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कटी गर्दन हाथ में ले कर बनानी थी वीडियो, बाप खुश, बीवी खुश… लेकिन घृणा कौन फैला रहा? हिन्दू!

कमलेश तिवारी हत्याकांड की जितनी भी जानकारी सामने आ रही है वो बताती है कि मजहबी उन्माद किस स्तर तक उतर सकता है। कमलेश तिवारी ने जो कहा, वो कब और कहाँ कहा, इसकी किसी को पुख्ता जानकारी नहीं। उसने ऐसा क्यों कहा था, ये भी भुलाया जा चुका है। केस चला, जेल में रहे, बाहर आए, लेकिन वो नहीं भूले जिन्होंने पूरी दुनिया को एक झंडे के नीचे लाने का सपना पाल रखा है।

वो नहीं भूले जो बाजारों में फट जाते हैं। वो नहीं भूले जिन्हें कोई मुल्ला, कोई मौलवी, कोई मजहबी घृणा फैलाता, तसबीह फिराता उन्मादी यह कह कर उकसाता रहा कि कमलेश तिवारी की गर्दन ले कर आओ। और हाँ, जब वो कहते हैं कि गर्दन ले कर आओ तो इसका कोई सांकेतिक मतलब नहीं होता। मतलब सिर्फ और सिर्फ, शब्दशः बस एक ही होता है: कमलेश तिवारी की गर्दन उतार कर लाओ। मतलब यह कि गोली मार कर, जहर दे कर, गाड़ी से कुचल कर मारो या जैसे भी, लेकिन गर्दन ले कर आना है।

इसलिए अशफाक और मोइनुद्दीन जब कमलेश तिवारी को मारने चले तो रास्ते में नमाज पढ़ कर चले। उन्होंने कहीं भी अपनी पहचान नहीं छिपाई। मिठाई के डिब्बे में रसीद रखी, होटल में अपना नाम दिया। उन्होंने कबूला कि वो चाहते थे कि लोग जानें कि मारने वाला कौन है, किसी को किसी भी तरह का भ्रम न हो कि किसी गैर-मजहब वाले ने मारा। ये बात और है कि हत्या के बाद जब यही बात लोग ट्विटर पर लिख रहे थे तो आतंकियों के, नक्सिलियों के, हत्यारों के हिमायतियों ने लगातार पूछा कि इसे मजहबी रंग क्यों दिया जा रहा है।

इसकी मानसिकता में आप जाइए। पढ़े-लिखे लोग, इंतज़ार करते हैं, मृतक से बातचीत करते हैं, मित्रवत् रिश्ता बनाते हैं, और सबके अंत में एक ही मकसद: कमलेश तिवारी की गर्दन काटनी है। ये किसी व्यक्ति की सोच नहीं है, ये सामूहिक सोच है जो किसी व्यक्ति के माध्यम से फलित होती है। कमलेश तिवारी की हत्या अशफाक और मोइनुद्दीन ने ही नहीं, एक मजहब ने की है जो ऐसे लोगों को रोकना तो छोड़िए, उनकी निंदा तक नहीं कर पाता।

हर जगह मिली सहायता

इन्हें कैसे लोगों ने सहायता दी? इनके सहयोगियों में मुफ्ती हैं, मौलवी हैं, मुल्ला हैं और इन्हें मदरसों में छुपाया गया, इनके बाप को कहा गया कि उन्हें इधर बुला लो, बाकी हम देख लेंगे। इसके बाप को कोई गम नहीं कि उसके बेटे ने क्या किया है, वो बार-बार ‘अल्लाह अच्छा करेगा’ कह रहा है फोन पर। आप सोचिए कि ये कैसे बाप हैं जो बेटे द्वारा की गई हत्या पर खुश हैं और इस उम्मीद में हैं कि कोई मदद कर देगा। मतलब, बाप भी सहमत है कि जो किया अच्छा किया!

पत्नी का भी वही हाल है। ये कैसा परिवार है, ये कैसा तंत्र है जो इस तरह की हत्या को सहमति देता है? ये कैसा समाज है, ये कैसा समुदाय है जो ऐसी हत्या पर खुश होता है और हर जगह लिखता है कि जो हुआ, वो सही हुआ। फिर ध्यान में आता है अशफाक का कबूलनामा जहाँ वो स्वीकारता है कि उसकी योजना थी कि गर्दन काट कर अलग करे, उसे हाथ में ले, उसका विडियो बनाए और उसे वायरल करे ताकि लोगों को यह चेतावनी मिले कि वो ऐसी बातें न करें।

ये घृणा कोई एक दिन में नहीं उपजती, ये घृणा संकलित होती रहती है, रिस-रिस कर। ये घृणा बचपन से, शिक्षण संस्थानों से, घरों से, मजहबी स्थलों से, दोस्तों के दायरे से, बाप से, समाज से, सामुदायिक जलसों से, सड़कों पर बँधे लाउडस्पीकरों से भरी जाती है। इसलिए हत्यारे को इस बात का मलाल नहीं होता कि वो हत्या करने जा रहा है। इसलिए उसे तनिक भी हिचक नहीं होती जब वो कमलेश तिवारी का मुँह बंद करके, उसका गला रेतता है।

इसकी तैयारी कितनी सटीक रही होगी कि डेढ़ मिनट में ही वो सारे काम निपटा लेता है। चूँकि वो जानता है कि समय की कमी होगी, इसलिए उसने हलाल करने की बाकायदा प्रैक्टिस की होगी, कई जानवर काटे होंगे। मीडिया रिपोर्ट्स में तो ये भी कहा जा रहा है। छाती में सात बार हृदय वाली जगह पर छुरा मारना, ताकि उसे दर्द हो। चेहरे पर गोली मारना, सर में नहीं, ताकि वो महसूस कर सके।

और आपको लगता है कि ये एक व्यक्ति का काम है? जी नहीं, वो चाकू भले ही मोइनुद्दीन के हाथ में थी, लेकिन उसे चलाने की शक्ति, जो कि पसलियों में बार-बार फँस कर निकल रही होगी, वो शक्ति सामुदायिक थी। अशफाक की उँगली ट्रिगर पर थी, लेकिन उसे चलाने का बल टीवी कैमरे पर बोलती उन आवाजों का था जो हर दिन नए अशफाक पैदा कर रही है। आपको लगता है कि ऐसे कृत्यों को अंजाम देना इतना आसान है?

चुप लोगों से बचिए, इन्हें पहचानिए

नेता ने कहा था कि वो हत्या कर के आएँ तो सही, जमानत की जिम्मेदारी वो लेता है। उसका बाप कहता है कि बात हो गई है, वो घर आ जाए। ये किससे बात हो गई है अशफाक के बाप की? कौन हैं ये लोग जो ऐसे लोगों को बचाने के लिए ‘बात’ कर चुके होते हैं? कौन हैं ये लोग जो किसी को इतना दिलासा दे देते हैं कि वो हत्या करे, गर्दन काट ले, विडियो बना ले, वायरल करे, और फिर भी वो बचा लिया जाएगा?

ये एक तंत्र है जो बहुत अच्छे तरीके से काम करता है। दुर्भाग्य बस यही है कि बुद्धिजीवियों की भी सहमति है इन्हें क्योंकि ये लोग हिन्दुओं के खिलाफ हैं, उन्हीं हिन्दुओं के खिलाफ जो बाबरी जैसे धब्बे को मिटाना चाहता है अयोध्या के इतिहास से, उन्हीं हिन्दुओं को खिलाफ जिसने अपने मतलब की सरकार चुनी है। इसलिए आधे घंटे में कमलेश तिवारी की हत्या में निजी दुश्मनी, चंदे के बँटवारे को ले कर हुई अनबन, उनकी माताजी का बयान, और प्रेम प्रसंग तक हवा में तैरने लगता है।

इनसे हर जगह बच कर रहिए। अगर आप किसी को जानते हैं, जो सोशल मीडिया पर चुप है इस मुद्दे को ले कर, तो वो अशफाक और मोइनुद्दीन को मौन सहमति दे रहा है। जो इस पर चुप बैठे हैं, वो वही हैं जो अशफाक के विडियो के वायरल होने के इंतजार में बैठे थे। इसलिए, इनसे आपको हर कदम पर बचना होगा। ये वो बम हैं,जो फटे नहीं हैं लेकिन कोई मुफ्ती, मुल्ला, मौलवी इन्हें दो बार उकसा दे, तो ये मिठाई के डिब्बें में रसीद रख कर आपका सर उतारने निकल पड़ेंगे।

उन्मादियों से बचिए, उन्हें पहचानिए। हर व्यक्ति उन्मादी नहीं है, लेकिन जो भी ट्विटर के ट्रेंड में हिन्दुओं की घृणा तलाश लेता है, लेकिन कमलेश की गर्दन पर बारह इंच लम्बा और तीन इंच गहरा घाव नहीं देख पाता, वो पोटेंशियल जिहादी है। वो किसी दिन किसी बाजार में नारा-ए-लहसुन लगाते हुए फट जाएगा और आप कहेंगे कि ये तो आपका दोस्त था, बड़ा रिजर्व रहता था।

मैं ये नहीं कह रहा कि आप सबकी निशानदेही कीजिए, मैं ये कह रहा हूँ कि चुप लोगों को पहचानिए। सारे लोग ऐसे नहीं हैं, लेकिन जिन्हें ट्विटर के ट्रेंड में घृणा दिखती है, लेकिन अशफाक-मोइनुद्दीन पर वो चुप रहते हैं, तो उनसे दूर रहिए। इनसे डरिए और संभल कर रहिए। इनसे आत्मरक्षा के उपाय कीजिए, क्योंकि जब अशफाक पिस्तौल तानेगा, और मोइनुद्दीन छाती पर चाकू मारेगा, गला रेतेगा और गर्दन उतारने से पहले मोबाइल पर विडियो बनाएगा, तब आपका वही उपाय काम में आएगा।

इनसे मतलब मत रखिए, ऐसे लोग उन्मादी हैं जो किसी के सगे नहीं। लेकिन हाँ, सारे लोग ऐसे नहीं होते। मैं उन्हें तलाश रहा हूँ जो ऐसे नहीं हैं। मुझे मिले नहीं, ये और बात है। लेकिन, मैं दिल की अतल गहराइयों से ये पूरी तरह, जिम्मेदारी से, मानता हूँ कि किसी खास समुदाय के सारे लोग ऐसे नहीं होते। आप कितना भी कह लें, मैं नहीं मानता। मैं इसलिए नहीं मानता क्योंकि मेरा धर्म ऐसा कहता है।

कमलेश तिवारी के हत्यारों अशफाक, मोइनुद्दीन की गिरफ्तारी के बाद नावेद आया सामने, नेपाल पहुँचाने की थी जिम्मेदारी

कमलेश तिवारी हत्याकांड में अशफाक और मोइनुद्दीन की गिरफ्तारी के बाद नावेद एक नया नाम सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार नावेद पेशे से एक वकील है और लॉ स्टूडेंट भी। पूरी साजिश में नावेद ने ही दोनों हत्यारों को नेपाल पहुँचाने का प्लान था। बरेली में दरगाह के मौलाना सैय्यद कैफी अली की गिरफ्तारी के बाद नावेद को भी यूपी पुलिस और एटीएस ने लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अब अशफाक और मोइनुद्दीन का सामना नावेद से करवाया जाएगा और दोनों के बयान क्रॉस चेक होंगे। अभी तक मिली जानकारी के अनुसार नावेद पर दोनों हत्यारों को नेपाल तक पहुँचाने की योजना बनाने का आरोप है। इसके अलावा उसपर मौलाना कैफी के साथ मिलकर दोनों आरोपितों को पनाह देने और उनका इलाज करवाने का भी आरोप है।

यहाँ बता दें कि इस पूरे मामले के संबंध में पहले नागपुर से आसिम की गिरफ्तारी हुई थी। जिससे पूछताछ के बाद ही कैफी और नावेद भी पकड़ में आए। पुलिस ने मौलाना को गुरुवार को बरेली से गिरफ्तार किया था और अब नावेद की गिरफ्तारी भी हो गई है। इन दोनों के अलावा 2 अन्य लोगों के भी साजिश में शामिल होने की जानकारी मिली है। जिनके बारे में पुलिस पता लगा रही है।

गौरतलब है कि कमलेश तिवारी की हत्या करने के बाद फरार हुए दोनों आरोपितों को बरेली में मौलाना कैफी ने मदद दी थी। अशफाक और मोइनुद्दीन दोनों बरेली पहुँचकर तीन घंटे मौलाना के घर रुके थे, बाद में इनके रुकने का इंतजाम मदरसे में हुआ था। कैफी के निर्देश पर ही नावेद ने दोनों को नेपाल बॉर्डर तक पहुँचने में मदद की थी।

फिलहाल, इस पूरे हत्याकांड में ताजा अपडेट के लिए बता दें कि मोइनुद्दीन अहमद और अशफाक हुसैन पुलिस कस्टडी में रिमांड पर लखनऊ लाए गए हैं। गुरुवार (अक्टूबर 24, 2019) शाम को ही गुजरात से ट्रांजिट रिमांड पर लेकर दोनों आरोपियों को लखनऊ पहुँची पुलिस ने कोर्ट में पेश किया। जिसके बाद दोनों को कोर्ट ने 48 घंटे के पुलिस रिमांड पर भेज दिया। दोनों 25 अक्टूबर सुबह 10 बजे से 27 अक्टूबर सुबह 10 बजे तक रिमांड पर रहेंगे।

शरद पवार के गढ़ में लहराया परचम: मिलिए BJP के उस विधायक से जिसके पिता ने मजदूरी कर इंजीनियरिंग पढ़ाई

महाराष्ट्र के चुनावी नतीजे न केवल सूबे के मौजूदा पीढ़ी के नेताओं, जैसे देवेंद्र फडणवीस, उद्धव ठाकरे, अजित पवार, राज ठाकरे, और शरद पवार जैसे पुराने क्षत्रपों का समर साबित हुआ, बल्कि इनमें कई नई पीढ़ी के नेता भी उभर कर आए हैं। सबसे चर्चित युवा प्रत्याशियों में ठाकरे खानदान के चश्मों-चिराग आदित्य ठाकरे हैं, जो न केवल शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के बेटे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुखिया राज ठाकरे के बेटे हैं, बल्कि अपने परिवार के पहले जनप्रतिनिधि भी। इसके अलावा शरद पवार के पोते रोहित पवार ने भी काफ़ी सुर्खियाँ बटोरीं।

लेकिन इस बीच एक चेहरा छिप गया- मिल मजदूर पिता के बेटे राम सतपुते का, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना पहला ही चुनाव राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) के गढ़ मालशिरस में जीता है। सतपुते लम्बे अरसे तक संघ के अनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के भी सदस्य रहे हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है।

अष्टी इलाके के निवासी सतपुते एबीवीपी में प्रदेश मंत्री के पद पर भी काम कर चुके हैं। बाद में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा में शामिल हो गए, तो वहाँ भी उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर आसीन कर दिया गया। माना जाता है कि वे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खासे करीबी हैं। उनके पिता विट्ठल सतपुते चीनी मिल में मजदूरी करते थे।

राम सतपुते को पहले ही विधानसभा चुनाव में टिकट मालशिरस का मिला, जिसे राकांपा का गढ़ और भगवा खेमे के लिए टेढ़ी खीर माना जाता है। और इन चुनावों में एनसीपी सबसे बड़ी विजेता बनकर उभरी भी है। उसने अपने विधायकों की संख्या में 13 की बढ़ोतरी की है, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन में भाजपा और शिवसेना को मिलाकर कुल 24 सीटों का घाटा हुआ है। ऐसे में सतपुते की इस जीत के मायने अहम हैं।

हालाँकि एनसीपी के उत्तमराव शिवदास जानकर ने सतपुते को कड़ी टक्कर दी- दोनों को ही एक लाख से ज्यादा वोट मिले और वोट % का अंतर महज़ 1% रहा, लेकिन अंततः सतपुते बाजी मारने में सफल रहे।

पहले यह सीट पर भाजपा की सहयोगी रामदास आठवले की पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) का उम्मीदवार उतरना था, लेकिन भाजपा प्रत्याशी राम सतपुते का नाम प्रस्तावित होने पर आरपीआई भी राज़ी हो गई। और राकांपा के गढ़ में सेंध लगाकर सतपुते ने भी साबित कर दिया कि उन पर दाँव लगाकर पार्टी नेतृत्व ने कोई भूल नहीं की थी।

कश्मीर के स्कूली बच्चों में कट्टर सोच भरने की फिराक में आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी: खुफिया एजेंसी

जम्मू-कश्मीर में अब आतंकवादी संगठन स्कूली बच्चों को मोहरा बनाने की फिराक में है। इंटेलिजेंस एजेंसियों ने इस बारे में सुरक्षाबलों को अलर्ट किया है। खुफिया एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों को सूचित किया है कि आतंकवादी घाटी में स्कूली बच्चों को कट्टरपंथी बनाने के लिए जमात-ए-इस्लामी जैसे प्रतिबंधित संगठनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इंटेलिजेंस इनपुट्स के मुताबिक आतंकी संगठनों ने कश्मीर में स्कूली बच्चों के जेहन में कट्टर सोच भरने का खाका तैयार किया है। ऐसी रिपोर्ट हैं कि आतंकी संगठन इस खुराफात के लिए प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी को आगे कर रहे हैं। जमात-ए-इस्लामी घाटी में स्कूली बच्चों में कट्टर सोच भरने का जिम्मा सौंपा गया है। 

आतंकवादी संगठन स्कूली बच्चों को कट्टरपंथी बनाने और एक समानांतर स्कूली शिक्षा प्रणाली शुरू करने के लिए इस संगठन के कैडर का उपयोग कर रहे हैं। ऐसी खबरें हैं कि जमात-ए-इस्लामी कश्मीर में स्थानीय स्तर पर एक समानांतर स्कूली शिक्षा प्रणाली स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों में सरकार विरोधी नैरेटिव फैलाना और बच्चों में नफरत भरना है।

आतंकी संगठनों की एक तरफ ये रणनीति है तो दूसरी ओर घाटी में पहले से चल रही स्कूली व्यवस्था को निशाना बनाने की कोशिश भी की जा रही है। हाल ही में आतंकवादियों ने चावलगाम में एक स्कूल की इमारत को जलाने की कोशिश की। वहीं आतंकवादी संगठन और भी सरकारी स्कूलों को निशाना बनाने की योजना बना रहे हैं।

दरअसल ये आतंकी संगठन स्कूलों पर हमला करके बच्चों के अभिभावकों के दिलों में दहशत भरना चाहते हैं। जिससे कि वो अपने बच्चों को इन स्कूलों से निकाल कर जमात-ए-इस्लामी द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में भेजने के लिए मजबूर हो जाएँ।

उल्लेखनीय है कि केंद्र ने मार्च में जमात-ए-इस्लामी जम्मू और कश्मीर पर पाँच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया। इसमें कहा गया था कि संगठन उग्रवादी संगठनों के साथ घनिष्ठ संपर्क में था। जमात-ए-इस्लामी को आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित किया गया था, जिसका उद्देश्य राज्य में किसी भी अलगाववादी गतिविधि को बढ़ने से रोकना है।

क़बूलनामा: कमलेश तिवारी के सिर को धड़ से अलग कर बनाना चाहते थे वीडियो, हत्या से पहले पढ़ी थी नमाज़

हिन्दू महासभा के पूर्व अध्यक्ष और हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष रहे कमलेश तिवारी की हत्या के मुख्य आरोपित अशफ़ाक़ और मोइनुद्दीन को गुरुवार (24 अक्टूबर) को मुख्य न्यायायिक मजिस्ट्रेट सुदेश कुमार के आदेश पर दो दिन के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया। क़रीब छ: घंटे तक चली पुलिस पूछताछ में हत्यारों ने अपने ज़ुर्म पर बिना किसी ख़ौफ़ के बयान दिया। उन्होंने बताया कि शुक्रवार (18 अक्टूबर) को सुबह क़रीब 10:30 बजे जब वो हत्या के मक़सद से भगवा कपड़े पहनकर खुर्शीदाबाद के लिए निकले थे, तो रास्ते में दरगाह में उन्होंने नामज़ पढ़ी थी।

इसके आगे उन्होंने बताया कि कमलेश तिवारी के कार्यालय का पता पूछते-पूछते वो आगे बढ़े। रास्ते में उन्हें लाल कपड़े पहने महिला मिली जिससे दोनों ने तिवारी का पता पूछा। भगवा कपड़े देखकर महिला को भ्रम हो गया और उसने कहा कि चलो मेरे साथ चुनाव प्रचार करो। महिला ने ख़ुद को अल्पसंख्यक मोर्चा का पदाधिकारी बताया था।

महज़ डेढ़ मिनट के अंदर हत्या की इस वारदात को अंजाम देने वाले आरोपितों ने अपना ज़ुर्म क़बूलते हुए कि वो लोग कमलेश तिवारी का सिर धड़ से अलग करना चाहते थे। इसके बाद सिर को हाथ में लेकर वीडियो बनाकर दहशत फैलाना चाहते थे। ऐसा करके वो लोगों को चेताना चाहते थे कि अब कोई धार्मिक विवादित टिप्पणी न करे। लेकिन, वहाँ घायल होने और पकड़े जाने के डर से वो कमलेश तिवारी का गला पूरी तरह से नहीं रेत पाए थे।   

आरोपित चाहते थे कि उनका नाम सामने आए, गर्दन पर सामने से किया था वार

अशफ़ाक़ ने बताया कि कमलेश के कार्यालय में पहुँचने पर उन्होंने देखा कि नीचे उनका गार्ड सो रहा था। नीचे कोई नहीं था, वो जीना चढ़ने लगे। कमलेश ने अपने कर्मचारी सौराष्ट्र को बता रखा था कि, कुछ मेहमान आने वाले हैं। इसलिए सौराष्ट्र ने उन्हें नहीं रोका। आरोपितों ने इस बात को नकारा है कि वे पिस्टल व चाकू मिठाई के डिब्बे में लेकर आए थे। उन्होंने बताया कि अशफ़ाक़ के पास पिस्टल थी, जबकि दोनों चाकू पैंट में रख रखा था। आधा किलो वाले मिठाई के डिब्बे में सिर्फ़ रसीद थी। इसकी वजह थी कि वो ख़ुद चाहते थे कि जाँच में उनका नाम सामने आए। इसीलिए दोनों हर जगह असली आईडी लगा रहे थे और सबूत छोड़ते हुए जा रहे थे।

अशफ़ाक़ ने बताया कि गोली उसे ही चलानी थी। इसलिए जब हमला किया तो उन्हें अचेत करने के लिए चाकू से गर्दन पर सामने की तरफ़ से सीधा वार किया। इस हमले से तिवारी की धीमी सी आवाज़ निकली, इसके बाद मोइनुद्दीन ने तिवारी का मुँह दबाया और अशफ़ाक़ ने गोली चलाई। यह गोली मोइनुद्दीन के हाथ से होकर गुज़री और फिर कमलेश तिवारी को लगी। इस दौरान तिवारी का गला भी रेता गया, इससे मोईनुद्दीन का हाथ भी छिल गया।

चोट लगी होने की वजह से दोनों लोगों ने चोटिल हाथ को जेब में डाला और चौराहे की तरफ भाग निकले। चौराहे पर ही एक मेडिकल स्टोर से अशफ़ाक़ ने डेटॉल, मरहम-पट्टी ख़रीदी। यहाँ से होटल गए और कपड़े बदल कर 16 मिनट में ‘चेक-आउट’ किए बिना बाहर आ गए।

कमलेश तिवारी के फोन पर बात करने से भी थे खफ़ा

आरोपितों ने बताया कि जब वो कमलेश से मिलने कमरे में गए तो वह उनसे ठीक से बात नहीं कर पा रहे थे। वे लोग बात शुरू करते, तो बीच में ही कभी किसी का फोन आ जाता, तो कभी वो किसी से बात करने लगते थे। बीच-बीच में कई बार कमलेश तिवारी ने उन्हें कहा कि काम बहुत बढ़ गया है। पार्टी का बड़ा सम्मेलन करना है। उनकी इस बात से आरोपित झुँझला भी रहे थे।

कुल चार लोग थे निशाने पर

अशफ़ाक़ ने बताया कि हिन्दू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी के अलावा यूपी अध्यक्ष गौरव गोस्वामी, सूरत के ही एक नेता और लखनऊ में विवादित बयान देने वाले उसके सम्प्रदाय के ही एक व्यक्ति निशाने पर थे।

2-2 बार सीएम को धूल चटाई, राहुल गाँधी के करीब आते ही 10 महीने में 2 बार हारे

कॉन्ग्रेसी हर वक्त गॉंधी परिवार और उसके युवराज राहुल गॉंधी की करीबी हासिल करने के तीन-तिकड़म में लगे रहते हैं। सोनिया गॉंधी जब से पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनीं हैं, तब से राहुल के करीबियों को किनारे किए जाने की चर्चा भी जोरों पर है। लेकिन, राहुल से करीबी होने की कीमत क्या होती है, रणदीप सिंह सुरजेवाला से बेहतर कॉन्ग्रेस में शायद ही कोई जानता हो।

कभी ​हरियाणा के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर देखे जाने वाले ‘जाइंट किलर’ सुरजेवाला 10 महीनों के भीतर दूसरी बार चुनाव हारे हैं। जनवरी में जींद उपचुनाव में वे तीसरे नंबर पर रहे तो अब कैथल की विधायकी हाथ ​से निकल गई है। चुनावी मैदान में उनका ग्राफ कॉन्ग्रेस प्रवक्ता बनने के बाद से गिरा है। यह जिम्मेदारी दिसंबर 2017 में पार्टी का अध्यक्ष बनते ही राहुल गॉंधी ने उन्हें थमाई थी। पार्टी के कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट का मुखिया भी बनाया। लेकिन, इससे सुरजेवाला की वो जमीन ही गायब हो गई जिसकी वजह से वे राहुल की नजरों में चढ़े थे। जिससे राहुल के करीबी होने का सुख मिला था।

सुरजेवाला को राजनीति विरासत में मिली है। पिता शमशेर सिंह सुरजेवाला हरियाणा में मंत्री और कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। इसलिए, उन्होंने राजनीति के गुर तेजी से सीखे। 17 साल की उम्र में रणदीप हरियाणा प्रदेश युवा कॉन्ग्रेस के महासचिव बन गए थे। 21 की उम्र में बतौर वकील प्रैक्टिस शुरू की। 1987 से 1990 के बीच पिता के साथ रह सांगठनिक काम सीखा, जो उस समय हरियाणा कॉन्ग्रेस के मुखिया थे। मार्च 2000 में वे युवक कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। इस पद पर पहुॅंचने वाले वे हरियाणा से पहले शख्स थे। वे फरवरी 2005 तक युवक कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे। यह इसके इतिहास का सबसे लंबा कार्यकाल है।

दिसंबर 2004 में रणदीप सुरजेवाला हरियाणा कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने 67 सीटें हासिल कर राज्य की सत्ता में वापसी की। इसके बाद सुरजेवाला भी करीब 10 साल तक हुड्डा के कैबिनेट में बने रहे। 2014 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की करारी शिकस्त के बावजूद सुरजेवाला नहीं हारे।

राष्ट्रीय स्तर पर सुरजेवाला को सुर्खी 1996 और 2005 के हरियाणा विधानसभा चुनाव से मिली। दोनों बार उन्होंने ओम प्रकाश चौटाला को पटखनी दी। दिलचस्प ये है कि दोनों बार चौटाला बतौर मुख्यमंत्री चुनाव लड़ रहे थे। इन्हीं नतीजों की वजह से उन्होंने जाइंट किलर के तौर पर सुर्खियॉं बटोरी और राजनीतिक विश्लेषक उनमें भविष्य का सीएम देखने लगे। ऐसे में राहुल गॉंधी ने जब उन्हें अपनी टीम में शामिल किया तो माना गया कि हरियाणा कॉन्ग्रेस के वे ही भविष्य हैं। लेकिन, समय का पहिया ऐसा घूमा कि इस बार सुरजेवाला उस कैथल से हार गए, जिस सीट पर 2005 से ही उनके परिवार का कब्जा था।

रणदीप सुरजेवाला अक्सर बताया करते हैं कि कैसे राजीव गॉंधी ने उनकी जान बचाई थी। बकौल सुरजेवाला- एक बार वे हैपेटाइटिस बी के चलते कोमा जैसी स्थिति में पहुँच गए थे। पीजीआई चंडीगढ़ के डॉक्टरों को एक इंजेक्शन की जरूरत थी जो उस समय इंग्लैड में ही मिलता था। ऐसे वक्त में राजीव गॉंधी ने अपने एक पायलट दोस्त से बात की और इंग्लैंड से इंजेक्शन मॅंगाया गया। सो, इस बात की उम्मीद रखनी भी नहीं चाहिए कि सौम्य और मृदुभाषी सुरजेवाला कभी उस टीस को बयॉं करेंगे जो उन्होंने राहुल गॉंधी की नजदीकियों से हासिल किया। भले ही वे चुप रहें, लेकिन सोशल मीडिया में ऐसी प्रतिक्रियाओं की भरमार है, जिनमें कहा गया है कि महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव से राहुल गॉंधी के दूर रहने के कारण ही कॉन्ग्रेस की स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है। अब देखना है कि सुरजेवाला अपनी मुक्ति का मार्ग कैसे तलाशते हैं!

पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर फहराएँगे तिरंगा: केंद्रीय मंत्री का बयान

जम्मू-कश्मीर में बनी चेनानी-नाश्री सुरंग का नाम कश्मीर में बलिदान देने वाले जनसंघ के बड़े नेता रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रख दिया गया। इस कार्यक्रम में अध्यक्ष के तौर पर पहुँचे केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने शिरकत की। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में कहा, “हमें प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर पूरा भरोसा है। वह दिन दूर नहीं जब पीओके में भी तिरंगा (या निशान) फहराया जाएगा, वही निशान जिसके चलते श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी जान दी थी।”

चेनानी से नाश्री तक के बीच बनी जिस सुरंग के कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह शामिल हुए, पीएम मोदी ने उसका उद्घाटन साल 2017 में ही कर दिया था। केन्द्रीय मंत्री ने बताया कि उस वक़्त किन्ही कारणों के चलते इसका नामकरण श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर नहीं हो पाया था। मोदी सरकार में सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को इसका श्रेय देते हुए उन्होंने कहा, “सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जी ने हमारे इस प्रस्ताव पर बिना समय गँवाए मंज़ूरी दे दी, जिसके लिए हम उनके कृतज्ञ हैं।”

उन्होंने इस टनल का नाम श्यामा प्रसाद मुखेर्जी के नाम पर रखने को लेकर बताया बताया कि आज से 66 साल पहले, 11 मई 1953 को लखनपुर में बिना किसी एफआईआर, चार्जशीट या फिर चेतावनी के बगैर श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें इसी चेनानी-नाश्री रोड के ज़रिये ले जाया गया। 23 जून 1953 को उनकी मृत्यु के बाद उनकी माँ ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को पत्र लिखा मगर उन्होंने इस पर कोई ध्यान तक नहीं दिया।

“न ही इस मामले में कोई इन्क्वायरी हुई। मगर अब नया दौर है, तब नेहरुजी की सरकार थी, आज मोदीजी की सरकार है। यद्यपि उस जाँच की भरपाई तो नहीं हो सकती मगर आने वाली पीढ़ी के लिए यह श्रद्धांजलि उनकी विरासत को संरक्षित करने का काम करेगी। पंडित नेहरु की सरकार द्वारा की गई गलतियों का प्रायश्चित अब मोदी सरकार कर रही है।” बता दें कि इस टनल को मुखर्जी के नाम पर करने का फैसला कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के दो महीने बाद आया है।

हाल ही में पीओके में तिरंगा फहराने वाला केन्द्रीय मंत्री का बयान इस बात की पुष्टि करता है कि पीओके पर कही गई अपनी बातों पर वे पहले की ही तरह पूर्णतः अडिग हैं। उन्होंने कहा कि कश्मीर के महाराज हरि सिंह के भारत में विलय होने के फैसले के बाद वहाँ यथास्थिति बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 370 को संविधान में जोड़ा गया था।
महाराजा हरि सिंह की जन्मजयन्ती पर एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 370 को हटा देने से राज्य के आम नागरिकों को काफी फायदा होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि अब वह दिन दूर नहीं जब पीओके यानी पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग होगा।

बता दें कि 2600 करोड़ रूपए की लागत से बनकर तैयार हुई 9 किलोमीटर लम्बी श्यामा प्रसाद मुख़र्जी टनल में 9.35 मीटर कैरेजवे है और इसमें दोनो ओर 5 मीटर की चढ़ाई वाली निकासी है। इस टनल के समनान्तार एक और टनल आपात स्थति के लिए बनाई गई है जिसे हर 300 मीटर पर इसके साथ जोड़ा गया है। इस टनल के होने से सबसे बड़ी सुविधा होगी कि जम्मू और उधमपुर से रामबान, बानिहाल और श्रीनगर की और जाने वाले लोग अपने सफ़र में अब तकरीबन दो घंटे का समय बचा सकेंगे। यह टनल सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस है जहाँ सर्विलांस, अग्नि-शमन से लेकर प्रसारण प्रणाली और यातायात नियंत्रण तक की सुविधा दी गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस टनल में हर 150 मीटर की दूरी पर SOS की सुविधा दी गई है।

UP में BJP की साजिश और हरियाणा में कॉन्ग्रेस के दुष्प्रचार से बसपा एक भी सीट नहीं जीती: मायावती

उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे आ गए हैं। बीजेपी ने 11 में से 8 सीटों पर जीत दर्ज की है। वहीं समाजवादी पार्टी ने 3 सीटों पर जीत हासिल की है। बसपा और कॉन्ग्रेस का खाता भी नहीं खुला। बसपा को इस चुनाव में करारी हार मिली है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस हार का ठीकरा भारतीय जनता पार्टी के सिर पर फोड़ा। मायावती ने यूपी में अपनी पार्टी की हार को छिपाने के लिए BJP पर आरोप लगाते हुए ट्वीट किया।

उन्होंने ट्वीट में लिखा कि यूपी विधानसभा आमचुनाव से पहले बीएसपी के लोगों का मनोबल गिराने के षडयंत्र के तहत बीजेपी द्वारा इस उपचुनाव में सपा की कुछ सीटें जिताने और बीएसपी को एक भी सीट नहीं जीतने देने को पार्टी के लोग अच्छी तरह से समझ रहे हैं। वे इनके इस षडयंत्र को फेल करने के लिए पूरे जी-जान से जरूर जुटेंगे। मायावती ने इसे बीजेपी की साजिश बताई है।

वहीं बसपा सुप्रीमो ने हरियाणा में मिली शिकस्त का इल्जाम कॉन्ग्रेस पर लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने अपने स्वार्थ के लिए मत विभाजन के भय का खूब प्रचार किया जिससे बसपा के परम्परागत वोटरों पर कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन अन्य मतदाता जरूर भ्रमित हो गए। मायावती ने ट्वीट कर यह कहने की कोशिश की कि कॉन्ग्रेस के झूठे प्रचार करके लोगों को बरगलाया इसीलिए कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन पिछली बार से अच्छा रहा।

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “हरियाणा की जनता भी बीजेपी सरकार के कुशासन से काफी दुःखी व त्रस्त थी और इनसे मुक्ति चाहती थी। लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने स्वार्थ के लिए जनता में वोटों के बँटने के भय को खूब प्रचारित किया। इससे बीएसपी के समर्पित वोटर तो कतई नहीं डिगे परन्तु अन्य वोटर जरूर भ्रमित हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि बीएसपी इस बार हरियाणा विधानसभा आमचुनाव में सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी, हालाँकि बीएसपी को पिछली बार से ज्यादा वोट मिले हैं।”

गौरतलब है कि हरियाणा चुनाव में हरियाणा विधानसभा चुनाव में किसी की पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। लेकिन 40 सीटें जीतकर बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है। कॉन्ग्रेस को 31 सीटों पर सफलता हासिल हुई। 

महाराष्ट्र नतीजे: शिव सेना दिखा रही तेवर, गठबंधन पर बादल, बागी समर्थन तलाश रहे फडणवीस

कल (गुरुवार, 24 अक्टूबर, 2019 को) पहले रुझान आने पर बैकफुट पर जाते दिख रहे हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जहाँ 24 घंटे बाद सरकार बनाने को लेकर लगभग आश्वस्त दिख रहे हैं, वहीं महाराष्ट्र में आसान लगने वाली राज्य के निवर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की राह रातों-रात मुश्किल हो गई है।

कल ही महाराष्ट्र में भाजपा सरकार के लिए मुश्किलें तब दिखनीं शुरू हो गईं थीं जब पता चला कि कद्दावर भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रहे गोपीनाथ मुंडे की विरासत और विधानसभा सीट फडणवीस सरकार की मंत्री रहीं पंकजा मुंडे के हाथ से छिटक कर उनके चचेरे भाई धनंजय मुंडे के हाथ में चली गई है। राज्य की फडणवीस सरकार के कुल 8 मंत्री विधानसभा लौटने का जनादेश पाने में नाकाम रहे हैं। इसके अलावा फडणवीस के खुद के ‘घर’ और गढ़, और भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दुर्ग, नागपुर में भी भाजपा को लगभग आधी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था।

हालाँकि, अगर आँकड़ों में देखें तो अभी भी भाजपा और शिवसेना का गठबंधन बड़े आराम से बहुमत के लिए ज़रूरी 145 के आँकड़े के पार दिख रहा है, लेकिन शिवसेना ने साफ़ कर दिया है कि वह भाजपा से और दबने वाली नहीं है।

शिव सेना के मुखपत्र सामना में आज के सम्पादकीय में विधानसभा नतीजों की जो समीक्षा है, उससे दिवंगत बाला साहेब ठाकरे और उद्धव ठाकरे की भगवा पार्टी का रुख स्पष्ट है। सामना के मुताबिक यह जनादेश कोई “महा जनादेश” नहीं है। यह उनके लिए सबक है जो “सत्ता की मद में चूर” हैं। सामना में शिव सेना ने यह भी कहा है कि इस जनादेश ने वह ग़लतफ़हमी भी दूर कर दी कि चुनाव जीतने का रास्ता दल बदल की इंजीनियरिंग करना और विपक्षी पार्टियों को तोड़ना है।

एक तरफ उद्धव ठाकरे भाजपा पर दूसरे दलों में दल बदल कराने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देवेंद्र फडणवीस चुनावी नतीजों का ठीकरा भाजपा के ही बागियों के सर फोड़ने में जुटे हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने उनके हवाले से दावा किया है कि भाजपा और गठबंधन को नुकसान कॉन्ग्रेस और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के विपक्षी गठबंधन यूपीए से कम हुआ है, अपने बागियों के चलते अधिक हुआ है।

उनका दावा है कि 15 बागियों से वह बातचीत कर रहे हैं, और उन्हें वे जल्दी ही भगवा खेमे में लौटा लाएँगे। अगर वे ऐसा कर ले जाते हैं, तो न केवल भाजपा की शिव सेना पर निर्भरता घट जाएगी, बल्कि शिव सेना के लिए उस समय गठबंधन छोड़ने का औचित्य समझाना मुश्किल हो जाएगा जब बागी भी भाजपा में लौटने लगे हैं।

हत्यारे अशफाक का ऑडियो सुनिए, क़त्ल के बाद भी बाप-बीवी को गम नहीं, कहा ‘अल्लाह अच्छा करेगा तेरा’

कमलेश तिवारी हत्याकांड में हत्यारोपित अशफाक का उसकी बीवी के साथ बात करते हुए ऑडियो वायरल हुआ है। हालाँकि, इस ऑडियो वायरल की खबर पहले भी मीडिया में आ चुकी है, लेकिन उस समय इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं हो पाई थी।

इस ऑडियो में अशफाक को उसकी बीवी और पिता से बात करते हुए स्पष्ट सुना जा सकता है। जिससे पता चलता है कि मामले की पूरी जानकारी होने के बाद भी अशफाक की बीवी और पिता उसका साथ देने को हर तरह से तैयार थे।

इस ऑडियो में हत्यारे के पिता-बीवी दोनों लगातार अशफाक से गुजरात आने की गुजारिश करते सुनाई पड़ रहे हैं। लेकिन अशफाक कह रहा है कि गुजरात आना उसके लिए पॉसिबल नहीं हैं।

ऑडियो में हुई बातचीत के अंश-

अशफाक की पत्नी- हेलो
अशफाक- अस्सलाम वालेकुम!
पत्नी- वालेकुम अस्सलाम….कहाँ हो मेरी जान कहाँ हो?
अशफाक- हम लोग कल लखनऊ पहुँच जाएँगे…पापा को बोल दो।
पत्नी- लेकिन तुम वहाँ क्यों जा रहे हो? यहाँ आ जाओ न।
अशफाक- वहाँ जाना पड़ेगा।
बीवी- हाँ तो ठीक है न हम यहाँ से प्रोसेस करेंगे तुम्हारे लिए, तुम प्लीज यहाँ आ जाओ न
अशफाक- पॉसिबल ही नहीं है… पापा है?
बीवी- क्यों नहीं है पॉसिबल? हाँ है पापा… बात करोगे? लो बात करो।
पिता- अस्सलाम वालेकुम बेटा!
अशफाक-वालेकुम अस्सलाम!
पिता- बेटा तू यहाँ कुछ भी करके आजा… अल्लाह अच्छा करेगा, तेरा भी अच्छा करेगा, तू नहीं आ सकता तो हमे बोल दे… हम आकर ले जाएँगे तुझे।
अशफाक- हाँ तो, हम लोग अभी शाहजहाँपुर जा रहे हैं, वहाँ से कल हम लोग लखनऊ जाएँगे।
पिता- न बेटा, वहाँ मत जाओ बेटा। इस तरफ आ जाओ। उन लोगों ने हमको बोला है बेटा। हम अहमदाबाद उनके यहाँ हो आए हैं। खाली उन्होंने बोला तू यहाँ आजा।
अशफाक- किसके यहाँ?
पिता- एसटी… एटी… (लड़खड़ाते हुए… पीछे से बीवी बोलती है एटीएस)… हाँ बेटा सब प्रोसिजर कर आए। तू चालू रख।
बीवी- हेलो
अशफाक-बाद में फोन करता हूँ, ये दूसरे का फोन है।
बीवी- करोगे न फोन?
अशफाक- हाँ
बीवी- तुम अच्छे हो न?

अशफाक- हाँ, अल्लाह का शुक्र है।

यहाँ बता दें कि हत्या को अंजाम देने के बाद अशफाक का ये ऑडियो उसके और उसकी बीवी के बीच हुई बातचीत का एक छोटा-सा अंश है। हत्याकांड की जाँच में जुटे पुलिस अधिकारियों ने खुलासा किया है कि अशफाक लगातार अपने घरवालों से अलग-अलग नंबरों से बात कर रहा था। जिसके कारण ही गुजरात एटीएस ने उसकी पत्नी का फोन सर्विलांस पर लगवा दिया था और लगातार उसकी कॉल डिटेल्स चेक की जा रही थी। अशफाक के घरवालों को मुठभेड़ के नाम से डराया गया था। जिसके बाद उसके पिता और बीवी ने अशफाक का फोन आते ही उससे गुजरात आने की गुजारिश की।

ऑडियो में कई बार ‘प्लीज’ शब्द को सुना जा सकता है, जिससे पता चलता है कि अशफाक की करतूत सामने आने के बाद भी उसके पिता-बीवी का मोह उससे नहीं छूटा था। वे उसे सब ठीक कर देने के नाम का लगातार आश्वासन दे रहे थे और बता रहे थे कि उन दोनों को यूपी में खतरा है।

इस पूरी ऑडियो को आप नीचे यूट्यूब लिंक पर क्लिक करके सुन सकते हैं: