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संभल में सपा नेता ने भाजपा के गुलफाम यादव को जहरीले इंजेक्शन से मरवाया था, जेल से छुड़वाए थे हत्यारे: ब्लॉक प्रमुख बेटा की कुर्सी बचाने को रची साजिश

उत्तर प्रदेश के संभल में भाजपा नेता गुलफाम यादव की हत्या सपा नेता महेश यादव ने करवाई थी। महेश यादव ने अपने बेटे का ब्लॉक प्रमुख बचाने को लेकर यह हत्या करवाई है। महेश यादव ने इस हत्या के लिए बरेली जेल से एक अपराधी की जमानत करवाई थी। पुलिस ने अब महेश यादव, उसके बेटे समेत हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया है।

इस घटना की साजिश का पूरा खुलासा संभल के एसपी कृष्ण कुमार ने मंगलवार (25 मार्च, 2025) को किया है। एसपी कृष्ण कुमार ने बताया कि इस मामले में जुनावई ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रवि यादव, उसके पिता और ग्राम प्रधान महेश यादव, मुकेश यादव, रामनिवास, सुधीर और विकास को गिरफ्तार किया गया है। एसपी ने बताया है कि हत्या मामले में 3 लोग फरार हैं।

ब्लॉक प्रमुख पद की थी लड़ाई

एसपी कृष्ण कुमार ने बताया कि ब्लॉक प्रमुख रवि यादव के खिलाफ गुलफाम यादव अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले थे। बताया गया है कि गुलफाम अपने बेटे को ब्लॉक प्रमुख बनाना चाहते थे। इसके चलते रवि यादव का पिता महेश यादव परेशान था। इसके बाद उसने गुलफाम यादव की हत्या की योजना बनाई। इसके लिए उसने अपराधियों का सहारा लेने का निर्णय लिया।

महेश यादव ने इसके बाद बरेली जेल में बंद अपराधी धर्मवीर उर्फ़ धम्मा से मुलाक़ात की। यह मुलाकात 19 नवम्बर, 2024 को जेल के भीतर ही हुई थी। धम्मा को महेश यादव ने हत्या के बदले जमानत करवाने की बात कही। धम्मा जब इस हत्या के लिए राजी हो गया तो उसकी जमानत का इंतजाम किया गया।

इस जमानत के लिए ₹35 हजार का खर्च हुआ। धम्मा इसके बाद जेल से बाहर आ गया। महेश यादव ने ₹1 लाख और धम्म पर खर्च किए। इसके जरिए धम्मा का गिरवीं पड़ा ट्रैक्टर छुड़वाया गया। महेश यादव ने इसके बाद हत्या की प्लानिंग की।

महेश यादव ने साजिश रची कि हत्या चुपचाप तरीके से की जाए, जिससे किसी को पता ना चले। इसी के लिए जहरीले केमिकल वाला इंजेक्शन लगाने की योजना बनाई गई। धम्मा ने इस साजिश में नेमपाल और महेश यादव को भी शामिल कर लिया।

इंजेक्शन की नेमपाल ने दी सलाह

नेमपाल ने धम्मा को इंजेक्शन से हत्या की सलाह दी थी। नेमपाल रामनिवास नाम के शख्स से यह जहरीला इंजेक्शन लाया था। जेल से बाहर आने के बाद धम्मा गुलफाम से नजदीकियाँ भी बढाने लगा था। वह उनके पास उठता-बैठता था। हत्या वाले दिन (10 मार्च, 2025) भी धम्मा गुलफाम के पास जाकर बैठ गया था।

नेमपाल और महेश इसके बाद घर के भीतर गए और गुलफाम यादव के इंजेक्शन लगा दिया। इससे उनकी मौत हो गई। हत्या के बाद तीनों फरार हो गए। हत्या करवाने वाले महेश यादव ने धम्मा समेत बाकी को कई दिनों तक शरण भी दी। वहीं पुलिस ने इस मामले में हत्या के बाद जाँच चालू की थी।

अंतत: उसने इस मामले का खुलासा किया और जुनावई के पास से ही इन लोगों को गिरफ्तार किया है। एसपी कृष्ण कुमार ने बताया है कि नेमपाल और धम्मा अभी भी फरार हैं और उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास किया जा रहा है।

मुलायम सिंह यादव के खिलाफ लड़ चुके थे गुलफाम

धर्मवीर उर्फ़ धम्मा ने जिन गुलफाम यादव की हत्या कर दी, वह संभल और पड़ोसी जिले कासगंज की राजनीति में बड़ा नाम थे। वह राज्य पिछड़ा आयोग में सदस्य रहे थे। उनकी पत्नी 3 बार से लगातार प्रधान हैं। उनका बेटा दिव्य प्रकाश ब्लॉक प्रमुख रह चुका है। उसी को दोबारा प्रमुख बनाने की जुगत में गुलफाम यादव थे।

जिस गुन्नौर इलाके से गुलफाम यादव आते थे, वहाँ यादव जनसंख्या काफी अधिक है। वह भाजपा के पुराने कार्यकर्ता थे और 2007 में भी विधानसभा चुनाव गुन्नौर विधानसभा से लड़ चुके थे। उन्होंने 2004 में भी मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन हार गए थे।

मस्जिद में घुस गया कुत्ता, मुस्लिम भीड़ ने शिव मंदिर में कीर्तन कर रही हिंदू महिलाओं पर कर दिया पथराव: लाठी-डंडों से भी किया वार, UP के मुरादाबाद में भारी फोर्स तैनात

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद स्थित एक गाँव की मस्जिद में पालतू कुत्ता घुस जाने पर दो समूहों के बीच विवाद हो गया। इसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने तरावीह की नमाज के बाद मंदिर में कीर्तन कर रही महिलाओं पर जमकर पथराव कर दिया। हालात को देखते हुए एसपी ग्रामीण ने गाँव में फ्लैग मार्च किया और भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया है। इस मामले में 30 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।

यह घटना जिले के बिलारी थाना क्षेत्र के बहादुरपुर गाँव की है। यहाँ सोमवार (24 मार्च 2025) की शाम को गाँव के ही विनोद कश्यप का पालतू कुत्ता मस्जिद में घुस गया। कुत्ते को असलम के बेटे ईशान ने ईंट मार दिया। हिंदू पक्ष ने कुत्ते को ईंट मारने का विरोध किया। यह बात दोनों समुदायों के बीच तनाव का कारण बन गया। हालाँकि, कुछ लोगों ने बीच-बचाव करके मामले को शांत करा दिया।

उसी दिन शाम को रमजान के महीने में होने वाली तरावीह की नमाज के बाद मुस्लिमों ने हंगामा कर दिया। तकरीबन 25-30 मुस्लिमों की भीड़ ने गाँव के मंदिर में भजन-कीर्तन कर रहीं रही कुछ महिलाओं पर पथराव कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने हिंदू पक्ष पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया और उन्हें बुरी तरह पीटा। कीर्तन में विनोद नाम का व्यक्ति भी शामिल था, जिसका कुत्ता मस्जिद में घुसा था।

भीड़ में शामिल गाँव के ही असलम, शरीफ, रफीक, ईशान आदि ने धमकी देते हुए विनोद पर जानलेवा हमला कर दिया और उसका गला दबोचकर उसे दबाने की कोशिश की। उन्होंने विनोद और उसके भतीजे पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया और बुरे तरीके से पिटाई की। हमले की बात सुनकर हिंदू भी अपने घरों से बाहर आ गए। लोगों को आता देखकर आरोपित मौके से फरार हो गए।

इस घटना की जानकारी किसी ने पुलिस को दे दी। घटना का पता चलते ही पुलिस अधीक्षक ग्रामीण आकाश सिंह और सीओ राजेश तिवारी भारी संख्या में पुलिस बल लेकर मौके पर पहुँच गया। पुलिस ने एंबुलेंस बुलाकर घायलों को तुरंत अस्पताल भेजवाया। पुलिस ने विनोद कश्यप की तहरीर पर 30 आरोपितों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया है।

जिन आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया हैं, उनके नाम हैं- असलम, शरीफ, रफीक, ईशान, मिसबाहुल, अकरम, शकील, तौफीक, सफीक, अल्ली, फिरासत, इरफान, मजीद, शफीक, रिजवान, सलीम और उसके चार लड़के। इसके अलावा, पुलिस ने कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है। पुलिस ने मौके से असलम, ईशान, शफीक और रफीक को गिरफ्तार कर लिया है। बाकी की तलाश की जा रही है।

बता दें कि बहादरपुर गाँव में मंदिर और मस्जिद एक ही रास्ते पर स्थित हैं। दोनों के बीच की दूरी सिर्फ 80 मीटर ही है। वहीं, बहादुरपुर गाँव में तीन चौथाई संख्या बहुसंख्यकों की है। वहीं, गाँव में एक चौथाई अल्पसंख्यक वर्ग के लोग हैं। गाँव के बुजुर्गों का कहना है कि इस गाँव में इससे पहले कभी कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं हुआ है।

अमानवीय, संवेदनहीन, घृणित… सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर लगाई रोक, ‘स्तन दबाने-पायजामा खोलने’ को रेप का प्रयास नहीं मानने का मामला: बच्ची को खींचकर ले गए थे 3 युवक

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी ‘स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास नहीं है’ को संवेदनहीन और घिनौना बताया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट के फैसले पर अपनी असहमति व्यक्त करते हुए उस पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की बेंच ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए बुधवार (26 मार्च) को सुनवाई की।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने हाई कोर्ट पर अपनी कड़ी असहमति व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हमें यह कहते हुए कष्ट हो रहा है कि (इलाहाबाद हाई कोर्ट की) विवादित आदेश में की गई कुछ टिप्पणियाँ निर्णय लिखने वाले जज की ओर से संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाती हैं।”

पीठ ने कहा कि यह फैसला अचानक नहीं सुनाया गया था, बल्कि करीब चार महीने तक इसे सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया है। इसका मतलब यह है कि न्यायाधीश ने उचित विचार-विमर्श और दिमाग लगाने के बाद फैसला सुनाया है। पीठ ने कहा कि ये टिप्पणी कानून के सिद्धांतों से पूरी तरह विपरीत हैं और यह संवेदनहीन एवं अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। इसलिए टिप्पणियों पर रोक लगाना मजबूरी है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भारत संघ, उत्तर प्रदेश राज्य के साथ-साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट में पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। वहीं, भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी पेश हुए और उन्होंने फैसले की निंदा करते हुए इसे चौंकाने वाला बताया। दरअसल, सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था। अदालत ने इसी का संज्ञान लिया है।

इससे पहले जस्टिस बेला त्रिवेदी और प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने इस मामले में दायर एक याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया था। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की वकील अंजलि पटेल ने याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करने की माँग की थी। साथ ही हाई कोर्ट के जजों द्वारा की जाने वाली अनुचित टिप्पणियों को देखते हुए जजों के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करने की माँग की थी।

इस मामले पर 24 मार्च को पेश वकील ने जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस पीबी वराले की खंडपीठ के समक्ष दलीलें शुरू करते हुए ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ की बात कही। इसके तुरंत बाद जस्टिस बेला त्रिवेदी ने वकील को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके साथ ही कहा कि कहा कि कोर्ट में ‘लेक्चरबाजी’ की अनुमति नहीं होनी चाहिए। इसके बाद जस्टिस बेला त्रिवेदी ने याचिका को खारिज कर दी।

बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की एकल पीठ ने 14 मार्च को कासगंज में एक नाबालिग लड़की से हुए यौन उत्पीड़न के एक मामले में सुनवाई के दौरान यह विवादित टिप्पणी की थी। जस्टिस मिश्रा ने कहा था कि किसी लड़की का स्तन पकड़ना, उसके पायजामे के नाड़े तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचना… रेप या रेप के प्रयास वाले अपराध की श्रेणी में नहीं आता है।

जस्टिस मिश्रा ने अपने फैसले में इसके पीछे यह तर्क दिया था कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपितों की कार्रवाई अपराध करने की तैयारी से आगे बढ़ चुकी थी। अदालत ने कहा था कि बलात्कार के प्रयास और अपराध की तैयारी के बीच अंतर को सही तरीके से समझना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को संशोधित करने का भी निर्देश दिया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का देश भर में जमकर आलोचना हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के नए बेंच ने एक चिट्ठी के आधार पर मामले का संज्ञान लिया। बता दें कि यह मामला 11 वर्षीय लड़की से संबंधित है। 10 नवंबर 2021 को आरोपित पवन, आकाश और अशोक ने पुलिया के नीचे खींचकर लेकर जाने की कोशिश करते हुए यौन उत्पीड़न की थी। आरोपितों में से एक ने बच्ची के स्तन दबाए थे।

वहीं, दूसरे आरोपित ने पीड़िता बच्ची के पायजामे का नाड़ा खोल दिया था। जब लड़की चिल्लाने लगी तो शोर सुनकर वहाँ से गुजर रहे लोगों ने हस्तक्षेप किया। इसके बाद आरोपित फरार हो गए। बाद में पॉक्सो एक्ट की धाराओं में केस दर्ज हुआ। निचली अदालत ने इसको लेकर समन जारी किया। इसके बाद आरोपित पक्ष इसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा। यहाँ इन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने रेप नहीं किया।

‘चर्च में ही गंदा काम करता था पादरी बजिंदर’: यौन शोषण पीड़िता ने NCW को सुनाई आपबीती, जिसको मारे थप्पड़ उसने बताया- रेप के केस में मेरे पति को फँसाना चाहता है

पंजाब में चंगाई सभाएँ करवाने वाले पादरी पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली पीड़िता ने राष्ट्रीय महिला आयोग की पदाधिकरियों से मुलाक़ात की है। पीड़िता ने अपनी पूरी आपबीती आयोग को सुनाई है। पीड़िता ने कहा है कि अब उसे पादरी बजिंदर सिंह पर कार्रवाई की उम्मीद जगी है।

इस बीच पंजाब पुलिस ने पादरी बजिंदर सिंह के खिलाफ एक और महिला से मारपीट के मामले में FIR दर्ज कर ली है। इस महिला ने बताया है कि वह चर्च छोड़ना चाहती थी, जिसके चलते उसे बजिंदर सिंह ने पीटा। महिला ने बताया है कि उसके पति को भी झूठे केस फँसाए जाने की कोशिश बजिंदर सिंह कर रहा था।

यौन शोषण की पीड़िता बोली- मेरी पूरी बात सुनी

बजिंदर सिंह के खिलाफ यौन शोषण की FIR करवाने वाली पीड़िता ने मंगलवार (25 मार्च, 2025) को दिल्ली राष्ट्रीय महिला आयोग में अपनी आपबीती सुनाई है। पीड़िता ने बताया, “उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी और समझी। सारी चीजें उन्होंने देखी हैं। पुलिस-प्रशासन से भी उन्होंने जानकारी ली है कि क्या कार्रवाई इस मामले में हुई है।”

महिला ने बताया, “उन्होंने हमें यही आश्वासन दिया है कि चिंता नहीं करनी है। जो भी कानूनी कार्रवाई करनी है, उसमें पूरा साथ दिया जाएगा। महिला आयोग ने कहा है कि हम पूरी तरह से आपके साथ हैं… मैंने अंदर पूरी एकदम साफ़ तौर पर बता दी थीं।”

पीड़िता ने बताया कि महिला आयोग ने उसे सुरक्षा देने का वादा भी किया है। पीड़िता ने बताया है कि महिला आयोग के एक्शन के चलते उसे अब बजिंदर सिंह के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद जगी है। पीड़िता के साथ ही पंजाब पुलिस के अधिकारियों को भी महिला आयोग ने तलब किया था।

इस पीड़िता ने फरवरी, 2025 में बजिंदर सिंह के विरुद्ध FIR दर्ज करवाई थी। पीड़िता ने बताया था कि वह 17 वर्ष की आयु से अपने परिजनों के साथ बजिंदर सिंह के चर्च आती थी। यहीं पर पहले बजिंदर सिंह ने उसका नंबर ले लिया। इसके बाद बजिंदर सिंह उसे भद्दे मैसेज करने लगा।

पीड़िता ने बताया कि बजिंदर सिंह उस पर विवाह करने का दबाव भी डालता था। पीड़िता ने FIR में कहा था कि गले लगाने के बहाने से वह उसे गलत तरीके से छूता था। पीड़िता ने शिकायत में बताया था कि बजिंदर सिंह रविवार को उसे अपने केबिन में अकेले बुलाता था और उसका यौन शोषण करता था। उसे धमकियाँ भी दी जाती थीं।

इस मामले में बजिंदर सिंह की एक बार कोर्ट में भी पेशी हो चुकी है। इसी बीच उसकी कुछ और वीडियो सामने आई थीं, जिसमें वह एक आदमी और एक महिला को बेरहमी से पीटते हुए दिखा था। इस विषय में भी पंजाब पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है।

चर्च से निकलना चाहा, तो बजिंदर ने पीटा

बजिंदर सिंह के खिलाफ एक महिला और बाकियों के साथ मारपीट के मामले में मोहाली में FIR दर्ज की गई है। पीड़ित महिला ने बताया है कि वह बजिंदर सिंह के चर्च में ही सालों से काम करती थी। उसने बताया है कि चर्च छोड़ने के उसके फैसले पर बजिंदर सिंह भड़का हुआ था।

महिला ने बताया कि उसने चर्च से त्यागपत्र दिया था लेकिन इसके बाद बजिंदर सिंह ने उसे सबके सामने बेइज्जत किया। उसके चेले महिला का पीछा करने लगे। महिला का आधार कार्ड, पैन और बाकी कागज भी जब्त कर लिए गए हैं। उसने बताया है कि बजिंदर सिंह सादे कागजों पर भी दस्तखत करवाए हैं।

महिला ने मीडिया को बताया कि बजिंदर सिंह ने उसे रविवार की प्रार्थना के बाद अपने केबिन में बुलाया था। उसने बताया कि यहाँ बजिंदर सिंह से एक युवक अपनी बहन को परेशान ना किए जाने को लेकर बात रखने आया था। इसी को लेकर बजिंदर सिंह ने उसकी पिटाई कर दी। बजिंदर सिंह ने उस पर अपनी बहन को चर्च आने से रोकने का आरोप लगाया।

महिला ने बताया कि इस मारपीट में जब बीच बराव की कोशिश को तो उसके ऊपर भी बजिंदर सिंह ने हमला कर दिया। महिला ने बताया कि उसके चेहरे पर मुक्के मारे गए और गला दबाया गया। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि चर्च छोड़ने के चलते बजिंदर सिंह उसके पति को छेड़छाड़ के मामले में फंसाने की कोशिश कर रहा है।

बजिंदर सिंह उसके पति के पास कोई महिला भेजकर पुलिस में मामला दर्ज करवाएगा, इसकी आशंका पीडिता ने दर्ज करवाई है। इस मामले में अब मोहाली पुलिस ने सभी पीड़ितों के बयान दर्ज कर लिए हैं और बजिंदर सिंह के खिलाफ जाँच कर रही है।

8 घंटे बाद दिल्ली पुलिस को लगी जस्टिस यशवंत वर्मा के घर लगी आग की भनक, 2 बार दरवाजे से लौटा दिए गए जवान-अधिकारी: रिपोर्ट, जाँच पैनल ने घटनास्थल का किया दौरा

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के लगभग आठ घंटे बाद तक दिल्ली पुलिस मुख्यालय को इसकी जानकारी नहीं थी। आग को बुझा लिए जाने के बाद जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने मौके पर पहुँचे पाँच पुलिसकर्मियों को वहाँ से चले जाने और सुबह आने को कहा। जिस समय यह घटना हुई थी, उस समय जस्टिस वर्मा अपनी पत्नी सहित घर से बाहर थे।

इंडियन एक्सप्रेस ने दिल्ली पुलिस के उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। सूत्रों ने यह भी बताया कि जब इस मामले के जाँच अधिकारी अगली सुबह जस्टिस वर्मा के आवास पर आए तो उन्हें वापस भेज दिया गया और बाद में आने के लिए कहा गया। इस अंग्रेजी समाचार पत्र ने जस्टिस वर्मा के निजी सचिव से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की।

दरअसल, नई दिल्ली जिला के एडिशनल डीसीपी ने 15 मार्च 2025 को सुबह 8 बजे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुबह की डायरी सौंपी थी। उस डायरी में पिछले 24 घंटों में इलाके में हुई घटनाओं का सारांश था। इसमें जस्टिस वर्मा के आवास में लगी आग का भी जिक्र था। इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को घटना की जानकारी दी गई और नोटों में लगी आग का वीडियो भी उन्हें दिखाया गया।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा ने केंद्र में अपने उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। उसके बाद उसी दिन शाम को करीब 4.50 बजे दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय को इसकी जानकारी दी गई। इसके बाद जस्टिस उपाध्याय के रजिस्ट्रार सह सचिव ने सितंबर 2024 से लेकर घटना तक जस्टिस वर्मा का सुरक्षा विवरण माँगा।

दिल्ली पुलिस ने जस्टिस वर्मा के सुरक्षा डिटेल दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस उपाध्याय को भेज दिया। पुलिस ने बताया कि इस अवधि के दौरान CRPF के जवान और दिल्ली पुलिस के तीन अधिकारी रोटेशन के आधार पर जस्टिस वर्मा के आवास पर तैनात थे। वहीं, सूत्रों का कहना है कि दिल्ली पुलिस से पूछा गया है कि घटना की रात को पंचनामा क्यों नहीं बनाया गया।

पंचनामा बनाने के लिए पाँच स्वतंत्र व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो घटनास्थल के गवाह हों और मुकदमे के दौरान वे अपना बयान दे सकें। यह भी पता चला है कि मामले की जाँच करने वाली आंतरिक पैनल इस पर विचार कर रहा है। वहीं, आग लगने के दौरान सबसे पहले पहुँचने वाले 5 पुलिसकर्मियों से अपना फोन दिल्ली पुलिस मुख्यालय को सौंपने के लिए कहा गया है। पैनल इसका जाँच करेगा।

वहीं, पैनल जस्टिस वर्मा के पिछले छह महीनों के कॉल डेटा रिकॉर्ड की भी जाँच करेगा है। उन्हें अपने फोन से कोई भी जानकारी डिलीट नहीं करने के लिए कहा गया है। बता दें कि मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया था। हालाँकि, बाद में CJI संजीव खन्ना ने जाँच के लिए विभिन्न हाई कोर्ट के तीन जजों की समिति गठित की है।

पैनल ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। पैनल ने मंगलवार (25 मार्च) को जस्टिस वर्मा के आवास पहुँची और जहाँ नोटों में आग लगी थी, वहाँ लगभग 45 मिनट तक निरीक्षण किया। पैनल जज वर्मा के पीए और दिल्ली अग्निशमन विभाग के प्रमुख अतुल गर्ग को बयान देने के लिए बुलाएगा। अतुल गर्ग के हवाले से मीडिया में खबर आई थी कि ‘जज के आवास पर घटना के दौरान कोई नकदी नहीं मिली थी’।

जस्टिस वर्मा ने भी दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय को दिए अपने स्पष्टीकरण में अतुल गर्ग के बयान का हवाला दिया था। हालाँकि, बाद में अतुल गर्ग ने इनकार कर दिया था कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था। इस मामले में अब जाँच पैनल जस्टिस वर्मा से भी पूछताछ करेगी। इसके साथ ही आग की घटना का कॉल जिन अग्निशमन कर्मियों ने उठाया था, उनसे पूछताछ की जाएगी।

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा के घर में लगी आग लेकर 21 मार्च की अग्नि रिपोर्ट के विवरण में कहा गया है कि सफदरजंग फायर स्टेशन को 14 मार्च की रात 11.35 बजे कॉल आया था। इसमें जज के घर में आग लगने की सूचना दी गई थी। इसके बाद दमकलकर्मी रात 11:43 बजे घटनास्थल पर पहुँचे। वे दो घंटे बाद यानी रात 1.56 बजे घटनास्थ से वापस लौट गए।

बता दें कि होली के दिन 14 मार्च की रात को करीब 11:30 बजे जस्टिस वर्मा के आवास से सटे स्टोर रूम में आग लग गई थी। यह आग बोरे में बंद रखे गए नोटों की गड्डियों में लगा था। इसके बाद जस्टिस वर्मा के पीए ने दिल्ली अग्निशमन सेवा को फोन करके घटना की जानकारी दी थी। आग बुझाने के दौरान का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें दिख रहा है कि 500 रुपए की गड्डियाँ जली हुई हैं।

जिस समय यह घटना हुई थी उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली में नहीं थे। कहा जाता है कि उस समय वे अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश गए थे। घर में सिर्फ उनकी वृद्ध माँ और एक बेटी थी। मामला जब उठा तो जस्टिस वर्मा ने अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के सभी आरोपों को नकार दिया और इसे एक साजिश बताया। उन्होंने कहा कि जिस जगह पर आग लगी, वह उनके आवास का मुख्य हिस्सा नहीं है।

हजारीबाग की जामा मस्जिद के पास मंगला जुलूस पर पत्थरबाजी, हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को करनी पड़ी हवाई फायरिंग: महाशिवरात्रि-होली पर भी झारखंड में हिंदुओं पर हुआ था हमला

झारखंड के हजारीबाग में हिंदुओं के लिए त्योहार मनाना मुश्किल होता जा रहा है। मंगलवार (25 मार्च 2025) देर रात रामनवमी की तैयारी में निकाले गए मंगला जुलूस पर कुछ उपद्रवियों ने पत्थरबाजी कर दी। ये सब सदर थाना क्षेत्र में जामा मस्जिद चौक के पास हुआ, जहाँ हिंदू अपने अखाड़ों के साथ शांति से जुलूस निकाल रहे थे। लेकिन अचानक पत्थर चलने शुरू हो गए, जिससे पूरा इलाका तनाव में आ गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस को चार राउंड हवाई फायरिंग करनी पड़ी और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। हर साल होली के बाद मंगलवार को हजारीबाग में मंगला जुलूस निकलता है। इस बार भी अखाड़ों के लोग ढोल-नगाड़ों के साथ चौक-चौराहों से गुजर रहे थे। जुलूस में कुछ गाने बज रहे थे, जिन पर दूसरे पक्ष ने आपत्ति जताई। बस इसी बात पर पहले बहस हुई, फिर पत्थरबाजी शुरू हो गई।

हिंदुओं का कहना है कि उनका जुलूस शांतिपूर्ण था, लेकिन असामाजिक तत्वों ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ा। पत्थरबाजी के साथ तोड़फोड़ भी हुई। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, फायरिंग की, तब जाकर भीड़ भागी। अब इलाके को छावनी बना दिया गया है और पुलिस हर तरफ नजर रख रही है।

हजारीबाग की डिप्टी कमिश्नर नैंसी सहाय ने कहा कि अब हालात काबू में हैं। उन्होंने बताया कि रामनवमी से पहले निकाले जा रहे दूसरे मंगला जुलूस पर पथराव किया गया। ये जगह झंडा चौक के पास है। जुलूस में गाना बजाने का विरोध करते हुए हमला किया गया है। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात है।

हजारीबाग के एसपी अरविंद कुमार सिंह मौके पर पहुँचे और लोगों से शांति की अपील की। अब FIR दर्ज की जा रही है और पुलिस दोनों पक्षों को समझाने में लगी है। लेकिन इलाके में तनाव अभी भी बना हुआ है।

महाशिवरात्रि पर भी हिंदुओं पर हुआ था हमला

बता दें कि हजारीबाग में ये कोई नई बात नहीं। अभी फरवरी 2025 में महाशिवरात्रि के दिन हजारीबाग के इचाक में झंडा लगाने को लेकर हिंदुओं पर हमला हुआ था। पत्थरबाजी और आगजनी में कई लोग घायल हुए थे, वाहनों को जलाया गया था। तब भाजपा नेता संजय सेठ ने इसे घुसपैठियों की साजिश बताया था और हेमंत सोरेन सरकार पर हिंदुओं की सुरक्षा में नाकाम रहने का इल्जाम लगाया था।

यही नहीं, अभी 14 मार्च 2025 को गिरिडीह में होली के दिन भी हिंदुओं पर पत्थरबाजी हुई थी। हजारीबाग में त्योहारों पर हिंदुओं को टारगेट करने की घटनाएं बढ़ रही हैं। लोग अब हर जुलूस और उत्सव में डर के साथ शामिल हो रहे हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा स्तन दबाना-पायजामा खोलना ‘रेप का प्रयास’ है या नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का शीर्ष न्यायालय ने लिया संज्ञान: जानिए क्या है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा हाल ही में एक मामले में की गई टिप्पणी ‘स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप या रेप का प्रयास का अपराध नहीं है’ का स्वत: संज्ञान लिया है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जज बीआर गवई और ऑगस्टिन जॉर्ज की पीठ द्वारा की जाएगी। इससे पहले जस्टिस बेला त्रिवेदी और प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने इस मामले में याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया था।

बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की एकल पीठ ने 14 मार्च को कासगंज में एक नाबालिग लड़की से हुए यौन उत्पीड़न के एक मामले में सुनवाई के दौरान यह विवादित टिप्पणी की थी। जस्टिस मिश्रा ने कहा था कि किसी लड़की का स्तन पकड़ना, उसके पायजामे के नाड़े तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचना… रेप या रेप के प्रयास वाले अपराध की श्रेणी में नहीं आता है।

जस्टिस मिश्रा ने अपने फैसले में इसके पीछे यह तर्क दिया था कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपितों की कार्रवाई अपराध करने की तैयारी से आगे बढ़ चुकी थी। अदालत ने कहा था कि बलात्कार के प्रयास और अपराध की तैयारी के बीच अंतर को सही तरीके से समझना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को संशोधित करने का भी निर्देश दिया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का देश भर में जमकर आलोचना हुई थी। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की वकील अंजलि पटेल ने याचिका दाखिल करके हाई कोर्ट के फैसले में दर्ज कुछ टिप्पणियों को हटाने और उसे रद्द करने की माँग की गई थी। याचिका में यह भी माँग की थी कि हाल के कुछ मामलों में हाई कोर्ट के जजों ने अनुचित टिप्पणियाँ की हैं। इसलिए जजों के लिए भी दिशा-निर्देश जारी की जाए।

इस मामले पर 24 मार्च को पेश वकील ने जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस पीबी वराले की खंडपीठ के समक्ष दलीलें शुरू करते हुए ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ की बात कही। इसके तुरंत बाद जस्टिस बेला त्रिवेदी ने वकील को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके साथ ही कहा कि कहा कि कोर्ट में ‘लेक्चरबाजी’ की अनुमति नहीं होनी चाहिए। इसके बाद जस्टिस बेला त्रिवेदी ने याचिका को खारिज कर दी।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य खंडपीठ ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया और इसकी सुनवाई बुधवार (26 मार्च) को तय कर दी। बता दें कि यह मामला 11 वर्षीय पीड़िता से संबंधित है, जिसके साथ 10 नवंबर 2021 को आरोपित पवन, आकाश और अशोक ने पुलिया के नीचे खींचकर लेकर जाने की कोशिश करते हुए यौन उत्पीड़न की थी। आरोपितों में एक बच्ची के स्तन दबाए थे

वहीं, दूसरे आरोपित ने पीड़िता के पायजामे का नाड़ा तोड़ा था। जब शोर बढ़ा तो वहाँ से गुजर रहे लोगों ने हस्तक्षेप किया। इसके बाद आरोपित फरार हो गए। बाद में पॉक्सो एक्ट की धाराओं में केस दर्ज हुआ। निचली अदालत ने इसको लेकर समन जारी किया। इसके बाद आरोपित पक्ष इसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा। यहाँ इन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने रेप नहीं किया।

मुझे हरामखोर कहा, कोर्ट खुलने से पहले मेरा घर तोड़ दिया: कुणाल कामरा के ‘हमदर्द’ हंसल मेहता को कंगना रनौत ने दिया करारा जवाब, याद दिलाए उद्धव सरकार के अत्याचार

कुणाल कामरा के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को ‘गद्दार’ कहने के बाद हो रही कार्रवाई को लेकर भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने प्रतिक्रया दी है। कंगना रनौत ने कहा है कि उद्धव सरकार के दौरान उनके दफ्तर पर अवैध रूप से कार्रवाई की गई थी, लेकिन अब कामरा पर हो रही कार्रवाई कानूनन रूप से ठीक है। कंगना रनौत के दफ्तर पर BMC ने उद्धव सरकार के दौरान बुलडोजर चलाया था।

कंगना रनौत ने न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए कहा, “जिस तरह से वो मेरे साथ अवैध रूप से किए गए काम का मजाक उड़ा रहे थे, मैं उसे वर्तमान से बिलकुल नहीं जोडूंगी। मेरे साथ जो किया गया वह पूरी तरह से अवैधानिक था, ये जो किया गया है वह कानूनी रूप से की गई प्रक्रिया है।”

कंगना ने आगे कहा, “आप कोई भी हो, किसी का अपमान करना, किसी की अपकीर्ति करना सही नहीं है। आप कॉमेडी के नाम पर किसी की इज्जत उछाल रहे हैं। उनके काम को आप धूमिल कर रहे हैं। शिंदे जी एक जमाने में रिक्शा चलाया करते थे। आज वो अपने दम पर इतना आगे तक आ पाए हैं।”

कंगना रनौत ने आगे कुणाल कामरा की योग्यता पर प्रश्न उठाए। उन्होंने पूछा, “इनकी (कुणाल) की क्या योग्यता है? कौन हैं ये लोग? ये जिंदगी में कुछ कर नहीं पाए, अगर लिख सकते हो तो साहित्य में या कॉमेडी में कुछ लिखते। कॉमेडी के नाम पर हमारे ग्रंथों का मजाक बनाना, लोगों का मजाक उड़ाना कितना सही है?”

कंगना रनौत ने फिल्म निर्माता हंसल मेहता को भी करारा जवाब दिया है। हंसला मेहता ने एक्स (पहले ट्विटर) पर कुणाल के पक्ष में ट्वीट किया था और कंगना पर निशाना साधा था। कंगना ने इसी ट्वीट का जवाबी दिया है।

कंगना ने लिखा, “उन्होंने मुझे हरामखोर जैसे नाम दिए, धमकी दी, देर रात मेरे वॉचमैन को नोटिस थमाई और सुबह कोर्ट खुल पाता उससे पहले ही बुलडोजर से मेरा पूरा घर गिरा दिया। हाईकोर्ट ने इस पूरी तोड़-फोड़ की कार्यवाही को पूरी तरह गैर-कानूनी बताया।”

कंगना ने लिखा, “वो इस पर हँसे और मेरे दर्द और जगहँसाई पर जश्न मनाया। ऐसा लगता है कि आपकी असुरक्षा और ओछापन न केवल आपके भीतर कड़वापन और बेवकूफी को बढ़ा रहा है बल्कि उसने आपको अंधा भी कर दिया है। ये आपकी बनाई हुई घटिया सीरीज या फिल्मों की तरह नहीं है, अपने झूठ और एजेंडे को यहाँ बेचना बंद कीजिए और मेरे मामलों से दूर रहिए।”

गौरतलब है कि रविवार (23 मार्च, 2025) को मुंबई में एक लाइव कार्यक्रम के दौरान कुणाल कामरा ने एकनाथ शिंदे को ‘गद्दार’ बताया था और उन पर एक अपमानजनक गाना गया था। उन्होंने एकनाथ शिंदे को रिक्शावाला बताया और कहा कि अगर उनकी नजर से देखा जाए तो शिंदे गद्दार नजर आएँगे।

इसके बाद BMC ने उस हैबिटेट क्लब पर कार्रवाई की थी, जहाँ यह कार्यक्रम हुआ था। कुणाल कामरा के विरुद्ध भी इस मामले में FIR दर्ज करके नोटिस भेजी गई है। महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले में कुणाल के खातों और कॉल रिकॉर्ड की जाँच करने को कहा है।

JNU वाली बकलोली बंद करो कन्हैया कुमार! सड़कों से पानी की नहीं होती चोरी, आता है विकास: अपने मालिक (राहुल गाँधी) से पूछो उसके पुरखों ने क्यों उजाड़ा बसा-बसाया बिहार?

वैसे तो वामपंथी होना कोई ख़ास बुरी बात नहीं है, लेकिन किसी का मूर्ख और वामपंथी एक साथ होना ऐसा दुर्लभ संयोग बनाता है कि देवता भी हैरत में पड़ जाते हैं। ‘आजादी-आजादी’ फेम कॉन्ग्रेसी हो चुके वामपंथी कन्हैया कुमार एक ऐसे ही दुर्लभ व्यक्ति हैं। वह ये बात समय-समय पर सिद्ध भी करते रहते हैं। इसी कड़ी में उन्होंने अपने गृहराज्य बिहार पर एक बयान दिया है।

कन्हैया कुमार ने एक नई थ्योरी गढ़ी है। कन्हैया कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया है कि बिहार में भारतमाला परियोजना की सड़कें राज्य का पानी लूटने को बनाई जा रही हैं। कन्हैया का पूछना है कि बिहार में पहले उद्योग क्यों नहीं आए और अब छोटे निवेश आ रहे हैं। कन्हैया ने कहा है कि सड़कों की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने सड़कें बनाने को एक साजिश करार दिया है।

मूर्खता की वैसे तो कोई सीमा नहीं होती लेकिन दो-तीन ऐसी बातों के बाद आदमी को चुप हो जाना चाहिए। हालाँकि, कन्हैया कॉन्ग्रेसी हैं और उनसे ऐसी कोई भी उम्मीद बेकार है। आगे कन्हैया एकाध कारोबारियों का नाम लिया और बिहार के खिलाफ साजिश रचने की बात कही।

कन्हैया का कहना है कि बिहार के पास बहुत पानी है, इसलिए यहाँ सड़कें बनाई जा रही हैं। पहली बात तो यह बचकाना तर्क है। और अगर आँकड़ों पर नजर डाली जाए तो 2023 में सामने आई जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में अभी 44% भूजल का दोहन हो चुका है, जबकि बिहार में कोई बड़ा औद्योगिक आधार नहीं है।

बिहार कन्हैया कुमार
बिहार में अब तक 44% पानी का दोहन ही हुआ है

यही रिपोर्ट बताती है कि गुजरात, जहाँ औद्योगिक ढाँचा मजबूत है, वहाँ भी यह स्तर 51% तक ही पहुँचा है। केवल हरियाणा, पंजाब और राजस्थान ही ऐसे राज्य हैं, जहाँ भूजल का दोहन 100% से अधिक हुआ है। ऐसे में कोई बिहार के पानी पर क्यों नजर डालेगा। एकाध राज्यों को छोड़ दिया जाए, तो पूरे देश की ही स्थिति एक सी ही है।

भारत में वामपंथियों का प्रिय शगल रहा है कि वह किसी भी तरह के विकास को गाली दें। इसी क्रम में कन्हैया ने भारतमाला परियोजना के तहत बनी सड़कों को भी कोसा और प्रश्न पूछा है कि यह क्यों बन रही हैं और इससे बिहार में कोई इंडस्ट्री नहीं आएगी।

कन्हैया को पता होना चाहिए कि बिहार ही नहीं बल्कि किसी भी जगह उद्योग-धंधे लगने की कुछ शर्तें होती हैं। जैसे जहाँ उद्योग-धंधा लगना है, वहाँ के लिए एक सड़क होनी चाहिए और आज के समय में तो हाइवे होना चाहिए। बिजली की सप्लाई होनी चाहिए, स्थायी नीतियाँ होनी चाहिए और क़ानून व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। लेकिन सबसे पहली शर्त सड़क है।

जब सड़क नहीं होगी तो भला फैक्ट्री लगाने वाले कैसे पहुँचेगें, माल कैसे पहुँचेगा। और किसी तरह फैक्ट्री लग भी जाए तो उसका माल कैसे बाहर जाएगा। कन्हैया कुमार का कहना है कि जब फैक्ट्री लगनी थी, तब नहीं लग पाई। क्या वह यह स्पष्ट करना चाहेंगे कि इस ‘तब’ में बिहार में कौन राज कर रहा था।

तब यानी 1950-2005 तक तो मोटे तौर पर कॉन्ग्रेस और लालू का ही शासन बिहार में था। कॉन्ग्रेस ने ही बिहार के उद्योग धंधों की दुर्दशा की है। ना कॉन्ग्रेस बड़े उद्योग धंधे बिहार लाई और जिसकी संभावना भी थी, उसे भी छीन लिया। कॉन्ग्रेस ही वह पार्टी थी, जिसने भाड़ा सामान्यीकरण क़ानून लागू किया।

इस कानून के तहत जितने भाड़े में राँची से निकला खनिज पटना आता, उतने में ही वह मद्रास पहुँचता। समुद्र तट का लाभ लेते हुए इसी के चलते तमाम उद्योग-धंधे दक्षिण के राज्य चले गए। कहते हैं इस कानून के चलते ₹10 लाख करोड़ का बिहार को हुआ।

यह कानून भी 1990 में जाकर खत्म हुआ। और यह कोई रोना रोने वाली बात नहीं है, इसकी आँकड़े तस्दीक करते हैं। प्रधानमंत्री को आर्थिक सलाह देने वाली एक कमिटी की रिपोर्ट बताती है कि बिहार का देश की जीडीपी में हिस्सा 1960-61 में 7.8% हुआ करता था, वह आज 2.8 पर खड़ा है। अगर इसमें झारखंड को भी मिला लें तो यह 4.3% पहुँचता है।

कन्हैया कुमार बिहार
देश में बिहार की जीडीपी का हिस्सा हर दशक के साथ नीचे जाता गया है

कन्हैया को कॉन्ग्रेस से प्रश्न पूछना चाहिए कि आखिर यह नीति क्यों लाई गई थी और क्यों उद्योग धंधे तबाह किए गए। आजादी के बाद तो बिहार में कोई नए उद्योग नहीं लगे, जो पहले से थे भी, कॉन्ग्रेस ने उन्हें भी बर्बाद किया। उन्हें कॉन्ग्रेस ने मरणासन्न कर दिया।

लालू प्रसाद यादव की सरकार के जंगलराज, रंगदारी और अपहरण उद्योग ने इन धंधों और पूंजीपतियों को राज्य बाहर भगाने में मदद की। यह मरणासन्न धंधों का क्रियाकर्म करने जैसा था। कॉन्ग्रेस और RJD, दोनों ही साथी रहे हैं। उद्योग-धंधे ना होने के अपराध में दोनों भागीदार हैं।

हाँ! ये बात ठीक है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने बिहार में उद्योग-धंधे लाने में कोई ख़ास सफलता नहीं हासिल की। नीतीश कुमार की सरकार कि उपलब्धि सड़कें और बिजली-पानी ही है। लेकिन बात ये है कि बिहार को इस जंगलराज ने उस गर्त में धकेल दिया था कि सड़क-पानी जैसी आधारभूत सुविधाएँ भी लोगों को मयस्सर नहीं थीं।

छोटे निवेश आने पर रोने वाले कन्हैया कुमार ये बात नहीं जानते क्या कि पहले किसी भी राज्य में छोटे ही निवेश आते हैं, क्या पहले दिन ही आने वाला निवेश ₹50 हजार करोड़ का आने लगेगा। कन्हैया की असल समस्या सड़क, उद्योग और पानी नहीं हैं। बात ये है कि उनका खुदका विकास नहीं हो रहा।

एक समय था कि मजदूरों को पूंजीपतियों और विकास के विरुद्ध भड़का कर कम्युनिस्ट नेतागिरी चमकाया करते थे। कन्हैया को बार-बार बिहार ने नकार दिया है। क्योंकि JNU में ढपली बजाना एक बात है, और चुनावी रण में उतर कर जीतना अलग बात। अच्छा होगा कि अपने राज्य के भले के लिए कन्हैया विकास के और प्रोजेक्ट माँगे, ना कि जो आ रहा है उसका भी विरोध करें।

सनातन अपनाया तो अपने ही समुदाय (मुस्लिमों) के लोगों ने तोड़ दिया घर, 4 दिनों तक भूखा रहा मेरा परिवार: मंच से भजन गायिका ने सुनाई प्रताड़ना की दास्तान, कहा- आज भी मिलती है धमकी

उत्तर प्रदेश के बांदा में आयोजित बांदा महोत्सव में भजन गायिका शहनाज अख्तर ने अपनी भक्तिमयी प्रस्तुति से लोगों का दिल जीत लिया। हालाँकि इसके बाद उन्होंने अपनी आपबीती भी बताई, जिसकी वजह से उन्हें पूरी जिंदगी परेशानियों का सामना करना पड़ा। शहनाज ने कहा, “मेरी पहचान सनातन धर्म से है। मैं हिंदू देवी-देवताओं के भजन गाती हूँ, उनकी पूजा करती हूँ, लेकिन इसके लिए मुझे और मेरे परिवार को बहुत कुछ सहना पड़ा।”

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के बरघाट में मुस्लिम परिवार में जन्मीं शहनाज की जिंदगी तब बदल गई, जब बचपन में वो गणेश मंदिर में लड्डू लेने गईं। वहाँ भजन-कीर्तन सुनकर उनका मन सनातन धर्म की ओर खिंच गया। 10 साल की उम्र से ही उन्होंने माता के भजन गाने शुरू कर दिए थे।

शहनाज अख्तर ने बताया कि जब उन्होंने सनातन धर्म को अपनाया और भजन गाना शुरू किया, तो मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथियों ने इसका विरोध किया। हालात इतने बिगड़ गए कि उनके घर पर हमला हुआ। उनके परिवार को बेरहमी से पीटा गया। वो कहती हैं, “हम चार दिन तक अस्पताल में रहे। भूखे-प्यासे तड़पते रहे, लेकिन किसी ने मदद नहीं की।”

समाज के कुछ लोगों ने उन्हें धमकियाँ दीं कि हिंदू देवी-देवताओं के भजन गाने से वो नर्क में जाएँगी। शहनाज कहती हैं कि अगर मैं हिंदू धर्म की भक्ति से नर्क में जाऊँगी, तो आपके अब्बा ने कौन सी जन्नत पेश कर रखी है। आज वो गर्व से कहती हैं, “मैं भगवा रंग में रंग चुकी हूँ। सनातन धर्म ही मेरी पहचान है।”

सोशल मीडिया पर भी शहनाज को ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ता है। हाल ही में एक रील वायरल हुई, जिसमें उन्हें बदनाम करने की कोशिश की गई। इसके खिलाफ उन्होंने एफआईआर दर्ज कराई। वो कहती हैं, “मैंने अपना नाम नहीं बदला, क्योंकि मेरी शख्सियत सनातन धर्म ने बनाई है। जो मुझे परेशान करेंगे, उनके खिलाफ कानून का सहारा लूँगी।”

बांदा महोत्सव में भगवा ड्रेस पहने, माथे पर त्रिपुंड लगाए और साध्वी की तरह केश सजाए शहनाज पूरी तरह सनातनी नजर आईं। अब तक वो 75 से ज्यादा भजन एल्बम रिलीज कर चुकी हैं। उनका पहला एल्बम 2005 में आया था और तब से ही वो सुर्खियों में बनी रहती हैं।

फरमानी नाज को भी झेलनी पड़ी थी कट्टरपंथियों की लानत, खूब मिली थी गालियाँ

शहनाज की कहानी अकेली नहीं है। साल 2022 में फरमानी नाज भी ऐसी ही मुश्किलों से गुजरीं। मुजफ्फरनगर की रहने वाली फरमानी ने जब शिव भजन ‘हर हर शंभू’ गाया और यूट्यूब पर अपलोड किया, तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें निशाना बनाया। फरमानी की जिंदगी पहले से ही मुश्किलों से भरी थी। शौहर इमरान ने बिना तलाक दिए दूसरा निकाह कर लिया था। बेटे की गले की बीमारी के इलाज के लिए ससुराल वाले मायके से पैसे माँगते थे। प्रताड़ना से तंग आकर वो मायके लौट आईं। वहाँ उनकी मुलाकात राहुल मुलहेड़ा से हुई, जिन्होंने उनकी आवाज को पहचान दी।

फरमानी ने बताया, “मैं अपने बच्चे का पेट पालने के लिए गाती हूँ। जो लोग आज विरोध कर रहे हैं, वो तब कहाँ थे जब मेरे शौहर ने मुझे छोड़ दिया?” राहुल ने 2017 में एक यूट्यूब चैनल शुरू किया था, जिसमें फरमानी की आवाज लोगों तक पहुँची। साल 2020 में उनका चैनल ‘फरमानी नाज सिंगर’ बन गया। अब इस चैनल का नाम ‘नाज म्यूजिक’ है, जिसके 1.71 मिलियन फॉलोवर्स हैं।

‘हर हर शंभू’ गाने पर उन्हें नेहा कक्कड़ की तारीफ मिली, लेकिन कट्टरपंथियों ने फतवा जारी कर दिया। उन्हें गालियाँ और धमकियाँ मिलीं। एक यूजर मोहम्मद अमजद ने लिखा, “शर्म करो फरमानी, अखिरियत का खौफ करो।” फिर भी फरमानी डटी रहीं। गानों से मिले पैसों से उन्होंने 8 लाख का कर्ज चुकाया और घर ठीक करवाया।

शहनाज और फरमानी की कहानी एक जैसी है। दोनों ने सनातन के प्रति अपनी भक्ति दिखाई, लेकिन अपने ही समुदाय के कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार हुईं। एक तरफ फरमानी मुस्लिम होकर भी भजन गा रही हैं, तो शहनाज ने सनातन का हाथ थामने के बाद भी अपना नाम नहीं बदला। जो ये बताता है कि सनातन में सभी की स्वीकार्यता है, लेकिन दूसरी तरफ के कट्टरपंथियों को दिक्कत कुछ ज्यादा ही होती है।