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भगवा झंडे से समुदाय विशेष को परेशानी क्यों? वो ध्वजा है, मिर्ची नहीं!

हैदराबाद में फलों के ठेले वाले ने भगवा ध्वज लगाया, समुदाय विशेष को दिक्कत हुई, पुलिस को ट्विटर पर बुला लिया, पुलिस भी आई और कहा कार्रवाई होगी। नालंदा में भगवा ध्वज लगाने वाले पाँच लोगों पर पुलिसिया केस बनाया गया कि साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। जमशेदपुर में दुकान के आगे भगवा पोस्टर पर राम-शिव के चित्रों समेत ‘हिन्दू फल की दुकान’ लिखने पर केस दर्ज हुआ क्योंकि किसी मजहब को दिक्कत हो गई।

ये चंद उदाहरण हैं, जो अब बढ़ते ही जा रहे हैं। एक पूरा गिरोह व्यवस्थित तरीके से हिन्दुओं के प्रतीकों पर उनके सिर्फ हिन्दू होने के कारण आक्रमण कर रहा है। क्योंकि इस देश में बलात्कारी और फसादी मुग़ल शासकों के समय से ले कर गाँधी के दौर तक में जजिया कर देने और ‘अब्दुल भाई को छोड़ दो‘ के नाम पर हत्यारे को बचाने की कोशिशें हुई हैं।

इसलिए, हिन्दुओं में हमेशा अपनी ही श्रद्धा प्रदर्शित करने में एक हीनभावना का दिखना आम है। आप अपने कार्यालय ललाट पर तिलक लगा कर जाइए तो आपको ‘मिलिटेंट हिन्दू’ कहा जा सकता है। जबकि तिलक से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, अपनी आत्मशांति के लिए लगाया जाता है। आपके हाथ के कलावे से दिक्कत हो जाती है, और आपको शायद मैनेजमेंट कह देगा कि ‘ये सब डेकोरम के खिलाफ है’।

आपको भी लगेगा नौकरी करना है, ये सब छोड़ा जा सकता है। आप अपने दस भाई-बिरादर को नहीं लाते कि हमारे मजहब पर हमला हो गया। ये विक्टिम कार्ड खेलना हिन्दुओं में न के बराबर दिखता है। जब तक वाकई परेशान ही न कर दिया जाए, हिन्दू बोलता तक नहीं। जब तक दो साधु और एक ड्राइवर भीड़ हत्या का शिकार नहीं हुए, हिन्दू मुखर नहीं हुआ। समुदाय विशेष का चोर भी मरता है तो वो अंतरराष्ट्रीय खबर बनती है।

गूगल पर ‘मौलवी रेप‘ टाइप कर लीजिए आपको दिख जाएगा कि कितनी खबरें हैं, कहाँ-कहाँ से हैं, लेकिन न्याय सिर्फ कठुआ की बच्ची के लिए माँगा जाता है, और उसके दरिंदे बलात्कारियों के हिन्दू होने मात्र से वो एक धार्मिक अपराध बना दिया जाता है। पूरे हिन्दू धर्म पर पाप का बोझ डालने के लिए अपराध में एक हिन्दू का होना मात्र काफी होता है, उसकी मंशा नहीं देखी जाती कि क्या अपराध धर्म के कारण हुआ है, या मर्द होने के कारण।

ख़ैर, ऐसे गिनाता रहूँ तो बहुत समय व्यर्थ होगा। पिछले साल जून-जुलाई में समुदाय विशेष से ‘जय श्री राम’ कहलवा कर मारने-पीटने की सारी घटनाएँ झूठी निकलीं, लेकिन कवरेज याद कीजिए कि कैसा था। जुलाई के बाद आए अगस्त में काँवड़ यात्रा पर ‘मजहबी’ इलाके में कितना पथराव हुआ, उसकी खबरें भी सर्च कर लीजिए, और उसकी कवरेज याद कीजिए। बहाने बनाए गए कि वो तो डीजे बजा रहे थे जैसे कि डीजे बजाने पर समुदाय विशेष द्वारा पत्थर मारना जायज हो जाता है!

आज कल नई नौटंकी चली है: भगवा झंडा लगा रहे हैं हिन्दू, ये गुंडागर्दी है,समुदाय विशेष को चिह्नित करना चाह रहे हैं, उनका व्यवसाय बर्बाद करना चाह रहे हैं। आप सोचिए कि किसी मुस्लिम को आप टोपी लगाने पर ‘गुंडा’ कह सकते हैं क्या? सोचिए कि जब कोई नमाज पढ़ कर आ रहा हो, आपने फोटो खींची और लिख दिया कि कट्टरपंथी गुंडा हिन्दुओं को डरा रहा है!

भगवा झंडे को ले कर बिलकुल वही हो रहा है। बेगूसराय को दलित सब्जीवाले ने अपने ठेले पर लगाया झंडा। उसने बोला कि ‘हिन्दू हूँ, लगाऊँगा’। थूकने वाले कांड के कारण समाज के कई हिस्से में लोग सब्जीवालों को शक की निगाह से देखने लगे हैं। अतः, वो नाम आदि पूछते हैं। इस कारण उस लड़के ने भगवा झंडा लगाया ताकि उसे बार-बार बताना न पड़े।

इस पर समुदाय विशेष की गली में उसे भला-बुरा कहा गया। आप इस बात को पलट दीजिए। समुदाय विशेष का सब्जी वाला टोपी लगाए सामान बेच रहा है, उसे हिन्दुओं को मुहल्ले में उसकी टोपी के कारण लोग गाली देने लगें, धमकाने लगें और उसका वीडियो सामने आ जाए। एक मानव के तौर पर आपको निराशा होगी कि हमारा समाज कहाँ आ गया है। लेकिन क्या बेगूसराय के उस लड़के के लिए वो निराशा आपको मीडिया में दिखी?

इन सारी बातों से साबित यही होता है कि दूसरा विशेष मजहब बस उँगली कर दे कि उसे दिक्कत है इस बात से, और जहाँ उसके तुष्टीकरण में लगी सरकार है, वो हिन्दू पर कार्रवाई करेगी। और, समुदाय विशेष इस बात का फायदा खूब ले रहा है। राँची में रहने वाले एक पत्रकार मित्र बताते हैं कि झारखंड में समुदाय विशेष ने इस बात का खूब फायदा उठाया है। वो किसी भी बात की तस्वीर ले कर पुलिस को टैग कर देते हैं, और पुलिस को आदेश आता है कि इस पर कार्रवाई करो। जमशेदपुर फल वाला उसी कारण से केस का हिस्सा बना था।

भगवा झंडे से परेशानी: अल्पसंख्यक कौन है?

लम्बे समय तक जमे रहने वाले सत्ताधीशों को जब यह समझ में आ गया कि एकमुश्त वोट पाने के लिए इस्लामी उम्मा की बातों पर ध्यान देना आवश्यक है, तो उन्होंने न सिर्फ समुदाय विशेष का तुष्टीकरण किया, बल्कि ये भी सुनिश्चित किया कि समुदाय विशेष को ‘मोर इक्वल’ ट्रीटमेंट मिले। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘अल्पसंख्यक’ शब्द सुनते ही हमेशा एक ही मजहब के लोगों की ही बात होती दिखती है।

‘अल्पसंख्यकों पर हमला’, ‘अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएँ’ आदि आप जब सुनेंगे तो आपको विशेष मजहब वाला ही दिखेगा। जबकि, यह मजहब इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। हिन्दू इस देश के करीब आठ राज्यों में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उस पर सुप्रीम कोर्ट में कभी-कभी केस पहुँचता है, जिसे नकार दिया जाता है। जैन, बौद्ध, पारसी, सिख आदि असली अल्पसंख्यक समुदाय को आप शायद ही कभी अपने अल्पसंख्यक होने का विक्टिम कार्ड फेंकते देखेंगे।

सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना करने वाले जनपद-महाजनपद वाले इस राष्ट्र में दोबारा लोकतंत्र बहाल हुआ तो, पश्चिमी देशों से आयातित विचाराधारा के नेताओं के कारण ये भी मान लिया गया कि क्रूसेड लड़ने वाले ईसाई मुल्कों की तरह भारत में भी ‘मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होगा’। जबकि, उन्होंने न तो निकट का इतिहास देखा, न पुरातन क्योंकि हिन्दू न कभी आक्रांता बना है, न ही अपने ऊपर आक्रमण करने वाले को भी भगाया।

मुस्लिमों और अंग्रेजों को ने इस देश पर हमला बोला, तबाही मचाई, अर्थव्यवस्था बर्बाद की, लेकिन हिन्दू आज भी उनके साथ रह रहा है। इसके उलट, बाकी मुस्लि राष्ट्रों में हिन्दुओं की गिरती जनसंख्या इस बात का सबूत है कि इस्लामी मुल्क इस्लाम के अलावा और कुछ देखना ही नहीं चाहते। अगर संयुक्त राष्ट्र या मानवाधिकारों जैसी हास्यास्पद चुटकुलेबाज संस्थाएँ हट जाएँ, तो दस दिन नहीं लगेंगे इस्लामी मुल्कों को अपने देशों से वहाँ के अल्पसंख्यकों के सामूहिक नरसंहार करने में।

हिन्दुओं ने कभी भी किसी भी तरह का धार्मिक अत्याचार किसी भी दूसरे मजहब पर कभी नहीं किया। उसके उलट, मध्ययुगीन इस्लामी बलात्कारी लुटेरों ने मजहबी अत्याचार के अलावा कभी कुछ किया ही नहीं। फिर भी आज तक हिन्दू जबरन पाँच बार अजान सुनता ही है, सड़कों पर होते नमाज को देख कर गाड़ी रोकता ही है, दुर्गा के विसर्जन की तारीख बदलता ही है।

इन सबके बावजूद, हमारे संविधान निर्माताओं को ये लगा कि हिन्दू सर्वसमावेशी नहीं है, वो दुसरे मजहब के आदमी को मार-काट देगा, अत्याचार करेगा, और अल्पसंख्यक आयोग की नौटंकी कर दी। नौटंकी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ऐसे आयोग की स्थापना में ही एक अनकही अवधारणा होती है कि बहुसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यकों पर अत्याचार ही करेगा।

हिन्दू ने कहाँ अत्याचार किया, किसी इस्लामी राष्ट्र को तो छोड़िए, टोले-मुहल्ले से विशेष मजहब को भागने पर मजबूर किया, ये बात दे कोई। उसके उलट इसी देश में कट्टरपंथियों ने कश्मीर की 100% हिन्दू जनसंख्या को कुछ सौ सालों में चार प्रतिशत में समेट दिया। आपको क्या लगता है कि हिन्दुओं ने बच्चे पैदा करना बंद कर दिए कश्मीर में या वहाँ से वो भाग गए? जी नहीं, सामूहिक नरसंहार हुए हिन्दुओं के और 1989-90 वाला तो अंतिम था…

कैराना, मेरठ आदि के गाँवों से हिन्दू पलायन कर रहे हैं, ‘ये घर बिकाऊ है’ लिख कर। यहाँ मुस्लिम रहते हैं और उन्होंने हिन्दुओं का जीना हराम कर रखा है। उनकी बहू-बेटियों पर फब्तियाँ कसते हैं। ऐसी ही खबर दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में आई थी कि हिन्दुओं की बच्चियों के सामने मजहब विशेष के लड़के न सिर्फ नंगे हो कर इशारे से उन्हें बुलाते हैं, बल्कि उन्होंने उनके कपड़े तक उतार लिए थे।

और आपने बनाया अल्पसंख्यक आयोग… पहले ही ये सोच लिया कि बहुसंख्यक है तो अत्याचार करेगा ही क्योंकि अमेरिका में श्वेत बहुसंख्यक वही कर रहा था और पूरे यूरोप में ईसाई लोग यहूदी और मजहब विशेष से सदियों से सतत युद्ध की स्थिति में थे ही। उन्हें लगा कि सभ्य समाज में ‘सेकुलर होने की जरूरत है’। हिन्दू को कभी सेकुलर होने की आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि उसने कभी ‘नॉन-सेकुलर’ दुष्कृत्य किए ही नहीं। ये काम इस्लामी और ईसाई आक्रांताओं का विशेषाधिकार रहा है।

अल्पसंख्यकों का प्रपंची विलाप: भगवा झंडे से हमें परेशानी है

कायदे से देश को हिन्दुओं को सुरक्षित करने के लिए ‘बहुसंख्यक आयोग’ की स्थापना करनी चाहिए थी ताकि उसकी पीड़ा को विशेष ध्यान दे कर समझा जा सके। ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कोई भी राजनैतिक नीति बनाने से पहले आपके समक्ष ऐसे उदाहरण होने चाहिए जिससे साबित हो कि उस नीति की आवश्यकता है। विभाजन के समय की मार-काट में तो दोनों ही तरफ के लोग थे, फिर ये क्यों मान लिया गया कि हिन्दू ही अत्याचार करेगा?

उससे पहले जब अंग्रेजों ने दंगे करवाए, तब भी दोनों तरफ के लोग अपराधी थे, फिर ये क्यों माना गया कि हिन्दू ही अत्याचार करेगा? क्या कहीं पर भी हिन्दुओं ने किसी ट्रेन की बॉगी में जा रहे 59 मौलवियों को आग से जलाया? क्या किसी हिन्दू ने किसी मस्जिद को तोड़ कर मंदिर खड़ी की? क्या किसी हिन्दू ने भारत से बाहर आक्रमण करके, देश पर कब्जा करने के बाद पूरी आबादी को जबरन हिन्दू बनाया?

जब इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं था तो फिर स्वतः संज्ञान लेने की ऐसी जल्दी क्या थी कि मजहब विशेष के लिए एक आयोग बनाना पड़ा। मजाक की सीमा तो यह है कि कश्मीर में भी चार प्रतिशत में सिमटा हिन्दू अल्पसंख्यक नहीं माना जाता, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर वो बहुसंख्यक है।

कॉन्ग्रेस ने राजनैतिक दूरदर्शिता दिखाते हुए एक आबादी को अपने वोटों के लिए न सिर्फ इस्तेमाल किया बल्कि ‘मोर इक्वल’ ट्रीटमेंट देते हुए उन्हें इस स्तर पर पहुँचा दिया कि इस राष्ट्र में हिन्दू दूसरे दर्जे का नागरिक है। सत्तर साल के इसी स्पेशल ट्रीटमेंट ने उन्हें इतना बलशाली बना दिया है कि उनके पास राजनैतिक प्रतिनिधित्व हो या न हो, वो सड़कों पर अपना प्रतिनिधित्व स्वयं करने लगते हैं और उसका जोड़ किसी के पास नहीं।

इनके नेता सौ करोड़ हिन्दुओं को पंद्रह मिनट में निपटाने की बात कर देते हैं और उस पर कुछ नहीं होती। ऐसे बयान बार-बार आते रहते हैं, लेकिन मीडिया को ऐसा नहीं लगता कि ये धमकी है, उकसाना है। शायद मीडिया भी समझती है कि उकसना भी समुदाय विशेष का ही विशेषाधिकार है, हिन्दू को तो कुछ भी कर लो, सड़क पर वो आने से रहा। आहत होना भी समुदाय विशेष का ही विशेषाधिकार है, और वो दोनों ही सूरतों में इसका प्रयोग कर लेता है: उसके मजहब पर टिप्पणी करो तब भी, अपने धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल करो तब भी।

समुदाय विशेष के आहत होने का कोई ओर-अंत नहीं। दिल्ली के दंगे भी वही करता है, तैयारी के साथ करता है, और फिर विचित्र तरीके से रोता भी है कि समुदाय विशेष के सफाए की बात हो रही थी, नरसंहार हो गया! फैसल फारूख के स्कूल की छत हो, या आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन के घर की छत… हर पंद्रह घर की छत पर गुलेल, पेट्रोल बम, एसिड की बोतलें… मस्जिद की छत पर पत्थरों का ढेर… फिर भी, समुदाय विशेष रो रहा है कि हिन्दुओं ने दंगा किया! सोशल मीडिया का दौर न होता तो ये भी गोधरा की तरह हिन्दुओं के सर पर डाल दिया जाता भले ही 59 कारसेवकों को जलाने का घिनौना काम समुदाय विशेष ने किया।

समुदाय विशेष की यही दिल को दीवाना बना देने वाली अदा आज हमें जमशेदपुर, नालंदा, बेगूसराय से ले कर हैदराबाद तक दिख रही है कि वो भगवा झंडा देखते ही परेशान हो जाते हैं। आप भला सोचिए कि झंडे से किसी को परेशानी क्यों होगी? चूँकि उम्माह की भाषा और राह पर चलने वाले समुदाय विशेष की अधिकता है दुनिया में, जो खुल कर कहते हैं कि राष्ट्र और इस्लाम में चुनना पड़ा तो इस्लाम चुनूँगा, वैसे में हिन्दू इनके गजवा-ए-हिन्द की राह में तो मोहम्मद बिन कासिम के समय से बैठा हुआ है, तो समस्या तो होगी ही।

इसलिए, भगवान हनुमान का स्टिकर ‘मिलिटेंट हिन्दुइज्म’ हो जाता है। राम के हाथ का धनुष कभी इन्हें हिंसा को बढ़ावा देने वाला लगेगा। फिर कहेंगे कि दुर्गा के हाथों से शस्त्रास्त्रों को हटा कर फूल-पत्तियाँ दे दो, चाँद-तारा दे दो तो और भी अच्छा, हिजाब पहना दो तो और बेहतर… बुर्के में दिखा दो तो गाल पर गीली पप्पियाँ ही ले लेगा कट्टरपंथी!

कमाल की बात देखिए कि यहाँ मूर्तियों के हाथों में अस्त्र है, चित्रों को चेहरे पर के रौद्र भाव से वो ‘मिलिटेंट’ प्रवृत्ति का हो जाता है, लेकिन इन्हीं कट्टरपंथियों को दुनिया के हर शहर में पूरे देह पर बम बाँध कर फटने वाले कट्टरपंथियों को आतंकी कहने में अभी तक दर्द होता है। चित्र में चेहरे के भाव और जमीन पर लाशों के ढेर पर टुकड़ों में बिखरा कट्टरपंथी… ज्ञानी लोगों के लिए चेहरे का भाव ज्यादा खतरनाक है।

ये मजाक नहीं है। इन्होंने अंग्रेज़ी के हिन्दुइज्म को सही माना है और उसके हिन्दी अनुवाद ‘हिन्दुत्व’ को आतंकी कह दिया है। ये मूर्खता है या धूर्तता, ये समझनें में समय लग जाएगा। ईद में सेवई की खीर माँगता हिन्दू असली हिन्दू है, उसने घर पर भगवा झंडा लगा लिया तो वो मिलिटेंट माना जाएगा। दीवाली पर पटाखे से होने वाली आवाज से जानवरों को हो रही परेशानी पर यही समुदाय विशेष और उसके हिमायती लम्बे ज्ञानवर्धक पोस्ट लिखते हैं, बकरीद पर कटते जानवरों सो कोई समस्या नहीं। अरे! वो तो मर ही गया, अब कष्ट कैसा! असली कष्ट तो जिंदा हो कर पटाखे सुनने में है!

भगवा झंडा: हिन्दुओं की गरिमा, सम्मान और परिभाषा का अंश

बात भगवा झंडे या रंग की नहीं, बात यह है कि सामाजिक बहुसंख्यक होने की परिणति जब दो बार राजनैतिक बहुसंख्यक होने में दिखी है, और कुछ लोगों को लग रहा है कि उनके ‘साड़कीय शक्ति प्रदर्शन’ का युग हाथों से चला जाएगा कुछ सालों में, तो कम होते तेल वाले दीये की फड़फड़ाती लौ की तरह वो अब और मुखर हो चले हैं। अब लक्ष्य स्वयं की शक्ति को दिखाने भर का नहीं, अब हिन्दुओं पर वैचारिक धावा बोलने का है कि तुम्हारा अस्तित्व मात्र ही इस दुनिया के लिए हानिकारक है।

वैसे, हम सब जानते हैं कि वो मजहब कौन सा है जिसके आतंक का ताप हर देश का हर शहर झेल चुका है जहाँ ये हैं, या नहीं हैं। यही कारण है कि इनकी मुखरता अपनी टोपी कस कर पहनने और सड़कों के नमाज से आगे, लॉकडाउन में भी मस्जिदों को आबाद करने से ले कर, अब हिन्दुओं के दुकानों के नाम, उनके ठेले के झंडे तक पहुँच चुकी है। ये अभी कुछ दिन चलेगा क्योंकि दुर्भाग्य से तुष्टीकरण कुछ जगहों पर चल ही रहा है, वहाँ के हिन्दू अभी भी राजनैतिक रूप से सो ही रहे हैं।

बात भगवा झंडे की नहीं, बात अनुच्छेद 370 से शुरु हो कर, अयोध्या विवाद और चोर-लुक्कर घुसपैठिया समुदाय विशेष को यहाँ से निकालने वाले NRC और CAA तक पहुँच चुकी है। यही तो कारण है कि कानूनी रूप से जितने कट्टरपंथी यहाँ हैं, उससे कहीं ज्यादा होने का क्लेम इनके नेता कर देते हैं। दो करोड़ बांग्लादेशी मुस्लिम हैं इस देश में, और वो दीमक हैं, उनको कीटनाशक जाल कर बाहर निकालना चाहिए और फिर अपने देश वापस भेदने की तैयारी होनी चाहिए।

इसलिए, पाकिस्तानियों के लिए जासूसी करने से ले कर, भारत में बम फोड़ने वालों को बाहर निकालने के लिए कानून आया, तो आतंक के हिमायतियों की सुलगने लगी है। वो परेशान हैं कि गजवा-ए-हिन्द की राह में ये लोकतंत्र कैसे आ गया, अभी तक तो बलात्कारियों और लुटेरों को ताजमहल निर्माता बता कर भारत की रक्षा करने वाला बता कर, मुग़ल सल्तनत पढ़ाते रहे, कुछ दिनों में कश्मीर से संस्कृत को गायब कर उर्दू पहुँचाने की तरह भारत में भी वही होने वाला था, लेकिन ये CAA से तो गड़बड़ हो गई!

इसीलिए, दोनों तरफ से संवैधानिक तरीके से चुनी हुई सरकार और उसके समर्थकों पर नाजायज हमले हो रहे हैं। भगवा रंग से आपत्ति हो रही है, ट्विटर पर पुलिस संज्ञान ले रही है और कोई भी वीडियो बना कर बता रहा है कि उस हिन्दू ठेले वाले के हिन्दू प्रतीक ध्वज के इस्तेमाल से उसकी भावनाएँ आहत हो रही हैं। हिन्दू इस तरह से हीनभाव में जीता रहा है कि एक बार उसे भी लगने लगता है कि ‘यार! क्यों लगा दिया भगवा झंडा?’

हिन्दू स्वतः बैकफुट पर आ जाता है कि जरूर हमने ही गलती की होगी। चार-पाँच सौ सालों का आतंकी सेकुलरिज्म यही तो है कि जिस धरती के लोगों ने लुटेरों, समुदाय विशेष के आतंकियों, अंग्रेज चोरों को बसने दिया, वो अब हिन्दुओं को इसलिए सजा दे रहा है कि तुम्हारे पास मौका था तो तुमने समुदाय विशेष के आक्रांताओं की तरह सत्ता हासिल करते ही कत्लेआम क्यों नहीं मचाया!

अरे भाई! हिन्दू गाय पालने और मंदिर में पूजा की घंटी बजाने से आगे गया ही कब? हमारे अखाड़ों की शस्त्र परंपरा को पानी कर ही दिया गया, गुरुकुल तबाह कर दिए, संस्कृति पर सतत हमले किए, विश्वविद्यालयों को आग लगाया ही… हिन्दू तो बाबर का बेटा हुमायूँ और हुमायूँ का अकबर रटने में व्यस्त रहा और अपने आराध्य को टेंट से निकालने में उसे सात दशक लग गए। हम कहाँ जा कर हमला करते? कभी किया ही नहीं।

जबकि ईसाइयों और मुगलों का पूरा इतिहास रक्तरंजित रहा है, मजहब की आड़ में एक प्रसारवादी, साम्राज्यवादी सोच के साथ इनके लुटेरों की फौजें हजार सालों से योजनाबद्ध तरीके से उपनिवेश बनाने से लेकर पूरे राष्ट्रों को मजहब बदलने पर मजबूर किया है। हिन्दू प्राचीन भारत की सीमाओं से बाहर गया ही नहीं। कहीं भी धर्म-परिवर्तन का जिक्र नहीं, किसी राजा ने जीते हुए साम्राज्य के पवित्र स्थलों को तोड़ा हो, ऐसी भी नहीं दिखता। राजाओं ने जीते हुए क्षेत्रों पर राज किया, प्रजा के इतिहास को मिटाने की कोशिश नहीं की, उनकी बच्चियों का बलात्कार नहीं किया।

इसलिए, वो अपने ही धर्म का अनुयायी होने पर, उसी के प्रतीकों के इस्तेमाल पर स्वयं पर संदेह करने लगता है कि पूजा करना गलत तो नहीं, कलावा लगाना गलत तो नहीं, रोली-चंदन और अक्षत को ललाट पर धारण करना गलत तो नहीं?

भगवा झंडा और हिन्दू

यज्ञ की अग्नि की ऊपरी लौ का रंग भगवा होता है, बीच का पीला, नीचे लाल। यज्ञ में आहुतियाँ दी जाती हैं, त्याग किया जाता है। अग्नि स्वयं तो पवित्र है ही, बल्कि अपने संपर्क में आने वाली वस्तुओं को भी पवित्र करती है। अग्नि ऊर्जा है। हर पवित्र, मंगलकारी कार्य की जड़ में अग्नि किसी न किसी रूप में स्थित होती है।

भगवा रंग उसी अग्नि के रूप का परिचायक है। भगवा उसी त्याग का प्रतीक है जो यज्ञ कुंड की आहुति होती है। भगवा वस्त्र वहीं धारण करता है जिसने सब कुछ त्याग दिया हो। कुछ साधु जो शिष्यादि हैं, वो पीला वस्त्र पहनते हैं। भगवा वही धारण करते हैं जिन्होंने सांसारिकता का त्याग कर दिया है, और सिर्फ समाज-राष्ट्र कल्याण के लिए समर्पित हैं।

भगवा झंडा उसी पवित्रता का प्रतीक है। भगवा रंग अग्नि के उसी भाव का प्रतीक है, इसलिए सनातन आस्था से जुड़े हर धर्म में (सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि) में इस रंग का स्थान सर्वोच्च है। ध्वज का होना हिन्दुओं को अपने संतों की याद दिलाता है, जिन्होंने सहस्त्रों वर्षों से इस भारतभूमि और सनातन परंपरा को बताए रखा। जो हमारे आज के लिए पूर्व में स्वयं को बलिदान कर गए।

इसलिए, यह रंग किसी की आँखों को चुभता है तो समस्या उसकी है। ये उसकी दुष्टता और नीचता है कि उसे हमारे धर्म के प्रतीक चिह्नों से घृणा है। वो अत्यंत ही अधम श्रेणी का जीव है जिसे दूसरे मानव की आस्था से समस्या है। इन्हें आम जनता ही जवाब देगी, वही प्रतिकार भी करेगी, वही इन्हें इनके अपराधों की याद भी दिलाएगी।

हिन्दू हमेशा थोड़ा लम्बा रास्ता लेता है। कुछ लोग दंगों के छोटे रास्ते से चलते हैं। वो भले ही बाबरी मस्जिद में कुछ साल नमाज पढ़ लें, लेकिन रामलला तो अपने ही जन्मस्थान में जाएँगे। लोकतंत्र का ही प्रयोग कर अगर पुलिस आज भगवा झंडे लगाने पर केस दर्ज कर रही है, तो यही पुलिस उसे वापस भी लेगी क्योंकि उसके हाथों को बाँधने वाले नेता अनंतकाल के लिए नहीं आते। यही भ्रम चोरों के एक खानदान को भी था, वो आज कल क्षेत्रीय पार्टियों के साथ किसी भी तरह गठबंधन कर के केन्द्रीय सत्ता में आने का स्वप्न कुछ ऐसे ही देख रही है जैसे गीदड़-गीदड़ी का जोड़ा पंचतंत्र की एक कहानी में एक साँड़ के पीछे इस लालच में चल रहा था कि उसके मांसल अंडकोश कभी तो जमीन पर गिरेंगे और वो कभी तो उन्हें खा पाएँगे। गीदड़-गीदड़ी भूख से मर गए।

उदयपुर का वो महादेव मंदिर, जहाँ हर दिन जल चढ़ाते थे इरफ़ान खान, गायों को खुद खिलाते थे चारा

बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान के निधन के बाद वह लगातार इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं। लम्बी बिमारी के बाद आखिरी सॉंस लेने के बाद से ही इरफ़ान खान के बाद उनके द्वारा मजहब की कट्टरताओं पर उनके बयान चर्चा का विषय हैं। इसके साथ ही इरफ़ान खान की कुछ पुरानी ऐसी ख़बरें भी फिरसे शेयर की जा रही हैं जिनमें देखा जा रहा है कि वो मंदिर भी जाया करते थे और गाय से भी प्रेम करते थे।

महादेव मंदिर जाते थे इरफ़ान

आज से ठीक एक साल पहले इरफ़ान खान उदयपुर में अपनी फिल्म इंग्लिश मीडियम की शूटिंग के लिए गए थे। यह अनुभव उदयपुर में इरफान के ड्राइवर रहे नरपत सिंह आसिया ने शेयर किए हैं। उन्होंने बताया कि वो करीब 45 दिन तक इरफ़ान के साथ रहे। दैनिक भास्कर के रिपोर्टर सर्वेश शर्मा की यह स्टोरी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है।

इरफान के ड्राइवर रहे नरपत सिंह ने भावुक होकर बताया कि इरफान उनके गाँव कड़िया भी आए थे। वहाँ वो खेत में घूमे, बाड़े में गाय-बछड़ों को दुलारते। यही नहीं जब नरपत सिंह की माँ ने इरफान को आराध्य श्रीनाथजी की तस्वीर दी तो उन्होंने उसे सर से भी लगाया। इरफ़ान की मृत्यु से दुखी नरपत सिंह ने कहा कि इरफ़ान उनकी माँ द्वारा बनाई हुई चाय के लिए कहते थे कि यह एकदम उनकी अम्मी की बनाई हुई चाय जैसी है।

नरपत सिंह के परिवार के साथ इरफ़ान खान

ड्राइवर नरपत सिंह ने बताया कि जैसे ही वो लोग होटल से निकलते तो इरफ़ान खान सबसे पहले महादेव के मंदिर जाते वहाँ जल चढ़ाते और गाय को चारा और कुत्तों को रोटी भी खिलाते थे, ये उनका रुटीन था। इसके बाद ही इरफ़ान फिल्म की शूटिंग पर जाते थे।

भारत लौटकर त्र्यंबकेश्वर मंदिर में किया था हवन

वर्ष 2018 में इरफान जब लंदन में अपनी बीमारी न्यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर का इलाज करा रहे थे तो उनके दिवाली के समय चुपके से 2 दिन के लिए भारत आने की बात सामने आई थी। रिपोर्ट्स में बताया गया कि इरफान भारत आने के बाद सीधे नासिक के त्र्यंबकेश्वर शिव मंदिर में गए और वहाँ पर उन्होंने पूजा और हवन भी किया था।

वेबसाइट स्पॉटबॉय के अनुसार इरफान 2 दिन के निजी काम के लिए भारत आए थे। उन्होंने इसकी भनक किसी को लगने नहीं दी। इरफान नासिक के पास त्र्यंबकेश्वर मंदिर गए, जहाँ उन्होंने भगवान शिव की पूजा की। इरफान भारत में केवल 2 दिन रहे और वापस लंदन लौट गए।

इरफ़ान खान को वर्ष 2018 में पता चला था कि वह न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से पीड़ित हैं। इस बीमारी के इलाज के लिए इरफान खान लंदन भी गए थे और करीब साल भर इलाज कराने के बाद वह वापस भारत लौटे। इरफान खान अपने इलाज के कारण काफी दिनों तक बॉलीवुड से भी दूर रहे थे।

हालाँकि, लंदन से स्वस्थ होकर लौटने के बाद उन्होंने बॉलीवुड में वापसी की और अंग्रेजी मीडियम की शूटिंग भी की थी। इरफान खान को बीते दिन वर्सोवा के कब्रिस्तान में दफनाया गया। देशव्यापी लॉकडाउन के कारण उनकी अंतिम विदाई में केवल 20 लोग ही शामिल हो पाए। उनकी मौत के बाद इस्लामिक कट्टरपंथी उनकी आस्था और विश्वास के कारण उनके खिलाफ लगातार घृणा से भरे हुए बयान देते हुए देखे जा रहे हैं।

महाराष्ट्र: राज्यपाल कोश्यारी ने चुनाव आयोग को सौंपा जिम्मा, क्या लॉकडाउन में भी हो सकते है राज्य विधान परिषद के चुनाव?

महाराष्ट्र के राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने अपना पल्ला झाड़ते हुए निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर राज्य विधान परिषद की 24 अप्रैल को खाली हुई नौ सीटों पर शीघ्र चुनाव कराने का आग्रह किया है। राज्यपाल द्वारा आयोग को लिखे गए पत्र में आग्रह किया गया है कि लॉक डाउन की गाइडलाइन और राज्य की विषम परिस्थिति के मद्देनजर स्थिर सरकार जरूरी है। ऐसे में विधान परिषद के लिए चुनाव कराना ज्यादा उचित होगा। अब अगर चुनाव आयोग राज्यपाल कोश्यारी के अनुरोध को स्वीकार कर लेता है तो 28 मई से पहले चुनाव हो सकते हैं।

28 मई तक उद्धव अगर किसी भी सदन के सदस्य नहीं बने तो उनकी कुर्सी चली जाएगी। सीएम हटे तो सरकार का गिरना तय है। अब ये कहा जा सकता हैं कि (27 मई, 2020) महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और शिवसेना की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस-एनसीपी-शिवसेना गठबंधन सरकार के लिए एक ऐसी डेडलाइन बन गई है जिसे कोरोना लॉकडाउन ने गले की फाँस बना दिया है। ये वो तारीख है जिससे पहले उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र विधानमंडल के दोनों सदन- विधानसभा या विधान परिषद – में किसी एक का सदस्य बन जाना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर संविधान के प्रावधानों के मुताबिक उद्धव ठाकरे को इस्तीफा देना होगा।

24 अप्रैल को होने थे चुनाव

बता दें कि पहले की योजना के अनुसार नौ सीटों के लिए 24 अप्रैल को चुनाव होने थे और उद्धव ठाकरे को चुनाव लड़ना था। हालाँकि, कोरोना वायरस की वजह से आयोग ने चुनाव को स्थगित कर दिया। इसके कारण ही मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे चाहते थे कि राज्यपाल कोश्यारी अपने कोटे की खाली पड़ी दो सीटों में से एक पर उन्हें नामित कर दें। इसके लिए महाराष्ट्र कैबिनेट ने दो बार प्रस्ताव भी भेजा, लेकिन राज्यपाल कोश्यारी ने उस पर कोई फैसला नहीं किया। जिसके चलते मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कल यानी (30.4.20) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके मामले में दखल देने की गुहार लगाई थी। उन्‍होंने पीएम मोदी से कहा था कि ऐसे समय में जब महाराष्‍ट्र कोरोना की महामारी से जूझ रहा है राजनीतिक अस्थिरता ठीक नहीं है।

28 नवंबर 2019 को सीएम बने थे उद्धव

बता दें कि उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। संविधान के अनुच्छेद 164 (4) के मुताबिक, किसी भी मंत्री को (मुख्यमंत्री भी) पद की शपथ लेने के छह महीने के अंदर विधानसभा या विधानसपरिषद का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य है। उद्धव ठाकरे बिना चुनाव लड़े ही सीधे सीएम बने हैं, ऐसे में उन पर यह नियम लागू होता है। जनवरी 2020 में विधान परिषद की दो सीटों के लिए चुनाव भी हुए लेकिन उद्धव ठाकरे ने चुनाव नहीं लड़ा। 24 मार्च को विधान परिषद की धुले नांदुरबार सीट पर उपचुनाव होना था। 24 अप्रैल को विधान परिषद की 9 और सीटें खाली हो गईं। ऐसे में उद्धव ठाकरे ने उम्मीद लगाई थी कि वह इनमें से किसी एक सीट से चुनाव जीत जाएँगे और मुख्यमंत्री बने रहेंगे। इसी बीच कोरोना वायरस ने सारी गणित बिगाड़ दी है और चुनाव टाल दिए गए।

चुनाव आयोग की बैठक

ताजा जानकारी के मुताबिक आज (1.5.20) चुनाव आयोग महाराष्ट्र में विधान परिषद की रिक्त सीटों पर चुनाव कराने को लेकर बैठक करेगा। जिसमे लॉकडाउन में चुनाव कराने की स्थिति को लेकर चर्चा की जाएगी। जहाँ सीटों को लेकर लोगों की नजरें पहले राज्यपाल पर टिकी थी। वहीं अब सब बेसब्री से निर्वाचन आयोग के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में क्या लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए चुनाव आयोग चुनाव करवा सकती है। या फिर कोई नया कदम भी उठाया जा सकता हैं।

हैदराबाद: AIMIM नेता मोहम्मद मुर्तजा अली ने मस्जिद के बाहर ड्यूटी कर रहे पुलिस को धमकाया, केस दर्ज, देखें वीडियो

हैदराबाद पुलिस ने AIMIM पार्टी के कॉरपोरेटर मुर्तजा अली के खिलाफ मामला दर्ज किया है। मुर्तजा अली को एक वायरल वीडियो में बृहस्पतिवार (अप्रैल 30, 2020) को हैदराबाद के चवन्नी नदी अली बेग में एक मस्जिद के पास अपनी ड्यूटी कर रहे दो कॉन्स्टेबल को धमकाने और ड्यूटी में बाधा डालते हुए देखा गया था।

हैदराबाद के मदन्नपेट एरिया में एआईएमआईएम (AIMIM) के कॉरपोरेटर मोहम्मद मुर्तजा अली खुलेआम दो पुलिस कॉन्सटेबल को धमकी देते हुए नजर आ रहे थे। इन दोनों कॉन्सेबल्स की ड्यूटी कल शाम को इफ्तार के समय लगी हुई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मदन्नपेट के SHO संतोष कुमार ने से इस खबर की पुष्टि की और कहा कि देशव्यापी लॉकडाउन के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए पुलिस कॉन्टेबल्स ने मस्जिद में अंदर जाने वाले लोगों से कहा था कि 5 लोगों से ज्यादा लोगों को अंदर जाने की अनुमति नहीं है। उस दौरान करीब 10 लोग अंदर थे, जिस पर कॉन्सटेबल्स ने आपत्ति जताई थी।

इसके बावजूद AIMIM के कॉरपोरेटर मोहम्मद मुर्तजा अली ने खुलेआम कॉन्सटेबल्स को धमकी दी और उन्हें वहाँ से जाने के लिए कहा। माहौल को देखते हुए दोनों कॉन्सटेबल वहाँ से लौट गए।

SHO संतोष कुमार ने कहा कि उन्होंने दोनों पुलिस वालों को सुबह बयान देने के लिए बुलाया है और FIR दर्ज की जा रही है।

एसवीएन शिवराम शर्मा, एसीपी संतोषनगर ने कहा कि पुलिस कॉन्स्टेबल द्वारा शिकायत दर्ज की गई है और मुर्तुजा अली के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पहले भी धमकी और हमले की ऐसी कई घटनाएँ देश के कई हिस्सों में सामने आ चुकी हैं।

बता दें कि इससे पहले हैदराबाद में ही इलाज के दौरान नर्सों से दुर्व्यहार की खबर भी आई थी जहाँ तबलीगी जमाती कभी इन्हें हाथ लगाने की कोशिश करते हैं तो कभी इनको देखकर सीटी बजाते हैं, जन्नत दिखाने की बात कहते हैं। इसके अलावा भी कई अन्य तरीके से ये जमाती इनके साथ अभद्रता कर रहे थे।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस ने राज्यपाल कोश्यारी की टोपी से किया उत्तराखंड की संस्कृति और गढ़वाल रेजिमेंट का अपमान

महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी कॉन्ग्रेस और शिवसेना के निशाने पर हैं। ऐसे में महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस अब व्यक्तिगत टिप्पणियों के साथ ही उत्तराखंड की संस्कृति को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रही है। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की पारंपरिक टोपी पर कटाक्ष किया है, जो कि उत्तराखंड की संस्कृति के साथ-साथ भारतीय सेना की गढ़वाल और कुमाऊँ रेजिमेंट से भी है।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने मराठी में ट्वीट करते हुए लिखा- “महामहीम राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी यांनी टोपी काढून विचार केला तर निश्चितपणे त्यांना आपल्या जबाबदारीची आठवण होईल आणि ते मुख्यमंत्री @OfficeofUT यांची विधानपरिषदेचे सदस्य म्हणून नियुक्ती करतील। ही टोपीच घटनात्मक जबाबदारीच्या आड येत आहे।”

जिसका हिंदी अर्थ है- “यदि महामहिम राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अपनी टोपी उतारने के बारे में सोचते है, तो वे निश्चित रूप से अपनी जिम्मेदारी को याद करेंगे और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विधान परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त करेंगे। यह टोपी संवैधानिक जिम्मेदारी के लिए एक बाधा है।”

सचिन सावंत द्वारा राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा पहनी जाने वाली उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी पर हमले का वास्ता सिर्फ उत्तराखंड की संस्कृति से ही नहीं बल्कि गढ़वाल और कुमाऊँ रेजिमेंट से भी है। भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड राज्य से हैं और यह टोपी इस राज्य के पारंपरिक पहनावे का हिस्सा है।

सचिन सावंत के इस ट्वीट पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ साथ उत्तराखंड के कई लोगों ने आपत्ति जताई है। CM रावत ने ट्वीट करते हुए लिखा – “महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता द्वारा महाराष्ट्र के राज्यपाल एवं हमारे आदरणीय श्री @BSKoshyari जी पर की गई अभद्र टिप्पणी देवभूमि की संस्कृति के अहम प्रतीक चिन्ह के अपमान के साथ देश की फौज का भी अपमान है; ज्ञात हो कि इस टोपी का संबंध गढ़वाल रेजिमेंट और कुमाऊँ रेजीमेंट से रहा है।”

उत्तराखंड के पूर्व CM हरीश रावत ने किया सचिन सावंत का समर्थन

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता की बात का विरोध करने के बजाए बयान का राजनीतिक लाभ लेने के चक्कर में उत्तराखंड के पूर्व CM और 2 सीट से विधानसभा चुनाव हारने वाले कॉन्ग्रेस नेता हरीश रावत ने भी उनका समर्थन ही किया है।

अपमानजनक ट्वीट करने पर माफी माँगने के बजाए हरीश रावत के ही ट्वीट को शेयर करते हुए सचिन सावंत ने लिखा है – “मा. @tsrawatbjp जी, सिर्फ टोपी निकालकर निर्णय लीजिए ऐसा कहना अभद्र कैसे हुआ? वैसे कोश्यारीजी अपने टोपी का राजनीतिक मुद्दा राजनीतिक जीवन में पहले भी बना चुके हैं। वे जो टोपी पहनते हैं वो कुछ और ही है ऐसी उत्तराखंड में ही राय है। लोगों को गुमराह न करें।”

राज्यपाल कोश्यारी पर की गई इस अपमानजनक टिप्पणी से नाराज लोगों ने कार्रवाई की माँग की है –

धौलपुर: लॉकडाउन में जमा होने से रोका तो कॉन्स्टेबल को मारी गोली, हमलावर गिरफ्त से बाहर

राजस्थान के धौलपुर में लॉकडाउन का पालन कराने पर पुलिसकर्मी पर गोली चलाने की घटना सामने आई है।इस घटना में कॉन्स्टेबल के हाथ में चोट आई है। फायरिंग के बाद बदमाश मौके से फरार हो गए।

पीड़ित कॉन्स्टेबल शिव चरण मीणा के मुताबिक बीते दिन (बुधवार 29 अप्रैल) को वह धौलपुर में लॉकडाउन के दौरान ड्यूटी पर तैनात थे। इस बीच उन्होंने 4-5 लोगों को एक स्थान पर इकट्ठा खड़े हुए देखा। इसे देख वह मौके पर पहुँच गए और उन लोगों से लॉकडाउन के नियमों का हवाला देते हुए वहाँ से हट जाने के लिए कहा। लेकिन इस बात का विरोध करते हुए अज्ञात लोगों ने उन पर गोली चला दी और मौके से फरार हो गए।

सूचना पर पहुँची पुलिस ने घायल कॉन्स्टेबल को अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ उनका इलाज जारी है। कॉन्स्टेबल शिवचरण मीणा के हाथ में चोट आई है। आला अधिकारियों ने पीड़ित से बात कर घटना के विषय में जानकारी ली। हालाँकि अभी तक पुलिस को हमलावरों में के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी है।

इससे पहले ऐसा ही एक मामला पश्चिम बंगाल के हावड़ा से सामने आया, जहाँ लॉकडाउन लागू करा रहे पुलिसकर्मियों पर लोगों ने हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि इस हमले में दो से तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए। दरअसल यह घटना बेलिलियस रोड इलाके में मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) दोपहर बाद घटी। जब पुलिस सड़क पर घूम रहे लोगों को घर में जाने के लिए कह रही थी तभी लोगों ने पुलिस पर हमला कर दिया।

इतना ही नहीं अराजक तत्वों ने पुलिस की गाड़ी में भी तोड़फोड़ की। इसका वीडियो भी सामने आया था, जिसमें भीड़ को पुलिस के ऊपर हमला करते हुए देखा जा सकता है। ये भीड़ इतनी बेकाबू और आक्रामक थी कि रैपिड एक्शन फोर्स की टीम को बुलानी पड़ी थी।

वहीं सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मस्जिद में नमाज पढ़ने को रोकने गई पुलिस पर लोगों ने पथराव किया। इस घटना में 1 पुलिसकर्मी घायल हो गए। मामले में पुलिस ने अब तक 15 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस पर पथराव करने वाली भीड़ में महिलाएँ भी शामिल थीं।

आपको बता दें कि सरकार ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा को गैर जमानती अपराध बनाया है। साथ ही ऐसा करने वाले को सात साल की सजा हो सकती है। लेकिन इसके बाद भी पुलिसकर्मियों पर हमले रूक नहीं रहे हैं। देश के कई हिस्सों से चिकित्साकर्मियों और पुलिस बल पर हमले की खबरें सामने आ रही हैं।

कोरोना, इस्लामोफोबिया और पश्चिमी मीडिया: कुचक्रों के बावजूद जीतेगा भारत

रामचरितमानस का एक वृतांत है। राम और रावण का युद्ध चल रहा है। मेघनाद, कुंभकरण, अहिरावण सहित रावण के सभी प्रमुख योद्धा मारे जा चुके हैं। राक्षस सेना काफी कम हो चुकी है। दशानन तकरीबन अकेला है। तुलसीदास जी लिखते हैं कि रावण उस समय सोचता है कि मैं अब अकेला पड़ गया हूँ तो मुझे कुछ कोई और खेल खेलना पड़ेगा:

रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार। मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार॥

यानी हार नज़दीक जानकर रावण, युद्ध में उस समय माया यानि भ्रम की स्थिति पैदा करता है। अपनी सिद्धियों के जरिए वह झूठमूठ के अनेक रावण युद्ध के मैदान में पैदा कर देता है। इससे वानर-भालू सेना में दृष्टिभ्रम पैदा हो जाता है। अनेक रावण मैदान में देखकर राम की सेना ही नहीं, आकाश स्थित देवता भी परेशान हो जाते हैं। राम को सबसे पहले इस माया को खत्म करना पड़ता है। और तभी रावण का अंत हो पाता है।

यह पौराणिक गाथा एक सांकेतिक स्थिति का वर्णन करती है। जीवन के तकरीबन हर मोर्चे की यही स्थिति है। युद्ध में भ्रम की स्थिति पैदा करना शत्रु की रणनीति का हिस्सा होता है। इसका उद्देश्य होता है विपक्षियों के मन में संदेह पैदा करके बच निकलने का रास्ता ढूँढ़ना।

आज के सन्दर्भ में देखें तो इस समय दुनिया में दो युद्ध चल रहे हैं। एक महायुद्ध है मानवता और कोरोना के बीच का। इस भयानक युद्ध में अब तक दो लाख 28 हजार से ज्यादा इंसान मारे जा चुके हैं। 32 लाख से ज्यादा मनुष्य इससे संक्रमित हो चुके हैं। ये संक्रमण देश की सीमाएँ नहीं जानता और न ही ये मजहब की दीवारों को पहचानता है। मगर इस मौके का फायदा उठाकर कुछ लोग एक और युद्ध में विजय पाना चाहते हैं और वह है भारत में चल रहा नैरेटिव का युद्ध। नैरेटिव यानी कथ्य की इस लड़ाई में अब एक भ्रम पैदा करने की कोशिश हो रही है। वह है इस्लामोफोबिया का भूत।

एक तरफ देश कोरोना के साथ युद्ध में प्राणप्रण के साथ लगा हुआ है। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग, जिसमें मीडिया का एक वर्ग भी शामिल है, इसे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की लड़ाई में परिवर्तित करना चाहता है। ऐसा भ्रम फैलाने के पीछे उसका उद्देश्य है कि कोरोना के साथ जो युद्ध चल रहा है उससे देश का ध्यान भटक जाए। अब तक जो आंशिक सफलता देश ने कोरोना महामारी के विरुद्ध हासिल की है वह तिरोहित हो जाए।

ये विश्वव्यापी महामारी है जो तथाकथित विकसित देशों में अधिक विकराल रूप में फैली है। इससे मरने वाले की तादाद अब (30 अप्रैल) तक अमेरिका में 61670, इटली में 27682, फ्रांस में 24087, ब्रिटेन में 26097 और स्पेन में 24275 हो चुकी है। भारत में अभी तक इस बीमारी से अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ है। इसका श्रेय भारत की आम जनता के त्याग एवं निश्चय, सरकार की तत्परता, प्रधानमंत्री मोदी का लोगों से सीधा संवाद और हमारी गहरी सामाजिक विरासत को जाता है।

संभवत: यही बात कुछ तत्वों को पच नहीं रही। खासकर, पश्चिमी मीडिया के एक बड़े वर्ग और उनके यहाँ के प्रतिनिधियों को ये शायद असहज लग रहा है। संभवतः उन्हें अपेक्षित था कि यहाँ पश्चिमी देशों से ज़्यादा कहर मचे। इस वर्ग की नीयत पर संदेह की बात अगर हम छोड़ भी दें, तो ये वर्ग एक खास रंग के चश्मे से भारत को देखता आया है। ये भारत को एक अशिक्षित, गरीब, अविकसित, पिछडे, गंदगी से भरे, अस्वस्थ, गैर-अनुशासित और विभाजित मानसिकता वाले देश के रूप देखते आए हैं। शताब्दियों से भारत का चित्रण इसी नजरिए से होता रहा है।

भारतीय समाज की आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति, जिजीविषा और उसकी विरासत की मजबूती आज तक ये लोग देख ही नहीं पाए हैं। इसीलिए पश्चिमी मीडिया और उस जैसी सोच रखने वाले अन्य लोग ये समझ नहीं पा रहे कि इस देश में कोरोना ने अभी तक मौत का तांडव क्यों नहीं मचाया?

इसी नासमझी के कारण शायद तबलीगी जमात के मामले को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में एक के बाद एक समाचार आए हैं कि भारत में मजहब विशेष को प्रताड़ित किया जा रहा है। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि भारत में समुदाय विशेष से होना पाप हो गया है। वे इक्का-दुक्का घटना को लेकर यह प्रचारित कर रहे है कि भारत में मजहब के आधार पर इलाज किया जा रहा है। अक्सर लिखने वाले अपने लेखों में ना तो कोई ठोस सबूत देते हैं न ही कोई सटीक उदाहरण ही प्रस्तुत करते हैं। बल्कि कुछ एकाकी घटनाओं को बेतरतीब तरीके से आपस में जोड़कर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि भारत में अब इस्लामोफोबिया है। इन असंगत घटनाओं का उपयोग वे सिर्फ अपने पूर्व निर्धारित वैचारिक आग्रहों को सिद्ध करने के लिए ही इस्तेमाल कर रहे हैं।

कुछ रिपोर्ट्स का उल्लेख करना यहाँ ठीक रहेगा;

  • भारत में ‘मुस्लिम’ होना तो अपराध था ही, उस पर ये कोरोना आ गया (It Was Already Dangerous to Be Muslim in India. Then Came the Coronavirus) यह प्रतिष्ठित टाइम मैगज़ीन में 3 अप्रैल को छपे लेख का शीर्षक है। इस शीर्षक को पढ़ने के बाद इसकी निष्पक्षता के बारे में क्या कहा जा सकता है?
  • 13 अप्रैल के ‘द गार्डियन’ में लिखा गया कि “कोरोना वायरस के पीछे मुस्लिमो षड्यंत्र की कहानियाँ उन्हें निशाना बनाकर देश भर में फैलाई जा रही हैं” (Coronavirus conspiracy theories targeting Muslims spread in India)
  • पत्रिका ‘फॉरेन पॉलिसी‘ के 22 अप्रैल के अंक की एक रिपोर्ट कहती है- भारत कोरोना फ़ैलाने के लिए मुस्लिमों को बलि का बकरा बना रहा है (India Is Scapegoating Muslims for the Spread of the Coronavirus)
  • टेलीग्राफ नेपाल के 22 अप्रैल के ई-अंक में “भारत में मुस्लिमों का नरसंहार” शीर्षक से एक लेख छपा है।
  • अल जजीरा की 25 अप्रैल की खबर में तो भारत के पूरे लॉकडाउन को ही इस्लामोफोबिया का प्रतीक बता दिया गया। इस खबर का शीर्षक था ‘भारत का लॉकडाउन: असमानता और इस्लामोफोबिया की एक गाथा’ (India’s lockdown: Narratives of inequality and Islamophobia)

इस तरह के अनेकानेक समाचार, लेख, सम्पादकीय और टिप्पणियाँ दुनिया के कई बड़े प्रकाशनों में पिछले कोई एक महीने में लगातार आए हैं। इन्हें गढ़ने वाले कई ऐसे पत्रकार और लेखक हैं जिन्हें ख़बरों की दुनिया में ‘बड़ा’ माना जाता है। इनमें से अधिसंख्य अपनी ये रिपोर्ट लिखने से पहले ज़मीन पर नहीं उतरे। किंवदंतियों, अर्धसत्यों, व्हाट्सएप्प संदेशों (जिनमें कई फेक भी निकले), पूर्वाग्रह से ग्रसित आलेखों, एकतरफा विचारों और मान्यताओं के आधार पर इन्होंने खबरों की आड़ में बस एक नजरिया दुनिया को परोस दिया। निष्पक्षता का तकाज़ा था कि ये अपने विचारों और अभिमतों को इतना एकतरफा नहीं बनाते।

ये सही है कि मार्च और अप्रैल के महीनों में तबलीगी मरकज के कारण देश में कोरोना के मामलों में वृद्धि हुई। तबलीगी जमात के रहनुमाओं ने अपनी मूर्खता, ज़िद तथा अंधविश्वास के कारण सबसे पहले तो अपने अनुयायियों की जिंदगी को खतरे में डाला। आगे कई प्रदेशों में कोरोना का संक्रमण उनके कारण गया। इस कारण तबलीगी जमात लोगों के निशाने पर आ गई। ऐसा अस्वाभविक भी नहीं था। कई लोगों ने तबलीगियों और आम मुस्लिमों में भी घालमेल किया।

पत्रकारीय दायित्व का तकाज़ा था कि ये प्रतिष्ठित प्रकाशन बताते कि तबलीगी जमात सारे मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। कट्टरता और पुरातनपंथ से ग्रसित तबलीगी जमात, इस्लाम का एक पंथ मात्र है। तबलीगियों ने सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, मलेशिया, इंडोनेशिया तथा अन्य कई देशों में भी कोरोना को फैलाने में भूमिका निभाई। ऐसा करने वाले तबलीगी अकेले मजहबी या पंथिक लोग नहीं थे। अमेरिका में यह काम बाइबल बेल्ट के अंदर रूढ़िवादी चर्च के लोगों ने किया। दक्षिण कोरिया में यह काम चिनशियोजी चर्च के लोगों ने किया। तो फिर तबलीगी मुस्लिमों के एक प्रकरण को लेकर पूरे भारत में इस्लामोफोबिया का भूत खड़ा करना कितना सही है?

ऐसा ही नहीं हुआ, बल्कि इस्लामोफोबिया का भूत खड़ा करने के लिए भारत विरोधी निहित स्वार्थी तत्वों ने झूठ और फरेब का एक जाल भी खड़ा किया। खाड़ी के देशों से कई फेक और जाली एकाउंट से सोशल मीडिया पर एक अभियान चलाया गया। ओमान और सऊदी अरब के राजघरानों से सम्बंधित प्रतिष्ठित लोगों के नाम से भी जाली एकाउंट बनाकर भड़काऊ ट्वीट किए गए। इनमें से कई ट्विटर एकाउंट भारत के चिर-विरोधी पाकिस्तान से निकले। भारत में मजहबी फसाद फैलाना तो पाकिस्तान की नीति का अभिन्न हिस्सा है ही।

पत्रकारिता के मानदंड तो कहते हैं कि इस एकतरफा प्रचार की पड़ताल की जाती। पर ऐसा नहीं हुआ। बिना जाँच के मीडिया के इस वर्ग ने इस प्रचार को तथ्य बतलाकर दुनिया को परोस दिया। असल में दिक्कत तब होती है जब आप घटनाओं को देखने के लिए एक खास चश्मा तय कर लेते हैं। फिर आपको सत्य नजर नहीं आता। इसलिए कोरोना से संबंधित उद्धृत इन खबरों में एक खास बनावट आप देख सकते है। तकरीबन इन सबमें पहले तबलीगी जमात का उल्लेख होता है। फिर लेखक दिल्ली के दंगों को इनसे जोड़ता है।

इस तार्किक उछल-कूद में मोदी सरकार का जिक्र होना तो स्वाभाविक है ही। जब मोदी का नाम आया तो फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कैसे छूट सकता है? आरएसएस यानी हिन्दू। और हिन्दू का तात्पर्य सीधे मुस्लिम विरोधी होना। इसे तर्क़ कहें या कुतर्क- पर यही ताना-बाना हर घटनाक्रम पर फिट कर दिया जाता है। घटनाओं के तथ्यपरक, निरपेक्ष और और समग्र विश्लेषण की बजाय वे अपने पूर्वाग्रह को साबित करने के लिए बस घटनाओं का इस्तेमाल करते हैं। वे अपने नजरिए को, जो कि भारत को हिंदू-मुस्लिम की दृष्टि से देखता है कोरोना के घटनाक्रम पर भी लागू करना चाहते हैं।

बहुत सुविधा के साथ वे कई तथ्यों को पूरी तरह अनदेखा करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने 26 अप्रैल के अपने भाषण में कहा कि देश के 130 भारतीय बिना किसी भेद के अपने ही हैं। एक घटना का इस्तेमाल करके सभी मुस्लिमों को दोष देना सही नहीं है। यही बात कमोबेश पिछले अक्टूबर में सार्वजनिक भाषणों में भी उन्होंने कही थी। पर शायद यह बात इन तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के कथ्य में फिट नहीं बैठती इसलिए इनकी यह अनदेखी करते हैं।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई एक लम्बी लड़ाई है। ये तय है कि मानवता के साथ-साथ भारत भी इस लड़ाई को जीत ही लेगा। पर नैरेटिव और कथ्य की लड़ाई में, भारत को एक खास नजरिए से देखने वाले लोग, अपने को ठगा हुआ और परास्त महसूस कर रहे हैं। अपनी ही सोच के जाल में फँसा हुआ यह वर्ग इसे अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता। दलदल में फँसा हुआ व्यक्ति जिस तरह ज़्यादा हाथ-पाँव मारकर अपने को और गहरा डूबा लेता है। ये लोग भी अपने वैचारिक आग्रह में उसी तरह डूबे हुए हैं।

जिस तरीके से राम-रावण युद्ध में माया फैलाई गई थी, ये भी संदेह पैदा करके लोगों को दिग्भ्रमित करना चाहते हैं। मगर कोरोना के साथ लड़ाई से हम लोगों का ध्यान हटना नहीं चाहिए। जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा था ‘सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी’ इसलिए सभी भारत प्रेमी लोगों को इस बात का ध्यान रखना है कि कोरोना के साथ इस लड़ाई को मजहब आधारित भेदभाव में तब्दील ना होने दें।

इस लड़ाई में मजहब और पंथों से परे हटकर हर भारतवासी का महत्वपूर्ण योगदान है। ज़रूरी है कि किसी को भी इस आपदा की घड़ी में दूसरेपन का एहसास ना होने दिया जाए। यह लड़ाई हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई नहीं, बल्कि भारत और भारत विरोधियों की लड़ाई है। और ये निश्चित है कि सारे कुचक्रों के बावजूद कोरोना हारेगा, भारत जीतेगा।

ऋषि कपूर पर अपने ही फेक न्यूज का इंडिया टुडे ने किया फैक्ट चेक, क्योंकि उनके पास है ‘इन्फ़ॉर्मेशन वार रूम’

अभिनेता इरफान खान के निधन के ठीक एक दिन बाद ऋषि कपूर ने आज यानी गुरुवार को एचएन रिलायंस अस्पताल में आखिरी सांस ली। उनकी मृत्यु की सूचना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुई। इस वीडियो को कई मीडिया संस्थानों और ट्विटर पर जानी-मानी हस्तियों ने शेयर किया। इस वीडियो को लेकर दावा किया गया कि ये वीडियो ऋषि कपूर के देहांत से एक दिन पहले का है।

टीआरपी, व्यूज और रीच की लालच में कई मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थानों ने वीडियो को शेयर किया। इनमें से एक नाम इंडिया टुडे का भी है। टीआरपी के लिए मौक़े का फायदा उठाते हुए उसने पहले ये वीडियो शेयर किया और लिखा कि ऋषि के कपूर के ‘अंतिम क्षणों’ पर ‘एक नजर डालिए’।

वीडियो पुराना निकलने पर पहले अपना ट्वीट डिलीट किया और फिर अन्य संस्थानों पर झूठे दावे का ठीकरा फोड़ते हुए उसका ही फैक्ट चेक कर डाला। बाद में इस फैक्ट चेक को इंडिया टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने भी शेयर किया।

असलियत सामने आने पर दर्शकों से माफ़ी माँगने की बजाए राहुल कंवल द्वारा शेयर फैक्ट चैक में ऐसे दर्शाया गया कि जैसे सिर्फ़ अन्य संस्थानों ने ये दावा किया है कि ये वीडियो ऋषि कपूर के आखिरी समय का है। फैक्ट ये है कि ये वीडियो वीडियो फरवरी 2020 के पहले सप्ताह का है, जब ऋषि कपूर दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल में भर्ती थे और वीडियो में जिसे आप गाते हुए देख रहे हैं वह वार्ड बॉय धीरज है।

ध्यान दीजिए, कि पहले तो इंडिया टुडे ने जो ट्वीट किया वो शाम के 5: 56 पर किया और राहुल कंवल ने फैक्ट चेक को 7: 27 पर पोस्ट किया। यानी एक मीडिया संस्थान जो सबसे तेज होने का दावा करता है उसे पूरे डेढ़ घंटे लगे ये समझने में कि इस वीडियो को लेकर किया जा रहा दावा झूठा है। उसके बाद, जब उन्हें ये बात समझ भी आई तो उन्होंने माफी माँगने की बजाय अपनी गलती छिपाई और दूसरों की गलती को उभारते हुए फैक्ट चेक कर दिया। हालाँकि जिन्होंने गौर दिया होगा, वो समझ गए होंगे कि शायद ये पहली बार है जब किसी मीडिया संस्थान ने शर्मसार होकर अपनी फैलाई झूठी खबर का फैक्ट चेक किया।

इंडिया टुडे
इंडिया टुडे द्वारा अपनी ही खबर का किया गया फैक्ट चेक

दरअसल, इस वीडियो में एक युवक को ऋषि कपूर की ही फ़िल्म “दीवाना” के एक गाने को गाता हुआ देखा जा सकता है। वीडियो में ऋषि कपूर अस्पताल में बेड पर लेटे हुए देखे जा रहे हैं और उनके पास खड़ा एक युवक गीत गा रहा है। यह वीडियो एक रात पहले का नहीं बल्कि इस वीडियो को पहली बार युट्यूब पर फरवरी 2020 में शेयर किया गया था।

आपको बता दें कि आज सुबह ऋषि कपूर की कैंसर की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई है। उनकी उम्र 67 साल थी। इसके बाद देश के बड़े-बड़े नेता और अभिनेताओं ने अपने-अपने तरीके से उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए शोक व्यक्त किया था। इससे पहले 29 अप्रैल को जाने-माने अभिनेता इरफान खान ने भी मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में चल रहे इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था।

इरफान खान भी पिछले एक वर्षों से कैंसर से पीड़ित थे। दो दिन के भीतर दो बड़े अभिनेताओं का चले जाना बॉलीवुड की एक बड़ी क्षति मानी जा रही है।

अल्पसंख्यकों के अधिकार पर नहीं बोल पाए SC के वकील जे साईं दीपक, जामिया ने आखिरी वक्त में कैंसल किया लेक्चर

जामिया मिलिया इस्लामिया में 24 अप्रैल को ऑनलाइन लेक्चर्स को लेकर एक घोषणा हुई। इस घोषणा में जामिया के छात्र समूह ने ऐलान किया कि वे विविध क्षेत्रों के नामी शख्सियतों का ऑनलाइन लेक्चर आयोजित कराने जा रहे हैं।

इस सीरीज को 25 अप्रैल से शुरू करने की बात कही। बताया कि 30 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के वकील जे साईं दीपक अल्पसंख्यकों के अधिकार और जामिया मिलिया इस्लामिया एवं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण पर अपनी बात रखेंगे। मगर, जब इसका समय आया तो एक नया ऐलान हुआ कि वकील जे साईं दीपक का व्याख्यान रद्द कर दिया गया है। इस निर्णय के पीछे की वजह और भी हैरान करने वाली बताई।

जानकारी के मुताबिक, व्याख्यान के लिए साईं दीपक से संपर्क करने वाले छात्रों ने पहले उन्हें भीड़ हिंसा पर अपनी बात रखने के लिए आमंत्रण दिया था। मगर, वकील साईं दीपक ने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे राजनीति को तूल देने वाले मुद्दों की जगह अकादमिक विषयों पर बात करना चाहते हैं। हालाँकि, इस दौरान इसी राजनैतिक मुद्दे को डिस्कस करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। मगर, इस बीच वे राजनैतिक उपक्रमों से दूर रहना चाहते हैं।

इसके बाद इस मामले पर काफी चर्चा हुई। अंत में साईं दीपक इस बात पर माने कि वे अल्पसंख्यकों के अधिकार और जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण पर अपनी बात रखेंगे। इसके बाद जामिया छात्रों ने छात्र काउंसिल से बात की और साईं दीपक को एक मेल भेजा। इस मेल में लिखा था कि वे अपने व्याख्यान में अल्पसंख्यक अधिकार व सेकुलरिज्म पर बात रखेंगे।

इसके बाद जामिया की लॉ फैकल्टी ने उनकी तस्वीर के साथ एक पोस्टर भी जारी किया। मगर, जैसे ही ये इस आमंत्रण को जे साईं दीपक को भेजा गया, जामिया के कुछ छात्रों ने इसपर विरोध शुरू कर दिया व माँग करने लगे कि इस लेक्चर को रद्द किया जाए। लेकिन 29 अप्रैल को ट्विटर पर एक छात्र ने ये सुनिश्चित किया कि कमेटी में उसके दोस्त ने विश्वविद्यालय को इस बात के लिए राजी किया कि वे इस लेक्चर को होने दें। हालाँकि अब ये देखना है कि वे आंदोलन करने वाले छात्रों को मना पाएँगे या नहीं।

मगर, इस घटना के बाद जे साईं दीपक को कुछ मैसेज आने लगे। इन मैसेजों में उन्हें बताया जाने लगा कि जामिया में कुछ छात्र उनके लेक्चर के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं और माँग कर रहे हैं कि इसे रद्द किया जाए। यह जान साईं दीपक ने छात्र काउंसिल को मेल किया। इस मेल में अपने लेक्चर के मद्देनजर उन्होंने कहा कि वे लेक्चर के लिए उपलब्ध तभी रहेंगे जब छात्रों में से किसी को कोई दिक्कत न हो।

बावजूद इसके कि साईं दीपक अपने लेक्चर को प्राथमिकता देने की जगह छात्रों की सुरक्षा की बात कर रहे थे, फिर भी 30 अप्रैल को बिना किसी सूचना के उनका लेक्चर कैंसिल कर दिया गया। इसके पीछे आधिकारिक तौर पर कोई उपयुक्त कारण भी नहीं बताया गया। लेकिन जिस नोटिस में लेक्चर के कैंसिल होने ऐलान हुआ उसमें ये जरूर लिखा गया कि ऑनलाइन सत्र के चौथे लेक्चर ( साईं दीपक के व्याख्यान) को रद्द कर दिया गया है।

अब हालाँकि, एक ओर छात्रों के मैसेजों से साईं दीपक को वास्तविक वजह का पता थी और जो छात्र उनके ख़िलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, उन्होंने भी पहले ये ऐलान कर दिया था कि कुछ लोगों के दबाव में आकर प्रदर्शन कैंसिल हो गया।

मगर, जब जे साईं दीपक को इसके मद्देनजर मेल किया गया तो इसके पीछे का कारण बेहद अजीब बताया गया। मेल में लिखा गया कि लॉ फैकल्टी के एक इंप्लॉय की पत्नी का देहांत होने का कारण इसे रद्द किया गया है। सबसे हैरानी की बात ये है कि जिस दिन उनका लेक्चर होने था, उसी दिन उन्हें इसके बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद उस छात्र ने जो उनके लेक्चर को लेकर उत्साहित था उसने भी इस सूचना को ट्विटर पर डाला और बताया कि साईं दीपक का लेक्चर कैंसिल कर दिया गया है।

इसके बाद सभी पहलुओं को देखते हुए और असहिष्णु प्रशासन व छात्रों का असली चेहरा दिखाते हुए अपवर्ड ने निर्णय लिया कि जामिया के वे छात्र जो साईं दीपक का लेक्चर चाहते हैं, उन्हें वह अपना प्लैटफॉर्म मुहैया कराएगा। लेकिन, यहाँ पर विषय अल्पसंख्यकों के अधिकार न होकर अभिव्यक्ति की आजादी होगा।

ये बात स्पष्ट है कि यूनिवर्सिटी ने उन्हीं छात्रों के दबाव में आकर लेक्चर कैंसिल किया, जो पिछले साल नवंबर में सीएए के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे और तब पत्थरबाजी व आगजनी जैसी घटनाएँ हुईं थी। उस समय इन लोगों ने यही दावा किया था कि वे संविधान को बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

ऑल्टन्यूज के जुबैर ने BJP प्रवक्ता गौरव भाटिया के दावे पर उठाए सवाल, फिर खुद लगाई मुहर

धुर वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ऑल्टन्यूज को फैक्टचेकर के तौर पर लगातार गलत चीजों का बचाव करने और फेक न्यूज फैलाने की आदत पड़ गई है। तथ्यों को भी झुठलाने की कोशिश में ये कथित फैक्टचेकर भ्रामक निष्कर्ष निकालकर पेश करते हैं। ऐसा ही कुछ तब हुआ कि जब बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने एक मस्जिद में लोगों के इकट्ठा होने का वीडियो अपने ट्विटर हैंडल से पोस्ट किया।

गौरव भाटिया ने वीडियो साझा करते हुए कहा, “अगर यह जाहिलियत नहीं तो क्या है? क्या ये लोग देश के कानून से भी ऊपर हैं? यदि उनकी आलोचना करो तो कहते हैं कि हमारे धर्म को निशाना बनाया जा रहा है। खतरे में आप नहीं, बल्कि आपकी वजह से यह देश है। अब देखते है कितने लोग इनके समुदाय से (उनकी निंदा करने के लिए) सामने आते हैं। जिसको बुरा लगता है लगे, गलत है तो गलत है।”

बीजेपी के प्रवक्ता गौरव भाटिया ने साफ तौर पर इस बात का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ लोग देश भर की मस्जिदों में लॉकडाउन के नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए इकट्ठा होते रहते हैं और इसी के चलते लगातार कोरोना वायरस फैल रहा है।

गौरव भाटिया द्वारा ट्विटर पर वीडियो पोस्ट करते ही जुबैर ने उछलकर ऑल्टन्यूज के कथित फैक्ट चेक का एक लिंक डाला। इस प्रोपेगेंडावादी ने बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया के लिए कहा “ऐसी क्या मजबूरी आ पड़ी थी कि आपको लॉकडाउन से एक दिन पहले का यह वीडियो पोस्ट करना पड़ा? क्या आपको आईटी सेल से आदेश मिला था?”

फिर उसने अपने ट्वीट के अंत में ऑल्टन्यूज के कथित फैक्ट-चेक का लिंक जोड़ा। हालाँकि यह बात अलग है कि उसमें बीजेपी प्रवक्ता ने जो कहा उनके एक शब्द को भी खारिज नहीं किया गया है।

ऑल्टन्यूज के सह-संस्थापक जुबैर द्वारा पोस्ट किए गए फैक्ट चेक में कहा गया है कि यह वीडियो महाराष्ट्र की एक मस्जिद के बाहर रिकॉर्ड किया गया था, जो महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है। ऑल्टन्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई मिरर ने 23 मार्च को खबर दी थी कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार को राज्यभर में कर्फ्यू लगा दिया, क्योंकि रविवार को जनता कर्फ्यू का सख्ती से पालन करने के बाद लोग लगातार धारा 144 का उल्लंघन कर रहे थे।

इसके अलावा फिर से ऑल्टन्यूज ने पीटीआई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सोमवार को पुलिस ने मस्जिद के ट्रस्टियों के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की था, जहाँ करीब 150 लोग कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लागू सरकारी नियमों का उल्लंघन कर नमाज अदा करते हुए मिले थे। इससे यह साफ है कि जो लोग मस्जिद में इकट्ठा हुए थे उन्होंने कोरोना की रोकथाम के लिए जारी किए गए सरकारी आदेशों की अवहेलना की थी।

ऑल्टन्यूज द्वारा किए गए फैक्ट चेक का स्क्रीनशॉट

आपको बता दें कि गौरव भाटिया ने अपने ट्वीट में तारीख या फिर किसी स्थान और समय का उल्लेख नहीं किया था। इस वीडियो का प्रयोग उन्होंने केवल एक उदाहरण के रूप में किया था। जो सवाल उन्होंने खड़ा किया किया था वह आज भी है। इस बात में कोई दोराय नहीं कि यह एक निर्विवाद तथ्य है कि वीडियो में दिखाई दे रहे इकट्ठा लोगों ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए जारी सरकारी आदेशों की अवहेलना की थी और दूसरों के जीवन को खतरे में डाला था। इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी है।

लॉकडाउन उल्लंघन की अन्य घटनाएँ

आपको बता दें कि इस हफ्ते की शुरुआत में औरंगाबाद की एक मस्जिद में चालीस के आसपास लोग जमा हो गए थे, जबकि राज्य में कोरोनो वायरस का कहर जारी है। जब पुलिस मौके पर पहुँची तो भीड़ द्वारा उन पर हमला किया गया और यहाँ तक ​​कि हमले में महिलाएँ भी शामिल थीं। इस घटना में तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।

वहीं मंगलवार को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में लॉकडाउन का पालन कराने गए पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया। अहमदाबाद के गोमतीपुर में तबलीगी जमात के सदस्यों की खोज करने गए पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया। इस दौरान हुए पथराव में एक सिपाही भी घायल हो गया था। इस मामले को दो आरोपितों को हिरासत में लिया गया था।

गौरव भाटिया और जुबैर के बीच वास्तव में क्या हुआ

दरअसल बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया एक बड़े मुद्दे की ओर इशारा करने के लिए इस घटना का उपयोग कर रहे थे। उनके ट्वीट से इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता है कि उनका मतलब कुछ और था या उनका इरादा यह बताने का था कि भीड़ एक वैकल्पिक स्थान या समय पर थी। इसके बावजूद भी जुबैर ने भ्रामक टिप्पणी करते हुए प्रतिक्रिया दी कि यह भाजपा के आईटी सेल के दबाव में किया गया है।

ऐसा कर वह यह दिखाना चाहते थे कि लॉकडाउन का उल्लंघन सिर्फ दूसरें समुदाय के लोग ही कर रहे हैं। वास्तव में ऑल्टन्यूज की रिपोर्ट भी उसकी ही पुष्टि करती है।