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PM इमरान ख़ान नियाज़ी! 1947 से 71 और 2019 तक आपके 16 गुनाह: महिला IFS अधिकारी ने धो डाला

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में दिए गए भड़काऊ भाषण का भारत ने करारा जवाब दिया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इमरान ख़ान के दिए गए भाषण को हेट स्पीच करार देते हुए कहा कि उन्होंने वैश्विक मंच का दुरुपयोग कर दुनिया को गुमराह करने का काम किया है। भारत ने इमरान के ‘नस्लीय संहार’ ‘ब्लड बाथ’ ‘नस्लीय सर्वोच्चता’ ‘बंदूकें उठा लो’, ‘आख़िर तक लड़ेंगे’ जैसे शब्दों को गिनाते हुए कहा कि यह उनकी मानसिकता को उजागर करता है।

इमरान खान के भाषण पर भारत का जवाब

विदेश मंत्रालय की प्रथम सचिव (फर्स्ट सेक्रेटरी) विदिशा मैत्रा ने सवाल किया कि क्या पाकिस्तान यह स्वीकार करेगा कि वो दुनिया की एकमात्र सरकार है, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित सूची में सूचीबद्ध अल-क़ायदा और दाएश के आतंकियों को पेंशन प्रदान करता है? पिछले हफ्ते पाकिस्तान ने मुंबई में हुए 26/11 आतंकी हमले के आरोपी हाफ़िज़ सईद को मासिक पेंशन जारी करने की अनुमति देने के लिए UNSC में गुहार लगाई थी।

मैत्रा ने सवाल किया कि क्या पाकिस्तान इस बात से इनकार कर सकता है कि वो संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादियों का घर है? उन्होंने कहा,“क्या पाकिस्तान के पीएम इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि उनका देश संयुक्त राष्ट्र द्वारा सूचीबद्ध 130 आतंकवादी और 25 आतंकवादी संस्थाओं की शरणस्थली है?”

सचिव विदिशा ने सवाल किया कि क्या पाकिस्तान इस बात से इनकार करेगा कि 27 में से 20 पैरामीटर्स के उल्लंघन के चलते फाइनेंशियल एक्शन टॉस्क फ़ोर्स ने उसे नोटिस दे रखा है? क्या पीएम इमरान ख़ान न्यू यॉर्क शहर से इनकार करेंगे कि वो ओसामा बिन लादेन का खुले तौर पर बचाव करते रहे हैं?

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने पाकिस्तान पर एक के बाद एक कई सवाल दागे और कहा कि इमरान ख़ान अपने झूठ से मानवाधिकारों का चैंपियन बनना चाहते हैं, जबकि असलियत यह है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय पर आए दिन अत्याचार हो रहे हैं। विदिशा मैत्रा ने कहा कि पीएम इमरान ख़ान नियाज़ी को यह नहीं भूलना चाहिए कि 1971 में पाकिस्तान ने अपने ही लोगों पर ज़ुल्म ढाए थे और इस वजह से बांग्लादेश का जन्म हुआ था। विदिशा ने कहा कि पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय 1947 में 23% से घटकर अब 3% तक रह गया है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में ईसाई, सिख, अहमदिया, हिन्दू, शिया, पश्तून, सिंधी और बलूचों पर ईश निंदा क़ानून के तहत अत्याचार किया जाता है। वहाँ लोग जबरन धर्मांतरण के शिकार हो रहे हैं।

मैत्रा ने कहा, “किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जो कभी क्रिकेटर था और जेंटलमैन के खेल में विश्वास रखता था, उसका आज का भाषण दारा आदम खेल (Darra Adam Khel, पाकिस्तान की वो जगह जो अवैध बंदूकों का बाजार है) के बंदूकों और बर्बरता की याद दिलाता है।”

संयुक्त राष्ट्र को अनुच्छेद-370 के फ़ैसले की सच्चाई से अवगत कराते हुए भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि भारत के पुराने क़ानून को हटाए जाने पर पाकिस्तान ग़लत बातें फैला रहा है। उन्होंने कहा कि भारत, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को मुख्यधारा में शामिल करना चाहता है। भारत के लोगों को किसी भी दूसरे देश ख़ासतौर पर जिसने नफ़रत की विचारधारा से आतंकवाद की फैक्ट्री बनाई है, उसकी तरफ से सलाह या नसीहत लेने की ज़रूरत नहीं है।

ग़ौरतलब है कि कल रात (27 सितंबर), UNGA को संबोधित करते हुए, पाकिस्तान के पीएम इमरान ख़ान ने भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगला था। इतना ही नहीं उन्होंने आवंटित समय-सीमा को भी पार कर दिया (उन्हें 15-20 मिनट का समय दिया गया था, लेकिन उन्होंने 30 मिनट से अधिक का समय लिया) ख़ान ने अनुच्छेद-370 के निरस्त होने पर भारत-विरोधी प्रचार किया।

INX मीडिया मामला: नीति आयोग की पूर्व CEO सिंधुश्री सहित 4 अधिकारियों पर भी चलेगा मुकदमा

केंद्र सरकार ने INX मीडिया मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को चार अधिकारियों के खिलाफ मुक़दमा चलाने की अनुमति दे दी है। इनमें नीति आयोग की पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सिंधुश्री खुल्लर शामिल हैं। अन्य अधिकारयों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के पूर्व सचिव अनूप के पुजारी, वित्त मंत्रालय में निदेशक रहे प्रबोध सक्सेना और आर्थिक मामले विभाग के पूर्व अवर सचिव रबींद्र प्रसाद शामिल हैं। ये सभी कथित रूप से INX मीडिया के विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड मंज़ूरी की प्रक्रिया में शामिल थे।

इस मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम आरोपित हैं। नीति आयोग की पूर्व CEO सिंधुश्री खुल्लर केंद्रशासित प्रदेश (UT) कैडर की 1975 बैच की अधिकारी हैं। वे 2004-2008 के दौरान आर्थिक मामलों के विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर थीं। रिकॉर्ड के अनुसार, उन्हें विभाग में विशेष सचिव के रूप में प्रोन्नत किया गया और वह उस पद पर 12 सितंबर 2008 से दो नवंबर 2008 तक रहीं। खुल्लर 2015 में नीति आयोग की पहली CEO नियुक्त की गई थीं।

CBI ने 22 जनवरी को चार अधिकारियों के ख़िलाफ़ फ़ौजदारी का मुक़दमा दर्ज करने की माँग की थी। इससे पहले CBI ने INX मीडिया मामले में गिरफ़्तार पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का नीति आयोग की पूर्व CEO सिंधुश्री से आमना-सामना करवाया था। CBI ने चिदंबरम की रिमांड के दौरान खुल्लर से लगातार दो दिन पूछताछ की गई थी। खुल्लर ने कथित तौर पर CBI को बताया था कि वो केवल आदेशों का पालन कर रही थी।

जाँच एजेंसी का आरोप है कि विदेशी निवेश के लिए INX मीडिया को विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (FIPB) मंज़ूरी देने में अनियमितताएँ बरती गई थी। जून में, केंद्रीय सतर्कता आयोग ने भ्रष्टाचार के एक मामले में कथित संलिप्तता के लिए खुल्लर के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए मंत्रालयों से मंज़ूरी भी माँगी थी।

ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों सुनवाई के दौरान पी चिदंबरम को कोर्ट से बड़ा झटका लगा था। कोर्ट ने उनकी न्यायिक हिरासत को 3 अक्टूबर तक बढ़ा दिया था। बता दें कि कॉन्ग्रेस नेता पाँच सितंबर से न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल में बंद हैं।

विधानसभा चुनाव में किसे टिकट, किसे नहीं… कॉन्ग्रेस पार्टी की टेंशन, राहुल गाँधी करेंगे Chill!

अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के उम्मीदवारों के चयन में पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की कोई भूमिका नहीं होगी। राहुल, जिन्होंने इस साल के आम चुनावों में पार्टी की हार (बहुत बुरी वाली हार) की ज़िम्मेदारी लेने के बाद कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, उन्होंने उम्मीदवार चयन बैठकों में भाग लेने व बैठकों में लिए गए निर्णयों में शामिल होने से ख़ुद को अलग कर लिया है।

उनकी टीम के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर हिंदुस्तान टाइम्स को यह बताया कि आगामी विधानसभा चुनावों में राहुल गाँधी टिकट वितरण की प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि इस संदर्भ में राज्य के नेताओं के परामर्श से पार्टी ही बेहतर निर्णय ले सकती है। ख़बर के अनुसार, राहुल ने कॉन्ग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) की दो बैठकों में शिरक़त भी नहीं की। जिनमें से एक पिछले गुरुवार (26 सितंबर) को थी। हालाँकि आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वो साल 2010 से ही वो CEC के सदस्य हैं।

राहुल गाँधी के बारे में हालाँकि कार्यकर्ताओं का मानना है कि वो अभी भी चुनाव प्रचारक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। कॉन्ग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य केएच मुनियप्पा ने कहा,

”राहुल ने नैतिक आधार पर काम छोड़ दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह चुनाव प्रक्रिया में भाग नहीं ले रहे हैं। वास्तव में, वह पहले से कहीं अधिक मज़बूत अभियान चलाने में हमारी मदद कर रहे हैं।”

वहीं, अकादमिक और लेखक नीरा चंदोके का कहना है कि राहुल के बिना कॉन्ग्रेस को संगठनात्मक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसा लगता है कि राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस की नीति या फैसले लेने संबंधी मामलों से दूरी बना ली है। क्योंकि राजनीति तो उन्होंने छोड़ी नहीं है। अभी पिछले महीने ही वो अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड गए थे। हालाँकि उनका दौरा किसी और कारण से तब सुर्खियों में रहा था। उस दौरे पर उनका एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक लड़के को राहुल गाँधी को Kiss करते हुए देखा गया था। ANI द्वारा शेयर किया गया यह वीडियो काफ़ी वायरल हुआ था।

दरअसल, केरल में बाढ़ राहत कार्यों का जायजा लेने अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड पहुँचे राहुल गाँधी को एक अजीब स्थिति का सामना करना पड़ा था। वीडियो में आप देख सकते हैं कि अपनी कार में बैठकर मीडिया से बात कर रहे राहुल गाँधी के पास अचानक एक लड़का पहुँचा और उनको Kiss कर लिया। लड़के की इस हरक़त के बाद राहुल गाँधी के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गई थी।


गोरखपुर ऑक्सीजन कांड: डॉ कफील को नहीं मिली है क्लीन चिट, बकलोल मीडिया कर रही गलत रिपोर्टिंग

यूपी के गोरखपुर स्थित बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज (बीआरडी) अस्पताल में दो साल पहले ऑक्सीजन की कमी से 60 बच्चों की मौत के मामले में निलंबित डॉ कफील खान को पूरी तरह से क्लीन चिट नहीं मिली है। उन्हें गोरखपुर मेडिकल कालेज में प्रवक्ता और राजकीय चिकित्सक होते हुए प्राइवेट प्रैक्टिस करने का दोषी पाया गया है। वहीं अनुशासनहीनता और नियमों के उल्लंघन से संबंधित आरोपों की जाँच की जा रही है।

शासन ने डॉ कफील खान को दोषी बताए जाने के साथ ही स्पष्ट किया है कि कफील खान खुद को क्लीन चिट देने की भ्रामक व्याख्या कर रहे हैं। अभी भी उनके खिलाफ चल रही विभागीय कार्यवाही में अंतिम फैसला होना बाकी है। शासन का तर्क है कि अभी तक इस प्रकरण में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है इसलिए खुद को क्लीन चिट मिलने की खबर बताना गलत ही नहीं अनुशासनहीनता के दायरे में भी आता है। बता दें कि डॉ कफील खान फिलहाल जमानत पर हैं और वो अपने ट्विटर से योगी सरकार द्वारा खुद को निर्दोष करार देने का दावा कर रहे हैं।

डॉ कफील खान पर आरोप लगा था कि मेडिकल कॉलेज में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त होने के बाद भी उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस जारी रखी और चिकित्सीय लापरवाही बरती। जाँच अधिकारी ने इस आरोप पर लिखा है कि डॉ कफील नियमों और शर्तों का उल्लंघन कर मेडिस्प्रिंग हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर रुस्तमपुर (गोरखपुर) में प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे थे। डॉ कफील खान इस आरोप पर समुचित जवाब नहीं दे सके और उन्हें आरोप में दोषी पाया गया।

डॉ कफील पर लगे आरोप व जाँच की कॉपी-1

इसके अलावा, कफील खान को घटना के समय मौजूद होने के बावजूद ऑक्सीजन गैस की कमी के संबंध में उच्चाधिकारियों को सूचित नहीं करने के संबंध में आरोपित किया गया था। हालाँकि, इस मामले में वो दोषी नहीं पाए गए हैं। डॉ कफील खान ने उच्चाधिकारियों से बात के संबंध में फोन कॉल डिटेल्स और 7 सिलेंडर उपलब्ध कराने के साक्ष्य प्रस्तुत किए थे।

डॉ कफील पर लगे आरोप व जाँच की कॉपी-2

साथ ही डॉ कफील पर बाल रोग जैसे संवेदनशील विभाग में दी जाने वाली सुविधाओं, उपचार तथा स्टाफ आदि के प्रबंधन एवं नियंत्रण संबंधी उत्तरदायित्वों का निर्वहन नहीं करने का आरोप लगा था। जाँच के दौरान यह आरोप सही नहीं पाए गए हैं।

गौरतलब है कि गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के डॉ कफील को 10 अगस्त 2017 को ऑक्सजीन की कमी की वजह से 60 बच्चों की मौत का जिम्मेदार ठहराते हुए गिरफ्तार और निलंबित किया गया था। इस कांड में कॉलेज के प्राचार्य समेत 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

कॉन्ग्रेस फिर आई इमरान के काम: भारत विरोधी बयान और ‘RSS-आतंक’ के लिए किया गृहमंत्री को याद

कॉन्ग्रेस पार्टी एक बार फिर पाकिस्तान के काम आई है। बड़े ही शर्म की बात है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने फिर से भारत विरोधी बयान और हिन्दूओं को बदनाम करने के लिए कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व गृह मंत्री के बयान का सहारा लिया है। बता दें कि इमरान खान ने यूएन में अपने संबोधन में कहा, “पिछली कॉन्ग्रेस सरकार के गृह मंत्री ने बयान दिया था कि आरएसएस के शिविरों में आतंकवादियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।” 

हालाँकि, इस दौरान इमरान खान ने किसी का नाम नहीं तो लिया, लेकिन साफ है कि वे किसकी तरफ इशारा कर रहे थे। बता दें कि 2013 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भाजपा और आरएसएस पर हिंदू आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। इसके साथ ही पी चिदंबरम ने भी भगवा आतंकवाद पर विवादित बयान दिए थे। ये दोनों नेता यूपीए सरकार में गृह मंत्री रह चुके हैं।

यह पहली बार नहीं है कि इमरान खान ने भारत पर हमला करने के लिए कॉन्ग्रेस को कोट किया हो। महाधिवेशन के सत्र से इतर पत्रकारों से बातचीत में भी इमरान ने कॉन्ग्रेस को कोट करते हुए कहा था कि जम्मू-कश्मीर में लोगों को 20 दिनों से बंद रखा गया है। कोई नहीं जानता है कि राजनीतिक कैदियों के साथ क्या हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को अंधेरी गली में बंद कर रखा है। इससे पहले कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र को भेजे डोजियर में भी पाकिस्तान ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और उमर अब्दुल्ला के बयान का उल्लेख किया था।

इसके अलावा भारत के आतंरिक मामलों में दखल देते हुए इमरान खान ने एक बार फिर से आर्टिकल 370 को निरस्त करने के केंद्र सरकार के फैसले की आलोचना की। इमरान ने धमकी देते हुए कहा कि यदि कश्मीर से कर्फ्यू हटता है तो वहाँ खून की नदियाँ बहेंगी। जहाँ प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में शांति और सद्भावना की बात की, वहीं इमरान का भाषण ठीक इसके विपरीत युद्ध की धमकी पर आधारित रहा।

त्रिपुरा के मंदिरों में बलि पर रोक: खत्म होगी शक्ति पीठ माता त्रिपुरेश्वरी मंदिर की 500 साल पुरानी परंपरा?

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने शुक्रवार (27 सितंबर) को राज्य में हिन्दू मंदिरों में पशु बलि पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद प्रसिद्ध शक्ति पीठ माता त्रिपुरेश्वरी मंदिर में 500 साल पुरानी परम्परा के तहत प्रतिदिन दी जाने वाली बलि पर भी रोक लग जाएगी। दरअसल राज्य सरकार की ओर से हर दिन एक बलि यहाँ दी जाती रही है, जो यहाँ की परंपरा है।

हाई कोर्ट में अपनी दलील देते हुए राज्य सरकार ने भारत के साथ विलय के समझौते के नियमों और शर्तों का हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि सरकार पारम्परिक तरीके से माता त्रिपुरेश्वरी व अन्य मंदिरों में पूजा करेगी। पशु बलि के पक्ष में यह तर्क दिया गया कि पशु बलि का अनुसरण स्वतंत्रता से पहले, महाराजा के शासनकाल से चली आ रही है। साथ ही यह भी कहा गया कि घरेलू तौर पर दी गई पशु बलि पूजा करने का एक अभिन्न अंग रहा है, तो इसे रोका कैसे जा सकता है?

मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायमूर्ति अरिंदम लोध की पीठ ने अपने 72-पृष्ठ के फ़ैसले में कहा,“अन्य मंदिरों के अनुरूप ही त्रिपुरेश्वरी मंदिर की नियमित गतिविधियों में सरकार की भूमिका सीमित है, और सरकारी धन से प्रत्येक दिन एक बकरे की बलि देने के लिए धन के साथ मंदिर का निर्माण करना धर्मनिरपेक्ष गतिविधि के दायरे में नहीं आता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (क) के तहत प्रदान किया गया है।”

आदेश में कहा गया,

“समाज में सुधार लाने के लिए सभी गलत प्रथाओं का उन्मूलन करके परिवर्तन लाना राज्य का कर्तव्य है। इस तरह की प्रथाओं में भाग लेने के बजाय, राज्य को मंदिरों में पशुओं की बलि पर प्रतिबंध लगाने वाला क़ानून बनाना चाहिए क्योंकि यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के ख़िलाफ़ है।”

न्यायमूर्ति करोल ने पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए कहा,

“जब तक यह आवश्यक न हो, धर्म के लिए पशु की बलि एक नैतिक कार्य नहीं माना जा सकता है। सभी धर्म दया का आह्वान करते हैं और किसी भी धर्म को हत्या की आवश्यकता नहीं है। मंदिर में पशुओं की बलि, जो कि चिंता का विषय है, गंभीर व नैतिक रूप से ग़लत है, क्योंकि यह अवैध रूप से किसी के जीवन को छीनने जैसा है।”

उन्होंने कहा, “राज्य सरकार सहित किसी भी व्यक्ति को त्रिपुरा राज्य स्थित मंदिरों में किसी भी पशु/पक्षी की बलि देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। भक्त चाहें तो मंदिर में बकरे का दान कर सकते हैं लेकिन उसकी बलि नहीं दे सकते।”

ख़बर के अनुसार, पीठ ने राज्य के सभी ज़िलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को आदेश के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य के मुख्य सचिव को राज्य के दो प्रमुख मंदिरों – देवी त्रिपुरेश्वरी मंदिर और चतुरदास देवता मंदिर में तुरंत सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश दिया। यहाँ परंपरागत तौर पर बड़ी संख्या में पशुओं की बलि दी जाती है। पीठ ने आदेश दिया कि मुख्य सचिव को हर महीने सीसीटीवी कैमरों की वीडियो रिकॉर्डिंग प्राप्त करनी होगी।

‘कश्मीर में 60000 की मौत, 10 लाख घायल’ – पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा वाले न्यूयॉर्क टाइम्स की पत्रकारिता

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने शुक्रवार (सितंबर 27, 2019) को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 74वें सत्र में अपने पहले संबोधन में कश्मीरी प्रोपेगेंडा को हवा दिया। ग्लोबल वॉर्मिंग से भाषण शुरू करने वाले इमरान खान की सुई कश्मीर पर जाकर अटक गई। यूएन में पाकिस्तान का नापाक चेहरा एक बार फिर सामने आया। इमरान खान ने एक तरह से धमकी देते हुए कहा कि कश्मीर से कर्फ्यू हटते ही युद्ध जैसे हालात बनेंगे। खान का युद्ध राग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उसी मंच से कुछ समय पहले दिए गए शांति संदेश के ठीक उलट था। पीएम मोदी ने कहा था कि भारत एक ऐसा देश है, जिसने विश्व को ‘‘युद्ध नहीं बुद्ध’’ दिए।

शर्मिंदगी की बात ये है कि अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी भिखारियों की तरह चंद डॉलरों के लालच में पाकिस्तान का साथ दिया और झूठा एवं मनगढ़ंत अभियान चलाया। दरअसल, शुक्रवार (सितंबर 27, 2019) को न्यूयॉर्क टाइम्स में कश्मीर को लेकर एक विज्ञापन छापा गया। जहाँ ये बताया गया कि कैसे कश्मीरियों के साथ जुल्म हो रहा है। बता दें कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे खबर के तौर पर नहीं, बल्कि विज्ञापन के तौर पर छापा। जिसमें ये दिखाने की कोशिश की गई कि भारत किस तरह कश्मीरियों को दबाकर कश्मीरी लोगों के साथ जुल्म कर रहा है। खबर के मुताबिक, इस विज्ञापन को इंटरनैशनल ह्यूमैनिटैरियन फाउंडेशन ने स्पॉन्सर किया है, जिसके केन्या, इंडोनेशिया और थाइलैंड में ऑफिस हैं।

इस विज्ञापन में पाकिस्तान के झूठे बयान को दिखाया गया है, जबकि पाकिस्‍तान में ईसाइयों, हिंदुओं, शियाओं, अहमदियों और गुलाम कश्‍मीर के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के ट्रैक रिकॉर्ड को नजरअंदाज करने के साथ ही जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खुले तथ्य को पूरी तरह से छुपाया गया है। इस तथ्यहीन विज्ञापन में दावा किया गया है कि भारत सरकार द्वारा कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद से लोगों को बंदी बना कर रखा गया है। जबकि वास्तविकता में यहाँ पर संचार व्‍यवस्‍था की बहाली के बाद सामान्य स्थिति वापस आ रही है। जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारी इम्तियाज हुसैन 26 सितंबर को अपने ट्विटर अकाउंट से एक वीडियो शेयर करते हुए इसकी पुष्टि की थी और कहा था कि प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के दिमाग के अलावा कहीं भी बंद या प्रतिबंध नहीं है।

Hey न्यूयॉर्क टाइम्स f**k you, फिर से!

इसके अलावा इस विज्ञापन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा आरएसएस का पूरे देश में फैलने के बयान का भी उल्‍लेख है, मगर पाकिस्तान में स्वतंत्र रूप से काम कर रहे कई आतंकी समूहों के बारे में या इस मसले पर विज्ञापन ने चुप्पी साध रखी है।

न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित विज्ञापन (फोटो साभार: news x)

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने विज्ञापन में लिखा कि कश्मीर में अब तक सुरक्षाबलों के हाथों 60000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि दस लाख से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं। एक जिम्मेदार (जो कि कहीं से भी यह शायद अब रहे नहीं!) पब्लिकेशन हाउस के नाते न्यूयॉर्क टाइम्स को ये बताना चाहिए कि आखिर जो आँकड़े उन्होंने छापे हैं वो कहाँ से आए? किस जगह ये आँकड़े छपे हैं कि कश्मीर से आर्टिकल 370 निष्क्रिय होने के बाद से अब तक 60000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं या दस लाख से ज्यादा लोग घायल हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के इस विज्ञापन की दुनिया भर में किरकिरी हो रही है।

न्यूयॉर्क टाइम्स, जो अमेरिका के ‘प्रतिष्ठित’ अखबारों में से एक है, उसने पैसों के लिए ये पेड प्रोपेगेंडा चलाकर ना सिर्फ अपने पब्लिकेशन का स्तर गिरा दिया, बल्कि पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों की भी अवहेलना की, जो ये सिखाता है कि आप प्रायोजित प्रोपेगेंडा का हिस्सा नहीं बनेंगे। बड़ा सवाल ये है कि अगर न्यूयॉर्क टाइम्स ने विज्ञापन के तौर पर ही सही यदि कश्मीरियों के कंधे पर रखा पाकिस्तान का एजेंडा विज्ञापन के तौर पर छापा तो, वो बलूचिस्तान को क्यों भूल गए? क्या बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना किस तरह लोगों को मार रही है, वो उन्हें नजर नहीं आता?

न लाल, न भगवा: भगत सिंह किसी की ‘बपौती’ नहीं

आज ही के दिन जन्मे भगत सिंह महज़ 23 वर्ष की उम्र में फाँसी पर चढ़ा दिए गए- इस लेख को इस वाक्य के साथ ही खत्म किया जा सकता है। 23 की उम्र दुनिया को देखने, समझने और उसके बारे में सारे निष्कर्ष सही-सही निकाल लेने के लिए काफ़ी नहीं होती। भगत सिंह जैसे ज़ाहिर तौर पर प्रखर बुद्धि, जिज्ञासु और सदैव-शंकालु युवक के लिए भी नहीं। 23 वर्ष की उम्र में बेशक जो साहस उन्होंने दिखाया, वह बिरले ही दिखा पाते हैं- पूरी उम्र जीने के बाद भी जब मौत का क्षण आता है, तो शायद ही ऐसा कोई हो जिसके पैर न काँप जाते हों, जो भगवान से गिड़गिड़ा कर कर कुछ और पलों की भीख न माँगे। उस उम्र में शांतिपूर्वक टहलते हुए फाँसी के फंदे तक चले जाना, और उसके पहले उसके बारे में लिख तक देना यकीनन कोई ‘आम’ इंसान नहीं कर सकता।

लेकिन खास इंसान भी हमेशा, हर चीज़ में खास कहाँ होते हैं? खामियाँ सबमें होतीं हैं, सबमें कुछ-न-कुछ कमज़ोरियाँ, कुछ कसर रह ही जाती है। और भगत सिंह ने खुद अपनी मौत के महज़ कुछ वक्त पहले लिखे गए निबंध ‘Why I Am an Atheist’ में लिखा है कि इंसानी खामियों से वे ऊपर नहीं उठ पाए हैं।

तो ऐसे में कितना सही होगा कि 40-50-60-70 साल के कुटिल, पैंतरेबाज़ राजनीतिज्ञ एक 23 साल के लड़के के कंधे पर रख के अपनी विचारधारा की बंदूक चलाएँ, जिसे इस देश के दुर्भाग्य से न ही अपने विचारों को परिपक्व करने के लिए ठीक से दुनिया के अध्ययन का समय मिल पाया, न ही जो कुछ पढ़ने या लिखने का समय मिला भी, उसके आईने में दुनिया को देखने का- कि क्या ‘लाल’ दुनिया सच में उतनी रूमानी है जितना प्रेस बता रही थी, या ‘भगवा’ उतना ही बुरा, रूढ़िवादी है, जितना बताया गया? कितना सही होगा चाहे राष्ट्रवादियों द्वारा भगत सिंह को अपनी राजनीतिक परम्परा का राष्ट्रवादी बता देना, या उन राष्ट्रवादियों के वामपंथी विरोधियों द्वारा यह दावा करना कि “अगर भगत सिंह होते तो हमारे साथ मोदी से लड़ते”?

क्या उन्होंने स्टालिन का हत्याकांड देखा था?

इसमें कोई दोराय नहीं कि भगत सिंह मार्क्सवाद से बहुत ज़्यादा प्रभावित थे। वे न केवल समाजवाद के आर्थिक पुनर्वितरण आदर्श को दुनिया की सभी समस्याओं का अंत मानते थे, बल्कि भगवान तक को चुनौती देते थे कि अगर वह सही में अस्तित्व में है, तो क्यों नहीं आकर इस “अच्छे विचार को लागू करने में आने वाली संभावित व्यवहारिक परेशानियों” को दूर कर देता।

लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने समय का, अपने कालखंड का ‘उत्पाद’ होता है- उस समय की दुनिया में, 1920-30 के दशक में मार्क्सवाद पर आधारित लेनिन की रूसी क्रांति की ही ‘हवा’ थी। न उस समय तक दुनिया के कानों में लेनिन और उसके उत्तराधिकारी स्टालिन के करोड़ों को लीलने वाले हत्याकांडों की खबर पहुँची थी, न ही Alexander Solzhenitsyn की Gulag Archipalego, जॉर्ज ऑरवेल की Animal Farm जैसी किताबें आईं थीं, जिन्होंने व्यवहारिक ही नहीं, वैचारिक स्तर पर भी कम्युनिस्ट विचार और मार्क्सवाद की सोच के मूल में ही निहित समस्याओं को उजागर किया था।

अगर मैं यह दावा करूँ कि इन किताबों को पढ़कर, या देश-बर-देश कम्युनिस्ट प्रोजेक्ट को लाशों के ढेर पर खड़े खोखले आदर्श व “एक और मौका दे दो किसी और जगह पर, इस बार सच में सच्चा साम्यवाद होगा!” के नारे से उनका मोहभंग हो ही जाता। ऐसा दावा केवल वामपंथियों की तरह “वे मोदी के दुश्मन होते”, “anti-national कहलाए जाते” सरीखा झूठा दावा और उनके साथ अन्याय होगा। हो सकता है वे न भी बदलते- लेकिन इस संभावना को नकारा भी नहीं जा सकता। सीताराम गोयल भी शुरू में मार्क्सिस्ट थे, लेकिन बाद में वे संघ से जा जुड़े।

हिन्दू धर्म को लेकर उनके विचार

हिन्दुओं के धर्म और आस्था को लेकर भगत सिंह के विचार, एक बार फिर, एक महज़ 23 साल के नवयुवक के विचार थे। इस उम्र में जोश और साहस भरपूर होता है, जिसका भगत सिंह द्वारा प्रदर्शन निस्संदेह अद्वितीय था, लेकिन काले और सफ़ेद के बीच के सौ रंगों को देखने का धैर्य, सूक्ष्म अंतरों (nuances) को समझने की स्थिरता अमूमन इस उम्र में नहीं आती- और भगत सिंह के उपर्युक्त चर्चित निबंध में अधीरता का भाव साफ़ दिखता है। इससे न ही भगत सिंह के जीवित रहने की स्थिति में भी उनके हिन्दू धर्म के प्रति उनके विचारों के कभी न बदल पाने की कोई डिक्री हो जाती है, न ही वह हिन्दू धर्म पर कोई अंतिम फ़ैसला बन जाते हैं।

साथ ही यह भी नहीं भूला जा सकता कि उनके समय में आर्य-समाजी आंदोलन ज़ोरों पर था, जिसके अनुसार केवल वेद-पाठ, और वेदों में लिखी बातों की आर्य-समाजी व्याख्या, ही इकलौता और असली हिंदुत्व थे, बाकी सब गलत। और भगत सिंह आर्य-समाजी परिवार में ही पले-बढ़े थे। ज़ाहिर तौर पर हिन्दुओं की हज़ारों धार्मिक धाराएँ और शाखाएँ, उनमें सूक्ष्म लेकिन दृढ़ अंतर, उनसे जुड़े कर्मकांड और उनके पुराण उन्हें बेकार तो वैसे ही लगने थे- चाहे वे नास्तिक बनते या न बनते।

लेकिन भगत सिंह की मृत्यु के बाद आर्य-समाज के बाहर के हिन्दू धर्म का पुनर्जागरण हुआ, उसमें श्री ऑरोबिंदो समेत अनेकों मनीषियों ने अलग-अलग तरीके से प्राण फूँके और उसमें से समकालीन और आधुनिक समाज के साथ सुसंगत तत्व चुन कर आगे बढ़ाया। यहाँ तक कि भगत सिंह की तरह अनीश्वरवादी, नास्तिक सावरकर ने भी अपनी ज़िंदगी का एक दशक से ज़्यादा समय हिन्दू सामाजिक सुधार में लगाया।

ऐसे में, फिर एक बार, यह प्रश्नवाचक चिह्न रह जाता है, जिसका अवश्यंभाविता के साथ जवाब असम्भव है, कि भगत सिंह का नव-जागृत, आधुनिक हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के साथ कैसा रिश्ता होता। शायद वे तब भी नास्तिक रहते, लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि न भी रहते!

जान दे दी ‘बच्चे’ ने तुम्हारे लिए, और ‘निचोड़ो’ मत

23 साल का युवक ‘बच्चे’ से बहुत बूढ़ा नहीं होता। उस उम्र में भगत सिंह ने अपनी जान दे दी- भगवा, लाल, नीली, पीली, खाकी, यानि हर विचारधारा के लोगों की आज़ादी के लिए। उनका बलिदान ही उनकी ‘legacy’ है, उनकी ‘विरासत’ है- उनके हिन्दुओं के बारे में विचार, लेनिन के बारे में उनकी राय, यह सब उनका निजी है। सार्वजनिक बहस में बेतुका।

एक तरफ़ वे धर्म की खिल्ली उड़ाते थे, दूसरी तरफ़ ‘धार्मिक कॉमरेड’ शचीन्द्रनाथ सान्याल की धार्मिकता से प्रभावित भी थे। यह उस उम्र और उस दौर की स्वाभाविक वृत्ति थी, अभिव्यक्ति थी। उसे किसी भी तमगे तक समेटना, चाहे वह भाजपा का ‘राष्ट्रवादी’ (वर्तमान राजनीति के संदर्भ में) का हो, या कम्युनिस्टों का ‘राइट-विंग का दुश्मन’ का, अन्याय होगा। उनका ‘appropriation’ होगा।

भगत सिंह ने अपनी जान के रूप में अपना ‘रस’ पहले ही इस देश के खून में मिला दिया है। अब गन्ने की तरह उनकी लाश को वैचारिक-राजनीतिक पेराई मशीन में डालकर “और निचोड़ने” की कोशिश न की जाए।

सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन ने प्रोपेगेंडा वेबसाइट के फर्जी आरोपों का दिया करारा जवाब

सद्गुरु जग्गी वासुदेव और उनकी आध्यात्मिक-सामाजिक संस्था ईशा फाउंडेशन ने Coalition for Environmental Justice in India के आरोपों पर करारा जवाब दिया है। Environment Support Group नामक वेबसाइट पर प्रकाशित एक खुले पत्र में ‘populism’ से लेकर ‘हाथियों की जमीन चुराई, आदिवासियों की ज़मीन चुराई’ जैसे वाहियात, पुराने, घिसे-पिटे आरोपों को ही दोहराया गया, जिनके जवाब सद्गुरु और ईशा फाउंडेशन से लेकर तमिलनाडु सरकार तक कई बार, कई मौकों और मंचों पर दे चुके हैं। The Wire की एक हिट जॉब रिपोर्ट भी इस ‘खुले पत्र’ में चस्पा थी। यह पत्र सद्गुरु के ‘Cauvery Calling’ (‘कावेरी की पुकार’) अभियान से जुड़े हॉलीवुड अभिनेता लियोनार्डो डि कैप्रियो को लिखा गया था, जिसमें उनसे इस अभियान से अलग हो जाने की अपील की गई थी। ईशा फाउंडेशन ने उन्हीं आरोपों पर अपना जवाब अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया है।

क्यों पुकार रही है कावेरी?

उत्तर भारत में जैसे गंगा-यमुना बदहाल हैं, वैसा ही हाल दक्षिण भारत में कावेरी का है। कभी कर्नाटक-तमिलनाडु दोनों प्रदेशों के बड़े हिस्से को आवश्यकता से अधिक जल देने वाली यह नदी आज जनसंख्या दबाव और बेतहाशा दोहन से लगभग 40% पानी खो चुकी है और यह दोनों राज्य पानी की कमी से जूझ रहे हैं। चेन्नै और बंगलुरु में हाल में दिखे जल-संकट महज़ बानगी भर हैं पूरी समस्या की गंभीरता के। सद्गुरु इसी नदी में पानी वापिस लाने के लिए ‘कावेरी की पुकार’ (Cauvery Calling) अभियान चला रहे हैं, जिसके अंतर्गत कावेरी के आस-पास की कृषि-भूमि पर अनाज और नकदी फसलों के अलावा पेड़-पौधे भी लगाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, बाकायदा कृषि के एक प्रकार, वन्य-कृषि (Agroforestry), के रूप में।

इसके लिए न केवल किसानों के बीच जागरुकता का अभियान चलाया जा रहा है, बल्कि उन्हें ईशा फाउंडेशन अन्न- और फसल-कृषि से वन्य-कृषि पर जाने के लिए एक सहायता का ढाँचा खड़ा कर रहा है, जिसमें 242 करोड़ पेड़ निजी कृषि भूमि पर लगाने के लिए देना शामिल है। इसी अभियान के लिए 62-वर्षीय सद्गुरु ने 2-3 सितंबर से शुरू कर 17 सितंबर तक 3,500 किलोमीटर की सड़क यात्रा भी की थी, जिसके एक बड़े हिस्से में उन्होंने खुद बाइक रैली की थी।

सरकारी भूमि की बात कहाँ से आई?

अपने ‘खुले पत्र’ में Coalition for Environmental Justice in India ने सबसे पहले सरकारी भूमि के इस्तेमाल का आरोप लगाया है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने पूछा है कि सरकारी भूमि के इस्तेमाल की बात कहाँ से आ गई? यह अभियान तो, ईशा के मुताबिक, निजी किसानों को अपनी कृषि भूमि पर पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करने का है। फाउंडेशन का कहना है कि उनकी वेबसाइट, उनके कार्यक्रमों, सरकार को दिए गए दस्तावेज़ों (अभियान का एक हिस्सा अपनी भूमि पर पेड़ लगाने वाले किसानों को अपनी ज़रूरत के मुताबिक लालफ़ीताशाही के हस्तक्षेप के बिना पेड़ काट सकने की इजाज़त दिलाने का भी है, जिसके लिए जरूरी क़ानूनी बदलाव के लिए फाउंडेशन प्रयासरत है) आदि में कहीं भी सरकारी भूमि का तो नाम भी नहीं है।

इसे निजी भूमि पर कराने के पीछे फाउंडेशन का तर्क है कि इस अभियान को अंततः जिन किसानों को सफ़ल बनाना है, निजी भूमि पर होने वाली पैदावार का आर्थिक लाभ उन्हें प्रोत्साहित और प्रेरित करेगा। इसके अलावा आरोप का एक हिस्सा एक ही तरह के पेड़ों को लगाकर एकल कृषि के प्रोत्साहन का है। इसे भी काटते हुए ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि इसमें पहली बात तो केवल वृक्षारोपण ही नहीं, झाड़ियाँ, पौधे और हरियाली के अन्य प्रकार शामिल हैं, और पेड़ों का चयन भी स्थानीय पर्यावरण और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और वन्य विभाग से सलाह लेने के पश्चात् ही किया गया है।

दर्जन-भर सरकारी-गैर सरकारी संस्थाएँ शामिल, सभी अनभिज्ञ हैं?

अगला आरोप लगाया गया है कि ईशा फाउंडेशन को नदी और उसके आसपास की भूमि, जलवायु आदि का कोई ज्ञान ही नहीं है; और वे वृक्षारोपण के अति-सरलीकृत (over-simplified) समाधान को थोपना चाहते हैं। इसके जवाब में ईशा ने पीएमओ, कर्नाटक-तमिलनाडु राज्य सरकारों, जल शक्ति मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु-परिवर्तन मंत्रालय, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अरिजित पसायत, बायोकॉन की किरण मजूमदार शॉ, उद्योग चैंबर Confederation of Indian Industries (CII) के महानिदेशक चन्द्रजित बनर्जी, इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. एएस किरण कुमार आदि का नाम गिनाते हुए पूछा कि क्या यह सभी ऐसे लोग और संस्थान हैं जो बिना जाने-समझे किसी भी मसले पर किसी व्यक्ति या मुद्दे के पीछे खड़े हो जाएँगे?

ईशा फाउंडेशन ने यह भी बताया कि सद्गुरु को United Nations Convention to Combat Desertification (UNCCD) के COP14 शिखर सम्मेलन में Cauvery Calling अभियान के बारे में बोलने के लिए निमंत्रित किया गया था। वे भारत में इस अभियान की सफलता से प्रभावित हो इसे दुनिया-भर में करने के बारे में जानना चाहते थे।

इसके अलावा ईशा फाउंडेशन और Cauvery Calling अभियान लगातार देश के चोटी के आर्थिक थिंक टैंक नीति आयोग से भी लगातार सलाह ले रहा है।

नौसिखिये नहीं हैं हम, 18 साल का अनुभव है वन्य-कृषि का

अगला आरोप था कि ईशा फाउंडेशन अंधाधुंध, बिना सोचे-समझे पेड़ लगाना चाहता है- उसे न तो इसके पर्यावरणीय असर के बारे में समझ है, न ही इसके सामाजिक पहलुओं के बारे में पता है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि उनकी वेबसाइट पर कावेरी के आस-पास की भूमि को उचित खंडों (सेग्मेंट्स) में बाँटते हुए उस खंड में लगने लायक पेड़ों की सूची अपनी वेबसाइट पर डाली है। यह सूची कर्नाटक वन विभाग, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय समेत आधा दर्जन संस्थाओं और दशकों तक वन्य-कृषि और पेड़ों के साथ काम कर चुके विशेषज्ञों के साथ सलाह-मशविरे के बाद तैयार की गई है।

यही नहीं, ईशा फाउंडेशन ने यह भी दावा किया है कि उनके प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स को 18 वर्ष वन्य-कृषि के क्षेत्र में तमिलनाडु में काम करने का अनुभव है। गौरतलब है कि प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स देश के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार ‘इंदिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार’ से सम्मानित हो चुका है। इसके अलावा ईशा ने दावा किया है कि तमिलनाडु में कई जिलों में, जिनमें कावेरी के आसपास के जिले भी शामिल हैं, वन्य-कृषि को सफलतापूर्वक आज़माया जा चुका है।

इसके सामाजिक पहलू को लेकर भी ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि ‘कावेरी की पुकार’ अभियान में यह भी अछूता नहीं है। अभियान के लिए ईशा फाउंडेशन के स्वयंसेवक 7,000 से अधिक गाँवों में जाकर करीब 2,70,000 लोगों से अभियान की आधिकारिक शुरूआत के पहले ही मिले थे। लाखों किसानों के जल-संकट से जूझ रहे होने के चलते पंचायतों के नेतृत्व ने इसमें बेहद रुचि दिखाई है।

पंचायत स्तर पर होगा काम

इस मुद्दे पर आगे ईशा फाउंडेशन ने अपने उत्तर में लिखा है कि इस अभियान का क्रियान्वन ग्राम पंचायतों के स्तर पर पर ही होना है। जहाँ जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ (Biodiversity Management Committees) पहले से सक्रिय हैं, वहाँ फाउंडेशन उनकी सहायता बेशक लेगा क्योंकि वन्य-कृषि से जैवविविधता में वृद्धि होती है।

पर्यावरण और विकास/अर्थव्यवस्था को दुश्मन बनाने से काम नहीं चलेगा

ईशा फाउंडेशन ने सद्गुरु के कथन “Ecology और economics को साथ लेकर चलना होगा, एक-दूसरे की कीमत पर नहीं” को दोहराते हुए इस बात पर बल दिया कि Cauvery Calling आर्थिक प्रोजेक्ट है, जो पर्यावरणीय परिणाम को ध्यान में रखकर चलाया जा रहा है। संस्था ने दावा किया है कि यह वन्य-कृषि मॉडल तमिलनाडु के 69,760 किसानों के साथ आज़माया गया है। इसे अपनाने वालों की आय में 300%-800% बढ़ोतरी देखी गई है।

इसके अलावा फाउंडेशन का कहना है कि उसने यह कभी दावा नहीं किया कि पेड़ लगाना ही नदी-संकट के निदान का इकलौता उपाय है। उसने वृक्षारोपण इसलिए चुना क्योंकि वृक्ष नदियों की समस्या के सबसे सस्ता और प्रकृति पर आधारित समाधान हैं।

‘हाथियों की ज़मीन’, ‘आदिवासियों की ज़मीन’ का प्रोपेगंडा

अगला आरोप ईशा फाउंडेशन पर वही घिस-घिस कर बदरंग हो चुका “हाथियों की जमीन चुराई”, “आदिवासियों की ज़मीन चुराई” का प्रोपेगंडा है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने एक बार फिर दोहराया कि पर्यावरण मंत्रालय और तमिलनाडु के राज्य वन विभाग ने यह बहुत पहले साफ़ कर दिया है कि ईशा फाउंडेशन का आश्रम जिस ज़मीन पर है, उस पर हाथियों का कोई कॉरिडोर कभी नहीं रहा। इसके अलावा ईशा फाउंडेशन ने फिर दोहराया कि उस पर आदिवासियों को आवंटित की गई जो 44 एकड़ ज़मीन हथियाने का आरोप है, उस ज़मीन से ईशा फाउंडेशन का कभी कोई नाता नहीं रहा।

सरल भाषा में समझना ‘पॉपुलिस्ट’ होना होता है तो हो

‘Populism’ के आरोप के जवाब में ईशा फाउंडेशन ने लिखा कि इसके पहले ऐसे जटिल विषय को जनता की समझ में आने लायक सरल भाषा में समझाने वाला जनांदोलन कभी नहीं हुआ है। अगर ऐसा करना ‘पॉपुलिस्ट’ होना होता है तो हो। पूरे देश के नदियों के विषय पर उठ खड़े होने का तो स्वागत किया जाना चाहिए।

PIL अगंभीर, सद्गुरु को पैसा कमाने के लिए ऐसे तरीकों की ज़रूरत नहीं

‘कावेरी की पुकार’ आंदोलन के लिए पैसे जुटाने के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका को ईशा फाउंडेशन ने अगंभीर करार देते हुए इस बात का खंडन किया कि यह पैसा कर्नाटक की राज्य सरकार से विमर्श किए बगैर इकट्ठा किया जा रहा है। ‘जलपुरुष’ माने जाने वाले राजेंद्र सिंह के “पैसे और शोहरत के लिए” काम करने के आरोप पर ईशा फाउंडेशन ने कहा कि यह उनकी अपनी राय है, लेकिन साथ में जोड़ा कि पद्मविभूषण से सम्मानित जग्गी वासुदेव को पैसा कमाने के लिए ऐसे हथकण्डे अख्तियार करने पड़ें, ऐसा आरोप हास्यास्पद है।

अपने बयान के अंत में ईशा फाउंडेशन ने सभी विरोधियों को एक निष्पक्ष वार्तालाप के लिए निमंत्रित किया, ताकि फाउंडेशन को ‘Cauvery Calling’ के असली स्वरूप को प्रस्तुत करने का अवसर मिले।

अब अगर खराब सड़क बनाई तो ठेकेदारों का भी कटेगा ‘ट्रैफिक चालान’: नितिन गडकरी

केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने नए मोटर व्हीकल एक्ट-2019 के तहत ठेकेदारों पर भी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। आज उन्होंने एक ट्वीट कर कहा कि नए मोटर व्हीकल एक्ट-2019 के तहत सिर्फ आम लोगों के लिए पेनल्टीज और जुर्माने की राशि ही नहीं बढ़ाई गई है, बल्कि सड़क के ठेकेदारों द्वारा फॉल्टी सड़क डिजाइन, निम्न स्तर का निर्माण और रख-रखाव में लापरवाही करने पर 1 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है।

बता दें कि एक सितंबर से पूरे देश में नया मोटर व्हीकल एक्ट लागू हो गया है। इस विधेयक से प्राप्त अधिकारों के जरिए यातायात के विभिन्न नियमों का उल्लंघन किए जाने के मामले में भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। संशोधित विधेयक में नाबालिग द्वारा गाड़ी चलाने के दौरान हुई दुर्घटना पर गाड़ी के मालिक को तीन साल जेल की सजा तथा दुर्घटना का शिकार हुए पीड़ित को 10 गुना अधिक मुआवजा प्रदान करने का भी प्रावधान है।

मोटर व्हीकल एक्ट का उल्लंघन करने पर वाहन चालकों पर तो जुर्माने का प्रावधान है ही साथ ही अब केंद्रीय परिवहन मंत्री ने सड़क बनाने वाले ठेकेदारों पर जुर्माने का जो प्रावधान किया है। उससे उम्मीद जताई जा रही है कि सड़क निर्माण की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। बता दें कि नए नियम के तहत अब किसी ठेकेदार ने खराब सड़क बनाई तो उसे जुर्माना देना पड़ेगा। शायद अब सड़क पर मोटर चालकों को कुछ हद तक गड्ढों से मुक्ति मिले।