Home Blog Page 4284

‘हिंदू लड़की को गर्भवती करने से 10 बार मदीना जाने का सवाब मिलता है’: कुणाल बन ताहिर ने की शादी, फिर लात मार गर्भ गिराया

उत्तर प्रदेश के बरेली से ‘लव जिहाद’ का एक मामला सामने आया है। एक युवती ने पुलिस थाने में ताहिर हुसैन और उसके परिवार के खिलाफ मजहब छिपाकर शादी करने की रिपोर्ट दर्ज कराई है। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मुख्य आरोपित को जेल भेज दिया है।

ताहिर ने मंदिर में ले जाकर माँग भरी 

मामला बरेली के इज्जतनगर थाने का है, जहाँ पर एक युवती ने ताहिर हुसैन के खिलाफ धर्म छिपा कर शादी करने की एफआईआर कराई है। युवती का आरोप है कि वो प्राइवेट नौकरी करती थी। इस दौरान नवंबर 2019 में एक युवक उसके संपर्क में आया। उसने खुद को युवती के समुदाय का बताकर मेल-जोल बढ़ा लिया। कई बार संबंध भी बनाए। बाद में उसने मंदिर में ले जाकर उससे शादी की और मंदिर में ही उसकी माँग भरी। उसके बाद वो पत्‍नी के तौर पर उसके साथ रहने लगी। 

पेट में लात मारकर गिराया गर्भ 

लड़की का आरोप है कि शादी से पहले उसने अपना नाम कुणाल शर्मा बताया। उसने इसी नाम (कुणाल शर्मा) से फेसबुक अकाउंट भी बना रखा था। गर्भवती होने पर युवती ने शादी का रजिस्ट्रेशन कराने को कहा तो आरोपित ताहिर हुसैन लगातार टाल-मटोल करने लगा। 20 नवंबर को जब गर्भवती होने की बात पीड़िता ने ताहिर के घरवालों को बताई तो वो आग-बबूला हो गए। पीड़ित युवती के मुताबिक ताहिर की माँ, भाई और बाकी लोगों ने उसके साथ मारपीट की। उन्होंने पेट में लात मारकर पेट में पल रहा उसका दो महीने का गर्भ गिरा दिया।

लव जिहाद ही हमारा मकसद 

आरोप है कि ताहिर और उसके घरवालों ने उससे कहा कि लव जिहाद ही उनका मकसद है। पीड़ित के मुताबिक शादी का झाँसा देकर आरोपित ताहिर ने उसका रेप किया। पीड़िता का आरोप है कि ताहिर ने कहा, “मुझे तुमसे शादी नहीं करनी थी। मेरा मजहब मुझे कहता है कि हम लव जिहाद में विश्वास रखते हैं, शादी में नहीं। एक हिंदू को गर्भवती करने से हमें दस बार मदीना शरीफ जाने का सवाब मिलता है।” युवती ने कहा कि आरोपित और उसके परिवार ने उसे धमकी भी दी कि अगर उन लोगों ने पुलिस में शिकायत की तो उन्हें जान से मार देंगे।

मुख्य आरोपित ताहिर गिरफ्तार: एसपी सिटी 

इस मामले में बरेली एसपी सिटी रविन्द्र सिंह का कहना है कि पीड़ित युवती की शिकायत पर आरोपित ताहिर, उसकी माँ, भाई और एक अन्‍य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर आरोपों की जाँच शुरू कर दी गई है। हालाँकि उन्होंने ये भी बताया कि इसमें ‘लव जिहाद’ का मामला नहीं बनता क्योंकि ये मामला 27 तारीख को दर्ज हुआ है। इसमें पुलिस ने ताहिर और अन्य को मामूली धाराओं का ही आरोपित माना है। फिलहाल ताहिर को गिरफ्तार कर लिया है।

UP में ‘लव-जिहाद’ कानून के तहत उवैस अहमद पर पहली FIR

गौरतलब है कि बरेली में इससे पहले रविवार (नवंबर 29, 2020) को ‘ग्रूमिंग जिहाद’ कानून के तहत पहला केस दर्ज हो चुका है। केस के मुताबिक, उवैस अहमद गाँव की ही एक छात्रा पर धर्म परिवर्तन का दबाव बना रहा था। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने इस प्रकरण के संबंध में मामला दर्ज कर लिया है, फ़िलहाल मामले का आरोपित फ़रार है। 

हाल ही में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने ‘ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद)’ के विरुद्ध बने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020 पर हस्ताक्षर कर इसे मंजूरी दी थी। इसके बाद ये राज्य में औपचारिक रूप से लागू हो गया।

जब कंगना ने खोज निकाला ‘रनौत’ की कुलदेवी का 1200 वर्ष प्राचीन मंदिर, पैतृक गाँव में की स्थापना

कंगना रनौत न सिर्फ सोशल मीडिया पर हिंदुत्व के लिए आवाज़ उठाती हैं, बल्कि वो जमीन पर भी धर्म के लिए काम करने में विश्वास रखती हैं। हिमाचल प्रदेश के मंडी में स्थित ढबोई उनका पैतृक गाँव है, जहाँ माँ महिषासुरमर्दिनि उनकी कुलदेवी हैं। कंगना रनौत घर में कोई भी समारोह होने पर या अपनी फिल्मों की रिलीज से पहले अपनी कुलदेवी के मंदिर जाकर उनका आशीर्वाद लेती हैं। अक्सर वो सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें भी शेयर करती हैं।

कंगना रनौत कहती हैं, “मैं एक हिन्दू हूँ और इस पर मुझे बहुत गर्व है। मेरे व्यक्तित्व की आधारशिला स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ, सनातन धर्म और भगवद्गीता हैं।” क्या आपको पता है कि उनके गाँव में कुलदेवी का जो मंदिर है, उसका निर्माण कंगना रनौत ने ही कराया है? उन्होंने एक बार इससे जुड़ा वाकया सुनाते हुए कहा था कि उनकी माँ को बचपन में बहुत सारे ऐसे सपने आते थे, जिनमें छोटी बच्चियाँ दिखती थीं।

साथ ही सपने में उन्हें माँ दुर्गा का रूप भी दिखता था। बकौल कंगना रनौत, उनकी माँ ने जब इस बारे में पंडितों से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि अगर सपने में बच्ची या माँ दुर्गा दिखती है तो कुलदेवी का दर्शन करना चाहिए। उन्होंने बताया कि उनकी माँ ने अपनी कुलदेवी का मंदिर ढूँढने की भी कोशिश की, लेकिन लाख जतन करने के बावजूद वो सफल नहीं हुए। यहाँ-वहाँ खोज करने पर भी नहीं मिली, लेकिन सपने आते रहे।

कंगना रनौत ने आगे बताया कि जब वो फिल्मों में आईं और देश-विदेश में यात्राएँ करने लगीं, तब उनकी माँ ने उनसे कहा कि तुम हमारी कुलदेवी को ढूँढो। कंगना रनौत के अनुसार, उन्होंने इसके बाद उदयपुर के जगत गाँव में अम्बिका माता के 1200 वर्ष पुराने मंदिर को खोजा और वहाँ दर्शन किया। इसके बाद उन्होंने अपने गाँव के लोगों (‘रनौत’ समुदाय की) की व्यथा देखी, जो इतनी दूर जाकर कुलदेवी का दर्शन नहीं कर पाते थे। इसलिए, उन्होंने यहीं मंदिर बनवाने का निर्णय लिया।

फिर कंगना रनौत ने ढबोई में ही कुलदेवी का मंदिर बनवाया। उन्होंने जो मंदिर बनवाया, उसे मंडी की जनता और अपना पूर्वजों को समर्पित किया। अपनी फिल्म ‘मणिकर्णिका’ की रिलीज से पहले भी वो मंदिर में दर्शन करने गई थीं। वो अन्य मंदिरों में भी दर्शन के लिए जाती रहती हैं और हिंदुत्व को लेकर काफी मुखर रहती हैं। कंगना रनौत पुरानी भारतीय संस्कृति और इतिहास की रक्षा के लिए भी सजग नजर आती हैं।

फ़िलहाल कंगना रनौत दिवंगत संगीतकार वाजिद खान की पत्नी कमलरुख के समर्थन में लगी हुई हैं, जिन्होंने ‘लव जिहाद’ की चर्चाओं और इसके खिलाफ कई राज्यों में क़ानून बनाने की तैयारियों के बीच अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा किया कि किस तरह से उन पर इस्लामी धर्मान्तरण के लिए परिवार ने दबाव बनाया। इस पर कंगना ने पूछा है कि जो लोग दंगे और धर्म-परिवर्तन नहीं करते, उन्हें हम कैसे सुरक्षित रखें?

केरल का सिंह, जिससे काँपते थे टीपू और ब्रिटिश: अंग्रेजों ने बताया स्वाभाविक सरदार, इतिहासकारों ने नेपोलियन से की तुलना

केरल को ‘God’s Own Country’ भी कहा जाता है, जहाँ एक से बढ़ कर एक वीर हुए हैं। लेकिन, वहाँ के लोगों के मन में पजहस्सी राजा के लिए ऐसा सम्मान है, जैसा शायद ही कहीं और देखने को मिले। उन्हें ‘केरल वर्मा’ के नाम से भी जाना जाता है। वे मालाबाद में कोट्टयम (Cotiote) के हिन्दू राजा थे। उन्हें दक्षिण में ‘केरल सिंहम’ के नाम से पुकारा जाता है, अर्थात, केरल का शेर। वो शेर, जो अंग्रेजों के सामने भी एक योद्धा की तरह लड़ा।

पजहस्सी राजा का जन्म 3 जनवरी 1753 को हुआ था। आज से 215 वर्ष पहले 30 नवंबर 1805 को 52 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हुई थी। वे ऐसे काल में वयस्क हुए थे, जब औरंगजेब की मृत्यु के 50 वर्ष से अधिक बीत चुके थे। एक तरफ मुग़ल साम्राज्य तहस-नहस हो रहा था, दूसरी तरफ अंग्रेजों की महत्वाकांक्षाएँ हिलोरे मार रही थीं। हाँ, मराठा साम्राज्य ज़रूर अपने चरम पर पहुँच गया था।

लेकिन, ये ऐसा समय था जब खतरा इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ-साथ अंग्रेजों से भी था। मालाबार के लिए वो समय बहुत ही त्रासद थे, क्योंकि टीपू सुल्तान का अब्बू हैदर अली अपने साम्राज्य के विस्तार में लगा हुआ था और समूचे केरल पर उसकी नजर थी। हैदर अली किसी तरह मालाबार के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा करने में कामयाब रहा, जिस कारण वहाँ के राजा को भाग कर त्रावणकोर में शरण लेनी पड़ी।

त्रावणकोर में तब शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गई थी, क्योंकि हैदर अली के आक्रमण के बाद हिन्दुओं और ईसाइयों में भय का माहौल था। लेकिन, कोट्टायम में स्थिति काफी खराब थी और पजहस्सी राजा वैसे तो गद्दी की लाइन में चौथे नंबर थे, लेकिन उन्हें राजा बनना पड़ा। उन्होंने 1774-1793 में लगभग दो दशक की अवधि में मैसूर की फ़ौज को रोकने के लिए संघर्ष किया। अंत में राजपरिवार और सेना के अन्य लोगों ने भी उनकी बहादुरी को देखते हुए उन पर अपना विश्वास जताया।

इस तरह से पजहस्सी राजा का जीवन दो मोर्चों पर संघर्ष करते हुए व्यतीत हुआ। एक मैसूर की इस्लामी सत्ता और एक ईस्ट इंडिया कंपनी। जब उत्तरी केरल में भगदड़ की स्थिति मची हुई थी और अधिकतर जमींदारों से लेकर प्रभावशाली हस्तियों तक अपने लोगों को छोड़ कर त्रावणकोर चले गए थे, जब उन्होंने अपने राज्य में रह कर जनता की सेवा करने की ठानी। उन्होंने पहले टीपू सुल्तान की फ़ौज के खिलाफ अंग्रेजों की सहायता ली।

लेकिन, उन्हें अंग्रेजों की धोखेबाजी भरी चालें समझने में देर नहीं लगी और उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को धता बता कर उन यूरोपियन आक्रांताओं के खिलाफ युद्ध लड़ा। 1790 में तीसरे मैसूर युद्ध में अंग्रेजों ने वादा किया था कि पजहस्सी राजा द्वारा की जा रही मदद के बदले में कोट्टायम को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया जाएगा। लेकिन, अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान के साथ जो 1792 की संधि की, उसमें कोट्टायम के साथ विश्वासघात किया गया।

पजहस्सी राजा ने इसके बाद अंग्रेजों की सेना पर एक के बाद एक आक्रमण शुरू किए। 7 जनवरी 1997 को कैप्टन बोमैन के नेतृत्व वाली 80 ब्रिटिश ट्रूप्स की टुकड़ी पर हमला बोला गया। कैथरी अम्बु नायर इस हमले का नेतृत्व कर रहे थे। ये हमला इतना तेज था कि कैप्टन बोमैन ही मारा गया। कई अंग्रेज अधिकारी भी मारे गए और घायल हुए। सेना को खासी क्षति पहुँची। इसके अगले ही दिन अंग्रेजों की सेना पर फिर हमला हुआ।

ये हमला इतना भयंकर था कि पूरी ब्रिटिश टुकड़ी में सिर्फ एक ही व्यक्ति जिंदा बचा, बाकी सभी मारे गए। इसके बाद आक्रमण के डर से वायनाड और इसके आसपास के क्षेत्रों में जितने भी ब्रिटिश सेना की टुकड़ियाँ थीं, वो भी भाग खड़ी हुईं। उन्हें आक्रमण के भय से वापस बुला लिया गया। कनवरथ संकरम नाम्बियार इन हमलों में पजहस्सी राजा के सबसे विश्वस्त सिपहसालार थे। लेकिन, अंग्रेजों ने भी तैयारी शुरू कर दी थी।

फ़रवरी 1797 में अंग्रेजों ने वायनाड और उसके आसपास के पजहस्सी राजा के ठिकानों पर हमला बोल दिया। इस बार अंग्रेज बड़ी संख्या में थे और हमला चारों दिशाओं से बोला गया गया। लेकिन, मार्च आते-आते किस्सा बदलने लगा और कोट्टायम की सेना के साथ जनता भी आ गई। मार्च 9, 10, 11 को तीन दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ और नायर व कुरुचिया समुदाय के योद्धाओं ने अंग्रेजों को भगा दिया।

ब्रिटिश के लिए स्थिति इतनी बुरी हो गई कि वापस मैदानों में भागने के लिए भी उनके पास रास्ते नहीं बचे थे। पजहस्सी राजा ने एक चालाकी की थी कि उन्होंने अपनी सेना के एक समूह को टीपू सुल्तान की फ़ौज के ड्रेस में डाला था। ब्रिटिश अभी ये सोच ही रहे थे कि वो केरल में कौन सी रणनीति अपनाएँ, तभी चौथा मैसूर युद्ध शुरू हो गया और उन्हें अपनी योजनाएँ ठप्प करनी पड़ीं। वो पजहस्सी राजा के साथ संधि के लिए मिन्नतें करने लगे।

इसके लिए बॉम्बे के गवर्नर जोनाथन डंकन खुद मालाबार आए। उन्होंने पजहस्सी राजा के दुश्मनों के साथ किए करारों को रद्द कर दिया और उन्हें अपना विरोध वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश की। इसके लिए उनके राज्य को 8000 रुपए प्रतिवर्ष देने की योजना भी बनी। तब तक कोट्टायम के वरिष्ठ राजा भी त्रावणकोर से आ गए थे। सारी संधि के बावजूद अंग्रेजों का मानना था कि पजहस्सी राजा उनके भरोसे के लायक नहीं हैं और वो कुछ भी कर सकते हैं।

लेकिन, जल्द ही लोगों को पता चल गया कि अंग्रेजों के साथ संधि पजहस्सी राजा की एक रणनीतिक चाल थी। इसी तरह की रणनीतिक चाल, जैसे छत्रपति शिवाजी जैसे राजाओं ने इतिहास में इस्लामी आक्रांताओं के साथ अपनाया था। अंग्रेजों ने केरल में मसालों की खेती (मिर्च इत्यादि) भी शुरू कर दी थी, ताकि केरल के राजाओं के व्यापार को ठप्प किया जा सके। लेकिन, पजहस्सी राजा ने जहाँ-जहाँ ऐसा किया गया था, वहाँ हमला बोला।

अनजारकंडी में अंग्रेजों की खेती को बर्बाद कर दिया गया। कोडोली और मंताना में अंग्रेजों के आउटपोस्ट्स को निशाना बनाया गया। कर्नल वेलेस्ली कहीं और व्यस्त था और वो वहीं से सेना को निर्देश दे रहा था। इसी कारण अंग्रेजों ने 1801 में कर्नल स्टीवेंसन को एक बहुत बड़ी सेना के साथ वहाँ भेजा। अपनी सेना के दम पर वो दक्षिण मालाबार में पजहस्सी राजा के अनुयायियों को उनसे अलग करने में सफल हुआ।

फिर वो समय आ गया, जो दिन कभी महाराणा प्रताप जैसे राजाओं ने देखा था, लेकिन राष्ट्र की स्वतंत्रता को हमेशा सर्वोपरि रखा। मई 1801 आते-आते वायनाड और उसके आसपास की सारी रणनीतिक स्थलों पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया और पजहस्सी राजा अपनी पत्नी के साथ जंगलों में भटकने के लिए मजबूर हो गए। वो चिरक्कल, कोट्टायम, कदठनाद और कुरुम्ब्रनाड के जंगलों में ठिकाने बनाने लगे।

चूज़हली नाम्बियार और पेरुवय्यल नाम्बियार जैसे उनके सिपहसालारों को अंग्रेजों ने बंदी बना लिया। पेरुवय्यल को दो अन्य लोगों के साथ कन्नवम भेज कर फाँसी पर लटका दिया गया। उनकी सारी सम्पत्तियों को जब्त कर लिया गया। अंग्रेजों ने ऐलान किया कि जो उसके पाले में आ जाएँगे, उनकी सम्पत्तियों को छोड़ दिया जाएगा और उन्हें बख्श दिया जाएगा, लेकिन इस ऑफर को लेने वालों की भारी कमी रही, जिससे ये कदम फेल हो गया।

कन्नावांथ नाम्बियार को फाँसी पर लटका दिया गया। इसके बाद पजहस्सी राजा के आत्मसमर्पण की अटकलें लगाई जानें लगीं, क्योंकि बाहर अंग्रेज खूनी दरिंदे बन गए थे और एक के बाद एक जानें ले रहे थे। विद्रोही गतिविधियों को लगभग रोक दिया गया। मालाबार के प्रिंसिपल कलक्टर मेजर मैक्लेऑड ने इसका फायदा उठा कर पूरे जिले को Disarm करने का निर्णय लिया, जिसके तहत सभी के हथियार छीन लिए गए।

जिन्होंने भी अपने हथियार नहीं लौटाए या छिपा लिए, उन्हें पकड़े जाने पर मौत की सज़ा दी गई। 1802 की शुरुआत में ये सब होने के बाद अंग्रेज निश्चिंत होने लगे कि विद्रोह को दबा दिया गया है और पजहस्सी राजा की अब खास ताकत बची नहीं। लेकिन, अक्टूबर में वायनाड के परमणरम किला पर हमला कर विद्रोहियों ने उसे अपने हाथ में ले लिया। वहाँ 70 अंग्रेजों और उनके वफादारों को मार डाला गया।

एडाचिन्ना कुंगन नायर ने इस हमले का नेतृत्व किया था। इसके बाद वल्लियूरकावु मंदिर में उनकी हजारों की सेना जमा हुई और उन्होंने वायनाड पास के साथ-साथ पेरिया को भी अपने कब्जे में ले लिया। मैसूर से लेकर मननतोडी तक के पूरे रास्ते पर कुंगन नायर के ही निर्देश चलने लगे। अंग्रेजों ने पजहस्सी राजा पर 3000 रुपए का इनाम रख दिया। उनके साथ के अन्य देशभक्तों पर 300 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक का इनाम रखा।

इसका नुकसान ये हुआ कि रुपए के लालच में गद्दारों ने पजहस्सी राजा की खोज शुरू कर दी। कोलकरों को भड़का कर उनके खिलाफ लगाया गया। कोलकरों ने दक्षिण वायनाड में उनके ठिकाने पर हमला बोला, जहाँ पजहस्सी राजा तो बाल-बाल बच गए, लेकिन उनके दो लोगों को धर लिया गया। वहाँ 1300 की कोलकर सेना को लगाया गया था, लेकिन वायनाड में मौसम बदलने लगा और उनमें से बहुत कम बच गए।

पजहस्सी राजा ने हार नहीं मानी थी और उन्होंने अंतिम युद्ध के लिए अपनी सेना को संगठित करना शुरू कर दिया। वायनाड में कुरुचिया और कुरुम्बर सेनाओं को इकठ्ठा किया जाने लगा, ताकि अंतिम युद्ध लड़ा जा सके। लेकिन, कुरुचिया सेनापति तरक़्क़ुल चंदु को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उन्हें बंदी बना लिया। उनके कैम्प में रसद वगैरह जिस रास्ते से आता था, उस पर कब्ज़ा कर लिया गया, ताकि वो बाहर निकलने को मजबूर हों।

अब वो अपने समर्थकों के साथ राज्य के एक ऐसे हिस्से में घिर चुके थे, जहाँ भोजन-पानी तक की व्यवस्था नहीं थी। एक तरह से वो अलग-अलग थलग हो गए। सब कलक्टर टीएच बाबर उनके खिलाफ युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे। 30 नवंबर 1805 को उन्हें जंगल में ही एक छोटी सी नदी के किनारे चारों ओर से घेर लिया गया। अंग्रेजों के इतिहास के मुताबिक, अंग्रेजों की सेना ने ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसानी शुरू की। पजहस्सी राजा को भी गोली लगी और उनकी मृत्यु हो गई।

लेकिन, केरल के स्थानीय इतिहास में कुछ और ही दर्ज है। कहते हैं कि पजहस्सी राजा न तो अंग्रेजों के हाथों मरना चाहते थे और न ही पकड़ा जाना चाहते थे। इसीलिए, उन्होंने अपनी हीरे की अंगूठी पूरी की पूरी निगल ली, ताकि उनकी मृत्यु हो जाए। उनके 4 साथियों को मौके पर ही अंग्रेजों ने मार डाला और 2 को अपने साथ ले गए। उनकी पत्नियों और समूह में शामिल महिलाओं को भी अंग्रेज अपने साथ लेकर गए।

अंग्रेज उनकी युद्धकला से इतना प्रभावित थे कि पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। 31 दिसंबर 1805 को मालाबार के प्रिंसिपल कलक्टर ने बाबर को भेजे गए पत्र में लिखा था, “हालाँकि वो एक विद्रोही थे, लेकिन पजहस्सी राजा भारत के स्वाभाविक सरदारों में से एक थे। उन्हें इसी तरह याद रखा जा सकता है, बजाए एक मृत दुश्मन की तरह याद रखने के।” उत्तर केरल में उनकी मृत्यु के साथ ही संघर्ष भरा आंदोलन ख़त्म हो गया।

टीएच बाबर को अंग्रेजों ने बड़े इनाम से नवाजा। उसके ही शब्दों में देखें तो केरल के पजहस्सी राजा एक ‘असाधारण और विलक्षण योद्धा’ थे। केरल के इतिहास के वो सबसे बड़े योद्धाओं में से एक थे। कुशल क्षमता, किरदार की मजबूती और अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्धता उनकी पहचान थी। इतिहासकार ए श्रीधर मेनन अपनी पुस्तक ‘Kerala History And Its makers‘ में लिखते हैं कि पजहस्सी राजा अपनी कुशल संगठनात्मक क्षमता के लिए विख्यात थे। केरल डिस्ट्रिक गैजेट के एडिटर रहे मेनन लिखते हैं:

“वे एक जन्मजात नेता था। वे एक कभी न थकने वाले स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनके पास उच्च-स्तरीय संगठनात्मक क्षमता थी। अपने अनुयायियों के दिलों-दिमाग में वे जादुई रूप से छाए हुए थे और उन्हें वे सही कार्य के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर देने के लिए प्रेरित करने की क्षमता रखते थे। नेपोलियन बोनापार्ट की तरह उन्होंने सारे दुःख और क्लेश अपनी सेना के साथ खुद भी सहे, व्यक्तिगत उदाहरण स्थापित कर के अपने लोगों में आत्मविश्वास पैदा किया। टीएच बाबर ने स्वीकार किया था कि उनके अनुयायियों में उनके लिए वो सम्मान और प्रभाव था, जो उनकी मृत्यु के बाद भी कम नहीं हो सका। उनके लोगों द्वारा किया गया गुरिल्ला युद्ध भारतीय इतिहास में बहुत कम ही देखने को मिला। उन्होंने अंग्रेजों की आधीनता की जगह मौत को चुना।”

उनकी यही खासियत थी कि वो व्यक्तिगत रूप से सारे खतरे खुद मोल लेते थे और जनता को इन मामलों में अपने पीछे रखते थे। जब उन्होंने 1793 में अंग्रेजों से लोहा लिया तो कोट्टयम की जनता से स्पष्ट कह दिया कि वो अंग्रेजों को टैक्स न दें। टैक्स कलेक्ट करने के लिए वे खुद जमीन पर उतरे। इन सबके बीच एक क्रूरमब्रनाड राजा था, जिसकी अंग्रेजों से खूब छनती थी और उसके कारण ही अंग्रेज पजहस्सी राजा को देखना तक नहीं चाहते थे।

उन पर 2009 में ‘केरल वर्मा पजहस्सी राजा’ नामक फिल्म भी बनी, जिसमें 3 नेशनल अवॉर्ड और 12 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाले मलयालम अभिनेता मामूटी ने उनका किरदार निभाया था। ये उस समय की सबसे महँगी मलयालम फिल्म थी, जिसका बजट 27 करोड़ रुपया था। ढाई साल इसे बनाने में लगे और ऑस्कर विजेता रेसुल पुकुट्टी ने इसके लोकेशन के लिए इफेक्ट्स तैयार किए थे। फिल्म को 8 प्रमुख अवॉर्ड समारोहों में लगभग 4 दर्जन अवॉर्ड्स से नवाजा गया।

इसी तरह से त्रावणकोर के धर्मराज राम वर्मा और राजा केशवदास पिल्लई उनमें से एक थे, जिन्होंने टीपू सुल्तान को नेदुमकोट्टा के दीवार के युद्ध (Battle Of Nedumkotta) में नाकों चने चबवाए। ये वो समय था, जब केरल को बाहरी खतरों का भान हो चला था और उसने एक दीवार बनवाई थी, ताकि उत्तर से आने वाले दुश्मनों से रक्षा की जा सके। इसी दीवार को वहाँ ‘नेदुमकोट्टा’ या फिर ‘Travancore Lines’ कहा जाता था।

जिस गर्भवती महिला के पेट में लात मारी थी वामपंथी नेता ने, अब वो BJP के टिकट पर लड़ रहीं चुनाव

केरल में 2 साल पहले मार्क्सवादी पार्टी के स्थानीय नेता के कारण अपने साढ़े 4 महीने के गर्भ को खोने वाली महिला को लेकर खबर है कि उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर लिया है और इस बार वह बालुसरी से पंचायत चुनावों में भाजपा की प्रत्याशी हैं।

केरल में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव बीएल संतोष ने इस संबंध में जानकारी दी। उन्होंने ट्वीट कर लिखा,

“ये श्रीमती ज्योत्स्ना जोस हैं। इन्हें सीपीएम गुंडों ने पेट पर मारा था, जब वह गर्भवती थीं। इस हमले में उन्होंने साढ़े चार माह का बच्चा खो दिया। आज वह बालुसरी पंचायत में भाजपा की प्रत्याशी हैं और वामंपथ के अमानवीय व बर्बर शासन को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

साल 2018 में ज्योत्स्ना जोस के साथ हुई घटना के संबंध में प्रकाशित इंडिया टुडे की रिपोर्ट में बताया गया है कि महिला के परिवार ने पहले शिकायत दर्ज करवाई हुई थी लेकिन तब पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया। हालाँकि हमले के बाद इस संबंध में कोडेनचेरी पुलिस ने 7 गिरफ्तारियाँ कीं और आरोपितों को कोर्ट में पेश किया गया।

दरअसल, ये पूरा मामला जमीनी विवाद को लेकर हुआ था। कुछ लोगों ने जबरन घर में घुस कर महिला के परिवार को धमकाया था और उनसे गाली गलौच की थी। जब महिला की ओर से शिकायत लिखवाई गई तो इस पर कोई एक्शन नहीं हुआ। बाद में उसी रात एक मीडिएटर लोगों के साथ उनके घर में आया और महिला के पति व बच्चे पर हमला किया।

जब महिला ने बीच-बचाव करना चाहा तो उसके हाथ बाँध दिए गए और आदमियों से उसे मारने को कहा गया। महिला ने इस दौरान दावा किया था कि उसके पेट पर हमला करने वालों में एक सीपीआईएम नेता थंबी था।

बता दें कि हमले में गर्भवती महिला के प्लेसेंटा (गर्भ में जिससे बच्चे को खून, खाना जाता है) पर ब्लड क्लॉट हो गए थे, जिसकी वजह से उन्हें अपना बच्चा गँवाना पड़ा। बाद में महिला ने अपने नाम से दो थानों में शिकायत दी थी और यह जान कर सीपीएम के कई नेता थंबी का नाम कंप्लेन से निकलवाने के लिए लगातार उन पर दबाव बनाने लगे थे।

जो बायडेन की टीम में एक और भारतीय: नीरा टंडन को बजट प्रबंधन की जिम्मेदारी मिलनी तय, बनेंगी OMB की निदेशक

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन की टीम में भारतीय मूल के लोगों का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। अब नीरा टंडन का ‘ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट (OMB)’ का निदेशक नियुक्त किया जाना तय माना जा रहा है। ये व्हाइट हाउस के भीतर एक बड़ा पद है। प्रशासन के बजट के पूरे प्रबंधन के लिए OMB के डायरेक्टर ही जिम्मेदार होते हैं। 50 वर्षीय नीरा टंडन इस पद को संभालने वाली पहली महिला होंगी।

फ़िलहाल वो ‘सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोसेस’ की चीफ एग्जीक्यूटिव हैं। ये संगठन वामपंथी झुकाव वाला है। इससे ये भी स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन एक लिबरल और सेंट्रिस्ट लोगों की टीम तैयार कर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया एजेंसियों की कई ख़बरों में कहा गया है कि इस नॉमिनेशन की घोषणा जल्द ही होगी। अभी की आर्थिक स्थिति में OMB के डायरेक्टर का किरदार काफी महत्वपूर्ण होने वाला है।

इससे पहले वो अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला हिलेरी क्लिंटन की सबसे विश्वस्त सलाहकार रह चुकी हैं। हिलेरी ने ओबामा प्रशासन में ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट’ का जिम्मा भी संभाला था। नीरा ने तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के ‘अफोर्डेबल केयर एक्ट’ को पास कराने में अहम भूमिका निभाई थी। उनका जन्म मैसाचुसेट्स के बेडफोर्ड में हुआ है। उनके माता-पिता भारत से जाकर अमेरिका में बस गए थे।

उन्होंने लॉस एंजेल्स स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से आर्ट्स में स्नातक की डिग्री हासिल की थी। उनका पालन-पोषण भी कई परेशानियों के बीच हुआ था क्योंकि उनकी उम्र जब महज 5 साल थी, तभी उनके माता-पिता ने तलाक ले लिया था और वो अलग रहने लगे थे। उनकी माँ ने काफी संघर्ष के बाद ट्रेवल एजेंट का जॉब प्राप्त किया। 1992 में स्नातक करने के बाद 1996 में उन्होंने येल लॉ स्कूल से जुरिस डॉक्टर की डिग्री प्राप्त की।

फिर उन्होंने ‘एल लॉ एंड पॉलिसी रिव्यू’ में बतौर सबमिशन्स एडिटर सेवा दी। कॉलेज में ही उनकी मुलाकात उनके होने वाले पति बेंजामिन एडवर्ड्स से हुई थी। दोनों ने मिल कर 1988 में डेमोक्रेट राष्ट्रपति उम्मीदवार माइकल डुकाकिस के चुनाव प्रचार का जिम्मा संभाला, लेकिन वो जीत नहीं पाए। इसके बाद उन्होंने वाशिंगटन डीसी में कई राष्ट्रपति उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार अभियान में विभिन्न पदों पर काम किया।

उन्हें क्लिंटन परिवार का विश्वस्त माना जाता है। हिलेरी क्लिंटन तो उन्हें अपना दोस्त मानती हैं। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की ऊर्जा नीतियों, स्वास्थ्य सुधार और घरेलू नीतियों के अभियानों में कई पद संभाले थे। अगर हिलेरी क्लिंटन 2014 में अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव जीत जातीं तो उन्हें बड़ा रोल मिलना तय था। फ़िलहाल नीरा टंडन जो बायडेन प्रशासन के बजट की जिम्मेदारी संभालेंगी। अमेरिका के भारतीय संगठनों ने उनकी नियुक्ति का स्वागत किया है।

बता दें कि जहाँ एक तरफ कमला हैरिस अफ़्रीकी-भारतीय मूल की पहली महिला हैं, जो वहाँ उपराष्ट्रपति के पद तक पहुँची हैं, तो दूसरी तरफ जो बायडेन ने यूएस की नई ‘फर्स्ट लेडी’ और अपनी पत्नी जिल के पॉलिसी डायरेक्टर (नीति निदेशक) के रूप में माला अडिगा को नियुक्त किया है। भारतीय मूल की माला अडिगा जो बायडेन के 2020 चुनावी अभियान की सीनियर पॉलिसी अडवाइजर रही हैं।

बेटी हुई तो भी छोड़ा, बेटा के बाद भी छोड़ा… फिर तलाक भी फाइल किया: वाजिद खान की पारसी बीवी का दर्द

मशहूर संगीतकार वाजिद खान की पत्नी का पोस्ट सोशल मीडिया पर नजर आने के बाद धर्मांतरण के मुद्दे ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में कई बातों का खुलासा किया। अपने शुरुआती रिश्ते की बातें बताते हुए कमलरुख ने कॉलेज दिनों को याद किया और बताया कि जब उन्होंने शादी करने का फैसला किया, उस समय मजहब परिवर्तन की बात उठी थी।

कमलरुख के मुताबिक, वाजिद एक ऐसे परिवार से आते थे, जिनका मानना था कि यदि कमलरुख को उनके परिवार में शादी करनी है, तो धर्मांतरण जरूरी होगा। हालाँकि वह इस बात से नाखुश थीं और वाजिद को ये सब चीजें अपनी शादी में बाधा लग रही थी।

साक्षात्कार के मुताबिक, दोनों ने इस मसले को सुलझाने के लिए एक माह का समय लिया और बाद में वाजिद खान ने कमलरुख की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें बिना धर्म परिवर्तन के स्वीकार लिया। मगर, बाद में मजहब ने प्रेम को खत्म कर दिया।

वाजिद का परिवार खुश नहीं था। कई महीनों तक उन्होंने कमलरुख से बात भी कम की। लेकिन कुछ टाइम बाद धर्म परिवर्तन का दबाव बढ़ गया। खासकर बच्चों के जन्म के बाद ये प्रेशर कुछ ज्यादा हो गया। वाजिद की माँ उन पर दबाव बनाती। धीरे-धीरे यह सब अलग स्तर पर पहुँच गया और कमलरुख व वाजिद के रिश्तों में दरार पड़नी शुरू हो गई।

वाजिद खान की पत्नी के अनुसार, उनकी शादी के समय उनके परिवार की ओर से अड़ंगे बहुत कम थे। कमलरुख के परिवार के लोग तो दोनों मजहब की परंपराओं के हिसाब से शादी करने को तैयार थे लेकिन वाजिद के घर वालों ने इन सबसे साफ मना कर दिया। शादी के बाद चीजें और बदतर हुईं। कमलरुख कहती हैं:

“वाजिद दो हिस्सों में बँट गए थे और कन्फ्यूज हो गए थे। उनका परिवार उन पर और मुझ पर अपनी रूढ़िवादी सोच थोपता था। जब मैं नहीं सुनती थी तो मेरा एक प्रकार से बहिष्कार होता था। वह हमारे लिए एक अनुपस्थित पिता और पति बन गए थे।”

यहाँ याद दिला दें कि इन्हीं सब पीड़ा से गुजरते हुए कमलरुख ने अपने पोस्ट में धर्म परिवर्तन के खिलाफ बने कानून का समर्थन करते हुए कहा था, “मेरे बच्चे और मैं उन्हें बहुत याद करते हैं और हम चाहते हैं कि वह बिना धार्मिक पूर्वग्रहों के एक परिवार के रूप में हमारे लिए अधिक समय दें।”

उन्होंने इंटरव्यू में बताया कि शादी का निर्णय लेने से पहले जब दोनों में धर्म परिवर्तन को लेकर बात हुई तो वाजिद के सामने उनकी ओर से आपत्ति जताई गई। इसके बाद उन्होंने स्पेशल मैरेज एक्ट के तहत शादी करने का निर्णय लिया। उनका मानना है, “अगर वाजिद के लिए मजहब इतना महत्वपूर्ण होता तो वह पारसी से शादी नहीं करते। वह मेरे खुले विचारों से अवगत थे और मेरी इच्छाओं का सम्मान करते थे, मगर बाद में उनकी माँ के दबाव के कारण वह परेशान रहने लगे।”

कमलरुख खान के अनुसार, मुस्लिम रीति रिवाजों से निकाह न होने के कारण उनके बच्चों को नाजायज बताया गया। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कोशिशें की गईं कि वह धर्म परिवर्तित कर लें। वाजिद के परिवार के लिए स्पेशल मैरेज एक्ट कुछ नहीं था। वह बताती हैं:

“मैंने बिना रोए, हल्ला मचाए कभी कोई पारसी त्योहार नहीं मनाया। उन्होंने मेरे पारसी परिवार के किसी फंक्शन आदि में आना बंद कर दिया था। उनकी माँ खुलेआम उनसे दोबारा शादी करने को कहती थी, जो जाहिर है उन्होंने नहीं सुना। उनके परिवार का रवैया मेरे प्रति अपमानजनक था।”

वह कहती हैं कि लगातार हस्तक्षेप और प्रभाव के कारण वाजिद के परिवार वालों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि उनका पति कभी उनके पक्ष में खड़ा नहीं हुआ। इसके अलावा तलाक की धमकी देने जैसे हथकंडे भी आजमाए गए। लेकिन बाद में तलाक नहीं हुआ क्योंकि वाजिद को अपनी गलती का एहसास हो गया था।

कमलरुख के अनुसार, वाजिद की माँ के दबाव का असर उनके रिश्ते पर ऐसा पड़ा कि आर्शी (उनकी बेटी) जब ढाई-तीन साल की थी, तब वाजिद घर छोड़ गए और तीन साल बाद लौटे। इसके बाद उन्हें बेटा रेहान हुआ और दोबारा वही चीजें हावी हो गईं। नतीजन साल 2014 में दोबारा वाजिद उन्हें छोड़ कर गए और डिवोर्स फाइल कर दिया।

ये आना-जाना लगातार चलता रहा। बच्चों के प्रति जिम्मेदारी निभाने के लिए वाजिद ने कभी हॉस्पिटल तक विजिट नहीं किया। हर काम कमलरुख अकेले संभालती रहीं। ऐसे में जब डिवोर्स फाइल हुआ तो उन्हें बहुत बुरा महसूस हुआ, मगर अपने बच्चों के लिए उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। 

वह कहती हैं,

“हम एक साथ यात्रा करते थे। खाना खाने जाते थे। मूवी देखते थे। बिलकुल एक आम परिवार की तरह। अपने जाने से एक-डेढ़ साल पहले, उन्होंने हमारे पास आकर हमें छोड़ कर जाने के लिए माफी माँगी थी। लेकिन उनमें अपनी माँ के ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत नहीं थी और न ही हमारे पास लौटने की। ”

वह बताती हैं कि अंतिम समय में वाजिद लगातार उनके संपर्क में थे और लॉकडाउन के दौरान भी कई बार उनसे बात की थी। उनके अनुसार वाजिद के जाने के बाद उन्होंने इन सब पर इसलिए बात की है क्योंकि अब उन्हें उनके बच्चों की चिंता हैं। उनकी बेटी 16 साल की है और बेटा 9 साल का। वाजिद के घर वालों ने उनकी संपत्ति उनसे छीन ली है। अकेले कमलरुख को हर चीज के लिए भुगतान करना पड़ता है।

वो एक हिप्नोथेरेपिस्ट के रूप में काम करती हैं और कहती हैं, “हमारी कमाई का प्राथमिक स्रोत वाजिद का वैवाहिक समर्थन रहा है। अगर वह भी छीन लिया जा रहा है (उन लोगों द्वारा जो पिछले 7-8 वर्षों से मेरे या मेरे बच्चों के संपर्क में रहने के लिए परेशान नहीं हुए, वो भी ऐसे अनुचित आधारों पर) तो मुझे हर मोर्चे पर वापस लड़ने की जरूरत है।”

इसके अलावा कमलरुख के मुताबिक उन्होंने इसलिए भी बोलना जरूरी समझा क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि पिछले 17 सालों में उन्होंने जो झेला, वो किसी महिला को झेलना पड़े। वह कहती हैं,

“अगर मेरे बच्चों का अधिकार खतरे में हैं और मेरे सम्मान को कीचड़ में घसीटा जा रहा है, तो हमें बोलना होगा। कोई हमें इससे बाहर नहीं कर सकता। कानूनी लड़ाई चलेगी और लोगों को इसके बारे में पता होना चाहिए। अगर मेरी तरह एक शिक्षित, स्वतंत्र महिला सिर्फ इस वजह से गुजर सकती है कि उसने प्यार से शादी की और धर्मपरिवर्तन नहीं किया, तो ये बहुत सी दूसरी महिलाओं के साथ हो सकता है, जो कम सशक्त हैं।”

उनका कहना है कि उन्होंने ये सब इसलिए बताया क्योंकि वो उस पीड़ा को भी उजागर करना चाहती हैं, जिससे वह गुजरीं। उनके मुताबिक, उनका पोस्ट किसी धर्म के खिलाफ नहीं। हर धर्म एक समान होता है। लोग मामलों को बिगाड़ने के लिए विश्वास का इस्तेमाल करते हैं और वह इसी के खिलाफ हैं।

पड़ोसी मुस्लिम लड़की से जिसने किया प्यार, उसके भाई की ईंट-पत्थर से कुचल कर हत्या: नसीम सहित 6 पर FIR

उत्तर प्रदेश के बिजनौर से हत्या का एक मामला सामने आया है। पत्थर से कुचल कर न सिर्फ युवक की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई, बल्कि उसके शव को जला भी दिया गया, ताकि कोई पहचान न पाए। शुक्रवार (नवंबर 27, 2020) की सुबह युवक का शव मिला, जिसके बाद क्षेत्र में तनाव व्याप्त हो गया। मृतक शिवम के भाई ने अपने एक अन्य भाई की प्रेमिका के पिता-पुत्र समेत मुस्लिम समुदाय के 5 लोगों पर हत्या का मामला दर्ज कराया है।

‘दैनिक जागरण’ की खबर के अनुसार, बुखारा रोड स्थित झालु बस स्टैंड के पास से युवक का जला हुआ शव बरामद किया गया। शव के पास खून से सना एक पत्थर भी मिला। पत्थर से चेहरे और सर पर जोर-जोर से वार कर के उसकी हत्या की गई थी। एसपी सिटी लक्ष्मी निवास मिश्र, सीओ सिटी कुलदीप गुप्ता और शहर कोतवाल राजेश सोलंकी ने घटनास्थल पर पहुँच कर पूरे मामला का जायजा लिया और कार्रवाई के निर्देश दिए।

डॉग स्क्वाड को भी लगाया गया। पोस्टमॉर्टम के समय अस्पताल में ही परिजनों ने बडवान नगर मोहल्ला निवासी शिवम की पहचान की। मृतक के भाई वासु ने बताया कि उसके एक भाई जिनका नाम सागर है, पड़ोस के ही मुस्लिम समुदाय की एक लड़की को भगा कर ले गया था। लगभग 5 महीने पहले पुलिस ने सागर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था और लड़की को उसके परिजनों को सौंप दिया था। सागर अभी भी जेल में ही है।

वासु ने बताया कि शिवम अपने भाई सागर की पैरवी करता था और इसी बात से पड़ोस के मुस्लिम समुदाय के लोग उससे खासी रंजिश रखते थे। उसने आरोप लगाया कि लड़की के भाई और पिता ने ही मिल कर शिवम की हत्या की है। पुलिस ने आरोपितों के घर दबिश ज़रूर दी, लेकिन वो सभी फरार हो गए हैं। एसपी ने हर बिंदु पर जाँच की बात कहते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

बिजनौर पुलिस ने जानकारी दी है कि इस मामले में मृतक के भाई की तहरीर पर नसीम और नफर के विरुद्ध अभियोग पंजीकृत किया गया है। साथ ही आश्वासन दिया कि आवश्यक विधिक कार्रवाई की जा रही है। असगर, नईम, एजाज और आरिफ के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है। शिवम अपने परिजनों से खाना बनाने को कह कर घर से बाहर गया था, लेकिन वो नहीं लौटा। बाद में उसकी हत्या की सूचना मिली।

‘अमर उजाला’ की खबर के अनुसार, मोहल्ले के लोगों ने बताया कि जिस लड़की को सागर भगा कर ले गया था, वो गर्भवती भी थी। लोगों ने गुरुवार के शाम 6 बजे शिवम को किशोरी के घर के बाहर खड़ा देखा था। शादीशुदा शिवम के दो बच्चे भी हैं। शहर के कोतवाल राजेश सोलंकी ने स्वीकार किया कि ये हत्या रंजिशन की गई है। फ़िलहाल पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है और आरोपितों की तलाश में है।

प्रेम में अलग-अलग मजहब होने के कारण रंजिश के तहत हत्या का ये पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। हाल ही में दिल्ली में राहुल राजपूत की लड़की के परिजनों ने हत्या कर दी थी। किशोरी के भाई मुहम्मद अफरोज और मुहम्मद राज ने लात-घूँसों से उसकी इतनी पिटाई की थी कि आँत फटने से मौत हो गई। उससे पहले अंकित सक्सेना की हत्या का मामला सामने आया था।

बच्चे, बच्चियाँ, किन्नर, महिलाएँ, पुरुष – 40+ रेप करने वाले सिकंदर खान उर्फ जीवाणु को उम्रकैद, कहा – मुखबिर को मार डालूँगा

राजस्थान में एक बलात्कारी को उसकी प्राकृतिक मृत्यु तक कारावास की सज़ा सुनाई गई है। सिकंदर खान उर्फ़ जीवाणु पर आरोप है कि उसने 40 से भी अधिक बच्चों व वयस्कों का बलात्कार किया है। चौंकाने वाली बात ये है कि पीड़ितों में बालक-बालिकाएँ और महिलाएँ, सभी ही शामिल थे। वो एक सीरियल रेपिस्ट है। 2019 में जयपुर के शास्त्री नगर और भट्टा बस्ती में 4 व 7 साल की दो बच्चियों के बलात्कार कर के वो कोटा भाग गया था।

लेकिन, कमिश्नरेट की टीम ने उसे धर-दबोचा और महज 23 दिनों में जाँच पूरी करने के बाद उसका चालान पेश किया गया। कोर्ट में उसके खिलाफ कुल 36 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। पुलिसकर्मियों दिनेश यादव और मोहम्मद मरगुब ने उसकी करतूतों का खुलासा किया था, जिन्हें आउट ऑफ टर्न प्रमोशन भी दिया गया। जून 2019 में दो बच्चियों के साथ बलात्कार के बाद शहर मे स्थिति तनावपूर्ण थी और उसकी गिरफ़्तारी के लिए प्रदर्शन भी हुए थे।

इस मामले में जब पूछताछ भी मुश्किल हो रही रही, तब कई टीमों का गठन कर के पुलिस ने आरोपित सिकंदर खान उर्फ जीवाणु की गिरफ़्तारी के लिए भेजा। उसे कोटा में पकड़ा गया। POCSO कोर्ट ने शुक्रवार (नवंबर 27, 2020) को उसे आजीवन कारावास और 3.11 लाख रुपए की सजा सुनाई। उसने पूछताछ में बताया कि जयपुर में अखबारों में अपनी सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद वो वहाँ से फरार हो गया था।

बीच में उसने 20 हजार रुपए की लूट को भी अंजाम दिया। हालाँकि, पुलिस ने उसके मोबाइल लोकेशन के आधार पर उसे पकड़ लिया। उसने खुलासा किया कि वो कई खानाबदोश महिलाओं को झाँसा देकर उनके साथ बलात्कार कर चुका है। साथी कीटाणु (रफीक) के साथ मिल कर उसने लूट और चेन छीनने की कई घटनाओं को अंजाम दिया था। उसने ये भी धमकाया था कि उसकी सूचना देने वाले को वो जेल से निकलते ही मौत के घाट उतार देगा।

मेडिकल जाँच में ये भी पता चला है कि वो एड्स जैसी बीमारी से जूझ रहा है। उसने 40 से अधिक किन्नर, महिलाएँ, पुरुष, खानाबदोश, बच्चे – इन सभी से बलात्कार करने की बात कबूली थी। 2004 में एक बच्चे के साथ बलात्कार के मामले में पहले ही उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। पिछले साल 7 साल की बच्ची को बाइक से अमीनाशाह ले जाकर उसने बलात्कार किया था और फिर उसे वापस घर छोड़ दिया था।

लेकिन, कोर्ट ने टिप्पणी की कि ये मामला ‘Rarest Of Rare’ में नहीं आता है, इसीलिए उसे फाँसी की सजा नहीं दी जा रही है। लेकिन, साथ ही कहा कि ऐसे अपराधियों को आजीवन समाज से दूर रखा जाना चाहिए, इसीलिए उसे मृत्यु तक जेल कि सजा दी जा रही है। कोर्ट में उसके खिलाफ 111 दस्तावेज पेश किए गए। उसके घर से उसकी एक पेंटिंग मिली थी, जिसमें उसने खुद को ‘मौत का कहर’ बता रखा था। वो अपने साथ खिलौने वाली बन्दूक भी रखता था, जिसका इस्तेमाल कर के वो बच्चों को डराता था।

इस पर कोर्ट ने अभियोजन के अधिवक्ता एमएस किशनावात को 3 अगस्त को केस से संबंधित साक्ष्य पेश करने के लिए कहा था कि वो पॉक्सो एक्ट के अपराध, चोरी, हत्या व दुष्कर्म जैसे अपराध करने का आदी है। सिंकदर उर्फ़ जीवाणु पर पॉक्सो कोर्ट ने आईपीसी की धारा-323, 341, 363, 376, 376 एबी और पॉक्सो की धारा 3,4,5,6 में आरोप तय किए थे। शास्त्री नगर थाना पुलिस ने 24 जुलाई 2019 को चार्जशीट दाख़िल की थी। 

हिंदू बेईमान, मुसलमान महान और योद्धा: भारत को लेकर विंस्टन चर्चिल की सोच, जिसने मारे 40-45 लाख निर्दोष लोग

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) में जर्मनी से पूरे विश्व को बचाने के लिए ब्रिटिश के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) को एक महानायक माना जाता है। इंटरनेट पर यदि विंस्टन चर्चिल का नाम टाइप करें तो कई जगह उनके लिए ‘हीरो’ या ‘लेजेंड’ जैसे शब्द पढ़ने को मिलेंगे। उनके जन्म दिवस (30 नवंबर 1874) से लेकर उनकी मृत्यु वाली तारीख (24 January 1965) पर उनके कृत्यों का महिमामंडन एक आम बात है। 

अभी बीते साल लेबर पार्टी के नेता मेकडोनेल ने विंस्टन चर्चिल की इस बात को लेकर आलोचना की थी कि उन्होंने 1910 में कामगारों पर फायरिंग करने के लिए सुरक्षा बलों को आदेश दिए थे। इसके बाद चर्चिल के पोते निकोलस ने नेता पर पलटवार करके कहा था, “लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए एक सस्ते नेता के इस हमले से मेरे दादा की प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आ सकती। मैं नहीं समझता कि इससे दुनिया में कोई हड़कंप मचेगा।”

अपने दादा विंस्टन चर्चिल के लिए इतने आत्मविश्वास के साथ बोले गए निकोलस के शब्द कितने सही हैं, इस पर एक सीमा के बाद सवालिया निशान लग जाता है। चर्चिल, ब्रिटेन के लिए एक कामयाब शासक भले ही हों लेकिन वो शख्सयित कैसे थे, इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि उन्होंने न केवल असहयोग आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महात्मा गाँधी को ‘अधनंगा फकीर’ कह कर उनकी मौत का इंतजार किया, बल्कि साफ शब्दों में सभी भारत के लोगों के लिए ये भी कहा–  “मैं भारतीयों से नफरत करता हूँ।” 

विंस्टन चर्चिल ने ली थी 40-45 लाख लोगों की जान

ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल कई मायनों में भारत के लिए अभिशाप साबित हुए। इतिहासकार और लेखिका मधुश्री मुखर्जी ने अपनी किताब चर्चिल्स सीक्रेट वॉर में यह दावा किया है कि साल 1943 में बंगाल में पड़ा अकाल कोई आपदा नहीं थी बल्कि चर्चिल की प्रायोजित साजिश थी, जिसके कारण लगभग 30 लाख लोगों ने भूख से तड़प कर अपनी जान गँवाई थी। भारत के इतिहास में अकाल के कारण मरने वालों की संख्या में ये अब तक की शायद सबसे अधिक संख्या है।

Study Says Winston Churchill's Policies Caused the 1943 Bengal Famine
बंगाल में आई आपदा

चर्चिल ने भारत के साथ क्या नहीं किया! एक अघोषित तानाशाह के रूप में उन्होंने भारत के संसाधनों को बुरी तरह लूटा। एक ब्रिटिश सैनिक से प्रधानमंत्री बने विंस्टन चर्चिल के कार्यकाल (10 मई 1940 – 26 जुलाई 1945) के बीच जब बंगाल में अकाल पड़ा और कई हिस्सों में लोगों को खाना नसीब नहीं हुआ, तो चर्चिल ने इसी बीच सारा अनाज जरूरतमंदों को देने के बजाय ब्रिटिश सेना को भिजवा दिया।

उस समय के गवाह रहे लोग आज भी बंगाल त्रासदी को याद करते हुए बताते हैं कि तब नदियों में लाशें तैरती थीं और कुत्ते व गिद्ध लाशों को नोचकर खाते थे। इतनी लाशों को देखकर किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वह उनका अंतिम संस्कार कर सकें। जो लोग जिंदा थे, उन्हें कस्बों और शहरों में किसी तरह बस खाने की तलाश थी। लोग चावल की जगह उसका पानी माँगते थे, क्योंकि उन्हें पता था किसी व्यक्ति के पास दूसरे को चावल देने के लिए नहीं होगा।

चर्चिल ने कैसे भारतीयों के खून से साने अपने हाथ

सन 1943 में तूफान और बाढ़ के कारण बंगाल में खाने का अकाल पड़ा था। हैरानी इस बात की थी कि इस आपदा के आने के एक साल पहले ही देश में बहुत बड़ी तादाद में फसल पैदा हुई हुई थी। लेकिन, अपने देश में अनाज का भरमार होने के बाद भी ब्रिटिश ‘तानाशाह’ चर्चिल के कारण बंगाल वासियों को अकाल झेलना पड़ा। 

चर्चिल ने उस समय भूख से तड़प रहे लोगों को अनाज देने की बजाय यूरोप में अनाज पहुँचाना जरूरी समझा और जब इस पर विचार विमर्श हुआ तो हालातों पर संवेदनशीलता दिखाने की बजाय उन्होंने कहा कि भारत के लिए कोई भी मदद अपर्याप्त होगी क्योंकि भारतीय खरगोश की तरह बच्चे पैदा करते हैं। इतना ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया से जो पानी के जहाज भारत की ओर आ रहे थे, उनके यहाँ अनलोड करने पर रोक लगा दी गई और सारा अन्न यूरोप में स्टॉक करने को कहा गया।

BBC blasted for 'outrageous' report pinning blame on Churchill for Bengal  famine deaths | World | News | Express.co.uk
तस्वीर साभार: डेली एक्सप्रेस

बंगाल अकाल के दौरान आर्चीबैल्ड वैवेल भारत के वायसराय थे। उन्होंने बंगाल अकाल को ब्रिटिश हुकूमत के अंदर होने वाली सबसे बड़ी त्रासदियों में एक बताया था। उन्होंने कहा था कि इससे जो ब्रिटिश साम्राज्य की छवि को नुकसान हुआ है, उसकी भारपाई नहीं की जा सकती।

आज हम सबको मालूम है कि ब्रिटिशों ने भारत पर एक सदी से ज्यादा राज किया। लेकिन क्या हम इस बात को जानते हैं कि भारत में इस ब्रिटिश काल के दौरान 31 अकाल पड़े थे जबकि ब्रिटिशों से पहले के भारत के 2000 सालों के इतिहास को लेकर केवल 17 अकालों का उल्लेख सामने आता है। 

एक सदी और दो हजार सालों की आपस में तुलना करके विचार करिए, किन कारकों के कारण भारत ने बंगाल त्रासदी झेली होगी? क्या वाकई इसके लिए प्राकृतिक कारण जिम्मेदार थे? या इसके पीछे चर्चिल जैसे बर्बर शासक का हाथ था, जिसका आज जन्म दिवस भी है।

चर्चिल के हाथों को 40-45 लाख लोगों के खून से सना हुआ यूँ ही नहीं कहा जाता। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर अपनी किताबों में इस विषय को उठा चुके हैं। वह बताते हैं कि चर्चिल से उस समय भारत में तैनात कई अधिकारियों ने खाने की माँग की थी। किंतु उन्होंने खाना पहुँचाने की बजाय पूछा था- क्या गाँधी अब तक जिंदा है?

साभार: crimesofbritain

कहा ये भी जाता है कि अगर साल 1945 में चर्चिल को बतौर प्रधानमंत्री हार नहीं मिलती तो हो सकता है कि भारत को आजादी के लिए और इंतजार करना पड़ता। चर्चिल भारत की आजादी के बिलकुल खिलाफ थे। 

उनका मानना था कि नस्ली रूप से गोरे ही सिर्फ सर्वश्रेष्ठ हैंं। जब लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा गया, उस समय विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री नहीं थे, लेकिन तब भी भारत को आजादी देने का उन्होंने सख्त विरोध किया था।

भारत आने से पहले माउंटबेटन जब उनसे मिलने गए, तब चर्चिल ने उन्हें कहा था, “तुम ब्रिटिश साम्राज्य को भंग करने जा रहे हो। साम्राज्य भंग करने की इस प्रक्रिया में मैं तुम्हें समर्थन नहीं दे सकता।” उनका मानना था कि ब्रिटिशों के लिए यूरोप के बाद भारत सबसे अच्छी जगह होगी। इसलिए इसकी देखभाल का काम एक ईश्वरीय मिशन के तहत अंग्रेजों को सौंपा गया है।

भारतीयों (खासकर हिंदुओं) को लेकर खास घृणा थी मन में

ब्रिटिश कंजरवेटिव पार्टी के नेता विंस्टन चर्चिल का मानना था कि लोकतंत्र भारतीयों के लिए उचित नहीं है। इतिहासकार पैट्रिक फ्रेंच अपनी मशहूर किताब, “Liberty or Death Indias Journey To Independence and Division” में लिखते हैं कि चर्चिल का हमेशा मानना था कि अंग्रेज ही सर्वोच्च हैं। वह कभी भारतीयों के औचित्य को नहीं मानते थे। 

चर्चिल को हिंदू सबसे बेईमान लोग लगते थे जबकि मुसलमान उन्हें विश्वासपात्र और महान लगते थे। उन्होंने लंदन में सोवियत राजनयिक इवान मिखाइलोविच मास्की से कहा था, 

“अंग्रेजो को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करना चाहिए, क्योंकि इसके बाद मुसलमान वहाँ के मास्टर बन जाएँगे, वे योद्धा हैं जबकि हिन्दू केवल हवाई बात करने वाले हैं। हिन्दू सिर्फ सटीक भाषणों, कुशलता से संतुलित प्रस्तावों और हवा में महल बनाने की बाते करने में एक्सपर्ट हैं!”

कुछ जगहों पर इस बात का उल्लेख है कि चर्चिल ने अपनी युवावस्था में इस्लाम धर्मांतरण पर विचार कर लिया था। वह मुसलमानों के इतने बड़े प्रशंसक थे कि उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट से झूठ बोला था कि युद्ध के समय भारतीय सेना में अधिकांश मुस्लिम थे, जबकि हकीकत में वहाँ ज्यादातर हिंदू थे।

चर्चिल की महात्मा गाँधी के प्रति घृणा

चर्चिल को महात्मा गाँधी से खासी चिढ़ थी। वह सत्याग्रह आंदोलन और असहयोग आंदोलन के बाद से गाँधी का विश्वव्यापी प्रभाव समझ चुके थे। ऐसे में जब गाँधी गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन गए, तब भी उन्हें चर्चिल के विरोध का सामना करना पड़ा। वह गाँधी-इरविन समझौते के भी खिलाफ थे। चर्चिल ने गाँधी के लिए राजद्रोही शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था: 

“वह (गाँधी) एक मध्यम दर्जे का राजद्रोही वकील है और अब एक फकीर बनने का ढोंग कर रहा है। वह अर्ध-नंगा होकर वाइस-रीगल पैलेस में घुसने का प्रयास कर रहा है जबकि वह अब भी खुल्लम-खुल्ला आज्ञा का उल्लंघन करने वाला अभियान चला रहा है। ऐसा व्यक्ति भारत में केवल गड़बड़ करके गोरों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।”

साभार: BBC

बीबीसी के अनुसार 1942 में चर्चिल को जब गाँधी के अनशन पर जाने की बात पता चली तो उन्होंने बैठक करके तय किया कि इस बार गाँधी को मरने दिया जाएगा। उन्होंने वायसरॉय काउंसिल से कुछ भारतीय सदस्यों के इस्तीफे की अटकलों की बात पर कहा था:

“अगर कुछ काले लोग इस्तीफ़ा दे भी दें, तो इससे फ़र्क क्या पड़ता है। हम दुनिया को बता सकते हैं कि हम राज कर रहे हैं। अगर गाँधी वास्तव में मर जाते हैं तो हमें एक बुरे आदमी और साम्राज्य के दुश्मन से छुटकारा मिल जाएगा। ऐसे समय जब सारी दुनिया में हमारी तूती बोल रही हो, एक छोटे बूढ़े आदमी के सामने जो हमेशा हमारा दुश्मन रहा हो, झुकना बुद्धिमानी नहीं है।”

इसके बाद जब गाँधी का अनशन कई दिनों तक चला तो चर्चिल को इस बात से इतनी दिक्कत हुई कि उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका के प्रधानमंत्री जनरल स्मट्स को पत्र में लिखा, “मुझे नहीं लगता कि गाँधी की मरने की कोई इच्छा है। मुझे लगता है कि वो मुझसे बेहतर खाना खा रहे हैं।” इससे पहले बंगाल अकाल के दौरान वह गवर्नर को लिखे एक तार में पूछ ही चुके थे कि गाँधी अब तक मरे क्यों नहीं हैं?

इसके अतिरिक्त जब गाँधी ने भारत की आज़ादी के आश्वासन के बदले ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों में मदद की पेशकश की तो चर्चिल ने कहा था, “वॉयसराय को इस देशद्रोही से बात नहीं करनी चाहिए और उसे दोबारा जेल में डाल देना चाहिए।”

जहरीली गैस से तबाही मचाने के समर्थन में था विंस्टन चर्चिल

द्वितीय विश्व युद्ध के समय विंस्टन चर्चिल भारत के उत्तरी हिस्से में आदिवासियों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कराना चाहते थे। उन्होंने 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने वाले आदिवासियों के विरुद्ध रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करने का समर्थन किया था। चर्चिल ने भारतीय दफ्तर को एक आतंरिक मेमो भेजा था। 

इस मेमो में कहा गया था, “हमें उत्तरी-पश्चिमी मोर्चे पर आदिवासियों के खिलाफ जहरीली गैस का इस्तेमाल करना चाहिए।” इससे पूर्व चर्चिल ने रूस के बोल्शेविक्स में सबसे खतरनाक रासायनिक हथियार का इस्तेमाल करने की स्वीकृति दी थी। उस वक्त वह युद्ध मामलों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

चर्चिल ने जनता में डर और दहशत को पैदा करने के लिए आम नागरिकों पर टेरर बॉम्बिंग का समर्थन किया था। जिसके बाद ड्रेडसन में हुई भयानक बमबारी देखने को मिली थी। चर्चिल ने खुद कहा था कि वो भारी बमबारी के ज़रिए ऐसे हमले चाहते हैं जो ख़ौफ़ पैदा करने वाले और सब कुछ तहस-नहस करने वाले हों।

साल 1944 में लिखे एक पत्र में चर्चिल ने ऐसे एक्शन्स को लेकर घोषणा की थी। उन्होंने लिखा था, “संभवत: मुझे ज़हरीली गैस के इस्तेमाल के लिए आपके समर्थन की ज़रूरत पड़े। हम इससे रुस और जर्मनी के दूसरे शहरों को भर देंगे। हमें हर हाल में ऐसा करना ही चाहिए।”

विंस्टन चर्चिल

अन्य देशों में चर्चिल का कहर

अपने आतंक को जर्मनी में व्यापक स्तर पर फैलाने के लिए चर्चिल ने मवेशियों को भी अपना निशाना बनाया। उन्होंने ऑपरेशन वेजेटेरियन की तहत जर्मनी के जानवरों को एंथरैक्स के पैकेट खिलाने की योजना बनाई। उनका मकसद था कि इस ऑपरेशन के जरिए वह जर्मनी के लोगों को दूध और बीफ से वंचित कर देंगे और जो भी जर्मनीवासी मवेशियों से मिलने वाले दूध व माँस का सेवन करेगा, वो सब संक्रमित हो जाएँगे। साल 1944 में इसके साथ 5 मिलियन एंथरैक्स केक (मवेशियों के लिए) निर्मित हुए थे।

ओपन मैग्जीन में शशि थरूर के लेख के अनुसार, चर्चिल को युद्ध में सेक्स से ज्यादा आनंद आता था। उनमें कोई नैतिकता नहीं बची थी। जब उनका बेटा रैंडॉल्फ लड़ाई के मैदान में था तो उन्होंने अपनी बहू पामेला को अमेरिकी राजदूत हैरमैन के सामने ‘आनंद’ के लिए पेश कर दिया था। बाद में पामेला ने उसी राजदूत से शादी भी कर ली थी।

थरूर के मुताबिक, चर्चिल का मकसद साफ था कि युद्ध और उसकी ज़रूरत के लिए वह जापानियों को तबाह कर देंगे, जर्मन नागरिकों को मैदानों में खदेड़कर बमों से तहस-नहस कर देंगे और भारतीयों को भूखा मार देंगे।

उन्होंने श्वेतों के लिए रास्ता बनाते हुए केन्या में भी इंसानियत पर वार किया था। उन्होंने वहाँ की उपजाऊ ज़मीन पर बसे स्थानीय नागरिकों को जबरन पुनर्वासित करने में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी और उसके लिए नीतियाँ बनाने का काम किया था। इस कदम के चलते 150,000 से अधिक पुरुष, महिलाएँ और बच्चे यातना शिविरों में जाने को मज़बूर हुए थे। चर्चिल के शासन में केनियाई लोगों को प्रताड़ित करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों ने बलात्कार, सिगरेट से जलाने और बिजली के झटके देने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया था।

तस्वीर साभार: crimesofbritain

इसके अलावा चर्चिल के कहने पर एथेंस की सड़कों पर ग्रीक प्रदर्शनकारियों को 1944 में रौंद दिया गया था, जिसके चलते 28 लोगों की मौत हो थी और 128 लोग घायल हुए थे। चर्चिल को लेकर कहा जाता है कि उसे अपने युद्ध के प्रति प्रेम का मालूम अफगानिस्तान में रहने के दौरान हुआ। जब ब्रिटेन ने ईरान के तेल उद्योग को अपने कब्जे में कर लिया तो चर्चिल ने घोषणा की कि ये तोहफा हमारे वाइल्ड सपनों से परे परियों के देश से मिला है। उसने ईरान पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित किया था। उसने ईराननियों से उनके प्राकृतिक संसाधनों को छीना था और गरीबी के वक्त वहाँ लूटपाट का बोल बाला करवाया था।। 

आज विंस्टन चर्चिल के कोट, उसके भाषणों का उल्लेख आपको कई जगह देखने को मिलते होंगे, बिलकुल ऐसे जैसे उसने अपनी छवि सकारात्मक रूप में स्थापित की हो। लेकिन, हकीकत में वह हिटलर से कम नहीं था। उनका समर्थन करने वालों के लिए यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसे नस्लभेदी और क्रूर शासक की कही बातें किन स्थितियों में प्रासंगिक मानी जाएँगी।

सैंकड़ों लोगों के खून का जिम्मेदार चर्चिल का दर्शन आखिर क्यों कोई अपनाएगा? वह एक ऐसा साम्राज्यवादी था, जिसे श्वेत लोगों के भविष्य की चिंता जरूर थी लेकिन इंसानियत पर प्रहार करने से पहले उसके अंदर कोई संवेदना नहीं उमड़ती थी। वह इंग्लैंड को श्वेत लोगों की सरजमीं रखना चाहता था और स्थितियों को युद्ध की नजर से तौलता था।

धुले के किसान ने ‘मन की बात’ में जिक्र के लिए PM का जताया आभार, नए कृषि कानून से हुए फायदे के बारे में भी बताया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (नवंबर 29, 2020) को अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में धुले ज़िले के जितेंद्र भोइजी द्वारा नए कृषि कानून से लाभ प्राप्त करने के बारे में बताया था। जितेंद्र ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मुझे खुशी है कि पीएम मोदी जी ने आज (‘मन की बात’ में) मेरा उदाहरण दिया। मुझे मध्य प्रदेश के एक व्यापारी ने धोखा दिया। नए खेत कानूनों की मदद से मैंने इसके बारे में शिकायत दर्ज की और तुरंत कार्रवाई की गई।”

उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश के एक व्यापारी ने उनसे मक्का खरीदा और पैसे नहीं दिए। नए कृषि कानून के तहत केस दर्ज करवाने के बाद उन्हें पैसे वापस मिले।

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया था कि महाराष्ट्र के धुले जिले के किसान जितेंद्र भोइजी ने मक्का की खेती की थी। सही दाम के लिए उन्होंने फसल व्यापारी को बेचना तय किया। तीन लाख 32 हजार रुपए का पेमेंट तय हुआ था। 25 हजार रुपए उन्हें एडवांस मिल गए थे। बाकी पैसा 15 दिन में चुकाने की बात हुई थी। लेकिन उन्हें बाकी पेमेंट नहीं मिला।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मक्का खरीदने वाले बरसों से चली आ रही उसी परंपरा को निभा रहे थे कि ‘किसान से फसल खरीद लो, महीनों तक पेमेंट न करो’। चार महीने तक जितेंद्र का पेमेंट नहीं हुआ था। सितंबर से जो नए कृषि कानून बने हैं, इस कानून में यह तय हुआ है कि फसल खरीदने के तीन दिन में ही किसान को पूरा पैसा पेमेंट करना है। किसान शिकायत दर्ज कर सकता है। क्षेत्र के एसडीएम को एक महीने के भीतर ही किसान की शिकायत का निपटारा करना होगा। ऐसे में जितेंद्र की शिकायत का समाधान होना था। शिकायत के चंद दिन में उनका बकाया मिल गया। इस प्रकार कानून की सही और पूरी जानकारी जितेंद्र की ताकत बनी।

प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को अपने चर्चित रेडियो कार्यक्रम मन की बात के दौरान किसानों से जुड़े मसले पर खासतौर से चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत में खेती और उससे जुड़ी चीजों के साथ नए आयाम जुड़ रहे हैं। बीते दिनों हुए कृषि सुधारों ने किसानों के लिए नए संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं। बरसों से किसानों की जो माँग थी, जिन माँगों को पूरा करने के लिए किसी न किसी समय में हर राजनीतिक दल ने उनसे वायदा किया था, वो माँगें पूरी हुई हैं।