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अनुराग कश्यप ने Sacred Games में किया सिखों का अपमान: गुरुद्वारा कमिटी के अध्यक्ष का आरोप

शिरोमणि अकाली दल के नेता और दिल्ली के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने विवादित फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप पर आरोप लगाया है कि उन्होंने नेटफ्लिक्स की सेक्रेड गेम्स सीजन 2 में धार्मिक चिह्नों का अपमान करके सिखों की भावनाओं को ठेस पहुँचाया। सिरसा दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमिटी के अध्यक्ष भी हैं।

अपने एक ट्वीट में सिरसा ने अनुराग कश्यप पर निशाना साधते हुए कहा, “मैं हैरान हूँ कि बॉलीवुड लगातार हमारे धार्मिक चिह्नों को अपमानित कर रहा है! अनुराग कश्यप ने जान-बूझ कर सेक्रेड गेम्स के सीजन 2 में ऐसा दृश्य डाला है जहाँ सैफ अली खान अपना कड़ा समुद्र में फेंक देते हैं। कड़ा कोई आम जेवर नहीं है। ये सिखों का गुरूर है और गुरु साहिब का आशीर्वाद है।”

बता दें ‘कड़ा’ या ‘करा’ का महत्व सिखों के लिए इसलिए इतना है क्योंकि ये उन ‘पंज ककार’ का ही एक हिस्सा हैं जिन्हें एक सिख हमेशा धारण किए रहते हैं। बाकी चार केश, कंघा, कछेरा और कृपाण हैं। ‘पंज ककार’ की प्रथा को सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह द्वारा शुरू किया गया था। उन्होंने 1699 में सभी सिखों को इसे धारण करने का आदेश दिया था। इसलिए सिख समुदाय के लोगों का मानना है कि पाँच ककार सिर्फ़ उनके सिख होने का ही सूचक नहीं हैं, बल्कि ये ऐसा विश्वास है जो उन्हें सामूहिक रूप से एक अलग पहचान देता है और उनके सिख रहने के विश्वास को जीवित रखता है।

रही बात अब अनुराग कश्यप की तो उनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का काम पहली बार नहीं किया गया है। इससे पहले भी वह अपने निर्देशन में हिंदू-फोबिक कंटेंट दिखाकर लोगों के निशाने पर आ चुके हैं। अपने शो के जरिए वह भारतीय संस्कृति और खासकर हिंदुओं के ख़िलाफ़ घृणा और आपत्तिजनक सामग्री फैलाने का काम करते है। शायद इसलिए अपना कारनामों से मिलने वाली आलोचना को देखने से पहले वो ट्विटर से नौ दो ग्यारह हो गए हैं।

रुनुमा को धोखा दे मोहिदुल ने दूसरी लड़की से की निकाह, चाकू घोंप लिया बेवफाई का बदला

असम के नगाँव में सोमवार (अगस्त 20, 2019) को एक प्रेमिका ने अपने प्रेमी की चाकू घोंपकर हत्या कर दी। घटना दिन दहाड़े बारपेटा जिले के नगाँव स्थित बाउसी बनिकांता ककाती (बीबीके) कॉलेज के सामने घटी। लड़की की पहचान 19 वर्षीय रुनुमा अहमद के रूप में हुई। वह BBK कॉलेज में प्रथम वर्ष की छात्रा है। लड़के का नाम मोहिदुल था और वह अपनी स्नातक पूरी कर चुका था।

जानकारी के मुताबिक रुनुमा और मोहिदुल के बीच 7 साल से प्रेम संबंध था। लेकिन तीन दिन पहले 27 वर्षीय मोहिदुल ने किसी और लड़की से शादी कर ली। मोहिदुल की शादी की बात सुन रुनुमा सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और पूरी वारदात को अंजाम देने का मन बनाया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार लड़की ने जिस समय हत्या की उस वक्त वो कॉलेज की यूनिफॉर्म में थी। उसने लड़के को घटनास्थल पर बुलाया। जहाँ लड़का अपने दोस्त के साथ पहुँचा। दोनों कोने में खड़े होकर बात करने लगे। लेकिन थोड़ी ही देर में लड़की ने अपने बैग से चाकू निकालकर वार कर दिया। लड़का चिल्लाया तो दोस्त उसके पास भागा। उसने देखा कि लड़का खून से लथपथ नीचे पड़ा हुआ था। दोस्त ने उसे अस्पताल ले जाने का प्रयास किया, लेकिन बारपेटा के अस्पताल में डॉक्टरों ने उसकी मौत हो गई। पुलिस ने बताया घटना के बाद से रुनुमा फरार है।

अब मलेशिया से भी ज़हर नहीं उगल सकेगा ज़ाकिर नाइक: ‘बोलने’ पर लगा प्रतिबन्ध तो माँगी माफ़ी

मलेशिया ने ज़ाकिर नाइक के ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाई की है। ज़ाकिर नाइक पर मलेशिया में कहीं भी सार्वजनिक रूप से बोलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। अब वह मलेशिया के किसी भी राज्य में सार्वजनिक सभाओं में नहीं बोल पाएगा और न ही किसी भी जमावड़े को सम्बोधित कर सकेगा। मलेशिया की रॉयल पुलिस ने सभी राज्य स्तरीय उच्चाधिकारियों को इस सम्बन्ध में सूचित कर दिया है। मलेशिया की पुलिस ने कहा कि यह निर्णय ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के हित में और ‘सामाजिक सद्भावना’ बनाए रखने के लिए लिया गया है।

ज़ाकिर नाइक ने हाल ही में हिन्दुओं के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बयान दिया था। मलेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने भी स्वीकार किया था कि ज़ाकिर का रेसियल बयान बर्दाश्त करने योग्य नहीं है। प्रधानमंत्री महाथिर ने साफ़-साफ़ कहा था कि ज़ाकिर नाइक ने सीमा लांघी है। ज़ाकिर नाइक की भारतीय एजेंसियों को भी तलाश है। मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर हेट स्पीच तक के मामले उसके ख़िलाफ़ चल रहे हैं। मलेशिया में अपने ख़िलाफ़ कार्रवाई से बौखलाए ज़ाकिर ने वहाँ के कई नेताओं को ही कोर्ट में घसीट लिया।

अब ज़ाकिर नाइक ने अपने बयान को लेकर माफ़ी माँगते हुए कहा है कि वह रेसिस्ट नहीं है और उसके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। उसने कहा कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय की भावना को चोट पहुँचाना इस्लाम के ख़िलाफ़ है और अगर कोई गलतफहमी हुई है तो वह माफ़ी माँगता है। उसने डर जताया कि ऐसे विवादों के कारण लोगों का इस्लाम से भरोसा उठ जाएगा। ज़ाकिर नाइक ने कहा था कि मलेशिया के हिन्दू यहाँ के पीएम महाथिर की तुलना में नरेंद्र मोदी के प्रति ज्यादा वफादार हैं।

इसके अलावा ज़ाकिर नाइक ने चीनियों को भी ‘पुराना मेहमान’ बताते हुए मलेशिया से चले जाने को कहा था। पेनांग के उपमुख्यमंत्री रामासामी ने कहा कि मलेशिया को ज़ाकिर नाइक का असली रंग समझने में समय लग गया। ज़ाकिर ने उनके ख़िलाफ़ भी कोर्ट में मामला दर्ज कराया है। नाइक को भगोड़ा बताते हुए रामासामी ने कहा कि चीनी और भारतीय कई पीढ़ियों से मलेशिया में रह रहे हैं और आज तक किसी रेसिस्ट व्यक्ति ने भी उन पर सवाल नहीं उठाए। उन्होंने ज़ाकिर नाइक को मलेशिया से बाहर भेजने की माँग की।

पेनांग के उपमुख्यमंत्री प्रोफेसर रामासामी ने ज़ाकिर नाइक को निशाने पर लिया

मलेशिया के पूर्व पुलिस प्रमुख रहीम नूर ने सरकार से माँग की थी कि ज़ाकिर नाइक का ‘परमानेंट रेजिडेंट’ समाप्त कर उसे भारत को सौंप दिया जाए, क्योंकि उसने आपराधिक कार्य किया है। ज़ाकिर नाइक ने अपने विवादित बयान में कहा था कि मलेशिया में रहने वाले हिन्दुओं को भारत में रह रहे अल्पसंख्यकों से सौ गुना ज्यादा अधिकार मिलते हैं।

सिक्किम, अरुणाचल और नगालैंड जाने के लिए वीजा जरूरी: झूठ फ़ैलाने पर ‘सबसे बड़े दलित नेता’ को लगी लताड़

ख़ुद को देश का सबसे बड़ा दलित नेता बताने वाले उदित राज ने एक बार फिर अपने ‘व्हाट्सप्प ज्ञान’ का परिचय दिया है। नॉर्थ वेस्ट दिल्ली ने सांसद रह चुके उदित राज को इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो वह कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे। भाजपा ने उनकी जगह सूफी गायक हंसराज हंस को तरजीह दी और वह विजयी भी हुए। कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने ट्विटर पर दावा किया है कि नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में प्रवेश करने के लिए भारतीयों को वीजा बनवाना पड़ता है।

उदित राज ने ‘नवभारत’ अख़बार के छत्तीसगढ़ संस्करण का हवाले देते हुए ट्वीट किया, “नगालैंड, अरुणाचल और सिक्किम में भारतीयों को प्रवेश करने के लिए वीज़ा चाहिए लेकिन वो भाजपा का मुद्दा नहीं है। वहाँ हिंदू बनाम मुस्लिम का मुद्दा नहीं बनता यही वजह है।” इस झूठे भ्रामक ट्वीट को लेकर लोगों ने उदित राज को जम कर लताड़ लगाई। कुछ लोगों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि उदित राज कभी भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे थे।

एनडीटीवी के राजनीतिक संपादक अखिलेश शर्मा ने उन्हें जवाब देते हुए पूछा, “सर। मैं बिना पासपोर्ट-वीज़ा दो महीने पहले सपरिवार सिक्किम होकर आया। रास्ते में नेपाल था, वहाँ भी सिर्फ आधार कार्ड दिखाकर चला गया था। अब पुलिस पकड़ेगी तो नहीं?”

उदित राज ने जिस ‘नवभारत’ समाचार पत्र का जिक्र किया है, उसने मंगलवार (अगस्त 13, 2019) के संस्करण में यह ख़बर छापी थी, जिसके जाल में उदित राज फँस गए। अख़बार ने ‘इनर लाइन परमिट’ को आंतरिक वीजा बताया था। अख़बार के अनुसार, किसी सीमित या संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेनी पड़ती है और यह ब्रिटिश काल का नियम है। ख़बर में सिक्किम का कहीं भी जिक्र नहीं है, इसे उदित राज ने यूँ ही घुसेड़ा। अख़बार ने नीचे दिए गए इस ख़बर में ‘राज्य सरकार की अनुमति’ को वीजा बता दिया:

‘नवभारत’ की भ्रामक ख़बर, जिसके आधार पर उदित राज ने झूठ फैलाया

दरअसल, भारत का कोई भी नागरिक देश के किसी भी हिस्से में बिना वीजा-पासपोर्ट भ्रमण कर सकता है। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड में यात्रा के लिए ‘इनर लाइन परमिट’ की ज़रूरत पड़ती है, जो आसानी से मिल जाती है। इसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था भी है। सिक्किम में इसकी भी कोई ज़रूरत नहीं पड़ती। शेष भारत के अन्य हिस्सों के हजारों-लाखों लोग उत्तर-पूर्वी राज्यों में काम कर रहे हैं। ऐसे में, उदित राज का यह दावा सरासर ग़लत है कि किसी भी भारतीय राज्य में जाने के लिए भारत के लोगों को वीजा बनवाना पड़ता है।

ISIS के 4 अफ़ग़ान आतंकी ISI की मदद से भारत में घुसे, पूरे देश में हाई अलर्ट जारी

आतंकवादी भारत में हमले की फ़िराक़ में हैं। जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से लगातार ऐसी सूचनाएँ आ रही हैं कि आतंकी बौखलाए हुए हैं और वे कोई बड़ी साज़िश रच रहे हैं। ताज़ा सूचना के अनुसार, खूँखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के 4 आतंकी गुजरात और राजस्थान स्थित अंतरराष्ट्रीय सीमा से भारत में दाखिल हुए हैं। इसके बाद राजस्थान व गुजरात सीमा सहित पूरे देश में हाई अलर्ट जारी किया गया है।

उच्चाधिकारियों द्वारा थानाध्यक्षों को भेजे गए पत्र में उनके क्षेत्र में आने वाले सभी होटलों, ढाबों, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन व अन्य भीड़भाड़ वाले स्थलों पर सघन चेकिंग का निर्देश दिया गया है। अपने-अपने क्षेत्र में सतर्कता बरतने के लिए कहा गया है। इन सबके अलावा आने-जाने वाले वाहनों की चेकिंग कर संदिग्ध व्यक्तियों से पूछताछ करने को भी कहा गया है। भारत में घुसे चारों आतंकी अफ़ग़ान मूल के हैं।

इन सभी आतंकियों को भारत में घुसपैठ कराने में पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई का हाथ है। आईएसआई आतंकियों के साथ मिल कर भारत में किसी बड़े हमले को अंजाम देकर अमन और शांति भंग करने की साज़िश रच रही है। इस अलर्ट के बाद मध्य प्रदेश की पुलिस भी सतर्क हो गई है और राजस्थान की सीमा से लगे ज़िलों में विशेष सावधानी बरती जा रही है। विभिन्न सड़कों पर चेकपॉइंट्स बना कर गुजरात और राजस्थान से आने वाले वाहनों की चेकिंग की जा रही है।

ख़ासकर गुजरात और राजस्थान से मध्य प्रदेश में प्रवेश करने वाले ट्रेनों में विशेष तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। तीनों राज्यों की पुलिस को आतंकियों के स्केच भी दिए गए हैं, जो अफ़ग़ानिस्तान के कुनार प्रान्त के निवासी बताए जा रहे हैं।


छत्तीसगढ़: लगातार कई दिनों तक भूखे-प्यासे कमरे में बंद रखा, 10 गायों की मौत

छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव जिले के बरबसपुर गाँव में काँजी हाउस में 10 गायें मृत अवस्था में पाई गई। इन गायों को कमरे के अंदर बंद कर दिया गया था। मंगलवार (अगस्त 20, 2019) को एक अधिकारी ने बताया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ की गायों की मौत दम घुटने की वजह से हुई है।

पुलिस का कहना है कि सरपंच की शिकायत मिलने के बाद मामले की जाँच शुरू कर दी गई है। जानकारी के मुताबिक, दो दिनों पहले गाँव के ही अज्ञात व्यक्ति द्वारा गायों को काँजी हाउस में लाकर रखा गया था, लेकिन उसने गायों को काँजी हाउस के खुले स्थान में रखने की बजाय काँजी हाउस के अंदर बने छोटे से कमरे में घुसाकर गेट लगा दिया था। गायों के लिए कमरे में हवा आने की कोई जगह नहीं थी। गाय लगातार कई दिन तक बिना हवा और चारे-पानी के एक छोटे से कमरे में बंद रही और 10 गायों की मौत हो गई।

एसएसपी यूबीएस चौहान ने बताया कि उन्हें सरपंच से शिकायत मिली थी कि वह अपने साथ काँजी हाउस की चाबी रखता था। एक व्यक्ति ने उससे चाबी माँगी थी, लेकिन उन्होंने उसे नहीं दी। बाद में उन्हें पता चला कि कुछ गायों की एक कमरे के अंदर मौत हो गई है।

गौरतलब है कि, शुक्रवार (अगस्त 9, 2019) को आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा के बाहरी क्षेत्र में चलाए जा रहे प्राइवेट गोशाला में जहरीला चारा खाने से तकरीबन 100 गायों की मौत हो गई। डॉक्टरों द्वारा की गई शुरुआती जाँच व पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद सामने आया कि गायों के चारे में जहर मिला कर उन्हें खिला दिया गया था।

खोखले लिबरलो, वामपंथियो! तुमने ढंग से पत्रकारिता की होती, तो हमारी ज़रूरत ही नहीं पड़ती

कल हमारी अंग्रेजी साइट की एडिटर नुपुर ने दो ट्वीट किए और लिखा कि हमें वो (लेफ्ट-लिबरल गिरोह) घृणा से इसलिए देखते हैं क्योंकि उनके निकम्मेपन के कारण ही हमें आना पड़ा। अगर वो अपनी कलम नहीं बेचते, तो हमें कलम उठाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। पत्रकारिता क्या है, क्या होनी चाहिए, ये आज के दौर में चर्चा का विषय ज़रूर है, लेकिन पत्रकारिता के नाम पर क्या हो रहा है, वो हमारे दौर से छुपा नहीं है।

अगर पत्रकारिता सही होती रहती तो ‘मीडिया’ के पहले ‘मेन्स्ट्रीम’ और ‘सोशल’ जैसे शब्द नहीं लगाने होते। मीडिया तो मेनस्ट्रीम ही होनी चाहिए। आपने ‘सोशल मीडिया’ को अलग कर दिया क्योंकि मेन्स्ट्रीम अपने काम से भटक रहा था। तकनीक की कमी कहिए या कुछ और, सोशल मीडिया को आने में समय ज़रूर लगा लेकिन सही मायनों में मीडिया या सूचना का लोकतांत्रीकरण अब ही हो पाया है। अब मीडिया के तोप सोशल मीडिया के आगे रोजाना नंगे हो रहे हैं।

2014 के बाद जो हुआ, और उससे पहले जो हो रहा था, वो न सिर्फ राजनैतिक तौर पर ‘मोदी से पहले’ और ‘मोदी के बाद’ के नाम से जाना जाएगा, बल्कि पत्रकारिता के संदर्भ में भी एक नेता या विचारधारा को लेकर इन दो कालखंडों में भारतीय मीडिया को पढ़ाया जाएगा। मोदी के आने से पहले मीडिया ने, जिसने सालों से अपनी आत्मा डॉक्टर फॉस्टस की तरह लूसिफर रूपी कॉन्ग्रेस को गिरवी रख दी थी, सोचा भी नहीं था कि उसके साल भर की मेहनत के बावजूद वो आ ही जाएगा, और ऐसे आएगा कि सब कुछ बदल जाएगा।

इसलिए, 2012-13 में भारतीय मीडिया में सिर्फ टोन में बदलाव आया था। उन्होंने 2002 पर काफी समय तक सुई घुमाई। यूट्यूब पर करन थापर द्वारा मोदी को पानी पिलाने वाले वीडियो ही चलते रहे। उन्हें लगा कि हर बार की तरह, झूठ और प्रलाप के साथ, स्टूडियो से रैली करने वाली पत्रकारिता और एंकरों के सहारे वो इनएविटेबल को रोक लेंगे। मोदी इनएविटेबल का पर्याय बन कर आया, और लोकतांत्रिक संख्याबल के साथ आया।

इसलिए 2014 के बाद इन माओवंशी कामपंथी लम्पटों के गिरोह को लगा कि अगर इन्होंने रिपोर्टिंग की टोन को बदलने के साथ-साथ हिटलर के गोएबल्स वाली नीति नहीं अपनाई, तो लम्बे दौर में उनका अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। फिर अभ्युदय हुआ चोरों के नए गिरोह का जिसमें क्विंट, वायर, स्क्रॉल जैसे अजेंडाबाजों ने बीबीसी और एनडीटीवी जैसे पुराने पापियों की सवारी करते हुए जगह बनानी शुरू की।

फिर इन्होंने अपनी पुरानी, आजमाई हुई नीति अपनाई। अंग्रेजी में फेक न्यूज का कारोबार करना शुरू किया। इनका पूरा कच्चा-चिट्ठा आपको हमारी वेबसाइट के ‘फैक्ट चेक’ सेक्शन में मिल जाएगा। फेक न्यूज सिर्फ गलत खबर फैलानी नहीं होती, फेक न्यूज वैसे स्तंभ भी हैं, ओपिनियन आर्टिकल्स भी हैं जहाँ आप अपनी घटिया सोच और मनोवृति से पिक्सल काले करते हैं जिसमें तथ्य शून्य होता है, कल्पना पूरे सौ प्रतिशत।

अब मैं दो पैराग्राफ लिखूँगा जो आपको विशेष रूप से पढ़ना चाहिए। याद कीजिए कि भारत अचानक से असहिष्णु कैसे हो गया था! याद कीजिए कि जिस रोहित वेमुला के सुसाइड नोट में विनती थी कि उसकी मौत को राजनैतिक रंग न दिया जाए, उसके साथ क्या हुआ! याद कीजिए मोदी को किस तरह की मीडिया कवरेज मिली चुनावों के दौरान (दोनों बार) और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि कैसे धूमिल करने की लगातार कोशिशें होती रहीं। याद कीजिए कैसे कठुआ कांड ने वैश्विक पटल तक तहलका मचा दिया था। याद कीजिए गौरी लंकेश की हत्या को कैसे दिखाया गया था। याद कीजिए कि इन्होंने ‘जय श्री राम’ को कैसे आतंक का नारा बनाने की कोशिश की।

अब याद कीजिए जुनैद को और उन तमाम गौरक्षकों को, पुलिस वालों को जिन्हें गौतस्करों ने मौत के घाट उतार दिया। अब याद कीजिए रोहित वेमुला के बाद आत्महत्या करने वाले कई दलित छात्र-छात्राओं को जिनका नाम भी आप नहीं जानते। याद कीजिए ममता बनर्जी और अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए मजहबी दंगों को। याद कीजिए उन दसियों बच्चियों को जिनका बलात्कार मौलवियों ने मदरसे और मस्जिदों में किया। याद कीजिए गौरी लंकेश से पहले मार डाले गए बाईस पत्रकारों को जिन्हें ट्वीट भी नसीब नहीं हुआ। याद कीजिए उन ग्यारह खबरों को जहाँ समुदाय विशेष ने ‘जय श्री राम’ बुलवाने की झूठी बात फैलाई ताकि उन्हें कवरेज मिले।

अगर पहले के सारे मुद्दों की सही, तथ्यपरक, बिना अजेंडा की रिपोर्टिंग के साथ, दूसरे पैराग्राफ के सारे मुद्दों की रिपोर्टिंग, उसी प्रभाव से हुई होती तो ऑपइंडिया की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। हमारे जैसे लोग स्थापित पत्रकारों को कोसते हुए अपनी बात नहीं कहते। हम कुछ और मुद्दों पर लिखते, कुछ और बातें भी करते। लेकिन नैरेटिव पर कब्जे की लड़ाई में वैसे लोगों को आना पड़ा जो कहीं और थे, कुछ और कर रहे थे। अगर इस जहरीले नैरेटिव पर हमने हमला न किया होता, तो भारत की छवि के साथ-साथ पूरा समाज बिखर चुका होता क्योंकि हर ‘शांतिप्रिय’ यह सोचता कि हिन्दू उसे घर से बाहर निकलते ही काट देगा!

दो बार की कड़ी हार, घुटते साँस से भी गाली देते वामपंथी

2019 में वामपंथी लम्पटों और उनके बापों को पता चल गया कि उनकी लड़ाई अभिजात्यता की चाशनी में लिपटे अंग्रेजीदाँ चाटुकारों से नहीं है। तब उन्होंने नैरेटिव को मोड़ने की कोशिश की। पहले उन्होंने सोचा कि मोदी आएगा ही नहीं, फिर सोचा कि आएगा भी तो बहुमत नहीं मिलेगा, फिर सोचा कि इसके मंत्री घोटाला करेंगे तब घेरेंगे, फिर सोचा कि इसकी नीतियों से नुकसान होगा तब ढोल पीटेंगे, फिर सोचा कि टाइम बीतने पर सब कुछ बिखर जाएगा, फिर सोचा कि अगला चुनाव तो जीत ही नहीं पाएगा, फिर सोचा कि जीत भी गया तो बहुमत तो नहीं पाएगा, फिर सोचा…

ये बस सोचते रहे, और कुछ भी नहीं हुआ। सरकार की कुछ नीतियाँ गलत रही होंगी, आशा के अनुरूप फल नहीं मिले होंगे, लेकिन मोदी सरकार ने साबित किया कि उनका लक्ष्य न तो देश को तबाह करना है, न ही राष्ट्र के नाम पर पार्टी को मजबूत करना। वामपंथी चिरकुट लगातार लेख लिखते रहे, हर योजना को, हर नीति को बेकार कह कर डिसमिस करते रहे, लेकिन लोगों का भरोसा जगता गया।

यही भरोसा एनडीटीवी से लेकर स्क्रॉल, वायर, क्विंट, प्रिंट, बीबीसी आदि ने खोया। वामपंथियों और तथाकथित लिबरलों की एक खासियत है कि ये अपने दोगलेपन के खेल में इतने माहिर हैं कि ये परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं। ये अटल बिहारी को कट्टर कहते थे, फिर आडवाणी कट्टर हुए, फिर मोदी कट्टर हुए, फिर योगी कट्टर हुए। इस कट्टरपन की शृंखला में हर दूसरे के आते ही पहले को इन्हीं लम्पटों ने संत मान लिया। आज कल नए कट्टर अमित शाह हुए हैं।

2014 में जब मोदी आ गया था, तब इनकी चाल यह थी कि इसकी छवि को सुधरने ही न दिया जाए। लगातार निजी आक्षेप से लेकर वैसी बातों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया जिससे राष्ट्रीय तो छोड़िए, उस नेता के घर के बाहर के लोगों को भी फर्क नहीं पड़ता हो। सरकार और उसकी कार्यशैली पर सवाल नहीं हुए, सवाल इस पर उठे कि मोदी ने बीए किया है कि नहीं, मोदी की पत्नी क्यों उनके साथ नहीं है, मोदी हर रोज नए कपड़े क्यों पहनता है, मोदी राहुल गाँधी से डिबेट क्यों नहीं करता, मोदी एनडीटीवी को इंटरव्यू क्यों नहीं देता… ये थे राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे!

दुर्भाग्य से सोशल मीडिया के बूम से आम आदमी तक सच्चाई पहुँचने लगी। वैसे लोग जो अनौपचारिक रूप से फेसबुक पर पोस्ट करते थे, उन्हें एक दूसरे धड़े की उभरती मीडिया ने जगह देनी शुरू की। लोगों को जब अपने बीच के लोग सच बताने लगे, तो इस मीडिया को जगह मिली। साथ ही, इन अजेंडाबाजों की दुकान के शटर पर पत्थर फेंके जाने लगे।

दो ट्वीट कर के लिबरल बनने का शॉर्ट-‘कट’

अब इन्हें रिपोर्ट नहीं मिल रहे तो पूरा फोकस ही ‘वैचारिक स्तंभों’ यानी ओपिनियन पर केन्द्रित कर दिया है। हर वो व्यक्ति या पत्रकार जो खुल्लमखुल्ला गालियाँ दे रहा है भाजपा या मोदी को, उसे तुरंत लिंग छील कर लिबरल गैंग की सदस्यता दे दी जा रही है। बाज़ार में शोर किया जा रहा है कि ये आदमी लिबरल है। उसे भी कुछ साबित नहीं करना, कोई मापदंड नहीं, बस ज़िप खोलनी है, नंगा होना है, सबको पता चल जाता है कि महोदय लिबरल हैं, नंगे तो खैर हैं ही।

इसी ओपिनियनबाजी में, तथाकथित सोशल वर्कर, एक्टिविस्ट, फलाँ मामलों के स्वघोषित जानकार, फर्जी की फाइस्टी फेमिनिस्ट से लेकर नकारे, कुंठित और पूर्वग्रह से ग्रस्त लोगों को एक ही विषय पर लगातार लिखने कहा जाता है। हर लेख का निष्कर्ष पहले से तय होता है कि अमित शाह और नरेन्द्र मोदी अब भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बना ही देगा, ये दोनों समुदाय विशेष को हंट कर रहे हैं, प्रेस फ्रीडम को दबाया जा रहा है, डर का माहौल है, अघोषित आपातकाल यही है…

सत्य यह है कि मोदी सरकार के पाँच सालों में सिवाय इनके लेखों के इनका एक भी आरोप सही साबित नहीं हो पाया। न कोई घोटाला, न नीतिगत असफलता, न इकोनॉमी बर्बाद हुई, न दंगे हुए, न अल्पसंख्यक कहीं भी डर से जी रहा है। इसी मीडिया ने ये पूरा माहौल मैनुफैक्चर किया और पूरी कोशिश की कि लोग इनके हर अजेंडा को पत्थर की लकीर मान कर आगे बढ़ जाएँ।

हुआ इसके उलट यह बात कि अखलाख की भीड़ हत्या की हुई, तो ऐसे दसियों मामले सामने आए जहाँ इस्लामी भीड़ ने निर्दोष हिन्दू को काट दिया, रेत दिया, पीट कर मार दिया। बात गाय चुरा कर भागते मजहबी गौतस्करों की हुई तो दसियों मामले ऐसे सामने आए जहाँ गौरक्षकों को, पुलिस वालों को इन्हीं गौतस्करों ने जान से मार दिया, उन पर गोली बारी की। बात कट्टरपंथियों के डरे होने की हुई और कई मामले ऐसे सामने आए जहाँ उन्होंने बिना किसी कारण हिन्दू काँवड़ियों पर पत्थरबाजी की, उनके कई मंदिरों को लगातार तोड़ा।

इनके अजेंडे को बार-बार दूसरे धड़े के पत्रकारों ने बेहतर लेख और तथ्य के साथ काटा। परिणाम सामने है कि अब इन्हें पढ़ने वाले वही हैं जिनके भीतर अज्ञानता का अंधेरा है या फिर मतलब के विचारों को तथ्य मानने की विवशता। साथ ही, अगर आप इनके सोशल मीडिया पोस्टों पर जाएँ तो सहमति और असहमति दिखाने वालों का अनुपात बहुत कुछ बता देगा।

हमें नीचा दिखाने की नाकाम कोशिश

जब इन नग्न लेनिनवंशियों को इन्हीं के अंदाज में पटखनी दी जाने लगी तो बिलबिलाने लगे। ये कहने लगे कि हमारे शब्द गलत हैं, पत्रकारिता की शैली मर्यादा में नहीं है। कहा जाने लगा कि ये लोग तो गाली देते हैं। अरे शोना बाबू, काम गाली खाने वाला करोगे तो क्या तुम्हारी आरती उतारी जाए? लोगों में जहर बोने का काम तुम करोगे, हर दिन लोगों को डराओगे कि सामने वाले ने अगर ललाट पर तिलक लगाया है तो वो तुम्हें गली में छुरा मार देगा। हर लेख में लोगों को आने वाले बहुत बुरे भविष्य की मनगढ़ंत तस्वीर दिखाने का काम तुम करो, ताकि वो आदमी मन में इतनी घृणा पाल ले कि आईसिस तक से हिन्दुओं के खात्मे के लिए मदद माँगने लगे, और चाहते हो कि हम जो लेख लिखें, वो तुमसे पहले एडिट करवा लें!

ऐसे नहीं होता है। तुम अपनी दोगलई करो, हम अपनी पत्रकारिता करेंगे। हमारे शब्दों का चुनाव हम करेंगे। शब्द स्वतंत्र रूप से गाली नहीं होते, संदर्भ उन्हें गाली बनाता है, कटाक्ष बनाता है, परिहास बनाता है, विशेषण बनाता है। इसलिए, हमें ज्ञान देना बंद करो और तथ्यों के साथ पत्रकारिता करो, क्योंकि तुम्हारे लिखने से यह साबित नहीं हो जाता कि तबरेज को ‘जय श्री राम’ न बोलने के लिए भीड़ ने मार दिया। तुम पुलिस केस बनने से पहले अपराधी तलाश लेते हो, फिर उसमें धर्म घुसा देते हो, फिर एक नारा, फिर किसी दूर के संबंधी का भाजपा कनेक्शन ढूँढ लाते हो, और इसे ग्राउंड रिपोर्ट कह देते हो।

वो दिन बीत गए। पत्रकारिता तथ्यों से होगी, नैरेटिव से नहीं। नैरेटिव ही बनाना है तो वो हम बनाएँगे कि दो महीने तुम भले ही ‘जय श्री राम’ वाली खबरें खूब घुमाओ, हम उतने ही दिन में वैसी हर खबर के गलत होने का सबूत तुम्हारे मुँह और नितंब, दोनों पर, खींच कर मारेंगे ताकि आवाज कहीं से न निकले। नैरेटिव ही बनाना है तो हम बनाएँगे कि कठुआ जैसे कांड तो एक-दो ही हैं, मौलवियों द्वारा बच्चियों के बलात्कार की जितनी खबरें बोलोगे, तारीख के साथ दिखाएँगे और तुम गिन नहीं पाओगे। नैरेटिव ही बनाना है तो हम बनाएँगे इस्लामी आतंकी आक्रांताओं ने सैकड़ों साल पहले भी हमारे मंदिर तोड़े और आज भी तोड़ रहे हैं। नैरेटिव ही बनाना है तो हम बनाएँगे कि पचास बार तुमने कैसे हिन्दुओं पर हुए हेटक्राइम पर कुछ नहीं बोला, जिसमें अपराधी के मुस्लिम होने की ख़बर आई।

ये नहीं चलेगा। लेकिन हाँ, तुम्हारी नग्नता का सर्कस चलते रहना चाहिए। इससे हमें फायदा है। हमें सिर्फ हेडलाइन पढ़ कर पता चल जाता है कि तुम्हारी खबर जबरदस्ती का एंगल लिए हुए है। हमें पता चल जाता है कि हमें कहाँ ढूँढना है और असली खबर दस मिनट में सामने आ जाती है कि तुमने ये पूरी स्टोरी सिर्फ हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए की थी। इसलिए, बने रहो। अपने उसूलों से समझौता करते रहो। तुम्हें लगता है कि मेफिस्टोफिलीस लूसिफर के आदेश पर तुम्हारी मदद कर रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है।

तुम्हारे चौबीस साल बीत जाएँगे। घड़ी में सात बजेगा। तुम घबरा कर याद करोगे कि जो निर्णय तुमने व्यक्तिविशेष की घृणा के कारण लिए और समाज को उससे क्षति पहुँचाई, वो कितने घातक थे। फिर मध्यरात्रि में नर्क के दूत आएँगे, तब तुम गिड़गिड़ाओगे, सही करने की कसमें खाओगे। लेकिन तुम्हें छोड़ा नहीं जाएगा। तुम्हारे दोस्तों को सुबह एक लाश मिलेगी, वो तुम्हारी तरह की पत्रकारिता की लाश होगी, क्षत-विक्षत।

कंपनी में छँटनी आत्महत्या का कारण नहीं: मृत कंप्यूटर ऑपरेटर के पिता ने किया BBC के प्रोपेगंडा का खंडन

मीडिया किस तरह से घटनाओं को घूमा-फिरा कर पेश करता है, इसका नमूना आप पहले भी देख चुके हैं। लेकिन, किसी व्यक्ति की दुःखद मौत के बाद उसकी लाश पर अपना प्रोपेगंडा चलाना कहाँ तक उचित है? वह भी एक अंतरराष्ट्रीय और काफ़ी पुरानी मीडिया संस्थान द्वारा ऐसी हरकत तो और भी शर्म की बात है। बीबीसी ने एक इंजीनियर की आत्महत्या पर गन्दा खेल खेला है और बीबीसी हिंदी के डिजिटल एडिटर मिलिंद खांडेकर जैसे पत्रकारों ने इसे आगे बढ़ाया। खांडेकर का ट्वीट देखिए:

सबसे पहले ख़बर के बारे में जानते हैं, फिर बीबीसी के प्रोपेगंडा पर वापस आएँगे और उसके बाद आपके सामने सच्चाई रखेंगे। दरअसल, भाजपा के बारीडीह मंडल के आईटी सह-संयोजक कुमार विश्वजीत के बेटे ने शुक्रवार (अगस्त 16, 2019) को आत्महत्या कर ली। 26 वर्षीय कुमार आशीष ‘टाटा मोटर्स’ के लिए जॉबवर्क करने वाली कंपनी ‘आटोमैटिक एक्सेल’ में कार्यरत थे। बीबीसी के अनुसार, वे अपनी आत्महत्या से पहले काफ़ी सहज थे और दोस्तों एवं परिवार के साथ समय बीता रहे थे।

इसके बाद बीबीसी ने इसमें और भी एंगल घुसेड़ा। पुलिस के हवाले से दावा किया गया कि उनके मन में नौकरी को लेकर असुरक्षा की भावना थी। अर्थात, बीबीसी ने पुलिस के हवाले से जॉब इन्सिक्युरिटी को आशीष की ख़ुदकुशी की वजह बताया। आशीष के पिता विश्वजीत ‘टाटा स्टील’ में कार्यरत हैं। बीबीसी ने विश्वजीत के हवाले से बताया कि घर में नौकरी जाने के बाद की स्थिति को लेकर बातें होती थीं।

‘टाटा स्टील’ में ट्रेनिंग को लेकर टेस्ट लिया जा रहा है। बीबीसी ने इन सारी चीजों की खिचड़ी बना कर यह दिखाने की कोशिश की कि नौकरियाँ जा रही हैं और इसी कारण लोग आत्महत्या कर रहे हैं। जबकि, बीबीसी से भी बात करते हुए विश्वजीत से साफ़-साफ़ कहा कि उन्हें आशीष की आत्महत्या का कारण नहीं पता। इसी ख़बर में पुलिस ने भी कहा कि आत्महत्या की मूल वजह का पता लगाया जा रहा है। मिलिंद खांडेकर और बीबीसी ने इसे ‘ऑटो कंपनियों में हो रही छँटनी’ से जोड़ कर अपना उल्लू सीधा किया।

अब आते हैं सच्चाई पर। आशीष के पिता विश्वजीत ने एक पत्र लिख कर उनके बेटे की आत्महत्या को लेकर मीडिया में चल रही भ्रामक ख़बरों को निराधार बताया है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लिखे पत्र में उन्होंने साफ़ किया है कि आशीष की आत्महत्या का कारण ‘कम्पनी द्वारा कर्मचारियों की छँटनी’ नहीं है। नीचे हम वह पत्र संलग्न कर रहे हैं, जो आशीष के पिता विश्वजीत ने पूर्वी सिंहभूम के वरिष्ठ एसपी को भेजा:

आशीष के पिता विश्वजीत का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लिखा गया पत्र

इस पत्र में विश्वजीत ने उन सारी ख़बरों का खंडन किया है, जिनमें आशीष की आत्महत्या की वजह ‘कम्पनी द्वारा की जाने वाली छँटनी’ को बताया गया है। उन्होंने अपने बेटे की मौत की वजह ‘पारिवारिक जिम्मेदारियों का तनाव’ और ‘घरेलू समस्या’ को बताया। ऐसे में, सोचिए उस पिता पर क्या गुजर रही होगी जिसके जवान बेटे के मृत्यु शोक को मीडिया के एक प्रोपेगंडा परस्त हिस्से द्वारा राजनीतिक जामा पहना कर बेचा जा रहा हो।

भूमाफिया आजम खान पर वक्फ सम्पत्तियाँ हड़पने के आरोप में मुकदमा दर्ज

पूर्व मंत्री और सपा के नंबर दो नेता से भूमाफिया घोषित हुए आजम खान पर अब वक़्फ़ बोर्ड की सम्पत्तियाँ हड़पने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया है। इसके अलावा उन पर शत्रु सम्पत्ति को वक़्फ़ सम्पत्ति बनाने का भी आरोप है।

रामपुर के अल्लामा नकवी ने की शिकायत

रामपुर के लोक सभा सांसद आजम खान पर मुकदमा भी रामपुर में ही दर्ज कराया गया है। रामपुर के अजीमनगर थाने में अल्लामा जमीर नकवी ने शिकायत की कि आजम खान, उनकी पत्नी तंजीन फातिमा, बेटे अब्दुल्ला आजम, उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल बोर्ड लखनऊ के अध्यक्ष वसीम रिजवी और सुन्नी वफ्फ बोर्ड के अध्यक्ष जुफर फारुखी सहित नौ लोगों ने कानून का उललंघन कर शत्रु सम्पत्ति को वक़्फ़ सम्पत्ति बनाया और नकली वक़्फ़ बोर्ड का भी गठन किया। उन्होंने अपनी शिकायत में लिखा कि कानून के मुताबिक वक़्फ़ की सम्पत्ति न किसी को ऐसे दी जा सकती है न ही उपहार में; इसी तरह शत्रु संपत्ति भी किसी को नहीं दी जा सकती।

आजम खान और अन्य पर मुकदमें आईपीसी की धाराओं 420, 467, 468, 471, 447, 409, 201, 120B, और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत दर्ज किए गए हैं।

रिसॉर्ट पर चल चुका है बुलडोजर, किताबें चुराने का भी आरोप

आजम खान पर इससे पहले मदरसे से किताबें चुराने, क्लब से शेर की मूर्तियाँ चुराने और बेटे के नाम पर रिसॉर्ट सिंचाई विभाग की ज़मीन ‘चुरा’ कर (अवैध कब्ज़ा कर) बनवाने के भी आरोप है। उनके ‘हमसफ़र रिसॉर्ट’ के एक हिस्से को तोड़ने के आदेश उपजिलाधिकारी ने तीन हफ्ते पहले ही दिए थे।

तमिलनाडु में मठ के स्वामी को समन, कहा था अब मूर्तियों पर इस्लामी हमले नहीं होते

तमिलनाडु में एक मंदिर के पुजारी को इस्लामी हमले नहीं होने की बात कहने पर पुलिस ने समन भेज दिया है। उन पर आरोप है कि ऐसा कहकर कि मूर्तियों पर अब इस्लामी हमले नहीं होते, उन्होंने साम्प्रदायिक वैमनस्य और नफरत भड़काने की कोशिश की है।

‘अब हमले नहीं होते तो विग्रह छिपाने का क्या औचित्य?’

श्रीविल्लीपुतुर स्थित श्री मानवाला मामुनिगळ जीयार मठ के पुजारी श्री सतगोप रामानुज जीयार स्वामी ने 22 जुलाई को कहा था कि उस मंदिर में मौजूद भगवान विष्णु के विग्रह आति वरदार को वापिस मंदिर के कुण्ड में रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह परम्परा विग्रह को इस्लामी आक्रांताओं से बचाने के लिए शुरू की गई थी, और अब जबकि इस्लामी हमले नहीं होते, विग्रह को खतरा नहीं है, तो इस परम्परा को चालू रखने का कोई मतलब नहीं है।

तौहीद जमात के जिला सचिव ने की पुलिस से शिकायत

जीयार स्वामी के इस बयान में सामुदायिक घृणा बढ़ाए जाने की बात होने की शिकायत सईद अली ने पुलिस से की। उन्होंने यह शिकायत मुख्यमंत्री स्पेशल सेल के ऑनलाइन पोर्टल से की। सईद अली ऑल इंडिया तौहीद जमात की काँचीपुरम इकाई के सचिव हैं। उनकी शिकायत के आधार पर जीयार स्वामी को श्रीविल्लीपुतुर पुलिस स्टेशन में हाजिर होने का समन भेजा गया है

48 दिन बाहर रहता है विग्रह, फिर 40 साल पानी में

अति वरदार विग्रह पेरुमल के नाम से जाने वाले भगवान विष्णु की 9 फ़ीट ऊँचा अंजीर की लकड़ी से बना विग्रह है (तमिल में अंजीर को आति कहते हैं)। 16वीं शताब्दी तक इसे मंदिर की गर्भ-गुड़ी (गर्भगृह) में पूजा जाता था।

जब इलाके में इस्लामी हमला शुरू हुआ तो मंदिर के अधिकारियों और पुजारियों (दत्तात्रेयों) ने चाँदी के बक्स में डालकर विग्रह को मंदिर के ही कुण्ड में छिपा दिया। सालों तक किसी को विग्रह के बारे में पता नहीं चला क्योंकि दोनों दत्तात्रेय बिना किसी को यह रहस्य बताए मर गए।

फिर देवराजा पेरुमल (भगवान विष्णु) की दूसरी मूर्ति बनाई गई और आति वरदार के विकल्प में उसी की पूजा होने लगी। फिर 1709 में जब किसी कारणवश मंदिर का कुण्ड खाली किया गया तो आति वरदार विग्रह बरामद हुआ। लेकिन तब मंदिर के अधिकारियों ने निर्णय लिया कि आति वरदार विग्रह 40 साल में एक बार ही 48 दिन के लिए मंदिर के कुण्ड से निकाल कर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा जाएगा।

इस साल उस दर्शन-काल में लगभग 1 करोड़ लोगों ने आति वरदार के दर्शन चेन्नै से 90 किलोमीटर दूर स्थित काँचीपुरम के श्री वरदराजा पेरुमल मंदिर में किए। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक सप्ताहांत पर तो श्रद्धालुओं को 10 से 12 घंटे तक भी इंतज़ार करना पड़ा, और कई दिन ऐसे रहे जब एक ही दिन में 3 लाख से अधिक श्रद्धालु विग्रह के दर्शनों के लिए जुटे।

इस अनोखे मंदिर में लोगों की अपार श्रद्धा है। यही वजह है कि भगवान अति वरदार भले ही 40 वर्ष तक जल समाधि में रहते हों, लेकिन पूरे साल इस मंदिर में भक्तों की भीड़ जुटती है। इससे पहले वर्ष 1979 में भगवान अति वरदान ने मंदिर के पवित्र तालाब से बाहर आकर भक्तों को दर्शन दिए थे।