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अयोध्या में राम मंदिर: 370 हटाने के अहम किरदार ज्ञानेश कुमार को मोदी सरकार ने दी जिम्मेदारी

बीते महीने झारखंड चुनाव के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि अयोध्या में चार महीने के भीतर भव्य राम मंदिर बनेगा। अब केंद्र सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संबंधित सभी मामलों को देखने के लिए गृह मंत्रालय में एक अलग डेस्क बनाया गया है। इस डेस्क में तीन अधिकारी होंगे। इनका नेतृत्व अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार करेंगे। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के फैसले में भी कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल 9 नवबंर को इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। 5 सदस्यों वाली बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने के भीतर ट्रस्ट बनाने को कहा था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था। इस फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं को भी शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया था।

ऐसे में ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में अलग डेस्क बनाने का मोदी सरकार का फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस फैसले से जुड़े सभी मामलों को अब यही डेस्क देखेगी। कुमार गृह मंत्रालय की जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से जुड़े विभाग के भी प्रमुख रहे हैं। आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म किए जाने और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बॉंटने के मोदी सरकार के फैसले में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इस बीच, कई मीडिया रिपोर्ट्स ऐसी आई हैं जिनमें दावा किया गया है कि मस्जिद के लिए योगी सरकार ने जमीन का चुनाव कर लिया है और इससे संबंधित प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी भेज दिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय में 1990 के दशक से लेकर 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों तक भी अयोध्या को लेकर एक अलग विभाग था। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पेश होने के बाद इसे समाप्त कर दिया गया था।

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गोडसे से सावरकर के थे शारीरिक संबंध: RSS पर कॉन्ग्रेस का नया प्रोपेगेंडा

वामपंथी गिरोह के चंगुल में फँसकर वैचारिक दिवालिएपन की शिकार कॉन्ग्रेस के कैसे दिन आ गए हैं कि अब किसी भी हद तक जाकर झूठ और अफवाह फ़ैलाने में लग गई है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, ताजा मामला मध्य प्रदेश के भोपाल में कॉन्ग्रेस द्वारा चलाए जा रहे अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस सेवा दल के प्रशिक्षण शिविर में कथित रूप से ‘वीर सावरकर’ नाम की पुस्तिका का वितरण किया गया है। इस पुस्तिका में बीजेपी पर निशाना साधने के लिए सावरकर को टारगेट करते हुए उनके आसपास की कई घटनाओं, सवालों और विवादों का जिक्र है।

विनायक दामोदर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर कॉन्ग्रेस द्वारा जारी की गई विवादित पुस्तिका में दावा किया गया है, “महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के साथ हिंदू महासभा के सह-संस्थापक का शारीरिक संबंध था।”


साभार -India Today

रिपोर्ट के अनुसार, डोमिनिक लैपिएरे और लैरी कॉलिन्स की किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में उल्लेखित एक घटना का उल्लेख करते हुए, कॉन्ग्रेस द्वारा जारी बुकलेट में कहा गया है, ” ब्रह्मचर्य धारण करने से पहले, नाथूराम गोडसे के एक ही शारीरिक संबंध का ब्यौरा मिलता है। यह समलैंगिक संबंध था। उनका पार्टनर था उनका राजनैतिक गुरू वीर सावरकर।”

आरएसएस और वीर सावरकर पर कॉन्ग्रेस द्वारा जारी पुस्तिका में कॉन्ग्रेस ने हिंदू महासभा के सह-संस्थापक से संबंधित कुछ सवाल-जवाब में जिन विषयों को चुना है और जिन वाक्यांशों का जिक्र किया है वे आने वाले समय में नए विवादों को जन्म देंगे।

विवादित पुस्तिका में एक सवाल है, “क्या सावरकर ने हिंदुओं को अल्पसंख्यक महिलाओं के बलात्कार के लिए प्रोत्साहित किया?’ और प्रश्न का उत्तर, जैसा कि कॉन्ग्रेस की पुस्तिका में बताया गया है, ‘हाँ’ है।

साभार -India Today

इस पुस्तिका में दावा यह भी है कि सावरकर ने 12 साल की उम्र में एक मस्जिद पर पथराव किया था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ग्रेस द्वारा वितरित पुस्तिका में आरएसएस को “नाजी और फासीवादी” संगठन के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही बताया गया है कि उसने इसकी प्रेरणा हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद से ली है।

कॉन्ग्रेस के इस प्रपंच का कारण भी आप समझ गए होंगे। यह जानबूझकर उस गिरोह को भड़काने की साजिश है जो आज NRC के विरोध के नाम पर सड़क पर है। हिंसा पर अमादा है। यह पुस्तिका भी आरएसएस और सावरकर को बदनाम करने तथा समुदाय विशेष को भड़काने की कॉन्ग्रेस के चिरपरिचित अंदाज का एक हिस्सा है।

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इस साल 6 साल में सबसे कम बच्चों की मौत हुई है। बीते सालों में 1500, 1300 तक बच्चे मरे हैं। इस साल 900 की ही मौत हुई है। हर रोज अस्पतालों में मौतें होती ही रहती है। इसमें कोई नई बात नहीं है।
-अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री, राजस्थान, 28 दिसंबर 2019

भाजपा प्रधानमंत्री कार्यालय के इशारे पर कोटा में बच्चों की मौत को लेकर सियासत कर रही। इसकी आड़ में वह CAA का विरोध छिपाना चाहती है। 2015, 2016, 2017 में जब भाजपा की सरकार थी तब भी बच्चे मरे थे।
-रघु शर्मा, स्वास्थ्य मंत्री, राजस्थान, 01 जनवरी 2020

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ पूरे देश में जो माहौल बना हुआ है, उससे ध्यान हटाने के लिए इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। मैं पहले ही कह चुका हूॅं इस साल शिशुओं की मौत के आँकड़ों में पिछले कुछ सालों की तुलना में काफी कमी आई है।
-अशोक गहलोत, मुख्यमंत्री, राजस्थान, 02 जनवरी 2020

ये चुनिंदा बयान हैं उनके जिनकी कोटा के जेके लोन अस्पताल में 100 से ज्यादा बच्चों की मौत के मामले में सीधे-सीधे जवाबदेही बनती है। एक का राज्य का मुखिया होने के नाते तो दूसरे की उस महकमे का मुखिया होने के नाते जिसके अधीन यह सरकारी अस्पताल आता है। लेकिन, यदि तारीखों का फर्क छोड़ दें तो इन बयानों में आपको कोई अंतर दिखता है? वही असंवेदनशीलता और वैसा ही कुतर्क। एक ही संदेश बच्चे मरते हैं तो मरें, हमें फर्क नहीं पड़ता। हम नंबर गिना देंगे और बता देंगे कि पहली वाली सरकार में इससे ज्यादा मरे थे।

राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार की बच्चों की जिंदगी से ज्यादा मोह​ब्बतें नंबर से दिखती है। सो, यूनिसेफ के कुछ आँकड़ों पर गौर कर लें। इसके अनुसार साल के पहले दिन यानी एक जनवरी 2020 को सबसे अधिक बच्चे भारत में पैदा हुए। इस दिन भारत में कम से कम 67,385 बच्चे पैदा हुए। इसी दिन चीन में 46,299, पाकिस्तान में 16,787 बच्चों ने जन्म लिया। 26,039 बच्चों की पैदाइश के साथ इस मामले में नाइजीरिया तीसरे और 13,020 नवजातों के साथ इंडोनेशिया पॉंचवें पायदान पर रहा।

यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक हेनरिटा फोर ने कहा, “नव वर्ष और नए दशक की शुरुआत न सिर्फ भविष्य की हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने का एक अवसर है, बल्कि हमारे बाद इस दुनिया में आने वाले का भी भविष्य है। प्रत्येक 1 जनवरी हमें उन संभावनाओं की याद दिलाती है।” यूनिसेफ की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, “दुनिया में ऐसे लाखों बच्चे है जिनके लिए ये दिन शुभ नहीं है। 2018 में जन्म के पहले महीने में 25 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हो गई। इनमें से एक तिहाई की मौत जन्म के पहले दिन हुई।”

जाहिर है कल को गहलोत इन आँकड़ों का हवाला देकर कह सकते हैं कि इनके आगे कोटा में मरने वाले मासूमों की संख्या तो कुछ भी नहीं। जिस दिन यूनिसेफ ने अपने आँकड़े पेश किए उस दिन तो कोटा के जेके लोन अस्पताल में ‘बस’ 5 बच्चे ही मरे थे। उसके पहले के 7 दिनों 22 मरे थे। गहलोत बताएँगे कि 25 दिसंबर को 1, 26 को 3, 27 को 2, 28 को 6, 29 को 1, 30 को 4 और 31 को 5 बच्चे की मौत हुई। फिर आपसे पूछेंगे कि 25 लाख नवजातों की मौत के सामने ये क्या मायने रखते हैं?

जेके लोन अस्पताल में दम तोड़ने वाले नवजातों में 3 दिन की रेखा, 2 दिन की कांता से लेकर 1 दिन की नरगिस तक है। 28 दिसंबर की रात जब चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव ने 5 घंटे समीक्षा बैठक की तो उसी दौरान 4 बच्चे भी मर गए। लेकिन, गहलोत सरकार को इन तथ्यों से कोई फर्क नहीं पड़ता।

उसे जेके लोन अस्पताल पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की रिपोर्ट से भी फर्क नहीं पड़ता। यह​ रिपोर्ट कहती है कि अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को लेकर बरती जा रही लापरवाही बच्चों की मौत का एक अहम कारण है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं। दरवाजे टूटे हुए हैं। इसके कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते रहते हैं। राजस्थान पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार जेके लोन ही नहीं कोटा के अन्य सरकारी अस्पतालों का भी ऐसा ही हाल है। अराजकता का आलम यह है कि जेके लोन अस्पताल के वार्ड में लगाने के लिए पिछले सप्ताह 27 हीटर खरीदे गए। लेकिन, ये हीटर कहॉं गए यह अस्पताल के अधीक्षक तक को मालूम नहीं है।

लेकिन गहलोत जानते हैं कि उनसे सवाल नहीं पूछे जाएँगे। न असंवेदनशीलता के लिए, न ध्वस्त स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए और न सरकारी अस्पतालों में फैली बदइंतजामी को लेकर। इसलिए वे तथ्यों की परवाह नहीं करते। उन्हें मालूम है कि राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है। वे जानते हैं कि गोरखपुर और मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत पर चीखने वाली मीडिया और लिबरल गैंग को नरगिस के मॉं-बाप की सिसकी सुनाई नहीं देगी। रेखा और कांता तो खैर हिंदू नाम हैं। उनके माँ-बाप का रूदन तो वैसे भी वामपंथियों, कॉन्ग्रेसियों और मीडिया गिरोह को सुनाई पड़ना नहीं है।

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फ़रहान अख्तर के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज: CAA के विरोध-प्रदर्शन के दौरान भारत का ग़लत नक़्शा किया था पोस्ट

फ़रहान अख्तर के ख़िलाफ़ भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट करने के लिए मामले में गोवा पुलिस के साइबर क्राइम विभाग में शिक़ायत दर्ज की गई है। यह घटना उस समय की है जब फ़रहान ने मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ नागरिकों से विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी। ग़लत नक़्शे में कश्मीर को भारत से बाहर रखा गया था। यह शिक़ायत गोवा क्रॉनिकल्स (Goa Chronicles) के संस्थापक और प्रधान संपादक सेवियो रोड्रिग्स (Savio Rodrigues) द्वारा दर्ज कराई गई है।

ख़बर के अनुसार, अपनी शिक़ायत में, रोड्रिग्स ने लिखा,

“जैसा कि हम सभी जानते हैं कि फ़रहान अख्तर CAA के बारे में कुछ नहीं जानते थे और सिर्फ़ लोगों को CAA के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए उकसा रहे थे, इस दौरान वो कई मीडिया चैनल्स और उनके कैमरों में कैप्चर हो गए थे। अधिक परेशान करने वाली बात यह है कि इस विरोध के लिए लोगों को आमंत्रित करते समय उन्होंने भारत के ग़लत नक़्शे वाले पोस्टर का इस्तेमाल किया। यहाँ इस बात का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि उनके द्वारा उपयोग किए गए मानचित्र का उपयोग अधिकतर कश्मीरी अलगाववादियों द्वारा किया जाता है जो कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते हैं।”

रोड्रिग्स ने फ़रहान अख्तर के इस अपराध को ग़ैर-ज़िम्मेदाराना करार देते हुए उनके ख़िलाफ़ तत्काल प्रभाव से कड़ी कार्रवाई करने की माँग की है। रोड्रिग्स ने पुलिस से मामले का संज्ञान लेने और क़ानून के अनुसार पर्याप्त कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। अपनी शिक़ायत में, उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि जावेद अख़्तर के बेटे फ़रहान ने भले ही इस मामले पर माफ़ी माँग ली हो, लेकिन उन्होंने अब तक अपने प्रोफ़ाइल से भारत के उस ग़लत नक़्शे को नहीं हटाया।

उन्होंने कहा, “इस बात को 14 दिन से अधिक का समय हो गया है और भारत का ग़लत नक़्शा अभी भी उनके (फ़रहान) ट्विटर हैंडल पर दिख रहा है। ऐसा होना न केवल ग़ैर-क़ानूनी है, बल्कि देश के ख़िलाफ़ एक गंभीर अपराध भी है।”

बता दें कि भारत का ग़लत नक़्शा पोस्ट करने वाले फ़रहान अख्तर पहले शख़्स नहीं हैं, उनके अलावा कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने भी ऐसा किया था, जब उन्होंने ‘भारत बचाओ रैली’ की एक तस्वीर अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर की थी, जिसमें भारत का ग़लत नक़्शा दिख रहा था। थरूर का यह पोस्ट उनकी टाइमलाइन पर सात घंटे तक बना रहा, लेकिन उसके बाद जब उन्हें ट्रोल किया गया तो उन्होंने अपना यह ट्वीट डिलीट कर दिया। लेकिन सोशल मीडिया के आज के युग में यूज़र्स की पैनी नज़र से कहाँ कुछ बच पाता है, बस उन्हें भी घेर लिया गया था।

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CAA पर कॉन्ग्रेस में फूट, मुस्लिमों को गुमराह करने का आरोप लगा 4 बड़े नेताओं ने दिया इस्तीफा

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) को लेकर कॉन्ग्रेस के भीतर का मतभेद भी सामने आने लगा है। पार्टी स्टैंड के विरोध में गोवा के चार नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। इन्होंने पार्टी पर अल्पसंख्यकों खासकर, समुदाय विशेष को बरगलाने का आरोप लगाया है।

इस्तीफा देने वाले नेताओं में पणजी कॉन्ग्रेस ब्लॉक समिति के अध्यक्ष प्रसाद अमोनकर, उत्तर गोवा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ प्रमुख जावेद शेख, ब्लॉक समिति सचिव दिनेश कुबल और नेता शिवराज तारकर शामिल हैं। पार्टी से इस्तीफा देने के बाद इन्होंने कहा कि वे सीएए का समर्थन करते हैं।

पत्रकारों से बात करते हुए अमोनकर ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी नागरिकता कानून पर जनता को, खासकर समुदाय विशेष को बरगलाने का काम कर रही हैं। वे सीएए और एनआरसी पर पार्टी के गलत रुख का विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष में होने का मतलब यह नहीं होता कि सरकार के हर काम का विरोध किया जाना चाहिए। नागरिकता संशोधन कानून का स्वागत किया जाना चाहिए।

अमोनकर के अनुसार कॉन्ग्रेस को लोगों को बरगलाना और राजनैतिक फायदा पाने के लिए अल्पसंख्यकों के मन में डर भरने का काम बंद कर देना चाहिए।

कॉन्ग्रेस नेता ने बताया कि पिछले हफ्ते नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ गोवा में आयोजित कार्यक्रम का वे सभी हिस्सा थे। लेकिन, वहाँ उन्होंने नेताओं के भाषण सुनकर महसूस किया कि वे अल्पसंख्यकों के दिमाग में डर भरना चाहते हैं। यह सरासर गलत है।

उनके अनुसार, गोवा एक शांतिपूर्ण राज्य है और कॉन्ग्रेस यहाँ अल्पसंख्यकों को भड़काने का प्रयास कर रही है। सरकार ने नागरिकता कानून को संवैधानिक प्रक्रिया के बाद पास किया है और वे केवल उन शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रयास कर रही है, जिनका सदियों से भारतीय संस्कृति से संबंध रहा है।

अमोनकर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सीएए में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात है। बावजूद इसके, इन देशों के बहुसंख्यक आबादी भी भारतीय नागरिकता के लिए अप्लाई कर सकती है। इसके लिए काफी लंबे समय से प्रावधान है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस अलग-अलग राज्यों में अपनी राजनीति साधने के लिए मोदी सरकार द्वारा लाए नए कानून को असंवैधानिक करार दे रही हैं। साथ ही विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होकर इसके प्रति जनता तो भड़काने का काम कर रही है। दिल्ली सहित कई जगहों पर हिंसा में उसके नेता नामजद भी हुए हैं।

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ‘वामपंथी’ वीसी हांगलू ने दिया इस्तीफा: यौन शोषण, भ्रष्टाचार के थे गंभीर आरोप

पिछले चार सालों से विवादों में घिरा रहा इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय को कई विवादों से तब मुक्ति मिली जब यौन शोषण, अश्लील चैट, नियुक्तियों में धाँधली से लेकर वित्तीय अनियमितता जैसे कई आरोपों से घिरे कुलपति प्रोफेसर रतन लाल हांगलू ने अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। वामपंथी विचारधारा के पोषक प्रोफेसर रतन लाल हांगलू ने 30 दिसंबर 2015 को इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का कार्यभार ग्रहण किया था और सबसे ज्यादा विवादित वीसी के रूप विख्यात हो चुके हांगलू ने 30 दिसंबर 2019 को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया। उनके साथ ही चार अन्य विश्विद्यालय के अधिकारियों ने अपना इस्तीफ़ा भी सौंप दिया। और आज इस पूरे प्रकरण से कहीं न कहीं ताल्लुक रखने वाले और कुलपति द्वारा नियुक्त हॉस्टल के वार्डनों ने भी अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया। कुलपति के इस्तीफे को रमेश पोखरियाल निशंक ने मंजूर करते हुए राष्ट्रपति के पास फाइल भेज दी है।

कुलपति के अलावा इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के जिन चार अन्य अधिकारियों ने इस्तीफ़ा सौंपा उनमें रजिस्ट्रार प्रोफेसर एनके शुक्ला, चीफ प्रॉक्टर प्रोफेसर रामसेवक दुबे, जनसंपर्क अधिकारी डॉक्टर चितरंजन कुमार और वित्त अधिकारी डॉ सुनील कांत मिश्रा शामिल हैं। इन चारों अधिकारियों ने अपना इस्तीफा कुलपति प्रोफेसर रतन लाल हांगलू को भेजा था। इसके आलावा हॉस्टल के वार्डनों ने भी अपना इस्तीफ़ा कुलपति को भेज दिया है।

बता दें कि कथित रूप से घोर वामपंथी प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू का कुलपति के रूप में पूरा कार्यकाल विवादित और शिक्षण का माहौल ख़राब करने वाला रहा था। इस पूरे प्रकरण पर ऑपइंडिया ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों से बातचीत की। छात्रों ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा, “इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लिए आज ख़ुशी का दिन है l क्योंकि पिछले चार वर्षों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र कुलपति प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू के अदूरदर्शी कार्यशैली से प्रताड़ित थेl इनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने का मतलब निष्कासन और निलंबन होता थाl नियमों के विरुद्ध जा कर कार्य करना इनकी आदत थी l इनके खिलाफ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय में सैकड़ों शिकायत की गई थीl और पिछले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्री रहे प्रकाश जावडेकर जी ने इसपर कार्यवाही करने का तीन बार आश्वाशन भी दिया थाl पिछली शिकायतों को ध्यान में रखते हुए नए शिक्षा मंत्री श्री रमेश पोखरियाल निशंक जी ने पदभार ग्रहण करते ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जाँच होने तक शिक्षक भर्ती पर रोक लगा दिया थाl”

चार साल के कार्यकाल में कई आरोपों से घिरे रहे कुलपति हांगलू

कुलपति पिछले चार वर्षों के दौरान अलग-अलग वजहों से लगातार विवादों में बने रहे। जिसके कारण विश्वविद्यालय में लगातार कई आन्दोलन भी हुए।

हांगलू पर ये हैं मुख्य आरोप:

  • गैर-कानूनी नियुक्तियाँ करना जैसे ओएसडी और स्पोर्ट्स ट्रेनर, जबकि ये पद विश्वविद्यालय में है ही नहीं।
  • वित्तीय अनियमितताएँ जिनमें अपनी सुरक्षा पर 10 लाख का मासिक खर्च और वीसी के घर की मरम्मत के लिए 70 लाख खर्च करना।
  • शैक्षिक अनियमितताएँ जैसे यूनिवर्सिटी के अंडरग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट और रिसर्च प्रोगाम्स के लिए प्रवेश परीक्षा में अनियमितता।
  • कैंपस में खराब माहौल जैसे असुरक्षा की भावना। साथ ही छात्राओं का उत्पीड़न जैसे कई गंभीर मामले हैं।  

इसके अलावा हांगलू पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ का आरोप भी लगा था। उनके कई विवादित और अश्लील चैट भी ऑपइंडिया के पास हैं जिसमें वो उनके निजी अंगों पर कमेंट करते और उन्हें नौकरी का प्रलोभन देकर अनुचित लाभ उठाने की बात कह रहे हैं। इसके अलावा उन पर एक महिला मित्र के साथ उनके कथित अंतरंग बातचीत का ऑडियो वायरल होने के बाद भी उन पर कई अन्य आरोप लगे थे। जिससे उनकी मानसिकता और छात्राओं के उत्पीड़न की बात को और मजबूती मिलती है। इसके आलावा भी वहाँ के छात्र-छात्राओं ने उनपर कई अन्य आरोप भी लगाए। छात्रों ने बताया कि रतन लाल हांगलू के कार्यकाल में विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ लगभग 300 के आसपास मुक़दमे हो गए, और माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना के कारण कुलपति को इलाहबाद हाई कोर्ट ने फटकार भी लगाई थी l कश्मीर के सन्दर्भ में इनके विवादित बोल और सेना पर असभ्य टिप्पणी के कारण इनका छात्रों के एक धड़े ने पोस्टर जारी कर इनका विरोध तो जताया ही था, साथ ही साथ जिला न्यायालय प्रयागराज में एक मुकदमा भी दाखिल किया थाl

यौन उत्पीड़न पर महिला आयोग में भी हुई थी शिकायत

कुलपति और एक महिला के बीच अन्तरंग बातचीत का ऑडियों व्हाट्सअप पर वायरल होने के बाद एवं महिलाओं कथित यौन उत्पीड़न मामले की शिकायत राष्ट्रीय महिला आयोग से की गई थी। आयोग ने कुलपति हांगलू ऐसा न करने पर चेतावनी भी दी थी कि यदि वह नहीं पहुँचते हैं तो पुलिस के जरिए समन भेजकर उन्हें बुलवाया जाएगा। छात्रों ने बताया कि इस दौरान वह विदेश यात्रा पर होते हुए भी सीधे दिल्ली स्थित महिला आयोग के कार्यालय पहुँचे थे। जहाँ तीन घंटे तक वह आयोग के सवालों से घिरे रहे। इस दौरान विश्वविद्यालय की छात्राएँ भी कुलपति के बर्खास्तगी की माँग को लेकर आंदोलन करती रहीं थी।

कुलपति हांगलू का विवादों से है पुराना नाता

छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया कि इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार 30 दिसंबर 2015 को ग्रहण करने से पहले प्रो. रतन लाल हांगलू पश्चिम बंगाल के कल्याणी विश्वविद्यालय में कुलपति थे। वहाँ भी उन पर ऐसे ही महिला उत्पीड़न समेत कई संगीन आरोप लगे थे। छात्रों ने बताया कि वहाँ की एक महिला ने तो उनका इलाहाबाद तक पीछा किया था और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच उनकी काली करतूत की पोल खोल डाली थी। महिला ने सार्वजनिक मंच पर आरोप लगाया था कि रतन लाल हांगलू ने कल्याणी विश्वविद्यालय में कुलपति रहते हुए उनकी बेटी का उत्पीड़न किया था।

छात्रों का कहना है, “कुलपति के अदूरदर्शी और अराजक रवैए के खिलाफ ना सिर्फ छात्र आंदोलित थे बल्कि शिक्षक और कर्मचारी समूह भी कई कई बार आंदोलित हुए। और ऐसे आन्दोलनों में मुख्य भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों को कुलपति ने अन्य वामपंथी गिरोह की तरह ही अपने व्यक्तिगत अभिमान पर चोट समझ कर कार्यवाही करने से कोई गुरेज नहीं किया था। इनके इन्हीं कारगुजारियों पर संज्ञान लेने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अलग-अलग जाँच समिति भेज कर स्थिति का पुनरावलोकन किया और जाँच में कुलपति के कार्य शैली से असंतुष्ट हुआl”

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा भेजी गई जाँच कमिटी के चेयरमेन प्रोफ़ेसर देसी राजू थे, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के लगातार गिरते हुए हालातों की ओर इशारा करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय में अगर यही परिस्थितियाँ रही तो एक दिन यह बर्बाद हो जाएगाl इसमें इस बात का भी जिक्र था कि विश्वविद्यालय में अभी हाल के दिनों में महिला सुरक्षा की वीभत्स स्थिति की शिकायत के बाद राष्ट्रिय महिला आयोग ने गंभीर टिप्पणियाँ की थी। और कुलपति प्रोफ़ेसर रतन लाल हांगलू से तीन घंटे तक जिरह किया और उनके जबाबों से असंतुष्ट रही।

छात्रों का कहना है कि हांगलू के चार वर्षों के कार्यकाल में विश्वविद्यालय NIRF की रैंकिंग में 200 के बाहर चला गया है। विश्वविद्यालय के इस दुर्गति से विश्वविद्यालय से जुड़े दुनियाँ भर के लोग आहत थे। छात्रों ने इस ओर विशेष रूप से ध्यान दिलाया कि वामपंथ का नेक्सस कितना तगड़ा है कि तमाम आरोपों और सबूतों के बाद भी एक वामपंथी दूसरे वामपंथी को बचाने की पूरी कोशिश करता है। छात्रों का कहना है कि तमाम आरोपों के बाद भी अभी कुछ दिनों पहले ही कुलपति हंगलू क्लीन चिट लेकर दिल्ली से प्रयागराज आए थे। लेकिन पिछले दो दिनों में कुछ ऐसा छात्रों के अथक प्रयास और सबूतों से कुछ ऐसा हुआ कि कुलपति महोदय की पोल पुनः खुल गई और भारी दबाव में उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया।

छात्रों ने बताया कि आज की इस इस जीत के सूत्रधार इलाहबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की एकता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी छात्रसभा और NSUI ने गंभीर वैचारिक मतभेदों को भुला कर एकजुटता के साथ संघर्ष किया। कुलपति के खिलाफ मामला इतना संगीन था और बहुसंख्यक छात्र एकजुट कि सभी छात्र संगठनों को एक साथ आना पड़ा सिवाय आजादी के फर्जी विमर्शों का नारा लगाने वाले वामपंथी गिरोह और उनके छात्र संगठन ही थे जो इस अभूतपूर्व आन्दोलन के लिए कभी खुल कर सामने नहीं आए।

यहाँ आप एक पैटर्न देख सकते हैं कथित रूप से महिला अधिकारों के झंडाबरदार ही अक्सर महिलाओं के उत्पीड़न में आरोपित पाए जाते हैं और इलाहाबाद मामले में भी आरोपित कथित वामपंथी हांगलू थे तो भला वामपंथी छात्र संगठन कैसे वामपंथ के अतियों और जहर के खिलाफ आवाज उठाए। विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा कि चार साल की इस लड़ाई के बाद मिली जीत ने वामपंथ की जड़ों और उनके झूठे आदर्शों पर कुठाराघात किया है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए छात्रों ने बताया कि भाजपा सरकार के इस महत्वपूर्ण कदम के बाद एक बार फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आम छात्रों के साथ-साथ राष्ट्रवादी छात्रों में सरकार के प्रति भरोसा बढ़ेगा। हालाँकि, इस बात से कोई इंकार नहीं है कि समाजवादी छात्र सभा और NSUI के छात्रों ने भी इस आन्दोलन में अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन इस आन्दोलन को राष्ट्रवादी छात्रों ने ही शुरू किया था। और धीरे-धीरे छात्रों का आंदोलन बन जाने के कारण यह आन्दोलन सब का हो गया और सभी छात्र संगठनों (वामपंथियों को छोड़कर) ने अपनी बराबर की भूमिका निभाई। यह इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्रों की सबसे बड़ी जीत हैl छात्रों ने बताया कि कुलपति हांगलू के इस्तीफे पर मुहर देश के उन महत्वाकांक्षी कुलपतियों को भी एक सीख है जो खुद को बहुत ताकतवर समझते हैं और अपने वामपंथी गिरोह के बल पर हर तरह के गलत काम करने के बावजूद भी साफ़ बच निकलने की उम्मीद पाले रहते हैं।

साथ ही छात्रों का यह भी कहना है आने वाले दिनों में भाजपा की सरकार को यह सोचना चाहिए कि किस तरह से वामपंथी गिरोह विश्विद्यालयों में अपनी जड़ें इतनी गहराई तक जमा चुके हैं कि आज कई विश्वविद्यालय देश विरोधी गतिविधियों के अड्डे बन चुके हैं। जाधवपुर और JNU विशेष रूप से और वहाँ के पढ़े हुए लोग और प्रोफ़ेसर जहाँ भी किसी भी रूप में जाएँ उस परिसर का माहौल ख़राब करने और देश विरोधी एजेंडा चलाने से पीछे नहीं हटते। सरकार को चाहिए कि विश्वविद्यालय को राजनीति या देशविरोधी गतिविधियों का अड्डा न बनने दें।

चलते-चलते आपको BHU में हाल ही में हुए आंदोलन की याद भी दिला दूँ जहाँ वामपंथी गिरोह की वजह से ही संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय का मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम और महज संस्कृत भाषा का मुद्दा बन गया था। वहाँ भी इस पूरे विवाद की जड़ में कुलपति राकेश भटनागर थे जो JNU के प्रोफ़ेसर थे। हिन्दू धर्म और मालवीय जी के आदर्शों से उनका नाता इतना छिछला है कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति मालवीय भवन में जाने से भी कतराते हैं। वहाँ भी वामपंथी छात्र संगठन कथित रूप से वामपंथी कुलपति के समर्थन में और फिरोज खान के ‘धर्म विज्ञान’ पढ़ाने के समर्थन थे और जो लड़ रहे थे वो सनातन धर्म को जीने वाले छात्र थे। अंततः देश ने उनके मुद्दे को समझा और उन्हें जीत मिली। इलाहाबाद में भी मीडिया गिरोह और वामपंथी धड़े ने छात्रों का साथ नहीं दिया। फिर भी छात्र सालों लड़े और आज वामपंथी और देशविरोधी विचारधारा के पोषक कुलपति के इस्तीफे के साथ प्रयागराज के इलाहाबाद विश्वविद्यालय को उनसे मुक्ति मिली। अब आने वाले समय में छात्रों को उम्मीद है कि जो भी विश्वविद्यालय की बागडोर थामने आएगा वह ज़रूर न सिर्फ विश्वविद्यालय को बल्कि छात्रों को विज़न देकर राष्ट्रहित में अपना योगदान देने के लिए आगे ले जाएगा।

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102 बच्चों की मौत के बाद भी नहीं जागी कॉन्ग्रेस सरकार: कोटा के अस्पताल की ख़िड़कियाँ टूटी, हीटर गायब

राजस्थान के कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत ने सबको झकझोर दिया है। लेकिन इससे प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। कोटा में केवल जेके लोन अस्पताल ही नहीं, बल्कि जिले के कई अन्य सरकारी अस्पतालों (सीएचसी व पीएचसी) की हालत भी बेहद जर्जर हैं। इनमें प्रसूतियों एवं शिशुओं के इलाज के लिए न पर्याप्त बेड हैं और न ही उपकरण।

इतना ही नहीं इन अस्पतालों में मरीजों को मिलनी वाली अन्य व्यवस्थाएँ भी माकूल नहीं हैं। इसके कारण भारी संख्या में प्रसूताओं को जेके लोन अस्पताल की ओर रुख करना पड़ता है। इस अस्पताल में दिसंबर से लेकर अब तक 102 बच्चों की मौत हो चुकी है। फिर भी अव्यवस्थाएँ सुधरने का नाम नहीं ले रही है। बीते दिनों NCPCR की टीम ने यहाँ निरीक्षण करने के बाद बताया था कि मेडिकल कॉलेज के परिसर में सुअर घूमते पाए गए और ख़िड़कियाँ-दरवाजे भी टूटे मिले। अब खबर आई है कि ठंड से ठिठुरते मरीजों के लिए पिछले सप्ताह 27 हीटर का इंतजाम किया गया था, वे गायब हैं।

राजस्थान पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, मेडिकल कॉलेज के नए अस्पताल में जरूरत के मुताबिक संसाधनों और सेवाओं की बड़ी कमी है। एक नए अस्पताल के गायनिक वार्ड में जहाँ 100 बेड की आवश्यकता है, वहाँ केवल 65 बेड हैं। जिसके कारण कई माँओं को अपने बच्चों के साथ कड़ाके की सर्दी में नीचे ही लेटना पड़ता है। कहा जा रहा है शेष 35 बेडों का अलग से वॉर्ड बनना है। इसके लिए पीडब्ल्यूडी विभाग को प्रस्ताव दिया गया था। जिन्होंने वॉर्ड तो तैयार कर दिया, लेकिन वहाँ दरवाजे नहीं लगाए गए। इसके अलावा शहर के भीमगंजमंडी व सुल्तानपुर सीएचसी में शिशु रोग विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। इसके कारण इलाकों में रह रहे लोगों को जेके लोन अस्पताल की ओर जाना पड़ता है।

राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण में प्रकाशित खबर

सीएमएचओ डॉ. बीएस तंवर इस बात को मानते हैं कि जिले के अस्पतालों में बच्चों के लिए अलग से बेड नहीं हैं। इसके कारण जच्चा-बच्चा का उपचार सामान्य बेड पर होता है। नए अस्पताल के अधीक्षक डॉ. सीएस सुशील का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर के ऊपर नया गायनिक वार्ड तैयार हो रहा है। लेकिन उसके भी छत और दरवाजों का काम बाकी है।

वहीं, जेके लोन अस्पताल में टूटी ख़िड़कियों, सीलन व अन्य अव्यवस्थाओं के कारण सर्दी में होती बच्चों की मौत पर हाड़ौती विकास मोर्चा के संभागीय अध्यक्ष राजेन्द्र सांखला ने स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल का ध्यान आकर्षित करवाया था। इसके बाद उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी कि अब गैरजिम्मेदारी नहीं चलेगी। उन्होंने अधीक्षक को फोन पर व्यवस्थाएँ सुधारने के निर्देश दिए। साथ ही आदेश दिया कि यदि अस्पतालों में कमी है तो उसका प्रस्ताव दें। धारीवाल ने कल ये भी कहा था कि संसाधनों के अभाव में किसी को मौत नहीं चाहिए। लेकिन आज सुबह ही जेके लोन अस्पताल में कुछ अन्य बच्चों की मौत की खबर ने फिर लोगों को सहमा दिया।

सर्दी से मरीजों को बचाने के लिए पिछले हफ्ते वार्ड इंचार्ज ने अपने-अपने वार्डों में हीटर लगाने की डिमांड नर्सिंग अधीक्षक कार्यालय को दी थी। इसके बाद 27 नए हीटरों की खरीददारी हुई। लेकिन ये 27 हीटर जो डिमांड पर मँगाए गए थे। वो कहाँ लगे, ये किसी को पता ही नहीं चला। मरीज अब भी ठिठुर रहे हैं। ख़िड़कियों से ठंडी हवा आती रहती है। वार्डों की दीवारों में भी सीलन हैं। जिसकी वजह से ठंडी हवाओं से वार्ड और भी ठंडे हो जाते हैं। इससे मरीजों व उनके तीमारदारों की हालत सर्दी से खराब होती है।

इतने गंभीर मामले पर अस्पताल के तीन अलग-अलग अधिकारी अलग-अलग बयान देते नजर आते हैं। नर्सिंग अधीक्षक रामरतन मीणा के अनुसार अस्पताल में नए हीटर आए थे, लेकिन कहाँ गए यह उन्हें नहीं पता है। शिशु विभाग के एचओडी डॉ अमृत लाल बैरवा का कहना है कि नए हीटर के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। वहीं, जेके लोन अस्पताल के अधीक्षक डॉ. एससी दुलारा का कहना है कि नए हीटर खरीदे गए हैं। लेकिन, ये कहॉं लगाए गए हैं इसकी जानकारी उनके पास नहीं है।

गौरतलब है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी कॉन्ग्रेस नेता असंवेदनशील बयान देकर राज्य सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर, भाजपा लगातार सरकार का ध्यान इस तरफ आकर्षित करने के प्रयास में है। लोकसभा अध्यक्ष और कोटा के सांसद ओम बिरला ने एक बार फिर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ध्यान बच्चों की मौत की ओर आकर्षित करवाया है। उन्होंने ट्वीट कर बताया है, “राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पुनः स्मरण पत्र भेजकर संसदीय क्षेत्र कोटा के जेके लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय में शिशुओं की असमय मृत्यु की प्रतिदिन बढती संख्या को देखते हुए संवेदनशीलता के साथ चिकित्सा सुविधाओं के मजबूत बनाने का आग्रह किया है।”

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बिग BC के इक़बाल अहमद, पत्रकार की तरह लिखो, मजहबी मत बनो, चीजें बेहतर दिखेंगी

नागरिकता संशोधन बिल संसद के दोनों सदनों में पास होता है। फिर यह नागरिकता संशोधन कानून बनता है। कानून के खिलाफ कुछ लोग, कुछ नेता (जो संसद में विरोध नहीं कर पाए, सड़कों पर कर रहे हैं) सड़कों पर उतरते हैं, विरोध के नाम पर दंगा करते हैं। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में आगजनी की जाती है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है। बवाल इतना बढ़ जाता है कि पुलिस को यूनिवर्सिटी में घुसना पड़ता है, दंगाई हो चुके छात्रों पर लाठियाँ बरसाई जाती हैं।

जामिया मिलिया इस्लामिया चूँकि छात्रों की जगह है, इसलिए उन पर पड़ी लाठियों से देश के बाकी विश्वविद्यालयों के छात्र (सभी नहीं, सिर्फ वामपंथी और एंटी-BJP) खुद को जोड़ कर देखने लगे। उनके अंदर भी CAA विरोध के नाम पर मोदी-विरोध, हिंदू-विरोध का स्वर उबाल मारने लगा। इसी उबाल में IIT कानपुर के कुछ गिने-चुने छात्रों ने 17 दिसंबर को एक प्रदर्शन का आयोजन किया। आयोजन में फैज अहमद फैज की एक कविता (लाज़िम है कि हम भी देखेंगे… सब बुत उठवाए जाएँगे… सब तख़्त गिराए जाएँगे… बस नाम रहेगा अल्लाह का) गाई गई।

पत्रकारिता का स्वघोषित बड़ा नाम लेकिन काम कौड़ी भर का

जब यह कविता गाई जा रही थी, उसी समय कुछ छात्रों ने इसे लेकर विरोध किया। बाद में इसको लेकर IIT प्रशासन को लिखित में शिकायत भी दी गई। इसी संबंध में की गई शिकायतों की जाँच के लिए प्रशासन ने 6 सदस्यी कमिटी का गठन किया। चूँकि फैज वामपंथियों के पसंदीदा नंबर 1 हैं, इसलिए मीडिया गिरोह ने IIT कानपुर की कमिटी वाली खबर को तड़का-मसाले के साथ चलाया। सबकी हेडिंग-रिपोर्टिंग देखकर आप चौंक जाएँगे। चौंक जाएँगे क्योंकि सबने बिना जाने फर्जी खबरें, फर्जी हेडिंग से चलाई।

इकॉनमिक्स टाइम्स ने तो टाइटल में ही झोल कर दिया – मतलब पूरी गलत रिपोर्टिंग!

सच क्या है?

IIT कानपुर में फैज अहमद फैज के नज्म का पाठ किया गया – सच यह है। सच यह है कि आईआईटी ने एक जाँच कमिटी का गठन किया है। लेकिन यह सच नहीं है कि कमिटी ‘फैज की नज्म हिंदू विरोधी है या नहीं’, की जाँच करेगी। क्यों यह सच नहीं है? क्योंकि जो इस कमिटी के अध्यक्ष हैं, वो खुद मीडिया गिरोह द्वारा चलाए जा रहे झूठ का पर्दाफाश कर रहे हैं। नाम है – मनीन्द्र अग्रवाल। प्रोफेसर हैं, डेप्यूटी डायरेक्टर हैं, वहीं IIT कानपुर में ही।

मनीन्द्र अग्रवाल ने 16 दिसंबर मतलब कैंपस में कुछ छात्रों के द्वारा विरोध-प्रदर्शन के ठीक एक दिन पहले भी ट्वीट किया था। ट्वीट में कैंपस के अंदर पब्लिक प्रोटेस्ट को लेकर उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की थी। इसके बाद जब फैज की नज्म का पाठ किया जाता है, उसके खिलाफ शिकायत की जाती है और कमिटी का गठन होता है, तब जो रिपोर्टिंग मीडिया गिरोह द्वारा की जाती है, उस पर मनीन्द्र सिर्फ हँसते हैं, व्यंग्य के तौर पर जवाब देते हैं।

फैज, मुस्लिम और मीडिया

इंडिया टुडे ने सब-टाइटल में खेल किया और जाँच कमिटी को फैज के नज्म के हिंदू विरोधी होने या न होने तक सीमित कर दिया

समुदाय विशेष नाम वाले कवि, पत्रकार, लेखक आदि सब अपना मजहब दिखाने में जुटे हुए हैं। इसी शृंखला में BBC, या बिग BC के इकबाल अहमद ने बिना IIT कानपुर की जाँच के आदेश को पढ़े अपनी हिन्दू घृणा उड़ेल दी है। जबकि जाँच उस आयोजन (मतलब बिना परमिशन के विरोध क्यों और आयोजन के पहले या बाद में सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डाली गई या नहीं?) को लेकर बैठी है। जबकि इकबाल अहमद लिखता है कि कमिटी को तय करना है कि ‘उनकी कविता कहीं हिंदू विरोधी तो नहीं।’ इस तरह की हिन्दू घृणा अजेंडाबाज़ पत्रकारों में सामान्य हो गई है।

बॉलिवुड के लेखक और स्वघोषित क्रांतिकारी हैं जावेद अख्तर। सांसद भी रह चुके हैं। लेकिन सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है इन्हें। होती तो प्रतिक्रिया देने से पहले IIT में फोन घुमाकर कमिटी की हकीकत जानने की कोशिश करते। लेकिन नहीं। आखिर हैं तो उसी मीडिया गिरोह के ये भी। और मजहबी तो खैर हैं ही। मजहबी तो फैज अहमद फैज भी थे। क्यों? क्योंकि जैसा उन्हें प्रचारित किया जाता है, अगर वो वामपंथी होते तो अपने नज्म में अल्लाह जैसे शब्द की जगह प्रकृति या इसके समान उर्दू शब्द का प्रयोग करते। यही कारण है कि मजहबी फैज के लिए मजहबी जावेद अख्तर डिफेंस में आते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि फैज तो ‘एंटि-पाकिस्तान’ थे और ‘जिया-उल-हक के खिलाफ’ थे।

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‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में हिंदू व देश विरोधी-प्रदर्शन

हिंदुओं का नरसंहार करने वाले इस्लामी अक्रांता सागरिका घोष को लगते हैं देशभक्त और आजादी के परिंदे

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिन्दू-विरोधी कट्टरता साफ़ तौर पर दिखी। बावजूद इसके लिबरल गैंग इनकी पर्दादारी कर अपने राजनीतिक एजेंडे को बढ़ाने में लगा है। लिबरल गैंग की एक सदस्य हैं सागरिका घोष। मुख्यधारा की मीडिया की कुख्याता प्रोपेंगेंडाबाज सागरिका ने एक बार फिर इस्लामपरस्त और सीएए विरोधी अपने एजेंडे का प्रदर्शन किया है।

हाल ही में सागरिका घोष ने एक ट्वीट कर जिहादियों का जमकर महिमामंडन किया। जिन जिहादियों का उन्होंने महिमामंडन किया है उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ ऐसे-ऐसे अत्याचार किए हैं जिन्हें शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है। सागरिका के अनुसार, सिराजुद्दौला, टीपू सुल्तान और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे लोग “महान देशभक्त शासक” थे।

लिबरल्स के तर्क केवल और केवल उनके पाखंड की निशानी से अधिक और कुछ नहीं होते। एक तरफ़ तो यह तर्क दिया जाता है कि भारत 1947 से पहले अस्तित्व में नहीं था, जबकि दूसरी तरफ़, इस्लामिक आक्रांताओं का “महान देशभक्त शासक” के रूप में महिमामंडन किया जाता है। स्पष्ट तौर पर, लिबरल गैंग को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे जो कह रहे हैं वह सच है या झूठ। उन्हें केवल अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना होना है। वे केवल इसी की परवाह करते हैं। इसके लिए उन्हें इस्लामी निरंकुश शासकों का महिमामंडन करने की ज़रूरत पड़ती रहती है।

टीपू सुल्तान एक उन्मादी नरसंहारक था। उसने न सिर्फ़ हिन्दुओं पर अत्याचार किया बल्कि उनका नरसंहार करने पर वह गर्व भी करता था। इससे उसका जिहादी चरित्र जाहिर होता है। दूसरी तरफ़,
सिराजुद्दौला ने देशभक्ति की भावनाओं की कोई परवाह नहीं की। अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए वह ऐसे लोगों को कुचलता रहा। उसके दौर में बंगाल में इस्लामी शासन द्वारा हिन्दुओं के ख़िलाफ़ क्रूरता की गई। यही वजह थी कि उस समय अधिकांश हिन्दुओं ने इस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन का स्वागत किया था।
सिराजुद्दौला बंगाल का अंतिम स्वतंत्र नवाब था।

बहादुर शाह ज़फ़र की कहानी बेहद जटिल है। 1857 के युद्ध को ‘स्वतंत्रता के पहले युद्ध’ के रूप में स्थापित किया गया। निश्चित रूप से यह ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता की कहानी’ नहीं है, जैसा कि अब तक बताया जाता रहा है। यह एक रणनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए था, जिसके तहत अस्थायी रूप से एक-दूसरे के साथ सहयोग करने वाले समूह थे।

सागरिका घोष का इतिहास ज्ञान लिबरल संस्करण की विशिष्टता है। इसके अनुसार हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की खाई के लिए अंग्रेज जिम्मेदार थे। जबकि सच्चाई यह है कि पिछले हज़ार वर्षों में ऐसा कोई समय नहीं रहा जब हिन्दू-मुस्लिम संबंध अच्छे रहे हों। फिर भी हिन्दुओं और दूसरे माहजब के बीच विभाजन के लिए अंग्रेजों को दोषी ठहराने का प्रयास किया जाता है ताकि नेहरू के सेक्युलर-लिबरल दृष्टि को उचित ठहराया जा सके।

सागरिका घोष ने अपने ट्वीट में इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया है कि नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध का वर्तमान उन्माद पूरी तरह से इस्लामी चरमपंथियों द्वारा संचालित है। इन विरोध-प्रदर्शनों में “हिन्दुओं से आज़ादी” और “काफ़िरों से आज़ादी” जैसे नारे सुनाई पड़े। साफ़ तौर से प्रदर्शनकारी उसी विचारधारा का पालन करते हैं जिसका टीपू सुल्तान ने किया था।

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जिस LKS का कॉन्ग्रेस और उसके साथियों ने बहिष्कार किया, उसी की शान में राहुल गाँधी ने कसीदे पढ़े

एक संगठन है LKS। यानी लोक केरल सभा। केरल के प्रवासियों के इस संगठन का एक सम्मेलन हाल में संपन्न हुआ है। इस सम्मेलन का केरल के विपक्षी गठबंधन UDF ने बहिष्कार किया। इसमें कॉन्ग्रेस भी शामिल है। लेकिन कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने इसी संगठन की तारीफों के पुल बॉंध दिए। यह बात सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस और यूडीएफ के उसके साथियों की जमकर किरकिरी हो रही है।

केरल के वायनाड से सांसद राहुल गाँधी ने 12 दिसंबर को लिखे पत्र में LKS की सराहना की। इसे भारतीय प्रवासी से जुड़ने का एक “महान मंच” बताया। राहुल गाँधी ने पत्र में लिखा,

“मैं मलयाली प्रवासी सदस्यों को उनकी अभूतपूर्व सफलता और राज्य के योग्य राजदूतों को बधाई देता हूँ। लोक केरल सभा प्रवासी भारतीयों से जुड़ने और उनके योगदान को पहचानने का एक बेहतरीन मंच है।”

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से गुरुवार (2 जनवरी) को राहुल गाँधी का यह पत्र पोस्ट किया गया।

इसके बाद यूडीएफ को बेहद शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। राहुल गाँधी ने LKS की प्रशंसा ऐसे समय में की जब राज्य के विपक्षी दलों अन्य नेताओं ने उससे दूरी बना राखी थी। बीजेपी नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री, वी मुरलीधरन LKS के सम्मलेन के मुख्य अतिथि थे। लेकिन उन्होंने भी इसमें भाग नहीं लिया।

विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने जून 2019 में दो कारोबारियों की आत्महत्या के विरोध में LKS उपाध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। मृतकों में कन्नूर से साजन परील और पुनालुर से सुगाथन शामिल थे। दोनों को कथित तौर पर उनके महँगे निर्माणों के लिए सरकार की ओर से प्रशासनिक मंज़ूरी नहीं दी गई। विपक्ष ने तिरुवनंतपुरम में लोक केरल सभा द्वारा आर शंकर नारायणन थम्पी हॉल के पुनर्निर्मित करने के खर्च पर भी नाराज़गी जताई थी।

LKS का तीन दिवसीय बैठक शुक्रवार (27 दिसंबर) को सम्पन्न हुआ था। राहुल गाँधी का प्रशंसा-पत्र सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस नेता उनके बचाव में जुट गए हैं। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल का कहना है कि राहुल गाँधी के पत्र में कुछ भी राजनीतिक नहीं है। उन्होंने त्रिशुर में कहा, “UDF ने जब LKS का बहिष्कार करने का फैसला किया उससे पहले ही यह पत्र भेजा जा चुका था।”

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वे गायब हैं, मैं चिंतित हूँ: वायनाड में सांसद राहुल गाँधी को लेकर दर्ज कराई गई ‘मिसिंग कंप्लेंट’

राहुल गाँधी ने आँख मारी तो उनके विधायक जी ने भरी सभा में दे दी फ्लाइंग किस