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‘दल्ला पुलिस’: पिंजरा तोड़ की देवांगना की गिरफ्तारी से दिल्ली पुलिस पर भड़के प्रशांत भूषण

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दिल्ली पुलिस के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया है। प्रशांत भूषण ने प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ की एक ख़बर पर प्रतिक्रिया देते हुए दिल्ली पुलिस को ‘दल्ला पुलिस’ बताया है। ‘द वायर’ की उस ख़बर में कहा गया था कि दिल्ली पुलिस ने जेएनयू में पढ़ने वाली एमफिल की छात्रा देवांगना कलिता को पिछले 10 दिनों के भीतर तीसरी बार गिरफ़्तार किया है। अबकी क्राइम ब्रांच ने ये कार्रवाई की।

इसी ख़बर से प्रशांत भूषण भड़क गए। बता दें कि देवांगना कुख्यात संगठन ‘पिंजरा तोड़‘ की कार्यकर्ता है, जो दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के दौरान लोगों को भड़काने और महिलाओं को उकसा कर सड़क जाम करवाने में लगी हुई थी। देवांगना को तीन दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है, जिससे प्रशांत भूषण को मिर्ची लग गई। दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने भी लोगों का ध्यान इस तरफ आकृष्ट कराया कि प्रशांत भूषण दिल्ली पुलिस के लिए कैसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।

देवांगना को इससे पहले उसकी साथी नताशा नरवाल के साथ 23 मई को गिरफ़्तार किया गया था। जमानत मिलने के बाद 28 मई को देवांगना को फिर गिरफ्तार किया गया। इस तरह से गिरफ़्तारी होने के बाद उसे 10 दिनों में तीसरी बार पुलिस ने शिकंजे में लिया है। देवांगना जाफराबाद में हिंसा फैलाने में लगी हुई थी। इससे पहले पुलिस ने 14 दिनों की कस्टडी माँगी थी, लेकिन 2 दिन की ही मिली। देवांगना के खिलाफ हत्या का प्रयास, आपराधिक साज़िश और दंगे फैलाने के आरोप हैं।

पिंजरा तोड़ के सदस्यों ने 22 फरवरी की शाम को नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के लिए स्थानीय निवासियों को भड़काया और उन्हें जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर इकट्ठा होने के लिए कहा। पूछताछ में खुलासा हुआ था कि नताशा और देवांगना ने दूसरे समुदाय को भड़काने के लिए पूरी रणनीति तैयार की थी। नताशा और देवांगना ने साजिश रच के 66 फूटा सड़क को ठप्प करवाया था। इन्होंने कई अन्य इलाकों में घूम-घूम कर लोगों को भड़काया और दंगों में भाग लेने को उकसाया।

बता दें कि ‘पिंजरा तोड़’ शुरू किया गया था हॉस्टल की समस्याओं को लेकर। लेकिन अब यह पूरी तरह से डीयू में वामपंथी प्रोपेगेंडा का महिला ब्रिगेड बन कर खड़ा हो चुका है जो हर उस विषय पर भीड़ की शक्ल लेकर पहुँच जाता है, जो वामपंथियों के वृहद एजेंडे का हिस्सा है। आप इनके फेसबुक पोस्ट्स को खँगालेंगे तो ‘पिंजरा तोड़’ की नेत्रियाँ दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की पूरी आधारशिला रखती प्रतीत होती हैं।

शरजील हो या टुकड़े-टुकड़े गैंग, बख्शा नहीं जाएगा, भुगतने होंगे परिणाम: अमित शाह की दो टूक

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को एक इंटरव्यू दिया है। इसमें उन्होंने अर्थव्यवस्था से लेकर प्रवासी संकट, पालघर लिंचिंग से लेकर चीन के साथ सीमा गतिरोध तक, हर सवाल के जवाब दिए हैं।

‘टुकडे टुकडे गैंग’ के संबंध में एक सवाल पर गृह मंत्री ने दोहराया कि किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वो शरजील इमाम हो या फिर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के ‘साजिशकर्ता’। अमित शाह ने कहा कि मोदी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।

प्रवासी मजदूरों के सवाल पर अमित शाह ने कहा, “केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को 11,000 रुपए भेजे थे, ताकि शिविरों में रह रहे प्रवासियों की मदद की जा सके। हम इस बात से सहमत हैं कि कुछ कम्युनिकेशन गैप आए हैं, मगर हमें यह भी समझना चाहिए कि इन श्रमिकों को घर भेजने के लिए बसों और ट्रेनों को नियमित रूप से चलाया जा रहा है। 41 लाख प्रवासियों को बसों के जरिए भेजा गया। 54 लाख प्रवासी कामगारों को वापस भेजने के लिए 3,968 श्रमिक स्पेशल चलाए गए हैं।”

चीन के साथ सीमा गतिरोध के मुद्दे पर गृह मंत्री ने कहा, “नरेन्द्र मोदी सरकार देश की सीमाओं की सुरक्षा और देश के सार्वभौमत्व पर जरा भी आँच नहीं आने देगी। डिप्लोमेटिक स्तर पर और सेना के स्तर पर भारत-चीन मुद्दे पर बात हो रही है। मुझे भरोसा है कि स्थिति सँभल जाएगी। हम किसी का कुछ नहीं लेना चाहते हैं, लेकिन हमारा लेने की कोशिश करने वाले को मुँह तोड़ जवाब दिया जाएगा।”

पाकिस्तान के बारे में उन्होंने कहा, “भारत ने कभी भी विस्तारवादी नीति नहीं अपनाई है। मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि चाहे वह सर्जिकल स्ट्राइक हो या हवाई हमला, न तो भारत की सीमाओं का उल्लंघन बर्दाश्त किया जाएगा और न ही भारत के क्षेत्र पर हमला। हम किसी और के किसी भी चीजों की अभिलाषा या लोभ नहीं रखते हैं।”

इसके साथ ही गृह मंत्री ने कहा, “हम भारत को उत्पादन का हब बनाना चाहते हैं। अगर देश का व्यक्ति ये तय कर ले कि हम भारत में बनी चीजों का ही उपयोग करेंगे तो हमारे अर्थतंत्र को बड़ी गति मिलेगी। आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल की दिशा में हम आगे बढ़ेंगे।”

अमित शाह ने अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में बात करते हुए कहा, “ये दोनों देश की एकता और अखंडता से जुड़े हैं। सीएए पर जिसने भी भ्रांति फैलाई है उसे अब चिंता हो रही है। हमने दिल्ली में षड्यंत्र का एक केस भी रजिस्टर किया है और उसके तहत जो जो भी दोषी होगा, उस पर कानूनी कार्रवाई होगी।”

उन्होंने आतंकवाद के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि घाटी में युवाओं को भड़काने का सबसे बड़ा कारण अनुच्छेद 370 था। इससे अलगाववाद और आतंकवाद की तरफ घाटी का युवा जाता था। 90 के बाद सबसे कम आतंकी घटनाएँ 370 हटाने के बाद और 2014-2020 के दौरान हुई है।

इसके साथ ही उन्होंने पालघर लिंचिंग पर कहा कि भारत सरकार इस पर मूक दर्शक बनकर नहीं बैठी है। हाईकोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया है। ये गंभीर मामला है और सरकार इस पर मूक दर्शक बनकर नहीं बैठेगी।

महाराष्ट्र CM कोरोना रिलीफ फंड में आए ₹342 करोड़, संक्रमण से लड़ने पर केवल ₹23.82 करोड़ खर्च: RTI से खुलासा

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कोरोना वायरस रिलीफ फंड में दानदाताओं की मदद से 18 मई तक 342.01 करोड़ रुपए जमा हुए थे। लेकिन अभी तक महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार ने COVID-19 संबंधित व्यवस्थाओं में कुल धनराशि में से केवल 23.82 करोड़ रुपए का इस्तेमाल किया है। इसका खुलासा एक RTI के जरिए हुआ।

बता दें कि मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने एक आरटीआई दायर की थी। इसमें कोरोना वायरस के खिलाफ राज्य की लड़ाई में प्राप्त धन और खर्च के बारे में जानकारी माँगी गई थी।

RTI के तहत मिले जवाब के अनुसार, 18 मई, 2020 तक कुल 342.01 करोड़ रुपए जमा किए गए। इनमें से 79.82 करोड़ रुपए इस फंड से खर्च किए गए। हैरत की बात ये है कि इनमें से केवल 23.82 करोड़ रुपए ही COVID-19 संबंधित मामलों में खर्च किए गए।

सीएम रिलीफ फंड के सहायक लेखाधिकारी मिलिंद काबाडी ने बताया कि 18 मई 2020 तक कुल 342.01 करोड़ रुपए की धनराशि जमा हुई है। इस धनराशि में से कुल 79,82,37,070 रुपए खर्च हुए हैं। खर्च हुई धनराशि से कोविड-19 पर केवल 23, 82,50,000 रुपए खर्च की गई है। इसमें से 20 करोड़ रुपए सेंट जार्ज अस्पताल मुंबई को आवंटित किया गया और 3,82,50,000 रुपए मेडिकल शिक्षा और संशोधन विभाग को दिया गया है।

इसके अलावा, महाराष्ट्र सरकार द्वारा खर्च की गई कुल राशि का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी मजदूरों को उनके मूल राज्यों में वापस भेजने में खर्च किया गया। वहीं प्रवासी मजदूरों के लिए जो रकम आवंटित की गई है, उसे राज्य जिलाधिकारियों को सौंप दी गई है ताकि रेलवे किराए का भुगतान समय पर हो सके। इसमें 36 जिला स्थित प्रवासी मजदूरों का किराया 53,45,47,070 रुपए बताया गया है। रत्नागिरी जिला स्थित प्रवासी मजदूर का रेलवे का किराया 1.30 करोड़ और सांगली स्थित मजदूर का रेलवे का किराया 44.40 लाख रुपए अदा किया गया है।

RTI में कहा गया है कि औरंगाबाद में हुए रेल हादसे में 16 मृतक मजदूरों के परिजनों को 80 लाख रुपए की आर्थिक मदद सीएम रिलीफ फंड कोविड -19 के अकाउंट से की गई है। 

अनिल गलगली के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ने कोरोना वायरस को लेकर कुल जमा रकम में से सिर्फ 7 प्रतिशत रकम स्वास्थ्य सेवा पर खर्च की है। प्रवासी मजदूरों की रेलवे टिकट पर 16 प्रतिशत रकम खर्च की है और रेलवे दुर्घटना के मृतकों पर 0.23 प्रतिशत रकम खर्च की है।

आज भी सीएम रिलीफ फंड में 262.28 करोड़ रुपए की धनराशि हैं। अनिल गलगली ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को चिठ्ठी लिखकर स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए COVID19 फंड का इस्तेमाल करने का अनुरोध किया है।

राजदीप सरदेसाई की ‘लाश’ पत्रकारिता: बीमारी से राजकुमार की मौत, कहा- भूख से मरा, सरकारी मदद कहाँ

राजदीप सरदेसाई ने उत्तर प्रदेश के बाँदा में एक गरीब की मौत पर अपनी ‘गिद्ध वाली पत्रकारिता‘ करनी चाही। उन्होंने एक वीडियो पोस्ट किया और साथ में लिखा कि बुंदेलखंड के बाँदा में गरीबों की भूख से हालत खराब है। उन्होंने बताया कि उनकी पत्रकार मौसमी ने एक व्यक्ति से अपनी स्टोरी के दौरान बात की थी, जो अब चल बसा है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि अनाज गोदामों में रखे-रखे सड़ रहे हैं।

‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने पूछा कि आखिर सरकार के ये सारे पैकेज जनता के पास कब पहुँचेंगे? ऐसा कहने के पीछे उनका तात्पर्य था कि मृतक को सरकार ने सहायता नहीं मुहैया कराई थी, इसलिए उसकी जान चली गई। बाँदा के डीएम ने राजदीप सरदेसाई को सच्चाई से अवगत कराया। मृतक का नाम राजकुमार है, जो खम्हौरा गाँव का निवासी था। ये अंतर्रा प्रखंड के अंतर्गत आता है।

डीएम ने बताया कि मृतक राजकुमार की पत्नी मनोज कुमार अंत्योदय राशन धारक है। उन्हें अप्रैल 1, 2020 को 20 किलो गेहूँ और 15 किलो चावल दी गई थी। इसके बाद उसी महीने की 17 तारीख को ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ 5 किलो चावल दिया गया था। मई 6, 2020 को उन्हें पुनः अंत्योदय कार्ड से 20 किलो चावल और 15 किलो गेहूँ मुहैया कराया गया था। इन सबके बावजूद राजदीप ने बिना कुछ जाने झूठ फैलाया।

हाल ही में 18 मई 2020 को मृतक की पत्नी को फिर से ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ के तहत 5 किलो चावल और 1 किलो चना प्राप्त हुआ था। बता दें कि ये खाद्य सामग्रियाँ निःशुल्क दी गई है, इसके एवज में कोई पैसा नहीं लिया गया। साथ ही बाँदा प्रशासन ने साफ़ कर दिया है कि राजकुमार की मृत्यु भूख के कारण नहीं हुई है, बीमारी के कारण हुई है। इसके बाद लोगों ने राजदीप सरदेसाई को जम कर लताड़ा।

हालाँकि, राजदीप सरदेसाई ने बाद में बाँदा के डीएम का उनकी रिप्लाई के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि वो अपनी स्टोरी में उनकी इस प्रतिक्रिया को जोड़ने की कोशिश करेंगे। एक यूजर ने राजदीप से कहा कि वो अब जनता से माफ़ी माँगें। इसके बावजूद राजदीप सरदेसाई बाँदा के राजकुमार का वो इंटरव्यू लोगों को दिखाते रहे, जो उन्होंने तब दिया था जब वो जिन्दा थे। लोगों ने आरोप लगाया कि वो सरकार को बदनाम करने के लिए लगे हुए हैं।

फीस बढ़ाने को लेकर UP के निजी स्कूल पहुँचे हाईकोर्ट, कपिल सिब्बल ने स्कूलों का रखा पक्ष

उत्तर प्रदेश के प्राइवेट स्कूलों की एसोसिएशन ने एक तरफ फीस बढ़ाने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है तो वहीं दूसरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक ज्ञापन देकर प्राइवेट स्कूल एक्ट बनाने की माँग की है। हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका के बाद कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।

हाईकोर्ट में सरकार के फैसले के खिलाफ जाते हुए प्राइवेट स्कूलों ने यह दलील दी कि वह लोग ऑनलाइन क्लासेज चला रहे हैं और उनको स्कूल में तैनात शिक्षकों की सैलरी को भी बढ़ाना है। इसके साथ-साथ स्कूल के खर्चे भी उन्हीं को चलाने हैं। ऐसे में सरकार फीस बढ़ाने के उनके अधिकार को नहीं रोक सकती।

प्राइवेट स्कूलों के एसोसिएशन की ओर से दाखिल की गई याचिका पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस देकर जवाब माँगा है। यह आदेश जस्टिस अनिल कुमार और जस्टिस सौरभ लवानिया की बेंच ने पारित किया है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 18 जून को की जाएगी।

दरअसल याचिका पर सुनवाई के दौरान प्राइवेट स्कूलों की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए थे।

प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष अतुल श्रीवास्तव ने बताया, “हम लोग लॉकडाउन में अभिभावकों की परेशानी समझ रहे हैं, लेकिन स्कूलों की परेशानी भी सरकार को समझनी पड़ेगी। हम ऑनलाइन क्लासेज चला रहे हैं। हम लगातार लॉकडाउन के बाद भी बच्चों को पढ़ा रहे हैं और जब तक लॉकडाउन रहेगा तब तक बच्चों को पढ़ाते भी रहेंगे, हमें शिक्षकों को बढ़ी हुई सैलरी भी देनी है।”

श्रीवास्तव ने कहा, “हम स्कूलों के खर्चे भी मेंटेन करते हैं। अगर हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं तो फीस बढ़ाने के हमारे अधिकार हमारे पास होने चाहिए। सरकार जैसे दूसरे क्षेत्रों को मदद कर रही है वैसे हमें भी मदद करें, हमें भी अनुदान दे या फिर अभिभावकों को कुछ अनुदान दें ताकि हमारे स्कूल भी चल सकें। अगर हम शिक्षकों की सैलरी नहीं बढ़ाएँगे तो हम अच्छे शिक्षकों को रोक नहीं पाएँगे। इसलिए हम लोगों ने फीस बढ़ाने के अपने अधिकार को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया है।”

मामले को लेकर उप मुख्यमंत्री और शिक्षा विभाग के प्रमुख दिनेश शर्मा ने कहा, “प्राइवेट स्कूल अगर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं तो हम भी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे। अगर कोरोना संकट के इस दौर में प्राइवेट स्कूल किसी तरह की फीस को बढ़ाने की मनमानी करते हैं तो भारी जुर्माना लगाया जाएगा।”

डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने कहा कि कोरोना संकट को देखते हुए सिर्फ एक साल के लिए आदेश निकाला गया है। लोगों की आर्थिक तंगी के चलते उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होगी, इसलिए जो स्कूल हैं, वह एक साल के लिए फीस नहीं बढ़ाएँ। हर महीने की फीस लें।

साथ ही एक बार में 3 महीने या 6 महीने की फीस न वसूली जाए, ऐसा भी आदेश राज्य सरकार ने जारी किया है। और अभी जब तक बस नहीं चलनी है तो कोई वाहन शुल्क ना लें, यह सरकार का आदेश है। यह मानना इन स्कूलों की बाध्यता है, लेकिन अगर यह लोग मनमानी करेंगे तो राज्य सरकार एक्शन लेगी।

वहीं दूसरी तरफ एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन देकर प्राइवेट स्कूल एक्ट बनाने की माँग की है। साथ ही जो फीस वृद्धि एक साल तक रोकने का ऑर्डर निकाला गया है, उसे भी खत्म करने की माँग की गई है।

दरअसल कोरोना की रोकथाम के लिए देश में जारी लॉकडाउन के बीच उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने एक आदेश निकालकर सभी प्राइवेट स्कूलों में एक साल के लिए फीस वृद्धि पर रोक लगा दी थी। साथ ही वाहन शुल्क भी लेने से मना कर दिया था, जिसके खिलाफ एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल उत्तर प्रदेश ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

एजेंडा के लिए हो रहा न्यायपालिका का इस्तेमाल, सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप के लिए लोग जा रहे SC: हरीश साल्वे

न्यायपालिका को कमजोर करने के लिए उस पर हो रहे हमलों पर बात करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने शनिवार (मई 30, 2020) को एक वेबिनार में उपस्थिति दर्ज कराई। इस दौरान उन्होंने कई मुद्दों पर बात करते हुए बताया कि न्यापालिका की आलोचना में क्या दायरे होने चाहिए और क्या कहा जाना चाहिए और क्या नहीं। इस वेबिनार को ‘कैन फाउंडेशन’ द्वारा होस्ट किया गया था, जिसमें साल्वे ने ये बातें कहीं।

इस दौरान साल्वे ने हर्ष मंदर की जम कर आलोचना की, जो हाल ही में सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों में समुदाय विशेष को उकसाते हुए पाया गया था। मंदर दूसरे समुदाय को भारत सरकार के खिलाफ भड़काता रहा है और वो खुद को एक्टिविस्ट भी बताता है। साल्वे ने कहा कि कई ऐसे लोग हैं, जो रोज-रोज कोर्ट को गाली देते हैं। ऐसे लोग सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए कहते हैं कि उन्हें न्याय की उम्मीद नहीं है और अगले ही दिन भागे-भागे कोर्ट में आते हैं।

साल्वे ने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट को इन्हें नज़रंदाज़ करना चाहिए? उन्होंने कहा कि सबसे अच्छा विकल्प यही है कि इन्हें भाव ही न दिया जाए। इसके बावजूद साल्वे ने आत्ममंथन पर जोर दिया। उन्होंने मीडिया के एक लेख के बारे में बात करते हुए कहा कि उसमें भारतीय न्यापालिका को आशाहीन बताते हुए अंतरराष्ट्रीय न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद जताई गई है। उन्होंने इसे दायरा लाँघना करार देते हुए कहा कि ये फ्रीडम ऑफ स्पीच और लिबर्टी ऑफ एक्सप्रेशन का उल्लंघन है।

साल्वे ने कहा कि कोर्ट के किसी फैसले के आधार पर आलोचना होना ठीक है लेकिन ये कहना कि अदालत ये करे और ये न करे, सही नहीं है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि आजकल लोग कोर्ट के किसी फैसले की आलोचना की जगह कोर्ट की ही आलोचना करते हैं और अपना एजेंडा पूरा करने के लिए अदालत जाते हैं। साल्वे ने सरकार से व्यक्तिगत मानहानि के लिए एक ट्रिब्यूनल के गठन की माँग की है। उन्होंने यूके का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ व्यक्तिगत मानहानि के मसलों को फ़ास्ट-ट्रैक आधार पर सुलझाया जाता है जबकि भारत में ऐसे केस सालों चलते रहते हैं।

उन्होंने इस दौरान प्रशांत भूषण के मामले का उदाहरण भी दिया। भूषण ने जस्टिस कपाड़िया के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। इस मामले में अटॉर्नी जनरल ने भी कुछ नहीं किया था, जिसके बाद साल्वे इस मुद्दे को लेकर कोर्ट गए थे। हालाँकि, जस्टिस कपाड़िया तो नहीं रहे लेकिन ये केस अभी भी लंबित पड़ा हुआ है। साल्वे ने कहा कि सामान्य ‘ट्रोल्स’ को नजरंदाज किया जा सकता है लेकिन जो लोग जनता को किसी मुद्दे पर प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, उनसे इन मामलों में सावधानी से निपटा जाना चाहिए। इनमें एक्टिविस्ट और ओपिनियन मेकर वगैरह आते हैं। साल्वे ने कहा:

“कई लोग सरकार को बदनाम करने का एजेंडा लिए कोर्ट में आते हैं। जब निर्णय उनके पक्ष में नहीं आता तो वो जज पर बेईमान होने का आरोप लगा देते हैं। एक जज को बिना डरे काम करने और ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की शपथ लेनी होती है लेकिन आज मीडिया दौर के दौर में एक जज के मन में हमेशा पब्लिक ओपिनियन उसके खिलाफ जाने का भय बना रहता है। अगर सोशल मीडिया में निंदा का ये दौर चलता ही रहा तो फिर आज से 20 साल बाद प्रैक्टिस करने के लिए कोर्ट का अस्तित्व ही न हो, ऐसा हो सकता है।”

लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित के मामले में एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन द्वारा किए गए मीडिया ट्रायल की भी साल्वे ने आलोचना की। उन्होंने बताया कि श्रीनिवासन जैन ने उन्हें कॉल कर के पूछा था कि आखिर पुरोहित को जमानत कैसे मिल गई? बकौल साल्वे, उन्होंने जवाब दिया कि आप इतने निश्चित कैसे हो कि बेल मिलना चाहिए था या नहीं? तब तो एडिशनल सोलिसिटर जनरल की जगह आपको ही कोर्ट में दलीलें पेश करनी चाहिए थीं?

उन्होंने बताया कि संचार एजेंसी पीटीआई ने एक बार प्रकाशित कर दिया था कि उन्होंने कोर्ट में कहा कि हाँ, उनके क्लाइंट ने टैक्स की चोरी की है। उन्होंने बताया कि एजेंसी के किसी सदस्य को किसी ने ऐसा बोल दिया कि ये साल्वे के शब्द हैं और उसने छाप दिया। उन्होंने कोर्ट में लगातार जाने वाली जनहित याचिका के बारे में कहा कि यह सरकार के कामकाज पर असर डालने का एक हथियार बन गया है। उन्होंने बताया कि एक समय था, जब जुडीसियरी ही सरकार चला रही थी।

बता दें कि हरीश साल्वे ने ही इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव मामले में भारत का पक्ष रखा था। जाधव का पहरण कर के उन पर भारतीय जासूस होने का आरोप लगाया गया और फाँसी की सजा सुना दी गई। पाकिस्तानी सैन्य अदालत के इस फैसले पर अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने रोक लगा दी। हरीश साल्वे जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने का भी समर्थन कर चुके हैं।

बालों से दुखी सागिरका घोष ने माँगा बार्बर, केजरीवाल ने खोल दिए सैलून, ट्विटर पर बताया भी- जाइए कटवा लीजिए

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार (जून 1, 2020) को राज्य में कोरोना वायरस की स्थिति को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली के बॉर्डर एक हफ्ते के लिए सील होंगे। इस दौरान केवल पास के जरिए जरूरी सेवाओं से जुड़े लोग आवाजाही कर सकेंगे।

इस दौरान मुख्यमंत्री केजरीवाल ने बताया कि दिल्ली में सैलून खोलने की अनुमति है। केजरीवाल के इस फैसले से खुश महिला पत्रकार सागरिका घोष ने ट्वीट करते हुए लिखा कि ये उनके बालों की समस्या को लेकर लगाई गई गुहार का ही नतीजा है कि सीएम अरविंद केजरीवाल ने नाई की दुकान और सैलून खोलने की इजाजत दी। सागरिका ने इसके लिए सीएम को धन्यवाद कहा।

सीएम केजरीवाल ने इसका जवाब देते हुए लिखा, “जाइए कटवा लीजिए।” दिल्ली बीजेपी के मीडिया प्रभारी प्रत्यूष कंठ का कहना है कि सीएम केजरीवाल ने महज 60 सेंकेंड के अंदर सागरिका के ट्वीट का जवाब दे दिया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि दिल्ली बीजेपी चीफ मनोज तिवारी लगातार सीएम से पूछ रहे हैं कि उन्होंने टीवी और प्रिंट विज्ञापनों, नए हॉस्पिटल बेड और वेंटीलेटर आदि पर कितने खर्च किए, मगर वो जवाब नहीं दे रहे हैं। उन्होंने सागरिका घोष से मदद माँगी है, क्योंकि सीएम केजरीवाल ने उन्हें तुरंत जवाब दिया।

वहीं सोशल मीडिया पर भी इस ट्वीट को लेकर दिलचस्प प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। वोक श्री सनीचर नाम के एक यूजर ने लिखा, “बालों से दुखी महिला पत्रकार ने लगाई गुहार, केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा – ‘कटवा लीजिए”

एक यूजर ने लिखा, “आप स्वयं जाकर काटोगे?”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “सेठजी को आम जनता की सुखकारी के आलावा सब कुछ मालूम है। सेठ एक खास बिरादरी के हेयर कट तक की सेवा कर देंगे। दंगाई बलात्कारी के लिए पैसे हैं। पैसे नहीं है तो सिर्फ आम नागरिक और दिल्ली के कर्मचारी के लिए। वरना 12 मिनट की कोरोना की समझ देनी हो पेपर में तीन-तीन पन्ने की ऐड पैसे तो हैं।”

आशीष सिंह माही नाम के यूजर लिखता है, “दिल्ली में कोरोना विस्फोट हुआ है और मुख्यमंत्री कह रहे हैं एन्जॉय करिए, इतनी संवेदनहीनता लाते कहाँ से हैं अरविंद केजरीवाल?”

एक ने लिखा, “दिल्ली में लाश के ऊपर लाश रखी हुई है। अस्पतालों में मरीजों के इलाज की जगह नहीं है। पूरी दिल्ली खुल गई है। अब ऑटो में भी चार सवारी बैठ सकती है। आने वाला समय किस कदर होने वाला है। इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। लेकिन यह धूर्त बाल कटवाने की वकालत कर रहा है।”

एक यूजर लिखता है, “दिल्ली वालों के लिए साफ पानी सप्लाई के लिए भी कोई खास वर्ग आगे आकर इसी तरह माँग करे तो उनकी भी माँग पूरी हो सकती है।”

इकबाल अहमद नाम के शख्स ने लिखा, “पत्रकार का पॉवर! एक दिन पहले सैलून खोलने का ट्वीट दूसरे दिन सैलून खुल भी गया। खास बात कि ट्वीट कर के मुख्यमंत्री बता भी दिए जाइए सैलून खुल गया। यह फैसला उस वक़्त जब दिल्ली की सीमा सील की जा रही है। काश मज़दूरों के ट्वीट पर इसी तरह फौरन एक्टिव होते मुख्यमंत्री जी।”

बता दें कि सागरिका घोष ने 30 मई को एक ट्वीट करते हुए सीएम केजरीवाल से गुहार लगाई थी कि दिल्ली में हेयर कट सर्विस को चालू कर दिया जाए।

पाकिस्तानी उच्चायोग की ‘असली कार’ में घूम रहे थे ‘नकली आधार’ वाले जासूस: जानें, कैसे पकड़े गए

नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में तैनात दो कर्मचारी 31 मई 2020 को जासूसी करते रंगे हाथ पकड़े गए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इन्होंने खुद को भारतीय बताने के लिए फर्जी आधार कार्ड बनवा रखा था।

उच्चायोग के वीजा विभाग में कार्यरत इन जासूसों की पहचान आबिद हुसैन और ताहिर हुसैन के तौर पर की गई है। दोनों को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने ट्रेनिंग दी थी। दोनों को उनके ड्राइवर जावेद हुसैन के साथ 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने को कहा गया है।

रिपोर्टों के अनुसार इन्होंने भारत छोड़ दिया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के हवाले से वाघा बॉर्डर के जरिए इनके वापस लौट आने की पुष्टि की गई है।

पत्रकार आदित्य राज कौल ने एक वीडियो शेयर किया है। जिससे पता चलता है कि दोनों जासूसी के लिए पाकिस्तानी उच्चायोग के आधिकारिक वाहन का इस्तेमाल करते थे। इस गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर 89 CD 106 है। कार का शीशा टूटा हुआ था और पकड़े जाने के बाद इन्होंने भागने की कोशिश भी की थी।

पाकिस्तानी उच्चायोग इस कार को बेचने की फिराक में था। इसकी ब्रिकी के लिए कुछ दिन पहले उच्चायोग की ओर से लोकल न्यूजपेपर में विज्ञापन दिया गया था।

आबिद हुसैन और ताहिर खान फर्जी आधार कार्ड लेकर इसी कार से घूम रहे थे। आबिद ने नासिर गौतम के नाम से आधार बनवा रखा था। इन्हें जब पकड़ा गया तब ये करोलबाग में संवेदनशील जानकारी हासिल करने के लिए एक ‘डिफेंस कर्मचारी’ से मिलने गए थे। इनके पास से 15 हजार रुपए और दो आईफोन भी मिले हैं।

कौल ने 2.20 मिनट का एक वीडियो भी शेयर किया है। इसमें 42 वर्षीय आबिद हुसैन एक रेस्तरां में किसी से बात कर रहा है। कौल ने वीडियो में दिख रही तिथि गलत है डिस्क्लेमर के साथ इसे साझा किया है। यह वीडियो वायरल हो रहा है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार सैन्य खुफिया ईकाई को कुछ हफ्ते पहले आबिद और ताहिर हुसैन के बारे में विश्वसनीय जानकारी हाथ लगी थी। पता चला था कि वे सेना के बारे में गोपनीय जानकारी जुटाने की कोशिश में लगे हैं। उनके निशाने पर आर्मी से जुड़े लोग थे। उनसे ये नकली भारतीय पहचान के साथ संपर्क करते थे।

इसके बाद से ही सैन्य खुफिया ईकाई की इन पर नजर थी। सूत्रों के अनुसार ISI ने इन्हें ऐसे लोगों की सूची भी दे रखी थी जिन्हें अपने जाल में फॉंसना था। इनके करोलबाग जाकर किसी से मिलने की सूचना मिलने के बाद सैन्य खुफिया ईकाई ने दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के साथ जाल बिछाया और इन्हें धर-दबोचा।

जब इनसे इनकी पहचान को लेकर सवाल किया गया तो आबिद ने खुद को गीता कॉलोनी निवासी नासिर गौतम बताया। उसने इसकी पुष्टि के लिए आधार कार्ड भी दिया। लेकिन अधिकारियों को जल्द ही पता चल गया कि यह फर्जी है। कार्ड पर ‘Gautam’ की जगह ‘Gotam’ लिखा था। पूछताछ में दोनों ने पाकिस्तानी नागरिक होने और दिल्ली स्थित उच्चायोग में तैनात होने की बात कबूल ली।

गौरतलब है कि इससे पहले 2016 में, पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारी महमूद अख्तर के पास से संवेदनशील दस्तावेज मिलने के बाद उन्हें persona non grata घोषित किया गया था।

पूछताछ के दौरान, अख्तर ने खुलासा किया था कि वह पाकिस्तान सेना की बलूच रेजिमेंट से संबंधित था और डेपुटेशन पर पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी इंटर-सर्विस इंटेलिजेंस (ISI) में शामिल हो गया था। वह सितंबर 2013 से नई दिल्ली के पाकिस्तानी उच्चायोग में तैनात था।

पाकिस्तान के उच्चायुक्त को तत्कालीन विदेश सचिव ने बुलाया और अख्तर की गतिविधियों पर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान ने उसी दिन बदले की नीयत से इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के एक सहायक कार्मिक और वेलफेयर अधिकारी सुरजीत सिंह को persona non grata घोषित कर दिया था। इस बार भी अपने दो जासूसों की पोल खुलने के बाद से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है।

अगर बॉर्डर खोल दिया तो बाहरी लोगों से 2 दिन में भर जाएगा अस्पताल का बेड: केजरीवाल का असंवेदनशील तर्क

देश में अब Unlock 1.0 को शुरू किया जा चुका है। इसका सीधा मतलब है कि देश में अब धीरे धीरे कर लॉकडाउन को खत्म किया जाएगा। इस बीच दिल्ली सरकार की तरफ से एक अहम फैसला लिया गया है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार (जून 1, 2020) को मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि वो दिल्ली की सभी सीमाओं को 1 हफ्ते के लिए सील कर रहे हैं।

इसके पीछे उन्होंने बेहद ही बेतुका और असंवेदनशील कारण दिया। उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि दिल्ली में कोरोना के केस तेजी से बढ़ रहे हैं। ये चिंता की बात तो है, लेकिन घबराने की बात नहीं है। वो इसलिए क्योंकि AAP की सरकार ने दिल्ली के अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं में खूब पैसा लगाया। काफी सारे नए हॉस्पिटस, आईसीयू, मोहल्ला क्लीनिक खोला। सारे इलाज मुफ्त कर दिए।

केजरीवाल आगे कहते हैं, “दिल्ली सरकार ने पिछले 5 सालों में स्वास्थ्य सेवाओं में अभूतपूर्व विकास किया और यही वजह है कि जब कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण देश और दुनिया के कई हिस्सों में स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ ध्वस्त हो गई हैं, आपका मुख्यमंत्री आपको विश्वास दिलाता है कि अगर आपके घर में किसी को कोरोना हो जाता है तो आपको घबराने की जरूरत नहीं है। आपके लिए अस्पताल में बेड खाली है।”

मीडिया को संबोधित करते हुए केजरीवाल बताते हैं,

“आज दिल्ली में 2300-2400 मरीज हैं, जबकि लगभग साढ़े नौ हजार बेड का इंतजाम है। लेकिन अगर हमने बॉर्डर खोल दिए तो पूरे देश भर से लोग दिल्ली इलाज कराने के लिए आते हैं। लोग दो कारण से दिल्ली आते हैं। पहला कारण ये कि यहाँ का इलाज देश के किसी भी राज्य या शहर से अच्छा है और दूसरा कारण यह है कि दिल्ली के अंदर सरकारी अस्पतालों में सब कुछ मुफ्त है। 10 लाख का ऑपरेशन भी मुफ्त में होता है। तो हम जैसे ही बॉर्डर खोलेंगे देश भर से लोग इलाज कराने के लिए दिल्ली आएँगे और जो साढ़े नौ हजार बेड हमने आपके लिए रखे हैं, वो दो दिन में भर जाएँगे।”

उन्होंने दिल्ली की जनता से इस मसले पर सुझाव माँगा है। इसे आप वीडियो में 6:36 से 7:48 के बीच सुन सकते हैं।

गैरतलब है कि यह पहली बार नहीं है, जब केजरीवाल ने दूसरे राज्य के लोगों के लिए इस तरह का बयान दिया है। इससे पहले भी उन्होंने बिहार के लोगों को लेकर विवादित बयान दिया था।

उन्होंने कहा था, “दिल्ली में जिस तरह की व्यवस्था है इस तरह की व्यवस्था किसी राज्य में नहीं है। ऐसा है कि बिहार से एक आदमी 500 का टिकट लेता है और दिल्ली में आता है और अस्पताल में पाँच लाख का ऑपरेशन फ्री में करा के वापस चला जाता है। इससे ख़ुशी भी होती है कि अपने ही देश के लोग हैं, उन्हें इलाज मिलना चाहिए। सभी को ख़ुश रहना चाहिए। लेकिन दिल्ली की भी अपनी क्षमता है। दिल्ली पूरे देश के लोगों का इलाज कैसे करेगी? ज़रूरत है कि देश के अंदर व्यवस्था सुधरे।”

ब्राह्मणों को बदनाम करने से लेकर इस्लामी आक्रांताओं के महिमामंडन तक: NCERT पुस्तकों में गड़बड़ी पर नीरज अत्री से बातचीत

देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की माँग अक्सर उठती रहती है, क्योंकि पाठ्यक्रम और एनसीईआरटी में तथ्यों की विश्वसनीयता शक के घेरे में है। लेखक नीरज अत्री ने इस पर वृहद रिसर्च किया है। अत्री ने कहा कि जब उन्होंने पाया कि इन पुस्तकों में एक तरफ मुगलों और इस्लामिक शासकों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, वहीं दूसरी तरफ हिन्दू राज्यों को ऐसे प्रस्तुत किया गया है, जैसे उनकी कोई विशेषता ही न हो।

उन्होंने बताया कि एनसीईआरटी के माध्यम से ऐसा नैरेटिव बनाया जाता है जैसे ब्राह्मण बाहर से आए थे और उन्होंने यहाँ के लोगों का शोषण किया है। अत्री ने एनसीईआरटी में तथ्यों के साथ हुए इस छेड़छाड़ के लिए 100 से भी अधिक आरटीआई लगाए। उन्होंने एनसीईआरटी पुस्तकों के बारे में बताया कि UPA सरकार के आने के बाद उसमें आर्य-द्रविड़ की थ्योरी परोसी गई, जिससे बच्चों के मन में गलत धारणाएँ बैठीं।

अत्री ने बताया कि डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने पूरी रिसर्च कर इसे पहले ही गलत साबित किया था। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु के पेरियार ने इन चीजों को हवा दी थी। उन्होंने कहा कि इतिहास का लक्ष्य होता है कि बच्चों को उनकी गौरवमयी इतिहास पढ़ाया जाए और अतीत में हुई गलतियों से सीख ली जाए। इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान और अमेरिका का उदाहरण दिया। भारत सबसे पुरानी सभ्यता है और हमारे पास गौरव करने के लिए इतनी चीजें हैं, फिर भी हम अकेले देश हैं जो अपने ही बच्चों का आत्मविश्वास ख़त्म करता है। बताता है कि आपके देश में महिलाओं का शोषण होता है।

जैसे- अगर एक बच्चे पढ़ेगा कि शूद्रों या महिलाओं को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं हैं तो उन पर क्या असर पड़ेगा? अत्री ने ध्यान दिलाया कि वेदों में महिलाओं ने ऋचाएँ लिखी हैं। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति को इतनी गाली दी जाती है, लेकिन उसी मनुस्मृति में लिखा है कि जब एक बच्चे का जन्म होता है तो उसे शूद्र कहा जाता है। इसका अर्थ है कि जिन्हें शूद्र की परिभाषा तक नहीं पता है, वो भारत-विरोधी चीजें पढ़ाने में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

नीरज अत्री ने कहा कि मनुस्मृति भी दो तरह की बाजार में मिलती है। इनमें से एक क्रिटिकल एडिशन है। दूसरे वाले में काफी गलत चीजें लिखी हुई हैं, जिससे पता चलता है कि बाद में उससे काफी छेड़छाड़ की गई और नैरेटिव गढ़ने के लिए उसका इस्तेमाल किया गया। उन्होंने बताया कि एनसीईआरटी ने इसे ऐसे पेश किया, जैसे प्राचीन काल में कानून की यही एकमात्र किताब थी। मनुस्मृति मनु का विचार है, जो वो कुछ ऋषियों को बताते हैं।

अत्री ने कहा कि कहीं उन्हें ऐसा प्रमाण नहीं मिलता है, जहाँ प्राचीन राजाओं में से किसी ने कहा हो कि उनका शासन मनुस्मृति के हिसाब से चलेगा। उन्होंने कहा कि सन्दर्भ से अलग हटाकर चीजों को पेश कर उसका अर्थ बदल दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर, इन पुस्तकों में पढ़ाया गया कि सीमा विवाद के समय मनुस्मृति में प्रावधान है कि राजा को छिपाकर बाउंड्री की मार्किंग करनी चाहिए। इसके बाद बच्चों से पूछा जाता है कि क्या इससे समस्याएँ सुलझेंगी?

असली मनुस्मृति में सीमा की मार्किंग के लिए फल-फूल के पेड़ लगाने की बात कही गई है। देवालय और तालाब बनाने की बात कही गई है। कहीं भी विवादों को सुलझाने के लिए अजीबोंगरीब प्रावधानों का जिक्र नहीं है। उन्होंने एनसीईआरटी की सातवीं की पुस्तक का एक उदाहरण दिया। उसमें लिखा है कि राजपूतों के उद्भव के साथ कई ट्राइब्स ने ख़ुद को जाति व्यवस्था का हिस्सा बनाया, लेकिन रूलिंग कास्ट को ज्वाइन करने की किसी को इजाजत नहीं दी। साथ ही लिखा है कि जिन्होंने जाति व्यवस्था को नकार दिया, उन्होंने इस्लाम अपना लिया।

ऑपइंडिया के संपादक अजीत भारती के साथ नीरज अत्री की बातचीत

अत्री ने बताया कि पंजाब और सिंध के समुदायों को लेकर ये झूठा नैरेटिव गढ़ा गया है, जिसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। जाट से लेकर सभी समुदायों का उलटा इस्लामिक आक्रान्ताओं के खिलाफ लड़ने का इतिहास है। फिर बताया गया है कि अहोम पहले अलग देवी-देवताओं की पूजा करते थे, लेकिन ब्राह्मणों के वहाँ जाने के साथ हिन्दू धर्म का उद्भव हुआ। लेकिन वहाँ के राजाओं ने पूरी तरह अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी। ये बात भी गलत है।

नीरज अत्री कहते हैं कि एक-एक टॉपिक पर इसी तरह अलग नैरेटिव बनाया गया है। उन्होंने जानकारी दी कि चन्द्रगुप्त मौर्य के समय मेगास्थनीज ने अपने भारत दौरे के समय लिखा है कि कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है लेकिन ब्राह्मणों का जीवन सबसे कठिन है। यानी, कसी भी अन्य जाति के लोगों के पास ब्राह्मण बनने का अधिकार था। इसलिए ब्राह्मणों को लेकर जो भ्रांतियाँ फैलाई गई हैं, वो सब गलत हैं।

अत्री ने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में भ्रान्ति फैलाई गई है कि दो ब्राह्मणों ने उसे जला दिया, क्योंकि वे वहाँ के छात्रों की हरकत से गुस्सा हो गए थे। डीएन झा खुद को कम्युनिस्ट बताते हैं और चमत्कार में विश्वास नहीं रखते। लेकिन यहाँ पर उन्होंने दैवीय शक्ति से पानी का झरना फूटने से लेकर सिद्धि से आग लगने तक की बातों को स्वीकार किया है। इसी तरह की कई भ्रान्तियाँ वामपंथियों ने कहीं-कहीं से लाकर फैलाई है।