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ट्रेन में लूटपाट के बाद फैयाज, समीर ने साथियों संग शशांक को बेरहमी से पीटा, खून की उल्टियों के बाद हुई युवक की मौत: 4 पर केस दर्ज, रेलवे ने की मुआवजे की घोषणा

हैदराबाद-दिल्ली दक्षिण एक्सप्रेस में मोहम्मद फैयाज, सय्यद समीर, एम. श्याम कोटेश्वर राव और मोहम्मद अमन ने यूपी के शशांक रामसिंह राज की पीटपीट कर हत्या कर दी। इन हत्यारों ने शशांक की जेब से रुपए निकाल लिए और मोबाइल छीन लिया, जिसका विरोध करने पर शशांक और उसके दोस्त की जमकर पिटाई की, जिसमें शशांक की मौत हो गई। शशांक यूपी के लखीमपुर खीरी जिले के राजापुर कैमहारा के रहने वाले थे, लेकिन अब उनका शव उनके घर पहुँचा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना गुरुवार (2 दिसंबर 2024) की सुबह तेलंगाना के पास हुई। शशांक अपने दोस्तों के साथ ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफर कर रहा था। वे सभी शौचालय के पास सो रहे थे। इसी दौरान चार हमलावरों ने शशांक की जेब से ₹1,700 चोरी कर लिए। जब एक अन्य यात्री का मोबाइल चोरी हुआ और उसने जागकर फोन वापस छीन लिया, तब शशांक को अपने पैसे चोरी होने का पता चला। शशांक ने तुरंत उन हमलावरों का सामना किया और अपने पैसे लौटाने की माँग की।

हमलावरों ने शशांक पर क्रूरता से हमला किया। उन्होंने उसे लात-घूंसों से मारा और अन्य यात्रियों को भी पीटा। यह पूरा हमला करीब 30 मिनट तक चला, उसके बाद अन्य सह-यात्रियों ने बीच-बचाव किया। पिटाई के दौरान शशांक को गंभीर चोटें आईं और उसने खून की उल्टी की। इसके बाद वह बेहोश हो गया।

सुबह करीब 9:15 बजे ट्रेन नागपुर स्टेशन पहुँची, जहाँ रेलवे के डॉक्टरों ने शशांक को मृत घोषित कर दिया। यात्रियों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए दो हमलावरों को पकड़ लिया, जबकि बाकी दो ट्रेन में छिप गए थे।

नागपुर जीआरपी ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। हमलावरों की पहचान मोहम्मद फैयाज S/o मोहम्मद हाशिमुद्दीन (19), सय्यद समीर S/o सय्यद जिमाल (18), एम. श्याम (21), और मोहम्मद अमन S/O मोहम्मद अकबर (19) के रूप में हुई है। सभी आरोपित हैदराबाद के रहने वाले हैं।

रेलवे पुलिस ने चारों आरोपियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। रेलवे प्रशासन ने शशांक के परिजनों को ₹1.5 लाख का मुआवजा देने की घोषणा की है।

सड़क निर्माण पर पत्रकार ने की रिपोर्टिंग, कॉन्ट्रैक्टर ने मारकर सेप्टिक टैंक में फिंकवाया: 3 दिन बाद लाश मिली, छत्तीसगढ़ CM बोले- अपराधी को किसी हाल में नहीं बख्शेंगे

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में मुकेश चंद्राकर नाम के एक पत्रकार की हत्या कर दी गई है। शुक्रवार (3 जनवरी 2025) को मुकेश का शव सेप्टिक टैंक से बरामद हुआ है। वह 1 जनवरी से लापता चल रहे थे। आरोप है कि सड़क निर्माण में कमियाँ उजागर करने की वजह से ठेकेदार द्वारा मुकेश की हत्या की गई। पुलिस ने आरोपित ठेकेदार सुरेश सहित कुछ अन्य संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कातिलों पर कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पत्रकार मुकेश चंद्राकर बुधवार (1 जनवरी 2025) को अचानक लापता हो गए थे। उनके भाई युकेश ने पुलिस में एक गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। पुलिस ने जाँच शुरू की तो मुकेश के मोबाइल की अंतिम लोकेशन एक स्थानीय ठेकेदार सुरेश चंद्राकर की एक प्रॉपर्टी के पास पाई गई। यह निर्माण छत्तानपारा बस्ती के पास है जहाँ सुरेश चंद्राकर के कर्मचारियों के आवास हैं। सुरेश भी यहाँ अक्सर बैडमिंटन खेलने आया करता था।

इस जगह की जाँच के दौरान पुलिस को यहाँ बने सेप्टिक टैंक के पास नया निर्माण नजर आया। इस निर्माण तो तुड़वाया गया तो सेप्टिक टैंक के अंदर मुकेश की लाश पड़ी दिखी। लाश तेजी से सड़ रही थी। उसके कपड़ों से मुकेश की पहचान परिजनों ने की। लाश को कब्ज़े में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। मृतक के परिजनों से तहरीर लेकर जाँच शुरू कर दी। ठेकेदार सुरेश चंद्राकर और उसके कुछ कर्मचारियों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी गई है।

युकेश चंद्राकर की शिकायत में इस बात का जिक्र है कि उनके भाई ने कुछ दिनों पहले गंगालूर से नेलशानार जाने वाली निर्माणाधीन सड़क पर ग्राउंड रिपोर्ट की थी। तब मुकेश ने इसके निर्माण में हो रही कई खामियों को उजागर किया था। मुकेश की इसी रिपोर्ट पर जगदलपुर लोक निर्माण विभाग ने जाँच शुरू कर दी। बताया जा रहा है कि इस सड़क को ठेकेदार सुरेश चंद्राकर बनवा रहा था। वह मुकेश की रिपोर्टिंग से काफी नाराज हुआ था।

बताया यह भी गया है कि पूर्व में भी पत्रकार मुकेश और ठेकेदार सुरेश चंद्राकर के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो चुका था। मुकेश को लगातार धमकियाँ दी जा रहीं थीं। कहा जा रहा है कि 1 जनवरी को सुरेश चंद्राकर ने मिलने का झाँसा देकर मुकेश को अपने यहाँ बुलवाया। यहाँ उसने मुकेश की हत्या करके लाश को सेप्टिक टैंक में फेंक दिया और ऊपर से नया प्लास्टर चढ़वा दिया। मृतक के भाई की शिकायत में सुरेश चंद्राकर के साथ 2 अन्य लोगों का भी जिक्र है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस घटना का संज्ञान लिया है। शुक्रवार को उन्होंने अपने X हैंडल पर मृतक की आत्मा की शांति की कामना की है। इसी के साथ उन्होंने लिखा, “इस घटना के अपराधी को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। अपराधियों को जल्द से जल्द से गिरफ्तार कर के कड़ी से कड़ी सजा देने के निर्देश हमने दिए हैं।” CM ने मुकेश चंद्राकर की हत्या पत्रकारिता जगत के लिए कभी न भर सकी जा सकने वाला नुकसान बताया है।

गौरतलब है कि एक राष्ट्रीय संस्थान का संवाददाता होने के साथ मुकेश चंद्राकर अपना खुद का यूट्यूब चैनल भी चलाते हैं। साल 2021 में जब नक्सलियों ने CRPF के एक जवान का अपहरण कर लिया था तब उसे रिहा करवाने में मुकेश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। छत्तीसगढ़ सहित देश भर के तमाम पत्रकारों ने मुकेश की हत्या पर गुस्सा जताया है। उन सभी ने हत्यारों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

‘PM मोदी न चढ़ाएँ अजमेर शरीफ पर चादर, रोक लगे’ : अदालत में डली याचिका, दावा- पहले दरगाह की जगह था शिव मंदिर

अजमेर की एक अदालत में याचिका दाखिल की गई है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर उर्स के मौके पर चादर पेश करने पर अस्थायी रोक लगाने की माँग की गई है। यह याचिका हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने दायर की है। उनका कहना है कि अजमेर शरीफ दरगाह का स्थल विवादित है और वहाँ चादर भेजने से अदालत की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, याचिका में कहा गया है कि यह दरगाह एक प्राचीन शिव मंदिर को तोड़कर बनाई गई है। गुप्ता ने अदालत से अपील की है कि केंद्र सरकार को दरगाह पर चादर भेजने से रोका जाए, क्योंकि इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। गुप्ता का कहना है कि अदालत में मामला लंबित रहने के दौरान चादर पेश करना अदालत की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होगा।

गुप्ता की याचिका में कहा गया है कि दरगाह की संरचना और वहाँ मौजूद कुछ विशेषताएँ यह साबित करती हैं कि यह स्थल मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था। याचिका में दावा किया गया है कि मुख्य प्रवेश द्वार की छत और छतरियों की डिजाइन हिंदू वास्तुकला का संकेत देती है। याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से स्थल की जाँच कराने और वहाँ भगवन श्री संकटमोचन महादेव मंदिर की पुनर्स्थापना की माँग की गई है।

गुप्ता का यह भी कहना है कि दरगाह के भूमिगत मार्ग में एक शिवलिंग मौजूद है, जिसकी पूजा करने का हिंदुओं का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह अधिकार वर्तमान में बाधित हो रहा है। पिछले महीने इसी मामले में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी किया था।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (2 जनवरी 2025) को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू को चादर सौंपी थी, जो उर्स के मौके पर दरगाह पर पेश की जानी है। यह चादर हर साल प्रधानमंत्री की ओर से भेजी जाती है। रिजिजू ने इसे ट्वीट कर प्रधानमंत्री की भावना को ‘भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक’ बताया था। पीएम मोदी ने भी इसे री-ट्वीट किया था।

मणिपुर में कुकी दंगाइयों ने पुलिस पर फेंके पेट्रोल बम, डिप्टी कमीशनर के ऑफिस पर भी हमला: घायल SP की तस्वीर सामने आई, जवाबी कार्रवाई में 15 घायल

मणिपुर के कांगपोकपी जिले के सैबोल गाँव में कुकी उग्रवादियों की भीड़ ने शुक्रवार (3 जनवरी) को पुलिस पर हमला कर दिया। यह हमला पुलिस अधीक्षक (SP) और डिप्टी कमिश्नर के दफ्तरों पर किया गया था। इसमें पुलिस अधीक्षक मनोज प्रभाकर घायल हो गए है। सामने आई तस्वीरों में दिख रहा है कि एसपी प्रभाकर के माथे से खून बह रहा है।

हमलावर कुकी उग्रवादी अत्याधुनिक हथियारों से लैस थे और वे छद्म वेश में थे। कहा जा रहा है कि कुकी समर्थित कमिटी ऑफ ट्राइबल यूनिटी (CoTU) ने केंद्रीय बलों की तैनाती के खिलाफ क्षेत्र में ‘पूर्ण बंद’ की घोषणा की थी। वे सैबोल गाँव में केंद्रीय बलों द्वारा ‘सामुदायिक बंकरों’ पर कब्जे और मंगलवार (31 दिसंबर) को महिलाओं पर कथित लाठीचार्ज के खिलाफ ‘विरोध’ कर रहे थे।

दरअसल, CoTu ने सैबोल से केंद्रीय बलों को हटाए जाने तक ‘आर्थिक नाकेबंदी’ का आह्वान किया था। शुक्रवार (3 जनवरी) को कुकी उग्रवादियों ने पूरे दिन विरोध प्रदर्शन किया। शाम को उन्होंने पुलिस अधीक्षक के कार्यालय की घेराबंदी की और उसे सील करने की कोशिश की। उन्होंने परिसर में तोड़फोड़ की और कई वाहनों को नष्ट कर दिया। कुकी उग्रवादियों ने पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम भी फेंके।

हमले के दौरान केंद्रीय बलों ने उग्रवादियों को रोकने की कोशिश की और हिंसक कुकी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए खाली कारतूस और आँसू गैस के गोले दागे। कमिटी ऑफ ट्राइबल यूनिटी के अनुसार, इसमें करीब 15 लोग घायल हो गए हैं। उनमें से 11 लोगों को ICU में भर्ती कराया गया है।

सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक बयान में मणिपुर पुलिस ने बताया, “स्थिति से निपटने के लिए सुरक्षा बलों की बड़ी टुकड़ियाँ तैनात की गई हैं। स्थिति अब नियंत्रण में है और इस पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।” इस बीच, कमिटी ऑफ ट्राइबल यूनिटी ने ‘पूर्ण बंद’ को 24 घंटे के लिए बढ़ाने की घोषणा की है।

धार्मिक विवादों की समय से सुनवाई के लिए जरूरी है रिलीजियस ट्रिब्यूनल: कोर्ट और सरकार को अब इस दिशा में सोचने की क्यों है जरूरत, जानिए

धर्म की रक्षा में न्याय का आधार ही समाज को एकता और शांति प्रदान करता है। सरकार को धार्मिक स्थलों से संबंधित विवादों के समाधान के लिए एक अलग ट्रिब्यूनल की स्थापना करनी चाहिए। यह ट्रिब्यूनल सामान्य अदालतों से अलग हो और इसमें विशेष रूप से धार्मिक विवादों का निपटारा किया जाए। इसके लिए एक अलग धार्मिक ट्रिब्यूनल का गठन एक प्रभावी कदम हो सकता है।

इससे न केवल इन विवादों का त्वरित समाधान सुनिश्चित होगा, बल्कि राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश में धार्मिक विवाद अक्सर समाज में तनाव और अस्थिरता का कारण बनते हैं। इन विवादों का त्वरित और न्यायपूर्ण समाधान आवश्यक है, ताकि देश में धार्मिक सौहार्द्र और कानून व्यवस्था बनी रहे।

धार्मिक विवाद संवेदनशील होते हैं और इनके कारण समाज में तनाव और अशांति का माहौल बन सकता है। एक विशेष ट्रिब्यूनल के माध्यम से इन विवादों को सुलझाने से विवादित पक्षों को निष्पक्ष और विशेषज्ञ समाधान मिलेगा। इसके अलावा, यह पहल सामान्य अदालतों के बोझ को भी कम करेगी और अन्य मामलों के निपटारे में तेजी लाएगी।

भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देता है। अनुच्छेद 25-28 हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन, प्रचार और अभ्यास करने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण सुनिश्चित करता है। वहीं, अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है कि वह न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों द्वारा लिए गए निर्णयों की समीक्षा कर सके।

हालाँकि, संविधान धार्मिक विवादों के लिए अलग ट्रिब्यूनल का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता, लेकिन संसद को विशेष कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है। अनुच्छेद 323B के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं को विशेष ट्रिब्यूनल स्थापित करने का अधिकार है। धार्मिक मुद्दों पर शीघ्र और प्रभावी न्याय के लिए धार्मिक विवादों को सिविल कोर्ट में सुलझाने में वर्षों लग सकते हैं।

ट्रिब्यूनल में धार्मिक और कानूनी विशेषज्ञों की नियुक्ति की जानी चाहिए, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके। इसके साथ ही इन ट्रिब्यूनल के निर्णयों पर उच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान होना चाहिए, ताकि संवैधानिक प्रक्रिया का पालन हो। धार्मिक विशेषज्ञता के कारण ट्रिब्यूनल में धार्मिक और कानूनी विशेषज्ञ शामिल होंगे, जो जटिल धार्मिक मामलों को बेहतर तरीके से समझ कर उसे सुलझा सकते हैं।

समाज में शांति बनाए रखने के साथ-साथ ट्रिब्यूनल विवादों को निपटाने के लिए एक केंद्रीय मंच प्रदान करेगा, जिससे जगह-जगह विवाद और हिंसा से बचा जा सकेगा। क्षेत्राधिकार की बात करें तो ट्रिब्यूनल को केवल धार्मिक विवादों, धार्मिक स्थलों और संबंधित मामलों तक सीमित रखा जाए। धार्मिक विवादों का समाधान हिंसा से नहीं, संवाद और कानून के माध्यम से ही संभव है।

ट्रिब्यूनल का गठन इस दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। यह ट्रिब्यूनल सुनिश्चित करेगा कि हर धर्म को न्याय मिले और कोई भी निर्णय तटस्थता और संविधान के दायरे में रहे। भारत में धार्मिक विवादों के समाधान के लिए अलग ट्रिब्यूनल का गठन संविधान सम्मत और समय की आवश्यकता है। राज्य सरकारों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए ताकि भविष्य में धार्मिक विवाद राष्ट्रीय एकता और कानून व्यवस्था को बाधित न करें।

अर्ध कुंभ, कुंभ, पूर्ण कुंभ और महाकुंभ: जानिए क्या है अंतर, कैसे होती है गणना… क्यों इस बार प्रयागराज में लग रहा है महाकुंभ

प्रयागराज में इस साल महाकुंभ मेले का भव्य आयोजन हो रहा है, जो हर 144 साल में एक बार होता है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम पर आयोजित इस मेले को धार्मिक आस्था और भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। करोड़ों श्रद्धालु देश-विदेश से इस मेले में भाग लेने आ रहे हैं। महाकुंभ में संगम पर स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दौरान स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मेले में साधु-संतों और नागा साधुओं के अखाड़े भी हिस्सा लेते हैं।

यह महाकुंभ न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति और एकता का उत्सव भी है। इस बार प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेले को महाकुंभ कहा जा रहा है, ऐसा क्यों है? कुंभ, अर्ध कुंभ, पूर्ण कुंभ और महाकुंभ में क्या अंतर होता है और इनकी खगोलीय गणना किस आधार पर की जाती है, इस लेख के माध्यम से आपको समझाते हैं।

महाकुंभ मेला भारतीय संस्कृति का ऐसा पवित्र उत्सव है, जिसकी गूँज प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक युग तक सुनाई देती है। यह मेला न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय दर्शन, परंपरा और खगोलीय विज्ञान का अद्भुत संगम भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश की बूंदें हरिद्वार, प्रयागराज (इलाहाबाद), उज्जैन और नासिक के पवित्र स्थलों पर गिरीं। यही कारण है कि इन चार स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है।

खगोलीय गणनाओं के आधार पर कुंभ और महाकुंभ का आयोजन अनंत काल से होता रहा है। विष्णु पुराण में इस बात का उल्लेख है कि जब गुरु कुंभ राशि में प्रवेश करता है और सूर्य मेष राशि में होता है, तो हरिद्वार में कुंभ का आयोजन होता है। इसी प्रकार, जब सूर्य और गुरु सिंह राशि में होते हैं, तो नासिक में कुंभ लगता है। उज्जैन में कुंभ तब होता है जब गुरु कुंभ राशि में प्रवेश करता है। प्रयागराज में माघ अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं और गुरु मेष राशि में होता है। इस खगोलीय गणना का सटीक पालन आज भी किया जाता है।

अर्ध कुंभ

अर्ध कुंभ एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है, जो हर छह साल में हरिद्वार और प्रयागराज में होता है। यह आयोजन गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर होता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक पवित्र माना जाता है। अर्ध कुंभ का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इसे कुंभ मेले का आधा चक्र माना जाता है।

इसमें लाखों श्रद्धालु स्नान करने के लिए आते हैं, क्योंकि यह मान्यता है कि इस दौरान संगम में स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके आयोजन का समय भी खगोलीय गणनाओं पर आधारित होता है। जब बृहस्पति वृश्चिक राशि में और सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब अर्ध कुंभ का आयोजन होता है।

कुंभ मेला

कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है, जो हर 12 साल में चार स्थलों – हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है। इसे भारतीय संस्कृति और आस्था का प्रतीक माना जाता है। कुंभ मेले की पौराणिक कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है, जिसमें अमृत कलश के लिए देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ था। इस आयोजन का मुख्य आकर्षण पवित्र नदियों में स्नान है, जिसे अमृत स्नान कहा जाता है।

यह मेला भी खगोलीय गणनाओं पर आधारित होता है। जब बृहस्पति सिंह राशि में और सूर्य मेष राशि में होता है, तब कुंभ मेले का आयोजन होता है। इसके अलावा, अन्य ग्रहों की स्थिति भी इसकी तिथि निर्धारण में महत्वपूर्ण होती है।

पूर्ण कुंभ

पूर्ण कुंभ मेला कुंभ मेले का ही विस्तार है, जो हर 12 साल में प्रयागराज में आयोजित होता है। इसे कुंभ का पूर्ण रूप माना जाता है और इसका महत्व अन्य कुंभ मेलों से अधिक है। पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर होने वाले इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति है।

पूर्ण कुंभ का आयोजन शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है। इस मेले में लाखों श्रद्धालु और साधु-संत भाग लेते हैं। विशेष रूप से नागा साधु और अखाड़ों का योगदान महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान, हवन, कथा वाचन और प्रवचन होते हैं। पूर्ण कुंभ का आयोजन भी खगोलीय गणनाओं के आधार पर होता है।

महाकुंभ

महाकुंभ मेला भारतीय धार्मिक आयोजनों का सबसे बड़ा पर्व है, जो हर 144 साल में केवल प्रयागराज में आयोजित होता है। इसे कुंभ मेले का सबसे पवित्र और महत्त्वपूर्ण रूप माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस मेले में संगम पर स्नान करना आत्मा को पवित्र और पापों से मुक्त करता है।

महाकुंभ का आयोजन खगोलीय गणनाओं पर आधारित होता है। जब बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा एक विशेष स्थिति में होते हैं, तब इसका आयोजन होता है। खास बात ये है कि महाकुंभ का आयोजन 12 पूर्ण कुंभ के साथ यानी हर 144 साल में होता है, वो भी सिर्फ प्रयाग में। साल 2013 में प्रयागराज में आखिरी बार पूर्ण कुंभ का आयोजन हुआ था। इस बार महाकुंभ का 12वाँ अवसर यानी 144वाँ साल है, इसलिए इस पूर्ण कुंभ को महाकुंभ कहा जा रहा है।

हर 144 साल आयोजित होने वाले महाकुंभ को देवताओं और मनुष्यों के संयुक्त पर्व के रूप में देखा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं के एक दिन के बराबर होता है। इसी गणना के आधार पर 144 वर्षों के अंतराल को महाकुंभ के रूप में मनाया जाता है।

महाकुंभ 2025 में पाँच प्रमुख स्नान पर्व होंगे, जिनमें तीन राजसी स्नान शामिल हैं-

  1. पौष पूर्णिमा (13 जनवरी 2025): कल्पवास का आरंभ।
  2. मकर संक्रांति (14 जनवरी 2025): पहला शाही स्नान।
  3. मौनी अमावस्या (29 जनवरी 2025): दूसरा शाही स्नान।
  4. बसंत पंचमी (3 फरवरी 2025): तीसरा शाही स्नान।
  5. माघी पूर्णिमा (12 फरवरी 2025): कल्पवास का समापन।
  6. महाशिवरात्रि (26 फरवरी 2025): महाकुंभ का अंतिम दिन।

कुंभ मेले का हर प्रकार अर्धकुंभ, कुंभ, पूर्ण कुंभ और महाकुंभ हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन आयोजनों के पीछे पौराणिक और ज्योतिषीय मान्यताएँ हैं, जो इनकी विशेषता को और भी बढ़ा देती हैं। महाकुंभ का आयोजन केवल प्रयागराज में होता है, जो इसे और भी खास बनाता है। 2025 का महाकुंभ न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र होगा, बल्कि यह भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का भव्य प्रदर्शन भी करेगा।

हिंदू पति को बताए बगैर मुस्लिम पत्नी ने अम्मी-अब्बा से मिलकर करवाया बेटे का खतना: दर्द की शिकायत के बाद सामने आया पूरा कच्चा चिठ्ठा- राजकोट की घटना

राजकोट में एक हिन्दू व्यक्ति की मुस्लिम बीवी ने अपने बेटे का खतना करवा दिया। यह उसने बिना अपने पति की जानकारी के करवा दिया। इस काम में मुस्लिम महिला की अम्मी और अब्बू ने भी मदद की। मामले का खुलासा तब हुआ जब बच्चे ने गुप्तांग में दर्द की शिकायत की। घटना का पता चलने के बाद पीड़ित ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है।

यह घटना राजकोट के राया टेलीफोन एक्सचेंज के पास तुलसीपार्क इलाके की है। हिंदू युवक ने पुलिस को बताया है कि साल 2018 में उसका एक मुस्लिम लड़की से प्रेम संबंध हो गया था। इसके बाद दोनों ने विवाह कर लिया। इस शादी से उनका 4 साल का बेटा है।

21 दिसंबर, 2024 को वह काम के सिलसिले में बाहर गया था और यहाँ से वह एक सप्ताह बाद लौटा। जब वह वापस आया तो उसके बेटे ने बेटे ने गुप्तांग में दर्द की शिकायत की। उसने जब देखा तो बच्चे के गुप्तांग पर पत्तियाँ बंधी हुई थी। जब उसने इस मामले में अपनी पत्नी से पूछा तो उसने खतने की बात कबूली।

उसकी पत्नी ने अपनी माँ के साथ मिलकर खतना करवाने की जानकारी दी। इसी के बाद हिन्दू युवक पुलिस के पास पहुँचा और पत्नी रुक्सार और उसकी सास, खतना करने वाले डॉक्टर या जमात खाने के जमाती के खिलाफ यूनिवर्सिटी थाने में मामला दर्ज करवाया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। अभी किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

हिन्दू युवक ने कहा है कि शादी के बाद पिता का धर्म बेटे पर भी लागू होता है ऐसे में उसके बेटे का खतना करवाना गलत है। हिन्दू युवक ने आरोप लगाया कि उसकी मुस्लिम पत्नी ने उसे अपमानजनक बातें बोलीं और गालियाँ भी दी। यह भी सामने आया है कि उसकी पत्नी बेटे को लेकर कहीं चली गई है। उसकी सास से उसे धमकाया भी है।

मुस्लिम, इस्लाम और पैगंबर को लेकर गंदी-गंदी बात करने वाले कौन हैं टॉमी रॉबिन्सन: दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क भी आए उनके सपोर्ट में

ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग के खिलाफ मुखर होकर बोलने के बाद अब दुनिया के सबसे अमीर आदमी एलन मस्क ने ब्रिटेन के एक दक्षिणपंथी टॉमी रॉबिनसन के पक्ष में आवाज उठाई है। उनके ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर लोग टॉमी रॉबिनसन के बारे में जानना चाहते हैं कि आखिर उन्होंने ऐसा किया क्या है जो ब्रिटेन सरकार ने उन्हें जेल में डाला हुआ है ।

जानकारी के मुताबिक टॉमी रॉबिनसन (असली नाम स्टीफन याक्सली लेनन) दक्षिणपंथी विचारधारा की मुखर आवाज रहे हैं। टॉमी रॉबिन्सन का असली नाम स्टीफन याक्सली-लेनन है। उन्हें ब्रिटिश इंग्लिश डिफेंस लीग (EDL) नामक संगठन के संस्थापक के रूप में जाना जाता है, जो खुलकर अप्रावासी मुस्लिमो के खिलाफ, इस्लाम के खिलाफ और पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ बोलने के लिए जाना जाता है।

इतना ही नहीं यह संगठन अक्सर इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के खिलप विरोध प्रदर्शन करता है और इसके सदस्यों पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया जाता रहा है। स्वयं रॉबिनसन इस मुखर रवैये के कारण इस्लामी कट्टपंथियों के निशाने पर काफी समय तक थे। फिर बाद में उनके ऊपर सीरियाई लड़के से जुड़े मामले में अदालत की अवमानना करने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया।

रॉबिनसन पिछले 18 महीने से जेल की सजा काट रहे हैं। जानकारी के मुताबिक उन्होंने अदालती मनाही के बावजूद एक डॉक्यूमेंट्री प्रसारित की थी, जिसमें मुस्लिम युवक के साथ यौन अपराध को दिखाया गया था। ब्रिटिश अदालत ने इस डॉक्यूमेंट्री में किए गए दावों को आधारहीन करार दिया था।

वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी टॉमी रॉबिनसन का हर प्रकार से विरोध करते रहे हैं, लेकिन एलन मस्क ने हाल में रॉबिन्सन को रिहा करने का आह्वान किया है। मस्क ने रॉबिन्सन की विवादास्पद डॉक्यूमेंट्री को सोशल मीडिया पर साझा किया और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टारमर की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जिसने रॉबिनसन को जेल मे डाला है उन्हें जेल में होना चाहिए।

पीएम मोदी ने रखी वीर सावरकर कॉलेज की आधारशिला, ₹140 करोड़ में बनेगा: दिल्ली यूनिवर्सिटी को 30 साल बाद मिला नया कॉलेज

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार (3 जनवरी, 2025) को दिल्ली को हजारों करोड़ की सौगात दी है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को 29 वर्षों के अंतर के बाद मिल रहे वीर सावरकर कॉलेज का शिलान्यास किया है। पीएम मोदी ने झुग्गी में रहने वालों 1600 से अधिक लोगों के लिए बनाए गए फ्लैट्स का भी उद्घाटन किया है। इन सबके अलावा पीएम मोदी ने CBSE के नए हेडक्वार्टर, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर समेत और कई परियोजनाओं का शिलान्यास-उद्घाटन किया है। पीएम मोदी ने इसे दिल्ली के लिए बड़ा दिन बताया है।

पीएम मोदी ने दिल्ली के नजफगढ़ में वीर सावरकर कॉलेज का शिलान्यास किया है। यह कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध होगा। दिल्ली विश्वविद्यालय को 30 वर्षों बाद कोई नया कॉलेज मिल रहा है। इससे पहले 1995 में दिल्ली विश्वविद्यालय को आखिरी कॉलेज मिला था। वीर सावरकर कॉलेज को ₹140 करोड़ की लागत से बनाया जाएगा। यह कॉलेज 18000 स्क्वायर मीटर से अधिक इलाके में फैला है और इसमें अत्याधुनिक सुविधाएँ होंगी।

वीर सावरकर कॉलेज में 24 क्लासरूम जबकि 8 ट्युटोरियल रूम होंगे। इस कालेज में लाइब्रेरी, कैंटीन और शिक्षकों के लिए 40 कमरे होंगे। कॉलेज कैम्पस से नजफगढ़ समेत तमाम आसपास के क्षेत्रों को फायदा होगा। दिल्ली विश्वविद्यालय को इसके अलावा एक पश्चिमी और पूर्वी कैंपस मिल रहा है। इसमें से एक में कानून की पढ़ाई होगी। दोनों कैम्पस को ₹480 करोड़ की लागत से बनाया जाने वाला है। इसके चलते दिल्ली विश्वविद्यालय शहर के चारों कोनों में फ़ैल जाएगा।

पीएम मोदी ने दिल्ली में शिक्षा क्षेत्र के अलावा लोगों को घरों की सौगात भी दी है। पीएम मोदी ने दिल्ली के अशोक विहार स्लम पुनर्वास परियोजना के बनाए गए अंतर्गत झुग्गी झोपड़ी वालों निवासियों के लिए बनाए गए नए फ्लैटों का दौरा किया है। उन्होंने यहाँ कुछ लाभार्थियों को चाभी भी सौंपी। यहाँ 1600 से अधिक फ्लैट्स बनाए गए हैं। अब लोग झुग्गी को छोड़ कर यहाँ रह सकेंगे। सरकार ने इन फ्लैट पर ₹25 लाख का खर्च किया है।

पीएम मोदी ने दिल्ली के नौरोजी नगर में बनाए गए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर सरोजिनी नगर में बनाए गए 2500 फ्लैट्स का उद्घाटन भी किया है। सरोजिनी नगर में बनाए गए इन फ्लैट्स में कई आधनिक सुविधाएँ जोड़ी गई हैं। पीएम मोदी ने इसके अलावा दिल्ली के द्वारका में बनाए गए CBSE के नए इंटिग्रेटेड हेडक्वार्टर का भी उद्घाटन किया है। इसके निर्माण में ₹300 करोड़ खर्च हुए हैं। इस हेडक्वार्टर में डाटा सेंटर भी बनाया गया है। पीएम मोदी ने यह सभी योजनाएँ दिल्ली को विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सौंपी है।

जिस ‘बंगाल के कसाई’ सुहरावर्दी ने करवाया हिन्दुओं का नरसंहार, उसकी महानता बच्चों को पढ़ाएगी बांग्लादेश की यूनुस सरकार: नई किताबों में लाई स्पेशल चैप्टर

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से लगातार इस्लामी कट्टरपंथ को लगातार बढ़ावा मिल रहा है। इस पूरी कवायद को बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार खुद बढ़ा रही है। इसी कड़ी में अब बांग्लादेश में बच्चों को पढ़ाई जाने वाली किताबों में बदलाव किए गए हैं। ऐसी ही एक किताब में हिन्दुओं का नरसंहार करवाने वाले पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और मुस्लिम लीग नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी की बड़ाई की गई है। अब बांग्लादेश इस कसाई के बारे में पढ़ेंगे।

हुसैन सुहरावर्दी को हिन्दुओं के नरसंहार के लिए ‘बंगाल का कसाई’ कहा गया था। सुहरावर्दी ने यह नरसंहार बंगाल का प्रधानमंत्री रहते हुए करवाया था। सुहरावर्दी ही वह शख्स था जिसने 1943 में बंगाल के अकाल को बद से बदतर बना दिया था।

सुहरावर्दी के ही राज में मुस्लिमों ने 1946 में डायरेक्ट एक्शन डे किया था और हजारों हिन्दुओं को मरवा दिया था। अब बांग्लादेश में हिन्दुओं पर लगातार हमले हो रहे हैं और यूनुस सरकार सुहरावर्दी का महिमामंडन कर रही है और उसके कट्टरपंथी विचारों को बढ़ावा दे रही है। असल में यह बच्चों में भी उसी कट्टरपंथ को भरने की योजना है।

सुहरावर्दी और 1946 का नरसंहार

16 अगस्त 1946 भारतीय इतिहास में हिन्दू विरोधी हिंसा के सबसे क्रूर दिनों में से एक है। इसे कलकत्ता का नरसंहार नाम से भी जाना जाता है। 5 दिनों तक चले इस नरसंहार की शुरुआत थी जिसमें लगभग 5,000 लोग मारे गए थे। इस नरसंहार में हज़ारों हिंदू घायल हुए थे और 120,000 बेघर हो गए थे। इस नरसंहार के पहले ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का आह्वान मुस्लिम लीग के सुप्रीमो मुहम्मद अली जिन्ना ने किया था। जिन्ना ने कलकत्ता की हिंदू आबादी के खिलाफ़ लूट, हत्या और यौन हिंसा के लिए लोगों को भड़काया था।

जिन्ना ने अपने ऐलान में साफ़ कर दिया था कि मुस्लिम लीग अंग्रेज (ब्रिटिश) सरकार के साथ सहयोग करना बंद कर देगी और संवैधानिक तरीकों को अलविदा कह देगी। जिन्ना ने ऐलान किया था कि वह पूरे देश में हिंसा करेंगे। जिन्ना के हिंदू समुदाय का नरसंहार करने वाले जिन्ना के इस सपने को साकार करने वाला व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि हुसैन शहीद सुहरावर्दी था।

1946 से पहले बंगाल एक मुस्लिम बहुल प्रांत था। बंगाल की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी केवल 42% थी। लेकिन कलकत्ता शहर में हिंदू बहुसंख्यक थे। उनकी आबादी 64% था। इस ‘जनसांख्यिकीय असंतुलन’ ने कलकत्ता को सुहरावर्दी और मुस्लिम लीग के निशाने पर ला दिया। वे हिंदुओं को डराकर बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करने के लिए मजबूर करना चाहते थे।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1946 में सत्ता ट्रांसफर के लिए बातचीत को मिशन भेजा था। यह लोग भारत के बँटवारे पर भी बात करने वाले थे। हालाँकि, कॉन्ग्रेस बँटवारे को लेकर राजी नहीं थी जबकि मुस्लिम लीग चाहती थी कि पाकिस्तान बन जाए। मुस्लिम लीग ने अपनी माँग मनवाने के लिए हिंसक तरीके अपनाने का फैसला लिया और 16 अगस्त, 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे घोषित कर दिया। इस दिन को भी जानबूझकर चुना गया था। दरअसल, यह रमजान का अठारवां दिन था।

इसी दिन बद्र का युद्ध हुआ था। इस बद्र के युद्ध में पैगंबर मोहम्मद की सेनाओं ने कुरैशों से युद्ध किया था और हराया था। इसके चलते इस्लाम का अरब में कब्जा पक्का हो पाया था। इसी को ध्यान में रखते हुए सुहरावर्दी और जिन्ना ने यही दिन चुना। वह हिन्दुओं को कुरैश दिखाना चाह रहे थे और भारत के मुस्लिमों को पैगम्बर मुहम्मद की फ़ौज। उन्होंने अखबारों और सभाओं के जरिए खूब जहर भी उगला। मुस्लिम लीग वालों ने नारा दिया, “लड़ के लेंगे पाकिस्तान, लेकर रहेंगे पाकिस्तान, अल्लाहु अकबर, नारा-ए-तकबीर।”

मुस्लिम लीग के मुखपत्र द स्टार इंडिया ने लिखा, “मुसलमानों को याद रखना चाहिए कि यह रमज़ान ही था जब अल्लाह ने जिहाद की मंजूरी दी थी। रमज़ान में ही बद्र की लड़ाई लड़ी गई थी, जो इस्लाम और बुतपरस्तों के बीच पहला खुला युद्ध था, जिसे 313 मुसलमानों ने जीता था और फिर रमज़ान में ही पैगंबर के नेतृत्व में 10,000 मुसलमानों ने मक्का पर जीत हासिल की थी और अरब में जन्नत और इस्लाम के राज की स्थापना की। मुस्लिम लीग खुशकिस्मत है कि वह इस महीने और दिन पर अपनी कार्रवाई शुरू कर रही है।”

16 अगस्त 1946 की सुबह कलकत्ता में हिंसा भड़क उठी। मुस्लिम लीग के नेताओं के भड़काऊ भाषणों ने हिंसा को और भड़का दिया। हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने सभी मौलवियों को तक़रीर देने का निर्देश दिया था, जिसमें जुम्मा के नमाजियों को पाकिस्तान बनाने के लिए हर कोशिश करने को कहा गया था। यहाँ हिन्दुओं पर हमला करना साफ़ मकसद था। सुहरावर्दी ने मुसलमानों को यह साफ़ कहा था उन्हें कानूनी छूट मिलेगी और पुलिस हस्तक्षेप नहीं करेगी। इससे उन्हें हिंदू इलाकों में उत्पात मचाने का और भी हौसला मिला।

सुहरावर्दी ने पुलिस को काम नहीं करने दिया और इससे मुस्लिम गुंडों को बिना किसी डर अपने हमले करने की छूट मिल गई। जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, स्थिति तेजी से बिगड़ती गई। लोहे की रॉड, तलवारों और अन्य हथियारों से लैस मुस्लिम भीड़ ने कोलकाता शहर भर में हिंदू घरों और व्यवसायों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। कॉलेज स्ट्रीट और बड़ाबाजार जैसे इलाके मुसलमानों के लिए सामूहिक हत्या, बलात्कार और आगजनी करने के लिए मुख्य निशाना बने।

सुहरावर्दी ने इस हिंसा में बड़ा रोल निभाया था। उसने नरसंहार से कुछ साल पहले बंगाल पुलिस में हेरफेर करके पंजाबी मूस्लिमों और पठानों को बड़ी संख्या में भरा था। कलकत्ता पुलिस में इससे पहले पारंपरिक रूप से आरा, बलिया, छपरा और देवरिया के हिंदू शामिल थे। सुहरावर्दी ने इसमें बदला करके यह पका कर दिया कि दंगे के समय कार्रवाई हिन्दुओं के खिलाफ हो और मुस्लिमों के अपराध पर वह आँख मूँद ले। इस हिंसा के लिए लम्बी योजना बनाई गई थी। पेट्रोल इकट्ठा करने और गुंडों को खाना-पानी के लिए भी विशेष इंतजाम था।

ब्रिटिश सरकार ने नरसंहार के 6 दिनों के बाद ही सहाला संभालने के लिए सेना भेजी लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका था। यह हिंसा बाद में बिहार और पंजाब समेत बाकी इलाकों में फैली। इसी के कुछ दिन बाद बाद में यह बिहार और पंजाब सहित अन्य क्षेत्रों में फैल गया। इसी के कुछ दिनों बाद मुसलमानों ने अक्टूबर और नवंबर 1946 में नोआखली नरसंहार की साजिश रची। सुहरावर्दी के सहयोगी और मुस्लिम लीग का नेता ग़ुलाम सरवर हुसैनी इस नरसंहार के पीछे मास्टरमाइंड था। नोआखली में लगभग 5,000 हिंदुओं की हत्या कर दी गई।

सुहरावर्दी के कुकर्म मिटाने का हो रहा प्रयास

अब सुहरावर्दी के कुकर्मों पर पर्दा डालने का प्रयास किया जा रहा है। सुहरावर्दी को डायरेक्ट एक्शन डे से अलग करने का भी प्रयास किया जा रहा है। उसे न केवल महिमामंडित किया जा रहा है, बल्कि इतिहास के प्रमुख आदमी के रूप में भी चित्रित किया जा रहा है। जबकि असल में सुहरावर्दी को कोलकाता में ‘गुंडों के राजा’ के रूप में जाना जाता था। ‘बंगाल के कसाई’ के रूप में उसकी करामातों को विभिन्न इतिहासकारों ने दर्ज किया है, लेकिन फिर भी मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली बांग्लादेश सरकार इसे छिपाने की कोशिश कर रही है।