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फैक्टचेक: क्या आरफा खानम घंटे भर में फोटो वाली बकरी मार कर खा गई?

हाल ही में स्वघोषित पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने एक ट्वीट शेयर किया था जिसमें उन्होंने अत्यंत ही निश्छल भाव से एक मेमने (बकरी का बच्चा) को हृदय से लगा कर पकड़ा हुआ था। यूँ तो पशुओं से प्रेम प्रदर्शित करना सोशल मीडिया पर काफी प्रचलित है लेकिन आरफा खानम द्वारा ऐसा करना कई लोगों को आश्चर्यजनक लगा। कुछ लोगों ने फब्तियाँ भी कसीं कि ये फोटोशॉप है, लेकिन पिछले अनुभव के आधार पर हम यही कह सकते हैं कि सुश्री शेरवानी ने कभी भी जानवरों का फोटोशॉप नहीं किया है। हाँ, स्वयं की तस्वीरों के साथ डिजिटल छेड़-छाड़ के लिए उन पर कई आरोप लगे हैं।

बाहरहाल, जैसे ही ट्वीट आया तो लोगों ने इसे खूब पसंद किया और रीट्वीट करने लगे। इस ट्वीट के वायरल होते ही, एक दूसरा स्क्रीनशॉट भी वायरल हो गया। आरफा के पाँच बज कर दस मिनट वाले ट्वीट के साथ एक ट्वीट छः बज कर दस मिनट का था, जिसके स्क्रीनशॉट को कई लोगों ने एक दूसरे को व्हाट्सएप्प पर भेजना शुरु किया। किसी ने यह लिखा कि देखो जिस बकरी को सीने से चिपका कर फोटो खिंचा रही थी, घंटे भर में उसे मार कर खा गई।

व्हाट्सएप्प पर घूमती तस्वीर की सच्चाई क्या है?

क्या है असली सच्चाई?

जब हमने इस दावे पर काम करना शुरु किया तो सबसे पहली बात जो सामान्य बुद्धि विवेक से पता चली कि घंटे भर में बकरे का मांस पकाना अत्यंत मुश्किल है। उसमें भी, मांस उपलब्ध हो तब तो किसी तरह कूकर में पपीते के टुकड़े डाल कर सिटी लगवाई जा सकती है, लेकिन बकरे को हलाल कर के बनाने में घंटे से ज्यादा ही समय लगेगा।

पार्ट टाइम पंचर एक्सपर्ट और पार्ट टाइम शेफ जुबैर से हमने सेकेंड ओपिनियन लेने की कोशिश की तो जुबैर ने हमें बहरीन से वीडियो कॉल पर बताया, “देखिए, अगर बकरी कटी हो तो एक घंटे में पकाई जा सकती है, लेकिन जिंदा बकरी को हलाल करने, छीलने, काटने, धोने और पकाने में कम से कम तीन से चार घंटे तो लग ही जाएँगे।”

यूँ तो हमें सीधे ऑल्टन्यूज की नासा वाली तकनीक अपना कर गूगल इमेज में रीवर्स इमेज सर्च कर के सच्चाई तक पहुँच जाना चाहिए था लेकिन उस तकनीक को हम अफोर्ड नहीं कर सकते। अतः, हमने तय किया कि व्हाट्सएप्प पर घूमती इस तस्वीर की गुणवत्ता जाँची जाए।

अगर आप दोनों ही इमेज को देखेंगे तो पता चलेगा कि स्क्रीनशॉट में शेयर किए गए दोनों ही तस्वीरों में साइज का अंतर है। एक तस्वीर बड़ी है, दूसरी छोटी। अब कोई यह कह देगा कि दूसरी इमेज जूम कर के भी तो लगाई जा सकती है। हमने उस बात पर भी ध्यान दिया तो पाया कि अगर यह इमेज सिर्फ जूम की हुई होती तो पूरी तस्वीर लगभग दोगुनी बड़ी होती।

यहाँ प्रोफाइल की तस्वीर दुगुनी बड़ी है, लेकिन मटन की तस्वीर उतनी ही बड़ी है जितनी अमूमन ट्विटर पर सिंगल तस्वीर होती है। जाहिर सी बात है कि यह तस्वीर और उसका टेक्स्ट किसी शरारती तत्व ने चिपकाया है। मटन की तस्वीर की सिमेट्री आप चेक करेंगे तो पाएँगे की उसकी तस्वीर पूरी आ गई है, लेकिन नीचे में लिखा टेक्स्ट कट रहा है जिसमें समय, दिनांक, और भारत लिखा हुआ है।

यहाँ हमने प्रतीक नाम के एक रीवर्स गूगल सर्च एक्सपर्ट से बातचीत की तो उसने बताया, “मैंने दोनों तस्वीरों को माइक्रोस्कोप लगा कर देखा तो पाया कि दोनों में फोंट का अंतर है, और फोरेंसिक एक्सपर्ट इसे एक नजर में नकार देंगे।” जब प्रतीक ने कह दिया, तो हम समझ गए कि सच ही कहा जा रहा होगा। फिर भी हमने अपना अन्वेषण जारी रखा।

इस तस्वीर में कई समस्याएँ हैं जो बताती हैं कि तस्वीर झूठी है, फर्जी है

साथ ही, एक और बात जो गौर करने योग्य है और ऑल्टन्यूज के स्तर का अन्वेषण खोजती है वो यह है कि इस तस्वीर की क्वालिटी एचडी नहीं है। आजकल के फोन में स्क्रीनशॉट भी फुल एचडी होते हैं, और व्हाट्सएप्प कभी भी इतनी बेकार तस्वीर नहीं बनाता। जाहिर सी बात है कि दुष्ट लोगों ने सुश्री आरफा जी को बदनाम करने की कोशिश की है।

एक बात और, जो शायद हम सबसे पहले कर लेते तो आर्टिकल लम्बा नहीं होता, वो यह है कि हम आरफा खानम शेरवानी के ट्विटर पर चेक कर लेते कि क्या उन्होंने ऐसा ट्वीट किया है? या फिर ऑल्टन्यूज के सोफिस्टिकेटेड तकनीक से ‘आर्काइव’ से ट्वीट निकाल लेते, तो भी पता चल जाता। लेकिन फिर हमने सोचा कि फैक्टचेकिंग के सबसे कुख्यात नाम की तरह ही, 1904 में किसी किताब में छपी तस्वीर पर विश्वास न कर के उसकी एचडी तस्वीर माँग लेंगे तो हम भी बड़े फैक्टचेकर कहलाएँगे।

आरफा का मटन वाला एक ट्वीट

आगे, हमने जब मटन और आरफा को सर्च किया तो सिर्फ एक ट्वीट मिला जिसमें उन्होंने मटन के एक डिश को इमली की चटनी के साथ खाने की बात को मुँह में पानी लाने वाला बताया था। प्रकृति और पशु प्रेमी होने का इससे बड़ा और क्या सबूत होगा कि आरफा ने उसी मेमने को नहीं खाया, जिसे गोद में ले कर तस्वीर खिंचा रही थीं। हालाँकि, हम जज नहीं करते, और आपको भी नहीं करना चाहिए। सबके प्रेम को प्रदर्शित करने का तरीका अलग होता है।

इसी लेख में थोड़ा और ज्ञान दे दूँ, ताकि ये फैक्टचेक ऑल्टन्यूज के स्तर की हो जाए, तो आपको बताता चलूँ कि अंग्रेजी में एक कविता है ‘पोरफिरियाज़ लवर’ जिसमें प्रेमी ने प्रेमिका का गला उसके बालों से ही घोंट दिया था क्योंकि उसे लगा कि इस वक्त वह उससे सबसे ज्यादा प्रेम कर रही थी, तो उसी अवस्था को अंतिम बना दिया जाए। हो सकता है आरफा का पशु प्रेम वैसा ही हो। लेकिन हमें क्या, हम जज नहीं करते।

क्या है निष्कर्ष?

तो, कुल मिला कर निष्कर्ष यह निकला कि ये तस्वीर कुछ शरारती और असामाजिक तत्वों की कारगुजारी है। ये वो लोग हैं जो नहीं चाहते कि लोग शांति से बकरी-प्रेम प्रदर्शित कर सकें।

नोट: लेख लिखने वाला रिपोर्टर ऑल्टन्यूज में नौकरी करना चाहता है, किसी की पहचान हो तो सीवी आगे बढ़ाने में मदद करें। पहले से ही आभार प्रकट कर रहा हूँ।

‘पहले सिर्फ ऐलान होते थे, 2014 के बाद हमने सोच बदली’: जानिए लखनऊ यूनिवर्सिटी के स्‍थापना दिवस पर क्या बोले PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (नवंबर 25, 2020) को लखनऊ विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष समारोह को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित किया। इस दौरान रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही अन्य मंत्री भी आनलाइन जुड़े रहे। संबोधन से पहले पीएम मोदी ने एक विशेष स्मारक डाक टिकट और भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी विशेष कवर भी जारी किया। 

पीएम मोदी ने लखनऊ विश्वविद्यालय के नाम पर 100 रुपए का सिक्का भी जारी किया। मैसूर विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय तीसरा ऐसा विश्वविद्यालय होगा जिसके 100 वर्ष पूरे होने पर स्मारक सिक्का जारी किया गया। इस सिक्के को मुंबई में सरकारी टकसाल में ढाला गया है। यह लखनऊ विश्वविद्यालय के खजाने में एक संपत्ति होगी। सिक्का ढलाई में चाँदी, कांस्य, तांबा और निकल का इस्तेमाल किया गया है।

इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि सौ वर्ष का समय सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है। इसके साथ अपार उपलब्धियों का जीता जागता इतिहास जुड़ा हुआ है। यहीं पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आवाज गूँजी थी। लखनऊ यूनिवर्सिटी से अनगिनत लोगों के नाम जुड़े हैं। सभी का नाम लेना संभव नहीं है। सौ साल की यात्रा में सभी ने अहम योगदान दिया है। 

पीएम मोदी ने कहा कि जब भी यहाँ से पढ़कर निकले लोगों से बात करने का मौका मिला है, यूनिवर्सिटी की बातें करते हुए वह लोग उत्साहित हो जाते हैं। तभी तो लखनऊ हम पर फिदा है। बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदला लेकिन लखनऊ यूनिवर्सिटी का मिजाज लखनवी ही है।

पीएम मोदी ने कहा कि नीयत के साथ इच्छा शक्ति का होना भी बहुत जरूरी है। इच्छा शक्ति न हो तो सही नतीजे नहीं मिल पाते। एक जमाने में यूरिया उत्पादन के बहुत से कारखाने थे, फिर भी बाहर से यूरिया आता था। उसका कारण था कि खाद के कारखाने पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते थे। हमने एक के बाद एक फैसले लिए और आज यूरिया कारखाने पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं। यूरिया की ब्लैक मार्केटिंग की भी समस्या थी। इसका खामिजाया किसानों को उठाना पड़ता था। यूरिया की नीम कोटिंग करके उसका इलाज भी किया गया। पहले भी नीम कोटिंग हो सकती थी लेकिन नहीं हुई। नीम कोटिंग के लिए इच्छा शक्ति नहीं दिखाई गई।

केवल सकारात्म बातें सोचें

पीएम मोदी ने कहा कि खादी को आगे बढ़ाने को लेकर लोग नकारात्मक बातें करते थे। लोगों की बातों को किनारे किया और सकारात्मक बातों के साथ आगे बढ़ा। 2002 में पोरबंदर में महात्मा गाँधी के जन्मदिन पर खादी के फैशन शो का आयोजन किया। खादी और यूथ ने मिलकर जिस तरह से मजमा जमाया, उसने सभी पूर्वाग्रह को दूर कर दिया। सकारात्मक सोच और इच्छा शक्ति ने काम बना दिया। उन्होंने कहा, “आज जब सुनता हूँ कि खादी स्टोर से एक-एक दिन में एक-एक करोड़ की बिक्री हो रही है तो वो दिन याद कर खुशी होती है। इसी का नतीजा है कि जितनी खादी 20 साल में बिकती थी, वह 6 साल में बिकी है।”

यूनिवर्सिटी से निकले लोग राष्ट्रपति पद तक पहुँचे

पीएम ने कहा, 100 साल की इस यात्रा में यहाँ से निकले व्यक्तित्व राष्ट्रपति पद पर पहुँचे। राज्यपाल बने। विज्ञान का क्षेत्र हो या न्याय का, राजनीतिक हो या प्रशासनिक, शैक्षणिक हो या सांस्कृतिक या फिर खेल का क्षेत्र, हर क्षेत्र की प्रतिभाओं को लखनऊ विश्वविद्यालय ने सँवारा है। 

पीएम मोदी ने कहा, “आज हम देख रहे हैं कि देश के नागरिक कितने संयम के साथ कोरोना की इस मुश्किल चुनौती का सामना कर रहे हैं। देश को प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाले नागरिकों का निर्माण शिक्षा के ऐसे संस्थानो में ही होता है। लखनऊ यूनिवर्सिटी दशकों से अपने इस काम को बखूबी निभा रही है।”

2014 के बाद हमने सोच बदली

पीएम मोदी ने कहा, “रायबरेली की रेल कोच फैक्ट्री में वर्षों पहले निवेश हुआ, संसाधन लगे, मशीनें लगीं, बड़ी-बड़ी घोषणाएँ हुई, लेकिन कई वर्षों तक वहाँ सिर्फ डेंटिंग-पेंटिंग का ही काम होता था। 2014 के बाद हमने सोच बदली, तौर तरीका बदला। परिणाम ये हुआ कि कुछ महीने में ही यहाँ से पहला कोच तैयार हुआ और आज यहाँ हर साल सैकड़ों कोच तैयार हो रहे हैं।”

पीएम मोदी ने कवि प्रदीप की पंक्तियाँ याद करते हुए कहा, “कभी कभी खुद से बात करो, कभी खुद से बोलो, अपनी नजर में तुम क्या हो, ये मन के तराजू पर तोलो…. यह पंक्तियाँ हम सभी के लिए गाइडलाइन हैं। आज भागदौड़ की जिंदगी में आत्म मंथन की आदत भी छूटती जा रही है।”

बता दें कि लखनऊ विश्‍वविद्यालय की स्थापना 1920 में की गई थी। इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और भारतीय मूल्‍यों को बढ़ावा देने तथा समाज और मानवता की सेवा करने के उद्देश्‍य से की गई थी। लखनऊ विश्वविद्यालय ने अपने इस सफर के 100 साल पूरे किए हैं।

सरकार ने लक्ष्मी विलास बैंक के डीबीएस बैंक में विलय को दी मंजूरी: निकासी की सीमा भी हटाई, 6000 करोड़ के निवेश को स्वीकृति

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लक्ष्‍मी विलास बैंक (Lakshmi Vilas Bank) के डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड (DBS Bank India Limited) के साथ विलय के प्रस्‍ताव को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही लक्ष्‍मी विलास बैंक के जमाकर्ताओं पर निकासी की सीमा (withdrawal Limit) अब नहीं होगी।

यह जानकारी केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बुधवार (नवंबर 25, 2020) को दी। उन्‍होंने बताया कि लक्ष्‍मी विलास बैंक के डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड के साथ विलय से लक्ष्‍मी विलास बैंक के करीब 20 लाख जमाकर्ताओं और लगभग चार हजार कर्मचारियों को राहत मिलेगी।

लक्ष्‍मी विलास बैंक से जुड़े मामले का समाधान इसके जमाकर्ताओं और कर्मचारियों के वित्तीय हितों की रक्षा के साथ स्वच्छ बैंकिंग प्रणाली के लिए सरकार की मंशा को दर्शाता है। जावडेकर ने बताया कि कैबिनेट ने नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड में 6000 करोड़ रुपए के निवेश को मंजूरी इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर डेवलपमेंट के लिए दी है।

इसकी घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आत्मनिर्भर भारत पैकेज 3.0 में की थी। सरकार ने राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की शृंखला के कामों के लिए 111 लाख करोड़ रुपए के वित्त पोषण समर्थन के लिये यह कदम उठाया है।

इसके साथ ही मंत्रिमंडलीय समिति ने एटीसी टेलीकॉम कंपनी की करीब 12 प्रतिशत शेयर खरीदने के लिए एटीसी एशिया पैसिफिक के 2,480 करोड़ रुपए के एफडीआई प्रस्ताव को भी हरी झंडी दे दी है।  

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एलवीबी की वित्तीय सेहत को खराब करने वाले लोगों को दंडित किया जाएगा। इससे पहले सरकार ने 17 नवंबर को रिजर्व बैंक को संकट में फँसे लक्ष्मी विलास बैंक पर 30 दिन की ‘रोक’ की सलाह दी थी। साथ ही प्रत्येक जमाकर्ता की 25,000 रुपए की निकासी की सीमा तय की गई थी।

इसके साथ ही रिजर्व बैंक ने कंपनी कानून, 2013 के तहत एलवीबी के डीबीआईएल में विलय की योजना का मसौदा भी सार्वजनिक किया था। केंद्रीय बैंक ने एलवीबी के बोर्ड को भंग कर दिया था और केनरा बैंक के पूर्व गैर-कार्यकारी चेयरमैन टी एन मनोहरन को 30 दिन के लिए बैंक का प्रशासक नियुक्त किया था।

TRP मामले में रिपब्लिक की COO प्रिया मुखर्जी को 20 दिन की ट्रांजिट बेल, कर्नाटक हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस की दलील को नकारा

कर्नाटक हाई कोर्ट ने बुधवार (नवंबर 25, 2020) को रिपब्लिक टीवी की चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) प्रिया मुखर्जी को 20 दिन का ट्रांजिट बेल दिया है। मुंबई पुलिस ने तथाकथित टीआरपी हेरफेर घोटाले को लेकर प्रिया मुखर्जी के खिलाफ FIR दर्ज किया था।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आदेश दिया कि 20 दिनों की अवधि के बाद उन्हें राहत के लिए उपयुक्त फोरम का रुख करना होगा। कोर्ट ने कहा कि अगर इस बीच उन्हें गिरफ्तार किया जाता है, तो 2 लाख रुपए और दो श्योरिटी के जमानत बॉन्ड पर रिहा किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति एचपी संधेश की पीठ ने अपने आदेश में कहा, “जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में हो तो याचिकाकर्ता राहत माँग सकता है। याचिका में सीमित अवधि के लिए ट्रांजिट जमानत देने के लिए आधार बनाया गया है।”

कोर्ट ने इस आदेश में यह भी कहा कि पुलिस अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का दुरुपयोग कर रही थी। हाई कोर्ट ने कहा, “पुलिस अपना दिमाग नहीं लगा रही है कि संज्ञेय अपराध किया गया है या नहीं। पुलिस को इस बात पर अदालत को संतुष्ट करना चाहिए कि वे एक व्यक्ति को क्यों गिरफ्तार कर रहे हैं।” इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में उन्हें नागरिक के बचाव में आना होगा।

मुंबई पुलिस की दलीलें खारिज

हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस द्वारा उठाई गई उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता ‘फोरम शॉपिंग’ में लिप्त है। पीठ ने कहा “जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में है तो याचिकाकर्ता राहत माँग सकता है। याचिका सीमित अवधि के लिए ट्रांजिट जमानत देने के लिए एक आधार का काम कर रही है।”

गौरतलब है कि टीआरपी हेरफेर घोटाले की जाँच कर रही मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने रिपब्लिक टीवी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) प्रिया मुखर्जी को मंगलवार (नवंबर 17, 2020) को पूछताछ के लिए तलब किया था। 

उल्लेखनीय है कि टीआरपी हेरफेर मामले में हंसा रिसर्च ग्रुप ने मुंबई पुलिस पर बेहद संगीन आरोप लगाए थे। ग्रुप ने कहा था कि मुंबई पुलिस द्वारा उन्हें रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के खिलाफ गलत बयान देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। बार और बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, BARC के बार-ओ-मीटर (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) का संचालन करने वाली कंपनी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख करते हुए इस मामले की जाँच मुंबई पुलिस के बजाय केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की माँग की।

ऑस्ट्रेलिया ने आतंकी हरकतों में लिप्त मौलाना की नागरिकता छीनी, गृह मंत्री ने कहा- देश की सुरक्षा के लिए कोई भी कार्रवाई करेंगे

ऑस्ट्रेलिया ने मौलाना अब्दुल नसीर बेनब्रीका की नागरिकता छीन ली है। अल्जीरियन मूल के मौलाना पर 2005 में कई आतंकी घटनाओं की साजिश रचते हुए दबोचा गया था। इस्लामी मौलवी अब्दुल नसीर बेनब्रीका को 2009 में 15 सालों की सजा सुनाई गई थी और वो अगले महीने जेल से निकल सकता है। लेकिन, गृह मंत्री पीटर बटन ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया के लोगों को बचाने के लिए मौलाना की नागरिकता छीनना एक उचित कदम है।

एक और जानने वाली बात ये है कि आज तक ऑस्ट्रेलिया में इससे पहले किसी व्यक्ति के देश में रहते हुए नागरिकता नहीं छीनी गई, मौलाना ऐसी कार्रवाई का सामना करने वाला पहला व्यक्ति होगा। उसके वकीलों ने इस कार्रवाई पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। गृह मंत्री ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति देश के खिलाफ बड़ा आतंकी खतरा पैदा करता है तो उसके खिलाफ क़ानून के तहत हरसंभव कार्रवाई की जाएगी, जिससे ऑस्ट्रेलिया की रक्षा हो सके, चाहे वो कोई भी हो।

ऑस्ट्रेलिया में नियम है कि किसी भी व्यक्ति की नागरिकता तभी छीनी जा सकती है, जब वो दो देशों की नागरिकता रखता हो। इससे ये निश्चित किया जाता है कि ऐसा न हो कि नागरिकता छीने जाने के बाद उक्त व्यक्ति किसी भी देश का न रहे। पिछले साल भी ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा एजेंसियों ने इसे लेकर चिंता जताई थी और कहा था कि इससे देश की सुरक्षा पर अचानक से और अनअपेक्षिक प्रभाव पड़ सकता है।

मौलाना अब्दुल नसीर बेनब्रीका को 2005 में गिरफ्तार किया गया था और पाया गया था कि वो एक आतंकी संगठन की गतिविधियों का नेतृत्व करते हुए आतंकी हमले की साजिश रच रहा था। वो 1989 से ही ऑस्ट्रेलिया में रहता आ रहा था। उसके साथ 16 अन्य भी गिरफ्तार हुए थे, जिन्होंने कई आतंकी हमलों की साजिश रची थी। मेलबर्न में होने वाले वार्षिक फुटबॉल रूल्स फाइनल मैच को दहलाने की साजिश थी, जिसमें 1 लाख दर्शक आते हैं।

मौलाना अब्दुल नसीर बेनब्रीका को दी गई सज़ा में 12 साल की नॉन-पैरोल अवधि भी शामिल है, जो नवंबर 5, 2020 को एक्सपायर हो रही है। विक्टोरिया स्टेट के सुप्रीम कोर्ट में ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने अर्जी दी है कि उसकी सज़ा बढ़ा दी जाए, ताकि वो जेल में ही बना रहे। एक नियम के तहत आतंकियों को सज़ा पूरी होने के बाद भी 3 साल अतिरिक्त जेल में रखा जा सकता है। अब तक 2 बार कोर्ट ने 28-28 दिन के लिए उसकी सज़ा बढ़ाई है।

हाल ही में पूर्वी अफ्रीका में स्थित मलावी की पुलिस ने एक करोड़पति ईसाई ‘पैगम्बर’ को गिरफ्तार किया, जो चमत्कार के द्वारा काफी कुछ करने का दावा करता रहा है। अपने अनुयायियों के पीच ‘पैगम्बर’ कहे जाने वाले ईसाई उपदेशक पर धोखाधड़ी से लेकर मनी लॉन्ड्रिंग तक के मामले दर्ज हैं। उसे बुधवार (नवंबर 18, 2020) को गिरफ्तार किया गया। ईसाई उपदेशक शेफर्ड बुशिरी खुद को भी Prophet कहता है।

‘ये प्राचीनतम है, सभी भाषाओं की जननी है’: न्यूजीलैंड में सत्ताधारी लेबर पार्टी के सांसद ने संस्कृत में ली शपथ, आलोचकों को लताड़ा

न्यूजीलैंड में भारतीय मूल के गौरव शर्मा ने न सिर्फ हैमिलटन वेस्ट क्षेत्र से जीत कर देश का नाम ऊँचा किया, बल्कि संसद में संस्कृत में शपथ लेकर अपनी जड़ों को लेकर भी सजगता दिखाई। वो मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर के निवासी हैं और उन्होंने न्यूजीलैंड लेबर पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता, जो वहाँ की सत्ताधारी पार्टी है। न्यूजीलैंड में भारतीय हाई कमीशन मुक्तेश परदेशी ने उन्हें बधाई दी।

उन्होंने कहा कि डॉक्टर गौरव शर्मा युवा हैं। उन्होंने सबसे पहले न्यूजीलैंड की स्थानीय माओरी भाषा में शपथ ली, उसके बाद भारत की क्लासिक भाषा संस्कृत में शपथ ली। मुक्तेश ने कहा कि ऐसा कर के उन्होंने भारत और न्यूजीलैंड, दोनों की ही सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति अपने गहरे सम्मान का प्रदर्शन किया है। डॉक्टर गौरव शर्मा ने बताया कि वो 1996 में न्यूजीलैंड गए थे। एक ऐसा भी समय आया था, जब उनके पिता को 6 वर्षों तक एक अदद जॉब के लिए तरसना पड़ा था।

‘द ट्रिब्यून’ की खबर के अनुसार, उनका कहना है कि वो उनके परिवार के लिए सबसे कठिन समय था। उन्होंने बताया कि वो समाज की सेवा के लिए राजनीति में आए हैं, क्योंकि उनके परिवार को काफी सारी दिक्कतों से होकर गुजरना पड़ा है। उन्होंने कहा कि उन्हें सामाजिक सुरक्षा से मदद मिली, क्योंकि ये एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें न्यूजीलैंड ने काफी बेहतर किया है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि इसमें अभी और सुधार की गुंजाइश है।

हालाँकि, इसके लिए उन्हें आलोचना का भी सामना करना पड़ा। किसी ने उनसे पूछा कि उन्होंने हिंदी में शपथ क्यों नहीं ली, तो उन्होंने कहा कि ये सोच उनके मन में भी आया था, लेकिन उन्होंने सोचा कि पहाड़ी उनकी मूल भाषा है और पंजाबी में भी वो शपथ ले सकते थे, लेकिन सभी को खुश करना संभव नहीं हैं। ऐसे में उन्होंने बताया कि संस्कृत में शपथ लेकर उन्होंने एक साथ सारी भाषाओं को सम्मान दे दिया।

एक ट्विटर यूजर ने संस्कृत को अत्याचार, जातिवाद, रूढ़िवादिता और हिंदुत्व की भाषा करार दिया, जिसके जवाब में एक चार्ट शेयर कर के डॉक्टर गौरव शर्मा ने बताया कि वो कई भाषा बोलते हैं और कोई ऐसी भाषा चुनना चाहते थे, जो ज्यादा से ज्यादा भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करता हो। उन्होंने बताया कि 3500 साल पुरानी संस्कृत भारत की प्राचीनतम भाषा है और देश में आजकल बोली जाने वाली भाषाओं में से अधिकतर यहीं से निकली हैं।

शर्मा ने बताया कि उन्होंने ग्रामीण भारत के एक स्कूल में बचपन में संस्कृत की शिक्षा ली है, जहाँ यह सभी के लिए अनिवार्य था, यह न तो किसी एक वर्ग की निशानी थी और न ही किसी एक संस्कृति का प्रतीक। इसके बाद उन्होंने सवाल पूछने वाले पर निशाना साधते हुए लिखा कि वो तो अंग्रेजी में ट्वीट कर रहा है, ये ‘Colonialism’, अर्थात साम्राज्यवाद की भाषा हुई? लोगों ने उनके इस प्रकार स्टैंड लेने पर तारीफ की।

हाल ही में भाजपा ने भी कर्नाटक में राज्यसभा चुनाव के लिए के नारायण को उम्मीदवार बनाया। के नारायण छापखाना चलाते हैं और संस्कृत भाषा को जिंदा रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 68 वर्षीय के नारायण कर्नाटक के अति-पिछड़ा बुनकर समुदाय से आते हैं। वो 1994 से ही संस्कृत मासिक पत्रिका ‘संभाषण संदेश’ का प्रकाशन करते रहे हैं। इस पत्रिका में कोई प्रचार सामग्री नहीं होती। दुनिया भर में इसके 15,000 सब्सक्राइबर्स हैं।

‘भाजपा को हिंदुत्व की लौ लगी है, लव जिहाद उनका नया हथियार, बंगाल चुनाव के बाद ये भंगार में चले जाएँगे’: शिवसेना मुखपत्र

देश के कई राज्यों में लव जिहाद को लेकर चर्चा जारी है और इस पर कानून बनाने की बात की जा रही है। इसी मसले पर शिवसेना ने अब भारतीय जनता पार्टी पर टिप्पणी की है। मंगलवार (नवंबर 24, 2020) को शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ में लव जिहाद पर लेख लिखा गया, जिसमें कहा गया है कि चीन की घुसपैठ, कोरोना, आर्थिक मंदी समेत अन्य मसलों को छोड़कर बीजेपी नेताओं की ओर से लव जिहाद पर कानून बनाने की माँग की जा रही है। 

सामना में लिखा गया कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा ने मुंबई आकर राज्यपाल से मुलाकात की और लव जिहाद का जिक्र किया। लेकिन भाजपा ने ‘लव जिहाद’ की जो व्याख्या तैयार की है, उसके अनुसार महाराष्ट्र में ऐसे मामले कब और कितने हुए हैं, उसे सामने लाओ। लेकिन बिना कारण गड़े मुर्दे उखाड़कर राज्य का सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास मत करो।

सामना में बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा गया कि भाजपा को हिंदुत्व की लौ लगी है, लव जिहाद उनका नया हथियार है। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद ये हथियार भंगार में चले जाएँगे, लव जिहाद का मामला कहीं शुरू होगा तो वो पाकिस्तान और बांग्लादेश है। पाकिस्तान के हिंदू समाज की महिलाएँ और लड़कियाँ अत्यंत असुरक्षित तरीके से जीवन-यापन कर रही हैं।

सामना के संपादकीय में आगे लिखा गया है, “लव जिहाद मतलब सिर्फ दो भिन्न धर्मावलंबियों का एक-दूसरे से निकाह तक ही मर्यादित है क्या? सच कहें तो वैचारिक ‘लव जिहाद’ के कारण देश और हिंदुत्व का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। कश्मीर में पाक समर्थक, अनुच्छेद 370 प्रेमी महबूबा मुफ्ती से भाजपा ने सत्ता का निकाह किया, इसलिए इसे भी वैचारिक लव जिहाद क्यों न माना जाए? संघमुक्त व मोदी मुक्त हिंदुस्तान का डंका पीटने वाले नीतीश कुमार को फिर से गोद में बिठाकर सत्ता से निकाह करने को भी लव जिहाद क्यों न माना जाए? हिंदुत्व की रक्षा हर स्तर पर होने की आवश्यकता है। यह सिर्फ ‘रोटी-बेटी’ व्यवहार और चुनाव तक सीमित ना हो।”

सामना के लेख में कहा गया है कि लव जिहाद की जड़ पाकिस्तान में है और अब जड़ को उखाड़े बिना कोई विकल्प नहीं है, यह समझ लेना आवश्यक है। ‘लव जिहाद’ की कमर तोड़नी हो तो उसकी जड़ मतलब पाकिस्तान पर हमला करो। मतलब हिंदुस्तान के हर राज्य में इसको लेकर आंदोलन और कानून आदि बनाने की नौबत नहीं आएगी। अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे भाजपा शासित राज्यों में लव जिहाद के विरोध में कानून बनाने की हलचल शुरू है।

भाजपा-एनसीपी की सरकार शपथ ग्रहण के 80 घंटे बाद गिर गई थी और बाद में शिवसेना, राकांपा तथा कॉन्ग्रेस ने मिलकर महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार बनाई। इस पर तंज कसते हुए शिवसेना के मुखपत्र में कहा गया है, “एक साल पहले सुबह ‘लव जिहाद’ हुआ था। फिर भी महाविकास आघाड़ी की सरकार आई और टिकी। यह टिकनेवाली ही है!”

अहमद पटेल की मौत का कॉन्ग्रेस को कितना दुख? सुबह किया पहले राहुल को कोट, फिर जताया अपने नेता की मृत्यु पर शोक

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल के निधन के बाद आज मीडिया में उन्हें लेकर तरह-तरह की खबरें चल रही हैं। कहा जा है कि वह अकेले इतनी बड़ी शख्सियत थे कि उन्होंने गाँधी परिवार से रिश्ता न होने के बाद भी पार्टी पर राज किया। 

अब सवाल उठता है कि क्या वाकई ऐसा हो सकता है कि नेहरू-इंदिरा-राजीव की पीढ़ियों के अलावा किसी में इतना दम है कि वो कॉन्ग्रेस पर राज कर पाए? 

मीडिया में चलाई जा रही खबर

आज अहमद पटेल के इंतकाल के बाद न जाने वो कौन से सूत्र हैं जो मीडिया को इतनी लिबर्टी दे रहे हैं कि वह ये दावा कर दें कि कॉन्ग्रेस पर कोई नॉन गाँधी भी कभी राज कर सकता है। पिछले दिनों सिर्फ पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाने पर कपिल सिब्बल का क्या हाल हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। क्या ऐसी स्थिति में किसी की हिम्मत होगी कॉन्ग्रेस पर राज करने की?

अहमद पटेल को लेकर सुबह से हर कॉन्ग्रेसी नेता अपना दुख प्रकट कर रहा है। सोनिया गाँधी खुद उनके निधन को अपने लिए एक बड़ा नुकसान बता रही हैं। उनका कहना है कि उन्होंने एक वफादार सहयोगी और दोस्त खोया है। लेकिन, क्या यह शब्द काफी हैं इस कथन को साबित करने के लिए कि वरिष्ठ नेता अहमद पटेल की कॉन्ग्रेस में गाँधी परिवार के सदस्यों जितनी पैठ थी?

इसे समझने के लिए तो पार्टी के ऑफिशियल अकॉउंट पर किए गए ट्वीट पर नजर डालनी पड़ेगी। दरअसल, अहमद पटेल की मृत्यु की जानकारी आज सुबह 4 बजे उनके बेटे फैसल खान ने ट्विटर पर दे दी थी। इसके बाद कई कॉन्ग्रेसी नेता भी इसे लेकर अपना शोक प्रकट करने लगे। मगर कॉन्ग्रेस के आधिकारिक अकॉउंट के लिए अपने इतने बड़े नेता की खबर पर दुख जताना सुबह का पहला काम नहीं था।

पहला काम था- राहुल गाँधी का संदेश शेयर करना ताकि किसी मायने में उसकी गंभीरता सोशल मीडिया यूजर्स के सामने न दब जाए और लोग अहमद पटेल के गम में राहुल गाँधी के कोट को पढ़ना न भूल जाएँ।

कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर आज सुबह ठीक 8:00 बजे पहले राहुल गाँधी का संदेश शेयर किया गया। इसमें उन्होंने कहा था, “महिलाओं के खिलाफ हिंसा कई रूपों में सामने आती है और जिसे एक ऐसी संस्कृति द्वारा पोषित किया जाता है जो स्त्रित्व के चिह्नों का महिमामंडन करती है और साथ में महिलाओं की निंदा और अनादर भी करती हैं।”

इसके बाद कॉन्ग्रेस के आधिकारिक अकॉउंट से राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी जैसे नेताओं के ट्वीट को रीट्वीट किया गया, और पहले ट्वीट के करीब 22 मिनट बाद सुबह के 8:22 पर जाकर लिखा जाता है, “श्री अहमद पटेल के अचानक निधन के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपना एक मजबूत स्तंभ और राष्ट्र ने एक समर्पित नेता खो दिया। भारी मन के साथ हम उनके परिवार और समर्थकों के प्रति इस दुख की घड़ी में संवेदना व्यक्त करते हैं।”

हो सकता है कॉन्ग्रेस पार्टी के आलाकमान के प्रति अंधभक्ति को कई लोगों ने गौर किया हो। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि दूसरी ही ओर कॉन्ग्रेस समर्थक होने के नाम पर संवेदनाओं को मार चुके कई लोगों ने कॉन्ग्रेस के ट्वीट में हाँ में हाँ मिलाना सही समझा, उनसे ये सवाल पूछना जरूरी नहीं समझा कि आखिर अहमद पटेल की मृत्यु से बड़ा राहुल गाँधी के कोट में क्या है?

महिला की सुरक्षा और उनकी समानता पर बात करना एक ऐसा विषय है जो हमेशा प्रासंगिक रहता है लेकिन गुलामी में जकड़े कॉन्ग्रेसियों को मालूम है कि गाँधी परिवार के किसी भी सदस्य के मुख से निकलने वाली बात अहमद पटेल की मृत्यु से ज्यादा बड़ी सूचना है।

भले ही अहमद पटेल के पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के साथ करीबी रिश्ते हों। वो उनके अच्छे दोस्त हों, अच्छे सहयोगी हों। राहुल गाँधी भले ही उन्हें स्तंभ मानते हों। प्रियंका गाँधी उन्हें सलाहकार मानती हों, वफादार मानती हों। मगर, इसका मतलब ये नहीं है कि वो पार्टी पर राज कर पाए। मीडिया में किए जा रहे दावे अतिश्योक्ति से अधिक कुछ भी नहीं हैं।

आज अगर अहमद पटेल के जीवित रहते ये माँग उठा दी जाती कि वह इतने बड़े नेता हैं उन्हें पार्टी कमान सौंपी जाए, तो शायद कपिल सिब्बल की तरह कॉन्ग्रेसी उन्हें भी उनकी जगह दिखा देते। मात्र गाँधी परिवार का करीबी होना उन्हें कॉन्ग्रेस पर राज करने का अधिकार नहीं देता। बिलकुल वैसे ही जैसे कोई भी फैमिली फ्रेंड चाहे कितना भी खास, वफादार, समझदार हो लेकिन व्यक्ति फैमिली फ्रेंड को उसे नहीं सौंपता, उसे अपने बच्चों के लिए बचाए रखता है।

उत्तर प्रदेश में 9357 करोड़ रुपए का निवेश करेंगी 28 विदेशी कंपनियाँ: कोरोना काल में मिलेगा लाखों लोगों को रोजगार

कोरोना काल में जब वैश्विक स्तर पर मंदी के बादल घने होते जा रहे थे, उस दौर में भी उत्तर प्रदेश बेहतर निवेश और कारोबार के केंद्र के रूप में उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। यह योगी सरकार की बड़ी उपलब्धि है कि औद्योगिकीकरण की ओर कदम बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश ने विदेशी कंपनियों को खास तौर पर आकर्षित किया है। सिर्फ कोरोना काल में ही 28 विदेशी कंपनियों ने लगभग नौ हजार करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश में निवेश करने के लिए करार किया है।

दरअसल, कोरोना महामारी के कारण जहाँ एक तरफ देश भर में लोगों को अपने रोजगारों से हाथ धोना पड़ रहा है तो वहीं योगी सरकार ने इस दौरान प्रदेश में दर्जनों देशी-विदेशी कंपनियों को निवेश करने के लिए आकर्षित किया। जिसका परिणाम अब धरालत पर दिखने लगा है। कोरोना काल में करीब 57 देशी-विदेशी कंपनियों ने प्रदेश सरकार संग करीब 46 हजार 501 करोड़ का निवेश करने का करार किया है। इनमें कई ऐसी कंपनियाँ हैं जो चीन से अपना प्लांट बंद कर भारत में आने को इच्छुक हैं।

इन कंपनियों में उत्पादन शुरू होने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। इनमें 28 विदेशी कंपनियों ने 9357 करोड़ रुपए के निवेश के लिए करार किया है। एक जूता बनाने वाली कंपनी ऐसी है, जो चीन से शिफ्ट होकर भारत आई है और तीन सौ करोड़ रुपए के निवेश से आगरा में उत्पादन शुरू किया है। इसके अलावा 37, 144 करोड़ रुपए का निवेश करने के लिए घरेलू 29 कंपनियों ने सरकार के साथ करार किया है।

ये हैं निवेश करने वाली विदेशी कंपनियाँ

कहाँ की कंपनियाँ              निवेश

  • कनाडा की दो कंपनियाँ    : 1746 करोड़ रुपए
  • जर्मनी की चार कंपनियाँ    : 300 करोड़ रुपए
  • हॉन्गकॉन्ग की एक कंपनी  : 1000 करोड़ रुपए
  • जापान की सात कंपनियाँ   : 2000 करोड़ रुपए
  • सिंगापुर की दो कंपनियाँ    : 1600 करोड़ रुपए
  • यूके की तीन कंपनियाँ      : 1375 करोड़ रुपए
  • यूएसए की पाँच कंपनियाँ   : 309 करोड़ रुपए
  • कोरिया की चार कंपनियाँ  : 928 करोड़ रुपए

उद्यमियों की पहली पसंद बना यूपी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभिन्न विभागों की नीतियाँ बनाने से लेकर श्रम कानूनों में दर्जनों सुधार किए। जिस वजह से देश में प्रदेश दूसरे पायदान पर पहुँच गया है। यह बड़ी वजह है कि देश में उद्यमियों की पहली पसंद यूपी बन गया है।

सीएम ने दिए 2 माह के अंदर उद्यमियों को कब्जा दिलाने के निर्देश

कोरोना काल में उद्यमियों को साढ़े आठ सौ प्लॉट आवंटित किए गए हैं। इसके अलावा यमुना एक्सप्रेस वे के किनारे सेक्टर 28 में साढ़े तीन सौ एकड़ में डेडिकेटेड मेडिकल डिवाइस पार्क प्रस्तावित है, जिसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए कलाम इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ टेक्नोलॉजी के साथ एमओयू किया गया है। मुख्यमंत्री ने दो माह के अंदर सभी उद्यमियों को भौतिक रूप से कब्जा दिलाने के निर्देश दिए हैं, ताकि जल्द से जल्द प्रोजेक्ट धरातल पर उत्पादन शुरू कर सकें।

फ्रांस के राजदूत ने सीएम योगी से की मुलाकात

इसके अलावा भारत में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लेनिन मंगलवार (नवंबर 24, 2020) से यूपी के विशेष दौरे पर हैं। बुधवार (नवंबर 25, 2020) को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिष्टाचार भेंट की। सीएम योगी ने खुद ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी। उन्होंने कहा, “भारत में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लेनिन के साथ अद्भुत मुलाकात हुई। हमने फ्रांस और भारत के बीच संबंधों को और मजबूत करने के साथ उत्तर प्रदेश की विशाल क्षमता का लाभ उठाने के लिए साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा की।”

रोशनी घोटाला में महबूबा मुफ्ती का नाम: जम्मू में सरकारी जमीन कब्ज़ा कर बनाया गया PDP का दफ्तर, CBI कर रही जाँच

रोशनी लैंड स्कैम में अब जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP की मुखिया महबूबा मुफ्ती का नाम सामने आ रहा है। ये लैंड स्कैम अपने-आप में प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। गरीबों को शासित जमीन मुहैया कराने और प्रदेश में बिजली लाने के लिए जिस कानून को बनाया गया था, जम्मू कश्मीर के नेताओं ने उसका जम कर फायदा उठाया और अकूत धन-संपत्ति अर्जित की। जबकि जनता गरीब ही बनी रही।

इस घोटाले की जाँच CBI ने अपने हाथों में ली हुई है। अभी तक के जाँच में कई खुलासे हुए हैं और इन सब के तार जम्मू कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों से जुड़ रहे हैं, जिनमें से एक फारूक अब्दुल्लाह का नाम पहले ही सामने आ चुका है। ‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, अब पता चला है कि महबूबा मुफ्ती की पार्टी PDP ने जम्मू के संजवान क्षेत्र में तीन कनाल सरकारी भूमि पर अवैध रूप से कब्ज़ा जमा लिया।

इसके बाद इस जमीन पर पार्टी के दफ्तर का निर्माण कराया गया। इसी ऑफिस के पहले फ्लोर पर विवादास्पद नेता राशिद खान ने डेरा जमा लिया। जिस समय ये सब हुआ, उस वक़्त राज्य में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार थी। 2 बार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे सईद काफी विवादित नेता थे और उनके केंद्रीय गृह मंत्री रहते ही घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ था। उनके निधन के बाद उनकी बेटी महबूबा सीएम बनी थीं।

PDP के नेता चौधरी तालिब हुसैन ने भी जम्मू डिविजन के चन्नी रामा इलाके में दो कनाल सरकारी जमीन पर अवैध रूप से कब्ज़ा जमा रखा है। उन्होंने रोशनी एक्ट का सहारा लेने की जहमत तक नहीं उठाई और सीधा भूमि कब्ज़ा डाली। वो बलात्कार के भी आरोपित हैं और उन्हें अप्रैल 2019 में खुद महबूबा मुफ्ती ने अपनी पार्टी में पूरे गर्मजोशी के साथ शामिल किया था। उन्हें आदिवासियों के अधिकार के लिए लड़ने वाला बता कर उन्होंने ऐसा किया।

‘न्यूज़ 18’ की खबर में एक CBI अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि गुजरे जमाने की फ़िल्मी हस्तियाँ फिरोज खान और संजय खान की बहन दिलशाद शेख ने भी राजधानी श्रीनगर में 7 कनाल सरकारी जमीन पर कब्ज़ा जमा लिया। दिलशाद ने जमीन को नियमित करने के लिए राशि भी नहीं जमा कराई लेकिन रोशनी एक्ट का इस्तेमाल किया। इसी तरह एक अन्य PDP नेता असलम मट्टू ने भी राजधानी में भूमि कब्जाई।

उन्होंने भी इसके तहत जमा कराई जाने वाली रकम नहीं दी। जम्मू-कश्मीर के एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद के परिवार के एक सदस्य ने भी इस एक्ट का गलत तरीके से फायदा उठा कर सरकारी भूमि पर कब्ज़ा किया। फारूक अब्दुल्लाह ने दावा किया था कि अवैध रूप से कब्ज़ा की गई सरकारी जमीन के बदले चुकाई गई रकम से राज्य में बिजली आएगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

सीएम फारुक अब्दुल्ला सरकार द्वारा 2001 में लाई गई इस स्कीम के तहत 1990 से हुए अतिक्रमणों को इस एक्ट के दायरे में कट ऑफ सेट किया गया था। सरकार का कहना था कि इसका सीधा फायदा उन किसानों को मिलेगा, जो सरकारी जमीन पर कई सालों से खेती कर रहे है। लेकिन नेताओं ने जमीनों पर कब्जे जमाने का काम शुरू कर दिया। वर्ष 2005 में तब की मुफ्ती सरकार ने 2004 के कट ऑफ में छूट दी। उसके बाद गुलाम नबी आजाद ने भी कट ऑफ ईयर को वर्ष 2007 तक के लिए सीमित कर दिया।