जगह डच झंडा जला दिया। बिना किसी कारण के झंडा जलाए जाने के चलते नीदरलैंड के लोग तुर्की से नाराज़ हो गए। उन्होंने पूरे देश में हज़ारों तुर्की झंडे जला दिए।

इतना करने के बाद भी उनका गुस्सा कम नहीं हुआ। जब तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन 2017 में नीदरलैंड गए, तो डच सरकार ने उन्हें विनम्रता से कह दिया कि ‘इधर से फूट लो!’ यह सुनकर तुर्की के लोग फिर से भड़क गए, सड़कों पर उतर आए और फिर से झंडे जलाने लगे।

लेकिन मूर्खों के कोई गाँव भले ना होते हों, देश जरूर होता है। इसी का उदाहरण देते हुए उन्होंने डच का विरोध करने को इस बार डच के बजाय फ्रांसीसी झंडे जलाए। उसके बाद, आपने सोचा होगा कि फ्रांसीसी लोग तुर्की के झंडे जलाएँगे।

उन्होंने इसका और भी कड़ा जवाब दिया। उन्होंने तुर्की के झंडे का एक डोरमैट बनाया और उसे रौंद दिया। 2018 में कुवैत में एक व्यक्ति ने अपनी तुर्की की नौकरानी को मार डाला। तुर्की ने अपनी खुफिया एजेंसी से हत्यारे की एक फोटो मँगाई। तुर्की ने इस फोटो अपने टीवी पर बड़े धूमधाम से दिखाया।

उन्होंने यह भी घोषणा की कि वे मोसाद की तरह उसे ढूंढ कर मारेंगे। लेकिन इन तुर्की लोगों ने ‘गौर से देखो इस दरिंदे को’ वाली फोटो समेत जो खबर चलाई, उसमें उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून-जे-इनको दिखा दिया। उन्होंने राष्ट्रपति के साथ ट्रम्प कि बेटी को भी दिखाया था। इसके बाद तुर्की की बड़ी लानत-मलानत हुई।

तुर्की के पेपर को इसके बाद माफी माँगनी पड़ी। हालाँकि, इसके बाद भी अगले 2 महीने तक कोरिया में टॉयलेट पेपर पर तुर्की का झंडा लगा रहा। ऐसे देश के लिए चुप रहना ही बेहतर था। लेकिन इस बीच उन्होंने अजरबैजान के लिए आर्मेनिया से झगड़ा किया और अपनी मिसाइलों और विमानों का मज़ाक उड़वाया।

फिर पाकिस्तान की मदद करने आए और उनके ड्रोन की इज्जत में मिट्टी में मिलवा दी। ऊपर से बहिष्कार की वजह से तुर्की का व्यापार और आय भी रसातल को गई। खैर! इस कहानी से सीख मिलती है: ‘तुर्क ऐसा है और तुर्क वैसा है’, ऐसी बकवास सिर्फ़ बॉलीवुड की फिल्मों में होती है। अन्यथा, तुर्की नंबर एक का ‘चमन’ देश है।

‘रीजनरेटिव ब्रेकिंग’ को नहीं समझ पाए कॉन्ग्रेसी, उड़ाने लगे रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का ‘मजाक’: जानिए कैसे काम करती है यह तकनीक, कितनी होगी बिजली की बचत?

26 मई को कई कॉन्ग्रेस समर्थकों ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का मजाक उड़ाया। इनका मानना है कि लोकोमोटिव इंजन के ब्रेकिंग सिस्टम के जरिए बिजली पैदा करने और उसे वापस ट्रांसमिशन लाइनों में ट्रांसफर करने के बारे में रेल मंत्री ने झूठ बोला।

अश्विनी वैष्णव ने कहा था, ” ये जो नया इंजन है, जब चलता है तो ऊपर के तार से बिजली लेता है, और जब रुकता है तो अपने जेनेरेटर से बिजली लेता है और ये बिजली वापस ट्रैक के ऊपर लगे तारों में भेजता है।”

ये बयान दाहोद में 9000 HW के पहले लोकोमोटिव इंजन के लॉन्च के दौरान रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के बारे में बात करते हुए दी थी।

कॉन्ग्रेस समर्थकों ने तकनीक को समझे बिना उनका मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। एक्स पर एक पोस्ट में एमॉक ने लिखा, “ट्रेन तार से बिजली लेती है और जब ड्राइवर ब्रेक लगाता है तो वह उसी तार में वापस बिजली भेजती है, अश्विनी वैष्णव। कोई इतने आत्मविश्वास के साथ ऐसी मसखरी कैसे कर सकता है?”

पत्रकार पीयूष राय, जो अपनी मर्जी से या फिर गलती से इस तकनीक से अंजान थे। उन्होने लिखा, “मैं अभी भी इसे समझने की कोशिश कर रहा हूँ। रेल मंत्री ने यह काम तब किया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंच पर थे।”

एक और कॉन्ग्रेस समर्थक हैंडल ‘यूनाइटेड विद आईएनसी’ ने लिखा, “ट्रेन तार से बिजली लेती है और जब चालक ब्रेक लगाता है तो वह उस बिजली को उसी तार में वापस भेज देती है – अश्विनी वैष्णव, रील मंत्री।”

विवादास्पद एक्स हैंडल वी द्रविड़ियन ने लिखा, “दुखद तथ्य यह नहीं है कि अश्विनी वैष्णव मोदी की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि यह है कि वे मोटे तौर पर कह रहे हैं कि ट्रेन को तार से करंट मिलता है और जब पायलट ब्रेक लगाता है, तो इंजन बिजली को वापस तार में भेज देता है। देवियो और सज्जनों, हम मंत्रियों के साथ नहीं रह रहे हैं। हम एक क्वांटम दायरे में रह रहे हैं जहाँ अश्विनी वैष्णव निकोलस टेस्ला हैं।”

वी द्रविड़ियन हैंडल दक्षिण भारत से संचालित होता है, जहाँ जाहिर तौर पर तकनीक का बोलबाला है, फिर भी ये सोच दिखी।

अश्विनी वैष्णव का बयान

दाहोद में इलेक्ट्रिक इंजन फैक्ट्री के उद्घाटन के अवसर पर बोलते हुए, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे यह प्लांट आधुनिक इंजीनियरिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि नए लोकोमोटिव सिर्फ़ इंजन से कहीं बढ़कर हैं – वे बिना किसी शोर, कंपन के ‘चलते-फिरते कंप्यूटर सेंटर’ हैं और इनमें एयर-कंडीशन्ड केबिन और ऑनबोर्ड शौचालय भी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ये इंजन चलते समय ओवरहेड तारों से बिजली खींचते हैं और ब्रेक लगाने पर रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के जरिए उसी तारों को बिजली वापस भेजते हैं।

उन्होंने कहा, “जब ट्रेन चलती है, तो वह ओवरहेड वायर से बिजली खींचती है। जब ब्रेक लगाए जाते हैं, तो इंजन जनरेटर में बदल जाता है और ओवरहेड वायर को बिजली वापस भेजता है। यह आधुनिक तकनीक का चमत्कार है।”

भारत ने रीजेनरेटिव ब्रेकिंग तकनीक से लैस अपना पहला 9000 HW इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव पेश किया है। यह रेलवे नवाचार में एक बड़ी उपलब्धि है। इंजन को पीएम मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किया और इसे गुजरात के दाहोद में बनाया गया है। इंजन का कोडनेम, डी9, दाहोद-9000 है।

21,405 करोड़ रुपये की लागत वाली इस इकाई से अगले दशक में 1,200 लोकोमोटिव बनाने की उम्मीद है, जिनमें से प्रत्येक 75 किमी/घंटा की औसत गति से 4,600 टन तक का भार ढोने में सक्षम है। भारतीय रेलवे इन इंजनों को निर्यात करने पर भी विचार कर रहा है।

रीजेनरेटिव ब्रेकिंग क्या है?

रीजेनरेटिव ब्रेकिंग एक परिपक्व और प्रभावी तकनीक है जो धीमी होने के दौरान ट्रेन की गतिज ऊर्जा को बिजली में बदल देती है। पारंपरिक गतिशील ब्रेकिंग सिस्टम में, ऊर्जा आमतौर पर गर्मी के रूप में बर्बाद हो जाती है। हालाँकि, रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के मामले में, ऊर्जा इलेक्ट्रिक मोटर्स में करंट को उलट देती है, जिससे ट्रेन के धीमे होने पर वे जनरेटर में बदल जाती हैं।

जितना बिजली का उत्पादन होता है, उसे फिर से बिजली वितरण प्रणाली में भेजा जाता है, जहाँ इसका उपयोग अन्य ट्रेनों या स्टेशन सुविधाओं को बिजली देने के लिए किया जा सकता है।

यह तकनीक एसी सिस्टम पर चलने वाली इलेक्ट्रिक ट्रेनों में विशेष रूप से प्रभावी है, जहाँ इसे न्यूनतम अतिरिक्त लागत के साथ लागू किया जा सकता है। डीसी-संचालित प्रणालियों को कम वोल्टेज स्तर और ग्रिड को बिजली वापस करने की सीमित क्षमता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, हालाँकि अपग्रेड से उनकी दक्षता में सुधार हो सकता है।

बजरंग बली के जन्मस्थान को कब्जे में लेना चाहती थी कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार, अंजनेय मंदिर के मुख्य पुजारी को हटाने की रची साजिश: SC ने एक्शन पर लगाई रोक

कर्नाटक के कोप्पल में भगवान हनुमान के जन्मस्थान माने जाने वाले श्री अंजनेय मंदिर का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। कॉन्ग्रेस सरकार ने मंदिर के मुख्य पुजारी विद्यादास बाबाजी को हटाकर मंदिर पर कब्जा करने की कोशिश की थी। हालाँकि कॉन्ग्रेस सरकार की मंशा पर पानी फिर गया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उसके इस फैसले पर रोक लगा दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि विद्यादास बाबाजी मंदिर में पूजा-पाठ करते रहेंगे और उन्हें मंदिर परिसर में एक कमरे में रहने की सुविधा दी जाएगी। यह फैसला मार्च 2025 के घटनाक्रम के बाद आया, जब सरकार ने पुजारी को हटाने की कोशिश तेज कर दी थी।

बजरंग बली के जन्मस्थान पर कब्जे की कोशिश

तुंगभद्रा नदी के तट पर अंजनेय पहाड़ी पर स्थित श्री अंजनेय मंदिर को बजरंग बली का जन्मस्थान माना जाता है और यह हिंदुओं के लिए बेहद पवित्र है। विद्यादास बाबाजी इस मंदिर के मुख्य पुजारी हैं और उनका रामानंदी समुदाय पिछले 120 साल से मंदिर में पूजा-पाठ करता आ रहा है। लेकिन 2018 में कर्नाटक सरकार ने कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। जिला कलेक्टर ने कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1997 की धारा 23 के तहत मंदिर को अपने कब्जे में लेने का आदेश दिया। इसके बाद विद्यादास को हटाने की कोशिश शुरू हुई।

विद्यादास ने इस फैसले के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 14 फरवरी 2023 को हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश दिया कि विद्यादास को मंदिर में पूजा करने से नहीं रोका जाए और उनके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाए। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस आदेश की अनदेखी की। मार्च 2025 में कोप्पल के डिप्टी कमिश्नर और असिस्टेंट कमिश्नर ने चुनाव आयुक्त के साथ मंदिर पहुँचकर विद्यादास को पूजा करने से रोका और एक नए पुजारी को नियुक्त करने की कोशिश की। याचिका के मुताबिक, अधिकारियों ने विद्यादास को धमकाया और अपमानित किया।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

विद्यादास के वकील विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि कॉन्ग्रेस सरकार हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रही है। उन्होंने बताया कि मुख्य पुजारी विद्यादास को न सिर्फ पूजा करने से रोका गया, बल्कि उनके निवास की बिजली काट दी गई और उन्हें मंदिर से हटाने के लिए साजिश रची गई। याचिका में यह भी आरोप है कि कुछ कर्मचारियों ने विद्यादास को ‘गाँजा’ (कैनबिस/ड्रग्स) केस में फँसाने की कोशिश की।

जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा, “कर्नाटक सरकार हाई कोर्ट के 14 फरवरी 2023 के आदेश का पालन करे। विद्यादास को मंदिर में पुजारी के तौर पर काम करने और एक कमरे में रहने की इजाजत दी जाए। अगर इस आदेश का पालन नहीं हुआ, तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा।” कोर्ट ने सरकार को नोटिस भी जारी किया।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार पर उठ रहे गंभीर सवाल

ये पूरा मामला कॉन्ग्रेस सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है। हिंदू समुदाय का मानना है कि यह मंदिर उनकी आस्था का केंद्र है और सरकार का इसे अपने कब्जे में लेना धार्मिक परंपराओं के साथ खिलवाड़ है। विद्यादास ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की थी, लेकिन 9 अप्रैल 2025 को हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिंदू समुदाय के लिए राहत भरा है। हालाँकि कोर्ट का अंतिम फैसला बाकी है। फिलहाल विद्यादास बाबाजी मंदिर में पूजा-पाठ जारी रख सकते हैं।

‘कावेरी’ इंजन की रूस में हो रही टेस्टिंग, UCAV एयरक्राफ्ट में लगेगा: सोशल मीडिया में फंड कैम्पेन के बाद आई नई जानकारी, रिपोर्ट में बताया- तेजस-AMCA में भी इंटीग्रेट करने का प्लान

सोशल मीडिया में वर्तमान में Fund Kaveri Engine (फंड कावेरी इंजन) का ट्रेंड चल रहा है। नेटीजेंस की माँग है कि भारत के स्वदेशी फाइटर इंजन प्रोग्राम कावेरी को और भी फंड स मुहैया करवाए जाएँ। इस बीच इसको लेकर एक सकारात्मक खबर सामने आई है।

ANI की एक खबर के अनुसार, कावेरी इंजन की वर्तमान में रूस में टेस्टिंग चल रही है। यह टेस्टिंग DRDO कर रहा है। अभी कावेरी इंजन को 25 घंटे और टेस्ट किया जाना है। इसके बाद यह भारत के स्टेल्थ अटैक ड्रोन UCAV में इंटीग्रेट किया जाएगा। UCAV को भारत में बनाया जा रहा है और इसके भी जल्द अंतिम रूप लेने की संभावना है।

रिपोर्ट बताती है कि कावेरी इंजन की टेस्टिंग के लिए रूस की एजेंसियों ने स्लॉट भी मुहैया करवा दिए हैं। यह टेस्टिंग रूस की राजधानी मॉस्को के निकट एक टेस्ट फैसिलिटी में हो रही है। यहाँ इस कावेरी इंजन को एक IL-76 कार्गो एयरक्राफ्ट पर लगाया जाता है और अलग-अलग पैमानों पर जाँच की जाती है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि DRDO इसे आगे UCAV के अलावा भारत के स्वदेशी एयरक्राफ्ट LCA तेजस में भी इंटीग्रेट करने की योजना पर काम कर रहा है। DRDO इसी के साथ इसे भारत के पाँचवी पीढ़ी के एयरक्राफ्ट AMCA में भी इंटीग्रेट करने पर विचार कर रहा है।

रूस में टेस्टिंग का कारण भारत के पास इससे जुड़ा इन्फ्रा नहीं होना है। कावेरी या ऐसा कोई भी इंजन बड़े कार्गो विमानों पर टेस्ट किया जाता है। इन्हें ‘टेस्टबेड’ कहा जाता है। भारत के पास कोई ऐसा टेस्टबेड नहीं है। इसके चलते कावेरी इंजन की टेस्टिंग भारत में नहीं हो पाती।

फंड कावेरी इंजन अभियान चलाने वालों की माँग है कि भारत ऐसा ही एक टेस्टबेड तैयार करे। इसके अलावा जिन भी टेस्टिंग सुविधाओं के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है, उन्हें भी भारत में विकसित किया जाए। यदि यह इंजन पूरी तरह से विकसित हो जाता है तो भारत को विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

क्या है कावेरी इंजन?

कावेरी’ उस इंजन प्रोग्राम का नाम है, जिसे डिफेन्स रिसर्च एंड डेवेलपमेंट आर्गेनाईजेशन (DRDO) भारत के लिए विकसित कर रहा है। DRDO की GTRE लैब इसे बना रही है। योजना है कि यह कावेरी इंजन आने वाले समय में हमारे स्वदेशी लड़ाकू विमानों में लगाया जाएगा।

इस पर लम्बे समय से काम चल रहा है। कुछ तकनीकी सीमाओं और कभी कभार फंडिंग की कमी के चलते यह प्रोजेक्ट लटका हुआ है। सबसे पहले कल्पना की गई थी कि कावेरी इंजन को भारत के अपने लड़ाकू विमान LCA तेजस में लगाया जाएगा।

कावेरी इंजन के समय पर तैयार ना हो पाने और इसका प्रदर्शन आशानुरूप ना होने के चलते इसे LCA तेजस प्रोग्राम से अलग कर दिया गया था। इसके LCA तेजस में अमेरिकी कम्पनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के बने F404 इंजन लगाए गए हैं।

भारत अब बड़ी संख्या में तेजस विमान बना रहा है लेकिन अमेरिकी कम्पनी GE इंजन की डिलीवरी में देरी कर रही है। इसके चलते नए तेजस मार्क-1A विमानों का निर्माण धीमी गति से हो रहा है। इसका सीधा प्रभाव भारत की एयरफ़ोर्स पर पड़ रहा है, जो विमानों की कमी से जूझ रही है।

पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने वालों के इंटरव्यू हो रहे रद्द, वीजा पर लगी रोक: ट्रंप की नई विदेश नीति में फिलिस्तीन-गाजा के समर्थकों पर निशाना

ट्रंप प्रशासन ने एक और बड़ा फैसला लिया है, जिसका असर दुनियाभर के उन छात्रों पर पड़ेगा जो अमेरिका में पढ़ना चाहते हैं। अब अमेरिका ने अपने दूतावासों को स्टूडेंट और एक्सचेंज विजिटर वीजा (F, M, J कैटेगरी) के लिए नए अपॉइंटमेंट लेने से रोक दिया है। यह कदम अमेरिकी विदेश डिपार्टमेंट द्वारा विदेशी छात्रों की सोशल मीडिया जाँच को और सख्त करने की तैयारी का हिस्सा है।

क्यों लिया गया यह फैसला?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बताया कि एक समीक्षा के बाद छात्र वीजा आवेदकों की सोशल मीडिया जाँच के लिए नए नियम बनाए जाएँगे। जब तक ये नए नियम नहीं आ जाते, तब तक दूतावासों को नए वीजा अपॉइंटमेंट शेड्यूल करने से रोका गया है। हालाँकि, पहले से तय किए गए अपॉइंटमेंट चलते रहेंगे।

यह फैसला ट्रंप प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वे लोगों को देश से बाहर भेजने (डिपोर्टेशन) और छात्र वीजा रद्द करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रशासन खासकर उन छात्रों और ग्रीन कार्ड धारकों को निशाना बना रहा है जो फिलिस्तीन का समर्थन करते हैं या गाजा में इजरायल की कार्रवाई की आलोचना करते हैं। प्रशासन उन्हें अमेरिकी विदेश नीति के लिए खतरा और हमास समर्थक मानता है।

अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, नए सोशल मीडिया जाँच के लिए दूतावासों को अपने काम करने के तरीकों में बदलाव करना होगा। उन्हें हर मामले में लगने वाले समय और संसाधनों को ध्यान में रखकर ही अपॉइंटमेंट देने को कहा गया है। दूतावासों को अमेरिकी नागरिकों की सेवाओं, इमिग्रेंट वीजा और धोखाधड़ी रोकने पर ज्यादा ध्यान देने की सलाह दी गई है।

सरकार क्या कह रही है?

अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने इस फैसले पर सीधे टिप्पणी करने से मना कर दिया, लेकिन उन्होंने कहा कि अमेरिका देश में आने वाले हर व्यक्ति की जाँच के लिए हर तरीका अपनाएगा। उन्होंने कहा, “हम यह जानने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे कि आने वाला व्यक्ति कौन है, चाहे वह छात्र हो या कोई और।”

पहले भी ऐसे मामले

ट्रंप के आलोचकों ने इस कदम को अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पर हमला बताया है। हाल ही में, टफ्ट्स यूनिवर्सिटी की एक तुर्की छात्रा को गाजा में इजरायल की कार्रवाइयों की आलोचना करने वाले एक लेख के कारण छह हफ्तों तक लुइसियाना के एक इमिग्रेशन डिटेंशन सेंटर में रखा गया था। बाद में एक फेडरल जज ने उसे जमानत दे दी।

पिछले हफ्ते भी, ट्रंप प्रशासन ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को अंतरराष्ट्रीय छात्रों को दाखिला देने से रोकने की कोशिश की थी। हार्वर्ड में लगभग 6,800 अंतरराष्ट्रीय छात्र हैं, जो कुल छात्रों का 27% हैं। प्रशासन ने हार्वर्ड की नीतियों में बड़े बदलाव की माँग की थी, जिसके विरोध के बाद यह कदम उठाया गया।