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मुख्तार अंसारी के नजदीकी मो. आजम ने खुद ही नष्ट कराया अपना होटल, 2 दिन पहले मिला था योगी प्रशासन से आदेश

उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों की लंबी फेहरिस्त है, जिनका बीते दशकों में राज्य के भीतर काफी खौफ़ रहा है लेकिन योगी सरकार में हालातों में काफी बदलाव हुआ है। अपराधियों की गिरफ्तारी से लेकर बाहुबलियों के अवैध निर्माण, योगी सरकार की इन सभी पर कार्रवाई जारी है। हाल ही में अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी समेत कई बाहुबलियों के उत्तर प्रदेश में स्थित कई अवैध निर्माण ढहाए गए। इस कार्रवाई के प्रभाव से उपजा भय सामाजिक राजनीतिक गलियारों में स्पष्ट रूप से नज़र आ रहा है। विधायक मुख्तार अंसारी के नज़दीकी मोहम्मद आज़म ने अपना अवैध निर्माण खुद ही ध्वस्त करना शुरू कर दिया है।  

पिछले कुछ समय में बाहुबली विधायक मुख्तार अंसार के कई अवैध निर्माण ढहाए गए, जो कि प्रदेश के अलग-अलग शहरों में स्थित थे। अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के तहत उत्तर प्रदेश के गाजीपुर स्थित रोजा क्षेत्र में डॉक्टर मोहम्मद आज़म के होटल पर भी कार्रवाई होनी थी। इस निर्माण के साथ खामी यह थी कि इसे मास्टर प्लान द्वारा तय मानक के आधार पर नहीं बनाया जा रहा था। 

इस बात की जानकारी मिलते ही मास्टर प्लान के अधिकारियों ने 2 दिन पहले इस अवैध निर्माण के संबंध में निर्देश जारी किया था। इसके बाद उन्होंने इस निर्माण के अवैध हिस्से को एक हफ्ते में गिराने का आदेश दिया था। साथ ही यह भी कहा था कि ऐसा नहीं होने पर कार्रवाई जिला प्रशासन द्वारा की जाएगी। इसके बाद मोहम्मद आज़म ने खुद ही अपने अवैध निर्माण को नष्ट करना शुरू कर दिया।

केवल यही नहीं, इसके अलावा भी गाजीपुर जिला प्रशासन ने कई अन्य जगहों पर कार्रवाई की। गाजीपुर स्थित हमीद सेतु के नज़दीक निर्मित शम्मे हुसैनी अस्पताल पर भी प्रशासन ने बुलडोजर चलवाया। एडीएम की अगुवाई में हुई इस कार्रवाई के तहत 24 अक्टूबर को शम्मे हुसैनी अस्पताल गिराया गया था, इस अस्पताल के मालिक डॉ. आजम सिद्दीकी और डॉ. साजिद बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के बेहद करीबी माने जाते हैं। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस अस्पताल को लगभग 40 से 50 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया था। कुछ समय बाद उच्च न्यायालय ने इस कार्रवाई पर स्टे का आदेश भी जारी किया था लेकिन तब तक अस्पताल का 80 फ़ीसदी हिस्सा गिराया जा चुका था।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार माफ़ियाओं और बाहुबलियों पर कार्रवाई को लेकर काफी सक्रिय रही है। सरकार द्वारा ‘ऑपरेशन क्लीन’ और ‘ऑपरेशन नेस्तनाबूद’ चलाया जा रहा है, इसके तहत मुख्तार अंसारी के प्रदेश भर में स्थित अवैध निर्माण गिराए जा रहे हैं। इसके अलावा पिछले 4 महीनों से मुख्तार अंसारी की गैंग से जुड़े लोगों पर प्रशासन की कार्रवाई जारी है।     

ईशनिंदा पर पाकिस्तानी पीएम इमरान खान ने कुछ ‘ज्ञान’ दिया, UN Watch ने लगाई लताड़

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के रवैये और नज़रिए को लेकर अक्सर सार्वजनिक मंचों पर सवाल खड़े किए जाते हैं। चाहे वह पाकिस्तान के आंतरिक राजनीतिक और रक्षा संबंधी उतार-चढ़ाव हों या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि। ताज़ा मामले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के नज़रिए पर प्रश्न खड़े किए गए, जब उन्होंने ईशनिंदा को लेकर टिप्पणी की। टिप्पणी का स्वरूप कुछ ऐसा था, जिसकी बड़े पैमाने पर आलोचना हुई। 

पाकिस्तानी सरकार के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक बयान साझा किया गया। यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का था। ईशनिंदा पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में ईशनिंदा अस्वीकार्य और असहनीय है।” ट्विटर पर पाकिस्तानी सरकार की तरफ से की गई इमरान खान की टिप्पणी को लेकर काफी प्रतिक्रिया आई। 

इसी बीच यूएन वॉच (UN Watch) ने भी इसका जवाब दिया। यूएन वॉच ने साफ़ शब्दों में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (U.N. Human Rights Council) में पाकिस्तान की मौजूदगी को ही असहनीय बता दिया। यूएन वॉच ने अपने ट्वीट में लिखा, “संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में आपकी (पाकिस्तान) की मौजूदगी ही असहनीय है।” यानी यूएन वॉच ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की साफ़ शब्दों में आलोचना की। 

दरअसल यूएन वॉच संयुक्त राष्ट्र का इकलौता मान्यता प्राप्त गैर सरकारी समूह (NGO) है, जो मानवाधिकार से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर निगरानी रखता है, मानवाधिकारों की रक्षा करता है और तानाशाही सरकारों का सामना करता है। यूएन वॉच ने इसके बाद चीन में उईगर समुदाय से जुड़े लोगों पर हो रहे अत्याचार पर पाकिस्तान के द्विआयामी रवैये की आलोचना करते हुए ट्वीट किया। 

इस ट्वीट में यूएन वॉच ने लिखा, “आप (पाकिस्तान) हिम्मत मत करिएगा खुद को मुस्लिमों का रक्षक बताने की क्योंकि पाकिस्तान की सरकार उईगर के साथ कैम्प में हो रहे जानवरों जैसे बर्ताव पर चीनी सरकार की सराहना करती है।” यूएन वॉच की तरफ से यह प्रतिक्रिया तब आई, जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के फोकल पर्सन (डिजिटल मीडिया प्रवक्ता) अर्सलान खालिद ने इस यूएन वॉच पर टिप्पणी की थी।          

‘मुझे और तजिंदर बग्गा को गिरफ्तार कर लिया गया है’: अर्णब के समर्थन में ‘सत्याग्रह’ करने पहुँचे कपिल मिश्रा का आरोप

दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा और प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर बग्गा ने आरोप लगाया है कि राजघाट पर अर्णब गोस्वामी के समर्थन में विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। कपिल मिश्रा ने ट्विटर पर जानकारी दी कि उन्हें और तजिंदर बग्गा को गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने ऐलान किया था कि वो उद्धव ठाकरे सरकार के अत्याचार के खिलाफ और अर्णब गोस्वामी की आज़ादी के लिए रविवार (नवंबर 8, 2020) की सुबह 9 बजे धरना देंगे।

उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस ने राजघाट और उसके आसपास के इलाकों में धारा-144 लगा दी है। उन्होंने अपने इस विरोध प्रदर्शन को सत्याग्रह का नाम दिया था। वहीं तजिंदर बग्गा ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें और कपिल मिश्रा को गिरफ्तार कर के दिल्ली पुलिस राजेंद्र नगर थाने लेकर गई है। हालाँकि, अभी तक दिल्ली पुलिस की तरफ से इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा गया है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने इन दोनों के गिरफ्तार किए जाने के आरोपों के बाद विरोध दर्ज कराया और कहा कि उन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी थी, बावजूद इसके ये कार्रवाई की गई। तजिंदर बग्गा ने कुछ लोगों ने ट्वीट्स को रीट्वीट किया, जिसमें कहा गया था कि महीनों तक सड़कों को जाम रखने की अनुमति तो है लेकिन शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की नहीं। वहीं ‘रिपब्लिक भारत’ के डिप्टी न्यूज़ एडिटर आशुतोष चतुर्वेदी का कहना है कि इन दोनों को हिरासत में लिया गया।

उधर अर्णब गोस्वामी ने जेल शिफ्ट किए जाते समय पुलिस वैन के भीतर से ही मीडिया से बात करते हुए बताया है कि उन्हें उनके वकीलों से भी बात नहीं करने दी जा रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें सुबह के 6 बजे जगा दिया गया और रविवार की सुबह उन्हें धक्का भी दिया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ। अर्णब गोस्वामी ने महाराष्ट्र की मुंबई पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि उनकी जान को ख़तरा है।

‘मेरी जिंदगी खतरे में, वकीलों से भी बात नहीं करने दी जा रही’ – अर्णब गोस्वामी को तलोजा जेल ले गई महाराष्ट्र पुलिस

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के संस्थापक और मुख्य संपादक अर्णब गोस्वमी ने अपनी जान को खतरा बताया है। बुधवार (नवंबर 4, 2020) की सुबह उन्हें गिरफ्तार किया गया था। रविवार को अर्णब गोस्वामी को पुलिस द्वारा तलोजा तेल में शिफ्ट किया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस मामले में सुनवाई की है और अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अर्णब गोस्वामी के प्रशंसकों को उम्मीद है कि अदालत से उन्हें राहत मिलेगी और वो रिहा होंगे।

अर्णब गोस्वामी ने जेल शिफ्ट किए जाते समय पुलिस वैन के भीतर से ही मीडिया से बात करते हुए बताया कि उन्हें उनके वकीलों से भी बात नहीं करने दी जा रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें सुबह के 6 बजे जगा दिया गया और रविवार की सुबह उन्हें धक्का भी दिया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ। अर्णब गोस्वामी ने महाराष्ट्र की मुंबई पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे उसकी कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगता है।

अर्णब गोस्वामी ने ये भी खुलासा किया कि पुलिस उनसे कह रही है कि वो उन्हें उनके वकीलों से संपर्क ही नहीं करने देगी। उन्होंने कहा, “मेरी ज़िंदगी खतरे में है। मैं भारत की जनता को, पूरे देश की जनता को बताना चाहता हूँ कि मेरी जान खतरे में है।’ अर्णब गोस्वामी इससे पहले अलीबाग क्वारंटाइन सेंटर में जुडिशल कस्टडी में थे। अब सभी की नजरें सोमवार को आने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर टिकी हुई हैं।

अर्णब गोस्वामी मीडिया से बात कर ही रहे थे कि पुलिसकर्मियों ने आकर उन्हें रोक दिया और फिर वैन को आगे बढ़ा दिया। कोर्ट को दी गई अर्जी में अर्णब गोस्वामी ने बताया था कि गिरफ्तारी के दौरान और एक पुलिस वैन में अलीबाग में ट्रांसफर होने के दौरान पुलिस ने उन्हें जूते से मारा, पानी तक नहीं पीने दिया। अर्णब ने अपने हाथ में 6 इंच गहरा घाव होने, रीढ़ की हड्डी और नस में चोट होने का दावा भी किया है। उनका कहना है कि पुलिस ने गिरफ्तारी के वक्त जूते पहनने तक का समय नहीं दिया।

‘तिरंगा नहीं उठाएँगे, कश्मीर पर चीन का शासन करवाएँगे’… देश तोड़ने की बातें करने वाले सत्ता की मलाई देख अब लड़ेंगे चुनाव

जम्मू कश्मीर की दोनों प्रमुख स्थानीय राजनीतिक पार्टियाँ अजीबोगरीब बातें कर रही हैं। जहाँ उनके दोनों बड़े नेता चुनाव न लड़ने की बातें कर रहे हैं, वहीं उनकी पार्टियाँ साथ चुनाव लड़ने के लिए दमखम दिखा रही हैं। अब वहाँ पीपल्स फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (PFGD) ने जम्मू कश्मीर में होने वाले जिला विकास परिषद (DDC) के चुनाव साथ मिल कर लड़ने का निर्णय लिया है। वहीं उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती चुनाव नहीं लड़ेंगे।

जम्मू कश्मीर की प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी भी DDC का चुनाव लड़ेगी। बता दें कि PAGD में नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, पीपल्स कॉन्फ्रेंस, आवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस, J&K पीपल्स मूवमेंट के साथ ही सीपीआई और सीपीएम भी शामिल हैं। इसका गठन अक्टूबर 15, 2020 को हुआ था। गठबंधन के अध्यक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्ला प्रत्याशियों के नामों की घोषणा करेंगे। प्रवक्ता सज्जाद गनी लोन ने इस बात की जानकारी दी है।

पिछले साल अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद ये पहली बार है, जब जम्मू कश्मीर में हाल ही में खाली हुई पंचायत सीटों के साथ-साथ DDC का चुनाव करने का निर्णय लिया गया है। नवम्बर 28, 2020 को मतदान होना है। ऐसे में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और पूर्व मंत्री आगा रुहुल्लाह मेंहदी का कहना है कि ये केंद्र सरकार का बिछाया ‘जाल’ है, ताकि जम्मू कश्मीर की पार्टियाँ चुनाव में हिंसा ले सकें। उन्होंने इन चुनावों और इसमें हिस्सा लेने का विरोध किया।

जम्मू कश्मीर में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीए मीर ने अपनी पार्टी को प्रदेश की सबसे पुरानी पार्टी बताते हुए कहा कि वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कभी अलग नहीं रही है और भाजपा को किसी हाल में जीत कर दबदबा बनाने का रास्ता नहीं दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा और जनसंख्या के हिसाब से उनकी कुछ चिंताएँ भी हैं। इस तरह से अब लगभग सभी प्रमुख पार्टियाँ आगामी चुनावों में हिस्सा ले रही हैं।

जहाँ फ़ारूक़ अब्दुल्ला कह रहे हैं कि जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को फिर से कायम करने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट ही उनकी एकमात्र उम्मीद बची है, वहीं उनके बेटे उमर अब्दुल्ला का कहना है कि जब तक ये केंद्र शासित प्रदेश बना रहेगा, तब तक वो व्यक्तिगत रूप से चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि वो 6 वर्षों तक जिस ‘शक्तिशाली’ सदन के नेता रहे हैं, वो वहाँ सदस्य के रूप में नहीं जा सकते, क्योंकि उसे कमजोर कर दिया गया है।

जम्मू कश्मीर की एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती भी कह चुकी हैं कि जब तक जम्मू कश्मीर का पुराना संविधान और झंडा वापस नहीं आ जाता, तब तक वो न तो कोई चुनाव लड़ेंगी और न ही भारत का झंडा उठाएँगी। उन्होंने केंद्र सरकार के लिए ‘डकैत’ शब्द का प्रयोग भी किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस देश के संविधान की जगह अपना घोषणापत्र लाना चाहती है। उन्होंने कहा था कि अब उन जैसे नेताओं का इस आंदोलन में ‘खून देने का वक्त’ आ चुका है।

इसका मतलब साफ़ है कि जहाँ अब्दुल्ला और मुफ़्ती परिवार के लोग खुद किसी भी चुनाव में हिस्सा न लेकर प्रतीकात्मक विरोध भी दर्ज कराना चाह रहे हैं, ताकि लोगों को लगे कि वो अनुच्छेद-370 को भूले नहीं हैं और सब कुछ सामान्य नहीं हुआ है, लेकिन दूसरी तरफ उनकी पार्टियाँ पूरी ताकत से चुनाव लड़ती रहेंगी, क्योंकि उन्हें भाजपा को रोकना है और सत्ता की मलाई भी चाभनी है। वो दोनों तरफ से रहना चाहते हैं।

जम्मू कश्मीर में कट्टरवादियों की नजर में आतंकवादियों और अलगाववादियों की तरह उन्हें भी प्रदेश का ‘सच्चा हिमायती’ समझा जाए, इसीलिए सीनियर अब्दुल्ला चीन को इधर आकर जम्मू-कश्मीर को अपने में मिला लेने का देश-विरोधी आइडिया आता है और मुफ़्ती परिवार भारत और भारत के झंडे के खिलाफ बयान तो दे रहा है, लेकिन साथ ही भारत के संविधान और सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा भी जता रहा है। ये दल फ़िलहाल कन्फ्यूजन की स्थिति में हैं। चुनाव नहीं लड़े तो सत्ता जाएगी और चुनाव लड़े तो कट्टरपंथियों की नजरों में गिरेंगे।

कुछ ही दिनों पहले ‘पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन’ ने डॉ फारूक अब्दुल्ला को अपना अध्यक्ष और महबूबा मुफ्ती को 6 पार्टी समूह का उपाध्यक्ष घोषित किया था। यह निर्णय पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के गुपकार रोड पर स्थित निवास पर आयोजित अलायंस में शामिल घाटी के शीर्ष नेताओं की दो घंटे तक चली बैठक में लिया गया था। सज्जाद लोन को गठबंधन का प्रवक्ता बनाया गया है।

बिहार-अमेरिका की खबरों के बीच UP चुनाव में CM योगी ने किया BJP का झंडा बुलंद, कॉन्ग्रेस का सफाया

बीते दिन (7 नवंबर 2020) को बिहार विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण के मतदान पूरे हुए। इसके बाद सामने आए एग्जिट पोल्स में एनडीए (भाजपा-जदयू) को बहुत अच्छे संकेत नहीं मिले हैं लेकिन इस दौरान उत्तर प्रदेश की 7 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी हुए थे। इन 7 सीटों पर हुए उपचुनाव के एग्जिट पोल में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बढ़त मिलती हुई नज़र आ रही है। इंडिया टुडे एक्सिस माई इंडिया एग्जिट पोल में भाजपा पूरी तरह विजेता नज़र आ रही है। 

इस एग्जिट पोल के अनुसार भारतीय जनता पार्टी को 37 फ़ीसदी तक मतदान मिल सकते हैं। वहीं प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी को 27 फ़ीसदी मतदान मिल सकता है। इसके अलावा मायावती की बहुजन समाज पार्टी को 20 फ़ीसदी और 6 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले कॉन्ग्रेस को सिर्फ 8 फ़ीसदी मतदान मिलने के आसार जताए गए हैं।   

सीटों की संख्या को लेकर बात करें तो इंडिया टुडे एक्सिस माई इंडिया एग्जिट पोल के अनुसार भाजपा को 5 से 6 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। समाजवादी पार्टी को एक या दो सीट और बसपा और कॉन्ग्रेस को शून्य सीट मिलने की संभावना जताई गई है। उत्तर प्रदेश की इन 7 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए 3 नवंबर को मतदान हुआ था। उत्तर प्रदेश की इन खाली सीटों पर हुए उपचुनावों का परिणाम 10 नवंबर को आएगा। 

इसी एग्जिट पोल के आधार पर अन्य राज्यों में हुए उपचुनावों के नतीजों को लेकर भी अनुमान लगाया गया। गुजरात में भी 8 सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा के लिए अच्छे संकेत सामने आ रहे हैं। इंडिया टुडे के एग्जिट पोल्स की मानें तो गुजरात में भाजपा 49 फ़ीसदी मतों के साथ लगभग 6 से 7 सीटें जीत सकती है। 

वहीं कॉन्ग्रेस की हालत गुजरात में भी बहुत दयनीय ही बनी हुई है, 40 फ़ीसदी मतदान के साथ कॉन्ग्रेस के हिस्से में सिर्फ एक सीट आने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि इसी एग्जिट पोल के अनुसार यह भी हो सकता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी का गुजरात में खाता ही न खुले। ठीक इसी तरह एग्जिट पोल्स के मुताबिक़ राज्य के अन्य राजनीतिक दल 11 फ़ीसदी मतदान हिस्सेदारी के साथ अपना खाता नहीं खोल पाएँगे।       

वहीं मध्य प्रदेश में 28 सीटों पर हुए उपचुनाव परिणाम में भी भाजपा की स्थिति काफी बेहतर नज़र आ रही है। इंडिया टुडे के एग्जिट पोल के अनुसार भाजपा 16 से 18 सीट तक जीत सकती है वहीं कॉन्ग्रेस के हिस्से में सिर्फ 10 से 12 सीट मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी को मध्य प्रदेश के उपचुनाव में सिर्फ एक सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है। 

3 बच्चों की अम्मी का बॉयफ्रेंड के साथ न्यूड वीडियो वायरल, पति रफीक ने भी मोबाइल पर देखा… 12 बार चाकू मार हत्या

मुंबई के भिवंडी में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की ही हत्या कर दी। उसकी पत्नी का अपने बॉयफ्रेंड के साथ न्यूड वीडियो वायरल हो गया था, जिसके बाद उसने इस वारदात को अंजाम दिया। आरोपित की पहचान रफीक मोहम्मद यूनुस के रूप में हुई है, जिसने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है। रफीक मोहम्मद यूनुस अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ अंसार नगर क्षेत्र में रह रहा था। लॉकडाउन में उसकी नौकरी भी चली गई थी।

पुलिस ने बताया है कि कोरोना वायरस से उपजे हालात के बाद लगाए गए लॉकडाउन में नौकरी जाने के कारण वो बेरोजगार हो गया था। पहले वो बिजली करघा संयंत्र में काम करता था। इसके बाद उसकी पत्नी नसरीन अपने तीनों बच्चों के साथ अपनी बहन के यहाँ रहने चली गई। वो भिवंडी में ही नगाँव क्षेत्र इलाके में रह रही थी। महिला के बॉयफ्रेंड की पहचान सद्दाम के रूप में हुई है, जिसके साथ उसका न्यूड वीडियो वायरल हो गया।

इस वीडियो को देखने के बाद 50 वर्षीय रफीक मोहम्मद यूनुस अपनी पत्नी से मिलने गया और उसने वहीं पर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद वो हत्या की वारदात में इस्तेमाल किए गए चाकू को लेकर स्थानीय शांति नगर थाना पहुँचा और आत्मसमर्पण कर दिया। सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर ममता डिसूजा ने बताया कि अपनी पत्नी के किसी ‘गैर-मर्द के साथ अफेयर’ वायरल होने के बाद वो काफी ‘शर्मिंदा’ था और इसीलिए उसने ऐसा किया।

अब पुलिस उस व्यक्ति की तलाश कर रही है, जिसने इस वीडियो को शूट कर के वायरल किया। आरोपित के व्हाट्सप्प पर भी ये वीडियो आया था। जब वो आत्मसमर्पण करने पहुँचा तो उसके कपड़े और चाकू खून से सने हुए थे। वो 17 सालों से नसरीन के साथ वैवाहिक सम्बन्ध में था। जॉब जाने से पहले वो पॉवर लूम में बतौर सुपरवाइजर कार्यरत था। उसने अपनी पत्नी के पेट, गर्दन और बाहों पर 12 बार खतरनाक चाकू से वार किया। उसके खिलाफ हत्या की धारा में मुकदमा दर्ज किया गया है।

अक्टूबर 2020 के अंत में सूरत से भी हत्या की एक ऐसी खबर आई रही, जिसने सभी को चौंका दिया था। एक फैक्ट्री मालिक रामू संतराम गोस्वामी को आलम और उसके दो सहयोगी अली और सतला नाम के आरोपितों ने निर्दयतापूर्वक मार डाला था। आरोपितों ने मृतक की पत्नी और तीन साल के मासूम बेटे की आँखों के सामने ही इस वारदात को अंजाम दिया था। आलम फैक्ट्री मालिक की पत्नी पर बुरी नजर रखता था।

बिहार विधानसभा चुनाव: गलत हो सकते हैं Exit Polls, कारण – महिला वोटिंग, अनाज वितरण और फेल होता MY समीकरण

बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के बाद आए लगभग सभी एग्जिट पोल्स में तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन की सरकार बनती दिख रही है, या फिर काँटे की टक्कर है, लेकिन क्या ये आँकड़े गलत भी हो सकते हैं? प्रथम चरण में भाजपा के लिए बहुत कुछ दाँव पर नहीं था, लेकिन दूसरे और तीसरे चरण को मिला दें तो कम से कम राजग को साधारण बहुमत तो मिलता दिख ही रहा है। अगर महिलाएँ बड़ी संख्या में मत डालने निकली हैं तो राजग के जीतने की संभावना ज्यादा है।

नीतीश कुमार से ज़रूर लोग ऊब गए हैं, जिसका कारण है पिछले पाँच वर्ष। लोग तारीफ भी करते हैं तो उनके प्रथम कार्यकाल की। नीतीश कुमार के कर्म का फल ही है कि राजद आज उन्हें टक्कर दे रही है क्योंकि 2015 में उन्होंने ही मृत पार्टी को संजीवनी दी। लेकिन, लोग तेजस्वी यादव को उनका विकल्प नहीं मान रहे। बिहार में आई बाढ़ के बाद हुए लाख भ्रष्टाचार के बावजूद जनता तक राहत सामग्री पहुँची, उसका फायदा भी उन्हें मिला।

इसी तरह सुशील कुमार मोदी से भी लोग नाराज़ हैं। सीमांचल के इलाके में देख लीजिए। वहाँ असदुद्दीन ओवैसी, राजद और कॉन्ग्रेस जीत सकती हैं लेकिन वोट बँटते हैं तो जदयू को फायदा हो सकता है। कई सीटों पर जातीय गुटबंदी टूटती दिख रही है। अनाज वितरण ही सबसे बड़ा वो कारण है, जिससे राजग को फायदा होता दिख रहा है। जहाँ पर यादव बनाम यादव है, जैसे तेज प्रताप यादव की हसनपुर, वहाँ भी उम्मीदवारों की छवि पर चीजें निर्भर करती हैं।

भाजपा को लेकर कोई नाराजगी नहीं थी क्योंकि लोग चाहते थे कि भाजपा अकेले लड़े। लेकिन, नीतीश कुमार को भी उतना नुकसान नहीं हुआ है। चिराग पासवान को लोजपा का परंपरागत वोट मिल रहा है लेकिन दूसरे लोग उनके साथ नहीं गए हैं। कई जगह उन्होंने पिछली बार अच्छा प्रदर्शन करने वाले निर्दलीयों को भी टिकट दिया है। राजद के लिए भी माई समीकरण की बहुत बड़ी गुटबंदी नहीं दिख रही है। इसीलिए बिहार विधानसभा चुनाव में एग्जिट पोल्स गलत भी हो सकते हैं।

पूरा वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

बिहार विधानसभा चुनाव में NDA और UPA में हो सकती है काँटे की टक्कर: एग्जिट पोल का दावा

बिहार में 243 विधानसभा सीटों पर 7 नवंबर (शनिवार) को तीसरे चरण का मतदान शाम छह बजे समाप्त हो गया। इस चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने सत्ता पर काबिज होने के लिए पुरजोर कोशिश की है। अब सभी की निगाहें चुनाव नतीजों पर है। 10 नवंबर को मतगणना के बाद फाइनल नतीजे सामने आएँगे। लेकिन एग्जिट पोल्स के रुझान आने शुरू हो गए हैं। जिसके अनुसार एनडीए और यूपीए में कड़ी टक्कर दिखाई दे रही है।

विभिन्न एग्जिट पोल के रुझानों से पता चलता है कि इस बार बिहार में पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला हो सकता है क्योंकि प्रत्येक एग्जिट पोल में महागठबंधन और एनडीए को लगभग बराबर सीटें मिलती दिख रही हैं।

Exit PollNDA allianceMahagathbandhanLJPOthers
Republic-Jan Ki Baat91-117138-1188-56-3
Times Now-C-voter104-128108-1131-34-8
TV9 Bharatvarsh110-120115-1253-510-15
Today’s Chanakya55-66180-191

रिपब्लिक-जन की बात एग्जिट पोल के नतीजों का दावा है कि एनडीए गठबंधन को 243 सीटों वाली विधानसभा में से 91 से 117 तक सीटें मिलने की उम्मीद है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि कॉन्ग्रेस और राजद के महागठबंधन गठबंधन 138 से 118 सीटों की सीमा तक कहीं न कहीं पहुँच सकता है। और सबसे अधिक सीटों के साथ गठबंधन के रूप में उभर रहा है। इसके अलावा, लोजपा और अन्य 8 और 6 सीटों में सिमटते दिख रहे हैं।

दूसरी ओर सी-वोटर एग्जिट पोल के नतीजों का दावा है कि एनडीए गठबंधन (जिसमें भाजपा, जदयू और अन्य दल शामिल हैं) 104 से 128 सीटों से जीत हासिल करेगा। वहीं महागठबंधन को 108 से 113 सीटें मिलने की उम्मीद है जबकि लोजपा और अन्य 3 से 8 सीटें स्कोर करेंगे।

तीसरे एग्जिट पोल टीवी 9 भारतवर्ष ने यह भी संकेत दिया कि बिहार में चुनावी लड़ाई जमकर लड़ी गई है। जहाँ एनडीए गठबंधन को 110-120 सीटें मिलने की उम्मीद है, जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी महागठबंधन को 115-125 सीटें मिलने का अनुमान है। एग्जिट पोल का दावा है कि एलजेपी और अन्य के खाते में 5 से 15 सीटें जा सकती हैं।

चाणक्य के बिहार विश्लेषण के मुताबिक, आरजेडी नेतृत्व वाला महागठबंधन राज्य की कुल 243 सीटों में से 180 से 191 सीटें जीतकर राज्य में सरकार बनाने के लिए तैयार है। वहीं चाणक्य का दावा है कि एनडीए गठबंधन 55 से 66 सीटों के साथ दूसरा स्थान हासिल करेगा।

इंडिया टुडे-एक्सिस माय इंडिया के मुताबिक मुख्यमंत्री पद के लिए आरजेडी नेता तेजस्वी यादव बिहार के 44 फीसदी वोटों के साथ नीतीश से आगे नजर आ रहे है। नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के तौर पर 35 फीसदी लोगों का वोट हासिल हुआ है। अन्‍य के खाते में 7 से 4 प्रतिशत सीटें जा सकती हैं।

एक्सिस माई इंडिया एग्जिट पोल के नतीजों का दावा है कि एनडीए को 69 से 91, महागठबंधन को 139 से 161 और लोजपा को 3 से 5 सीट मिलने का अनुमान है।

अर्णब गोस्वामी को आज भी जमानत नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- सत्र न्यायालय में कर सकते हैं आवेदन, जानिए आज क्या हुआ

रिपब्लिक ग्रुप के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी की जमानत याचिका पर 7 नवंबर को बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। 6 घंटे तक चली सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने जमानत के फैसले को सुरक्षित रख लिया है। अर्णब को अभी हिरासत में ही रहना होगा। फिलहाल, कोर्ट ने अर्णब को राहत देते हुए कहा कि वो चाहें तो लोअर कोर्ट में पिटिशन दाखिल कर सकते हैं। 

हाईकोर्ट ने लोअर कोर्ट से कहा, “अगर इनकी तरफ से याचिका दाखिल की जाती है तो उसपर 4 दिन के अंदर फैसला दे दिया जाए।” अर्णब को 2018 के आत्महत्या के मामले बुधवार को गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। गिरफ्तार और रिमांड के खिलाफ उसने बॉम्‍बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

शनिवार (नवंबर 7, 2020) को आयोजित विशेष सुनवाई में, जस्टिस एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की खंडपीठ ने अंतरिम राहत के लिए तत्काल आदेश पारित करने से इनकार कर दिया।

6 घंटे तक चली सुनवाई के बाद पीठ ने कहा, “हम आज आदेश पारित नहीं कर सकते। पहले से ही 6 बज चुके हैं। इस बीच हम यह स्पष्ट करते हैं कि याचिका का लंबित होना याचिकाकर्ता को सत्र न्यायालय में जमानत के लिए आवेदन करने से नहीं रोकता है और यदि ऐसा आवेदन दायर किया जाता है, तो उस पर चार दिनों के भीतर फैसला किया जाना चाहिए।”

हालाँकि, जब याचिकाकर्ता के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने जोर देकर कहा कि याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत प्रदान की जाए, तो जस्टिस शिंदे ने संकेत दिया कि अदालत ने आदेश को सुरक्षित रखा है और आने वाले सप्ताह में किसी दिन सुनाएगी। उन्होंने आश्वासन दिया कि अदालत जल्द से जल्द आदेश सुनाएगी।

वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने जगदीश अरोड़ा के बंदी मामले का हवाला दिया, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल प्रशांत कनौजिया को हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया था। साल्वे ने तर्क दिया कि कनौजिया के मामले के समान, उनके मुवक्किल अर्णब गोस्वामी को भी जमानत दी जानी चाहिए। हालाँकि, अदालत ने मामले में फैसला देने से इनकार कर दिया।

HC की याचिका में तर्क दिया कि पुलिस के पास रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आधार पर 2019 में मजिस्ट्रेट द्वारा मामले में एक क्लोजर आदेश पारित करने के बाद न्यायिक आदेश प्राप्त किए बिना मामले को फिर से खोलने के लिए पुलिस के पास कोई शक्ति नहीं है। बचाव पक्ष के वकीलों ने कहा कि मामले में जाँच फिर से शुरू करने के लिए पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई अवैध थी, इसलिए आरोपित को रिहा किया जाना चाहिए।

शुक्रवार (नवंबर 6, 2020) को, अर्णब गोस्वामी के वकील की सुनवाई के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की डिवीजन बेंच ने फिर से रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी की याचिका को स्थगित कर दिया है। बता दें, इस याचिका में 2018 के आत्महत्या मामले को रद्द करने की माँग की गई है। अदालत ने कहा कि, कोर्ट को निष्कर्ष पर आने से पहले दूसरे पक्ष को सुनने की जरूरत है। इसी आत्महत्या मामले में अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार किया गया है।। 

बॉम्बे HC ने शुक्रवार को कहा था कि निष्कर्ष पर आने से पहले अदालत को दूसरे पक्ष को सुनने की जरूरत है। अर्नब गोस्वामी ने जेल से अंतरिम रिहाई की भी माँग की। सुनवाई 5 नवंबर को शुरू हुई थी, जिसके एक दिन बाद रायगढ़ अदालत ने पुलिस रिमांड की याचिका खारिज कर दी थी और उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।

वहीं अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी मामले पर शुक्रवार (नवंबर 6, 2020) सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूरे मामले पर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके उनके पत्र पर उनसे दो हफ्तों में जवाब माँगा। इसके साथ ही कोर्ट ने अर्णब को राहत प्रदान करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा था कि उन्हें वर्तमान कार्यवाही के बाद गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

अर्णब को मुंबई के इंटीरियर डिजाइनर अन्वय और उनकी माँ को कथित तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में 4 नवंबर बुधवार को गिरफ्तार किया गया था। मुंबई पुलिस ने उन्हें न्यायिक सहमति के बिना हिरासत में लिया था। वे 18 नवंबर तक ज्यूडिशियल कस्टडी में हैं। पिछली 3 रातों से उन्हें अलीबाग में बने कोविड सेंटर में रखा गया था।

अर्णब ने दावा किया था कि पुलिस ने उन्हें जूते से मारा। पानी तक नहीं पीने दिया। सुनवाई के दौरान अर्नब के वकील ने कोर्ट में सप्लीमेंट्री एप्लिकेशन लगाई थी।। इसके अलावा अर्णब ने अपने हाथ में 6 इंच गहरा घाव होने, रीढ़ की हड्डी और नस में चोट होने का दावा भी किया है। अर्णब ने कहा कि पुलिस ने गिरफ्तारी करते समय उन्हें जूते पहनने का भी वक्त नहीं दिया। 

गौरतलब है कि गोस्वामी को रायगढ़ पुलिस ने 4 नवंबर की सुबह उनके मुंबई आवास से गिरफ्तार किया था, जिसके बाद अलीबाग के CJM ने उन्हें 18 नवंबर तक के लिए 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। कथिततौर पर गिरफ्तारी के समय मुंबई पुलिस ने अर्णब के नाबालिग बेटे से मारपीट और उनके परिजनों से बत्तमीजी भी की थी।

जिस पर HC में दायर याचिका में उठाया गया मुख्य तर्क यह है कि मजिस्ट्रेट द्वारा 2019 में पुलिस को सौंपी गई रिपोर्ट के आधार पर मामले में एक क्लोजर आदेश पारित होने के बाद न्यायिक आदेश प्राप्त किए बिना मामले को फिर से खोलने के लिए पुलिस के पास कोई पावर नहीं है।