संभल में लगातार तीर्थ और कुएँ मिलने का सिलसिला जारी है। संभल के ही एक मुहल्ले में अब तक का सबसे बड़ा कुआँ हाल ही में मिला है। प्रशासन ने इसकी खुदाई करवाई है। एक और ऐतिहासिक स्थल पर राम दरबार वाले सिक्के तथा पुराने बर्तन भी मिले हैं। प्रशासन संभल के 87 तीर्थ में से 41 को ढूँढने में सफल रहा है। उसने प्राचीन सभी 19 कुएँ भी ढूँढ लिए हैं।
संभल के सरायतरीन में अब तक सबसे बड़ा कुआँ मिला है। यह कुआँ जामा मस्जिद से 50 मीटर ही दूर स्थित है। इसे स्थानीय लोगों ने पाट दिया था। यह जिस मोहल्ले में स्थित है, उसे दरबार कहते हैं। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि यहाँ टोंक के नवाब का दरबार लगता था।
इस कुएँ का निरीक्षण डीएम-एसडीएम ने किया था। इसके बाद प्रशासन ने इस पर खुदाई चालू कर दी। कुएँ को पूरा खोदने के बाद यह अच्छी अवस्था मिला है। डीएम ने कहा है कि यह दर्शनीय है। यह कुआँ लगभग 70 फीट गहरा है।
यह उन्हीं 19 कुओं का हिस्सा है, जो संभल में स्थित हैं। लोगों ने यह शिकायत की थी कि इस कुएँ को दबंगों ने पाटा था और इस पर होने वाली पूजा भी रुक गई थी। हालाँकि, अब इसका पुराना स्वरुप लौटा दिया गया है। इसका निरीक्षण ASI की एक टीम ने भी किया है।
संभल के एक और इलाके में पुराने समय के सिक्के और बर्तन भी मिले हैं। यह सभी सिक्के अमरपति खेड़ा की समाधि के पास मिली है। अमरपति खेड़ा सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समकालीन थे। वह आल्हा ऊदल के गुरु भी बताए जाते हैं। उनकी समाधि के पास पहले भी खुदाई में कई सिक्के वगैरह मिलते रहे हैं।
इन सिक्कों को प्रशासन ने अपने संरक्षण में ले लिया है। सिक्कों की संख्या 300-400 है। इन पर भगवान राम और माता सीता की आकृति उकेरी है। इन पर लक्ष्मण की आकृति भी उकेरी है। इसके अलावा कुछ और भी डिजाइन वाले सिक्के सामने आए हैं। इनकी धातु क्या है, यह स्पष्ट नहीं हुआ है।
संभल में प्रशासन के प्रयास से 87 तीर्थ में से 41 तीर्थ ढूंढ निकाले गए हैं। इसके अलावा सभी 19 कूप भी ढूंढ कर खोदे गए हैं। इन सभ तीर्थों और कूपों के जीर्णोद्धार का काम भी चल रहा है। कई ऐसी जगह हैं, जहाँ ASI ने सर्वे किया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वो एक ऐसी पॉलिसी लेकर आएँ जिससे राज्य के अस्पतालों में पोस्टेड डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगे। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने इस मामले में चिंता जताते हुए कहा कि आज यह एक बड़ी समस्या है कि मरीज सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए जाता है और उसे निजी संस्थान में रेफर कर दिया जाता है।
अदालत ने कहा, “यह एक खतरा बन गया है कि मरीजों को इलाज के लिए निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है और राज्य सरकार द्वारा प्रांतीय चिकित्सा सेवाओं या राज्य मेडिकल कॉलेजों में नियुक्त डॉक्टर, मरीजों का इलाज और देखभाल नहीं कर रहे हैं। सिर्फ पैसे के लिए उन्हें निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है।”
गौरतलब है कि कोर्ट ने यह आदेश मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज के विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ अरविंद गुप्ता से जुड़ी याचिका पर पारित किया। डॉ गुप्ता के खिलाफ एक मरीज ने राज्य उपभोक्ता फोरम में शिकायत दी थी कि उन्होंने उस मरीज को प्राइवेट नर्सिंग होम भेजा और वहाँ उसका गलत इलाज हुआ। इसके बाद वो हाई कोर्ट पहुँचे।
इसके बाद ये मामला न्यायालय के समक्ष 2 जनवरी को उठा। कोर्ट ने सबसे पहले सवाल उठाया कि क्या डॉ गुप्ता को सरकारी सेवा में होने के बावजूद निजी सुविधा में मरीजों का इलाज करने की अनुमति दी जा सकती है? इसके बाद न्यायालय ने राज्य सरकार को यह भी आदेश दिया था कि वह जाँच करे कि सरकारी डॉक्टर किस प्रकार निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं।
अदालत ने उस समय भी कहा था, “यह एक गंभीर मामला है। राज्य को नर्सिंग होम और मेडिकल दुकानों में निजी प्रैक्टिस करने वाले सरकारी डॉक्टरों के बारे में भी जाँच करनी चाहिए, जिन्हें विभिन्न राज्य मेडिकल कॉलेजों में नियुक्त किया गया है।”
8 जनवरी को कोर्ट को चिकित्सा स्वास्थ्य एवं शिक्षा के प्रधान सचिव द्वारा 1983 के नियमों का हवाला देते हुए जानकारी दी गई कि कि ये नियम सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में कार्यरत डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस करने से रोकते हैं। वहीं सरकारी वकील ने बताया कि 6 जनवरी को उन सभी जिलाधिकारियों को प्राइवेट प्रैक्टिस रोकने के 30 अगस्त 1983 के शासनादेश का पालन कराने का निर्देश जारी किया गया है, जिन जिलों में मेडिकल कॉलेज स्थित है। इसको लागू करने का कोर्ट ने प्रमुख सचिव से हलफनामा मांगा गया है।
इसके बाद ही न्यायालय ने प्रधान सचिव को नियमों के क्रियान्वयन पर व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने को कहा। कोर्ट ने प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य को निर्देश दिया कि वे 1983 के आदेशों के प्रवर्तन का विवरण देते हुए व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करें। इसके साथ ही, राज्य सरकार को एक नीति तैयार करने का भी निर्देश दिया गया ताकि सभी सरकारी डॉक्टरों पर निजी प्रैक्टिस पर प्रतिबंध लगाया जा सके। अब इस मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को होगी।
गुजरात के अहमदाबाद में एक गौरक्षक पर घातक हमला किया गया। उसने कुछ समय पहले गोतस्करों के खिलाफ बीफ (गोमांस) तस्करी की शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़ित गौरक्षक ने पुलिस की शिकायत में बताया है कि बीफ पकड़वाने की वजह से हमला किया गया। इस हमले का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। गौरक्षक की शिकायत के बाद पुलिस ने इस मामले में मोहम्मद हुसैन समेत पाँच लोगों को गिरफ्तार किया है और आगे की कार्रवाई शुरू की है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, गौरक्षक पर हमले की घटना लाल दरवाजा इलाके में हुई, जो करण्ज पुलिस स्टेशन के तहत आता है। गौरक्षक मनोज बारिया ने पुलिस स्टेशन में जो शिकायत दर्ज कराई। पीड़ित के मुताबिक, वह घटना के दिन सुबह करीब 8 बजे एक दोस्त के साथ रुपाली सिनेमा के पास खड़ा था। इसी दौरान चार से पाँच लोग मास्क पहने और धारदार हथियारों व डंडों से उस पर हमला कर दिया।
इसी बीच पीड़ित ने एक हमलावर की आवाज से उसे पहचान लिया। वह हमलावर मोहम्मद हुसैन उर्फ लाइट उस्मान घाँची था। करीब तीन महीने पहले मनोज बारिया ने हुसैन और उसके साथियों के खिलाफ गाँधीनगर में 700 किलो बीफ की शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि हुसैन और उसके साथियों ने इस घटना से दुश्मनी निकालते हुए गौरक्षक मनोज बारिया पर हमला किया।
इस हमले में मोहम्मद वसीम कुरेशी, मुबीन खान पठान और दो अन्य लोग शामिल थे। इस हमले का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में देखा जा सकता है कि आरोपित अपने चेहरे पर कपड़े बाँधकर गौरक्षक को घेरकर उसे पीट रहे हैं। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और आरोपितों को गिरफ्तार किया।
पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद पुलिस हमलावरों को घटनास्थल पर ले गई और पूरे हमले के सीन को री-क्रिएट कराया गया। करण्ज पुलिस स्टेशन ने ऑपइंडिया से बताया कि पुलिस ने जैसे ही शिकायत मिली, कार्रवाई शुरू कर दी थी। सीसीटीवी फुटेज और शिकायतकर्ता के विवरण के आधार पर पुलिस ने आरोपितों को ट्रेस किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। सभी के खिलाफ आईपीसी की धारा 189(2), 191(2), 191(3), 190, 115(2), 118(1) और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 135(1) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
अधिकारी ने आगे बताया, “रात में घटना के समय पकड़े गए आरोपितों की पूछताछ ने बाकी तीन आरोपितों की पहचान भी स्पष्ट की और बाकी तीन आरोपितों को सुबह जल्दी गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार होने के बाद सभी पाँच आरोपितों के खिलाफ नियमों के अनुसार कार्रवाई की गई और उन्हें कोर्ट में पेश किया गया। वहाँ से उन्हें रिमांड पर भेज दिया गया। रिमांड मिलने के बाद हम आरोपितों को घटना स्थल पर ले गए और घटना के सीन को री-क्रिएट भी कराया।”
उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर में जाकर गरीब दलितों को लालच देकर उनका धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में एक ईसाई दंपती को एससी-एसटी कोर्ट के विशेष न्यायाधीश राम विलास सिंह ने 5 साल की सजा सुनाई है और उनके ऊपर 25-25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। ईसाई धर्मांतरण मामले में उत्तर प्रदेश धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत ये पहली सजा है।
जानकारी के मुताबिक, केरल से आए और मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के पिपरिया बैंक कॉलोनी में रहने वाले जोस पापाचन व उसकी पत्नी शीजा एएमएन के खिलाफ जलालपुर के जमौली निवासी भाजपा नेता चंद्रिका प्रसाद ने 18 जनवरी 2023 को केस दर्ज कराया था। चंद्रिका ने अपनी शिकायत में कहा था कि जोस और शीजा 2022 में 3 माह तक शाहपुर फिरोज गाँव की दलित बस्ती में आए-गए और वहाँ गरीब परिवारों को टारगेट करके उन्हें बरगलाया। इसके बाद 25 दिसंबर 2022 को दोनों पति-पत्नी ने दलितों को बड़ी संख्या में इकट्ठा करके धर्म परिवर्तन कराने का प्रयास किया।
#BIG: First Conviction in a Case of Christian Conversion under Uttar Pradesh Anti-Conversion Law
Pastor Jose Pappachan and his wife Sheeja Pappachan have been sentenced to five years of imprisonment with a fine of 25,000 INR each after being proven guilty of luring Dalits to… pic.twitter.com/Xf1SA74jdz
चंद्रिका की शिकायत के बाद पुलिस ने दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था। वहीं पड़ताल में इनके पास से ईसाई सामग्री बरामद हुई थी। इनके खिलाफ सबूत इकट्ठा करने के क्रम में ये जानकारी भी सामने आई थी कि ये लोग दलित बस्ती में पहुँचकर दलित समाज के लोगों को बाइबल का पाठ पढ़ाते थे, ईसा मसीह के बारे में बताते थे, रुपया पैसा का लालच देकर ईसाई धर्म से जुड़ने को कहते थे और आखिर में उनका ईसाई धर्म में परिवर्तन करवाकर उन्हें अपनी किताब देते थे। इतना ही नहीं ये लोग जनसभा करवाकर भी लोगों को बरगलाते थे।
कोर्ट ने यही सारे सबूत देखते हुए माना कि इन दोनों ने दलित समाज के लोगों को प्रलोभन देकर सामूहिक धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही विधि विरुद्ध ढंग से उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित कराया। इसके बाद उन्होंने दंपती को दलितों का धर्मांतरण कराने का दोषी पाते हुए धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत कारावास के साथ अर्थदंड की सजा सुनाई। अब शीजा को 18 जनवरी और जोस को 22 जनवरी को जेल भेजा गया।
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और उनके धार्मिक स्थलों पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। ताजे मामले में ग़ोपालगंज जिले के काशियानी उपजिला के तराइल नॉर्थपारा गाँव में दुर्गा मंदिर और शीतला मंदिर को गुरुवार (21 जनवरी 2025) की सुबह आग के हवाले कर दिया गया। इस आगजनी में दोनों मंदिरों को भारी नुकसान हुआ। दुर्गा मंदिर की पूजा सामग्री जलकर खाक हो गई और शीतला देवी की मूर्ति को पुआल जलाकर खंडित कर दिया गया। घटना के बाद गाँव में दहशत का माहौल बन गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रोज़ाना मंदिर में पूजा करने वाले तराइल गाँव के निवासी प्रमोथ विश्वास ने बताया कि जब वे सुबह पूजा के लिए पहुँचे तो दुर्गा मंदिर का बाँस का दरवाजा खुला हुआ था। अंदर जाने पर उन्होंने देखा कि मंदिर के भीतर सब कुछ जला हुआ था। वहीं पास के शीतला मंदिर में मूर्ति को जलाने के लिए पुआल का इस्तेमाल किया गया था। प्रमोथ ने तुरंत गाँव के अन्य लोगों को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा, “हमारे लिए यह केवल मंदिर नहीं, हमारी आस्था और संस्कृति का प्रतीक है। यह देखकर दिल टूट गया।”
पुलिस मौके पर पहुँची और घटना की पुष्टि की। काशियानी पुलिस थाने के प्रभारी मोहम्मद शफीउद्दीन खान ने कहा कि पुलिस कानूनी कार्रवाई कर रही है, लेकिन अब तक न तो किसी ने शिकायत दर्ज कराई है और न ही आरोपितों की पहचान हो सकी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि घटना की जाँच गंभीरता से की जाएगी।
इस बीच, बांग्लादेश सरकार ने इन घटनाओं को धार्मिक हिंसा मानने से इनकार कर दिया है। गृह मामलों के सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) जहाँगीर आलम चौधरी ने ढाका में अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स ट्रेसी ऐनी जैकब्सन से मुलाकात के दौरान दावा किया कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर कोई अत्याचार नहीं हो रहा। उन्होंने कहा, “हम बांग्लादेश में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करते। यहाँ सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। जो कुछ भी हो रहा है, वह धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से हो रहा है। भारतीय मीडिया झूठ फैला रहा है कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं।”
हालाँकि, बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों पर हमले और अल्पसंख्यकों पर हिंसा की घटनाएँ कुछ और ही कहानी बयाँ करती हैं। कथित ‘स्टूडेंट्स रिवोल्यूशन’ के बाद खासकर जब शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटाया गया, तब से अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं पर हमलों में बढ़ोतरी हुई है। ग़ोपालगंज की घटना इस हिंसा का ताज़ा उदाहरण है, लेकिन सरकार इसे स्वीकार करने से लगातार बच रही है।
मंदिरों पर हमलों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के बावजूद बांग्लादेश सरकार ने भारतीय मीडिया पर झूठे आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया देश की छवि खराब करने के लिए गलत सूचनाएँ फैला रहा है।
इसके अलावा, अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स ट्रेसी ऐनी जैकब्सन के साथ हुई इस बैठक में बांग्लादेश ने रोहिंग्या शरणार्थियों के पुनर्वास का मुद्दा भी उठाया गया। जहाँगीर आलम चौधरी ने अमेरिका से और अधिक रोहिंग्या मुस्लिमों को अपने देश में बसाने की अपील की। उन्होंने कहा कि अमेरिका पहले भी रोहिंग्या के पुनर्वास और सहायता में बड़ी भूमिका निभा चुका है। इस पर ट्रेसी ऐनी जैकब्सन ने बताया कि अब तक 17,000 रोहिंग्या अमेरिका में बसाए जा चुके हैं और यह प्रक्रिया अभी भी जारी है।
बैठक में सीमा सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, और पुलिस सुधार जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। बांग्लादेश ने अपने पुलिस और कोस्ट गार्ड के लिए मानवाधिकार और मानव तस्करी जैसे मामले में ज्यादा ट्रेनिंग देने की माँग की। ट्रेसी ऐनी जैकब्सन ने भरोसा दिलाया कि अमेरिका इस दिशा में अपनी मदद जारी रखेगा।
इसके साथ ही, बांग्लादेश सरकार ने यह भी दावा किया कि सीमा पर स्थिति सामान्य है। उन्होंने बताया कि अगले महीने भारत और बांग्लादेश के सीमा सुरक्षा बलों (बीएसएफ और बीजीबी) के बीच दिल्ली में बैठक होगी, जहाँ दोनों देशों के सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा होगी।
हालाँकि, ज़मीनी हकीकत इन दावों से काफी अलग है। बांग्लादेश में मंदिरों पर हमले और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की घटनाएँ यह साबित करती हैं कि वहाँ की सरकार इस मुद्दे को सुलझाने में नाकाम रही है। यही कारण है कि बांग्लादेशी सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बचाने के प्रयास में भारतीय मीडिया पर लगातार झूठे आरोप लगा रही है।
मानव सभ्यता द्वारा लोहे का उपयोग सबसे पहले भारत में हुआ था। तमिलनाडु से मिले लोहे के औजारों और बर्तनों से इस बात की पुष्टि हुई है। लैब में की गई जाँच से यह 5 हजार साल से अधिक पुराने पाए गए हैं। इससे पहले माना जाता था कि तुर्की में सबसे पहले लोहे का उपयोग चालू हुआ। ‘लौह युग’ का जनक अब भारत को माना जा सकता है।
तमिलनाडु में लौह युग के प्रमाण देने वाली रिपोर्ट मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने जारी की है। उन्होंने लिखा, “मैं बड़े गर्व के सामने विश्व के सामने यह घोषणा करता हूँ कि लौह युग की शुरुआत तमिल धरती पर हुई। विश्व-प्रसिद्ध संस्थानों के परिणामों के आधार पर, तमिलनाडु में लोहे का उपयोग ईसा पूर्व 4000 वर्ष की शुरुआत से होता है, जिससे यह स्थापित हो गया है कि दक्षिण भारत में लोहे का उपयोग 5,300 साल पहले जोरशोर से हो रहा था।”
With immense pride and unmatched satisfaction, I have declared to the world:
“The Iron Age began on Tamil soil!”
Based on results from world-renowned institutions, the use of iron in Tamil Nadu dates back to the beginning of 4th millennium B.C.E., establishing that iron usage… pic.twitter.com/YYslKX7K5F
तमिलनाडु के थूथुकोड़ी जिले में सिवागालाई समेत कई इलाकों में 2019 से 2022 के बीच आठ अलग-अलग जगह खुदाई की गई थी। यह खुदाई एक कब्रिस्तान के आसपास हुई थी। यहाँ खुदाई में तमिलनाडु पुरातत्व विभाग को 160 बड़े मिट्टी के कलश मिले थे। इनमें से एक कलश पूरी तरीके से बंद मिला, जिसमे सदियों के बाद भी मिट्टी नहीं गई थी।
इस कलश के भीतर एक मानव कंकाल, कुछ लोहे के औजार और धान के बीज भी मिले थे। सबसे पहले पुरातत्विकों ने धान की जाँच करवाई जो लगभग 3 हजार साल पुराना निकला। इसके बाद इस कलश और बाकी जगह से इकट्ठा हुए लोहे के सामान की जाँच हुई। यह सभी 2953 ईसा पूर्व से 3345 ईसा पूर्व (लगभग 5000 साल पुराने) के निकले।
इन कलश से इनमें चाकू, तलवार, छेनी, अंगूठी और कुल्हाड़ी जैसे सामान मिले हैं। यह लोहे को गला कर बनाए गए थे। इनकी जाँच एक्सेलरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री (AMS) तकनीक से करवाई गई। यह तकनीक कार्बन डेटिंग का एक हिस्सा है। इससे पता चलता है कि कोई वस्तु कितनी पुरानी थी।
‘एंटिक्विटी ऑफ़ आयरन: रीसेंट रेडिओमेट्रिक डेट्स फ्रॉम तमिल नाडु’ नाम से जारी की गई इस रिपोर्ट में इस पूरी खुदाई और जाँच तथा क्या-क्या मिला, इसकी जानकारी दी गई है। इसे K राजन और R सिवानंथन ने लिखा है।
तुर्की का दावा बदला
सिवागालाई में मिली वस्तुओं की जाँच केवल एक ही जगह नहीं हुई। बल्कि इसे लखनऊ में स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान लैब, फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी अहमदाबाद और अमेरिका स्थित बीटा लैब्स में टेस्ट करवाया गया। तीनों ने ही साफ़ किया कि तमिलनाडु में मिले लोहे के औजार 5000 साल से अधिक पुराने हैं।
अब तक माना जाता रहा है कि तुर्की और सीरिया के इलाकों में गलाए हुए लोहे का सबसे पहले उपयोग हुआ। तुर्की में लगभग 3700-4000 वर्ष पहले रहने वाले हित्तित लोगों को लोहा उपयोग करने का श्रेय दिया जाता रहा है। इन इलाकों में खुदाई से लोहे के तीर-तलवार आदि मिले हैं।
तमिलनाडु में मिले लोहे के सामान और अलग-अलग लैब से उनके 5000 साल से अधिक पुराने होने की पुष्टि के बाद अब तुर्की का दावा पलट गया है। भारतीय पुरातत्व विशेषज्ञों ने भी इसे बड़ी खोज करार दिया है। पुरातत्व विशेषज्ञ दिलीप चक्रबर्ती ने इसे दुनिया के लिए बड़ी खोज बताया है।
दिलीप कुमार ने कहा, “दुनिया में पहली बार, गले लोहे का इतिहास 3 हजार साल पहले का पाया गया है। यह ना केवल भारत के इतिहास में, बल्कि विश्व के पुरातत्व के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण खोज है।” ASI के पूर्व मुखिया राकेश तिवारी ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व के मामले में एक नया मोड़ है।
डॉक्टर तिवारी ने कहा है कि अब तक भारत में लोहे का उपयोग ज्यादा से ज्यादा 1500 ईसा पूर्व में माना गया है। यह साबित करने के लिए आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मिली वस्तुओं की जाँच भी हुई है। उन्होंने कहा कि अब नई खोज से यह 3000 साल पहले पहुँच गया है, जो कि एकदम अविश्वसनीय है।
गौरतलब है कि अब तक यह दावा होता रहा है कि भारत के लोगों का लोहे से परिचय तुर्की के लोगों ने करवाया। इस खोज के बाद यह दावा कमजोर पड़ गया है। उल्टे इस बात की अधिक संभावना है कि भारत से ही लोहा तुर्की या बाकी विश्व के इलाकों में पहुँचा हो।
उत्तर में ‘ताम्र युग’, दक्षिण में ‘लौह युग’
तमिलनाडु में ‘लौह युग’ के बारे में नई जानकारी देने वाली रिपोर्ट से भारत के इतिहास के विषय में और भी बातें सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जब उत्तर भारत में सिन्धु घाटी सभ्यता में ताँबे का उपयोग हो रहा था, लगभग उसी समय तमिलनाडु में लोहे का उपयोग हो रहा था।
रिपोर्ट में कहा गया है, “जब विंध्य के उत्तर (उत्तर भारत) में स्थित इलाकों में ने ताम्र युग चल रहा था, तो विंध्य के दक्षिण का क्षेत्र (विंध्य भारत) कामकाज में लाए जाने वाले ताँबे की कमी के चलते लौह युग में प्रवेश कर गया होगा।”
रिपोर्ट लिखने वाले K राजन ने कहा, “रेडियोकार्बन डेटिंग दर्शाती हैं कि जब सिंधु घाटी में ताम्र युग था, तब दक्षिण भारत लौह युग में था। इस अर्थ में, दक्षिण भारत का लौह युग और सिंधु का ताम्र युग एक ही समय में चल रहे थे।
उन्होंने कहा, “अब, हमने पाया है कि शिवगलाई और आदिचनल्लूर से मिले लोहे के औजार 2,500-3,000 ईसा पूर्व के हैं। आगे न केवल तमिलनाडु में बल्कि देश भर में अन्य स्थानों पर और अधिक स्थलों की खोज और खुदाई होनी चाहिए, ताकि अब तक जो कुछ भी हमने प्राप्त किया है, उसे और मजबूत किया जा सके।”
तमिलनाडु के पुरातत्व विभागके मुखिया उदयचंद्रन ने कहा, “अन्य धातुओं की तुलना में, लोहे को गलाने के लिए आपको 1,200 से 1,400 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। इसके लिए बेहतर तकनीक चाहिए होती है। यह दर्शाता है कि तमिल लोगों ने 5,300 साल पहले भी इस कौशल में महारत हासिल कर ली थी।”
मुरादाबाद कमिश्नरी के रामपुर जिले के स्वार ब्लॉक में तैनात महिला खंड शिक्षा अधिकारी (एबीएसए) बबीता सिंह पर लव जिहाद, भ्रष्टाचार और वसूली जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। बबीता सिंह पर पहले हिंदू महिलाओं को मुस्लिम समुदाय में शादी के लिए प्रेरित करने के आरोप लगे थे। अब उन पर रिश्वत लेने का भी मामला उजागर हुआ है। इस मामले में डीएम, मंडलायुक्त और बीएसए ने जाँच के आदेश दिए।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीन महीने पहले बबीता सिंह पर आरोप लगा था कि वे हिंदू महिला शिक्षकों को मुस्लिम युवकों से शादी करने के लिए प्रेरित कर रही थीं। शिक्षिकाओं का कहना है कि एबीएसए बबीता सिंह उन्हें इस्लाम को ज्यादा आजादी और बेहतर जीवनशैली वाला मजहब बताकर शादी के लिए बरगलाती हैं। एक शिकायत में आरोप लगाया गया कि बबीता सिंह कहती हैं, “मुस्लिम युवकों से शादी करने से लड़कियाँ ज्यादा खुश रहती हैं। मैंने भी मुस्लिम युवक से शादी की है।”
महिला शिक्षकों ने शिकायत में कहा कि बबीता सिंह अपने पद का दुरुपयोग कर न केवल लव जिहाद को बढ़ावा दे रही हैं, बल्कि जातिवाद और सांप्रदायिकता भी फैला रही हैं। उनका कहना है कि एबीएसए बच्चों को भी गुमराह करती हैं। इस मामले में प्रशासन ने बबीता सिंह से जवाब माँगा था।
लव जिहाद मामले में बीएसए की तरफ से जारी पत्र (फोटो साभार: भास्कर)
इसी दौरान सोशल मीडिया पर एक ऑडियो वायरल हुआ, जिसमें एबीएसए के कार्यालय के एक बाबू को रिश्वत माँगते हुए सुना गया। ऑडियो में शिक्षक साजिद अली से बीआरसी कार्यालय बुलाकर 10 हजार रुपये माँगने की बात हो रही थी। वहीं, एक अन्य ऑडियो में अध्यापिका रजिया से भी पैसे लेने की बातचीत का जिक्र है। इस मामले में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने संबंधित सभी पक्षों को 8 जनवरी 2025 को जिला कार्यालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया था।
आरोपित से माँगी गई सफाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुरादाबाद के मंडलायुक्त आन्जनेय सिंह ने मण्डलीय सहायक शिक्षा निदेशक (बेसिक) बुद्धप्रिय सिंह को जाँच का आदेश दिया। इसके तहत रामपुर के बीएसए राघवेंद्र सिंह ने बबीता सिंह से स्पष्टीकरण माँगा है। इसमें शिकायत की पुष्टि और समाधान के लिए एक सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने को कहा गया है।
भ्रष्टाचार केस में जारी पत्र (फोटो साभार: भास्कर)
बताया जा रहा है कि रिश्वत और लव जिहाद के आरोपों को अलग-अलग जाँच टीम देख रही है। जिसमें बबीता सिंह के बयान और वायरल ऑडियो की फॉरेंसिक जाँच के आधार पर आगे की कार्रवाई की बात कही जा रही है।
हालाँकि बबीता सिंह ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि कुछ शिक्षक उनके खिलाफ गलत आरोप लगा रहे हैं क्योंकि वे विद्यालयों में अनुशासनहीनता पर कार्रवाई करती हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति के बँटवारे मामले में सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल मुस्लिम व्यक्ति से विवाह कर लेने मात्र से कोई हिंदू धर्म का व्यक्ति इस्लाम में स्वत: धर्मांतरित नहीं हो जाता।
कोर्ट की यह टिप्पणी ‘डॉक्टर पुष्पलता एवं अन्य बनाम रामदास HUF एवं अन्य’ केस में की गई। मामला, दरअसल ये था कि फ्रेंड्स कॉलोनी में रहने वाले व्यक्ति राम दास ने दो शादियाँ (एक बीवी के गुजरने के बाद दूसरी) की थीं। पहली पत्नी से उनकी 2 बेटियाँ थीं और दूसरी पत्नी से 2 बेटे।
हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के 9 सितंबर 2005 के लागू होने के बाद से बेटियाँ भी पिता की संपत्ति में अधिकारी थीं। ऐसे में 2007 में मुकदमा दायर हुआ। पहली पत्नी से हुई बड़ी बेटी ने मुकदमा व्यक्ति की दूसरी पत्नी के दोनों बेटो पर किया।
आरोप लगाया गया कि ये लोग उनसे बिन पूछे या बिन सहमति लिए उनके पिता की संपत्ति बेचने, उसे अलग करने और उसे निपटाने की कोशिश कर रहे थे। जबकि बेटियों के पास मुकदमे की संपत्तियों में से प्रत्येक का 1/5 हिस्सा था।
पिता ने उस समय इस आधार पर बेटी द्वारा दायर किए गए मुकदमे का विरोध किया कि बेटी ब्रिटेन में पाकिस्तान मूल के किसी मुस्लिम व्यक्ति से निकाह कर चुकी थी और वहीं रहती थी। पिता का कहना था कि बेटी अब हिंदू नहीं है इसलिए उनकी संपत्ति में उनका अधिकार नहीं है।
बाद में केस की सुनवाई के बीच ही दिसंबर 2008 में व्यक्ति की मौत हो गई और उनका केस बेटों ने लड़ा। कोर्ट ने अब इसी मामले में ये पाया कि प्रतिवादियों को ये साबित करना था कि वादी की बड़ी बेटी अब हिंदू नहीं है, लेकिन वो लोग ऐसा नहीं कर पाए।
ऐसे में कोर्ट ने कहा प्रतिवादी अपना दायित्व पूरा करने में असफल रहे, क्योंकि इस दावे को प्रमाणित करने के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया कि सबसे बड़ी बेटी ने हिंदू धर्म त्याग दिया था या औपचारिक रूप से इस्लाम धर्म अपना लिया था।
अदालत ने कहा कि महिला ने हलफनामे के माध्यम से अपने साक्ष्य में स्पष्ट रूप से कहा है कि उस व्यक्ति के साथ अपने नागरिक विवाह के बाद भी वह अपने धर्म अर्थात हिंदू धर्म का पालन करती रही है।
जस्टिस जसमीत सिंह मामले की सुनवाई करते हुए बोले- “मेरे विचार से, किसी मुस्लिम से विवाह करने मात्र से हिंदू धर्म से इस्लाम में स्वतः धर्मांतरण नहीं हो जाता। वर्तमान मामले में, प्रतिवादियों द्वारा किए गए मात्र कथन के अलावा, प्रतिवादियों द्वारा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि वादी संख्या 1 ने इस्लाम में धर्मांतरण की मान्यता प्राप्त प्रक्रिया अपनाई है।”
न्यायालय ने कहा कि चूँकि महिला ने अपना धर्म नहीं बदला है, इसलिए वह एचयूएफ संपत्तियों में अपना हिस्सा “दावा करने की हकदार” है। कोर्ट ने माना कि नियमानुसार बेटियाँ एचयूएफ के नाम पर पीपीएफ खाते में जमा राशि में से प्रत्येक को केवल 1/4 हिस्सा पाने की हकदार थीं। वहीं प्रॉपर्टी में 2 संपत्तियों की हकदार हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (23 जनवरी 2025) को पराक्रम दिवस के अवसर पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस को श्रद्धांजलि दी। यह नेताजी की 128वीं जयंती है। इस अवसर पर वे संसद भवन के सेंट्रल हॉल में स्कूली बच्चों से भी मिले। उधर, नेताजी बोस की बेटी अनीता बोस फाफ ने पीएम मोदी से सुभाषचंद्र बोस की पार्थिव अवशेषों को जापान से भारत लाने की अपील की है।
अनीता बोस ने एक प्रेस रिलीज जारी करके कहा कि नेताजी की अस्थियाँ पिछले आठ दशकों से टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी हुई हैं। भारत की पिछली सरकारों के इरादे पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि दशकों तक देश की सरकारें नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पार्थिव अवशेषों को वापस लाने के मामले पर झिझकती रहीं या फिर इनकार करती रहीं।
Today, on Parakram Diwas, I pay homage to Netaji Subhas Chandra Bose. His contribution to India’s freedom movement is unparalleled. He epitomised courage and grit. His vision continues to motivate us as we work towards building the India he envisioned. pic.twitter.com/HrXmyrgHvH
उन्होंने आगे कहा, “एक समय तो रेंकोजी मंदिर के पुजारी और जापान की सरकार उनके (नेताजी सुभाषचंद्र बोस) के अवशेषों को उनकी मातृभूमि वापस भेजने के लिए इच्छुक, तैयार और उत्सुक थे। हमें यह स्वीकार करना होगा कि उस दिन ताइवान के ताइपेई (तब जापान के कब्जे में था) में उड़ान भरते समय हुई विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।”
नेताजी की बेटी अनीता बोस के अनुसार, सरकारों की यह झिझक शायद इस उम्मीद के कारण थी कि नेताजी की मौत 1945 में नहीं हुई थी। उन्होंने आगे लिखा, “नेताजी को अब और निर्वासित न रखें! उन्हें घर लौटने की अनुमति दें। कई हमवतन आज भी उन्हें याद करते हैं, उनका सम्मान करते हैं और उनसे प्यार करते हैं।”
तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने नेताजी को मरणोपरांत भारत रत्न देने का फैसला किया था, लेकिन दबाव की वजह से उन्हें यह फैसला वापस लेना पड़ा था। नेताजी को भारत रत्न नहीं देने के पीछे सरकार ने वजह बताई कि अगर ऐसा किया जाएगा तो इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि नेताजी की वास्तव में मृत्यु हो गई है।
इससे पहले अनीता बोस ने अगस्त 2019 में पीएम मोदी से जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी नेताजी की अस्थियों की डीएनए जाँच कराने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि इससे उनके पिता की मौत की सच्चाई सामने आ जाएगी। उन्होंने दावा किया था कि पिछली सरकारों में कुछ ‘खास लोग’ नहीं चाहते थे कि नेताजी की मृत्यु पर से रहस्य का पर्दा कभी उठे।
इसी तरह साल 2022 में अनीता बोस ने एक भारतीय चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि उनके पिता और भारत में उनके पिता की विरासत के साथ काफी गलत किया गया। वो कहती हैं कि नेताजी एक धर्मनिष्ठ हिंदू थे और वो धर्म के नाम पर लोगों की हत्या नहीं कर सकते थे, जैसा कि देश के बँटवारे के बाद हुआ था। बता दें कि विभाजन के दौरान लाखों हिंदुओं की हत्याएँ हुई थीं।
नेताजी की बेटी के मुताबिक, उनके पिता विद्रोही स्वभाव के थे। इसके कारण महात्मा गाँधी उन्हें अपने बस में नहीं कर पा रहे थे। गाँधीजी ने पंडित नेहरू का पक्ष लिया था। उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस के एक धड़े ने नेताजी के साथ गलत किया, उनके साथियों की निंदा की गई। नेताजी के सहयोगियों को वो लाभ भी नहीं मिला, जो कि अंग्रेजों के लिए लड़ने वालों को मिला।
गुजरात में मुस्लिम मालिक हिन्दू नामों से ढाबा लाइसेंस लिए हुए थे। वह इन हिन्दू नामों के आधार पर गुजरात राज्य सड़क परिवहन निगम (GSRTC) से अनुबंध भी कर चुके थे। यहाँ गुजरात की सरकारी बसें आकर रुकती थीं। यात्री इन्हें हिन्दू ढाबा समझ कर खाना खाते थे। अब इस मामले में सरकार ने कार्रवाई की है।
GSRTC ने राज्य के ऐसे 27 ढाबों के साथ अपना अनुबंध रद्द कर दिया हैं। इन ढाबों पर अब सरकारी बसें नहीं रुका करेंगी। इनमें से कुछ ढाबे ऐसे थे, जिनके मालिक मुस्लिम हैं लेकिन ढाबों के नाम हिन्दू देवी-देवताओं पर रखे गए थे।
यह ढाबे वडोदरा, राजकोट, गोधरा, मेहसाणा, भुज, भरूच, अहमदाबाद, नाडियाड और पालनपुर जैसे डिवीजन में बने हुए है। इस लिस्ट में भुज-ध्रगंधरा-अहमदाबाद रोड पर स्थित होटल शिवशक्ति भी है। इस होटल का नाम हिंदू देवता के नाम पर रखा गया था और इसका लाइसेंस भी हिन्दू के नाम पर था लेकिन इसके मालिक और प्रबंधक मुसलमान थे।
अब से स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसें इन होटलों पर हाल्ट नहीं करेंगी .. क्योंकि ये होटल हिन्दू नामो की आड़ में मुस्लिमो द्वारा चलाये जा रहे थे इन सभी के लाइसेंस GSRTC द्वारा रद्द किये गए ..
पिछले एक वर्ष में Gujarat State Road Transport Corporation(GSRTC) द्वारा हिंदू… pic.twitter.com/ftWFtjkP6k
यही कारनामा सूरत-अहमदाबाद रोड पर स्थित होटल तुलसी ने भी किया था। इसके अलावा भरूच डिवीजन में आने वाले सूरत-अहमदाबाद रोड पर स्थित होटल मारुति का परमिट भी रद्द कर दिया गया है। वडोदरा-गोधरा-मोडासा रोड पर स्थित होटल वृंदावन का परमिट भी रद्द हो गया है।
इसके अलावा अहमदाबाद-राजकोट रूट पर होटल सर्वोदय, अहमदाबाद-बालासिनोर-गोधरा-झालोद रूट पर होटल श्रीजी, अहमदाबाद-सूरत रोड पर होटल सहयोग, होटल गैलेक्सी, होटल रोनक, अहमदाबाद-ध्रगंधा-भुज रूट पर होटल सर्वोदय, सूरत- अहमदाबाद रोड पर बने होटल सतीमाता का भी परमिट रद्द हुआ है।
गौरतलब है कि GSRTC गुजरात सरकार की रोडवेज सेवा है। इसके पास 8 हजार से ज्यादा बसें हैं। इनमें से तमाम बसें लम्बे रूट पर चलती हैं। यह लम्बी रूट की बसें रास्ते में कुछ जगह ढाबों पर रुकती हैं ताकि याती ब्रेक ले सकें। यह ढाबे GSRTC तय करती है और इसके लिए टेंडर निकलते हैं।
इन्हीं में मुस्लिमों ने गड़बड़ी की। इससे पहले भी सोशल मीडिया पर मुस्लिम मालिकों द्वारा हिंदू नामों से चलाए जा रहे होटलों-ढाबों की जाँच की माँग लगातार उठती रही है। अब GSRTC ने कार्रवाई कर दी है।