Home Blog Page 3875

‘मेरे साथ जाहिल गाँव वाले की तरह बात मत करो’: गाँधी होते तो त्रिपुरा के DM साहब से क्या कहते?

त्रिपुरा (वेस्ट) के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट शैलेश कुमार यादव ने उसी विवाह समारोह को बंद करवाने के लिए रेड मारा जिसकी अनुमति उन्होंने खुद दी थी। पुलिसकर्मियों के साथ वैवाहिक स्थल पर जाकर धूम मचाने का उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में जो सबसे आपत्तिजनक बात नजर आई, वह है उनका व्यवहार। विवाह समारोह के लिए जिम्मेदार घरवालों के साथ जो करते हुए उन्हें देखा गया वह एक सरकारी अधिकारी के लिए उचित नहीं जान पड़ता।

कानून लागू करवाना सरकारी अधिकारी की जिम्मेदारी है। पर उसे कैसे लागू करवाना है, इस बात पर उन्हीं अधिकारियों के विवेक और धैर्य की परीक्षा होती है। वैवाहिक समारोहों में केवल दो घरों के लोग ही नहीं, उनके मेहमान भी होते हैं। ऐसे में इतने लोगों के बीच सबके साथ इस तरह का व्यवहार इन लोगों के मन में सरकारी अधिकारियों के प्रति एक धारणा छोड़ जाता है जो शायद जीवन भर के लिए उनके मन मस्तिष्क में रहे और खुद के साथ अपराधी की तरह किए गए व्यवहार को शायद ही कोई नागरिक भुला सके।

उसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात आए दिन सामने आती है जिसमें एक आम नागरिक यह प्रश्न उठाता है कि ये अधिकारी ऐसा ही व्यवहार ‘समुदाय विशेष’ के लोगों के साथ कर सकता था? यह प्रश्न गलत है या सही, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह प्रश्न पूछा जा रहा है। हम चाहे ऐसे प्रश्न के आगे अपनी आँखें बंद कर लें पर प्रश्न तो हमारी बंद आँखों के सामने खड़ा रहेगा। इसका उत्तर देने की क्षमता केवल उन सरकारी अफसरों के पास है जो सार्वजनिक स्थलों पर नागरिकों के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं। सोचने की आवश्यकता है कि यह प्रश्न क्या बिलकुल ही बेमानी है जिसके लिए हमेशा के लिए आँख और कान बंद कर लिए जाएँ ताकि ये प्रश्न न तो सुनने को मिलें और न ही पढ़ने को दिखें।

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के व्यवहार की चर्चा और आलोचना, दोनों हो रही है। किसी को इस बात से ऐतराज नहीं कि क़ानून का पालन होना चाहिए पर यदि ऐसे समारोह में ऐसा कुछ हो गया जिससे क़ानून को ठेस पहुँची तो क्या सरकारी अधिकारी क़ानून को ठेस पहुँचाने वालों के साथ वही सब कुछ करेंगे जैसा वे जुआघर या अवैध शराबखाने पर छापे के दौरान करते हैं? जिनके घर वैवाहिक समारोह है वे जुआघर चलाने वाले तो नहीं हैं कि उन्हें थप्पड़ मारे जाएँ या गाली दी जाए। वे ऐसे अपराधी तो नहीं हैं कि उन्हें सबके सामने धमकी दी जाए।

यह बहस अनवरत चल सकती है कि गलती किसकी है। दोनों पक्ष के लोग अपनी-अपनी बातें तर्क, वितर्क या फिर कुतर्क के रूप में रख सकते हैं पर सच यही है कि जिस समारोह के लिए अनुमति पर खुद डीएम साहब ने दस्तख़त किए हों, उसी समारोह में जाकर इस तरह के व्यवहार को उचित ठहराना उनके लिए आसान न होगा। त्रिपुरा उत्तर-पूर्व के राज्यों में से एक है और अफ़सरों के लिए वहाँ रहकर सुचारु रूप से शासन-व्यवस्था चलाना एक चुनौती होती है। अधिकारियों के लिए अपने मन से व्यवस्था चलाने के लिए जगह रहती है। ऐसी सुविधा नहीं होती कि वे स्थानीय लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करते हुए दिखें जैसा डीएम साहब ने किया, क्योंकि ऐसा व्यवहार उनके बारे में ही नहीं बल्कि सरकारी तंत्र के बारे में गलत धारणाएँ बनाने में मदद करता है।

हो सकता है सरकारी अधिकारियों के लिए कोई मॉडल कोड ऑफ कांडक्ट हो या न भी हो पर उनके पास विवेक तो होना ही चाहिए। माना कि बहुत सारे अधिकारियों को शौक होता है कि वे अमिताभ बच्चन के जवानी के दिनों वाले पुलिसिया किरदार को रीयल लाइफ में सार्वजनिक तौर पर करते हुए नजर आएँ, पर सार्वजनिक व्यवहार का अलिखित कोड भी बताता है कि ऐसे शौक अपराधियों के लिए रिज़र्व रखें जाएँ और उचित समय पर ही पूरे किए जाएँ। ऐसे शौक पढ़े-लिखे निरीह शहरी पर आजमाने से आम लोगों के लिए अधिकारी वर्ग के प्रति गलत धारणा बनाने में सुभीता रहेगा और वे अधिकारियों के साथ अपनी बनाई उसी धारणा के अनुरूप व्यवहार करेंगे।

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट माननीय शैलेश कुमार यादव ने मेजबानों में से किसी से कहा कि मेरे साथ जाहिल गाँव वाले की तरह बात मत करो, मैं तुम्हारा डीएम हूँ। गाँव वालों के लिए ऐसी सोच क्यों रखनी? भारतवर्ष का सरकारी तंत्र बात-बात पर जिन महात्मा गाँधी की कसम खाता है, उन्होंने ही कहा था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। यदि महात्मा की बात सच है और देश की आत्मा गाँवों में ही बसती है तो गँवई व्यक्ति को जाहिल बुलाकर ऐसी दृष्टि से देखने की सलाह क्या महात्मा देते? डीएम साहब को एक बार खुद से अवश्य पूछना चाहिए कि उनकी इस बात पर महात्मा गाँधी जी होते तो क्या कहते?

महाराष्ट्र सरकार ने कोविड खत्म मानकर 25% संविदा स्वास्थ्य कर्मियों को कर दिया था बर्खास्त, अब कर्मचारियों की भारी किल्लत

महाराष्ट्र सरकार ने इस साल जनवरी में यह सोचते हुए कि कोविड-19 संकट खत्म हो गया है एक दिन की बर्खास्तगी की सूचना के साथ 25 फीसदी संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों को हटा दिया। जैसे ही राज्य में कोविड मामलों में कमी आने लगी, महा विकास अघाड़ी सरकार ने अचानक ही उन स्वास्थ्य कर्मचारियों को जाने को कह दिया जिन्हें पिछले साल अप्रैल महीने के दौरान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत काम पर रखा गया था।

इस कदम ने उन्हें टीकाकरण अभियान के लिए अयोग्य बना दिया जो फ्रंटलाइन श्रमिकों के लिए शुरू होना था। कोरोना योद्धा कर्मचारी परिषद के अध्यक्ष प्रमोद केट ने कहा, “हम काम करने आए थे क्योंकि मुख्यमंत्री ने लोगों से आगे आने और मदद करने की अपील की थी। उस समय, अस्पतालों में स्थायी कर्मचारी काम पर नहीं आ रहे थे, लेकिन हमने अपने परिवारों की परवाह नहीं की और कोविड रोगियों के साथ काम किया। हमें बदले में क्या मिल रहा हैं बर्खास्तगी से पहले एक दिन का नोटिस। हम सरकार से माँग करते हैं कि वह हमें बहाल करे और स्थाई नौकरी दे।”

इन 10,000 संविदात्मक कर्मचारियों में से, 1,000 मुंबई के विभिन्न अस्पतालों में कार्यरत थे, जबकि 5000 से अधिक पूर्वी विदर्भ में काम पर रखे गए थे।

पूजा डोइफोड़े, जिन्होंने बीएमसी के ई वार्ड में एक बहुउद्देश्यीय कार्यकर्ता के रूप में काम किया, ने कहा, “जब हमने जॉइन किया था, तो हमने अपने परिवारों को जोखिम में डाल दिया था। हम में से कई कोविड -19 संक्रमित हो गए थे। हमने ऐसे समय में काम किया जब कोई भी अपने घरों से बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं था। हमने पीपीई किट में घंटों बिताए और कोविड पॉजिटिव शवों को स्थानांतरित किया। जब आवश्यकता पूरी हो गई तो हमें छोड़ने के लिए कहने के बजाय हम एक गरिमापूर्ण व्यवहार के हकदार हैं।”

स्वास्थ्य कर्मचारियों को डॉक्टरों, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट, मेडिकल ऑफिसर, हॉस्पिटल मैनेजर, नर्स, एक्स-रे तकनीशियन, ईसीजी तकनीशियन, प्रयोगशाला तकनीशियन, दवा निर्माता, स्टोर कीपर, डेटा एंट्री ऑपरेटर, वार्ड बॉय श्रेणियों में कोविड-19 अस्पतालों और कोविड देखभाल सुविधा केंद्रों पर मरीजों की आमद का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त किया गया था।

इन स्वास्थ्य कर्मियों ने अपनी निर्बाध और नि: स्वार्थ सेवा के लिए स्थायी रोजगार की माँग करते हुए राज्य भर में कई विरोध प्रदर्शन किए।

महाराष्ट्र में स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी

हालाँकि, कर्मचारियों की छंटनी का कदम राज्य सरकार के लिए उल्टा पड़ गया क्योंकि कोरोनोवायरस की दूसरी लहर के आने के साथ ही राज्य स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों की कमी से जूझने लगा।

महाराष्ट्र जो नए कोरोनोवायरस मामलों में अचानक तेजी से प्रभावित होने वाले सबसे पहले राज्यों में से एक था, वर्तमान में स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की बड़ी कमी का सामना कर रहा है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजेश भूषण ने इस महीने की शुरुआत में अपने असंतोषजनक प्रदर्शन को लेकर महाराष्ट्र सरकार को सावधान किया था। मंत्री ने संविदा कर्मियों की भर्ती में तेजी लाने के लिए महाराष्ट्र राज्य को खत लिखा। उन्होंने पत्र में जानकारी देते हुए कहा, औरंगाबाद, नंदुरबार, यवतमाल, सतारा, पालघर, जलगाँव, जालना जिलों की टीमों द्वारा स्वास्थ्यकर्मी कार्यबल की बड़ी संख्या में कमी की सूचना दी गई है।”

भूषण ने महामारी की दूसरी लहर के प्रति महाराष्ट्र के सुस्त रवैए की भी आलोचना की। केंद्रीय टीम से प्राप्त मूल फीडबैक के बाद, भूषण ने लिखा कि सतारा, सांगली और औरंगाबाद में कंटेनमेंट ऑपरेशन को औसत पाया गया जोकि संतोषजनक नहीं था, सतारा, औरंगाबाद और नांदेड़ में निगरानी और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को औसत पाया गया, इसकी मुख्य वजह इस कार्य में लगी सीमित जनशक्ति को पाया गया।

महाराष्ट्र में मंगलवार को कोरोना वायरस के 66,358 नए मामले सामने आए और 895 मौतें हुईं, इससे राज्या में कुल मृतकों की संख्या 66,179 हो गई है।

महाराष्ट्र में हुई RSS कार्यकर्ता की मौत, पत्रकार साक्षी जोशी ने दोष दिया मध्य प्रदेश के CM शिवराज को: पोल खुलने पर डिलीट किया ट्वीट

महाराष्ट्र के नागपुर में हुई एक घटना के लिए पत्रकार साक्षी जोशी सहित कुछ लोगों ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिम्मेदार ठहराया। पोल खुलने के बाद उन्होंने ट्वीट को चुपके से डिलीट भी कर लिया। ये मामला RSS स्वयंसेवक नारायण भाऊराव दाभाडकर से जुड़ा है, जिन्होंने कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बावजूद अस्पताल में अपना बेड एक अन्य मरीज को दे दिया। इसके 3 दिन बाद 85 वर्षीय नारायण का निधन हो गया।

इस घटना को लेकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनकी सराहना की। चौहान ने उस बात को शेयर किया, जो नारायण भाऊराव दाभाडकर ने अपने बेड दूसरे मरीज को देते समय कही थी। उन्होंने कहा था, “मैंने अपनी ज़िंदगी जी ली है। मेरी उम्र अब 85 साल है। इस महिला का पति युवा है। उस पर परिवार की जिम्मेदारी है, इसलिए मेरा बेड उसे दे दिया जाए।”

ऐसा आग्रह कर के वयोवृद्ध RSS कार्यकर्ता अपने घर लौट गए थे। इसके 3 दिन बाद उनका निधन हो गया। उनका ऑक्सीजन लेवल 60 पर पहुँच गया था। इससे पहले बेटी-दामाद उन्हें इंदिरा गाँधी शासकीय अस्पताल ले गए थे, जहाँ बड़ी मुश्किल से बेड मिला था। वहीं इलाज की प्रक्रिया के दौरान एक 40 वर्षीय महिला अपने पति को लेकर आई थी। अस्पताल में बेड खाली न होने पर उसे भर्ती से मना कर दिया गया।

वो महिला फफक-फफक कर रोने लगी, जिसके बाद नागपुर के नारायण भाऊराव दाभाडकर ने आग्रह किया कि उनका बेड इस महिला के पति को दे दिया जाए, वरना उसके बच्चे अनाथ हो जाएँगे। अस्पताल प्रशासन ने उनसे कागज़ पर लिखवाया भी कि वे स्वेच्छा से दूसरे मरीज के लिए अपना बेड दे रहे हैं। स्वीकृति पत्र भर कर वो घर लौट गए थे। सीएम शिवराज ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, “समाज और राष्ट्र के सच्चे सेवक ही ऐसा त्याग कर सकते हैं, आपके पवित्र सेवा भाव को प्रणाम! आप समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।”

सोशल मीडिया में जम कर शेयर हो रही है ये खबर (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)

पत्रकार साक्षी जोशी ने इसी ट्वीट पर प्रतिक्रिया दी। हाल ही में TMC के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शौचालय जाने को लेकर सवाल करने वाली साक्षी ने लिखा, “दिल से सलाम और सम्मान RSS के स्वयंसेवक नारायण जी के लिए, लेकिन आपके लिए नहीं शिवराज जी। वजह तो आप समझ गए होंगे। आप CM हैं। आपके ‘सिस्टम’ के कारण नारायण जी को ऐसा फैसला करना पड़ा।”

साक्षी जोशी ने आगे लिखा, “स्वयंसेवक तो आप भी रहे होंगे लेकिन पद मिल गया तो कर्तव्य भूल गए। नारायण जी को मेरा नमन।” जबकि सच्चाई ये है कि नागपुर, मध्य प्रदेश में नहीं बल्कि महाराष्ट्र में है और वहाँ के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे हैं, जिनसे साक्षी जोशी जैसे पत्रकार सवाल नहीं पूछते। वहाँ भाजपा विरोधी 3 दलों शिवसेना-NCP-कॉन्ग्रेस की ‘महाविकास अघाड़ी’ सरकार चल रही है। लेकिन, दोष पड़ोसी राज्य के CM को ही दिया जाएगा, क्योंकि पत्रकार लिबरल गिरोह की है।

‘मैं सन्न हूँ… वह मेरी आँखें थी’: वानखेड़े में सचिन के पहले मैच में स्कोरर थे सुहास, अब कोरोना ने किया ‘नेत्रहीन’

कोरोना संक्रमण ने कई लोगों से जीने का सहारा छीन लिया। ऐसे ही लोगों में से एक हैं ठाणे के सुहास मराठे। सुहास पेशे से क्रिकेट के आँकड़ों, रिकॉर्ड आदि को संकलित (स्टैट्समैन) करने का काम करते हैं। लेकिन पिछले दिनों जब उनकी पत्नी सुचेता ने कोविड के कारण दम तोड़ दिया तो वह भी बुरी तरह टूट गए।

ऐसा नहीं है कि सुहास मराठे, पत्नी के गुजरने के बाद होश खो बैठे या उनके भीतर काम करने की इच्छा नहीं बची। उनके सामने परेशानी ये है कि वह नेत्रहीन हैं और इतने सालों से पत्नी ही उनके पास आँखें बनकर साथ-साथ थीं। आज जब सुचेता जा चुकी हैं तो वह कहते हैं, “मैं सन्न हूँ। टूट गया हूँ। वह मेरी आँखें थी।”

मिड-डे की रिपोर्ट के अनुसार, 69 वर्षीय सुहास मराठे की सुचेता से शादी 38 साल पहले हुई थी। सुहास को बाईं आँख से शुरुआत से ही नहीं दिखता था। लेकिन 2002 में कॉर्निया ट्रांसप्लांट के बाद वह पूरी तरह नेत्रहीन हो गए। अपनी पत्नी को याद करते हुए सुहास कहते हैं, “मेरी पत्नी अखबार और मैग्जीन पढ़कर मेरी मदद करती थी। उसने विभिन्न प्रकाशनों में आँकड़ों को संकलित करने में मेरी मदद की थी।”

सुहास मराठे के बारे में बता दें कि 1992-1993 में जब सचिन तेंदुलकर ने वानखेड़े स्टेडियम में अपना पहला टेस्ट मैच खेला तो वह वहाँ ऑल इंडिया रेडियो मराठी कमेंट्री के स्कोरर थे। इसके अतिरिक्त भी कई मैचों में वे स्कोर संकलित करने का काम कर चुके हैं।

कुछ दिन पहले वह और उनकी पत्नी दोनों कोरोना संक्रमित हुए थे। ठाणे के अस्पताल में दोनों इलाज चला। सुहास तो ठीक हो गए, लेकिन उनकी पत्नी वेंटिलेटर सपोर्ट पाने के बाद भी बच नहीं सकीं। वह कहते हैं, “मुझे  इस समय खुद को मजबूत करना होगा। कुछ लोग इस समय बहुत-बहुत समर्थन दे रहे हैं जैसे, शिरिष कोंकार और उनके माध्यम से भारत के स्टैट्स गुरु मोहन मेनन से संवेदनाएँ पाकर भी अच्छा लगा।”

18-45 वर्ष के लिए टीकाकरण में दो दिन शेष, अब जाकर महाराष्ट्र ने लिया निर्णय: 20 मई के बाद लगेगा फ्री वैक्सीन

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। बुधवार (27 अप्रैल) को पूरे देश में कोरोनावायरस संक्रमण के 3.6 लाख से अधिक नए मामले आए। साथ ही 3200 से अधिक मौतें भी रिकॉर्ड की गईं। राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र अभी भी सर्वाधिक संक्रमित राज्यों में अव्वल स्थिति पर बना हुआ है। राज्य में अब तक 4.34 मिलियन केस सामने आ चुके हैं और लगभग 65,000 से अधिक मौतें हो चुकी हैं। राज्य में कई दिनों से लगातार 50,000 से अधिक संक्रमित मामले रोजाना दर्ज हो रहे हैं।

ऐसी स्थिति के बाद भी महाराष्ट्र की सरकार 1 मई से शुरू होने वाले टीकाकरण के तीसरे चरण के लिए वैक्सीन के दामों पर कोई निर्णय नहीं कर पाई थी। अंततः आज (28 अप्रैल) हुई कैबिनेट की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि महाराष्ट्र में 18 से 44 वर्ष की आयु के लोगों को मुफ्त में वैक्सीन उपलब्ध कराई जाएगी।

लेकिन बड़ी बात यह है कि पूरे देश में 1 मई से शुरू होने वाला टीकाकरण महाराष्ट्र में शुरू नहीं होगा। कैबिनेट की बैठक में यह भी निर्णय लिया गया है कि 18 से 44 वर्ष की आयु के लोगों का टीकाकरण 20 मई के बाद ही शुरू हो पाएगा। रिपब्लिक की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने यह दावा किया कि वैक्सीन की अनुपलब्धता के कारण 20 मई तक 18 वर्ष से अधिक लोगों के लिए टीकाकरण शुरू नहीं हो पाएगा लेकिन केंद्र ने जानकारी दी है कि राज्य में अभी भी वैक्सीन के 1 करोड़ डोज उपलब्ध हैं और अगले 3 दिनों 80 लाख अतिरिक्त डोज राज्य को उपलब्ध कराए जाएँगे।

इससे पहले लगातार महाराष्ट्र में वैक्सीन के दामों और टीकाकरण पर मत भिन्नता की स्थिति बनी हुई थी। खुद राज्य के मंत्री और शिवसेना के युवा नेता आदित्य ठाकरे राज्य में टीकाकरण की स्थिति पर असमंजस में थे और उन्होंने मुफ्त टीकाकरण की जानकारी देने वाला अपना ट्वीट भी डिलीट किया था।  

सोनिया गाँधी संतुष्ट हैं महाराष्ट्र सरकार के इस प्रयास से :

हालाँकि, जहाँ एक ओर कोरोनावायरस के संक्रमण को सही तरीके से न संभाल पाने के कारण महाराष्ट्र सरकार की लगातार आलोचना होती रही है वहीं दूसरी ओर कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कहा कि वह महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार द्वारा कोरोनावायरस के संक्रमण के प्रबंधन से संतुष्ट हैं। राज्य के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और राजस्व मंत्री बालासाहब थोराट ने यह बात बताई। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी MVA सरकार द्वारा ‘महामारी के कुशल और पारदर्शी प्रबंधन’ से संतुष्ट हैं। आपको बता दें कि महाराष्ट्र की MVA सरकार में कॉन्ग्रेस भी गठबंधन का हिस्सा है।

थोराट ने कहा कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने उनसे राज्य में कोविड-19 की स्थितियों पर बात की और राज्य सरकार के महामारी से निपटने के प्रयासों पर अपनी संतुष्टि व्यक्त की। साथ ही थोराट ने यह भी बताया कि सोनिया गाँधी ने राज्य में टीकाकरण कार्यक्रम को तेजी से चलाने का निर्देश भी दिया है।

यह अलग बात है कि जहाँ एक ओर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्य कई दिनों पहले ही 1 मई 2021 से शुरू होने वाले टीकाकरण कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार कर चुके हैं और मुफ्त में वैक्सीन उपलब्ध कराने का निर्णय भी ले चुके हैं, महाराष्ट्र सरकार ने टीकाकरण शुरू होने के ठीक 2 दिन पहले यह निर्णय लिया।

अधिकारी जता चुके थे महाराष्ट्र में टीकाकरण कार्यक्रम में देरी की संभावना :

मंगलवार को यह जानकारी प्राप्त हुई कि बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) ने यह घोषणा की है कि मुंबई में 18 से 44 वर्ष की आयु के लोगों का टीकाकरण निजी केंद्रों के माध्यम से ही होगा।  

हालाँकि, राज्य में स्वास्थ्य अधिकारियों ने टीकाकरण के तीसरे चरण के कार्यक्रम में देरी की संभावना भी जताई थी। मुंबई में वैक्सीन की अनुपलब्धता के कारण टीकाकरण कार्यक्रम प्रभावित हुआ जो कि वैक्सीन उपलब्ध होने के बाद पुनः प्रारंभ होगा।  

श्रीलंका में सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का-नकाब पहनने पर लगाया गया प्रतिबंध: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बताया खतरा

श्रीलंका के मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक स्थलों पर सभी प्रकार के चेहरे के नकाब को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होने का हवाला देते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव को मंगलवार (अप्रैल 27, 2021) को मंजूरी दे दी। हालाँकि, कोविड-19 से निपटने के लिए मास्क पहनने की अनुमति है।

यह कदम ऐसे समय आया है जब जन सुरक्षा मंत्री सरत वीरसेकरा ने मार्च में एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें बुर्का पर प्रतिबंध लगाने के लिए मंत्रिमंडल की मंजूरी प्राप्त करने की बात कही गई थी। बुर्के का इस्तेमाल मुस्लिम महिलाओं द्वारा चेहरा और शरीर को ढँकने के लिए किया जाता है।

कैबिनेट प्रवक्ता और सूचना मंत्री केहलिया रामबुकवेला ने बुर्के का उल्लेख किए बिना कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर सभी तरह के चेहरा ढँकने वाले नकाब पर प्रतिबंध लगाया जाता है। उन्होंने कहा कि ये फैसला दो साल पहले लिया गया था, जब ईस्टर संडे वाले दिन चर्च और होटलों पर एक के बाद एक कई आतंकी हमले हुए थे। मंत्री ने कहा, “सभी तरह के नकाब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं।” इस तरह से इसमें सभी तरह के बुर्का और नकाब शामिल हो जाएँगे। इस प्रस्ताव को अब कानून बनाने के लिए इसे संसद से अनुमोदित कराना होगा।

श्रीलंका की कैबिनेट के प्रवक्ता और सूचना मंत्री केहलिया रामबुकवेला ने कहा कि श्रीलंका में सार्वजनिक जगह पर चेहरे ढँकने पर फैसला दो साल पहले ही उस वक्त ले लिया गया था जब ईस्टर के दौरान श्रीलंका की चर्च में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने भयानक बम विस्फोट कर दिया था। उस हमले में ढाई सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। जिसके बाद सरकार ने फैसला किया था कि सार्वजनिक जगहों पर चेहरा ढँकने वाले नकाब पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। श्रीलंका के सूचना प्रसारण मंत्री ने कहा कि चेहरे छिपाने वाले किसी भी तरह के नकाब पहनने पर श्रीलंका में प्रतिबंध लगाया जा रहा है। ये देश की सुरक्षा के लिए खतरा है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, कोलंबो में पाकिस्तानी दूत ने एक ट्वीट में कहा कि यह प्रतिबंध “सिर्फ और सिर्फ श्रीलंकाई मुसलमानों और दुनिया भर के मुस्लिमों की भावनाओं को चोट पहुँचाने का काम करेगा।”

पिछले महीने श्रीलंका में पाकिस्तान के हाई कमीशन साद खट्टक ने कहा था कि श्रीलंका में बुर्के पर प्रतिबंध लगाना एक विभाजनकारी कदम है। श्रीलंका सरकार के इस कदम से मुस्लिमों की भावनाओं को ठेस पहुँच रही है और श्रीलंका में अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों को भी खतरा पैदा होगा।

श्रीलंका में हमला 

श्रीलंका में साल 2019 में ही सरकार ने इमरजेंसी कदम उठाते हुए सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहनने पर पाबंदी का ऐलान कर दिया था। साल 2019 में पाकिस्तान में ईस्टर के दिन एक के बाद एक कई बड़े बम धमाके हुए थे। इन बम धमाकों के पीछे मुस्लिम कट्टरपंथियों का हाथ था और उस बम धमाके के आरोप में श्रीलंका में कुछ दिन पहले एक बड़े मुस्लिम नेता को गिरफ्तार किया गया। श्रीलंका में उस बम ब्लास्ट में कई मौलानाओं को भी गिरफ्तार किया गया है, जिनके बम धमाके में सीधे हाथ पाए गए थे। 

श्रीलंका में सिलसिलेवार बम धमाकों को चरमपंथी संगठन नेशनल तौहीद जमात यानी NTJ ने अंजाम दिया था। इस संगठन ने श्रीलंका में एक साथ तीन चर्चों और बड़े होटलों को निशाना बनाया था। जिसमें 250 से ज्यादा लोग मारे गए थे और 500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। उस घटना के फौरन बाद श्रीलंका की सरकार ने अस्थाई तौर पर बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया था और अब कैबिनेट ने भी नकाब पर प्रतिबंध लगाने वाली फाइल पर साइन कर दिए हैं।

बेटे की शादी के लिए रखा था पैसा, अब उससे लोगों को लगवाएँगे कोरोना वैक्सीन: महाराष्ट्र में बीजेपी MLA ने पेश की मिसाल

महाराष्ट्र के कल्याण से भाजपा विधायक गणपत गायकवाड़ ने कोरोना काल में एक नई मिसाल पेश की है। गायकवाड़ ने संकट की इस घड़ी में अपने बेटे के शादी के लिए जमा राशि से क्षेत्र की जनता को वैक्सीन लगवाने का फैसला किया है। वे अपने पैसों से लगभग 1500 लोगों को वैक्सीन लगवाएँगे।

गायकवाड़ ने इस संबंध में बताया, “लॉकडाउन नियमों में केवल 25 लोग शादी में आ सकते हैं… मेरे पास करीब 18 लाख रुपए बचेंगे, जिससे मैं अपने विधानसभा के लोगों को फ्री में वैक्सीन दिलवाऊँगा।”

गायकवाड़ ने कहा कि उन्होंने इस संबंध में सारी परमिशन ले ली है। उनके फैसले को सोशल मीडिया पर सराहाया जा रहा है। नेटिजन्स का कहना है कि राजनेताओं को इसी तरह व्यवहार करना चाहिए। 

बता दें कि गणपत गायकवाड़ के बेटे की शादी 4 मई को है। धूमधाम से शादी के लिए गायकवाड़ परिवार कुछ महीनों से तैयारी में लगा था। लेकिन कोरोना के संकट को देखते गायकवाड़ परिवार ने अब शादी सादगी से संपन्न करने का फैसला किया। साथ ही शादी में जो भी खर्चा होने वाला था वो सारा पैसा अपने क्षेत्र की जनता के वैक्सीनेशन के लिए खर्च करने का निर्णय लिया है।

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में कोरोना की स्थिति अब भी काबू में नहीं है। हालाँकि लॉकडाउन के बाद वहाँ संक्रमितों की संख्या में कमी आई है। पिछले 24 घंटे में वहाँ से 48 हजार से ज्यादा मरीज मिले हैं। वहीं कल्याण क्षेत्र की बात करें तो हर रोज़ 1500 से 1700 कोरोना के नए केस सामने आ रहे हैं। मरीजों के रिश्तेदार इलाज के लिए भटक रहे हैं। जरूरत पड़ने पर न उन्हें दवाई मिल रही है और न ऑक्सीजन। ऐसे में अभी पिछले हफ्ते ही भाजपा विधायक गणपत ने अपने एमएलए फंड से 1 करोड़ रुपए ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट लगाने के लिए दिए थे।

दूल्हे का कॉलर पकड़ा, पुरोहित को पीटा, लग्न भ्रष्ट किया: त्रिपुरा DM की हरकत को 5 विधायकों ने बताया ‘आतंक’, CM ने तलब की रिपोर्ट

एक शादी समारोह में घुस कर लोगों को पीटने वाले त्रिपुरा के DM शैलेश कुमार यादव के खिलाफ भाजपा विधायकों ने कार्रवाई की माँग की है, जिसके बाद मुख्यमंत्री विप्लब कुमार देव ने इस पूरे प्रकरण की रिपोर्ट तलब की है। वेस्ट डिस्ट्रिक्ट के मजिस्ट्रेट को निलंबित करने के लिए 5 विधायकों ने मुख्य सचिव मनोज कुमार को पत्र लिखा है, जिसमें DM की हरकतों को ‘पूर्ण रूप से अशिष्ट और असभ्य’ करार दिया गया है।

डीएम शैलेश कुमार यादव ने कोरोना के दिशानिर्देशों का पालन कराने के नाम पर दो शादी समारोहों में मारपीट की। विधायकों ने लिखा, “मैं आपका ध्यान सोमवार (अप्रैल 26, 2021) की रात DM द्वारा गोलाप बागान और माणिक्य कोर्ट में स्टेट टेररिज्म की जो हरकत की, उस ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। ये शादी समारोह कोविड-19 दिशानिर्देशों का पालन करते हुए अनुमति के साथ हो रहा था। ये अशिष्ट और असभ्य हरकत थी।”

इस पत्र पर सत्ताधारी पार्टी के विधायकों दिबाचंद्र हरंगख्वाल, आशीष कुमार साहा, रामप्रसाद पॉल, सुशांता चौधरी और आशीष दास ने हस्ताक्षर किए थे। जिन विवाह भवनों में ये सब किया गया, वो रॉयल उज्जयंता पैलेस का हिस्सा हैं। पत्र में लिखा गया है कि इन्हीं DM ने इस शादी समारोह की अनुमति दी थी और साथ ही 4-4 कार ले जाने के लिए पास भी जारी किए गए थे। 50 लोगों के शामिल होने की शर्त पर समारोह के आयोजन की अनुमति थी।

विधायकों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों के दिशानिर्देशों के अनुरूप इन शादी समारोहों का आयोजन हो रहा था, लेकिन तभी DM अपने सुरक्षा कर्मचारियों के साथ वहाँ घुस गए और लोगों को पीटने लगे, उन्हें धमकियाँ देने लगे। आरोप है कि बुजुर्गों को भी नहीं छोड़ा गया। जब उनके द्वारा ही हस्ताक्षरित आदेश की कॉपी दिखाई गई तो उन्होंने लोगों के सामने ही उसे फाड़ डाला। ऐसा व्यवहार किया गया, जैसे नियमों का उल्लंघन कर के समारोह आयोजित किया जा रहा हो।

विधायकों के अनुसार, DM शैलेश यादव ने दूल्हा-दुल्हन की पिटाई की, बुजुर्ग पुरोहित को धक्का मारा और बुजुर्गों को गंदी-गंदी गालियाँ देते हुए उन्हें धकेल दिया। उन पर पुलिसकर्मियों के साथ भी हाथापाई करने का आरोप है। कहा गया है कि DM ने धमकी दी कि वो वेस्ट अगरतल्ला के पुलिस इंचार्ज को निलंबित करेंगे। उन पर शादी समारोह में उपस्थित महिलाओं के साथ भी दुर्व्यवहार करने का आरोप है।

पत्र में विधायकों ने लिखा है कि IAS शैलेश यादव ने महिलाओं को भी हिरासत में लेकर पकड़ कर थाने भिजवाया, जहाँ उन्हें कुछ देर हिरासत में रखने के बाद छोड़ा गया। बताया गया है कि इस घटना के ऑडियो और वीडियो क्लिप्स मौजूद हैं, जो सबूत के रूप में पेश किए जाएँगे। पत्र के अनुसार, वहाँ एक भी महिला पुलिस नहीं थी। अतिथियों पर लाठीचार्ज हुआ और शादी में व्यवधान डाल कर दूल्हे को ‘लग्नभ्रष्ट’ बना दिया गया।

विधायकों ने कहा है कि पुलिसकर्मियों के लिए DM द्वारा ‘चोर’ शब्द का प्रयोग करना ये बताता है कि उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा नियंत्रित विभाग के कर्मियों पर विश्वास नहीं है। अगले कुछ महीनों में कई शादियाँ होनी है, ऐसे में आशंका जताई गई कि ऐसे व्यवधान फिर पैदा किए जा सकते हैं। इस मामले की उच्च-स्तरीय जाँच के साथ-साथ शैलेश यादव को हटाने की माँग भी की गई है। पत्र के साथ शादी का परमिशन लेटर भी भेजा गया है।

वीडियो में देखा जा सकता है कि शैलेश यादव ने दूल्हे का कॉलर पकड़ा था। उन्होंने ‘चलो, बाहर निकलो’ कहते हुए अतिथियों को खदेड़ा। इस अत्याचार के बारे में पूछने पर उन्होंने ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ की दुहाई दी। विरोध होने पर उन्होंने कह दिया कि किसी को दुःख पहुँचा तो वो माफ़ी माँगते हैं, लेकिन वो जनता और समाज के व्यापक हितों को ध्यान में रख कर ऐसा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इससे लोग SOP का पालन करेंगे।

वहीं दुल्हन के भाई शुभ्रजीत देब ने भी फेसबुक के जरिए अपनी बात रखी है। उन्होंने बताया कि हिन्दू विधि-विधान से शुभ लग्न का समय तय किया था और अप्रैल 20 को त्रिपुरा में कड़ाई और तेज़ किए जाने के बाद ये आदेश दिए गए थे। उन्होंने पूछा कि क्या अब इस राज्य में ‘हिन्दू मैरेज एक्ट’ का पालन करना पाप है? उन्होंने सवाल दागा कि जब आदेश दिया था तो उसकी प्रति फाड़ी क्यों? उन्होंने आग्रह किया कि सामान्य नागरिकों को यूँ प्रताड़ित न किया जाए।

‘इनको जिंदा जला देना चाहिए’: कॉन्ग्रेस कार्पोरेटर ने सरकारी कर्मचारियों को धमकाया, महाराष्ट्र के पार्टी अध्यक्ष भी थे साथ

महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण से हालात बदतर हैं। स्वास्थ्य सेवा चरमराई हुई है। लेकिन, राज्य की सत्ताधारी महाविकास अघाड़ी के नेताओं की अकड़ में कोई कमी नहीं है। हाल में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जब सत्ताधारी गठबंधन के नेता कोरोना फ्रंटलाइन वॉरियर्स को धमकाते नजर आए हैं।

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ग्रेस के कार्पोरेटर बंटी शेलके पार्टी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले के साथ नागपुर के नगर पालिका निगम के कार्यालय पहुँचे और कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार करते हुए उन्हें धमकाया। अपने आपत्तिजनक आचरण के लिए कर्मचारियों की अक्षमता को वजह बताने वाले शेलके ने एक विवादित बयान भी दिया।

प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पटोले की मौजूदगी में, शेलके ने कहा कि अक्षमता के लिए कर्मचारियों को ‘जिंदा जला दिया जाना चाहिए।’ अब देखना ये है कि ऐसे मुश्किल समय में कॉन्ग्रेस कॉर्पोरेटर पर दुर्व्यवहार और कथित तौर पर काम में व्यवधान डालने की कोशिशों के लिए कोई कार्रवाई की जाती है या नहीं।

पिछले सप्ताह इसी तरह एक कोविड हॉस्पिटल में शिवसेना पार्षद संध्या दोषी ने हंगामा खड़ा कर दिया था। अपने रसूख का अनुचित फायदा नहीं मिलने पर वह बिफर गईं थी। इतना ही नहीं उनके साथ अस्पताल में आए शख्स ने मास्क तक नहीं पहन रखा था।

सोनिया गाँधी राज्य सरकार से खुश

इस बीच, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कोरोना वायरस संकट के ‘पेशेवर और पारदर्शी संचालन’ के लिए महाविकास अघाडी सरकार की प्रशंसा की है। उन्होंने सरकार के राजस्व मंत्री बालासाहेब थोराट के प्रदर्शन पर भी संतोष व्यक्त किया।

स्वास्थ्य संरचना बदहाल

महाराष्ट्र में मंगलवार को कोरोना संक्रमण के 66,358 नए मामले सामने आए। 895 मौतें हुई। इससे राज्य में मृतकों की संख्या बढ़कर 66,179 हो गई है। राज्य के स्वास्थ्य ढाँचे की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। महाराष्ट्र के बीड से एक अमानवीय तस्वीर सामने आई थी। यहाँ एक एंबुलेंस में 22 शवों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर श्मशान लाया गया और फिर एक चिता पर 2-3 लाश रख अंतिम संस्कार किया गया।

अस्पताल में हादसों का सिलसिला भी थमता नहीं दिख रहा है। ठाणे जिले में बुधवार तड़के अस्पताल में आग लगने से 4 मरीजों की मौत हो गई। पिछले हफ्ते विरार के एक अस्पताल में आग लगने से 13 मरीजों की मौत हो गई थी। उससे पहले ऑक्सीजन टैंकर के रिसाव से नासिक के एक अस्पताल में 23 लोगों की जान चली गई थी। ठाणे की घटना से पहले पिछले चार महीने में महाराष्ट्र के अस्पतालों में चार हादसों में कम से कम 57 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।

‘मुस्लिमों को बचाने के लिए बनाया बलि का बकरा’: बैंक कर्मी को ‘ईसाई’ होने के कारण पाकिस्तान में नौकरी से निकाला

पाकिस्तान में एक बैंक कर्मचारी को कथित तौर पर ईसाई होने के कारण नौकरी से निकाल दिया गया। वसीम मकबूल नाम का यह बैंक कर्मचारी सेल्स व इनकम टैक्स रिटर्न्स संबंधी विभाग का इन्चार्ज था। कुछ दिन पहले फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने उसके ख़िलाफ़ पड़ताल की और फिर नौकरी से निकाल दिया। अब उसने न्याय की आस में कैथलिक चर्च जस्टिस कमीशन में अपील की है।

यूसीए न्यूज के मुताबिक, नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान ने वसीम मकबूल पर किसी वसीम शहजाद के साथ FBR यूजर आईडी और पासवर्ड शेयर करने का आरोप लगाया था। साल 2018 में इस वसीम शहजाद ने आत्महत्या कर ली थी। वह भी बैंक में ही काम करता था। 18 मार्च को FBR ने अपने पत्र में लिखा, “उसने (वसीम मकबूल) फर्जी क्रेडिट वाउचर पास किया, जिसमें सही लाभार्थी के बदले अन्य खातों में क्रेडिट दिया गया और उसकी (लाभार्थी) राशि को रद्द कर दिया गया।” 

इस प्रकरण पर अपना पक्ष रखते हुए मकबूल ने स्वीकार किया कि उसने एफबीआर का पासवर्ड शेयर किया था। लेकिन, यूसीए न्यूज से बात करते हुए वह कहा, “मैं 2016 में लाहौर क्षेत्रीय कार्यालय में स्थानांतरित होने के बाद से एक शाखा प्रबंधक के निर्देशों का पालन कर रहा था। शहजाद, प्रबंधन की मदद करता था और उसे परफॉर्मेंस अवॉर्ड भी मिलता था। मेरे से पहले भी उसकी पासवर्ड तक पहुँच थी।”

अपनी शिकायत में मकबूल ने बताया, “शहजाद ने 3 करोड़ का हाथों से लिखा वाउचर अपने पिता और भाभी के अकॉउंट में शेयर किया। वह बैंक मैनेजर के निर्देशों पर फंड एकत्रित करता था। 2 साल मामले में जाँच के बाद सारे मुस्लिम कर्मचारियों को बेगुनाह करार दे दिया गया, जबकि मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। अब महामारी के समय में नौकरी ढूँढना बहुत ज्यादा मुश्किल है।”

इस मामले कैथलिक चर्च नेशनल कमीशन की ओर से डील करने वाले वकील बेहराम खान ने पूरे केस को धार्मिक भेदभाव का मामला बतया है। उन्होंने कहा, “हम इस केस को साल 2018 से मॉनिटर कर रहे हैं। ये दुखद है कि यहाँ धार्मिक तौर पर अल्पसंख्यकों को आसानी से निशाना बनाया जाता है। मुस्लिम नागरिकों को बचाने के लिए मकबूल को सिर्फ़ बलि का बकरा बनाया गया।”

बता दें कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है। हिंदुओं के साथ-साथ वहाँ ईसाई लोगों को भी खूब प्रताड़ित किया जाता है। हालत ये है कि अब वहाँ सिर्फ़ 2 प्रतिशत आबादी ईसाइयों की बची है। इनमें अधिकतर लोग अनपढ़ हैं और सफाईकर्मी, किसानी या दिहाड़ी मजदूरी का काम करते हैं। चर्च नेताओं का भी कहना है कि ईसाइयों को लगातार भेदभाव और नौकरी की कमी का सामना करना पड़ता है, जबकि स्वास्थ्य और रक्षा क्षेत्रों में उनकी भागीदारी है। सरकार बहुत निम्न स्तर का काम ईसाइयों को देती है जैसे सफाईकर्मी आदि का।