Home Blog Page 531

न संजीवनी, न महिला सम्मान… अपने दस्तावेज न दें, हो सकता है फ्रॉड: केजरीवाल की स्कीम को दिल्ली सरकार के ही विभागों ने बताया फर्जी, AAP चला रही रजिस्ट्रेशन अभियान

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार विधानसभा चुनावों से पहले अपनी ‘महिला सम्मान योजना’ और ‘संजीवनी योजना’ को खूब प्रचारित कर रहे हैं। वहीं, AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल सहित AAP कार्यकर्ता इन योजनाओं के लिए घूम-घूम कर पंजीकरण करा रहे हैं। अब दिल्ली सरकार के दो विभागों- स्वास्थ्य तथा महिला एवं बाल विकास ने नोटिस जारी करके दोनों योजनाओं को फर्जी बताया है।

दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग ने एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया है। इस नोटिस में कहा गया है कि उसे मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से जानकारी मिली है कि ‘एक राजनीतिक दल’ ‘मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना’ के तहत दिल्ली की महिलाओं को 2100 रुपए प्रतिमाह देने का दावा कर रहा है। दिल्ली सरकार द्वारा ऐसी कोई योजना अधिसूचित नहीं की गई है।

नोटिस में आगे कहा गया है कि अगर ऐसी योजना आती है तो उसके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया जाएगा। विभाग ने इस योजना को भ्रामक बताया है और कहा है कि जो भी राजनीतिक दल इस योजना के नाम पर फॉर्म भरवा रहा है, यह धोखाधड़ी के सिवाय और कुछ नहीं है। इसलिए ऐसी धोखाधड़ी से बचें और अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा करने से बचें।

नोटिस में आगे लिखा है, “नागरिकों को सावधान किया जाता है कि इस योजना के नाम पर व्यक्तिगत विवरण जैसे कि बैंक खाता, वोटर आईडी, फोन नंबर आदि के लीक होने का खकतरा हो सकता है और इसका फायदा साइबर अपराधी उठा सकते हैं। दिल्ली के सामान्य नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे इस गैर-मौजूद योजना के झूठे वादों को ना मानें, क्योंकि ये भ्रामक हैं।”

वहीं, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने ‘संजीवनी योजना’ को भी धोखाधड़ी बताया है और जनता को सचेत रहने के लिए कहा है। केजरीवाल या आम आदमी पार्टी सरकार की इस कथित योजना में दिल्ली के सभी अस्पतालों में 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने का दावा किया गया है। अब विभाग ने साफ तौर पर कहा है कि इस तरह की कोई योजना ही मौजूद नहीं है।

विभाग का कहना है कि अवैध व्यक्तियों ने पंजीकरण अभियान चलाया है, जिसमें वरिष्ठ नागरिकों से आधार और बैंक खाता जानकारी सहित व्यक्तिगत जानकारी माँगी जा रही है। इसके साथ ही नकली स्वास्थ्य योजना कार्ड वितरित किए जा रहे हैं। दिल्ली स्वास्थ्य विभाग ने जनता को इस योजना पर विश्वास नहीं करने तथा व्यक्तिगत जानकारी साझा नहीं करने की सलाह दी है।

बता दें कि इससे एक दिन पहले ही भाजपा ने आम आदमी पार्टी की इन योजनाओं को लेकर AAP सरकार पर हमला बोला था। भाजपा ने कहा था कि ये योजनाएँ सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं हैं। दरअसल, AAP ने पहले इन दोनों योजनाओं के लिए अपने वॉलंटियर्स के माध्यम से पूरे दिल्ली में रजिस्ट्रेशन का काम शुरू किया है।

इन नोटिसों के बाद AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने राजनीति शुरू कर दी है। उन्होंने सोशल मीडिया साइट एक्स पर एक पोस्ट किया है। इसमें उन्होंने कहा, “महिला सम्मान योजना और संजीवनी योजना से ये लोग (BJP) बुरी तरह से बौखला गए हैं। अगले कुछ दिनों में फ़र्ज़ी केस बनाकर आतिशी जी को गिरफ्तार करने का इन्होंने प्लान बनाया है। उसके पहले “आप” के सीनियर नेताओं पर रेड की जाएँगी।”

महाकुंभ में लेंगे पीलीभीत एनकाउंटर का बदला: खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने वीडियो जारी कर दी धमकी, PM मोदी-CM योगी को कहे अपशब्द

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में हुए तीन आतंकियों के एनकाउंटर के बाद अब खालिस्तानियों ने धमकियाँ देना चालू कर दिया है। खालिस्तानी आतंकी और सिख्स फॉर जस्टिस के सरगना गुरपतवंत सिंह पन्नू ने धमकी दी है कि वह इस एनकाउंटर का बदला लेगा। उसने महाकुंभ के मौके पर यह बदला लेने की बात कही है।

पन्नू ने मंगलवार (24 दिसम्बर, 2024) को एक वीडियो जारी किया। 3 मिनट के इस वीडियो में उसने कहा है कि यह एनकाउंटर फर्जी था और मारे गए तीनों आतंकी असल में शहीद हैं। उसने परिवार को मदद देने का भी ऐलान किया है। उसने कहा है कि SFJ उन तीनों परिवारों को ₹5 लाख देगा।

उसने साथ ही में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को लेकर भी अपशब्द कहे। पन्नू ने कहा है पीलीभीत में ही 1991 में एक फर्जी एनकाउंटर हुआ था जिसमें 11 सिखों को मार दिया गया था। उसने कहा है कि हालिया एनकाउंटर का बदला वह प्रयागराज में होने वाले महाकुंभ में लेगा।

पन्नू ने कहा है कि 14 जनवरी, 29 जनवरी और 3 फरवरी, 2025 को प्रयागराज महाकुंभ में हमला किया जाएगा। उसने हिंदुत्व को आतंकवाद करार दिया है। उसने पंजाब की आजादी और खालिस्तान को लेकर भी अपना प्रलाप दोहराया है। पन्नू की धमकी को पीलीभीत पुलिस ने संज्ञान में लिया है।

पीलीभीत पुलिस ने साइबर थाने में इस संबंध में एक FIR दर्ज कर ली है। पुलिस ने बताया है कि वह इस वीडियो को लेकर जाँच कर रहे हैं। कई जगह दावा किया गया है कि पीलीभीत पुलिस को भी इस घटना के बाद धमकियाँ दी गई हैं।

गौरतलब है कि सोमवार (23 दिसम्बर, 2024) को पीलीभीत के पूरनपुर में उत्तर प्रदेश पुलिस और पंजाब पुलिस ने एक संयुक्त ऑपरेशन में तीन खालिस्तानी आतंकियों को मार गिराया था। यह तीनों पंजाब के गुरदासपुर में एक पुलिस चौकी पर हमला करके भागे थे और पीलीभीत में आकर छुप गए थे।

यह तीनों आतंकी आतंकी खालिस्तान जिंदाबाद फ़ोर्स नामक देश विरोधी संगठन से जुड़े हुए थे। इनके हैंडलर ग्रीस, पाकिस्तान और इंग्लैंड में बैठे हुए थे। तीनों के पास से काफी हथियार भी बरामद हुए थे। एनकाउंटर में मार गिराए जाने के बाद उनके शरीर को पंजाब भेज दिया गया है।

जिनको आयुर्वेद/वेदों का ज्ञान नहीं, च्यवनप्राश कैसे बनाएँगे? बाबा रामदेव की पतंजलि के खिलाफ डाबर पहुँचा हाई कोर्ट, सिब्बल बोले- आदतन अपराधी, विज्ञापन पर रोक लगे

मशहूर कंपनी डाबर ने पतंजलि आयुर्वेद के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक मामला दायर किया है। डाबर का आरोप है कि पतंजलि अपने च्यवनप्राश उत्पादों के खिलाफ निगेटिव ऐड्स यानी विज्ञापन (नकारात्मक प्रचार अभियान) चला रहा है। डाबर ने हाई कोर्ट से तुरंत आदेश देने की माँग की है ताकि पतंजलि को इस प्रकार के निगेटिव प्रचार विज्ञापनों को चलाने से रोका जा सके। दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस मिनी पुष्करना ने इस मामले में नोटिस जारी किया है और मामले की सुनवाई जनवरी के आखिरी सप्ताह में की जाएगी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जज ने पहले इस मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का विचार किया था, लेकिन डाबर के द्वारा तुरंत राहत की माँग करने पर उन्होंने इस मामले की सुनवाई का निर्णय लिया। डाबर को विशेष आपत्ति पतंजलि के उस विज्ञापन पर है जिसमें स्वामी रामदेव कहते हैं, “जिनको आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान नहीं, चारक, सुश्रुत, धन्वंतरि और च्यवनऋषि की परंपरा में ‘ऑरिजिनल’ च्यवनप्राश कैसे बना पाएँगे?” इस बयान से यह इशारा किया जा रहा है कि केवल पतंजलि का च्यवनप्राश ‘ऑरिजिनल’ है और बाजार में बाकी कंपनियों के च्यवनप्राश उत्पादों को आयुर्वेद की परंपरा का ज्ञान नहीं है, इस कारण वे नकली या साधारण हैं।

डाबर की ओर से वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने इस मामले में तर्क रखा और कहा कि पतंजलि आयुर्वेद लगातार ऐसा कर रहा है। उन्होंने इस साल पतंजलि के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला भी दिया, जिसमें पतंजलि पर अवमानना का मामला दर्ज किया गया था। सिब्बल का कहना है कि ‘साधारण’ कहकर पतंजलि ने च्यवनप्राश की पूरी श्रेणी को ही निचा दिखाया है, जो आयुर्वेदिक चिकित्सा का एक प्राचीन और मान्यता प्राप्त रूप है। उन्होंने कहा कि ड्रग्स और कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत सभी च्यवनप्राश को प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में दिए गए विशिष्ट सूत्रों और सामग्री का पालन करना अनिवार्य है, जिससे यह दावा कि कुछ च्यवनप्राश ‘साधारण’ हैं, गुमराह करने वाला और प्रतियोगियों के लिए हानिकारक है।

सिब्बल ने यह भी बताया कि पतंजलि ने इस विज्ञापन को विभिन्न टीवी चैनलों पर चलाया है, जिनमें कलर्स, स्टार, जी, सोनी और आज तक शामिल हैं। इसके अलावा, यह विज्ञापन दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण में भी प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अदालत को बताया कि इन विज्ञापनों को पिछले तीन दिनों में 900 बार दिखाया गया है, और ये विज्ञापन जनता के दिमाग पर असर डाल सकते हैं।

पतंजलि आयुर्वेद की ओर से वरिष्ठ वकील जयंत मेहता ने दायर की गई याचिका की वैधता पर सवाल उठाए और मामले का जवाब दाखिल करने के लिए समय माँगा। इस प्रकार यह मामला अब दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए है और देखना होगा कि अदालत किस पक्ष में फैसला सुनाती है।

जो ‘पादरी’ से बने सुप्रीम कोर्ट जज, जिन्होंने राम मंदिर पर फैसले को बताया ‘न्याय का मजाक’, उनको NHRC का अध्यक्ष बनवाना चाहती थी कॉन्ग्रेस: जस्टिस रामासुब्रमण्यन की नियुक्ति से हुई नाराज

कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर से एक ऐसे व्यक्ति की देश के महत्वपूर्ण पद के लिए वकालत की है, जिसने हाल ही में हिन्दुओं को लेकर आपत्तिजनक बातें कही थीं। इसी व्यक्ति ने राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत बताया था। यह व्यक्ति जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन हैं। रोहिंटन नरीमन सुप्रीम कोर्ट में जज रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने उनकी वकालत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के मुखिया तौर पर हाल ही में की। उनको नियुक्त ना किए जाने पर कॉन्ग्रेस ने एक डिसेंट नोट (असहमति पत्र) भी लिखा है। यह पत्र अब सामने आया है।

NHRC के मुखिया के तौर पर सोमवार (23 दिसम्बर, 2024) को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वी रामासुब्रमण्यन को नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति उस कमिटी की सिफारिश पर की गई है, जो NHRC के मुखिया और सदस्यों के नामों पर मुहर लगाती है।

इस कमिटी में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ ही संसद के दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष और राज्यसभा के उपसभापति भी होते हैं। इसी कमिटी की बैठक में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस मुखिया तथा राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने रोहिंटन नरीमन के नाम की वकालत की थी।

यह बैठक 18 दिसम्बर, 2024 को संसद भवन में हुई थी। इस बैठक में जस्टिस रोहिंटन नरीमन के नाम पर सहमति ना बनने के कारण राहुल गाँधी और खरगे ने एक असहमति का नोट लिखा। इस असहमति नोट में उन्होंने कहा है कि वह जस्टिस फली नरीमन को इसलिए NHRC का मुखिया बनाना चाहते थे क्योंकि वह अल्पसंख्यक पारसी समुदाय से आते हैं।

इसके अलावा उन्होंने नरीमन को बौद्धिक गहराई और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के लिए प्रसिद्ध बताया है। इन्हीं फली नरीमन ने हाल ही में जस्टिस AM अहमदी मेमोरियल लेक्चर में हिन्दुओं को लेकर काफी अशोभनीय बातें कही थी।

उन्होंने राम मंदिर को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट को कोसा था और मस्जिद ना बनाने पर दुख जाहिर किया था। रोहिंटन नरीमन ने कहा था कि 1984 में विश्व हिन्दू परिषद की राम मंदिर बनाने की माँग ‘तानाशाही’ और ‘अत्याचारी’ थी। उन्होंने कहा राम मंदिर के मामले में हिन्दू पक्ष को हमेशा कानून के खिलाफ रहने वाला भी करार दिया था।

रोहिंटन नरीमन ने इसी वक्तव्य में इस बात पर भी निराशा जताई थी कि बाबरी गिराने के एवज में उसी राम जन्मभूमि के सीने पर मस्जिद दुबारा क्यों नहीं खड़ी की गई। मस्जिद ना तामीर किए जाने को नरीमन ने ‘न्याय के साथ भद्दा मजाक‘ बताया था और कहा था कि यह एक भरपाई होती।

जिन रोहिंटन नरीमन ने देश की लगभग 100 करोड़ हिन्दू आबादी के लिए श्रद्धेय राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त करने वाले फैसले को गलत बताया, उन्हें मानवाधिकार आयोग का मुखिया बनाना चाहती थी। जिस मानवाधिकार आयोग का काम देश के सभी लोगों को सर उठा कर जिन्दगी जीने के अधिकार को सुरक्षित करना है, उसका मुखिया कॉन्ग्रेस उन रोहिंटन नरीमन को बनाना चाहती थी जो राम मंदिर मामले में हिन्दुओं को कानून के खिलाफ मानते हैं। विचारणीय बात यह है कि रोहिंटन नरीमन यदि इसके अध्यक्ष बनते तो उनके हिन्दुओं के प्रति क्या विचार रहते।

रोहिंटन नरीमन के पिता फली नरीमन ने भी हिन्दू संत योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने को लेकर भी अपनी खीझ दिखाई थी। उन्होंने यह तब किया था जब अपने बेटे रोहिंटन नरीमन को पारसी समुदाय का पादरी बनाया था।

फैज की बाइक पर हवाबाजी या किराए का झगड़ा… भोपाल में तलवारबाजी-पत्थरबाजी क्यों? सिख बोले- पगड़ी की बेअदबी की, मुस्लिम बोले- हमारा रास्ता बंद किया

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में साम्प्रदायिक तनाव की खबर है। यहाँ 2 दिन पहले बाइक चलाने को लेकर हुए विवाद में मंगलवार (24 दिसंबर 2024) को तलवारें लहराई गईं और जमकर पथराव किया गया। यह विवाद सिख और मुस्लिमों के बीच हुआ है। लगभग आधे दर्जन लोग घायल हुए हैं, जिनका इलाज चल रहा है। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला भोपाल के जहाँगीराबाद क्षेत्र के पुरानी गल्ला मंडी का है। दरअसल, यह मामला 22 दिसंबर 2024 की घटना से जुड़ा हुआ है। 22 दिसंबर यानी रविवार को मोहम्मद फैज़ नाम का एक युवक सिखों की बस्ती सरदारपुरा की संकरी गलियों से फर्राटे मारता हुआ बाइक ले जा रहा था। कुछ लोगों ने फैज़ को टोका तो वह बहस करने लगा।

आखिर में फैज ने सब्जी के एक ठेले से चाकू लेकर सरदार पर हमला कर दिया। इस मामले में पुलिस ने पाँच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। वहीं, तीन आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल में भी डाल दिया है। इनमें से एक मोहम्मद फैज भी है। फरार चल रहे दो अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी नहीं होने से सिख समाज में नाराजगी थी। सिख समाज ने पगड़ी की बेअदबी का आरोप लगाया था।

इसको लेकर मंगलवार (24 दिसंबर 2024) को सिखों ने माइकल नाम के एक मुस्लिम पर हमला कर दिया। जवाब में मुस्लिम पक्ष ने भी पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस दौरान कई लोग घायल हो गए। इनमें महिलाएँ भी शामिल हैं। सिख पक्ष का आरोप है कि उनके घरों के आगे से मुस्लिम समुदाय के लोग बेढंगे तौर पर वाहन चलाते हुए निकलते हैं। वहाँ गली में बच्चे खेल रहे होते हैं। उन्हें नुकसान हो सकता है।

ऑर्गेनाइजर की पत्रकार शुभी विश्वकर्मा के मुताबिक, जिस जहाँगीराबाद इलाके में हिंसा हुई है, वो मुस्लिम बहुल है। यहाँ की अधिकतर दुकानों के मालिक मुस्लिम समुदाय के लोग हैं। हिन्दू और सिख समुदाय के लोगों ने यहाँ किराए पर दुकानें ले रखी हैं। कुछ दिनों पहले मकान मालिकों और किरायेदारों में भाड़े को लेकर विवाद भी हुआ था। दोनों पक्षों में तनाव की एक बड़ी वजह यह भी बताई जा रही है।

दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष का कहना है कि सिख समुदाय के लोगों ने उनके आने-जाने वाले रास्ते को बंद कर दिया है। मुस्लिम पक्ष के मुताबिक, सिखों की हिंसक भीड़ ने कहा, “यहाँ किसी मुसलमान को नहीं रहने देंगे।” दोनों पक्षों से कुल 6 लोग घायल हुए हैं जिसमें महिलाएँ भी शामिल बताई जा रही हैं। इन सभी को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया है।

हिंसा की सूचना मिलते ही मौके पर भारी पुलिस फ़ोर्स पहुँचा। बल प्रयोग करके भीड़ को तितर-बितर किया गया। केस दर्ज करके हमलावरों को चिन्हित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। DCP प्रियंका शुक्ला के मुताबिक, तनाव को देखते हुए मौके पर पहले से फ़ोर्स तैनात थी। अतिरिक्त फ़ोर्स बुलाकर हिंसा को काबू किया गया। दोनों तरफ से शिकायतें दर्ज की जा रही हैं।

पुष्पा 2 का प्रीमियर, भगदड़ में महिला की मौत… कैसे-क्यों कॉन्ग्रेसी CM और फिल्म स्टार के बीच ‘टशन’ में बदली: अल्लू अर्जुन से फिर हुई पूछताछ, बॉडीगार्ड गिरफ्तार

हैदराबाद में पुलिस ने फिल्म स्टार अल्लू अर्जुन से एक बार फिर पूछताछ की। इस बार पूछताछ का केंद्र ‘पुष्पा 2’ के प्रीमियर के दौरान हुई भगदड़ थी, जिसमें एक महिला की मौत हो गई और उसका नौ साल का बेटा गंभीर रूप से घायल है। पुलिस ने अर्जुन के बॉडीगार्ड एंथनी को गिरफ्तार कर लिया है, जिन पर धक्का-मुक्की का आरोप है। वहीं, पुलिस स्टेशन में अल्लू अर्जुन से यह जानने की कोशिश की गई कि भगदड़ के दौरान क्या उन्होंने किसी सुरक्षा निर्देश की अनदेखी की थी।

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब 4 दिसंबर को ‘पुष्पा 2’ के प्रीमियर के दौरान भारी भीड़ जुटी। इस शो में अर्जुन खुद मौजूद थे। स्टार को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग थिएटर में उमड़ पड़े, लेकिन थिएटर में प्रवेश और निकास के लिए एक ही रास्ता होने के कारण हालात बिगड़ गए। भगदड़ के दौरान 35 वर्षीय महिला की जान चली गई और उसका बेटा गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है।

मुख्यमंत्री रेवन्त रेड्डी ने इस घटना को लेकर सीधे तौर पर अल्लू अर्जुन पर निशाना साधा। उन्होंने विधानसभा में दावा किया कि पुलिस ने अर्जुन को थिएटर न जाने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने इसकी अनदेखी की। रेड्डी ने कहा कि अर्जुन अपनी गाड़ी की सनरूफ से हाथ हिला (Waving) कर रहे थे, जिससे भीड़ बेकाबू हो गई। इस दौरान पुलिस को महिला का शव बरामद करना पड़ा।

अल्लू अर्जुन ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि उन्हें अगले दिन इस त्रासदी का पता चला। उन्होंने यह भी कहा कि वह किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहते, लेकिन इस मामले में उनका पक्ष नहीं सुना गया। उन्होंने पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये की सहायता दी, जबकि उनकी फिल्म के निर्माताओं ने 50 लाख रुपये दिए।

इस घटना के बाद राजनीति गरमा गई। कॉन्ग्रेस और मुख्यमंत्री रेवन्त रेड्डी ने इसे कानून के समक्ष सभी को समान मानने का उदाहरण बताया। मुख्यमंत्री के समर्थकों का कहना है कि अर्जुन जैसे बड़े स्टार को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता। वहीं, विपक्षी दल बीजेपी और बीआरएस ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस सरकार अर्जुन को बेवजह निशाना बना रही है।

बीजेपी नेता मनोज तिवारी ने अर्जुन का बचाव करते हुए कहा कि तेलंगाना सरकार उन्हें बलि का बकरा बना रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री पर फिल्म इंडस्ट्री के खिलाफ द्वेषपूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाया।

इस मामले ने तब और तूल पकड़ा जब ‘पुष्पा 2’ के एक सीन को लेकर कॉन्ग्रेस नेताओं ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इस सीन में दिखाया गया है कि अर्जुन का किरदार मुख्यमंत्री के शासन को पलट देता है। कॉन्ग्रेस नेताओं का दावा है कि यह सीन वर्तमान मुख्यमंत्री रेवन्त रेड्डी की छवि को खराब करने की कोशिश है।

इस बीच, अर्जुन के घर पर कुछ उपद्रवियों ने हमला किया, जिसमें उनके घर के बाहर रखे गमलों को नुकसान पहुँचाया गया और टमाटर फेंके गए। पुलिस ने इस मामले में छह लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें से चार लोग रेवन्त रेड्डी के विधानसभा क्षेत्र कोडंगल के बताए जा रहे हैं।

फिल्मी दुनिया और राजनीति के बीच यह तनातनी तेलुगु सिनेमा के लिए नई नहीं है, लेकिन अर्जुन का विवाद इतने बड़े स्तर पर पहली बार देखा जा रहा है। फिल्म इंडस्ट्री के अन्य स्टार्स ने अर्जुन से मुलाकात कर उनके प्रति समर्थन जताया, लेकिन इससे मुख्यमंत्री की नाराजगी और बढ़ गई।

अब तक अर्जुन को पुलिस ने चीकड़पल्ली थाने में पेश होने का नोटिस दिया। वो पूछताछ के लिए थाने भी पहुँचे, जहाँ से उनके बॉडीगार्ड को गिरफ्तार भी कर लिया गया। वहीं, अर्जुन ने बयान दिया है कि वह जाँच में पूरा सहयोग करेंगे।

बहरहाल, यह विवाद अब सिर्फ एक भगदड़ या फिल्म सीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह तेलंगाना की राजनीति और फिल्म इंडस्ट्री के रिश्तों की गहरी खाई को उजागर कर रहा है।

हाथ-पैर-गर्दन काट सबको जला दिया, पिताजी की हड्डियाँ तक नहीं मिली: संभल लौटे बनवारी लाल के पुत्र, बताया- घास-फूस पर आटा लपेट पुतला बनाया, फिर किया अंतिम संस्कार

संभल में 1978 में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की बर्बरता अब सामने आ रही है। इस दंगे में 180 से ज्यादा लोग मरे थे। दंगे में संभल के बड़े व्यापारी बनवारी लाल गोयल की भी हत्या की गई थी। उनके हाथ-पैर और गला काट कर जला दिया गया था। बनवारी लाल गोयल के बेटे विनीत गोयल अब वापस संभल लौटे हैं। उन्होंने बताया है कि किस तरह दंगाइयों के चलते वह अपने पिता की अस्थियाँ तक नहीं पा सके और उन्हें सांकेतिक रूप से उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा।

विनीत गोयल ने कैमरे पर उस दंगे की सच्चाई बताई है। गोयल ने बताया कि उनका संभल में तब बहुत बड़ा एक अहाता था, जिसमें व्यापार होता था। दंगाइयों ने ट्रैक्टर लगाकर उस अहाते का गेट तोड़ दिया था। गोयल ने बताया कि उनके रसोइये हरद्वारी लाल ने यह सब पूरा माजरा देखा था। वह एक ड्रम में छुपे हुए थे। यहीं पर उनके पिता बनवारी लाल भी बाकी लोगों के साथ छुपे हुए थे। यह सभी दंगों के चलते दूसरी मंजिल की कोठरी में थे। उन्होंने बताया कि दंगाइयों को जब यह बात पता लगी तो वह बनवारी लाल समेत सबको नीचे ले आए।

विनीत गोयल के अनुसार, हरद्वारी लाल ने देखा था कि बनवारी लाल के मुस्लिम दंगाइयों ने हाथ-पैर काट दिए। उनकी पूरी दुकान और अहाते में पेट्रोल और मिट्टी का तेल डाल दिया गया और आग लगा दी गई। यहाँ पर टायरों में आग लगाई गई और विनीत गोयल के पिता समेत बाकी लोगों को इसी आग में झोंक दिया गया। इसी आग में जलकर सारे लोग मारे गए। किसी के शरीर तक नहीं बचे थे।

विनीत गोयल ने बताया कि इस कारण से उनको अपने पिता की अस्थियाँ तक नहीं मिली थी। गोयल ने बताया कि अपने पिता के चश्मे के एक हिस्से के सहारे उन लोगों ने यह पता किया था कि उनकी मौत हो गई। दंगे के एक माह के बाद उन्होंने फूल-पत्तों पर आटा लपेटकर उनका सांकेतिक दाह संस्कार किया था। विनीत गोयल के साथ के लोगों ने बताया कि संभल में हालात हमेशा ही खराब रहे हैं। उन्होंने बताया कि पीस कमेटी की बैठक में अच्छी-अच्छी बातें कही जाती थीं जबकि बाहर आकर कुछ भी नहीं बदलता था।

विनीत गोयल ने जो कुछ कैमरे पर बताया, कुछ वैसी ही बात हाल ही में ऑपइंडिया को मिली एक इंटरनल रिपोर्ट में भी लिखी हुई थी। यह रिपोर्ट संभल में हुए दंगों पर प्रशासन ने तैयार की थी। रिपोर्ट के अनुसार, बनवारी लाल गोयल को मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ा और कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो।

इसके बावजूद भी उनकी मुस्लिम दंगाइयों ने एक ना सुनी और 24 लोगों समेत हत्या कर दी। विनीत गोयल के परिवार की मुश्किलें यहीं नहीं खत्म हुई। दंगे के बाद भी उन लोगों को न्याय नहीं मिल सका। इस दंगे का मामला 2010 में गवाह ना होने चलते बंद हो गया था। गवाहों पर किस तरह का दबाव रहा होगा इसे इस बात से समझा जा सकता है कि बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल के कारोबारी साझेदार रहे प्रदीप अग्रवाल के भाई की वसीम ने गोली मारकर हत्या कर दी।

उसने साथ ही धमकी दी कि यदि उसके खिलाफ किसी ने एफआईआर करवाई तो उसकी भी हत्या कर दी जाएगी। उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। दंगे में किसी को सजा ना हो इसके लिए बनवारी लाल के परिवार पर डॉक्टर शफीकुर रहमान बर्क की ओर से भी दबाव डाला गया था। बर्क संभल से समाजवादी पार्टी से सांसद रहे हैं। फिलहाल उनके पोते जियाउर्रहमान बर्क इस सीट से सपा के सांसद हैं। न्याय ना मिलने और लगातर प्रताड़ना के चलते 1993 में बनवारी लाल गोयल के परिवार ने संभल छोड़ दिया था और दिल्ली चले आए थे।

विनीत गोयल ने संभल लौट कर डीएम और एसपी से मुलाक़ात की है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिलने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा है कि अगर दंगे में मारे गए उनके पिता को न्याय मिल जाता है, तो यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बैंकों के कर्ज वसूलने के तरीकों पर हाई कोर्ट ने उठाए सवाल, कहा- डिफॉल्टरों का नाम-फोटो छाप उन्हें मजबूर नहीं कर सकते: निजता और सम्मान के अधिकार का बताया उल्लंघन

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बैंक डिफॉल्टरों (कर्ज न चुकाने वालों) की तस्वीरें और जानकारी सार्वजनिक कर उन्हें कर्ज चुकाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। जस्टिस मुरली पुरुषोत्तम ने इसे व्यक्ति के गरिमा और प्रतिष्ठा के अधिकार का उल्लंघन बताया।

लाइव लॉ के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा, “कर्ज चुकाने के लिए उधारकर्ताओं को उनकी प्रतिष्ठा और गोपनीयता को नुकसान पहुँचाने की धमकी देना गलत है। डिफॉल्टरों की तस्वीरें और जानकारी सार्वजनिक करना उनके गरिमा और सम्मान के अधिकार पर हमला है। किसी के जीवन और स्वतंत्रता को केवल कानूनी प्रक्रिया के तहत ही बाधित किया जा सकता है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कदम संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। साथ ही, यह किसी कानून या नियम में बताए गए कर्ज वसूली के तरीकों में शामिल नहीं है।

यह मामला चेम्पझंथी एग्रीकल्चरल इंप्रूवमेंट कोऑपरेटिव सोसाइटी की ओर से दायर याचिका का था। याचिका में असिस्टेंट रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें सोसाइटी के मुख्य कार्यालय के बाहर लगे फ्लेक्स बोर्ड को हटाने को कहा गया था। इस बोर्ड पर डिफॉल्टरों के नाम और तस्वीरें प्रदर्शित की गई थीं।

बैंक ने कोर्ट में अपनी सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने इन डिफॉल्टरों को कई बार कर्ज चुकाने की अपील की थी। जब इसका कोई असर नहीं हुआ, तो उन्होंने यह कदम उठाया। बैंक ने यह भी बताया कि तस्वीरें और जानकारी सार्वजनिक करने के बाद कई लोगों ने कर्ज चुका दिया। इस सफलता से प्रेरित होकर, वे बैंक परिसर में एक और ऐसा बोर्ड लगाने की योजना बना रहे थे।

बैंक ने अपनी दलील में 1969 के केरल कोऑपरेटिव सोसाइटीज रूल के रूल 81 का हवाला दिया। उन्होंने इसे ‘टोम-टॉम’ प्रक्रिया के समान बताया, जो अचल संपत्तियों की कुर्की और बिक्री के दौरान अपनाई जाती है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि टोम-टॉम की प्रक्रिया अब पुरानी और अप्रचलित हो चुकी है। हालांकि, कोर्ट ने इस प्रक्रिया की वैधता पर कोई फैसला नहीं सुनाया क्योंकि यह मामला याचिका में शामिल नहीं था।

सम्मान देकर बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा का जश्न मना रहा है ‘द इकॉनॉमिस्ट’, दिया ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड: पश्चिमी मीडिया की ‘नैतिकता’ की फिर खुली पोल

हर साल दिसंबर महीने में यूरोपीय मैगज़ीन द इकॉनॉमिस्ट अपने प्रतिष्ठित ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड की घोषणा करती है। यह पुरस्कार किसी देश की समृद्धि या खुशहाली को नहीं, बल्कि उस देश द्वारा किए गए महत्वपूर्ण सुधारों को आधार बनाकर दिया जाता है। ऐसा दावा खुद ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ही करता है।

इस साल बांग्लादेश को यह सम्मान मिला है। द इकॉनॉमिस्ट ने कहा कि बांग्लादेश ने कथित ‘तानाशाही शासन’ को समाप्त करके यह अवॉर्ड प्राप्त किया। हालाँकि, इस दौरान मैगज़ीन ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रही हिंसा और उत्पीड़न को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

द इकॉनॉमिस्ट के अनुसार, ये अवॉर्ड उन देशों को दिया जाता है जिन्होंने पिछले साल में महत्वपूर्ण प्रगति की हो। मैगज़ीन ने बताया कि बांग्लादेश ने शेख हसीना की सरकार को हटाकर ‘तकनीकी अंतरिम सरकार’ स्थापित की है, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं। इसके अलावा छात्र आंदोलनों की भी सराहना की गई, जिन्होंने शेख हसीना की सत्ता को समाप्त किया।

मैगज़ीन ने यह भी दावा किया कि शेख हसीना के हटने के बाद देश में ‘व्यवस्था बहाल’ हुई है और ‘आर्थिक स्थिरता’ आई है। लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ है? हाल ही में बांग्लादेश ने भारत से 50,000 टन चावल की माँग की है और अडानी ग्रुप के बिजली बिल का बड़ा हिस्सा बकाया है। इसके अलावा बांग्लादेश का टेक्सटाइल उद्योग भी गंभीर संकट से गुजर रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि द इकॉनॉमिस्ट किस आर्थिक स्थिरता की बात कर रहा है।

लेकिन सबसे चिंता का विषय यह है कि द इकॉनॉमिस्ट ने बांग्लादेश में बढ़ती हिंदू विरोधी हिंसा और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। शेख हसीना की सरकार के गिरने के महज तीन दिनों के भीतर हिंदू मंदिरों, व्यवसायों और घरों पर 205 से अधिक हमले हुए। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है और अगस्त 2024 से बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर विस्तार से रिपोर्ट दी है।

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे अत्याचारों का एक प्रमुख उदाहरण चिटगाँव में भगवान गणेश की मूर्तियों के साथ की गई तोड़फोड़ है। इसी तरह पबना और किशोरगंज जिलों में दुर्गा की मूर्तियों को नष्ट किया गया। ये घटनाएँ बांग्लादेश में धार्मिक असहिष्णुता के बढ़ते स्तर को दर्शाती हैं, लेकिन द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

अब सवाल यह उठता है, क्या कोई देश सच में ‘सुधार’ कर सकता है, जबकि उसके अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा और दमन बढ़ रहा हो? भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए आँकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या पिछले तीन सालों में तेजी से बढ़ी है। 2022 में हिंदुओं पर 47 हमले दर्ज हुए थे, 2023 में यह संख्या 302 हो गई, जो 2022 के मुकाबले 545% अधिक थी। वहीं, 2024 में यह संख्या 2,200 तक पहुँच गई, जो 2023 से 628% और 2022 के मुकाबले 4,580% अधिक थी। इन आँकड़ों के बावजूद द इकॉनॉमिस्ट ने इन घटनाओं पर चुप्पी साध रखी है, जिससे उनकी ‘प्रगति’ की परिभाषा पर गंभीर सवाल उठते हैं।

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की अनदेखी

हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को अनदेखा करना एक व्यापक समस्या का हिस्सा है, जो उपमहाद्वीप में हिंदू समुदाय के हाशिए पर जाने और उनके उत्पीड़न को दर्शाता है। हाल के महीनों में बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने हिंदुओं पर हमले तेज कर दिए हैं। इन समूहों ने हिंदुओं और उनके संगठनों को परेशान करने के लिए ईशनिंदा के आरोपों का सहारा लिया है। हृदय पाल और उस्ताद मंडल के मामले इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।

यहाँ तक कि इस्कॉन जैसे हिंदू संगठन भी इस अत्याचार से बच नहीं सके। इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश और हिंदू नेता चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की गिरफ्तारी, हिंदू संस्थानों को निशाना बनाने की सोची-समझी रणनीति को दर्शाती है। अंतरिम सरकार द्वारा हिंदू विरोध प्रदर्शनों को दबाने और उन पर देशद्रोह जैसे झूठे आरोप लगाने के फैसले से यह साफ होता है कि उनकी स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए एक साजिश चल रही है।

पश्चिमी देशों का सेलेक्टिव अप्रोच

पश्चिमी देशों की चयनात्मक नैतिकता इस समस्या को और बढ़ाती है। बढ़ते सबूतों के बावजूद वैश्विक संस्थाएँ और मीडिया हाउस इन अत्याचारों को नजरअंदाज कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने इन नफरत से भरे अपराधों को दस्तावेज़ करने से परहेज किया है। हमारी एक रिपोर्ट के अनुसार, OHCHR ने इन हमलों को धार्मिक घृणा अपराध मानने से इनकार कर दिया है, जो हिंसा को नजरअंदाज करने की सोची-समझी कोशिश को दर्शाता है। इसके बजाय, वे व्यापक सांप्रदायिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इन घटनाओं के धार्मिक पहलुओं को छिपा देते हैं।

भारतीय मीडिया पोर्टल द वायर ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को छिपाने या कमकर दिखाने का प्रयास किया है। हाल ही में एक खुलासे में यह पाया गया कि द वायर ने जातीय सफाए को ‘अतिरंजित’ या ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताने की कोशिश की है, जिससे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों की जिम्मेदारी को कम किया गया। ऐसी रिपोर्टिंग न केवल पाठकों को गुमराह करती है, बल्कि यह उन खतरनाक विचारों को बढ़ावा देती है, जो हिंदू अल्पसंख्यकों के दर्द और पीड़ा को कमतर आँकते हैं।

बीबीसी ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा की रिपोर्टिंग के लिए आलोचना का सामना किया है। ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे बीबीसी ने हिंदुओं के खिलाफ टारगेटेड हिंसा और हमलों को ‘राजनीतिक हिंसा’ के तौर पर पेश किया और धार्मिक मामले को नजरअंदाज किया। बीबीसी ने इसे व्यापक राजनीतिक अशांति से जोड़ते हुए इस बात को छिपा दिया कि यह हिंसा सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हो रही है। इससे न केवल हिंदुओं के खिलाफ हो रहे व्यवस्थित उत्पीड़न को अनदेखा किया गया, बल्कि अंतरिम सरकार और अपराधियों की जिम्मेदारी को भी कम कर दिया गया।

पश्चिमी मीडिया और संस्थाओं का यह दोहरा रवैया लंबे समय से जारी है। द इकॉनॉमिस्ट, द वायर और बीबीसी जैसे मीडिया पोर्टल्स ने लगातार हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की गंभीरता को कम करके दिखाया है। वे इन घटनाओं को अक्सर ‘राजनीतिक’ या ‘आर्थिक अशांति’ के रूप में पेश करते हैं और धार्मिक संदर्भों को नजरअंदाज करते हैं। इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल हिंदुओं के उत्पीड़न की गंभीरता को गलत तरीके से पेश करती है, बल्कि अपराधियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जिम्मेदारी से बचने का मौका भी देती है।

द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू-विरोधी पक्षपात पुराना

सालों से द इकॉनॉमिस्ट ने यह साबित किया है कि उसका हिंदुओं, हिंदुत्व और भारतीय सरकार खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ स्पष्ट झुकाव है। यह पक्षपात लगातार हिंदू राष्ट्रवाद को ‘चरमपंथी’ आंदोलन के रूप में पेश करने के प्रयासों में दिखता है, जबकि इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को अनदेखा किया गया है।

हमारे शोध के दौरान यह पाया गया कि द इकॉनॉमिस्ट की रिपोर्टिंग में एक बार-बार दोहराया जाने वाला विषय है, जिसमें हिंदुत्व को एक रूढ़िवादी और वर्चस्ववादी विचारधारा के रूप में दिखाया गया है। उदाहरण के लिए, अपने एक लेख ‘What is Hindutva, the ideology of India’s ruling party?’ में इस मैगजीन ने हिंदुत्व को अल्पसंख्यकों को हाशिए पर डालने वाले हथियार के तौर में पेश किया।

इसके साथ ही द इकॉनॉमिस्ट भारत की नीतियों और घटनाओं के संदर्भ को तोड़-मरोड़कर पेश करने या पूरी तरह अनदेखा करने का प्रयास करता है। उदाहरण के तौर पर, उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की आलोचना करते हुए इसे भेदभावपूर्ण कानून बताया, जबकि इसके मूल उद्देश्य को नजरअंदाज कर दिया।

प्रधानमंत्री मोदी के शासन की कवरेज भी द इकॉनॉमिस्ट के इस पक्षपाती दृष्टिकोण को दिखाती है। उदाहरण के लिए, “How Narendra Modi is remaking India into a Hindu state” जैसे लेखों में पत्रिका ने सरकार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ भीड़ द्वारा हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जबकि सरकार द्वारा चलाए जा रहे कई कल्याणकारी योजनाओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया।

वास्तव में द इकॉनॉमिस्ट का हिंदू विरोधी और पक्षपाती रवैया केवल भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर हिंदू विरोधी विचारों को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। इस पत्रिका की रिपोर्टिंग और इसके द्वारा उठाए गए मुद्दे अक्सर इस विचारधारा का समर्थन करते हैं, जिसमें हिंदुओं के धार्मिक पहचान को निशाना बनाया जाता है और हिंदुओं पर ही चरमपंथ के आरोप लगाए जाते हैं, जोकि सच्चाई से एकदम उलट है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

दिल्ली में लाकर बसाता था जो शेख, बांग्लादेशी घुसपैठियों ने उसको ही मार डाला…हत्या की गुत्थी सुलझाते-सुलझाते दिल्ली पुलिस ने पकड़ लिया फेक आधार-वोटर कार्ड बनाने वाला पूरा गैंग

दिल्ली में अवैध घुसपैठियों के विरुद्ध वर्तमान में बड़ा अभियान चल रहा है। इसी कड़ी में घुसपैठियों के भारतीय पहचान पत्र बनाने वाले एक बड़े गिरोह के 11 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। पकड़े गए लोगों में से 5 बांग्लादेशी हैं जबकि बाकी भारतीय हैं। पकड़े गए में गिरोह आधार कार्ड ऑपरेटर और टेक्निकल एक्सपर्ट भी शामिल हैं। इनके द्वारा अब तक बनाए गए पहचान पत्रों और उसे बनवाने वालों की भी पड़ताल चल रही है।

दिल्ली पुलिस ने यह कार्रवाई मंगलवार (24 दिसंबर, 2024) को की है। दिल्ली के DCP दक्षिणी अंकित चौहान ने इस कार्रवाई की जानकारी मीडिया से साझा की है। उन्होंने बताया है कि जंगलों के रास्ते भारत में घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी विभिन्न रास्तों से दिल्ली पहुँच कर इस गिरोह से मिलते थे। पकड़े गए लोगों ने उस शेख की हत्या भी कर दी थी जो यहाँ उन्हें बांग्लादेश से लाता था।

DCP अंकित चौहान ने बताया, “हमने कुछ दिन पहले 4 लोगों को हत्या के एक मामले में पकड़ा था। उन्होंने बताया कि वह बांग्लादेशी हैं। उन्होंने सेंटो शेख नाम के एक आदमी ने उन्हें बुलाया था। उसने यहाँ दिल्ली के रोहिणी इलाके में पूनम कम्प्यूटर सेंटर चलाने वाले साहिल से मिलकर इन बांग्लादेशियों का फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनवाया। उनका आधार कार्ड भी बनवाया गया। 11 लोग गिरफ्तार किया गया है। इसमें 5 बांग्लादेशी और 6 उनके मददगार शामिल हैं।”

DCP अंकित चौहान ने बताया, “यह लोग जंगल के रास्ते भारत आते हैं। इसके बाद यह फर्जी कागजों के सहारे दिल्ली तक आते हैं। इसके बाद यह दिल्ली आकर फर्जी कागज बनाने वाले नेटवर्क से मिलकर आधार कार्ड वगैरह हासिल करते हैं। इसमें एक वेबसाइट का भी खुलासा हुआ है। इस वेबसाइट से फर्जी कागज बनाए जाते थे। यह वेबसाइट रजत मिश्रा, सद्दाम, सोनू कुमार और चाँद मोहम्मद मिलकर चलाते थे। इससे 228 प्रमाण पत्र 2 अकाउंट से बनाए गए हैं। कुल प्रमाण पत्र हजारों में हो सकते हैं।”

उन्होंने यह भी बताया कि एक महिला ने भारत में आकर अपना वोटर कार्ड भी बनवा लिया था। उसको भी पकड़ा गया है। पुलिस ने बताया है कि वह दिल्ली में घुसपैठियों की रोज तलाश कर रहे हैं। गौरतलब है कि यह घुसपैठिए कबाड़ बीनने से लेकर फैक्ट्रियों में काम करने में लगे हुए हैं। इन सभी से पूछताछ की जा रही है।

पुलिस यह भी पड़ताल कर रही है कि इनके द्वारा बनाए गए पहचान पत्रों का उपयोग कर के कौन सा घुसपैठिया कहाँ रह रहा है। इन गिरोह में शामिल अन्य लोगों की भी जानकारी जुटाई जा रही है। इन्होंने कितने फर्जी दस्तावेज अब तक तैयार कर दिए, इस पर भी जाँच हो रही है।

गौरतलब है कि फरवरी,2025 में दिल्ली में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से पहले उपराज्यपाल वी के सक्सेना ने पुलिस को अवैध घुसपैठियों के खिलाफ सघन अभियान चलाने का आदेश दिया है। इस अभियान के तहत अब तक 175 संदिग्ध बांग्लादेशी की पहचान की जा चुकी है। उनके कागजों का सत्यापन हो रहा है। इसके अलावा दिल्ली के स्कूलों को भी यह आदेश मिला है कि वह अवैध घुसपैठियों के बच्चों को दाखिला ना दें। भाजपा इससे पहले आरोप लगाती आई है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार ने अवैध घुसपैठियों को संरक्षण दिया है।