Home Blog Page 432

BBC, AP, NYT… पश्चिमी मीडिया के लिए नागपुर के मुस्लिम दंगाई ही ‘पीड़ित’, फिल्म छावा और हिंदुओं को ‘दोषी’ बताने का गढ़ा नैरेटिव: CM फडणवीस के बयान को भी तोड़ा-मरोड़ा

महाराष्ट्र के नागपुर में 17 मार्च 2025 को इस्लामिक भीड़ ने हिंदुओं और पुलिस के खिलाफ हिंसा की, जिसमें डीसीपी समेत कई पुलिसकर्मी और आम हिंदू घायल हुए। हिंदुओं के घरों को फूँक दिया गया। उनकी कारों को निशाना बनाया। खास बात ये है कि एक भी मुस्लिम घर, मुस्लिम की गाड़ी पर कोई हमला नहीं हुआ।

ये सब तब शुरू हुआ जब विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोग औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। अफवाह उड़ी कि उन्होंने औरंगजेब का पुतला जलाया, जिसमें कुरान की आयतें लिखी थीं। लेकिन पुलिस ने साफ कर दिया कि ये अफवाह गलत थी और दंगा पहले से प्लान किया गया था। फिर भी भारत में इस्लामिक-वामपंथी गिरोह और दुनिया भर में विदेशी मीडिया ने इस हिंसा का ठीकरा हिंदुओं, बीजेपी और फिल्म ‘छावा’ पर फोड़ दिया।

पश्चिमी मीडिया ने हिंदुओं को हिंसा के लिए ठहराया जिम्मेदार, फर्जी नरेटिव गढ़ा

पश्चिमी मीडिया ने इस खबर को ऐसा घुमाया कि सच को ही ढक दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT), एसोसिएटेड प्रेस (AP), बीबीसी और स्काई न्यूज जैसे बड़े नामों ने एक ही सुर में हिंदुओं को विलेन बना दिया। इनका कहना था कि हिंदू संगठनों ने औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग की और फिल्म ‘छावा’ ने लोगों को भड़काया, जिससे दंगे हुए। लेकिन सच ये है कि हिंसा इस्लामिक भीड़ ने शुरू की थी। बीबीसी ने अपनी हेडलाइन में लिखा, “भारत के एक शहर में औरंगजेब की कब्र को लेकर हिंसा के बाद कर्फ्यू”। उसने दावा किया कि नागपुर के महाल इलाके में वीएचपी और बजरंग दल ने औरंगजेब का पुतला जलाया, जिससे गुस्सा भड़का।

बीबीसी का स्क्रीनशॉट

बीबीसी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बयान को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया। उसने लिखा कि फिल्म ‘छावा’ ने लोगों को उकसाया, जिसमें छत्रपति संभाजी महाराज को औरंगजेब के हाथों क्रूर यातनाएँ झेलते दिखाया गया। बीबीसी ने ये साबित करने की कोशिश की कि हिंदू कार्यकर्ताओं की वजह से मुस्लिम भीड़ ने हिंसा की। लेकिन फडणवीस ने ऐसा कुछ नहीं कहा। उन्होंने विधानसभा में बताया कि ये दंगा पहले से सोचा-समझा था। मौके पर पत्थरों से भरी ट्रॉलियाँ मिलीं, जो साजिश की ओर इशारा करती हैं। बीबीसी ने सच को नजरअंदाज कर हिंदुओं को दोषी ठहराया।

फडणवीस ने साफ कहा कि वो किसी फिल्म को दोष नहीं दे रहे। उन्होंने मराठी में कहा, “‘छावा’ ने छत्रपति संभाजी महाराज की सच्ची कहानी सामने लाई। इससे लोगों में औरंगजेब के खिलाफ भावनाएँ जागीं। कुछ लोग जो औरंगजेब को पसंद करते हैं, वो भी सामने आए।” उनका कहना था कि फिल्म ने इतिहास को लोगों तक पहुँचाया, जिससे औरंगजेब की हकीकत खुली। लेकिन बीबीसी ने उनके बयान के कुछ हिस्सों को चुनकर ये दिखाया कि फिल्म ही हिंसा की जड़ है। ये फडणवीस के बयान को गलत तरीके से पेश करने की हिमाकत थी।

एपी ने भी हिंदुओं को कटघरे में खड़ा किया

अमेरिका की न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) ने भी हिंदुओं को ही कटघरे में खड़ा किया। उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा, “हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग की, जिससे पश्चिमी भारत में सांप्रदायिक झड़पें हुईं।” आर्टिकल के लेखक शेख सलिक तो अलग ही कहानी बताने की कोशिश की, उसके हिसाब से नागपुर में हिंसा तो मुस्लिम भीड़ ने की, लेकिन वो पीड़ित हैं। AP ने ये भी कहा कि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि औरंगजेब के हिंदुओं पर अत्याचार की कहानियाँ बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई हैं। जबकि सच ये है कि औरंगजेब ने लाखों हिंदुओं को मारा, मंदिर तोड़े, जजिया टैक्स लगाया-ये सब इतिहास में दर्ज है।

AP ने ये भी लिखा कि पिछले दस साल में पीएम नरेंद्र मोदी के राज में औरंगजेब के खिलाफ नफरत बढ़ी। उसने कहा कि मोदी ने औरंगजेब पर हिंदुओं को सताने का आरोप लगाया, जिससे मुस्लिम अल्पसंख्यक डरे हुए हैं। उसने ये भी जोड़ा कि हिंदू राष्ट्रवादियों की हिंसा से मुस्लिम परेशान हैं। लेकिन AP ने हरियाणा के नूहँ में 2023 की हिंसा, मध्य प्रदेश के मऊ में 2025 के हमले, राम नवमी, होली, दिवाली पर हिंदुओं पर हुए हमले, उदयपुर में कन्हैया लाल की हत्या, उमेश कोल्हे का कत्ल और 2020 के दिल्ली दंगों का जिक्र तक नहीं किया। इन सबमें मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं पर हमला किया था।

AP ने फिल्म ‘छावा’ और विक्की कौशल को भी निशाने पर लिया। उसने कहा कि इस फिल्म ने धार्मिक तनाव बढ़ाया। रिपोर्ट में लिखा, “कुछ समीक्षकों ने फिल्म को विभाजनकारी बताया, जो देश में धार्मिक दरार बढ़ा सकती है।” लेकिन सच ये है कि ‘छावा’ ने संभाजी महाराज की बहादुरी और औरंगजेब की क्रूरता को हल्के से दिखाया। फिल्म में कोई ऐसा नरेटिव नहीं था जो लोगों को बाँटे। फिर भी AP ने इसे हिंदुओं के खिलाफ इस्तेमाल कर लिया। ये साफ था कि वो इस्लामिक हिंसा को छुपाना चाहते थे।

एपी का स्क्रीनशॉट

हर बार जब हिंदू अपनी कहानी फिल्मों के जरिए बताते हैं, जैसे ‘छावा’ में संभाजी महाराज की वीरता या ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार, तो इस्लामिक कट्टरपंथी और उनके समर्थक हंगामा शुरू कर देते हैं। वो चाहते हैं कि हिंदू अपने अत्याचारों की बात न करें, अपने मंदिरों की माँग न उठाएँ और औरंगजेब जैसे अत्याचारियों की तारीफ को चुपचाप सुनें। AP ने कोर्ट में मंदिरों की माँग करने वाले हिंदुओं को ‘हिंदू चरमपंथी’ कहकर बदनाम करने की एकतरफा कोशिश की।

स्काई न्यूज ने भी अलावा ‘हिंदुओं’ को जिम्मेदार बताने का राग

स्काई न्यूज ने भी वही राग अलापा। उसने कहा कि ‘छावा’ ने महाराष्ट्र में तनाव बढ़ाया। उसने लिखा, “मुस्लिम, जो 14% आबादी हैं, उन्हें लगता है कि हिंदू भीड़ उन पर हमला कर रही है और सरकार चुपचाप समर्थन दे रही है।” स्काई न्यूज ने लव जिहाद को ‘साजिश थ्योरी’ कहकर खारिज कर दिया, जबकि हर दिन ऐसी खबरें आती हैं। उसने ये भी कहा कि बीजेपी सरकार मुस्लिमों के घर बुलडोजर से तोड़ रही है। लेकिन सच ये है कि बुलडोजर सिर्फ दंगाइयों की अवैध संपत्ति पर चलता है, न कि हर मुस्लिम के खिलाफ।

NYT भी फर्जी नरेटिव गढ़ने में रही शामिल

न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) ने भी हिंदुओं को दोषी ठहराया। उसने लिखा, “एक कट्टर हिंदू समूह की औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग से महाराष्ट्र में तनाव बढ़ा और हिंसा हुई।” NYT ने भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बयान को गलत तरीके से पेश किया और ‘छावा’ को जिम्मेदार ठहराया। उसने कहा कि हिंदुओं ने प्रदर्शन किया, जिससे दिक्कत शुरू हुई। लेकिन सच ये है कि हिंदुओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया था। हिंसा की शुरुआत इस्लामी कट्टरपंथियों भीड़ ने की, जो औरंगजेब को अपना हीरो मानती है।

NYT का स्क्रीनशॉट

NYT ने इतिहासकार सोहेल हाशमी का हवाला दिया, जिसने कहा कि संभाजी और औरंगजेब का झगड़ा धार्मिक नहीं, बल्कि दो राजाओं की लड़ाई थी। लेकिन औरंगजेब के फरमान, मंदिर तोड़ने, हिंदुओं की हत्या और जबरन धर्मांतरण के सबूत मौजूद हैं। NYT चाहता है कि लोग ये मानें कि औरंगजेब हिंदू-विरोधी नहीं था। वो ये भी नहीं चाहता कि लोग जानें कि आज के इस्लामिक कट्टरपंथी औरंगजेब और टीपू सुल्तान जैसे हिंदू-विरोधियों को क्यों पूजते हैं।

नागपुर हिंसा का पूरा घटनाक्रम, हिंदू बने निशाना

अब असली घटनाक्रम पर एक नजर डालते हैं। जिसमें 17 मार्च 2025 की शाम को नागपुर में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़की। अफवाह फैली कि हिंदुओं ने कुरान जलाई। इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं और पुलिस पर हमला कर दिया। भालदरपुरा इलाके में एक महिला पुलिसकर्मी के साथ बदसलूकी हुई, उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश की गई। पुलिस ने 84 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें मास्टरमाइंड फहीम शमीम खान भी शामिल है। फहीम माइनॉरिटी डेमोक्रेटिक पार्टी का शहर अध्यक्ष है और उसने 500 से ज्यादा दंगाइयों को इकट्ठा किया था।

महाराष्ट्र पुलिस को पता चला कि बांग्लादेश से सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाई गईं। 97 अकाउंट्स मिले, जिनमें ज्यादातर बांग्लादेशी आईपी से पोस्ट किए गए थे। स्थानीय हिंदुओं ने बताया कि मुस्लिम दंगाइयों ने उनके घरों पर तुलसी के गमले फेंके। एक चश्मदीद ने कहा कि वो गालियाँ दे रहे थे और भड़काऊ नारे लगा रहे थे। दंगाइयों ने हिंदुओं की गाड़ियों को निशाना बनाया, जिनमें स्वास्तिक या हिंदू देवताओं की तस्वीरें थीं।

कई गवाहों ने बताया कि मुस्लिम दंगाइयों ने पेट्रोल बम, तलवारें और बोतलें इस्तेमाल कीं। उनके चेहरे ढके हुए थे। उन्होंने बच्चों पर भी पत्थर फेंके और आसपास के लोगों और संपत्ति पर अंधाधुंध हमला किया। लेकिन मुस्लिम घरों या गाड़ियों को छुआ तक नहीं। ये साफ था कि ये हमला सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ था। फिर भी पश्चिमी मीडिया ने इसे हिंदुओं की गलती बता दिया।

पश्चिमी मीडिया ने इस हिंसा को गलत तरीके से पेश किया। उसने हिंदुओं की माँग और फिल्म ‘छावा’ को हिंसा का कारण बताया, जबकि ये इस्लामिक कट्टरपंथियों की साजिश थी। वो हिंदुओं को आक्रामक और मुस्लिम भीड़ को पीड़ित दिखाना चाहते हैं। ये पक्षपाती रिपोर्टिंग इस्लामिक हिंसा को सही ठहराती है और हिंदुओं को चुप रहने की नसीहत देती है। ये लोग कह रहे हैं कि अगर हिंदुओं ने अपनी कहानी न सुनाई होती, तो ये हिंसा न होती।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट को विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

जिस कंपनी ने बैंकों को लगाई ₹900 करोड़ की चपत, उसके गैर-कार्यकारी डायरेक्टर थे जस्टिस यशवंत वर्मा: CBI-ED की FIR में था नाम, सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाते हुए कहा था- जाँच की जरूरत नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास में नोटों से भरे बोरों में आग लगने का वीडियो सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। इसके साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने अपनी जाँच में इसकी गहन जाँच की सिफारिश की है। इसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय कमिटी बनाई है।

इससे पहले जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) की FIR और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ECIR में भी आ चुका है। जिस समय उनका नाम इन केंद्रीय एजेंसियों की फाइलों आरोपित बनाया गया था, उससे लगभग चार साल पहले यानी 2014 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज बन गए थे। जज बनने के बाद होने सिंभावली शुगर्स मिल नाम की एक कंपनी में गैर-कार्यकारी निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया था।

हालाँकि, पिछले साल यानी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई से जाँच कराने के फैसले को खारिज कर दिया था। सीबीआई से जाँच कराने का आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया था। सिंभावली शुगर्स के खिलाफ केंद्रीय एजेंसी सीबीआई ने साल 2018 में मामला दर्ज किया था। एफआईआर में जस्टिस वर्मा को फरवरी 2012 में सिंभावली शुगर्स में एक गैर-कार्यकारी निदेशक बताया गया था।

करोड़ों रुपए का गबन करने वाली कंपनी के नन-एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर थे जस्टिस वर्मा

एजेंसी ने उन्हें आरोपित नंबर-10 बनाया था। इस मामले में सभी आरोपितों के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया है। कंपनी ने 900 करोड़ का लोन लिया था। यह FIR ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (अब पंजाब नेशनल बैंक का हिस्सा) ने शुगर मिल के खिलाफ दर्ज कराई थी। कंपनी ने किसानों को कृषि उपकरण आदि देने के नाम पर इस बैंक से लगभग 150 करोड़ रुपए ऋण लिया था। वहीं, कुल 7 बैंकों से 900 करोड़ रुपए लोन लिया था।

सीबीआई द्वारा दर्ज FIR की कॉपी, जिसमें 10वें नंबर पर जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम है (साभार: न्यूज 18)

बैंक की शिकायत के अनुसार, जनवरी से मार्च 2012 के बीच ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स की हापुड़ शाखा ने 5,762 किसानों को कृषि उपकरण, खाद और बीज खरीदने में मदद करने के लिए 148.59 करोड़ रुपए वितरित किए थे। समझौते के तहत किसानों के व्यक्तिगत खातों में वितरित किए जाने से पहले धनराशि को एस्क्रो खाते में स्थानांतरित किया जाना था।

समझौते के तहत सिंभावली शुगर मिल्स ने ऋण चुकाने और किसानों द्वारा किसी भी चूक या पहचान मे धोखाधड़ी को कवर करने की गारंटी ली थी। कंपनी ने कथित तौर पर फर्जी ‘नो योर कस्टमर (KYC)’ दस्तावेज जमा किए और धन का गबन किया। मार्च 2015 तक बैंक ने लोन को धोखाधड़ी घोषित कर दिया। इसमें कुल 97.85 करोड़ रुपए गबन और 109.08 करोड़ रुपए की बकाया राशि शामिल थी।

FIR में जस्टिस वर्मा का भी नाम

इसके साथ बैंक ने 13 मई 2015 को इसकी सूचना केंद्रीय रिजर्व बैंक (RBI) को भी दे दी। इस मामले में CBI ने 12 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, जिनमें से एक वर्तमान जस्टिस यशवंत वर्मा भी एक थे। एफआईआर में नामजद एक और प्रमुख व्यक्ति गुरपाल सिंह था। वह कंपनी का उप प्रबंध निदेशक और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का दामाद था।

CBI द्वारा एफआईआर दर्ज करने के पाँच दिन बाद प्रवर्तन निदेशालय ने भी 27 फरवरी 2018 को लखनऊ के ED पुलिस स्टेशन में धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 की धारा 3/4 के तहत शिकायत दर्ज की। दिसंबर 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऋण वितरण से जुड़े 7 बैंकों की नए सिरे से सीबीआई जाँच का आदेश दिए। अदालत ने कहा कि धोखाधड़ी ने न्यायपालिका की ‘अंतरात्मा को झकझोर दिया है’।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने CBI से कहा था कि 7 बैंकों ने सिंभावली शुगर्स को ऋण क्यों दिए, जबकि उन्हें पता था कि कंपनी का लोन नहीं चुकाने का इतिहास रहा है। हाई कोर्ट ने पाया कि कई बैंक अधिकारियों ने 900 करोड़ रुपए के ऋण पास करने में सिंभावली शुगर मिल्स के साथ मिलीभगत की थी। कोर्ट ने कहा था कि ओरिएंटल बैंक ही एकमात्र बैंक था जिसने केंद्रीय एजेंसियों से संपर्क किया।

अपने आदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, “बैंक अधिकारियों ने आरबीआई के दिशा-निर्देशों और परिपत्रों की पूरी तरह से अनदेखी की। हम सीबीआई को निर्देश देते हैं कि वह जाँच करे कि किन अधिकारियों ने इन ऋणों को मंजूरी दी, बोर्ड या ऋण समिति के किन सदस्यों ने वितरण में मदद की और किन अधिकारियों ने गबन को बिना रोक-टोक जारी रहने दिया।”

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर कार्रवाई करते हुए सीबीआई ने फरवरी 2024 में एक नई जाँच शुरू की। इस जाँच का उद्देश्य यह पता लगाना था कि बैंक 2009 से 2017 के बीच सिंभावली शुगर मिल्स को ऋण क्यों देते रहे, जबकि यह कंपनी ऋण डिफॉल्टर थी। जाँच में कंपनी, उसके निदेशकों और अज्ञात बैंक अधिकारियों का नाम शामिल किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का CBI जाँच को रोका

मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जाँच को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में सीबीआई जाँच का आदेश देकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गलती की है, क्योंकि इसमें जाँच की कोई जरूरत नहीं थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों को कानून के मुताबिक धोखाधड़ी के लिए कार्रवाई करने से नहीं रोका गया है।

सूत्रों के हवाले से न्यूज 18 ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एफआईआर दर्ज होने के कुछ समय बाद ही सीबीआई ने यशवंत वर्मा का नाम उस एफआईआर से हटा दिया था। इसके बाद इस केंद्रीय एजेंसी ने कोर्ट को बता भी दिया था कि जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम FIR से हटाया जा रहा है। हालाँकि, साल 2014 में जब उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट का अतिरिक्त जज बनाया गया तो उन्हें शुगर मिल कंपनी से इस्तीफा दे दिया था।

जस्टिस वर्मा ने कई कंपनियों से जुड़े मामलों का निपटारा किया

ये वही जस्टिस यशवंत वर्मा हैं, जिन्होंने एक मामले में ED की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। साल 2023 में उन्होंने एक फैसला सुनाया था कि संघीय एजेंसी ED मनी लॉन्ड्रिंग के अलावा किसी अन्य अपराध की जाँच नहीं कर सकती है और वह यह नहीं मान सकती है कि इसमें कोई अंतर्निहित अपराध है। यह मामला प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड से जुड़े एक मामले से संबंधित था।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने 24 जनवरी 2023 को प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा दायर एक मामले में फैसला सुनाया था। दरअसल, प्रकाश इंडस्ट्रीज नवंबर 2018 में ED के कुर्की के एक आदेश के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट पहुँचा था। इस मामले की सुनवाई वर्तमान में जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ द्वारा की जा रही है।

जस्टिस यशवंत वर्मा 11 अक्टूबर 2021 को दिल्ली हाई कोर्ट में नियुक्त हुए थे। इसके बाद उन्होंने फरवरी 2022 तक सार्वजनिक परिसर (अधिनियम) और भूमि अधिग्रहण मामलों से निपटने वाली पीठ की अध्यक्षता की। मार्च 2022 से नवंबर 2022 तक उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में विविध रोस्टर रखा और इसमें RTI, दिल्ली परिवहन निगम और खेल से संबंधित कई मामलों का निपटारा किया।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने नवंबर 2022 से जुलाई 2023 तक मध्यस्थता मामलों को निपटाया। उन्होंने हाई कोर्ट के विविध रोस्टर का नेतृत्व किया। इसके तहत उन्होंने जनवरी 2023 में नेटफ्लिक्स के पक्ष में फैसला सुनाया था। वहीं, साल 1997 में हुए उपहार सिनेमा कांड पर आधारित फिल्म ‘ट्रायल बाय फायर’ की रिलीज़ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

जुलाई 2023 से उन्होंने आयकर अपील, प्रत्यक्ष कर, सेवा कर और केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच की अध्यक्षता की। मार्च 2024 में उन्होंने आयकर विभाग द्वारा कॉन्ग्रेस को 2018-19 के लिए 105 करोड़ रुपए के बकाया कर की वसूली के लिए जारी नोटिस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

इस साल जनवरी में जस्टिस वर्मा ने माना कि दक्षिण कोरिया स्थित सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी सैमसंग इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स प्राइवेट लिमिटेड भारत में कर का भुगतान करने के योग्य नहीं है। एक महीने बाद उन्होंने कार निर्माता मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के खिलाफ आयकर विभाग द्वारा जारी 2,000 करोड़ रुपए के पुनर्मूल्यांकन नोटिस को रद्द कर दिया था।

जस्टिस वर्मा ने ऑक्सफैम इंडिया और केयर इंडिया जैसे गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े कई मामलों में भी फैसला सुनाया था। जनवरी 2024 में उन्होंने ऑक्सफैम इंडिया और केयर इंडिया की कर छूट की स्थिति को रद्द करने वाले आयकर विभाग द्वारा पारित आदेश पर रोक लगा दी थी। वहीं, फरवरी 2025 में उन्होंने समाचार पोर्टल न्यूज़ क्लिक द्वारा दायर एक याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था।

न्यूज क्लिक ने अपनी याचिका में आयकर विभाग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे 2 मार्च को या उससे पहले बकाया कर के रूप में 19 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। अपने कार्यकाल के दौरान वह दिल्ली हाई कोर्ट के मूल पक्ष के प्रभारी न्यायाधीश भी थे। जस्टिस वर्मा का अब तक का 22 का करियर रहा है। अभी 5 साल 9 महीना उनका कार्यकाल बाकी है।

तिरुमाला मंदिर में सिर्फ हिंदू करेंगे काम, गैर-हिंदुओं का ट्रांसफर: आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू सरकार ने फैसले पर किया अमल, हर राज्य की राजधानी में बनेंगे भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने कहा है कि तिरुमाला के भगवान श्री वेंकटेश्वर मंदिर में सिर्फ हिंदुओं को ही काम करना चाहिए। जो कर्मचारी दूसरे धर्मों में आस्था रखते हैं, उन्हें सम्मान के साथ दूसरी जगह ट्रांसफर किया जाएगा। ये बातें उन्होंने अपने नाती एन देवांश नायडू के जन्मदिन पर मंदिर दर्शन के दौरान कही।

बता दें कि कुछ महीने पहले ही तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) बोर्ड ने 18 कर्मचारियों को ‘गैर-हिंदू धार्मिक गतिविधियों’ में हिस्सा लेने के कारण ट्रांसफर कर दिया था। नायडू ने कहा, “अगर ईसाई या मुस्लिम भाई-बहन हिंदू जगहों पर काम नहीं करना चाहते, तो उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें दूसरी जगह भेजा जाएगा।”

नायडू ने ये भी ऐलान किया कि तिरुपति में 35 एकड़ जमीन पर होटल बनाने का फैसला रद्द कर दिया गया है। ये जमीन पिछले वाईएसआर कॉन्ग्रेस सरकार ने देवलोक, एमआरकेआर और मुमताज बिल्डर्स को दी थी। उनका कहना है कि ये कदम मंदिर की पवित्रता बचाने के लिए उठाया गया, क्योंकि लग्जरी होटलों के खिलाफ लोगों ने सख्त विरोध जताया था। इसके अलावा उन्होंने बताया कि राज्य के कई गाँवों में लोग अपने यहाँ वेंकटेश्वर मंदिर चाहते हैं। इसके लिए एक ट्रस्ट बनाया जाएगा, जो फंड जुटाएगा। नायडू ने कहा, “एनटी रामाराव के समय अन्न दानम शुरू हुआ था, अब प्राण दानम शुरू किया गया है। तीसरे कदम के तौर पर मंदिर बनाएँगे।”

मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने देश भर की राजधानियों में भी भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर बनाने का प्लान बताया। इसके लिए सभी मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी जाएगी। 1 फरवरी को ट्रांसफर हुए 18 कर्मचारियों में 6 टीटीडी के स्कूलों के टीचर थे। बाकी में एक डिप्टी एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (वेलफेयर), असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, असिस्टेंट टेक्निकल ऑफिसर (इलेक्ट्रिकल), हॉस्टल वर्कर, दो इलेक्ट्रीशियन और दो नर्स शामिल थे।

टीटीडी के एक अधिकारी ने कहा, “सभी को उनकी सहमति से दूसरी जगह भेजा गया। अब तिरुमाला में गैर-हिंदू कर्मचारी नहीं हैं।” ये फैसला टीटीडी बोर्ड की उस बैठक के बाद लिया गया, जिसमें गैर-हिंदुओं को ट्रांसफर करने और राजनीतिक बयानों पर रोक लगाने की बात हुई थी। नायडू का ये कदम भक्तों की भावनाओं और मंदिर की परंपराओं को ध्यान में रखकर लिया गया है।

जस्टिस वर्मा के घर नहीं मिला कैश- यह बात दिल्ली के फायर चीफ ने कभी नहीं कही, फिर भी मीडिया ने चलाया: सुप्रीम कोर्ट के वकील जेठमलानी फेक न्यूज को लेकर PTI पर बरसे

दिल्ली हाई कोर्ट जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिले भारी मात्रा में नकदी को लेकर चीफ फायर ऑफिसर अतुल गर्ग ने मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया है। गर्ग ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि आग बुझाने के दौरान दमकलकर्मियों को जस्टिस वर्मा के घर कोई नकदी नहीं मिली। दरअसल, अतुल गर्ग के हवाले से न्यूज एजेंसी PTI ने यह रिपोर्ट की थी। इसके बाद कई मीडिया हाउस ने मीडिया रिपोर्ट की थी।

न्यूज एजेंसी IANS से बात करते हुए अतुल गर्ग ने कहा कि उन्होंने कभी किसी मीडिया आउटलेट को यह नहीं बताया कि दमकलकर्मियों ने घटनास्थल पर कोई नकदी नहीं मिलने की सूचना दी थी। जब अतुल गर्ग से पूछा गया कि मीडिया रिपोर्ट में उनका नाम क्यों लिया गया उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता क्यों लिया गया।” गर्ग ने कहा कि उन्होंने पहले ही खबर चलाने वाले मीडिया हाउस को स्पष्टीकरण भेज दिया है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने इन खबरों पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया साइट X पर बयान दिया है। उन्होंने कहा, “दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर से भारी मात्रा में नकदी जब्त किए जाने के बेहद घिनौने मामले में नया मोड़ आया है। कल पीटीआई ने खबर दी थी कि चीफ फायर ऑफिसर अतुल गर्ग ने जज के घर से किसी भी तरह की नकदी जब्त किए जाने से इनकार किया है।”

अपनी पोस्ट में उन्होंने आगे कहा, “आज गर्ग ने इस तरह का बयान देने से इनकार किया है! उनके इनकार के आलोक में पीटीआई की रिपोर्ट फर्जी थी। फर्जी खबर का स्रोत कोई भी हो, वह स्पष्ट रूप से जब्ती की सच्चाई को कमतर आँकने की कोशिश कर रहा था। पीटीआई को यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि उसकी रिपोर्ट का स्रोत कौन था, क्योंकि इससे न्याय और सच्चाई, दोनों को बाधित करने की कोशिश करने वालों की पहचान उजागर हो जाएगी।”

बता दें कि इससे पहले PTI और उसके हवाले से कुछ मीडिया हाउस ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अतुल गर्ग ने कहा था, “दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास पर आग बुझाने के अभियान के दौरान अग्निशमन कर्मियों को कोई नकदी नहीं मिली।” अग्निशमन दल ने 14 मार्च को आग बुझाने के बाद पुलिस को घटना के संबंध में सूचित किया था।

गौरतलब है कि होली की छुट्टी में जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में आग लग गई थी। उस समय जस्टिस वर्मा शहर से बाहर गए हुए थे। परिजनों ने आग को बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड को सूचित किया था। अग्निशमन कर्मियों ने आग पर काबू भी पा लिया। राहत एवं बचाव के दौरान अग्निशमन कर्मियों ने एक कमरे में भारी मात्रा में रखी गई नकदी देखी। कहा गया था कि आग भी इस नकदी में ही लगी थी।

इस मामले का संज्ञान लेते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय को रिपोर्ट देने के लिए कहा था। जस्टिस उपाध्याय ने इस मामले में अपनी रिपोर्ट CJI को सौंप दी है और मामले की गहन जाँच कराने की जरूरत बताई है। वहीं, जस्टिस वर्मा ने इसे अपने खिलाफ साजिश बताया है। रिपोर्ट मिलने के बाद CJI ने आंतरिक जाँच के लिए 3 जजों की एक समिति बनाई है।

‘हम तुझे छोड़ेंगे नहीं, तू हमें बहुत अच्छी लगती’: मुस्लिम युवकों ने हिंदू नाबालिग को दबोचा-प्राइवेट पार्ट छुए, शिकायत करने आया पीड़ित परिवार तो खौलता तेल डाल की पिटाई

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में नाबालिग दलित लड़की के साथ मुस्लिमों ने छेड़छाड़ की और विरोध करने पर पूरे परिवार को जमकर मारा पीटा, जिसका वीडियो वायरल हो रहा है। इस घटना के बाद पूरे इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैल गया। पुलिस ने मोनीश, आरिश, शहजाद, वसीम, सलमान, समीर, परवेज, आशु उर्फ बहल, कासिम, नाजिम के साथ अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया है।

जानकारी के मुताबिक, ये मामला मुजफ्फरनगर के चरथावल थाना क्षेत्र का है। जहाँ गुरुवार (20 मार्च 2025) को मोहल्ला तिरगारन में रहने वाली एक नाबालिग दलित लड़की अपने घर के बाहर रैकेट (बैडमिंटन) खेल रही थी, तभी बाइक सवार मोनीश और आरिश वहाँ पहुँचे और उसके साथ छेड़छाड़ की। लड़की ने बताया, “मैं गली में खेल रही थी, तभी पीछे से बाइक पर आए इन लड़कों ने मेरे कंधे पर मारा और गंदी बातें कहीं। मैं चिल्लाई, मेरी बहन ने भी देखा और शोर मचाया।” शोर सुनकर लड़की के पिता, भाई और चाचा नीचे आए, लेकिन तब तक मोनीश और आरिश गाली देकर भाग गए।

इसके बाद पीड़ित परिवार ने हिम्मत जुटाकर आरोपितों की हलवा-परांठे की दुकान पर शिकायत करने का फैसला किया। लेकिन वहाँ पहुँचते ही मामला और बिगड़ गया। आरोपितों ने अपने परिवार के साथ मिलकर पीड़ित लड़की और उसके परिवार पर उबलता हुआ तेल डाल दिया और लाठी-डंडों से मारपीट शुरू कर दी। लड़की ने बताया, “उन्होंने लाइट ऑफ कर दिया और 25-30 लोगों ने हम पर हमला कर दिया। मेरे पापा, भाई और चाचा को बहुत चोटें आईं।” इस दौरान दोनों पक्षों के बीच जमकर पथराव हुआ, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में चीख-पुकार और अंधेरे में लाठी-डंडे चलते साफ दिख रहे हैं।

यह मामला हिंदू समुदाय की नाबालिग बेटी के साथ मुस्लिम समुदाय के परिवार द्वारा उत्पीड़न का है, जिसके बाद दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया। स्थानीय लोगों में डर का माहौल है। पीड़ित परिवार ने पहले पुलिस स्टेशन में शिकायत की, लेकिन शुरुआत में उनकी सुनवाई नहीं हुई। बाद में जब वीडियो वायरल हुआ, तो पुलिस हरकत में आई। चरथावल थाने में 21 मार्च 2025 को 00:45 बजे एफआईआर दर्ज की गई। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

एफआईआर में पीड़ित के पिता ने लिखा है कि मोशीन और आरिश ने बेटी के कंधे पर हाथ डाला और कहा – “हम तुझे छोड़ेंगे नहीं, तू हमें बहुत अच्छी लगती है।” उन्होंने लड़की के प्राइवेट पार्ट को भी छुआ, जिसके बाद लड़की बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर घर पहुंची और पिता को सूचना दी। इसके बाद उन पर हमला किया गया। यही नहीं, हमलावरों ने ‘खाटी$#@’ शब्द कहते हुए गंदी-गंदी गालियाँ भी दी और धारदार हथियारों जैसे काचू, छुरी, लाठी, डंडे और गर्म तेल का छिड़काव करते हुए जान से मारने की नीयत से मारपीट की।

एफआईआर में 11 नामजद आरोपितों – मोनीश, आरिश, शहजाद, वसीम, सलमान, समीर, परवेज, आशु उर्फ बहल, कासिम, नाजिम और अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 191(2), 191(3), 190, 125, 74, 115(2), 352, 351(3), और पॉक्सो एक्ट की धारा 3, 4, साथ ही अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(1)(ए) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

पुलिस ने शनिवार (22 मार्च 2025) को एक नामजद आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। सीओ सदर देवव्रत वाजपेई ने कहा, “वीडियो वायरल होने के बाद हमने तुरंत केस दर्ज किया। एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है, बाकियों की गिरफ्तारी जल्द होगी।” भारी पुलिस बल तैनात कर स्थिति को नियंत्रित किया गया, लेकिन इलाके में तनाव बरकरार है।

दिशा सालियान केस में मीडिया के सामने आदित्य का नाम मत लेना: उद्धव ठाकरे ने CM रहते 2 बार किया था कॉल, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री का दावा- बेटे को बचाने की गुजारिश की थी

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर दिशा सालियान की मौत मामले में भारतीय जनता पार्टी के सांसद व पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने चौंकाने वाला दावा किया है। उनका कहना है कि उद्धव ठाकरे ने साल 2020 में कोविड के दौरान उन्हें दो बार कॉल करके अनुरोध किया था कि वो प्रेस के सामने उनके बेटे आदित्य ठाकरे का नाम न लें।

उन्होंने बताया, “दिशा सालियान के पिता हाई कोर्ट इसलिए गए क्योंकि उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है। उनके पिता को लगता है कि पुलिस उन्हें न्याय नहीं दिला पाई तो वो हाई कोर्ट चले गए।”

वह बोले,

“उद्धव ठाकरे का पीए, जो अब विधायक है उसने तब मुझे कॉल किया था। कहा था कि उद्धव ठाकरे मुझसे बात करना चाहते हैं… उसने पूछा था- ‘क्या आप बात करेंगे?’ , तब मैंने कहा था- ‘उन्हें फोन दो, मैं बात करूँगा’… इसके बाद ठाकरे ने फोन लिया और कहा- ‘जय महाराष्ट्र’ और मुझसे पूछा कि क्या मैं अब भी जय महाराष्ट्र कहता हूँ? इस पर मैंने जवाब दिया- मैं हमेशा ही जय महाराष्ट्र कहूँगा जब तक मैं मर नहीं जाता। जय महाराष्ट्र कोई ‘मातोश्री’ की प्रॉपर्टी नहीं है। ये छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रॉपर्टी है।”

इसी के बाद राणे ने दावा किया कि ठाकरे ने उनसे अनुरोध किया था कि वो कॉन्फ्रेंस में आदित्य का नाम न लें। अब जो एफआईआर हुई है वो सबूतों के आधार पर हुई।

दिशा सालियान के पिता पहुँचे हाई कोर्ट

गौरतलब है कि पिछले दिनों दिशा सालियान के पिता हाईकोर्ट के जाने के कारण ये केस दोबारा से चर्चा में आया था। उन्होंने अपनी याचिका में माँग उठाई कि शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो और पूरा मामला सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया जाए। उन्होंने याचिका में आरोप लगाया था दिशा सालियान की रेप के बाद हत्या हुई थी और बाद में कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों को बचाने के लिए इस मामले में साजिश रची गई।

नोटों से भरे अधजले बोरे, 25 पन्नों की रिपोर्ट, कोर्ट के काम से छुट्टी… जस्टिस यशवंत वर्मा के घर का सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया Video, जाँच के लिए 3 जजों की समिति CJI ने बनाई

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (22 मार्च 2025) को दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर मिले बेहिसाब नोटों का फोटो और वीडियो अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया। वीडियो में नकदी से भरे हुए बोरे जले दिखाई देते हैं। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की जाँच रिपोर्ट और आरोपित जस्टिस यशवंत वर्मा के जवाब को भी अपलोड किया गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने जाँच के लिए 3 सदस्यीय कमिटी गठित की है।

दरअसल, होली की छुट्टी में जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में आग लग गई थी। उस समय जस्टिस वर्मा शहर से बाहर गए हुए थे। परिजनों ने आग को बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड को सूचित किया था। अग्निशमन कर्मियों ने आग पर काबू भी पा लिया। राहत एवं बचाव के दौरान अग्निशमन कर्मियों ने एक कमरे में भारी मात्रा में रखी गई नकदी देखी। कहा जा रहा है कि आग भी इस नकदी में ही लगी थी।

जस्टिस उपाध्याय की जाँच रिपोर्ट में क्या है?

दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय द्वारा दी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि यह घटना 14 मार्च की रात 11:30 बजे स्टोर रूम में हुई थी। स्टोर रूम में जस्टिस वर्मा के बंगले में रहने वालों के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति को जाने की अनुमति नहीं थी। घटना के अगले दिन 15 मार्च को शाम करीब 4:50 बजे दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने आग के बारे दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को सूचित किया।

इसके बाद मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के साथ घटनास्थल का दौरा किया और वहाँ जस्टिस वर्मा से भी मुलाकात की। इस दौरे के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई। जस्टिस उपाध्याय को दिल्ली पुलिस कमिश्नर से पता चला कि आग के बारे में पीसीआर कॉल जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने की थी। जस्टिस वर्मा के नौकरों ने इस आग के बारे में उन्हें जानकारी दी थी।

जस्टिस उपाध्याय ने इस घटना के बारे में CJI संजीव खन्ना को बताया और उसके अगले दिन 16 मार्च को जस्टिस वर्मा से बात की। जस्टिस वर्मा ने जवाब देते हुए कहा कि उस कमरे में नौकर, माली और कभी-कभी सीपीडब्ल्यूडी कर्मी रहते थे। जब मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें पुलिस आयुक्त द्वारा भेजी गई व्हाट्सएप तस्वीरें दिखाईं तो न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने खिलाफ किसी साजिश की आशंका व्यक्त की।

CJI संजीव खन्ना द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस उपाध्याय को लिखा गया पत्र (साभार: लाइव लॉ)

इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को 25 पन्नों की अपनी रिपोर्ट भेज दी। इस रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि मामले की गहन जाँच की जरूरत है। रिपोर्ट मिलते ही CJI खन्ना ने 21 मार्च को जस्टिस उपाध्याय से कहा कि वे जस्टिस वर्मा से इस अघोषित नकदी के स्रोत और जली हुई नकदी को हटाने वाले व्यक्ति के बारे में जवाब माँगे।

इसके साथ ही उन्होंने जस्टिस उपाध्याय से कहा कि वे जस्टिस वर्मा को कहें कि वे अपने फोन को नष्ट या फेंके नहीं और ना ही अपने मोबाइल फोन से कोई भी मोबाइल नंबर, मैसेज या डेटा डिलीट करें। जस्टिस उपाध्याय ने CJI के इन निर्देश को जस्टिस वर्मा के पास पहुँचा दिया। हालाँकि, जस्टिस वर्मा ने अघोषित भारी नकदी से संबंधित सभी आरोपों से इनकार कर दिया।

जस्टिस वर्मा ने आरोपों से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए गए जस्टिस वर्मा के जवाब में इन आरोपों से इनकार किया गया है। जस्टिस वर्मा ने अपने जवाब में कहा कि जिस कमरे में आग लगी थी, वह उनका आधिकारिक आवास का कमरा नहीं है। यह स्टोररूम है और मुख्य आवास से अलग है। उन्होंने स्टोर रूम में किसी भी तरह की और कभी भी नकदी रखे जाने की बात से भी साफ इनकार किया है।

उन्होंने कहा, “जब आधी रात के आसपास आग लगी तो मेरी बेटी और मेरे निजी सचिव ने अग्निशमन सेवा को सूचित किया और उनकी कॉल विधिवत दर्ज की गई। आग बुझाने के दौरान सुरक्षा चिंताओं के कारण सभी कर्मचारियों और मेरे घर के सदस्यों को घटनास्थल से दूर जाने के लिए कहा गया। आग बुझने के बाद और जब वे घटनास्थल पर वापस आए तो मौके पर कोई नकदी या मुद्रा नहीं मिली।”

जस्टिस वर्मा ने अपने जवाब में कहा, “मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि मेरे या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा उस स्टोर रूम में कभी भी कोई नकदी नहीं रखी गई थी। यह नकदी हमारे द्वारा रखी जाने की बात बेतुका है। कोई व्यक्ति स्टाफ क्वार्टर के पास एक खुले, आसानी से सुलभ और आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले स्टोर रूम में नकदी रखेगा, अविश्वसनीय लगता है।”

दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने इन आरोपों से इनकार करते हुए अपने जवाब में आगे कहा, “यह एक ऐसा कमरा है जो मेरे रहने के क्षेत्र से पूरी तरह से अलग है और एक चारदीवारी मेरे रहने के क्षेत्र को उस आउटहाउस से अलग करती है। मैं केवल यही चाहता हूँ कि मीडिया ने मुझ पर अभियोग लगाने और प्रेस में बदनाम होने से पहले कुछ जाँच की होती।”

सुप्रीम कोर्ट ने गठित की जाँच कमिटी

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा के जवाब की जाँच करने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

CJI संजीव खन्ना ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय से यह भी कहा है कि वे जस्टिस यशवंत वर्मा को कोई भी न्यायिक कार्य ना सौंपें। बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा को तत्काल इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने का आदेश दिया था। हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट के बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया कहा कि इसे कूड़ेदान ना समझा जाए।

न्यूज 18 के अनुसार, CJI को रिपोर्ट सौंपने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने दिल्ली अग्निशमन सेवा के अधिकारियों, पुलिस के शीर्ष अधिकारियों और सुप्रीम कोर्ट के सतर्कता विभाग के अधिकारियों से मुलाकात की। जस्टिस उपाध्याय ने इन अधिकारियों से मिलने की जरूरत को लेकर CJI को भी अवगत कराया। ये मुलाकात करीब एक घंटे तक चली थी।

तोप से डरे न तलवार से, 80 घाव लेकर भी खड़े रहे बाबर के खिलाफ मैदान में: सपा सांसद ने जिन ‘राणा सांगा’ को बताया ‘गद्दार’, उनके बारे में जानते ही क्या हैं आप

उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने राणा सांगा के नाम से विख्यात महाराणा संग्राम सिंह को गद्दार बताकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। शनिवार (22 मार्च) को राज्यसभा में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इब्राहिम लोदी को हराने के लिए राणा सांगा ने ही बाबर को बुलाया था। उन्होंने हिंदुओं को ‘गद्दार’ राणा सांगा की औलाद बताया। अब सवाल है कि इतिहास इस को लेकर क्या कहता है।

नफरत करने वाले लोग अक्सर ये दावा करते हैं कि दिल्ली तत्कालीन सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराने के लिए राणा सांगा ने बाबर को भारत बुलाया था। हालाँकि, यह सच है कि राणा सांगा इब्राहिम लोदी को पहले ही बार-बार हरा चुके थे। इसके अलावा उन्होंने गुजरात और मालवा के सुल्तानों की सेना को कई बार अलग-अलग हराने के बाद दोनों की संयुक्त सेना तक को हराया था। ऐसे में उन्हें किसी बाहरी के सहायता की क्या जरूरत थी?

सन 1508 में मेवाड़ के शासक बने महाराणा सांगा ने अपने जीवन में कुल 100 से अधिक लड़ाइयाँ लड़ीं, लेकिन खानवा के सिवाय किसी में भी उनकी हार नहीं हुई थी। यही कारण है कि उनके पराक्रम को देखते हुए उन्हें ‘हिंदूपत’ की उपाधि मिली थी। इन लड़ाइयों की वजह से उनका एक आँख नहीं था। एक हाथ नहीं था। एक पैर काम नहीं करता था। शरीर पर 80 से अधिक गंभीर घाव के निशान थे।

महाराणा संग्राम सिंह के शासन में मेवाड़ा की सीमाएँ दूर-दूर तक फैल गईं। मेवाड़ की सीमा पूर्व में आगरा (वर्तमान में उत्तर प्रदेश) और दक्षिण में गुजरात की सीमा तक पहुँच गई थीं। राजपूताना इतिहास के विद्वान कर्नल जेम्स टाड के अनुसार, महाराणा संग्राम सिंह के पास 80,000 घोड़े, 500 हाथी और करीब 2 लाख पैदल सैनिक सैनिक थे।

कर्नल जेम्स टॉड ने बताया है कि महाराणा संग्राम सिंह के पास ऊँचे दर्जे के सात राजा, 9 राव और 104 रावल थे। मारवाड़ और आम्बेर उन्हें सम्मान देते थे। ग्वालियर, अजमेर, सीकरी, रायसेन, कालपी, चंदेरी, बूंदी, गागरौन, रामपुरा और आबू के राजा उन्हें अपना अधिपति मानते थे। वहीं, हिंदू उन्हें अपना देवता मानते थे।

इब्राहिम लोदी को ही नहीं, मालवा-गुजरात के सुल्तानों को भी राणा सांगा ने हराया

राणा सांगा ने दिल्ली, मालवा और गुजरात के सुल्तानों के साथ 18 भीषण युद्ध लड़े और सबको हराया। उनके शासन काल में आधुनिक राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, गुजरात के उत्तरी हिस्से और पाकिस्तान स्थित अमरकोट सहित कुछ अन्य हिस्सों पर विजय प्राप्त करके अपने राज्य में मिला लिया था। सन 1305 ईस्वी में परमार साम्राज्य के पतन के बाद उन्होंने पहली बार मालवा में राजपूत सत्ता को दोबारा स्थापित किया।

दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के नेतृत्व वाले लोदी वंश और राणा सांगा के नेतृत्व वाले मेवाड़ साम्राज्य के बीच 1517 में खतोली की लड़ाई लड़ी गई थी। इस युद्ध में राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी को बुरी तरह हराया था। उसने दोबारा 1518-19 में हमला करके राणा सांगा से बदला लेने की कोशिश की, लेकिन राणा सांगा ने फिर से उसे राजस्थान के धौलपुर में बुरी तरह परास्त किया। इब्राहिम लोदी वहाँ से भाग गया।

इब्राहिम लोदी ने कई बार सांगा से युद्ध किया, लेकिन हर बार उसे हार का सामना करना पड़ा। इन युद्धों के कारण आधुनिक राजस्थान में इब्राहिम ने अपनी पूरी ज़मीन खो दी। वहीं, राणा सांगा ने अपना प्रभाव आगरा के पीलिया खार तक फैला दिया। 16वीं सदी की पांडुलिपि ‘पार्श्वनाथ-श्रवण-सत्तवीसी’ के अनुसार, राणा सांगा ने मंदसौर की घेराबंदी के ठीक बाद रणथंभौर में इब्राहिम लोदी को हराया।

सन 1517 और फिर सन 1519 में उन्होंने मालवा के शासक महमूद खिलजी द्वितीय को हराया। यह लड़ाई ईडर और गागरोन में हुई। उन्होंने महमूद को पकड़ कर 2 महीने तक बंधक बनाकर रखा। बाद में महमूद ने माफी माँगी और दोबारा हमले नहीं करने की कसम खाई तो राणा सांगा ने सनातन युद्ध नियमों का पालन करते हुए उसे छोड़ दिया। हालाँकि, बदले में महमूद के राज्य के एक बड़े हिस्से को अपने राज्य में मिला लिया।

सन 1520 में राणा सांगा ने इडर राज्य के निज़ाम खान की मुस्लिम सेना को हराया और उसे अहमदाबाद की ओर धकेल दिया। अहमदाबाद की राजधानी से 20 मील दूर राणा सांगा ने अपना आक्रमण रोक दिया। कई लड़ाइयों के बाद राणा सांगा ने सफलतापूर्वक उत्तरी गुजरात पर कब्ज़ा कर लिया और अपने एक जागीरदार को वहाँ का शासक बना दिया। हटेली में मालवा और गुजरात के सुल्तान की संयुक्त सेना को राणा सांगा ने हराया।

इसी तरह राणा सांगा ने मालवा के सुल्तान नासिरुद्दीन खिलजी को बुरी तरह हराया औऱ गागरोन, भीलसा, रायसेन, सारंगपुर, चंदेरी और रणथंभौर को अपने राज्य में मिला लिया। महाराणा सांगा ने अपने द्वारा जीते गए सभी राज्यों से मुस्लिमों द्वारा गैर-मुस्लिमों पर लगाए जाने वाले जजिया कर को खत्म कर दिया और उनके द्वारा बनवाए गए मस्जिद-मकबरों को ध्वस्त करवा दिया।

राणा सांगा ने बयाना के युद्ध में बाबर को बुरी तरह परास्त किया

बाबर ने पंजाब और सिंध पर जीत के बाद दिल्ली पर कब्जा करने की योजना बनाई। उसने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के खिलाफ हमला कर दिया। 21 अप्रैल 1526 ईस्वी में बाबर और इब्राहिम लोदी के खिलाफ हरियाणा के पानीपत में भयानक लड़ाई हुई। इस लड़ाई में बाबर जीत गया और उसने इब्राहिम लोदी की हत्या कर दी। इस तरह बाबर का प्रभाव कई क्षेत्रों पर फैल गया।

हालाँकि, चित्तौड़ में राणा सांगा और पूर्व में अफगान उसके लिए मुश्किल खड़ी कर रहे थे। राणा सांगा बाबर की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए तैयारी करने लगे। उन्होंने बाबर के अधिकार क्षेत्र वाले आगरा पर चढ़ाई की तैयारी शुरू की। बाबर को इसकी खबर लगी तो उसने अपने बेटे हुमायूँ को बुलाया और आगरा के बाहर धौलपुर, ग्वालियर और बयाना के मजबूत किले पड़ते थे।

बाबर ने पहले इन किलों को अपने अधिकार में लेने की योजना बनाई। वहीं, बयाना का किला पर निजाम खाँ के अधिकार में था। बाबर ने उससे समझौते की कोशिश की। बाद में निजाम खाँ बाबर की तरफ जा मिला। 21 फरवरी 1527 को बयाना में बाबर और राणा सांगा की सेना युद्ध के मैदान में आ गईं। इस युद्ध में बाबर की सेना की करारी हार हुई। वह वापस आगरा लौट गया।

इस युद्ध में बाबर महाराणा सांगा का साथ मारवाड़ के शासक राव गांगा के पुत्र मालदेव, चन्देरी के मेदिनी राय, मेड़ता के रायमल राठौड़, सिरोही के अखैराज दूदा, डूंगरपुर के रावल उदय सिंह, सलूम्बर के रावत रत नसिंह, सादड़ी के झाला अज्जा, गोगुन्दा का झाला सज्जा, उत्तर प्रदेश के चन्दावर क्षेत्र से चन्द्रभान सिंह, माणिकचन्द चौहान और मेहंदी ख्वाजा आदि वीरों ने दिया था।

स्कॉटिश इतिहासकार विलियम एर्स्किन ने लिखा है, बाबर ने राणा सांगा के पराक्रम में पहले से ही जानता था, लेकिन उसका सामना पहली बार बयाना के युद्ध में हुआ। उन्होंने लिखा है, “बयाना में मुगलों को अहसास हुआ कि उनका सामना अफगानों से कहीं भयंकर सेना के साथ हुआ है। राजपूत किसी भी वक्त जंग के मैदान में दो-दो हाथ करने के लिए तैयार रहते थे और जान देने से गुरेज नहीं करते हैं।”

इस युद्ध को लेकर बाबर ने खुद अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में लिखा, “काफिरों ने वो भयंकर युद्ध किया कि मुगल सेना का मनोबल टूट गया। वो घबरा गए थे।” इतिहासकार वीके कृष्णराव के अनुसार, राणा सांगा बाबर को एक आततायी और विदेशी आक्रांता मानते थे। वे दिल्ली और आगरा को जीतकर विदेशी आक्रांताओं का अंत करना चाहते थे।

खानवा का युद्ध और एक तीर ने बदली तकदीर

बयाना के भयानक हार से बाबर हतोत्साहित हो चला था। उसके सैनिक उससे वापस लौटने की बात करने लगे थे। हालाँकि, बाबर एक मौका और आजमाना चाहता था। उसने सेना में एकजुटता रखने के लिए इस्लाम का सहारा लिया। उसने राजपूतों का साथ देने वाले अफगानों को काफिर और गद्दार बताकर अपने साथ मिलाने की कोशिश की। इस्लाम के नाम पर उसने अपने सैनिकों में जोश भर दिया।

उसने अपने सैनिकों से कहा, “सरदारों और सिपाहियों, संसार में आने वाला प्रत्येक मनुष्य अवश्य मरता है। जब हम चले जाएँगे तब एक खुदा ही बाकी रहेगा। यहाँ बदनाम होकर जीने की से अच्छा इज्जत के साथ मरना अच्छा है। खुदा ने हम पर बड़ी मेहरबानी की है। इस जंग में मरेंगे तो ‘शहीद’ होंगे और जीतेंगे तो ‘गाजी’ कहलाएँगे। इसलिए कुरान हाथ में लेकर कसम खाना है कि जान रहते कोई जंग में पीठ नहीं दिखाएगा।”

उधर ‘मानवों का खंडहर’ कहलाने वाले राणा सांगा भी बाबर को अंतिम चोट देना चाहते थे। इसकी तैयारी उन्होंने शुरू कर दी। आखिरकार 16 मार्च 1527 के बाबर और राणा सांगा की सेना आगरा के 60 किलोमीटर पश्चिम में स्थित खानवा में आमने-सामने आ गईं। कहा जाता है कि राणा सांगा की सेना में 1 लाख सैनिक थे, जबकि बाबर के पास 80 हजार। सभी इतिहासकार इसमें एकमत हैं कि राणा सांगा की सेना बाबर से कहीं ज्यादा शक्तिशाली थी।

उस समय बाबर के बारूद से राजपूतों के तलवार से हो रहा था। यह पहली बार था, जब भारत बारूद, तोप और बंदूक देख रहा था। इतिहासकारों का मानना है कि अगर बाबर के पास तोपें नहीं होती तो राणा सांगा को हराना मुश्किल था। अपने पूर्वज बप्पा रावल की तरह की राणा सांगा ने भी हिंदू शासकों का गठबंधन बनाकर विदेशी हमलावरों का मुकाबला कर रहे थे।

इतिहासकार प्रदीप बरुआ लिखते हैं कि अगर बाबर ने तोपों की मदद नहीं ली होती और पानीपत वाली रणनीति न दोहराई होती तो शायद दिल्ली में मेवाड़ का केसरिया ध्वज फहरा रहा होता। इस युद्ध के बाद राणा सांगा द्वारा गठित हिंदुओं का गठबंधन हमेशा के लिए बिखर गया और अगले लगभग 250 सालों तक मुगलों का भारत में शासन रहा।

क्या राणा सांगा ने बाबर को बुलाया था?

इतिहासकारों का मानना है कि पंजाब के गवर्नर दौलत खान दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी की जगह लेना चाहता था। वह यह जानता था कि फरगना का शासक बाबर अफगानिस्तान को जीतते हुए भारत की ओर आ रहा है। वहीं, इब्राहिम लोदी का चाचा आलम खान भी सल्तनत पर कब्जा करना चाहता। वह बाबर को जानता था। आलम खान और दौलत खान ने बाबर को भारत आने का न्योता भेजा।

दरअसल, सन 1523 में बाबर को दिल्ली सल्तनत के प्रमुख लोगों ने भारत आने का निमंत्रण दिया था। इसमें सुल्तान सिकंदर लोदी का भाई आलम खान लोदी, पंजाब के गवर्नर दौलत खान लोदी और इब्राहिम लोदी के चाचा अलाउद्दीन लोदी शामिल था। ये लोग इब्राहिम लोदी के शासन को चुनौती देने के लिए उसकी मदद माँगी थी। आलम खान ने बाबर के दरबार में भी गया किया।

वहाँ आलम खान लोदी ने बाबर से भारत में राजनीतिक अस्थिरता के बारे में बताया था। इसके बाद बाबर ने पंजाब में अपने दूत को भेजा। अपने दूत की रिपोर्ट आलम खान की बात को सही बताया। इसके बाद बाबर हिंदुस्तान फतह करने का सपना देखने लगा। उसने भारत पर सन 1503, फिर 1504, उसके बाद 1518 और 1519 में हमला किया। हालाँकि, सफल नहीं हो पाया।

इसके बाद बाबर ने 1526 में इब्राहिम लोदी के खिलाफ हमला कर दिया। राणा सांगा कई बार के युद्ध में हराकर उसे पहले ही कमजोर कर चुके थे। इसके कारण पानीपत के इस युद्ध में बाबर ने इब्राहिम लोदी को बुरी तरह हराया और हिंदुस्तान की गद्दी पर कब्जा कर लिया। इससे पहले वह गद्दी हथियाने की कोशिश में लगा था, लेकिन उसे राणा संग्राम सिंह उर्फ राणा सांगा से भय था।

इतिहासकार इस बात से इनकार करते हैं कि राणा सांगा ने बाबर को इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बुलाया था। दरअसल, राणा सांगा उस समय के सबसे शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने राजपूताना (राजस्थान का पुराना नाम) के सभी शासकों को मिलाकर एक गठबंधन बना लिया था। उन्हें हराना नामुमकिन था। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान से लेकर शक्तिशाली गुजरात और मालवा के मुस्लिम शासकों को तक को हरा दिया था।

राणा सांगा ने इब्राहिम लोदी को बार-बार हराया था। यहाँ तक कि एक बार बाबर को भी बयाना के युद्ध में हराया। इसलिए यह कहना है कि राणा सांगा ने बाबर को इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बुलाने था, पूरी तरह से गलत है। बयाना के युद्ध में हार के बाद बाबर अपनी आत्मकथा बाबरनामा में खुद लिखा है, “हिंदुस्तान में राणा सांगा और दक्कन में कृष्णदेव राय से महान शासक कोई नहीं है।”

‘राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव’ नाम का पुस्तक लिखने वाले डॉक्टर मोहनलाल गुप्ता भी इससे सहमत नहीं है। उन्होंने लिखा है कि बाबर दिल्ली पर कब्जा करना चाहता था और वह इब्राहिम लोदी और राणा सांगा की शत्रुता से परिचित था। इसको देखते हुए बाबर ने राणा सांगा के पास एक दूत भेजा और कहा कि बाबर दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी से युद्ध करना चाहते हैं।

दूत ने राणा सांगा को बताया कि इसी वजह से बाबर ने उनके साथ संधि का पत्र भेजा है। अपनी पुस्तक में मोहनलाल गुप्त आगे लिखते हैं कि बाबर ने आगे लिखा कि वे दिल्ली पर आक्रमण करेगा। हालाँकि, अधिकांश इतिहासकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका मानना है कि उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा को किसी बाहरी के सहयोग की जरूरत नहीं थी।

जीएन शर्मा और गौरीशंकर हीराचंद ओझा जैसे कई इतिहासकारों का मानना है कि बाबर ने भारत पर आक्रमण करने की योजना पहले ही बना रखी थी। उसने पानीपत की पहली लड़ाई जीतने से पहले भारत पर आक्रमण का चार बार प्रयास कर चुका था, लेकिन जीत नहीं मिली थी। वह राणा सांगा के पराक्रम से परिचित था। वह चाहता था कि राणा सांगा हस्तक्षेप ना करें।

नागपुर हिंसा में हुआ जितना नुकसान, सबकी भरपाई दंगाइयों की संपत्ति से होगी: CM फडणवीस ने किया ऐलान, कहा- ‘बुलडोजर चलेगा, कोई (दंगाई) नहीं बचेगा’

नागपुर में औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग को लेकर भड़की हिंसा के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सख्त रुख अपनाया है। देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार (22 मार्च 2025) को कहा कि दंगों में हुए नुकसान की भरपाई दंगाइयों से ही होगी।

मुख्यमंत्री ने कहा, “जितना नुकसान हुआ, उसकी कीमत वसूल करेंगे। अगर पैसे नहीं दिए तो उनकी संपत्ति बेच दी जाएगी।” मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुलडोजर एक्शन पर सवाल उठने पर कहा, “महाराष्ट्र में अपने तरीके से कार्रवाई होगी, जहाँ जरूरत पड़ी, बुलडोजर चलेगा। किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि अब तक 104 आरोपितों की पहचान हो चुकी है। इनमें से 92 गिरफ्तार किए जा चुके हैं। पकड़े गए लोगों में 12 नाबालिग भी हैं। इस दौरान उन्होंने बताया कि नागपुर हिंसा को लेकर सोशल मीडिया से 68 भड़काऊ पोस्ट हटाई गईं और ऐसे लोगों को भी सह-अभियुक्त बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि हिंसा में मालेगाँव से कुछ पार्टियों के सपोर्ट की बात सामने आई है।

मुख्यमंत्री ने महिला पुलिसकर्मी से छेड़छाड़ के आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि उसके साथ छेड़छाड़ नहीं बल्कि उस पर पत्थरबाजी हुई। देवेंद्र फडणवीस ने दावा किया कि 80% नागपुर शांत है और कर्फ्यू धीरे-धीरे हटेगा। इस बीच, नए सीसीटीवी लगाने की तैयारी भी चल रही है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 मार्च को नागपुर की यात्रा पर आ रहे हैं और उनके कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया है। बता दें कि पीएम मोदी 30 मार्च 2025 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पहुँचेंगे।

इश बीच, नागपुर के डिप्टी कमिश्नर लोहित मतानी ने बताया कि माइनॉरिटीज डेमोक्रेटिक पार्टी के हामिद इंजीनियर और NNTV चलाने वाले मोहम्मद शहजाद को हिंसा भड़काने के आरोप में पकड़ा गया है।

पाकिस्तानी ‘क्रिकेटर’ ने अमेरिका में खरीदे तीन बल्ले, पैसे अब तक नहीं भिजवाए: पेमेंट की इंतजार में बैठा दुकानदार, नेटिजन्स ने बाबर आजम को रगड़ा

पाकिस्तानी क्रिकेट टीम एक बार फिर सुर्खियों में है। चैंपियंस ट्रॉफी और उससे पहले वेस्टइंडीज-अमेरिका में हुए टी-20 क्रिकेट विश्वकप में टीम का प्रदर्शन तो बेहद खराब रहा ही, लेकिन खिलाड़ियों का बर्ताव भी बेहद घटिया रहा। कभी पाकिस्तानी खिलाड़ियों द्वारा पैसे लेकर फैंस के साथ डिनर करने की बात सामने आई, तो अब खबर आ रही है कि एक पाकिस्तानी खिलाड़ी ने अमेरिका में 3 महँगे बैट खरीदे, लेकिन उसकी कीमत ही नहीं चुकाई। यही नहीं, अब स्टोर मैनेजर पैसों के लिए फोन करता है, तो उसके फोन-मैसेज का कोई जवाब भी नहीं दिया जाता।

बैट ले लिए, पैसे ही नहीं चुकाए और अब नहीं उठाता फोन

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2024 के टी20 वर्ल्ड कप के दौरान न्यू जर्सी के एक क्रिकेट स्टोर से एक पाकिस्तानी खिलाड़ी (नाम का खुलासा नहीं) ने तीन महँगे बैट खरीदे, लेकिन दुकानदार वहीद खान का दिल टूट गया जब उसे पैसे नहीं मिले। वहीद ने बताया कि उसने खिलाड़ी को कई बार फोन और मैसेज किए, मगर कोई जवाब नहीं आया। खास बात ये है कि अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य में स्थित स्टोर से न्यूयॉर्क तक ये बैट पहुँचाने खुद दुकानदार ही गया था, जिससे बैट तो ले लिए गए, लेकिन उसकी कीमत नहीं चुकाई गई।

यह बात जैसे ही सोशल मीडिया पर फैली, लोगों का गुस्सा भड़क उठा। कई फैंस ने X पर पूर्व कप्तान बाबर आजम पर शक जताया, पर अभी तक कोई पक्का सबूत नहीं मिला।

लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कौन है ये खिलाड़ी जो अपनी इज्जत दाँव पर लगा रहा है?

इस घटना ने पाकिस्तानी क्रिकेट की छवि को धक्का पहुँचाया है। फैंस कह रहे हैं कि जो खिलाड़ी मैदान पर नाम कमाते हैं, उन्हें ऐसी हरकतों से बचना चाहिए। वहीद की मेहनत की कमाई अटकी है और लोग माँग कर रहे हैं कि खिलाड़ी सामने आए, सच बोले और पैसे चुकाए। यह विवाद अब टीम के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गया है।

पैसे लेकर प्रशंसकों के साथ किया था डिनर, धन के बँटवारे में भी हुआ था झगड़ा

बता दें कि उसी वर्ल्ड कप में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई थी। पाकिस्तानी ‘जंग’ अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने डलास में फैंस को डिनर के लिए बुलाया और हर एक से 2500 डॉलर लिए। एक और इवेंट ‘नाइट विद स्टार्स’ पैसे के झगड़े की वजह से रद्द हो गया, जिसमें बाबर आजम और बाकी खिलाड़ियों के बीच फीस को लेकर अनबन हुई थी। वैसे, कहीं कहीं ये ये रकम ₹2500 की नहीं, बल्कि सिर्फ ₹25 ही बताई जा रही है।

बता दें कि पीसीबी चेयरमैन मोहसिन नकवी ने डिनर और पैसों वाले मामले में काफी नाराजगी जताई थी। उन्होंने कार्रवाई की भी बात कही थी। हालाँकि ये अलग बात है कि किसी भी खिलाड़ी पर कोई एक्शन नहीं लिया गया।