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रिपोर्ट, इंटरव्यू, लेख… ‘द वायर’ ने बांग्लादेश में हिंदुओं की प्रताड़ना पर पर्दा डालने के लिए किए सारे जतन, इस्लामी कट्टरपंथियों को बचाने के लिए लगातार चला रहा प्रोपेगेंडा

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटाए जाने के बाद हिन्दुओं पर अत्याचार लगातार जारी है। मोहम्मद यूनुस सरकार के अंतर्गत हिन्दू लगातार निशाना बन रहे हैं, उनके मंदिर तोड़े जा रहे हैं। विदेशी मीडिया हमेशा की तरह हिन्दुओं के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों पर आँख मूँद चुकी है। लेकिन इस पूरे खेल में भारत का वामपंथी मीडिया पोर्टल द वायर भी पीछे नहीं है। वायर लगातार प्रयास कर रहा है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर पर्दा डाला जाए।

द वायर का ध्यान बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं की पीड़ा दिखाने बजाय इस बात पर ज्यादा रहा कि आखिर कौन दूसरा भारतीय पोर्टल कथित तौर पर झूठ फैला रहा है। अगस्त 2024 के बाद द वायर द्वारा प्रकाशित 10 रिपोर्टों, इंटरव्यू और लेखों का विश्लेषण हमने किया है। इसमें साफ दिखता है कि वायर ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को कम करके दिखाया है।

21 दिसंबर, 2024 को ही, द वायर ने लोकसभा में विदेश मंत्रालय के एक जवाब पर बांग्लादेशी सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट छापी। विदेश मंत्रालय ने बताया था कि 2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 2,200 घटनाएँ हुई हैं।

स्रोत: द वायर

यहाँ पर द वायर ने भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के विरोध में बांग्लादेश सरकार की जानकारी रखी। द वायर ने बांग्लादेशी प्रेस विंग के हवाले से दावा किया कि जनवरी और नवंबर 2024 के बीच हिंसा की केवल 138 घटनाएँ हुई हैं। वायर ने ले-देकर वही कहा जो बांग्लादेश दावा कर रहा है।

इसी तरह 12 दिसंबर, 2024 को वायर में पार्थ एस घोष ने एक लेख लिखा। इस लेख में घोष ने बांग्लादेश में हिंदुओं तथा अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों को लगभग नकार दिया। उन्होंने पड़ोसी देश में बिगड़ती स्थिति के बारे में चिंताओं को किनारे करते हुए हिन्दुओं पर हुए हमलों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया। उन्होंने कहा कि यह हमले बढ़ा-चढ़ा कर दिखाए गए हैं।

स्रोत: द वायर

घोष ने बांग्लादेशी राजनीति में इस्लामी ताकतों के मजबूत होने को स्वीकार तो किया लेकिन हिंसा को लेकर कुछ नहीं कहा। उन्होंने हिन्दुओं पर होने वाले हमलों को लेकर बांग्लादेश से आने वाली रिपोर्टों पर सवाल उठा दिए और उन्हें फर्जी खबर और ‘हिंदुत्व प्रोपेगेंडा’ बता दिया।

घोष ने यहाँ तक दावा किया कि बांग्लादेश की स्थिति भारत से कोई ख़ास अलग नहीं है। उन्होंने इस दौरान बांग्लादेश पर लिखने बताने के बजाय भारत की आलोचना में अपनी कलम घिसनी चालू कर दी। उन्होंने दावा किया कि भारत में मुस्लिमों पर अत्याचार होता है और ऐसे में भाजपा को बांग्लादेश पर प्रश्न नहीं उठाने चाहिए।

वायर ने लेख और विशेष रिपोर्ट में ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की खबरों में भी अपना प्रोपेगेंडा जारी रखा। वायर ने इस बात को दिखने में एड़ी चोटी का जोर लगाया कि बांग्लादेश में सब कुछ एकदम बढ़िया चल रहा है। इसी तरह 10 दिसम्बर,2024 को भारत और बांग्लादेश के बीच घटते व्यापार को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की।

स्रोत: द वायर

इसमें वायर ने बोनगांव के एक व्यापारी तपन साहा का हवाला दिया। वायर ने बताया कि तपन साहा को ढाका को रोजमर्रा की जिन्दगी काफी सामान्य लगी और भारत में जैसा बताया गया, वैसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि वह हिंसा के वीडियो भी बांग्लादेशी मीडिया से गायब थे।

इसी तरह से 5 दिसंबर, 2024 को प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में, वायर ने मुहम्मद यूनुस के बयान को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। यूनुस लगातार कहते आए हैं कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की रिपोर्ट ‘बढ़ा-चढ़ाकर’ बताई गई है और यह भारत और अन्य वैश्विक शक्तियों द्वारा फैलाई गई ‘मनगढ़ंत कहानी’ का हिस्सा है।

स्रोत: द वायर

वायर लगातार प्रयास कर रहा है कि हिन्दुओं के खिलाफ प्रताड़ना को किसी तरह दबाकर बताए। 3 दिसंबर, 2024 को द वायर ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें रहमान का दावा था कि भारत में ‘बांग्लादेश विरोधी भावना’ को बढ़ावा दिया गया है।

स्रोत: द वायर

गौरतलब है कि रहमान, जो वर्तमान में निर्वासन के तहत यूनाइटेड किंगडम में रह रहे हैं। वह 21 अगस्त,2004 को अवामी लीग की राजनीतिक रैली पर हुए आतंकवादी ग्रेनेड हमले का मुख्य आरोपित और मास्टरमाइंड हैं। उन्हें 2008 में बांग्लादेश में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हाल ही में बांग्लादेश में उन्हें राहत मिली है।

वायर ने हिन्दुओं पर अत्याचार दबाने की बात के लिए बांग्लादेशी मीडिया का भी सहारा लिया है। 29 नवंबर, 2024 को द वायर के लिए करन थापर के साथ एक इंटरव्यू में, ढाका ट्रिब्यून के संपादक जफर सोभन ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को काफी कम बताया।

इस्कॉन नेता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी पर चर्चा के दौरान, सोभन ने राजद्रोह के आरोपों की आलोचना की लेकिन इस बीच उन्होंने मोहम्मद यूनुस वाला ही राग अलापा। उन्होंने इस दौरान मोहम्मद यूनुस वाली बात कही कि बांग्लादेश हिन्दुओं की प्रताड़ना की बात मनगढ़ंत है।

बांग्लादेशी अखबार प्रथम अलो द्वारा पहले प्रकाशित और 19 अगस्त, 2024 को द वायर पर छपी एक कथित फैक्ट-चेक रिपोर्ट में, एक रूमर स्कैनर की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया। इस रिपोर्ट में भारतीय मीडिया आउटलेट्स पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमलों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया।

स्रोत: द वायर

रिपोर्ट में कई सोशल मीडिया पोस्ट की जाँच की गई थी, जिसमें कथित तौर पर बांग्लादेश में हुई घटनाओं को हिंदुओं पर हमले के रूप में गलत तरीके से पेश किया गया था। इस रिपोर्ट में पूरा फॉक्स इस बात पर था कि कैसे भारतीय मीडिया को झूठा साबित किया जाए। रिपोर्ट में ऑपइंडिया पर तक गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाया।

वायर ने अपना प्रोपेगेंडा बढ़ाने के लिए कथित फैक्ट चेक का भी हवाला कर दिया। इसमें मदद भी उसने उस ऑल्टन्यूज की ली, जिस पर खुद फर्जी खबर फ़ैलाने के आरोप है। वायर ने एक फैक्ट चेक के सहारे गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान को गलत साबित करने की कोशिश की जिसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिन्दुओं की घटती जनसंख्या के बारे में बात की थी।

स्रोत: द वायर

असल में तो सच्चाई यह है कि बांग्लादेश का खुद का आँकड़ा यही बात दिखाता है। जनसंख्या आँकड़ों के अनुसार, हिन्दू जनसंख्या 1901 में 33% से 1991 में 10.5% तक की गिरावट आई है, जबकि 2022 की जनगणना में इसमें और कमी आई है और यह सिर्फ़ 7.95% है।

बांग्लादेश में सत्ता के तख्तापलट के कुछ ही दिनों बाद 17 अगस्त, 2024 को वायर में मानश फिराक भट्टाचार्जी ने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने विदेशी मीडिया की तरह वही राग अलापा कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार मजहबी आधार पर नहीं हुआ है बल्कि इसका कारण राजनीतिक और उनका आवामी लीग से जुड़ाव है।

स्रोत: द वायर

15 अगस्त को द वायर में प्रकाशित राम पुनियानी के लेख में भी यही बात कही गई। हालाँकि, हिन्दुओं की पीड़ा बताने के बजाय पुनियानी ने यह बताया कि कैसे बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल हो गया है। उन्होंने यहाँ तक दावा कर दिया कि यूनुस सरकार मंदिरों को बचा रही है।

स्रोत: द वायर

द वायर का कुल मिलाकर एजेंडा यह रहा कि भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता कम करे। इसके अलावा उसने वह हर स्रोत नकारने की कोशिश की जो हिन्दुओं पर हमलों को बताती है और उसके बराबर में बांग्लादेशी दावा खड़ा किया है। वह बांग्लादेश सरकार का भोंपू बना हुआ हुआ है।

वायर ने जहाँ खुद तो हिन्दुओं की पीड़ा नहीं बताई, उन्होंने सभी मीडिया पोर्टल और लोगों को घृणा फ़ैलाने वाला घोषित कर दिया जो अपने स्तर पर यह काम कर रहे थे। इसे वायर ने इस्लामोफोबिया करार दिया। वायर ने इस दौरान हिन्दुओं पर हमलों का कारण भी राजनीतिक बता दिया, यही प्रयास विदेशी मीडिया करती आई है।

(मूल रूप से अनुराग ने यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी है। आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे विस्तार से पढ़ सकते हैं)

यहूदियों की सुरक्षा के लिए आगे आए हिंदू, हाथों में थामी बजरंग बली की पताका… लगाए जय श्रीराम के नारे: कनाडा में कड़ाके की ठंड में दिखाई एकजुटता, Video

कनाडा में यहूदियों के खिलाफ बढ़ रहे अपराध मामलों के बाद कनाडाई हिंदुओं ने सड़कों पर उतरकर यहूदियों के प्रति एकजुटता दिखाई है। उन्होंने टोरंटो के बाथसर्ट और शेपर्ड में यहूदी समुदाय की रक्षा के लिए प्रदर्शन किया।

कड़ाके की ठंड के बीच हुए प्रदर्शन की कुछ वीडियोज डेनियल बोर्डमैन ने अपने इंस्टा पर भी साझा की है। उन्होंने बताया कि बाथसर्ट और शेपर्ड में जिहादियों से यहूदियों की रक्षा के लिए हिंदू कनाडाई नागरिक सड़कों पर उतरे हैं। वीडियो में देख सकते हैं कि उनके हाथ में भारत, कनाडा, इजरायल का झंडा होने के साथ ‘जय श्रीराम’ लिखी पताका भी है जिसमें हनुमान जी भी बने हैं।

वीडियो में देख सकते हैं कि प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि वह यहूदियों के अधिकार के लिए सड़कों पर उतरे हैं क्योंकि यहूदियों के पास भी उतना ही जीने का अधिकार है जितना कि किसी और समुदाय के व्यक्ति के लिए है। हिंदू न केवल यहूदियों का समर्थन करते हैं बल्कि उनके शांति से जीने को भी पूरा सपोर्ट करते हैं।

प्रदर्शनकारी हिंदुओं ने कहा कि वह इजरायली और यहूदी भाइयों के साथ खड़े होकर ये बताना चाहते हैं कि वे कनाडा में सुरक्षित हैं। वहीं एक अन्य व्यक्ति ने यहूदियों को विश्वास दिलाया कि वह कनाडा में हिंदू यहूदियों के साथ हैं।

गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों में कनाडा में यहूदियों के खिलाफ काफी हिंसा होती देखी गई है। पिछले सप्ताह की बात है यहूदियों के धर्मस्थल पर आगजनी के बाद उनके एक प्राथमिक विद्यालय में गोलीबारी की घटना सामने आई थी।

ये पहली बार नहीं है जब कनाडा में हिंदू इजरायल के यहूदियों के लिए एकजुट हुए हो। पिछले साल भी जब हमास ने इजरायल के ऊपर हमला किया था उस समय भी हमास आतंकियों के खिलाफ कनाडा के हिंदुओं ने यहूदियों के साथ एकजुटता दिखाई थी और इस्लामी कट्टरपंथियों, आतंकियों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। साथ ही जोर-जोर से नारेबाजी भी हुई थी।

हाई कोर्ट में नकाब से चेहरा ढककर आई मुस्लिम महिला वकील, जज ने हटाने को कहा तो बोली- ये मेरा मौलिक अधिकार: जानिए फिर क्या हुआ, क्या कहते हैं नियम

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने हिजाब पहनी एक महिला वकील की बात सुनने से इनकार कर दिया। महिला वकील ने अपना चेहरा ढक रखा था। जब जज ने महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने को कहा तो उस महिला वकील ने चेहरा दिखाने से इनकार कर दिया। जज ने कहा कि कोई भी महिला वकील अपना चेहरा ढक कर अदालत में बहस नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति मोक्ष खजुरिया काज़मी और न्यायमूर्ति राहुल भारती की ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि महिला वकीलों को अपना चेहरा ढककर अदालत में उपस्थित होने की अनुमति नहीं है। इसके बाद खंडपीठ ने महिला वकील की बातें सुनने से इनकार कर दिया और इस केस में अगली तारीख दे दी।

दरअसल, यह मामला 27 नवंबर का है। उस दिन ‘मोहम्मद यासीन खान बनाम नाज़िया इकबाल’ से जुड़े घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई हो रही थी। इसी दौरान एक महिला हाई कोर्ट में पेश हुई। उसने खुद को सैयद ऐनैन कादरी नाम की एक वकील बताया और कोर्ट को कहा कि इस मामले को रद्द करने से जुड़ी याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हो रही है।

वह कोर्ट में वकील की पोशाक में आई, लेकिन उसने अपना चेहरा ढक रखा था। उस समय मामले की सुनवाई जस्टिस राहुल भारती कर रहे थे। जब न्यायाधीश राहुल भारती ने उस महिला वकील से अपना चेहरा दिखाने का अनुरोध किया तो उसने इनकार कर दिया। महिला वकील ने जोर देकर कहा कि चेहरा ढककर आना उनका मौलिक अधिकार है। इसलिए कोर्ट उससे नकाब हटाने के लिए नहीं कह सकता।

इसके बाद जज राहुल भारती ने 27 नवंबर के अपने आदेश में कहा, “यह न्यायालय याचिकाकर्ताओं के वकील के रूप में खुद को अधिवक्ता सुश्री सैयद ऐनैन कादरी बताने वाली महिला की उपस्थिति पर विचार नहीं करता, क्योंकि कोर्ट के पास एक व्यक्ति और एक पेशेवर के रूप में उनकी वास्तविक पहचान की पुष्टि करने का कोई आधार/अवसर नहीं है।” कोर्ट ने मामले को 5 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया।”

इसके बाद कोर्ट ने न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से पूछा कि क्या ऐसा कोई नियम है, जो महिला अधिवक्ताओं को अपना चेहरा ढककर पेश होने या अपना नहीं चेहरा ढकने के न्यायालय के अनुरोध को अस्वीकार करने का अधिकार देता है। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल ने 5 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट की जाँच करने के बाद न्यायमूर्ति मोक्ष खजूरिया काजमी ने 13 दिसंबर को कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा निर्धारित नियमों में ऐसे किसी अधिकार का उल्लेख नहीं है। बीसीआई नियमों के अध्याय IV (भाग VI) की धारा 49(1) (जीजी) के तहत महिला अधिवक्ताओं के लिए ड्रेस कोड का विवरण दिया गया है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने पाया कि BCI की इन प्रावधानों में महिला अधिवक्ताओं को काले रंग की पूरी आस्तीन वाली जैकेट या ब्लाउज, सफेद बैंड, साड़ी या अन्य मामूली पारंपरिक पोशाक के साथ-साथ काला कोट पहनने की अनुमति है। हालाँकि, न्यायालय ने बताया कि निर्धारित न्यायालय पोशाक में चेहरा ढकना शामिल नहीं है या इसकी अनुमति नहीं है।

इसके बाद न्यायालय ने कहा, “नियमों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए इस तरह की कोई पोशाक (चेहरा ढकना) स्वीकार्य है।” हालाँकि, बाद में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक अन्य वकील आगे आए। बाद में न्यायमूर्ति काज़मी ने 6 दिसंबर को मामले में निर्णय सुरक्षित रख लिया और 13 दिसंबर को उसे खारिज कर दिया।

संभल में जहाँ मिली 3 मंजिला बावड़ी, वह कभी हिंदू बहुल इलाका था: रानी की पोती आई सामने, बताया- हमारा बचपन यहीं बीता, बदायूँ के अनेजा ने प्लॉट काट मुस्लिमों को बेच दिए

उत्तर प्रदेश स्थित संभल जिले के चंदौसी क्षेत्र में राजस्व विभाग ने एक प्राचीन बावड़ी को भी खोज निकाला है। इसे ‘रानी की बावड़ी’ कहा जा रहा है। इसकी साफ-सफाई का काम जोर-शोर से जारी है। चंदौसी नगरपालिका की सफाई एवं खाद्य निरीक्षक प्रियंका सिंह का कहना है कि यहाँ खुदाई मैन्युअली की जा रही है। 40-50 मजदूर काम कर रहे हैं।

प्रियंका सिंह का कहना है कि ये बावड़ी है और इसकी खुदाई में किसी प्रकार की हानि ना हो इसलिए मशीनों का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। खुदाई का ये काम चंदौसी के लक्ष्मणगंज इलाके में हो रहा है। साल 1857 तक ये क्षेत्र हिन्दू बहुल हुआ करता था। हालाँकि, हिंदुओं के पलायन के बाद इस बावड़ी पर कब्जा कर लिया गया और उसे भर दिया गया।

दरअसल, इस जगह की खुदाई की माँग को लेकर संभल के जिलाधिकारी को एक प्रार्थना पत्र मिला था। प्रार्थना पत्र में लक्ष्मणगंज के अंदर बिलारी की रानी की प्रचीन बावड़ी होने का दावा किया गया था। इसी शिकायत का संज्ञान लेकर राजस्व विभाग की टीम लक्ष्मणगंज पहुँची थी। बस्ती के बीच में एक जगह चिन्हित कर के खुदाई शुरू हुई। कुछ ही देर बाद जमीन के नीचे प्राचीन इमारतें मिलनी शुरू हो गईं। 

रामपुर से सटे सहसपुर-बिलारी राजपरिवार द्वारा इसे बनवाया गया था। रानी की बावड़ी की खुदाई के बाद से यहाँ तीन मंजिला बावड़ी मिली है। वहीं, यहाँ रानी रहीं सुरेंद्र बाला की पोती राजकुमारी शिप्रा बाला ने बताया कि यह इलाका पहले हिंदू बहुल था। बाद में इस राजपरिवार के कई हिस्सेदार होने के बाद यहाँ की जमीनों को बदायूँ के अनेजा को बेच दिया। अनेजा ने इसकी प्लॉटिंग करके मुस्लिमों के बेच दिया।

राजकुमारी शिप्रा ने बताया, “यह दादी सुरेंद्र बाला और बाबा जगदीश कुमार की संपत्ति है। उनके बेटे लल्ला बाबू विष्णु कुमार की पाँच बेटियों में मैं सबसे छोटी हूँ। यहाँ हमारा पुश्तैनी फार्म हाउस था। फार्म हाउस में गन्ने की खेती हुआ करती थी। हम लोगों के लिए यहाँ एक कुआँ भी था। हम लोग यहाँ मम्मी-पापा के साथ पिकनिक मनाते थे। हमारा बचपन यहीं बीता है। यहाँ पर कोठी से जुड़ा हुआ लक्ष्मणगंज है।”

शिप्रा बाला का कहना है कि कोई भाई नहीं था। बकौल राजकुमारी, “अकेला आदमी अपनी संपत्ति पर ध्यान नहीं दे पाता है। इसके कारण लोग उसकी जमीन हथियाना शुरू कर देते हैं।” यही हाल परिवार से जुड़ी जमीनों का भी यही हुआ। ये मामला सहसपुर राजपरिवार से जुड़ा हुआ है। 1857 के सिपाही विद्रोह के समय सहसपुर की रानी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में इसे छावनी के तौर पर इस्तेमाल करती थीं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह बावड़ी बिलारी के राजा के नाना (सहसपुर के राजा) के समय की है। इसमें एक कूप और 4 कमरे हैं। बावड़ी के अंदर का दृश्य मंदिर जैसा दिखाई देता है। इसके अंदर एक सुरंग भी है। लगभग 150 साल पुरानी इस बावड़ी का प्रयोग पानी जमा करने और सैनिकों के आराम करने के लिए किया जाता था। इसके सिर्फ 150 मीटर दूर इलाके का सबसे प्रसिद्ध क्षेमनाथ तीर्थ मंदिर भी है।

यह बावड़ी करीब 10-12 मीटर लंबी और 28 फीट गहरी बताई जा रही है। संभल के डीएम राजेंद्र पैंसिया ने बताया कि इस बावड़ी में नीचे के दो मंजिल मार्बल के हैं और सबसे ऊपर का मंजिल ईंटों का बना है। उन्होंने बताया कि यह 400 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला है। वर्तमान में 210 वर्गमीटर ही है और बाकी हिस्सों पर कब्जा किया गया है। जिलाधिकारी ने बताया कि जल्द ही उन्हें भी खाली करा लिया जाएगा।

अब इस्लामी कानून से ब्रिटेन को हाँक रहे मुस्लिम, चल रहे 85 शरिया कोर्ट: 4 बीवी की रवायत को बढ़ावा, ग्रूमिंग गैंग के आतंक पर लिबरलों की चुप्पी से पैदा हुआ नया खतरा

इंग्लैंड का कानून इस्लामी कट्टरपंथ के आगे घुटने टेक रहा है। कभी दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज करने वाला इंग्लैंड अब मुस्लिम कट्टरपंथियों के नतमस्तक है। जिस इंग्लैंड ने ‘कानून का राज’ की अवधारणा दी थी, उस देश में अब इस्लामी अदालतें चल रही हैं। ब्रिटेन में दशकों से आदर्शवादी और लिबरल बनने के चक्कर में कट्टरपंथ पर मुंह बंद रखा गया था।

इस्लामी कट्टरपंथ के पैर पसारने को लेकर अगर कोई बोलता है तो उसे इस्लामोफोब करार दिया जाता है। इस्लाम पर इस चुप्पी का सबसे ज्वलंत उदाहरण ग्रूमिंग गैंग रहे हैं, जिन्होंने हजारों ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाया। यह निशाना बनाने वाले मुस्लिम थे और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अब शरिया अदालतें खुल्लम-खुल्ला ब्रिटिश कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही हैं। ‘शरिया कोर्ट’ के नाम पर चलाई जा रहीं यह अदालतें ब्रिटेन 4 निकाह जैसी सामजिक कुरीतियों को बढ़ावा दे रही हैं। इन अदालतों पर ब्रिटिश सरकार अंकुश नहीं लगा पा रही है। यह अदालतें अवैध निकाह भी करवा रही हैं जिनका कानूनन कोई रिकॉर्ड नहीं है।

ब्रिटिश अखबार द टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लैंड में वर्तमान में 85 ऐसी शरिया अदालतें चल रही हैं। मुस्लिमों के मसलों से निपटने के लिए बनाई गई यह शरिया अदालतें पूरे इंग्लैंड में फैली हुई हैं। यह अदालतें निकाह, तलाक, खुला और चार निकाह जैसे मामलों पर फैसले दे रही हैं। यह अदालतें ब्रिटिश कानून के खिलाफ जाकर तमाम फैसले देती हैं।

रिपोर्ट बताती है कि ऐसी पहली शरिया अदालत इंग्लैंड में लंदन में 1982 में खोली गई थी। तब से यह लगातार बढ़ रही हैं। इनमें से एक अदालत ने एक ऐसे एप को मंजूरी दे रखी थी जो मुस्लिम पुरुषों से उनकी बीवियों की संख्या पूछता था। इसके अलावा इंग्लैंड में चलने वाले एक और एप में भी मुस्लिम युवा निकाह के बाद कितनी बीवियाँ रखेंगे, इसकी जानकारी भर सकते हैं।

गौरतलब है कि ब्रिटिश कानून के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति एक से अधिक शादी/निकाह नहीं कर सकता। ऐसा करने के लिए तलाक और उसका कानूनी आदेश जरूरी है। हालाँकि, यहः शरियाई अदालतें इन सब बातों को नहीं मानती हैं और धड़ल्ले से इन सब कामों में मशगूल हैं।

इन शरिया अदालतों ने लगभग 100000 ऐसे निकाह करवाए हुए हैं, जिनका ब्रिटिश कानून में कोई पंजीकरण नहीं हुआ है। इंग्लैंड के भीतर शरिया अदालतों की धाक इतनी बढ़ गई है कि अब यूरोप के बाकी देशों और अमेरिका से मुस्लिम यहाँ अपने इस्लामी मसले लेकर पहुँच रहे हैं।

यह अदालतें चार निकाह को बढ़ावा दे रही हैं लेकिन ब्रिटिश एजेंसियाँ इनके आगे लाचार हैं। लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण में लगे रहने वाले ब्रिटिश नेताओं ने इस मसले पर आँखे मूँद ली हैं। इसी के चलते इंग्लैंड अब शरिया कोर्ट के पश्चिमी देशों का प्रमुख केंद्र है।

इंग्लैंड में इन शरिया अदालतों को लेकर धर्मनिरपेक्षता को लेकर काम करने वाले संगठन विरोध कर रहे हैं। इंग्लैंड के ऐसे ही एक संगठन नेशनल सेक्युलर सोसायटी ने माँग की है कि ब्रिटेन में चल रही इस समानांतर कानून व्यवस्था पर नकेल कसी जाए। उन्होंने कहा है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर असर पड़ रहा है। हालाँकि, सरकार इस मामले पर शांत है।

ब्रिटेन में इस्लामी कट्टरपंथ पर सरकार और लिबरल समाज का चुप रहना कोई विचित्र बात नहीं है। ग्रूमिंग गैंग के हाथों जब हजारों ब्रिटिश लड़कियाँ शिकार बन गईं तो एक टास्क फ़ोर्स बनाई गई। लेकिन इसी के साथ अब ब्रिटेन में इस्लामी कानून नाफ़िज करने की तैयारी है। ब्रिटिश सरकार ने इस दौरान शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन धँसा ली है।

ब्रिटिश सरकार इस पूरे इस्लामी कट्टरपंथ के तंत्र पर प्रहार नहीं करना चाहती। उसे लगता है कि इससे उसकी कथित उदार छवि पर असर पड़ेगा, जबकि सच्चाई यह है कि इसी का फायदा उठा कर इस्लामी कट्टरपंथी अपनी धाक इंग्लैंड में जमा रहे हैं। वह हिन्दुओं पर हमला करते हैं, महिलाओं को छेड़ते हैं यहाँ तक कि इंग्लैंड में धमाके भी हो चुके हैं।

दंगों के बाद हिंदुओं को करना पड़ा पलायन, नदी में विसर्जित करनी पड़ी मूर्तियाँ… अब खुर्जा में मिला बंद मंदिर, प्रशासन से जीर्णोद्धार और पूजा-पाठ फिर शुरू करवाने की माँग

बुलंदशहर जिले के खुर्जा कस्बे में एक ऐसा मंदिर मिला है, जो करीब 50 साल पुराना बताया जा रहा है और पिछले 30 वर्षों से बंद पड़ा था। इस मंदिर का निर्माण जाटव समुदाय ने किया था, जो वहाँ पूजा-अर्चना करते थे। साल 1990 के दंगों के बाद जाटव समुदाय ने इस इलाके को छोड़ दिया और मंदिर भी बंद हो गया। इस दौरान मंदिर की मूर्तियों को समुदाय के ही एक परिवार ने नदी में विसर्जित कर दिया था।

खुर्जा के एसडीएम दुर्गेश सिंह ने बताया कि मंदिर सलमा हकान मोहल्ले में स्थित है और इसका ढाँचा पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि इस स्थल को लेकर किसी भी समुदाय के बीच कोई विवाद नहीं है। एसडीएम ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर की मूर्तियों को नदी में विसर्जित कर दिया गया था और मामले की जाँच जारी है।

मंदिर का पता चलने के बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) और जाटव विकास मंच ने प्रशासन से मंदिर का जीर्णोद्धार कराने की माँग की है। VHP के मेरठ प्रांत के पदाधिकारी सुनील सोलंकी ने बताया कि मंदिर 1990 के बाद से बंद है। उस समय इस क्षेत्र में रहने वाले हिंदू परिवार दंगों के डर से पलायन कर गए थे। उन्होंने प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर मंदिर की सफाई और सौंदर्यीकरण कराने का अनुरोध किया, ताकि पूजा-पाठ फिर से शुरू हो सके।

जाटव विकास मंच के अध्यक्ष कैलाश भागमल गौतम ने भी मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मंदिर का निर्माण जाटव समुदाय के लोगों ने किया था। यह मंदिर 50 साल पुराना है, लेकिन 1990 के दंगों के दौरान समुदाय ने पलायन कर दिया, जिससे मंदिर बंद हो गया। अब मंच और VHP के सदस्यों ने मिलकर मंदिर में धार्मिक गतिविधियाँ फिर से शुरू करने की माँग की है।

इस मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों और संगठनों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। उनका मानना है कि मंदिर का जीर्णोद्धार कर पूजा-अर्चना फिर से शुरू की जा सकती है। प्रशासन से इस मामले में जल्द निर्णय लेने की उम्मीद जताई जा रही है।

बता दें कि इससे पहले संभल और वाराणसी में भी सालों से बंद पड़े मंदिरों का पता चला था। संभल में 1978 से बंद पड़े एक मंदिर को हाल ही में खोला गया, जहाँ कार्बन डेटिंग की प्रक्रिया भी हो चुकी है। वहीं, वाराणसी के मदनपुरा इलाके में 250 साल पुराने एक मंदिर का पता चला है। अब बुलंदशहर के खुर्जा में मिला यह मंदिर भी चर्चा में है।

अल्लू अर्जुन के घर पर हमला करने वालों को मिली जमानत, कॉन्ग्रेसी CM रेवंत रेड्डी के साथ तस्वीरें वायरल: तोड़फोड़ के बाद ‘पुष्पा 2’ एक्टर ने परिवार सहित घर छोड़ा

साउथ के सुपरस्टार व सुपरहिट फिल्म पुष्पा-2 के एक्टर अल्लू-अर्जुन के आवास पर 22 दिसंबर को पत्थरबाजी करके उनकी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का प्रयास हुआ। पुलिस ने इस मामले में 6 लोगों को पकड़ा जिन्हें आज सुबह तक बेल भी मिल गई। अब इसी मामले में एक बीआरएस नेता ने दावा किया है कि आरोपितों में से एक तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का आदमी था। वहीं कॉन्ग्रेस नेता ने इन आरोपों पर कोई बयान नहीं दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 22 दिसंबर 2024 को उस्मानिया यूनिवर्सिटी की ज्वाइंट एक्शन कमेटी के लोगों ने जुबली हिल्स में जबरन घुसने की कोशिश की थी। उनकी माँग थी कि उस महिला के परिजनों को 1 करोड़ रुपए दिए जाएँ जिनकी मौत भगदड़ के दौरान हुई थी।

पुलिस ने सही समय पर आकर इन्हें गिरफ्तार किया और 6 लोगों को जज के सामने पेश किया। कोर्ट ने 10-10 हजार रुपए तथा दो जमानती पेश होने के बाद सबको छोड़ दिया गया। इस बेल के बाद ही बीआरएस नेता कृष्णक सामने आए। उन्होंने दावा किया श्रीनिवास 2019 के जिला परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र (जेडटीपीसी) चुनावों में रेवंत रेड्डी और कोडंगल कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के ‘करीबी सहयोगी’ थे।

बीआरएस नेता कृषांक ने कुछ तस्वीरें पोस्ट की, जिनमें अल्लू अर्जुन के घर तोड़फोड़ करने वाला एक आरोपित मुख्यमंत्री के साथ पोज देते हुए दिखाई दे रहे था। उन्होंने कहा, “ओयूजेएसी को साल 2009 में महान तेलंगाना के लिए शुरू किया गया था। उसे हिंसा और ब्लैकमेल के लिए इसका इस्तेमाल करना घृणित है। अल्लू अर्जुन के आवास पर हमला करने वाले रेड्डी श्रीनिवास उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र नेता नहीं हैं। वह रेवंत के करीबी सहयोगी और 2019 जेडपीटीसी चुनाव में कोडंगल कांग्रेस के उम्मीदवार हैं।”

बता दें कि अल्लू अर्जुन रविवार को अपने घर हुए हमले के बाद परिवार को लेकर चिंतित हैं। वह अपने बच्चों के साथ सुरक्षित जगह चले गए हैं। उन्होंने अपने बच्चों को अपने पिता के घर भेज दिया है। तस्वीर सामने आई है जिसमें वह लोग गाड़ी में है और काफी चिंतित हैं। उनके बच्चे भी हैरान-परेशान होकर डरे बैठे हैं। इस घटना पर अल्लू अर्जुन के पिता ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनके घर पर जो कुछ हुआ, उसे सभी ने देखा है। लेकिन अब समय आ गया है कि वह लोग उसके अनुसार काम करें।

इस्लामी लुटेरे अहमद शाह अब्दाली को रोका, मुगल हो या अंग्रेज सबसे लड़े: जूनागढ़ के निजाम ने जहर देकर हिंदू संन्यासियों को मारा, जो बच गए उन्होंने बना दिया जूना अखाड़ा

प्रयागराज महाकुंभ-2025 की तैयारियाँ जोरों पर हैं। वहीं विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत विश्व के सबसे बड़े धार्मिक समागम में हिस्सा लेने के लिए पहुँच रहे हैं। इन्हीं अखाड़ों में से एक अखाड़ा है भैरव अखाड़ा। 13 अखाड़ों में सबसे बड़े भैरव अखाड़े को पंचदशनाम जूना अखाड़ा के नाम से भी जाना जाता है। नागा संन्यासियों के इस अखाड़े का इतिहास आध्यात्मिकता के साथ-साथ पराक्रम से भी भरा पड़ा है।

यही कारण है कि नागा संन्यासी अपने साथ अस्त्र-शस्त्र भी रखते हैं। इनके हाथों में तलवार, त्रिशुल, भाला, फरसा जैसे कई तरह के हथियार होते हैं। कहा जाता है कि नागा संन्यासियों ने मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक के साथ युद्ध लड़े हैं। जूना अखाड़े में एक शस्त्रागार भी है, जिसमें 400 वर्ष पुराने अस्त्र-शस्त्र रखे हुए हैं। कुंभ के आयोजन के दौरान नागा साधु इन हथियारों को लेकर निकलते हैं।

जूना अखाड़े की स्थापना का उद्देश्य

जूना अखाड़े शैव संप्रदाय से 7 अखाड़ों से ताल्लुक रखता है। इसकी स्थापना 1145 ईस्वी में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में हुआ था। यहीं पर इस अखाड़े का पहला मठ भी बना था। हालाँकि, हिंदू धर्म के कुछ जानकारों का मानना है कि इस अखाड़े की स्थापना का उल्लेख सन 1259 में मिलता है। वहीं, सरकारी दस्तावेजों में इस अखाड़े का पंजीकरण सन 1860 में कराया गया था।

जूना अखाड़े के इष्ट या अराध्य भगवान शिव या उनके रुद्रावतार भगवान दत्तात्रेय हैं। इस अखाड़े का केंद्र एवं मुख्यालय वाराणसी के हनुमान घाट पर स्थापित किया गया है। इस अखाड़े का आश्रम हरिद्वार के महामाया मंदिर के पास बनाया गया। इसके अलावे, इस अखाड़े के केंद्र उज्जैन से लेकर तमाम प्रमुख केंद्रों में स्थित है। कहा जाता है कि इस अखाड़े में 5 लाख से ज्यादा नागा साधु हैं।

कहा जाता है कि जब बौद्ध एवं जैन संप्रदाय के वर्चस्व को तोड़ने के लिए इन अखाड़ों की स्थापना की गई थी। नागा साधुओं को शास्त्र के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देकर युद्ध कौशल में पारंगत बनाया गया, ताकि वे हिंदू धर्म को स्थापित करने में सहयोग कर सकें। तब से ये अखाड़ा चले आ रही हैं। शंकराचार्य के निर्देशन में स्थापित ये अखाड़े बाद में मुस्लिम आक्रमणकारियों से भी लड़े।

अब्दाली, निजाम और मुगलों से भी लिया लोहा

कह जाता है कि इस अखाड़े के नागा साधुओं ने मंदिरों-मठों की रक्षा के लिए मुगलों से लोहा लिया था। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने अफगान आक्रांता अहमद शाह अब्‍दाली मथुरा-वृंदावन को लूटने के बाद गोकुल को लूटने के इरादे से आगे बढ़ा, लेकिन नागाओं ने इन्हें रोक दिया। इसके कारण अब्दाली का गोकुल को लूटने का सपना रह गया था।

यह भी कहा जाता है कि नागा साधुओं ने गुजरात के जूनागढ़ के निजाम के साथ एक भीषण युद्ध किया था। इस युद्ध में नागा संन्यासियों ने निजाम और उसकी सेना को धूल चटा दी थी। मान्यता है कि नागा साधुओं के सैन्य कौशल से निजाम भी प्रभावित हो गया था। आखिरकार इन संन्यासियों के आगे घुटने टेकते हुए जूनागढ़ के निजाम को इन्हें संधि के लिए आमंत्रित करना पड़ा।

जूना अखाड़े के संरक्षक महंत हरि गिरि बताते हैं कि अखाड़े के संन्यासी निजाम के पास संधि के लिए गए। इसमें संन्यासियों को जूनागढ़ सौंपने की बात कहते हुए भोजन पर आमंत्रित किया। इस दौरान निजाम ने धोखे से संन्यासियों को भोजन में जहर मिलाकर दे दिया। इससे सैकड़ों संन्यासियों की मौत हो गई। जो बच गए उन्होंने जूना अखाड़े की स्थापना की।

नागा संन्यासियों के शौर्य को लेकर एक और कथा कही जाती है। कहा जाता है कि मुगल आक्रांता जहाँगीर एक बार प्रयागराज कुंभ मेला में आने वाला था। तब वैष्णव और शैव संप्रदाय के संन्यासियों ने मिलकर एक पिरामिड बनाया और उससे एक छद्म युद्ध किया। इसमें पिरामिड पर चढ़कर एक साधु ने जहाँगीर को कटारी भोंक दी थी। इस तरह वे मुगलों के खिलाफ अपनी गुस्सा को रोक नहीं पाए थे।

पंचदशनाम जूना अखाड़े के अष्ट कौशल महंत योगानंद गिरी का कहना है कि नागा संन्यासियों जो अस्त्र-शस्त्र लेकर चलते हैं, इन्हीं उन्होंने मुगलों से लड़ाई लड़ी थी। इसके बाद अंग्रेजों के शासन के दौरान संन्यासी विद्रोह किया। योगानंद गिरि कहते हैं, “इन अस्त्रों को हम कैंची बोलते हैं, जो हमारे लिए पूजनीय होता है।”

कैसे बनते हैं नागा साधु?

अखाड़े का संन्यासी बनने के लिए एक संकल्प पूरा करना होता है। यह संकल्प 12 साल का होता है। यह संकल्प लेने वाला ब्रह्मचारी कहलाता है। ब्रह्मचर्य के दौरान उस शख्स को अखाड़े के नियम और परंपराएँ सिखाई जाती हैं। इस दौरान गुरु की सेवा करनी होती है। जब ब्रह्मचारी का 12 साल का संकल्प पूरा हो जाता है तो आने वाले कुंभ में नागा साधु के रूप में दीक्षा दी जाती है।

शुरुआत में संन्यास की दीक्षा गुरु के द्वारा दी जाती है। मंत्रोच्चार आदि से शरीर पर समस्त चीजों को धारण करवाया जाता है। इसके बाद विजय संस्कार संपन्न किया जाता है। विजय संस्कार में संन्यास लेने वाले व्यक्ति का पिंडदान और अन्य आहुतियाँ करवाकर उसे सांसारिक मोह-माया से काट दिया जाता है। आहूति दीक्षा मिलने के बाद नागा संन्यासी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

इस संस्कार के दौरान धर्म ध्वज के नीचे सभी साधुओं को एकत्रित किया जाता है और फिर नागा साधु की दीक्षा दी जाती है। इस दौरान एक अलग गुरु बनाया जाता है, जो दिगंबर होता है। इसके बाद अच्छे नागाओं की अखाड़ों में ड्यूटी लगाई जाती है। नागा संन्यासी आमतौर पर हाथ में त्रिशूल, तलवार, शंख लिए होते हैं और गले एवं शरीर में रुद्राक्ष आदि धारण करते हैं।

पश्चिम बंगाल में शॉल बेचते पकड़ा गया आतंकी जावेद मुंशी, नदी के रास्ते बांग्लादेश भागने की फिराक में था: पाकिस्तान में ली थी आतंक की तालीम, बम बनाने में है माहिर

पाकिस्तान में आतंकी ट्रेनिंग लेने वाला और जम्मू-कश्मीर में 2011 में एक मौलाना की हत्या में वांछित आतंकी जावेद मुंशी को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कैनिंग इलाके से गिरफ्तार किया गया। यह गिरफ्तारी जम्मू-कश्मीर पुलिस और पश्चिम बंगाल पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में हुई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-उल-मुजाहिदीन (TuM) का सदस्य जावेद मुंशी शॉल विक्रेता के तौर पर कैनिंग पहुँचा था। वह नदी के रास्ते से बांग्लादेश भागने की फिराक में था। पुलिस ने बताया कि हथियारों और विस्फोटक बनाने का विशेषज्ञ जावेद मुंशी लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के निर्देशों पर काम कर रहा था।

पुलिस ने रविवार (22 दिसंबर 2024) को जावेद मुंशी को गुलशन हाउस नाम के किराए के मकान से पकड़ा, जहाँ वह अपनी रिश्तेदार तबस्सुम बीवी और उसके शौहर गोलाम मोहम्मद के साथ रह रहा था। तबस्सुम ने बताया कि मुंशी उसकी बहन का शौहर है और वह पिछले 25 वर्षों से उनके परिवार का हिस्सा है।

मुंशी को कोलकाता की अलीपुर अदालत में पेश किया गया, जहाँ अदालत ने उसे जम्मू-कश्मीर पुलिस को ट्रांजिट रिमांड पर सौंप दिया। अब उसे श्रीनगर ले जाकर पूछताछ की जाएगी और उस पर UAPA के तहत मामला दर्ज होगा।

जाँच में पता चला कि जावेद मुंशी ने पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश की कई यात्राएँ की हैं और इसमें उसने फर्जी पाकिस्तानी पासपोर्ट का इस्तेमाल किया। वह पहले भी कई बार आतंकी गतिविधियों के चलते जेल जा चुका है।

बता दें कि 2011 में श्रीनगर में अहल-ए-हदीस के नेता शोकत अहमद शाह की हत्या में उसका नाम सामने आया था। उस समय एक साइकिल में लगे आईईडी विस्फोट में शाह की जान गई थी। इस घटना के बाद से ही वह फरार चल रहा था।

STF के अधिकारियों ने बताया कि मुंशी बांग्लादेश भागने की तैयारी कर रहा था, लेकिन कश्मीर पुलिस से मिली सटीक सूचना के आधार पर उसे समय रहते गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी गिरफ्तारी ने सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी राहत दी है।

मौलाना की बेटी ने 12 साल की उम्र में छोड़ा घर, बन गई शांति देवी: स्वामी श्रद्धानंद के अभियान से हिरोइन तबस्सुम की माँ ने खुद को किया ‘शुद्ध’, चिढ़ गए इस्लामी कट्टरपंथी

सदी भर पहले भारत में ‘शुद्धि अभियान’ चलाकर धर्मांतरित लोगों को वापस से हिंदू धर्म में लाने की शुरुआत करने वाले स्वामी श्रद्धानंद को कुछ समय बाद गुजरे हुए 100 साल बीत जाएँगे। स्वामी श्रद्धानंद ने अपना पूरा जीवन जिस तरह इस्लामी धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई थी उसके कारण उन्हें आज भी याद किया जाता है।

आज की स्थिति देख अंदाजा लगा सकते हैं कि उस दौर में इस्लामी ताकतों से लड़कर अपने धर्म की अलख जगाना कितना कठिन रहा होगा। ऐसा नहीं है कि उन्हें इस शुद्धि अभियान के कारण धमकियाँ नहीं आती थीं। 1915 में जब उन्होंने धर्म के प्रति लोगों को जगाना शुरू किया, उसकी के बाद से अक्सर इस्लामी ताकतें उन्हें अपने निशाने पर रखती थीं, लेकिन ये उनकी अपने धर्म के प्रति निष्ठा थी कि वो कभी पीछे नहीं हटे।

वैसे तो जाहिर है कि कई घटनाओं के कारण स्वामी श्रद्धानंद से कट्टरपंथी असुरक्षित महसूस करते होंगे, लेकिन एक घटना जिसका जिक्र बहुत कम सुनने को मिलता है आज हम उसे फिर साझा कर रहे हैं।

ये घटना टीवी जगत की जानी-मानी हस्ती तबस्सुम से जुड़ी है। तबस्सुम 80 के दशक में अपने शो ‘फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन’ के जरिए हर घर मशहूर हुई थी। 2022 में उनका निधन हुआ तो लोग उनकी आवाज और अंदाज को याद करने लगे। इसी दौरान उनके द्वारा बताई उनकी माँ की एक कहानी स्वराज्य पप सामने आई जिसके तार स्वामी श्रद्धानंद से जुड़े थे।

तबस्सुम और उनकी माँ अजहरी बेगम जो बाद में शांति देवी बनीं
(फोटो साभार: स्वराज्य)

दरअसल, तबस्सुम की माँ का नाम अजहरी बेगम था जो कि एक मौलाना ताज मोहम्मद की बेटी थीं। शुरुआत में उन्हें तालीम के नाम पर कुरान को पढ़ाया गया, लेकिन अजहरी बेगम के मन में न जाने क्या आई, उन्होंने हिंदू धर्म के ग्रंथों को जानने की इच्छा जताई।

बचपन में परिवार के साथ अजहरी बेगम की तस्वीर (फोटो साभार: )

अजहरी की बात सुन उनके घरवाले बहुत नाराज हुए। उन्होंने अजहरी को अपने मजहब की बातें बताने का प्रयास किया लेकिन वह हिंदू धर्म के बारे में जानने की ठान चुकीं थीं। 12 साल की उम्र में अजहरी ने अपना घर छोड़ा और स्वामी श्रद्धानंद तक जा पहुँचीं। शुद्धि अभियान के तहत अजहरी बेगम का मार्गदर्शन हुआ और उनको शांति देवी नाम दिया गया।

अजहरी के परिजनों को जब इस संबंध में पता चला तो सब के सब बौखला उठे। उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद के पास जाकर उन्हें कहा कि वो उनकी बेटी को लौटा दें। लेकिन स्वामी जी ने जवाब दिया कि कोई शांति देवी को बिना उनकी मर्जी से कहीं नहीं ले जा सकता। वहीं शांति देवी ने भी कहा कि वह वापस अपने घर नहीं लौटेंगी।

इस घटना के बाद इस्लामी कट्टरपंथी तिलमिला चुके थे। उन्होंने मौका देख स्वामी श्रद्धानंद के खिलाफ झूठा अपहरण का केस दर्ज करा दिया, लेकिन कोर्ट में आरोप सिद्ध नहीं कर पाए। 4 दिसंबर 1926 को वह हर आरोप से बरी हो गए और दोबारा अपने अभियान पर आगे बढ़े।

उनकी यह जीत इस्लामी कट्टरपंथी बर्दाश्त नहीं कर पाए। ख्वाजा हसन निजामी और अब्दुल बारी जैसे लेखक उनके खिलाफ अपने मजहब के लोगों को भड़काने लगे। नतीजन 23 दिसंबर 1926 को एक अब्दुल राशीद नाम पर इस्लामी कट्टरपंथी उनकी बीमार अवस्था का फायदा उठाकर घर में घुसा और उन्हें एक साथ तीन गोली मारी…।

बताया जाता है कि स्वामी श्रद्धानंद उस समय तक 60 हजार लोगों को घरवापसी करवा चुके थे। ये भी मालूम हो कि उनके धर्म के प्रति निष्ठा के कारण महात्मा गाँधी ने उनसे दूरी भी बना ली थी। वो उन्हें भड़काऊ भाषण देने वाला कहते थे और उनकी तुलना उस इस्लामी विचारधारा से करते थे जो हर किसी को धर्मातरित करके मुस्लिम बनाने की बात कहती है। इतना ही नहीं गाँधी ने स्वामी जी के हत्यारे को ‘भाई’ तक कहकर संबोधित किया था।