उत्तर प्रदेश के बरेली में शुक्रवार (नवंबर 27, 2020) को ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) का मामला उजागर हुआ है। एक मुस्लिम युवक तमंचा लेकर एक शादीशुदा हिंदू लड़की के घर में घुस गया और विरोध करने पर धमकी देने लगा।
लड़के ने घर में घुसते ही लड़की को बुला कर कहा कि वह उसके बिना नहीं रह सकता और उसकी शादी तुड़वा कर उससे निकाह करके ही रहेगा। लड़की के परिवार ने यह सब देखने के बाद डर से लड़के के ख़िलाफ़ देवरिया थाने में शनिवार को मुकदमा दर्ज करवाया है।
मामला शरीफ नगर गाँव का है। लड़की के पिता ने अपनी शिकायत में पुलिस को कहा है कि उनकी बेटी इंटर कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उवैस के संपर्क में आई थी। उवैस ने उसे अपने जाल में फँसाया और जब लड़की ने 2019 में बीए में एडमिशन लिया तो वह उसे बहलाकर अपने साथ भोपाल ले गया।
उस समय लड़की के घरवालों ने पुलिस में शिकायत नहीं की थी। गाँव में एक पंचायत बैठी थी और उसमें निर्णय लिया गया कि मुकदमा दर्ज नहीं करवाया जाएगा और उवैस उनकी लड़की को वापस कर देगा।
इसके बाद उवैस लड़की को चौराहे पर छोड़ गया, लेकिन लड़की पर धर्मांतरण और निकाह के लिए लगातार दबाव बनाता रहा। धमकियों का सिलसिला बंद न होने पर लड़की के पिता ने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी और जून में उसकी शादी कर दी।
युवती जब अपने ससुराल चली गई तो उवैस उसके घरवालों को परेशान करने लगा। कुछ दिन बाद उसने कहा कि उसने लड़की के ससुराल का पता लगा लिया है, जल्द ही वह वहाँ जाकर उसकी शादी तुड़वाएगा और फिर उससे निकाह करेगा।
उवैस की बातें सुनकर लड़की के पिता के मन में डर बैठ गया। वह बेटी को अपने घर ले आए। जब उवैस को इसकी खबर हुई तो वह तमंचा लेकर घर में आया और सबको धमकी देने लगा। अंत में परिवार ने तंग आकर शिकायत करवाई।
पुलिस ने इस मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि हाल में जो अध्याधेश (विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम’) जारी हुआ है, उसकी धारा 3 व 5 के तहत यह मुकदमा दर्ज हुआ है। इसके अलावा आईपीसी की अन्य धाराएँ भी उवैस के ख़िलाफ़ लगाई गई हैं। लड़का फिलहाल फरार है और उसकी गिरफ्तारी का प्रयास किया जा रहा है।
यहाँ बता दें कि ‘लव जिहाद’ के ख़िलाफ़ कानून बनाए जाने के बाद ये पहला मामला बरेली में दर्ज हुआ है। इससे पहले एक केस में एक युवती ने पुलिस थाने में ताहिर हुसैन और उसके परिवार के खिलाफ मजहब छिपाकर शादी करने की रिपोर्ट दर्ज कराई है। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मुख्य आरोपित को जेल भेज दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (नवंबर 30, 2020) को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 6 लेन सड़क मार्ग का उद्घाटन किया। उनके दौरे से पहले न सिर्फ वहाँ पर घाटों की साफ़-सफाई की गई, बल्कि सुरक्षा का भी विशेष ख्याल रखा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देव-दीपावली का पहला दीपक जलाएँगे। उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग 19 का भी उद्घाटन किया, जो 2 प्राचीन राजमार्गों को जोड़ता है। उन्होंने कृषि कानूनों और किसानों के प्रदर्शन पर भी बात की।
ये सड़क वाराणसी को प्रयागराज से जोड़ती है। इस सड़क के निर्माण में 2447 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इस राजमार्ग के चालू होने के बाद दोनों शहरों की दूरी 3 घंटे कम हो जाएगी। मात्र 1 घंटा में लोग वाराणसी से प्रयागराज की यात्रा कर सकेंगे। घाटों का सौंदर्यीकरण भी किया गया है। देव-दीपावली के दौरान काशी के 84 घाटों पर 15 लाख दीपक जगमगाएँगे। पीएम मोदी गंगा नदी में तैनात क्रूज से जलमार्ग से विश्वनाथ धाम पहुँचे।
इस दौरान जनता को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में काशी के सौंदयीकरण के साथ-साथ यहाँ की कनेक्टिविटी पर जो काम हुआ है, उसका लाभ अब आप सभी देख रहे हैं। उन्होंने जनता से कहा कि नए हाईवे हो, पुल-फ्लाईओवर हो, ट्रैफिक जाम कम करने के लिए रास्तों को चौड़ा करना हो, जितना काम बनारस और आसपास में अभी हो रहा है, उतना आजादी के बाद कभी नहीं हुआ।
पीएम ने समझाया कि जब किसी क्षेत्र में आधुनिक कनेक्टिविटी का विस्तार होता है, तो इसका बहुत लाभ हमारे किसानों को होता है। उन्होंने जानकारी दी कि बीते वर्षों में ये प्रयास हुआ है कि गाँवों में आधुनिक सड़कों के साथ भंडारण, कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्थाएँ खड़ी की जाएँ और इसके लिए 1 लाख करोड़ रुपए का फंड भी बनाया गया है। पीएम ने बताया कि वाराणसी में पेरिशेबल कार्गो सेंटर बनाया गया है।
हमने वादा किया था कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुकूल लागत का डेढ़ गुना MSP देंगे।
ये वादा सिर्फ कागज़ों पर ही पूरा नहीं किया गया, बल्कि किसानों के बैंक खाते तक पहुंचाया है।
इसके बनने के कारण अब यहाँ के किसानों को फल और सब्जियों को स्टोर करके रखने और उन्हें आसानी से बेचने की बहुत बड़ी सुविधा मिली है। पीएम मोदी ने कहा कि इस स्टोरेज कैपेसिटी के कारण पहली बार यहाँ के किसानों की उपज बड़ी मात्रा में निर्यात हो रही है। पीएम ने याद दिलाया कि कैसे चंदौली के किसानों की आय बढ़ाने के लिए 2 साल पहले काले चावल की एक वैरायटी का प्रयोग यहाँ किया गया था।
उन्होंने बताया कि पिछले साल खरीफ के सीज़न में करीब 400 किसानों को ये चावल उगाने के लिए दिया गया और साथ ही इन किसानों की एक समिति बनाई गई, इसके लिए मार्केट तलाश किया गया। उन्होंने कहा कि सरकार के प्रयासों औऱ आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर से किसानों को कितना लाभ हो रहा है, इसका एक बेहतरीन उदाहरण चंदौली का काला चावल (ब्लैक राइस) है। पीएम मोदी ने कहा कि ये चावल चंदौली के किसानों के घरों में समृद्धि लेकर आ रहा है।
दिल्ली में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के बीच वाराणसी पहुँचे पीएम मोदी ने कहा कि भारत के कृषि उत्पाद पूरी दुनिया में मशहूर हैं। उन्होंने पूछा कि क्या किसान की इस बड़े मार्केट और ज्यादा दाम तक पहुँच नहीं होनी चाहिए? साथ ही पूछा कि अगर कोई पुराने सिस्टम से ही लेनदेन ही ठीक समझता है तो, उस पर भी कहाँ रोक लगाई गई है? नए कृषि सुधारों से किसानों को नए विकल्प और नए कानूनी संरक्षण दिए गए हैं।
उन्होंने याद दिलाया कि कैसे पहले मंडी के बाहर हुए लेनदेन ही गैरकानूनी थे, वहीं अब छोटा किसान भी, मंडी से बाहर हुए हर सौदे को लेकर कानूनी कार्यवाही कर सकता है। उन्होंने दावा किया कि किसान को अब नए विकल्प भी मिले हैं और धोखे से कानूनी संरक्षण भी मिला है। उन्होंने कहा कि सरकारें नीतियाँ बनाती हैं, कानून-कायदे बनाती हैं। नीतियों और कानूनों को समर्थन भी मिलता है तो कुछ सवाल भी स्वभाविक ही हैं। उन्होंने इसे लोकतंत्र का हिस्सा बताया और कहा कि भारत में ये जीवंत परंपरा रही है। पीएम ने कहा:
“पिछले कुछ समय से एक अलग ही ट्रेंड देश में देखने को मिल रहा है। पहले होता ये था कि सरकार का कोई फैसला अगर किसी को पसंद नहीं आता था तो उसका विरोध होता था। लेकिन बीते कुछ समय से हम देख रहे हैं कि अब विरोध का आधार फैसला नहीं, बल्कि आशंकाओं को बनाया जा रहा है। दुष्प्रचारकिया जाता है कि फैसला तो ठीक है लेकिन इससे आगे चलकर ऐसा हो सकता है। जो अभी हुआ ही नहीं, जो कभी होगा ही नहीं, उसको लेकर समाज में भ्रम फैलाया जाता है। कृषि सुधारों के मामले में भी यही हो रहा है। ये वही लोग हैं जिन्होंने दशकों तक किसानों के साथ लगातार छल किया है। MSP तो घोषित होता था लेकिन MSP पर खरीद बहुत कम की जाती थी। सालों तक MSP को लेकर छल किया गया। किसानों के नाम पर बड़े-बड़े कर्जमाफी के पैकेज घोषित किए जाते थे। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों तक ये पहुँचते ही नहीं थे। यानी, कर्ज़माफी को लेकर भी छल किया गया।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि किसानों के नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाएँ घोषित होती थीं, लेकिन वे खुद मानते थे कि 1 रुपए में से सिर्फ 15 पैसे ही किसान तक पहुँचते थे। उन्होंने इसे योजनाओं के नाम पर छल करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब इतिहास छल का रहा हो, तब 2 बातें स्वभाविक हैं। पहली ये कि किसान अगर सरकारों की बातों से कई बार आशंकित रहता है तो उसके पीछे दशकों का इतिहास है। दूसरी ये कि जिन्होंने वादे तोड़े, छल किया, उनके लिए ये झूठ फैलाना मजबूरी बन चुका है कि जो पहले होता था, वही अब भी होने वाला है।
मुझे ऐहसास है कि दशकों का छलावा किसानों को आशंकित करता है।
लेकिन अब छल से नहीं गंगाजल जैसी पवित्र नीयत के साथ काम किया जा रहा है।
उन्होंने चुनौती दी कि जब इस सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड देखेंगे तो सच अपने आप सामने आ जाएगा। पीएम ने याद दिलाया कि भाजपा ने यूरिया की कालाबाज़ारी रोकने का वादा किया था और किसान को पर्याप्त यूरिया देने की बात की थी। उन्होंने कहा कि सरकार ने बीते 6 साल में यूरिया की कमी नहीं होने दी। यहाँ तक कि लॉकडाउन में जब हर गतिविधि बंद थी, तब भी दिक्कत नहीं आने दी गई।
उन्होंने कहा कि हमने वादा किया था कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुकूल लागत का डेढ़ गुणा MSP देंगे और ये वादा सिर्फ कागज़ों पर ही पूरा नहीं किया गया, बल्कि किसानों के बैंक खाते तक पहुँचाया गया है। बकौल पीएम मोदी, सिर्फ दाल की ही बात करें तो 2014 से पहले के 5 सालों में लगभग साढ़े 6 सौ करोड़ रुपए की ही दाल किसान से खरीदी गईं, लेकिन इसके बाद के 5 सालों में हमने लगभग 49 हज़ार करोड़ रुपए की दालें खरीदी हैं। अर्थात, लगभग 75 गुणा बढ़ोतरी।
प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि 2014 से पहले के 5 सालों में पहले की सरकार ने 2 लाख करोड़ रुपए का धान खरीदा था। लेकिन इसके बाद के 5 सालों में 5 लाख करोड़ रुपए धान के MSP के रूप में किसानों तक हमने पहुँचाए हैं। उन्होंने आँकड़े गिनाते हुए साबित किया कि लगभग ढाई गुणा ज्यादा पैसा किसान के पास पहुँचा है। 2014 से पहले के 5 सालों में गेहूँ की खरीद पर डेढ़ लाख करोड़ रुपए के आसपास ही किसानों को मिला। वहीं भाजपा की सरकार में 5 सालों में 3 लाख करोड़ रुपए गेहूँ किसानों को मिल चुका है, लगभग 2 गुणा।
इसके बाद पीएम मोदी ने सवाल दागा कि अगर मंडियों और MSP को ही हटाना था, तो इनको ताकत देने, इन पर इतना निवेश ही क्यों करते? साथ ही बताया कि मोदी सरकार तो मंडियों को आधुनिक बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। उन्होंने लोगों को ये याद रखने को कहा कि यही लोग हैं जो पीएम किसान सम्मान निधि को लेकर लोग सवाल उठाते थे। ये लोग अफवाह फैलाते थे कि चुनाव को देखते हुए ये पैसा दिया जा रहा है और चुनाव के बाद यही पैसा ब्याज सहित वापस देना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि एक राज्य में तो वहाँ की सरकार, अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते आज भी किसानों को इस योजना का लाभ नहीं लेने दे रही है। देश के 10 करोड़ से ज्यादा किसान परिवारों के बैंक खाते में सीधी मदद दी जा रही है। अब तक लगभग 1 लाख करोड़ रुपए किसानों तक पहुँच भी चुका है। उन्होंने आश्वासन दिया कि उन्हें एहसास है कि दशकों का छलावा किसानों को आशंकित करता है। लेकिन अब छल से नहीं गंगाजल जैसी पवित्र नीयत के साथ काम किया जा रहा है।
पीएम मोदी ने कहा कि आशंकाओं के आधार पर भ्रम फैलाने वालों की सच्चाई लगातार देश के सामने आ रही है और जब एक विषय पर इनका झूठ किसान समझ जाते हैं, तो ये दूसरे विषय पर झूठ फैलाने लगते हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया की जिन किसान परिवारों की अभी भी कुछ चिंताएँ हैं, कुछ सवाल हैं, तो उनका जवाब भी सरकार निरंतर दे रही है। साथ ही विश्वास जताया कि आज जिन किसानों को कृषि सुधारों पर कुछ शंकाएँ हैं, वो भी भविष्य में इन कृषि सुधारों का लाभ उठाकर, अपनी आय बढ़ाएँगे।
कॉन्ग्रेस की चुनौतियाँ किसी भी मोर्चे पर कम होने का नाम नहीं ले रही है। एक तरफ चुनावों में लगातार गिरता प्रदर्शन और दूसरी तरफ पार्टी के नेता! इसी कड़ी में वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने एक ट्वीट करके कॉन्ग्रेस के हिस्से की परेशानियाँ बढ़ा दी हैं। आनंद शर्मा ने कोरोना की वैक्सीन बना रही कंपनी में किए जा रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौरे को लेकर एक ट्वीट किया था।
रविवार (29 दिसंबर 2020) को किए गए इस ट्वीट में आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री मोदी की इस बात पर सराहना की थी। ट्वीट पर चर्चा और विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने स्पष्टीकरण पेश किया और अपने ट्वीट में संशोधन भी किया। उल्लेखनीय है कि शनिवार को इसी मुद्दे पर कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अलग मत रखते हुए मोदी सरकार को घेरने का प्रयास किया था।
वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने अपने ट्वीट में लिखा, “पहले किए गए ट्वीट में हुई गलती के लिए खेद प्रकट करता हूँ, जिसमें कुछ पंक्तियाँ मिसप्लेस (आगे-पीछे) हो गई थीं। इसकी वजह से लोगों के बीच भ्रम भी पैदा हुआ, मूल ट्वीट कुछ इस प्रकार है।”
Regretting the error in our earlier tweet where the lines got misplaced, resulting in some avoidable confusion. The original tweet reads as follows. pic.twitter.com/hrhD2me519
कई ट्वीट करते हुए आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सीरम इंस्टिट्यूट, भारत बायोटेक, जाइडस कैडिला दौरे का स्वागत करते हुए इसे भारतीय वैज्ञानिकों के कोरोना महामारी की वैक्सीन के उत्पादन कार्य को मान्यता देने वाला बताया था।
उन्होंने लिखा था, “यह कार्य अकेले ही फ्रंट लाइन वॉरियर का मनोबल बढ़ाएगा और देश के लोगों को भरोसा दिलाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने अनेक संस्थाओं का सम्मान किया है, जिन्होंने पिछले कई दशकों में भारत को दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन निर्माता के रूप में क्षमता प्रदान की है। प्रधानमंत्री मोदी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वैक्सीन आने के साथ-साथ एक कुशल और उचित प्लेटफॉर्म भी तैयार होगा, जिससे देश के आम लोग लाभान्वित होंगे।”
इसके ठीक एक दिन पहले शनिवार (28 नवंबर 2020) कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने इस मुद्दे पर अलग ही नज़रिया पेश किया था। उन्होंने कहा था, “काश प्रधानमंत्री मोदी विमान से उड़ने की जगह किसानों से संवाद करते। कोरोना वायरस की वैक्सीन का निर्माण वैज्ञानिकों को करना है, किसानों पर देश को खिलाने की जिम्मेदारी है लेकिन मोदी जी और भाजपा नेता सिर्फ प्रचार पर ही टिके हुए हैं।”
प्रधानमंत्री मोदी ने वैक्सीन के विकास और निर्माण प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा करने के लिए अहमदाबाद में जाईडस बायोटेक पार्क, हैदराबाद में भारत बायोटेक और पुणे में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया का दौरा किया था।
अपनी हालिया ‘सेक्युलर’ और ‘लिबरल’ छवि को आगे ले जाते हुए उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने ‘अज़ान पाठ प्रतियोगिता’ का आयोजन करने का फैसला किया है। इसकी घोषणा शिवसेना दक्षिण मुंबई डिवीजन के प्रमुख पांडुरंग सकपाल ने की।
अपने इस फैसले का बचाव करते हुए शिवसेना डिवीजन प्रमुख पांडुरंग सकपाल ने कहा कि भगवद गीता पाठ प्रतियोगिता की तरह ही अजान पाठ प्रतियोगिता होगी। मुस्लिम बच्चों को अज़ान पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए यह निर्णय लिया गया है। आलोचकों ने राज्य के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को साधने का प्रयास बताते हुए इसके लिए शिवसेना की निंदा की है।
अज़ान पाठ प्रतियोगिता आयोजित करने का विचार उनके दिमाग में कैसे आया, इस बारे में बात करते हुए सकपाल ने कहा, “मैं मरीन लाइन्स में बड़ा कब्रिस्तान के बगल में रहता हूँ। यही कारण है कि मुझे हर दिन अजान सुनने को मिलती है। मैंने अजान को अद्भुत और मनभावन पाया है। जो भी इसे एक बार सुनता है, वह अजान के अगले शेड्यूल का बेसब्री से इंतजार करता है। यही कारण है कि मेरे मन में मुस्लिम समुदाय के बच्चों के लिए अज़ान प्रतियोगिता आयोजित करने का विचार आया।”
अज़ान पाठ प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत करेगी शिवसेना: सकपाल
सकपाल ने यह भी कहा कि बच्चों को उनके उच्चारण, ध्वनि मॉड्यूलेशन और गायन के आधार पर पुरस्कार दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पुरस्कारों पर होने वाले खर्च का वहन शिवसेना करेगी। सकपाल ने कहा, “मुस्लिम समुदाय के बच्चे अजान का शानदार पाठ करते हैं। इस प्रतियोगिता को रखने का उद्देश्य प्रतिभाशाली कलाकारों के लिए एक मंच प्रदान करना है। मुझे नहीं लगता कि इस तरह की प्रतियोगिता पूरे देश में हुई है। यह पहला प्रयोग है और हमें उम्मीद है कि इसे अच्छी प्रतिक्रिया मिलेगी।”
सकपाल ने प्रतियोगिता पर सवाल उठाने वालों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसे लोगों को अनदेखा किया जाना चाहिए और अज़ान की तुलना महाआरती से करनी चाहिए। अंजान केवल 5 मिनट का होता है। इसलिए, अगर किसी को इन कुछ मिनटों से परेशानी होती है तो उन्हें अनदेखा किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अजान की परंपरा कई सदियों पुरानी है। यह कोई हाल की चीज नहीं है। इस तरह के विरोध को नजरअंदाज किया जाना चाहिए। महाआरती जितनी महत्वपूर्ण ही अज़ान है। यह प्यार और शांति का प्रतीक है।
हैदराबाद निकाय चुनावों से पहले ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अजीबोगरीब बयान दिया है। ओवैसी ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए एबीपी न्यूज को दिए साक्षात्कार में कहा कि उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे कई मजनूसे घिरी एक लैला हों।
ओवैसी ने कहा,
“देखिए मेरा हाल ऐसा है न, कि मैं लैला हूँ और मेरे हजारों मजनू हैं। बिहार में कॉन्ग्रेस ने कह दिया कि मैं बीजेपी की बी टीम हूँ। अब यहाँ कॉन्ग्रेस कह रही है ओवैसी नहीं है तो हमको वोट दे दो। अब बीजेपी कुछ और कह रही है। मुझे कोई फिक्र नहीं है। मैं एक लैला हूँ और मेरे चाहने वाले इतने हैं कि हर कोई चाहता है मुझे मुद्दा बना कर वोट हासिल किया जाए।”
ओवैसी का कहना कि कॉन्ग्रेस और भाजपा उन्हें निशाना बनाकर वोट माँग रही हैं। वहीं उनकी पार्टी हैदराबाद की परेशानियों- जैसे वाटर सप्लाई, जल निकास समस्या व आदि नागरिक मुद्दों पर जनता से वोट माँग रही है। उनका कहना है कि अन्य पार्टियाँ उनके नाम का इस्तेमाल करके विवाद खड़ा करना चाहती हैं।
इससे पहले भी ओवैसी ने बिहार चुनावों के नतीजे देखकर अपनी पार्टी की तुलना एक महिला से की थी। उन्होंने कहा था कि उनकी स्थिति, ‘फँस गई रजिया गुंडो में’ जैसी हो गई है। ओवैसी की पार्टी ने 5 सीट पर जीत दर्ज कराने के बाद ये टिप्पणी इसलिए की थी, क्योंकि भाजपा उन्हें एंटी नेशनल कहती है और महागठबंधन उन्हें वोट-कटुआ।
गौरतलब है कि ओवैसी ने ‘लैला-मजनू’ वाली टिप्पणी करने से पहले भाजपा को बीफ खिलाने की बात कही थी। इसे सुन भाजपा विधायक राजा सिंह ने उन्हें पोर्क बिरयानी का निमंत्रण भेजा था। राजा सिंह ने कहा था,
“मैं आपको आज बिरयानी का निमंत्रण दे रहा हूँ। मेरे इलाके में कई वाल्मिकी समुदाय के लोग हैं, जो पोर्क के साथ बिरयानी अच्छी बनाते हैं। अगर आपको बिरयानी इतनी पसंद है तो आइए हम आपको स्वादिष्ट बिरयानी ऑफर करते हैं।”
बता दें कि हैदराबाद में निगम चुनाव कल यानी 1 दिसंबर को होने हैं। रिजल्ट 4 दिसंबर को घोषित होगा।। इन चुनावों में बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाएगा। बीजेपी ने इन चुनावों में पूरी ताकत झोंक रखी है। अमित शाह, तेजस्वी सूर्या और अरविंद धर्मपुरी व जी कृष्ण रेड्डी वहाँ प्रचार कर चुके हैं।
इन दिनों दिल्ली की हवा बेहद खराब है। साथ ही शहर में कोरोना वायरस का प्रकोप भी काफी बढ़ रहा है। इस बीच दिल्ली की सत्तारुढ़ पार्टी आम आदमी पार्टी (AAP) ने हैदराबाद नगर निगम चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है। AAP इस बार पार्टी के सदस्यों की पत्नियों को मैदान में उतार रही है। इनमें से कुछ विधानसभा चुनाव लड़कर हार भी चुकी हैं।
आप के इन महिला उम्मीदवारों को बुर्के में पहचानना काफी मुश्किल है। बुर्के में इन महिलाओं को शायद ही कोई पहचान पाए। शायद यही वजह है कि AAP ने उम्मीदवारों के पति की तस्वीर को पोस्टर पर प्रमुखता से रखने का फैसला किया। यहाँ पर पितृसत्ता का यथार्थ चित्रण देखने को मिल रहा है।
इसी बीच AAP उम्मीदवार आसरा फातिमा का एक कैंपेन पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है।
वायरल हुए पोस्टर में देखा जा सकता है कि लोगों को यह पता लगाने के लिए उम्मीदवार कौन है, थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ती है। थोड़ी मशक्कत के बाद लोगों को पता चल पाता है कि चुनाव लड़ने वाली उम्मीदवार का नाम आसरा फातिमा है। पोस्टर में आसरा फातिमा के पति की बड़ी सी तस्वीर लगी है। यह तस्वीर पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल की तस्वीर से भी बड़ी है। मोहम्मद माजिद ने AAP के टिकट पर 2018 तेलंगाना विधानसभा चुनाव लड़ा था। उस हलफनामे के अनुसार, उनकी पत्नी ‘हाउसवाइफ’ है। वह दो साल बाद चुनाव लड़ रही है।
दरअसल आसरा का कैंपेन पोस्टर मजेदार कारणों से वायरल हुआ है। इस पोस्टर में कुछ को आसरा का नाम नहीं मिला तो किसी को उनकी तस्वीर ही नहीं दिखी। कुछ लोगों ने उनकी तस्वीर को ‘बोतल’ समझ लिया।
Me too feel same , I trying to finding why men name is Fatima ,why AAP using Coco cola ????
कई के पास पोस्टर से संबंधित काफी अधिक मनोरंजक और मजेदार सवाल थे।
Some other quiz questions: * How many people are in this picture? * What is Mohd Majid holding in his hand? * What is the spelling for Pressure Cooker? * There are two white caps in the picture. What is it that you find below the second white cap? * What does secret ballot mean?
कई लोगों ने यह भी बताया कि केरल में यह कैसे चलन में है, जहाँ पत्नियों को उम्मीदवारों के रूप में रखा जाता है और पतियों की तस्वीरें अधिक प्रमुखता से प्रदर्शित की जाती हैं।
इसी तरह दूसरों ने बताया कि कैसे पत्नी शायद पति के लिए प्रॉक्सी उम्मीदवार है। सोशल मीडिया यूजर ने लिखा कि मोहम्मद माजिद प्रॉक्सी उम्मीदवार हैं, उनकी पत्नी पर्दे के पीछे रहेंगी, भले ही वह जीतें। कहाँ हैं उदार उदारवादी जो पितृसत्ता को तोड़ना चाहते हैं।
Mohd Majid is the proxy candidate, his wife will remain behind the curtain, even if she wins. Where are woke liberals who want to smash patriarchy ? https://t.co/2cDmgkH6uX
इस साल की शुरुआत में दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP ने जितेन्द्र सिंह तोमर की जगह उनकी पत्नी प्रीति तोमर को मैदान में उतारा था। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान झूठी जानकारी साझा करने के लिए तोमर को अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
हैदराबाद चुनाव में AAP ने फरहीन बेगम को भी मैदान में उतारा है। बेगम की बुर्का पहने तस्वीर के साथ कैंपेन पोस्टर पर पुरुष की तस्वीर प्रमुखता से दिखाई देती है।
#AapkaGhmcCorporator Asra, home maker & social worker who understands the issues concerning half of the population-women is in the contest from Venkateshwara Colony division, ward number 92 at serial number 5 on the ballot paper with Pressure Cooker symbol. @aap_mla@aap_ka_majidpic.twitter.com/2xvclTbtyR
मोहम्मद अब्दुल मजीद द्वारा उनका प्रतिनिधित्व किया गया है। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि मजीद उनके पति हैं या उनकी ओर से अभियान चला रहे हैं। बता दें कि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव 1 दिसंबर 2020 को होंगे।
बिहार के एक छोटे से गाँव से आई सितारा परवीन (Sitara Parveen) को अपनी गायकी के कारण समुदाय के लोगों का विरोध झेलना पड़ा। यह जानकारी परवीन ने अपने संघर्षों पर बात करते हुए Indian Idol (इंडियन आइडल) में दी। परवीन ने बताया कि उन पर किस तरह के सामाजिक दबाव बनाए गए और उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
सोनी टीवी पर आने वाले इंडियन आइडल शो की कंटेस्टंट सितारा परवीन ने बताया कि वह जिस समुदाय से आती हैं, उसने उन्हें रोकने का प्रयास किया। सितारा कहती हैं कि वह 5 साल की उम्र से संगीत सीख रही हैं, लेकिन उनका अब तक का सफर बहुत कठिन रहा।
उन्होंने कहा कि हमारे समाज में लड़कियों को किसी भी क्षेत्र में खुद को आगे बढ़ाने का मौका नहीं दिया जाता। वह खुद एक ऐसे परिवार में जन्मीं जहाँ पर उनके पास अपने पैशन को फॉलो करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। इसके बाद समाज ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का प्रयास किया और उन्हें गायकी से रोकते रहे।
उन्हें उनके समाज ने गाना गाने के लिए दुत्कारा। वहीं, पिता और भाई को भी उलाहनाएँ दी गईं, क्योंकि वह सितारा को प्रोत्साहित करते थे। अपने ही खानदान के लोगों ने सितारा और उनके परिवार का साथ नहीं दिया।
इंडियन आइडल के मंच तक पहुँचने से पहले भी उन्होंने इसका जिक्र किसी से नहीं किया था। वह कहती हैं कि परिवार को शर्मिंदगी से बचाने के लिए उन्होंने अपनी संगीत की क्लास को भी सीक्रेट रखा और बहुत सीमित समय के लिए उसे सीखा।
गौरतलब है कि पिछले दिनों जायरा वसीम और सना खान जैसी मुस्लिम महिलाओं पर बॉलीवुड ने इस्लाम के प्रभाव को देखा है। एक इंस्टाग्राम पोस्ट के बाद सना का रहन-सहन किस तरह बदला और उन्होंने कैसे फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कहा, वो भी किसी से छिपा नहीं है। सना खान अब यूट्यूब पर केवल इस्लाम संबंधी बात करती नजर आती हैं।
उनसे पहले जायरा वसीम ने भी कुछ ऐसा ही किया था। इस्लाम के नाम पर उन्होंने एक ऐसे करियर को ठोकर मार दी थी, जिसका सपना कई लड़कियाँ देखती हैं। दिलचस्प यह था कि जायरा की आखिरी फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार का कंटेंट भी यही था कि वह एक टैलेंटेड सिंगर होती हैं, लेकिन अपने रुढ़िवादी पिता के कारण उत्पीड़न झेलती हैं।
राहुल गाँधी हर मुद्दे पर अपनी अजीबोगरीब राय के लिए जाने जाते हैं। आज की तारीख हो या आज से 7 साल पहले की, उनकी बातों में मनोरंजन का तड़का वही रहता है। अब जब दिल्ली और आस-पास में भारत सरकार द्वारा पारित किए गए कृषि कानूनों के विरोध में ‘किसान आंदोलन’ चल रहा है, हम आपको राहुल गाँधी का 6 साल पुराना तब का वीडियो दिखा रहे हैं, जब लोकसभा चुनाव सर पर था और यूपीए-2 अपना कार्यकाल पूरा कर चुका था।
तब उन्होंने ‘नेटवर्क 18’ के अशीत कुणाल के साथ एक इंटरव्यू में कृषि और किसान पर बात की थी। अशीत फ़िलहाल ‘न्यूज़ 1 इंडिया’ के मैनेजिंग एडिटर हैं। उन्होंने राहुल गाँधी से भ्रष्टाचार पर बातें शुरू की थी और फिर कृषि पर आ गए थे। उन्होंने कहा था कि RTI के माध्यम से यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचार को लोगों के सामने रखा और इसके खिलाफ बिल लेकर आए, लेकिन भाजपा के लोगों ने इसे पास नहीं होने दिया।
उन्होंने दावा किया कि जहाँ भी भ्रष्टाचार दिखा, कॉन्ग्रेस सरकार ने कार्रवाई की। उन्होंने नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा था कि वो खुद को ‘गुजरात का चौकीदार’ कहते हैं, लेकिन हमें एक चौकीदार नहीं चाहिए, हमें जनता को चौकीदार बनाना है। इसके बाद राहुल गाँधी ने कहा कि दुनिया भर में फ्यूल के दाम ऊँचे हैं, जिसे सरकार ने काउंटर किया है और किसानों को ये सुविधा दी है कि फलों-सब्जियों को डायरेक्टली बेचे।
राहुल गाँधी का अप्रैल 2014 का इंटरव्यू, देखें 6:00 के बाद (वीडियो साभार: CNN-News 18)
आज जब किसानों को मोदी सरकार द्वारा कृषि कानून के माध्यम से यही सुविधा दी गई है और वो कहीं भी बिना रिस्क उठाए अपनी फसल बेच सकते हैं, तो कॉन्ग्रेस इसका विरोध कर रही है। उन्होंने दावा किया कि अगर आप सचमुच में महँगाई को काबू करना चाहते हैं और इम्पैक्ट लाना चाहते हैं तो मेन मुद्दा क्या है, ये समझना होगा। फिर उन्होंने समझाया कि कैसे-कैसे आजकल किसान जो भी खेती करता है, उसके उत्पाद जाया हो जाते हैं, सड़ जाते हैं।
ये अजीब विडम्बना है कि जिस व्यक्ति की 10 सालों से सरकार थी, वो बोल रहा था कि किसानों के उत्पाद बिकते ही नहीं, सड़ जाते हैं। बजाए ये बताने के कि उसने इसके लिए पिछले एक दशक में क्या किया। उन्होंने किसानों को ‘फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट’ से जोड़ने की बात की थी। फिर उन्होंने किसानों को FDI से जोड़ने की बात की और भाजपा पर आरोप लगाया था कि वो उन्हें ऐसा करने से रोक रही है।
हाल ही में अपने एक भाषण में राहुल गाँधी ने दावा किया कि ‘नरेंद्र मोदी के कृषि कानूनों’ ने मंडी को ख़त्म कर दिया है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि किसान कहीं भी अपने उत्पाद बेच सकता है, लेकिन जब किसान खेत के बाहर ही नहीं निकल पाएगा, सड़क नहीं होगी- फिर कैसे जाकर बेचेगा? साथ ही राहुल गाँधी यहाँ तक दावा कर बैठे कि नरेंद्र मोदी ने हाल ही में 8000 करोड़ रुपए के दो हवाई जहाज ख़रीदे हैं।
तब वो सिर्फ 13 साल की थी। जूनियर स्कूल में पढ़ती थी। एक दिन वह अपने छोटे भाई के साथ मस्जिद गई। मजहबी शिक्षा की क्लास में हिस्सा लेने। लेकिन, किताब के बहाने मस्जिद का इमाम उसे टॉयलेट में ले गया। धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया। पल भर में वह नीचे और अधेड़ इमाम उसके ऊपर था। जब वह यह सब भोग रही थी, मस्जिद की पार्किंग में उसके अब्बा कार लेकर बच्चों का इंतजार कर रहे थे।
घटना ब्रिटेन की है। 2005 में हुई इस घटना का आरोपित इमाम खन्दाकेर मोहम्मद रहमान 65 साल का है। 2018 में यह मामला तब प्रकाश में आया जब पीड़िता ने आपबीती शौहर से साझा की। अब इस मामले की कोर्ट में सुनवाई चल रही है। हालाँकि इमाम ने अपने खिलाफ लगे आरोपों को खारिज किया है।
आरोपों के अनुसार रहमान ने साल 2005 के दौरान साउथ वेल्स मस्जिद की महिला वाशरूम (शौचालय) में नाबालिग के साथ बलात्कार किया था। इसके अलावा कई अन्य मौकों पर भी उसने लड़की के साथ ज्यादती करने का प्रयास किया। स्वानसी क्राउन कोर्ट (Swansea Crown Court) में आरोपित ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान पीड़िता के वकील जॉन हिपकिन ने कहा जिस वक्त आरोपित रहमान (65) ने बलात्कार की घटना को अंजाम दिया, पीड़िता केवल 13 साल की थी। रहमान ने लड़की को अपने साथ मस्जिद की पुस्तकालय तक चलने के लिए कहा। जब आरोपित को आसपास कोई नज़र नहीं आया तो वह पीड़िता को धक्का देकर वाशरूम की ओर ले गया।
पीड़िता ने आरोपित इमाम की पहचान यूट्यूब वीडियो देखने के दौरान की थी। आरोपित इमाम पर इसके अलावा दो अन्य मौकों पर भी उसने शारीरिक शोषण का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद भी पीड़िता जब मस्जिद आती थी तब रहमान उसके साथ ज्यादती करने का प्रयास करता था। उसे गलत तरीके से छूता था। बाद में पीड़िता ने मस्जिद जाना ही बंद कर दिया।
साल 2018 में पीड़िता ने पूरी घटना का ब्यौरा अपने शौहर को दिया तब इस मामले की पुलिस से शिकायत दर्ज कराई गई। पीड़िता ने बाद में बताया कि रहमान वही व्यक्ति है जो पहले उसकी तस्वीर खोज रहा था और इसके बाद उसने पीड़िता पर हमला किया था। लेकिन जब पुलिस ने रहमान से पूछताछ की थी तब उसने सारे आरोप नकार दिए थे।
सुनवाई के दौरान जॉन हिपकिन ने कहा कि इस बात पर निर्णय लेना न्यायालय का काम है कि क्या पीड़िता का बलात्कार और शोषण हुआ? इसके बाद न्यायाधीशों की पीठ ने वह वीडियो देखा जिसमें पीड़िता ने पुलिस के सामने पूरी घटना का ब्यौरा दिया था। इस वीडियो में पीड़िता ने विस्तार से बताया है कि कैसे इमाम ने मस्जिद स्थित महिलाओं के वाशरूम में उसे फर्श पर गिराया और जबरदस्ती की। फिर कैसे वह पार्किंग तक पहुँची जहाँ उसके पिता की कार खड़ी थी।
पीड़िता ने कहा, “इस घटना के बाद मैं कभी मस्जिद नहीं जाना चाहती थी। जब भी मस्जिद जाती रहमान गलत तरीके से छूता था। रहमान के पास एक छड़ी भी थी जिसका इस्तेमाल वह बच्चों को पीटने के लिए करता था। इसी बहाने उसे लड़कियों के साथ अभद्रता करने का मौक़ा मिल जाता था। मुझे इस बात का पछतावा है कि मैंने इस मामले की शिकायत पहले नहीं की, मैं उम्मीद करती हूँ जल्द ही इस घटना पर न्याय होगा।”
हाल में भारत सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के प्रोटेस्ट को क्रांति बताकर एक लोकतांत्रिक सरकार को गिराने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। लिबरलों को लग रहा है कि हर पगड़ी वाला भगत सिंह होता है। शायद वो भूल गए हैं कि भगत सिंह ने लड़ाई ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ भारत की ओर से लड़ी थी, भारत की लोकतांत्रिक सरकार को गिराने के लिए नहीं।
आज जब किसानों के प्रोटेस्ट को खालिस्तानियों का समर्थन मिल रहा रहा है तो 7 मार्च 1990 का दिन याद कर लेना भी जरूरी है। ये तारीख पंजाब के अबोहर के इतिहास में खूनी दिन के नाम से याद की जाती है। खालिस्तानियों का समर्थन किसी को भी कितना महंगा पड़ सकता है, इसका अंदाजा इस दिन के बारे में पढ़ कर लगाया जा सकता है।
अबोहर की खूनी शाम
7 मार्च 1990। समय-शाम के 6:30 बजे। अचानक सड़कों पर तेज धमाके की आवाजें सुनाई दीं। दुकानदारों को लगा बच्चे पटाखे जला रहे होंगे। कुछ देर बाद लोगों की भीड़ सड़कों पर भागती नजर आई। ये भीड़ चिल्ला रही थी- “भाजो गोलियाँ मार रहे (भाग लो, वो लोगों को मार रहे हैं)”, “बंदे मार ते, बंदे मार ते (वह मार रहे हैं)”, “अपनी जान बचाओ भाजो (भागो और अपनी जान बचाओ)।”
कुछ देर में सड़कों पर खालिस्तान कमांडो फोर्स के 10 आतंकी बाजार के हर कोने पर थे। ये बिना देखे किसी भी दिशा में लोगों को मार रहे थे। इन्होंने उस भीड़ को भी नहीं छोड़ा था, जो इनसे जान बचाकर आगे भाग रही थी। देखते ही देखते लाशों के ढेर बिछ गए। कई घायल हो गए। आतंकी इसके बाद भी फाजिलका रोड (भारत-पाक बॉर्डर के पास) की ओर बढ़ रहे थे।
इतिहास के झरोखे से अबोहार किताब से लिए गए अंश
कहा जाता है कि पहले तो जब आतंकियों ने गोलियों की बौछार की, तब पुलिस कहीं नजर नहीं आई, बाद में वह घरों में छिप गए। काफी देर पुलिस ने उन्हें ढूँढा, लेकिन वह घर से नहीं निकले। पुलिस के जाने के बाद यह आतंकी वहाँ से निकल गए और न जाने कहाँ खेतों से गायब हो गए। दुखद यह था कि अबोहर के पुलिस थाने में जब सड़कों पर हुए हमले की सूचना मिली तो उन्होंने अपना दरवाजा बंद कर दिया।
सदर बाजार की घटना थी और उससे थोड़ी दूर पर थाना था। पुलिस वाले चाहते तो इतना मुश्किल नहीं था बेसहायों की मदद के लिए पहुँचना, लेकिन उन्होंने खालिस्तानियों का नाम सुन कर अपने दरवाजे बंद कर लिए और मदद की आवाज आने पर भी कोई सुनवाई नहीं की। घटना के 40 मिनट बाद पुलिस निकली और ऐसे आतंकियों की छानबीन शुरू की, जो घटनास्थल से गायब हो चुके थे।
सिविल अस्पताल की हालत
उधर अबोहर के सिविल अस्पताल की हालत दयनीय हो चुकी थी। प्रशासन ऐसी किसी आपातकाल स्थिति से निपटने को तैयार नहीं था। मगर, तब भी आतंकियों के जाते ही अपने दरवाजे खोल कर घायलों की किसी तरह मदद कर रहा था। उस समय कोई एंबुलेंस सर्विस नहीं थी। घायलों को हाथ से खींचने वाले ठेलों पर अस्पताल पहुँचाया गया।
सीमित प्रशासन के साथ अस्पताल जुटा था कि किसी तरह आतंकी हमले के शिकार लोगों को जीवनदान दे सकें। मगर, प्रशासन भी क्या करता? मरीजों की संख्या इतनी बढ़ गई कि कुछ देर बाद दवाइयों और सर्जिकल उपकरण कम पड़ने लगे। पट्टियाँ भी इतनी नहीं थीं कि हर घाव पर उसे बाँधा जा सके।
खालिस्तानी अपना आतंक मचा कर जा चुके थे। पीछे रह गए थे घायल और उनके रोते-बिलखते परिजन। अस्पताल एक ओर जहाँ अपने संसाधनों को खत्म होता देख रहा था, वहीं थोड़ी देर में अस्पताल का नजारा कुछ और था। बाजार के कई लोग ज्यादा से ज्यादा तादाद में घायलों को खून देने के लिए उमड़ पड़े।
किताब के अंश
गोलीबारी खालिस्तानियों के लिए शायद कम थी, उन्होंने दो बम ब्लास्ट कर के शहर को फिर दहला दिया। पूरी घटना में 22 लोग मौके पर खत्म हो गए, 10 ने अस्पताल में दम तोड़ा, कइयों ने पसलियाँ गँवा दीं, कुछ की अंतड़ियाँ बाहर आ गईं, किसी के पाँव अलग हो गए और कई को अन्य बुरी चोटें आईं। रिकॉर्ड कहते हैं कि इस बम ब्लास्ट में 45 घायल हुए थे।
हमले में मारे गए लोग
इस हमले की अनेकों कहानियाँ हैं, जिन्हें कभी दस्तावेज में नहीं समेटा गया। एक महिला, जिसने इस हमले में अपनी जान गँवाई, वह उसी दुकान में छिपी थी, जिसमें वह खरीददारी कर रही थी। जैसे ही आतंकी दुकान में घुसे और लोगों को मारना शुरू किया, महिला ने उसे पहचान लिया।
महिला ने हैरानी से कहा, “तू?”, कुछ देर के लिए दुकान में अपने परिजन को देख आतंकी सकपकाया लेकिन थोड़ी देर बार उसने कहा, “मेरे पास कोई विकल्प नहीं है।” इसके बाद उसने महिला को गोलियों से छलनी कर दिया।
एक अन्य कहानी। 45 साल के गोबिंद नारंग जो घूम-घूम कर बने-बनाए कपड़े बेचते थे, उन्होंने गोली लगने के बाद एक दुकान में छिपने का निर्णय लिया। लेकिन उसी दुकान का मालिक शटर गिराकर वहाँ से भाग गया, क्योंकि उसे मालूम नहीं था कि कोई घायल उनकी दुकान में छिपा है। बाद में स्वास्थ्य उपचार न मिलने के कारण गोबिंद चल बसे।
भाजपा और आरएसएस ने की घायलों की मदद
ये केवल चंद कहानियाँ हैं। ऐसे अनेकों मामले हैं, जब खालिस्तानियों ने हिंदुओं पर बर्बर हमले किए। अबोहर की घटना के बाद कई संगठन आगे आए। रिकॉर्ड बताते हैं कि कई भाजपा नेताओं ने और आरएसएस वर्करों ने घर जा-जा कर घायलों की मदद की थी। बाकी नेताओं ने शायद तब भी घर से बाहर न निकल कर खुद को सुरक्षित रखना जरूरी समझा था। बुजुर्गों से पूछने पर पता चलता है कि कई लोग अपने नेताओं के पास मदद के लिए गए थे लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आया।
हमले के बाद क्या हुआ
इस हमले के बाद पुलिस की कायरता और आपात स्थिति को लेकर स्वास्थ्य तैयारियों ने स्थानीयों के मन में गुबार भर दिया। कई जगह ऐसे मामले सामने आए, जब प्रशासन और पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन हुए। 10 मार्च 1990 को बड़ी तादाद में थाने की ओर मार्च निकाला गया। गुस्साए लोगों ने पुलिस की मोटरसाइकिल फूँक दी। पुलिसकर्मियों पर पत्थर फेंके गए और बाद में जाकर जिलाधिकारी राकेश सिंह ने किसी तरह भीड़ को शांत कराने का प्रयास किया, तो लोगों ने उनकी गाड़ी पर भी बेकाबू होकर पत्थर फेंके।
इतिहास के झरोखे से अबोहार किताब से लिए गए अंश
इसके बाद बिना चेतावनी के जनता पर पुलिस ने ओपन फायर कर दिया। इस फायरिंग में 18 साल के नवीन और 20 साल के राजेंद्र मारे गए। नियम के अनुसार, पुलिस चेतावनी देकर फायरिंग करती है, लेकिन नियमों को दरकिनार रख कर लिए गए फैसले के कारण 2 लोगों की जान चली गई।
12 मार्च 1993- बदले का दिन
घटना को देखते ही देखते दो ढाई साल बीते, लेकिन स्थानीयों में गुस्सा कम नहीं हुआ। 17 अक्टूबर 1992 में डीएसपी सुरजीत सिंह ग्रेवाल अबोहार में तैनात किए गए। अपनी तैनाती के पहले दिन ही उन्होंने आतंकी हमले में मारे गए लोगों को न्याय दिलाने के लिए हमले के मास्टरमाइंड (चानन सिंह- Chanan Singh) को लाने का फैसला किया। उन्होंने गुरमुख सिंह (चानन सिंह के दामाद) की मदद की और मामले को शांत कराने का आश्वासन दिया। उन्होंने गुरमुख से निजी रिश्ते बनाए और उसे पूर्ण रूप से आश्वस्त कर दिया।
कुछ दिन बाद चानन सिंह ने अपने दामाद के घर में आना-जाना शुरू कर दिया। हालाँकि शुरू में वह काफी सतर्क रहता, लेकिन ग्रेवाल के खूफिया सूत्रों ने जानकारी दे दी कि चानन गुरमुख की बेटी की शादी और बेटे की शगुन समारोह में आने वाला है। ग्रेवाल ने फौरन एक टीम बनाई। सबको मजदूरों के कपड़े पहनाए और खुद सिख स्टूडेंट फेडरेशन के मुखिया दलजीत सिंह उर्फ बिट्टू बन गए।
डीएसपी ग्रेवाल (साभार: इतिहास के झरोखे से अबोहार)
वेन्यू पर पहुँचते ही उन्होंने गुरमुख के बेटे को अपनी पहचान बिट्टू बताई। इसके बाद वह उन्हें चानन के पास ले गया। 55 साल का चानन चरपाई पर बैठा था। उसे मालूम हो गया कि ये बिट्टू नहीं है और उसने ग्रेवाल पर गोली चला दी। खुशकिस्मती बस ये थी कि ग्रेवाल पूरी तैयारी के साथ उसको पकड़ने गए थे। कुछ ही सेकेंड में चानन का शव उनके हाथ में था।
डीएसपी के इस प्रयास ने उन पीड़ित परिवारों को थोड़ी राहत जरूर दी, जिन्होंने 1990 में अपने परिजनों को खो दिया था। लेकिन ये कहना कि घाव पूरी तरह भर गए, हमेशा असंभव होगा।
अबोहार की कहानी सामने लाने वाले मथुरा दास हितैषी
उक्त सारी कहानी और उसका अहम भाग, दिवंगत मथुरा दास हितैषी की किताब- ‘इतिहास के झरोखे से अबोहर’ से लिया गया है। उनकी किताब के कारण आज अबोहर की कहानी लोगों तक पहुँचने में सफल हुई। एक स्वतंत्रता सेनानी, हितैषी को उनका सरनेम उनके सामाजिक कार्यों के कारण मिला था। इसका अर्थ सबका भला करने वाला होता है। पीएनबी में बैंक मैनेजर रहते हुए और बाद में इंप्रूवमेंट ट्रस्ट का अध्यक्ष बनने के बाद भी उन्होंने कई लोगों की मदद की।