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मुगलों ने हमें अमीर नहीं बनाया DailyO, भ्रामक तथ्यों के लेख लिखकर स्वरा भास्कर को मसाला मत दो

डेटा- यह एक ऐसी चीज है जिसका इस्तेमाल आजकल सच को समझाने के लिए कम और लोगों को बरगलाने में ज्यादा हो रहा है। आँकड़ों से खेल कर कल को यह भी साबित किया जा सकता है कि जलियाँवाला बाग़ में अंग्रेजों ने नरसंहार नहीं किया था बल्कि दीपावली के पटाखे फोड़े थे। आँकड़ों का प्रयोग कर के एक बार फिर से बरगलाने की कोशिश की गई है। डेलीओ में राणा सफ़वी द्वारा लिखे गए एक लेख में मुग़लों को महान साबित करने की कोशिश की गई है और इसके लिए कुछेक आँकड़ों के इस्तेमाल किए गए हैं। यहाँ हम उन आँकड़ों की पोल तो खोलेंगे ही, साथ ही यह भी बताएँगे कि इस खोखले नैरेटिव के पीछे कैसी साज़िश है? इस बहती जमुनी में स्वरा भाष्कर ने भी हाथ धोए और कहा कि मुग़लों ने भारत को धनवान बनाया।

सबसे पहले लेख की बात करते हैं। राणा सफ़वी ‘भारतीय मुग़ल’ पुस्तक के लेखक हरबंस मुखिया के हवाले से लिखती हैं कि मुग़लों को आक्रांता नहीं कहा जा सकता। उन्होंने लोगों के ‘इतिहास ज्ञान’ पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि हर आक्रमण को भारत में ब्रिटिश की तरह ही समझा गया। उन्होंने दावा किया है कि मुग़ल भले ही आक्रांता बन कर आए लेकिन वे यहाँ भारतियों की तरह रहे। साथ ही मुग़ल राजाओं द्वारा राजपूत स्त्रियों से सम्बन्ध बनाने और शादी करने को भी मुग़लों की ‘भारतीयता’ से जोड़ा गया है। मुग़लों ने राजपूतों को सेना में ऊँचे पद दिए।

इसके अलावा सबसे अजीब बात यह है कि 1857 के विद्रोह को भी मुग़लों की ही देन बताने की कोशिश की गई है। यहाँ लोगों के इतिहास ज्ञान पर सवाल खड़ा करने वाली राणा सफ़वी को ख़ुद इतिहास सीखने की ज़रूरत है। शायद राणा सफ़वी ने अकबर और जोधा की शादी को लेकर ऐसा लिखा है। मुग़ल राजाओं में किसी भारतीय से शादी करने वाला अकबर पहला बादशाह था और उसका बेटा जहाँगीर जोधा की कोख से ही पैदा हुआ। लेकिन, जोधा-अकबर के तथाकथित रोमांस को लेकर धारणा बनाते समय यह बात हमेशा छिपा दी जाती है कि यह पूरी तरह से एक राजनीतिक शादी थी।

जोधा के पिता आमेर के राजा भारमल अकबर के साले शरीफुद्दीन मिर्जा से परेशान थे। इसके बाद आमेर ने एक संधि के तहत अपने राज्य को मुग़लों को समर्पित कर दिया और अकबर-जोधा की शादी भी इसी का परिणाम थी। जोधा को शादी के बाद मरियम-उज़-ज़मानी नाम से जाना गया। यहाँ राणा सफ़वी इसी तरह की राजनीतिक शादियों को मुग़लों की तथाकथित भारतीयता से जोड़ रही हैं। अकबर ने और भी कई शादियाँ की, और इसके बाद भी मुग़ल राजाओं और राजपूत स्त्रियों की शादियाँ हुई लेकिन वे सभी राजनीतिक कारणों से हुईं। यह मुग़लों की और राजपूतों दोनों की ही मज़बूरी थी। मुग़ल लगातार शक्तिशाली होते जा रहे थे और कई राज्य उनसे सीधे उलझना नहीं चाहते थे। इसी तरह मुग़ल भी लड़ाइयों से बचते हुए अपनी सीमाएँ बढ़ाते जा रहे थे।

अब आते हैं 1857 के विद्रोह पर। चूँकि उस समय तक मुग़ल राज्य शक्तिहीन हो चुका था और बहादुर शाह जफ़र की कुछ ख़ास ताक़त बची नहीं थी। मराठों ने मुग़लों को पस्त कर रखा था और अंग्रेजों ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। हाँ, दिल्ली में अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की सेना ज़रूर अंग्रेजों से लोहा ले रही थी लेकिन जब 14 सितम्बर को अंग्रेज लाल किले पर पहुँचे, तब तक भयभीत बादशाह अपने पुरखे हुमायूँ के मक़बरे में जाकर छिप चुका था। झाँसी से लेकर आरा और ग्वालियर तक विद्रोह हुए और बहादुर शाह कहीं भी दृश्य में नहीं था। राणा सफ़वी ने यह भी गलत लिखा है कि 1857 की लड़ाई में बहादुर शाह ज़फर को ‘हिंदुस्तान का बादशाह’ मान कर पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया था- यह केवल गंगा-जमुना दोआब के क्षत्रपों का निर्णय था, जबकि आज़ादी की वह लड़ाई चटगाँव के कम्पनी सिपाहियों और आरा में कुँअर सिंह से लेकर काठियावाड़ तक धधक रही थी, और यह लोग अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे थे, मुगलों की गुलामी करने के लिए नहीं।

बहादुर शाह ज़फर को जब अपनी गद्दी जाने का डर सताने लगा, तब जाकर वो सक्रिय भी हुआ- वरना तो सालों तक तो उसने कभी दरबार तक लगाने की भी कोशिश नहीं की थी। इसके बाद लेखिका लिखती हैं कि 16वीं से लेकर 18वीं शताब्दी तक मुग़ल विश्व सबसे अमीर साम्राज्य था। क्या यह समृद्धि मुग़ल अफ़ग़ानिस्तान और अरब से लेकर आए थे? क्या मुग़लों ने अरब से धन लाया, जिससे भारत समृद्ध हुआ? उनके पूर्वज तो उलटा भारत को लूट कर गए थे- बल्कि मुग़ल तो हमेशा से अपने आप को लुटेरे, हत्यारे और बलात्कारी तैमूर का वंशज कहलाने में फख्र महसूस करते थे, ऐसा उनके समय के दस्तावेजों से भी पता चलता है। शासन भले ही मुग़लों का था लेकिन समृद्धि हिंदुस्तान में पहले से ही थी, जो इस्लामी शासनकाल में समय के साथ कम ही होती गई।

राणा सफ़वी एक फ्रेंच पर्यटक के हवाले से लिखती हैं कि विश्व के कोने-कोने से सोना-चाँदी भारत में आते थे। क्या यह नया था? दक्षिण भारत और रोम के बीच व्यापक व्यापार को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भारत इस मामले में हज़ारों वर्ष पूर्व से ही अग्रणी था। रोम से व्यापारी भारतीय मसालों व सुन्दर जानवरों के लिए आते थे और बदले में सोने के सिक्के देते थे- और ऐसा मैं नहीं कह रहा, चाचा नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में लिखा है। ऐसे कई रोमन सिक्के आज भी मौजूद हैं, जिसमें रोम के सम्राट अगस्टस के चित्र हैं। अतः भारत में दुनिया के कोने-कोने से सोने-चाँदी का आना कोई नई बात नहीं थी। बल्कि, रोमन साम्राज्य के समय हिंदुस्तान इतना सोना खींच रहा था कि भारत से व्यापार जारी रखने के लिए उन्हें अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना पड़ गया

आगे भारत की जीडीपी की बात की गई है लेकिन उससे पहले एक और झूठा नैरेटिव यह गढ़ने का प्रयास किया गया है कि हिन्दू अमीर होते थे और सारे धन उन्हीं के पास था। यह एक तर्क के रूप में बेहद बेतुका है। यह ऐसा ही है जैसे कोई यह तर्क दे कि रोम में सारा धन रोमन लोगों के पास था। यह ऐसा ही है जैसे कोई इतिहासकार यह सवाल करे कि मंगोलिया में सारी संपत्ति मंगोलों के पास ही क्यों थी? हिन्दू और इससे निकले बौद्ध, जैन व सिख सम्प्रदाय के लोग भारत के मूल निवासी हैं- ऐसे में आज से 500 वर्ष पहले की बात करते हुए यह पूछना बेमानी ही है कि भारत की संपत्ति इन लोगों के अधिकार में क्यों थी। अब आते हैं जीडीपी वाली बात पर। लेखिका ने ‘अंगस मैडिसन’ के हवाले से दर्शाया है कि भारत की जीडीपी सन 1600 से लेकर 1870 तक बढ़ती रही। इसके लिए एक तालिका पेश की गई है। लेकिन, इसमें एक लोच है।

इस तालिका में दिखया गया है कि सन 1600 में भारत की जीडीपी $74,250 मिलियन थी, जो सन 1700 में $90,450 मिलियन हो गई और अंततः 1870 में $134,882 मिलियन हो गई। अगर इन आँकड़ों की बात करें तो पहली नज़र में भारत की जीडीपी बढ़ती दिख रही है। लेकिन, क्या आपको पता है कि ब्रिटिश राज आने के बाद 1913 में भारत की जीडीपी इसी आँकड़े के हिसाब से $204,221 मिलियन डॉलर हो गई थी? राणा सफ़वी से बस एक सवाल, इसका क्रेडिट किसे दिया जाएग- मुग़लों को या फिर ब्रिटिश को? जहाँ सन 1600 में भारत की जीडीपी विश्व का 22.4% थी, सन 1820 में यह घट कर 16.1% हो गई।

इससे साफ़ पता चलता है कि भारत जिस तरह पहले विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा था, मुग़लों के समय अगर कुछ काल को छोड़ दिया जाए तो उस प्रतिस्पर्धा में भारत लगातार पिछड़ते चला गया। हाँ, शेरशाह सूरी द्वारा अपनाए गए कुछ वित्तीय नियम-क़ानून को जारी रख कर मुग़लों ने अर्थव्यवस्था में सुधार ज़रूर किए लेकिन बाद में मंदिरों के विध्वंस, सामूहिक हत्याकांड, बलात्कार और व्यापक लूटपाट की वजह से भारत समृद्धि और अमीरी के मामले में पीछे छूट गया। नीचे दिए गए इस ग्राफ को देखिए, जो ‘अंगस मैडिसन’ के आँकड़ों पर ही आधारित है। इसमें आप साफ़-साफ़ देख सकते हैं कैसे जब यूरोप और अमेरिका अपना दबदबा बढ़ा रहा था, भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक रेस में लगातार पिछड़ती जा रही थी। मुगलों के ‘मेहरबानी काल’ में ही चीन ने हमें पछाड़ा, और उससे पहले मुग़लों के मज़हबी बिरादरों दिल्ली सल्तनत के आक्रमण और शासन काल में भी कभी दुनिया की चोटी पर रही हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत आप देख सकते हैं।

सन 1600 से लेकर 1870 तक विश्व में भारत की जीडीपी का दबदबा गिरता चला गया (केसरिया रंग की लकीर)

भारत की अर्थव्यवस्था का विश्व में इतना दबदबा था कि यह विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और मौर्य एवं गुप्त काल से यह दबदबा बरकरार रहा। आख़िर क्या कारण है कि ‘अच्छे इस्लामिक आक्रांता’ और ‘बुरे इस्लामिक आक्रांता’ कौन थे, इस पर बहस कर इसकी कोशिश की जा रही है कि हिंदुस्तानी मुग़लों के शुक्रगुज़ार बनें? अगर हमारे घर में कोई घुस आए और हमारी संपत्ति पर ऐश करते हुए हमें घर का नौकर बना दे, क्या इसे हमारी समृद्धि के रूप में गिना जाएगा? क्या मेरे घर में घुस आने वाले डाकू की हम पूजा करें क्योंकि उसने मेरे धन को लूट कर अपने घर ले जाने की बजाए मेरे घर में बैठ कर ही अय्याशी की? नहीं, मुग़ल और ब्रिटिश को अलग कर के नहीं देखा जा सकता। केवल उनके द्वारा की गई हिंसा का स्तरों को मापा जा सकता है, उसकी तुलना की जा सकती है।

इस लेख की सबसे अजीब बात यह है कि दारा शिकोह द्वारा लिखी गई पुस्तक का तो जिक्र मुग़लों की महानता दिखाने के लिए किया गया है लेकिन ख़ुद शिकोह का क्या हुआ, इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। ज़ंजीर में बँधे शिकोह को मैले हाथी पर बिठा कर दिल्ली की सैकड़ों पर घुमाया गया था। पर्यटक ‘निक्कोलाओ मनुक्की’ लिखते हैं कि जब औरंगजेब के आदेश पर दारा शिकोह का कटा हुआ सिर उसके सम्मुख लाया गया तो उसने उस पर तलवार से तीन वार किया और उस सिर को कुचल डाला। इसके बाद सैनिकों को आदेश दिया गया कि जेल में बंद शिकोह (और औरंगज़ेब) के बूढ़े बाप शाहजहाँ को यह सिर तब पेश किया जाए, जब वह भोजन करने बैठे। मुग़लों के भारत में धर्मनिरपेक्षता की सज़ा यही थी।

आज एक बार फिर से यह याद दिलाना ज़रूरी है कि भारत में मुग़लों द्वारा किए गए जिन कार्यों को अच्छा गिनाने की कोशिश की जा रही है, वह सब राजनीतिक रूप से ख़ुद को मजबूत करने के लिए किए गए थे। मुग़ल ख़ुद यहीं के होकर रह गए क्योंकि उन्हें यहाँ अय्याशी और राज करना था। उन्होंने दिल्ली-आगरा की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहाँ राजधानी स्थापित की और बाकी के इस्लामिक आक्रांताओं की तरह ही मंदिरों को ध्वस्त किया, बलात्कार किए, जबरन मतांतरण को बढ़ावा दिया, हिन्दुओं पर जज़िया लगाया गया और इस्लाम कबूल न करने पर नृशंस यातनाएँ दी गईं। भारत की अर्थव्यवस्था के सच से अधिक झूठ में पगे हुए आँकड़े पेश कर देने से मारकाट मचा कर सत्ता हथियाने वाले मुग़ल महान नहीं हो जाएँगे। हमारे घर में आकर, हमें ही मार कर, हमारी संपत्ति पर अय्याशी करने वाले को महान कैसे कह दें?

सायरा बानो की मौत पर अस्पताल में भीड़ का उत्पात: डॉक्टरों ने किया कार्य बहिष्कार, इमरजेंसी सेवाएँ ठप

लखनऊ में एक मुस्लिम महिला मरीज की मृत्यु के बाद परिजनों द्वारा अस्पताल में तोड़फोड़ किए जाने की घटना सामने आई है। बताया जा रहा है कि सायरा बानो के इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए उनके परिजन करीब 100 लोगों के साथ लखनऊ के केजीएमयू की लारी कार्डियोलॉजी में घुस आए और जमकर उपद्रव किया। इसके बाद डॉक्टरों ने कार्य बहिष्कार कर दिया।

डॉक्टरों का दावा, महिला ‘ब्रेनडेड’ हालत में लाई गई

डॉक्टरों का दावा है कि सायरा बानो को जब रात में अस्पताल लाया गया तो वह ‘ब्रेनडेड’ हालत में थीं- यानी उनका दिमाग पहले से ही मृत था। इसके बावजूद परिजनों की तसल्ली के लिए पेसमेकर भी लगाया गया। लेकिन फिर भी तीमारदार संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया। डॉक्टरों-कर्मचारियों के लाख समझाने पर भी वेनहीं माने

देखते-ही-देखते वो अपने साथ एक भीड़ ले आए, जिसकी संख्या विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में 50 से लेकर 100 तक बताई जा रही है। भीड़ ने अस्पताल में तोड़फोड़ और मारपीट शुरू कर दी, जिसके बाद अस्पताल के कर्मचारियों में अफ़रा-तफ़री मच गई। अधिकांश डॉक्टरों ने क्लोक रूम में छिप कर जान बचाई, वहीं दो डॉक्टरों को बाथरूम में शरण लेनी पड़ी। तीमारदारों को शांत करने के लिए 3 थानों की पुलिस लगानी पड़ी। कुछ मीडिया रिपोर्टों में तो दावा किया गया है कि भीड़ का आवेश इतना उग्र था कि पुलिस भी लाचार खड़ी देखती ही रही। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक पुलिस के सामने भी तीमारदारों का दुर्व्यवहार जारी रहा

डॉक्टरों ने काम रोका

हिंसा से बिफरे रेजिडेंट डॉक्टरों ने इमरजेंसी सेवाएँ ठप कर दीं। गंभीर हृदय रोगियों को ट्रॉमा सेंटर ले जाने को कह दिया गया। ओपीडी सेवाएँ देर से शुरू हुईं, और इमरजेंसी सेवाएँ शाम तक बाधित रहीं। शाम को जब कार्डियोलॉजी के बाहर पीएसी तैनात कर दी गई और प्रशासन ने अतिरिक्त पुलिस चौकी लगाने का आश्वासन दिया, तब जाकर डॉक्टरों ने इमरजेंसी सेवाएँ शुरू कीं।

चेहरे को कुचला, हाथ को किया क्षत-विक्षत… उभरती मॉडल ख़ुशी परिहार का बॉयफ्रेंड अशरफ़ शेख़ गिरफ़्तार

महाराष्ट्र में नागपुर और पांडुरना के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 47 पर शहर से लगभग 50 किमी दूर चतरपुर में एक उभरती मॉडल का शव पाया गया। उसके सिर और चेहरे को बुरी तरह से कुचला गया था। मृतका की पहचान 20 वर्षीया ख़ुशी परिहार के रूप में हुई है। ख़ुशी परिहार ने शहर में कई फैशन शो में भाग लिया था।

इस संबंध में केलवद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर जाँच शुरू की। शुरुआती जाँच में ख़ुशी के बॉयफ्रेंड अशरफ़ शेख़ का नाम सामने आया, जो गिट्टीखदान के कथित ड्रग्स का धंधा करने वाले का बेटा है। पुलिस के अनुसार हत्या के बाद सबूत को नष्ट करने का भरपूर प्रयास किया गया लेकिन अशरफ़ गिरफ़्तारी से बच नहीं पाया

कैसे पकड़ाया हत्यारा

घटनास्थल पर मृतका की पोशाक को देखकर पुलिस ने अंदाज़ा लगाया कि उसका संबंध शहरी क्षेत्र से है। जल्द ही पुलिस ने आसपास के थानों में गुमशुदगी की जाँच शुरू कर दी। मृतका के शरीर पर तीन टैटू थे। पहला टैटू-
‘ख़ुशी’ नाम से उसकी पीठ पर था, दूसरा टैटू- उसके सीने पर मुकुट के साथ ‘क्वीन’ था। तीसरा टैटू- उसके एक हाथ में – ‘आशु’ नाम से देखा गया।

मृतका की पहचान करने में इन तीनों टैटुओं ने पुलिस की काफ़ी मदद की। एक मुखबिर ने पुलिस को बताया कि यह शव शायद एक उभरती मॉडल खुशी परिहार का है। इसके बाद पुलिस ने उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स को भी सर्च किया और टैटू से उसकी पहचान का पता लगाया।

जब पुलिस ने ख़ुशी की तस्वीरों में अशरफ़ को देखा तो उसकी तलाश शुरू कर दी। फिर अशरफ़ को जल्द ही केलवद पुलिस ने ढूँढ़ निकाला।

मोबाइल लोकेशन से खेल खत्म!

अशरफ़ से पूछताछ के दौरान पुलिस को यह अनुमान हो गया था कि वो उन्हें गुमराह करने की कोशिश कर रहा है। दरअसल, ख़ुशी शुक्रवार (12 जुलाई) की रात 9 बजे उससे मिली थी। जब पुलिस ने उसके मोबाइल की लोकेशन चेक की, तो पता चला कि वो दोनों शुक्रवार को देर रात तक एकसाथ थे।

उभरती मॉडल ख़ुशी परिहार की बेरहमी से की गई हत्या (तस्वीर सौजन्य: नागपुर टुडे)

पुलिस की सख्ती के बाद अशरफ़ ने क़बूल किया कि वो और ख़ुशी कलामना के एक ढाबे में गए थे जहाँ उन्होंने शराब पी थी और खाना खाया था। वहाँ से वे पांढुर्ना की ओर चले गए जहाँ ख़ुशी की अन्य लोगों से दोस्ती को लेकर उनमें आपस में झगड़ा हो गया। इसी झगड़े के बाद उसने खुशी की हत्या कर दी।

अशरफ़ ने पुलिस को बताया कि आने वाले 10 दिनों में उनकी शादी होने वाली थी। अशरफ़ ने हाल ही में किराए पर गिट्टीखदान में एक फ्लैट भी लिया था, जहाँ ख़ुशी रहती थी। उसने उसे एक मोबाइल और एक कार भी दी थी। इस मामले में पुलिस अन्य एंगल से भी जाँच कर रही है।

सिद्धू एक महीने पहले दे चुके इस्तीफा! लेकिन मंत्रीपद का इस्तीफा RaGa को क्यों, राजनीतिक स्टंट के लिए?

पंजाब कॉन्ग्रेस के नेता, पूर्व क्रिकेटर, कमेंटेटर और अमरिंदर सिंह सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने दावा किया है कि वह एक महीने से अधिक समय पहले 10 जून को ही पंजाब सरकार के मंत्रीपद से इस्तीफा दे चुके हैं। आज (14 जुलाई, 2019) को उन्होंने उस इस्तीफ़े की एक प्रति भी जारी की

लेकिन इसमें दिलचस्प बात यह है कि यह इस्तीफा उन्होंने मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह या पंजाब के राज्यपाल वीपी सिंह बदनोर को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस के तत्कालीन (?) अध्यक्ष राहुल गाँधी को भेजा था। उन्होंने उसी ट्वीट के ठीक बाद यह भी ट्वीट किया कि वह अपना त्यागपत्र कैप्टेन अमरिंदर सिंह को भी भेजेंगे।

यहाँ यह समझ लेना जरूरी है कि अगर उन्होंने अभी तक इस्तीफा केवल राहुल गाँधी को भेजा है, और मुख्यमंत्री या राज्यपाल को नहीं, जैसा कि उनके ट्वीट से लगता है, तो यह इस्तीफा संवैधानिक रूप से सहीं नहीं हो सकता। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनकी पार्टी के अध्यक्ष को मंत्रियों की नियुक्ति, कार्य में हस्तक्षेप या इस्तीफ़े लेने का प्राधिकार नहीं है। उनका त्यागपत्र मान्य तभी होता, या भविष्य में भी तभी मान्य होगा, जब वह मुख्यमंत्री या राज्यपाल द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। वह अधिक-से-अधिक राहुल गाँधी को मुख्यमंत्री या राज्यपाल को सम्बोधित इस्तीफे की प्रति भेज सकते थे- वह भी तब यदि त्यागपत्र गोपनीयता की संवैधानिक शपथ के दायरे से बाहर का दस्तावेज हो, अन्यथा वह भी नहीं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सिद्धू को यह सब सामान्य राजनीतिक बातें पता ही नहीं हैं, या फिर यह ‘इस्तीफ़ा’ केवल एक राजनीतिक ‘स्टंट’ है। अगर उन्हें यह पता ही नहीं था कि उनका इस्तीफा लेने का अधिकार राहुल गाँधी को नहीं, अमरिंदर सिंह को है तो यह मंत्री के तौर पर उनकी काबिलियत पर प्रश्नचिह्न है। और यदि यह महज़ एक राजनीतिक स्टंट है तो… इसका जवाब बेहतर सिद्धू ही दे सकते हैं।

गणेश और कार्तिकेय SAME-SEX LOVE से पैदा हुए, RSS गुजरात दंगों के हमलावर: DU के सिलेबस का विरोध

दिल्ली विश्वविद्यालय के इंग्लिश डिपार्टमेंट से संबंधित अध्ययन सामग्री विवादों के घेरे में है। विश्वविद्यालय में गुजरात दंगों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका और हिंदू देवताओं से संबंधित विवादित अध्ययन सामग्री को सिलेबस में शामिल करने का विरोध किया जा रहा है। यह विरोध गुरुवार (11 जुलाई) को स्नातक पाठ्यक्रम की समीक्षा के लिए गठित एक स्थायी समिति की बैठक में किया गया।

स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य रसल सिंह के अनुसार, गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित एक कहानी ‘Manibein alias Bibijaan’ में बजरंग दल और RSS से संबंधित संगठनों को बेहद ख़राब भूमिका में दर्शाया गया है। उन्होंने कहा, “उन्हें (RSS और बजरंग दल) गुजरात दंगों में हमलावर के रूप में दिखाया जा रहा है।”

रसल सिंह ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि हिंदू देवताओं का चित्रण समलैंगिक के रूप में किया जाएगा, ‘जिसके लिए संदर्भ भागवत पुराण, शंकर पुराण, शिव पुराण से दिया जाएगा’।

रसल सिंह ने यह भी कहा कि उन्होंने समिति के समक्ष अपनी आपत्तियाँ रखी हैं। इसके लिए उन्हें सूचित किया गया है कि उनकी असहमति को सोमवार (15 जुलाई) को अकादमिक परिषद की बैठक में इंग्लिश डिपार्टमेंट द्वारा प्रकाश में लाया जाएगा।

उन्होंने च्वाइस बेस्ड करिकुलम सिस्टम में किए गए बदलावों पर भी प्रकाश डाला। इस पर उन्होंने कहा कि सिलेबस को 30% के बजाय पूरी तरह से बदल दिया गया। श्री सिंह ने कहा कि कम्युनिकेशन स्किल्स का पेपर पूरी तरह से साहित्य से भर दिया गया है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि ‘इंग्लिश में भारतीय लेखन’ के पेपर की जगह, ‘Litrerature and Caste’ और ‘Interrogating Queerness’ शुरू किए जा रहे थे।

सिंह ने प्राचीन और वैदिक साहित्य में समलैंगिकता के बारे में बात करते हुए ‘Interrogating Queerness’ पर शिक़ायत की। उन्होंने कहा,

“मैंने एक अध्याय पर आपत्ति जताई, जिसमें बताया गया है कि प्राचीन और वैदिक साहित्य में LGBTQ का मूल कैसे पाया जाता है। और उन्होंने एक उदाहरण दिया कि गणेश और कार्तिकेय दोनों Same-Sex Love से पैदा हुए थे। यह आपत्तिजनक है। ऐसी सामग्री दिमाग के लिए ज़हरीली है और हानिकारक व विभाजनकारी है। यह भारतीय राज्य, संस्कृति और लोकाचार के ख़िलाफ़ एक साज़िश है।”

इंग्लिश डिपार्टमेंट के प्रमुख राज कुमार ने रसल सिंह के दावों पर कहा,

“एकैडमिक काउंसिल के सदस्य अनावश्यक रूप से हमारे सिलेबस को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं, बावजूद इसके कि हम उन्हें समझा रहे हैं कि हम अपने सिलेबस में कई दृष्टिकोण दे रहे हैं। कहानी काल्पनिक है और वास्तव में गुजरात दंगों के बारे में नहीं है। लेकिन हमारे छात्रों को सिखाने के लिए कुछ है कि एक इंसान की कोई एक निश्चित पहचान कैसे नहीं हो सकती। इसकी वजह यह है कि कहानी में एक चरित्र है।”

स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग (SOL) के इंग्लिश डिपार्टमेंट के एक शिक्षक ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि यह कहानी लंबे समय से डीयू के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “यह डीयू के पुराने इंग्लिश पाठ्यक्रम में था और इसलिए SOL में भी हमारे पास है।” लेकिन शिक्षक, जो गुमनाम रहना चाहते थे, उन्होंने इस कहानी की प्रकृति साम्प्रदायिक है पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।


तमिलनाडु में दहशत के ठिकानों पर छापा, NIA ने किया 3 संदिग्ध आतंकियों को किया गिरफ्तार

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने तमिलनाडु में छापा मार कर तीन जिहाद-संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। संदिग्धों के पास से 9 मोबाइल फ़ोन, 15 सिम कार्ड, 3 लैपटॉप, 5 हार्ड डिस्क, 7 मेमोरी कार्ड, 3 सीडी/डीवीडी, 2 टैबलेट और 6 पेन ड्राइव बरामद हुए हैं। इसके अलावा, छापेमारी में काफी मात्रा में किताबें, मैगज़ीन, बैनर, पोस्टर, नोट्स इत्यादि भी जब्त किए गए हैं।

दो शहरों में, चार ठिकानों पर छापे

चेन्नै और नागापट्टिनम के दो-दो ठिकानों पर पड़े इस छापे का मकसद कोयम्बटोर में पिछले महीने गिरफ्तार 6 आईएस समर्थकों के गिरोह की पड़ताल था। NIA के मुताबिक, पकड़े गए लोगों में श्री लंका सीरियल बम धमाकों के मास्टरमाइंड माने जा रहे ज़ाहरान हाशिम का फेसबुक फ्रेंड मोहम्मद अज़हरुद्दीन भी था। इन 6 लोगों की गिरफ़्तारी के बाद इनके घरों और कार्यस्थलों पर पड़े छापे में ऐसे दस्तावेज भी बरामद हुए थे, जिनमें दक्षिण भारत, खास कर तमिलनाडु और केरल में आतंकी हमले करने के लिए युवाओं की भर्ती हेतु आईएस की विचारधारा सोशल मीडिया में फैलाने की बात थी।

चेन्नै में छापा, वहादे इस्लामी हिन्द संस्था के मन्नाडी स्थित कार्यालय पर मारा गया। इसके अलावा संस्था के राज्य अध्यक्ष मोहम्मद सईद बुखारी के घर पर भी छपा पड़ा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसके लिए नई दिल्ली से 7 अफसरों की टीम आई थी। इसके अलावा नागापट्टिनम में हसन अली युनुस्मारिकार के अड्डों पर भी NIA, केरल की टीम बुलाए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है।

NIA ने एक स्टेटमेंट जारी कर बताया कि सईद बुखारी, हसन अली और नागापट्टिनम के ही निवासी मोहम्मद युसफुद्दीन हरीश मोहम्मद के खिलाफ मामला आईपीसी की धाराओं के अलावा UAPA के अंतर्गत भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए आतंकवादी गैंग बनाने को लेकर दर्ज किया गया है। इसके साथ ही एनआईए का कहना है कि आरोपित सैयद मोहम्मद बुखारी, हसन अली और मोहम्मद युसुफुद्दीन और उसके सहयोगियों ने बड़े पैमाने पर फंड जुटाया है। ये लोग भारत में आतंकी हमलों को अंजाम देने की तैयारी कर रहे थे। इन आतंकियों का मंसूबा भारत में इस्लामिक राज्य की स्थापना करना है।

गौ तस्करी के आरोपित को पकड़ने गई पुलिस पर फायरिंग, महिलाओं ने की पत्थरबाजी: 7 पुलिसकर्मी घायल

प्रयागराज में गौ तस्करी के आरोपी को गिरफ़्तार करने गई यूपी पुलिस पर गाँव वालों ने हमला कर दिया। हमला भी ऐसा-वैसा नहीं, बाकायदा पुलिस पर फायरिंग। इसके चलते आरोपित भागने में सफल रहा और 7 पुलिस वाले घायल भी हो गए। मामला जनपद के धूमनगंज स्थित मरियाडीह गाँव का है। घायल पुलिसकर्मियों का इलाज कॉल्विन अस्पताल में चल रहा है।

गाँव में पुलिस ने डाला पहरा

हमले के बाद शांति-भंग जैसी किसी घटना से निपटने के लिए भारी मात्रा में पुलिस बल की तैनाती गाँव में कर दी गई है। मीडिया से बात करते हुए एसपी (क्राइम) आशुतोष मिश्र ने कहा कि हमले में शामिल आरोपितों को जल्दी ही हिरासत में ले लिया जाएगा। देर रात तक हमलावरों की तलाश में पुलिस की दबिश पड़ते रहने की बात भी मीडिया रिपोर्टों में सामने आ रही है।

फ़रार आरोपित की सूचना पाकर पहुँची थी पुलिस

आशुतोष मिश्र के मुताबिक नुरैन नामक व्यक्ति गौ तस्करी मामले में फ़रार चल रहा है। शनिवार शाम उसके घर पर होने की सूचना पाकर पहुँची बम्हरौली थाना क्षेत्र के आठ पुलिसकर्मियों की टीम ने उसे धर दबोचा। लेकिन नुरैन को लेकर जब पुलिस जाने लगी तो महिलाओं समेत सैकड़ों की संख्या में इकट्ठा भीड़ ने पुलिस को घेर लिया। अचानक से पुलिस पर लाठी-डंडों और पत्थरों से हमले होने लगे। मौका पाकर कुछ युवक नुरैन को ले भागने में सफल रहे।

पीछा करने वाले चौकी प्रभारी पर फायरिंग

बम्हरौली के चौकी प्रभारी नित्यानंद सिंह ने जब नुरैन का पीछा किया तो उन पर फायरिंग की गई। इसके बाद जान बचाने के लिए पुलिस को पीछे हटना पड़ा। जब इस वारदात की सूचना उच्चाधिकारियों को मिली तो तुरंत हरकत में आए सिविल लाइन्स के सीओ (सर्कल अफसर) 6 थानों का पुलिस बल और पीएसी लेकर खुद मौके पर पहुँचे। पुलिस फ़ोर्स की मौजूदगी देख ग्रामीण तितर-बितर हो गए

पुलिस ने 20 लोगों को नामजद किया है और अन्य अज्ञात आरोपियों का भी जिक्र मामले में है। सभी के खिलाफ हत्या के प्रयास समेत गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। आपको बता दें कि यह इलाका प्रदेश में कुख्यात बाहुबली अतीक अहमद का गढ़ है। जनपद में सर्वाधिक अपराध वाले इलाके में भी इसकी गिनती होती है।

FB पोस्ट पर बवाल: अंजुमन कमिटी की FIR पर लड़की को जेल, संप्रदाय-विशेष के लोग अब भी बाहर

इन दिनों धर्म और संप्रदाय को लेकर लोगों के बीच काफी रोष का माहौल व्याप्त है। लोग अपनी सोशल मीडिया वॉल पर किसी धर्म को लेकर कुछ भावनाएँ व्यक्त करते हैं तो समुदाय विशेष द्वारा उसे सांप्रदायिक तनाव का कारण करार दिया जाता है। इसे आपसी सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश बताते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही जाती है। और प्रशासन के लिए डर का माहौल कुछ इस कदर है कि इन मामलों में पुलिस भी बिना जाँच किए त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित को जेल में डाल देती है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है राँची के पिठोरिया से। यहाँ ग्रेजुएशन पार्ट थ्री में पढ़ाई करने वाली एक युवती पर आरोप है कि उसने फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए धर्म-विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इससे समुदाय विशेष के लोग आहत हो गए।

अंजुमन कमिटी पिठोरिया ने लड़की के पोस्ट को आपत्तिजनक और धार्मिक भावना को आहत करने वाला बताते हुए उसके खिलाफ पिठोरिया थाने में एफआईआर दर्ज करा दिया। इसके बाद पुलिस ने अंजुमन कमिटी की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई करते हुए 2 घंटे के भीतर उस युवती को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जानकारी के मुताबिक, कमिटी द्वारा 4 बजे आवेदन किया गया था और 6 बजे लड़की को थाने ले जाया गया और फिर जेल में डाल दिया गया। इससे आक्रोशित लोगों का कहना है कि युवती को दो घंटे के अंदर जेल भेज दिया गया, जबकि कई गंभीर टिप्पणी करने वाले बाहर हैं।

थानेदार द्वारा बिना जाँच-पड़ताल किए लड़की को जेल भेजने के खिलाफ शनिवार (जुलाई 13, 2019) को जनाक्रोश भड़क गया। लोग लड़की को रिहा करने और थानेदार पर कार्वाई की माँग कर रहे थे। उनका कहना था कि थानेदार ने उचित कार्रवाई न करते हुए अपनी मनमानी की है। लड़की की जल्द से जल्द रिहाई करवाने को लेकर लोग धरने पर बैठ गए और थानेदार विनोद राम के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। लड़की के समर्थन में विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस, बजरंग दल, हिंदू जागरण मंच के राँची जिला के पदाधिकारी भी थाना पहुँचे। लोगों ने थानेदार पर एकतरफा कार्रवाई करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि अगर जिस धर्म को लेकर लड़की ने टिप्पणी की है, तो उसी धर्म के लोगों ने प्रतिक्रिया में लड़की के धर्म को लेकर भी बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की है। ऐसे में जब मामला दोनों तरफ से था तो फिर कार्रवाई एकतरफा क्यों की गई?

अंजुमन कमिटी द्वारा थाने में दर्ज की गई शिकायत

मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीण एसपी आशुतोष शेखर व एएसपी अमित रेणु भी वहाँ पहुँचे। उन्होंने लोगों को समझाया और आश्वासन दिया कि उनके द्वारा उठाए गए सभी पहलूओं की जाँच होगी औ अगर जाँच के दौरान ये पाया जाता है कि थानेदार विनोद राम दोषी हैं, तो उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उस फेसबुक पोस्ट की भी जाँच होगी, जिसको लेकर गिरफ्तारी हुई और उसमें अगर दूसरा पक्ष भी दोषी पाया जाएगा तो उन्हें भी बख्‍शा नहीं जाएगा। वहीं, लड़की की रिहाई को लेकर कहा गया कि उसे सोमवार (जुलाई 15, 2019) को बेल पर रिहा कर दिया जाएगा।

चुनाव से पहले दिल्ली कॉन्ग्रेस में फूट: शीला दीक्षित-पीसी चाको के मतभेद आए सामने

दिल्ली कॉन्ग्रेस की गुटबाजी एक बार फिर से खुलकर सामने आने लगी है। दिल्ली कॉन्ग्रेस में 14 जिला कॉन्ग्रेस कमिटी पर्यवेक्षक और 280 ब्लॉक कॉन्ग्रेस कमिटी पर्यवेक्षकों की नियुक्ति को लेकर रार छिड़ गई है। प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित के इस फैसले का विरोध करते हुए दिल्ली के तीन कार्यकारी अध्यक्ष हारुन युसुफ, देवेंद्र यादव और राजेश लिलोथिया ने सीधे राहुल गाँधी को खत लिखकर शिकायत की है। इसके अलावा उन्होंने कॉन्ग्रेस के दिल्ली प्रभारी पीसी चाको और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को भी खत लिखा है।

पत्र में तीनों कार्यकारी अध्यक्षों ने लिखा कि शीला दीक्षित ने इन नियुक्तियों को लेकर न तो उनसे कोई सलाह ली और न ही उन्हें सूचित किया गया। शीला दीक्षित ने खुद ही पदाधिकारियों को मनोनीत कर दिया। कार्यकारी अध्यक्षों ने शीला दीक्षित की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए ब्लॉक कमिटी को भंग करने की माँग की। उनका कहना है कि पर्यवेक्षकों की नियुक्ति का फैसला गलत है।

इसके बाद पीसी चाको ने शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने पहले भी उनसे कहा है कि पार्टी संगठन का फैसला वो अकेले नहीं कर सकती हैं, इसलिए शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को जो उन्होंने ब्लॉक पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की थी, उसे महासचिव प्रभारी के तौर पर वे (पीसी चाको) अयोग्य करार देते हैं। साथ ही चाको ने अपने पत्र में ये भी लिखा कि शीला दीक्षित जल्द ही संगठन की मीटिंग बुलाकर सबके साथ मिलकर दिल्ली कॉन्ग्रेस के लिए काम करें।

गौरतलब है कि इससे पहले शीला दीक्षित ने दिल्ली के ब्लॉक अध्यक्ष की कमिटी को भंग कर दिया था। उसके बाद भी पीसी चाको और शिला दीक्षित के मतभेद ऐसे ही सामने आए थे और प्रभारी महासचिव ने शीला दीक्षित के फैसले को तब भी अयोग्य करार दिया था। दिल्ली में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने वाले हैं लेकिन कॉन्ग्रेस अभी तक अपने झगड़े निपटाने में असफल रही है।

ता चढ़ि मुल्ला (फर्जी) बाँग दे: ‘जय श्री राम’ न कहने पर मारा, हम अदरक करेंगे, लहसुन करेंगे

चार लौंडे क्रिकेट खेलते हुए भिड़ गए, मार-पीट हुई, एक-दो बूँद खून निकला, बच्चे घर गए। फिर आया लम्पट इमाम जिसने जानबूझकर एक सामान्य झगड़े को सीधा जय श्री राम तक जोड़ दिया और कहा कि उसने पुलिस को सारी बातें बता दी हैं, शिनाख्त दे दी है, चेहरे और नाम दे दिए हैं। आगे इमाम ने फरमाया कि अगर जुमे की नमाज तक ये लोग गिरफ्तार नहीं किए जाएँगे तो वो होगा, जो आज तक न हुआ। जाहिर सी बात है कि इमाम साहब का आशय सड़क पर नमाज पढ़ने का तो बिलकुल नहीं था, उनका आशय दंगा और हिंसा का ही था क्योंकि जिस हिसाब से वो बोल रहे थे, लग रहा था खड़े हो कर सूरज को खींच लेंगे और कहेंगे कि जुमेरात को ही जुमा करो, और इन्हें बता दो कि आखिर वो क्या होने की बात कर रहे हैं!

खबर सुबह आ गई थी, और हमें पूरी तरह से संदेह था कि ये खबर फर्जी साबित होनी है। टाइम्स नाव, क्विंट, फेक्ट चेकर डॉट इन, एनडीटीवी सरीखे सारे मीडिया वालों ने तुरंत ‘मजहबी टोपी’ वाली इमेज लगा कर, कान के नीचे एक लाल जगह को लाल घेरे में घेरा और बताया कि इन्हें तो ‘जय श्री राम’ कहलवाने के कारण पीटा गया। एक चोरकट मीडिया वाले ने तो यह भी गिनाया कि मोदी के शपथ ग्रहण के बाद यह कितने नंबर की घटना हुई है। उसने बाद में फर्जी साबित हुई घटनाओं को नहीं गिनाया क्योंकि वो तो नैरेटिव को सूट नहीं करता ना!

शाम में पता चला कि इमाम साहब बस दंगे कराना चाहते थे क्योंकि ऐसी ही एक अफवाह पर चाँदनी चौक में कट्टरपंथियों की वही भीड़ पत्थरबाजी करते हुए दुर्गा मंदिर और उसकी मूर्तियों को तोड़ा जो हाल ही में बिरयानी बाँटते नजर आ रहे थे। ऐसे दंगाई इमाम को क्या सजा मिली कोई नहीं जानता, न ही किसी को ये जानने में कोई रुचि है।

अब आप सोचिए कि जिन बच्चों के बीच लड़ाई हुई थी, उसमें जो हिन्दू बच्चे थे (जी हाँ, हमारे समय के इमामों ने बच्चों को अब हिन्दू और मुस्लिम में बाँट दिया है, पहले वो बस खेलने वाले बच्चे हुआ करते थे), वो हिन्दू बच्चे घर जाते और उनके इलाके के किसी पुजारी को पता चलता है कि ऐसा हुआ है, और वो कैमरे पर बोलता, “मुस्लिम बच्चों ने हमारे लड़कों को मारा और उनसे जबरन ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगवाए। हमने पुलिस को नाम और फोटो दे दिए हैं। अगर कल शाम तक भगवान की आरती से पहले वो गिरफ्तार नहीं हुए, तो हम वो करेंगे जो कभी नहीं हुआ।”

तब कहा जाता कि देश का माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। बच्चों को मजहब के आधार पर चिह्नित करके कट्टर बनाया जा रहा है। ये वही लोग कहते जिनके आवाज निकाल सकने वाले सारे छिद्र बंद हैं क्योंकि सारे छिद्र सेकुलर हो रखे हैं।

ये पहली घटना नहीं है जब ये इमाम, मौलवी और कठमुल्ले मजहब की आड़ में भीड़ को दंगा करने के लिए तैयार करते हैं। लगातार ऐसी घटनाएँ फर्जी साबित होती जा रही हैं। दो मुस्लिम लौंडों ने आपस में ही ‘जय श्री राम’ बोलने की बात पर विडियो बना कर वायरल करने के लिए ऐसी ही बेहूदगी की और बाद में पकड़े गए। ऐसी ही एक घटना सामने आई जब दारू पीकर मारपीट करने वासे आतिब ने ‘जय श्री राम’ वाला विक्टिम कार्ड खेला।

कुछ समय पहले गुड़गाँव में हवा से ‘शान्तिप्रियों’ की टोपी उड़ी और मीडिया नाचने लगा कि उसकी टोपी हिन्दू आदमी ने उतार कर फेंक दी। ये बेशर्म और निकम्मे माडिया वाले माफी भी नहीं माँगते। वस्तुतः ये लोग दंगाई हैं जो अपना काम हर बार कर जाते हैं। इन्हीं के चैनलों के एंकर ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ की बातें करते नजर आते हैं, और इन्हीं के चैनलों की फर्जी बातों को आधार बना कर, अफवाह फैलाई जाती है और मंदिर तोड़ा जाता है।

अब तो हर ऐसी घटना पर लगता है कि जरूर फर्जी होगा क्योंकि आपसी रंजिश के नाम की गई हत्या में मणिपुर की खबर में ये लोग तुरंत हिन्दू और गाय घुसा देते हैं, जबकि पता चलता है कि बात कुछ और ही थी। जिस जुनैद की हत्या को लेकर रवीश कुमार आज भी माला फेर लेते हैं, वो सीट के विवाद में मारा गया था। बरकत अली ने शराब पीकर मारपीट की, पुलिस से कहा उसे ‘जय श्री राम’ बोलने कहा गया, टोपी निकाल कर फेंक दी।

हर घटना के केन्द्र में शांतिप्रिय और जय श्री राम। जब लग रहा था कि मोदी के खिलाफ बहत्तर प्रधानमंत्री उम्मीदवार आएँगे, और चोरों की मंडली एक साथ खड़ी हो कर मोदी को हरा देंगे, तो ये सारी बातें आधे साल तक नहीं हुई। मोदी के जीतते ही ऐसी खबरों में अचानक से इजाफा कैसे हो गया? आखिर आधी खबरें झूठी क्यों साबित हो रही हैं? दर्जन भर मंदिर तोड़े गए, मूर्तियाँ विखंडित हुईं, और हर बार आरोपित या तो शांतिप्रिय है, या अज्ञात।

मंदिरों को तोड़ने को लिए भीड़ बुलाने के लिए अफवाह फैलाई जाती है कि ‘अरे हिन्दुओं ने शांतिप्रिय को मार दिया, क्योंकि उसने जय श्री राम नहीं बोला’। फिर अचानक से डरे हुए लोगों के हाथों में पत्थर आ जाते हैं, तलवारें आ जाती हैं और हौज़ काज़ी का दुर्गा मंदिर तोड़ दिया जाता है। उसके बाद उन्हीं हिन्दुओं का, और सारे धर्म पर एक भद्दा सा मजाक फेंका जाता है कि ‘अरे, हम मंदिर बना देंगे’। अरे दंगाइयो! तुम मंदिर क्यों बनाओगे? तुम्हारा तो मजहबी इतिहास रहा है मंदिर और मूर्तियों को तोड़ने का, चौदह सौ साल से यही तो हो रहा है। आज कानून है तो थोड़ा कम करते हो, लेकिन शिवलिंग पर पेशाब करने से लेकर, हनुमान की मूर्ति का सर तोड़ने वाले तुम्हारे ही भाई-बंधु हैं।

ये एक तय तरीके से, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की राह चलते हुए राजनैतिक परिदृश्य को प्रभावित करने की एक मुहिम है। चूँकि दो बार सत्ता पाने के बावजूद, पहले से ज्यादा संख्याबल के बावजूद, हिन्दू न तो सड़कों पर दौड़ रहा है, न दंगे हो रहे हैं जो कॉन्ग्रेस और कामपंथी वामभक्त सरकारों का सिग्नेचर रहे हैं, तो इनके विचारावलंबियों ने नई तरकीब निकाली: खुद को थप्पड़ मारो और कहो कि हिन्दू ने मारा। फिर क्विंट, स्क्रॉल, एनडीटीवी आदि है ही बताने के लिए कि शांतिप्रिय को हिन्दू ने थप्पड़ मारा क्योंकि वो ‘जय श्री राम’ नहीं बोल रहा था।

उसके बाद, व्हाइट सुप्रीमैसिज्म से जूझता, बुनियादी तौर पर नस्लभेदी, साम्प्रदायिक घृणा से सना हुआ अमेरिका अपने संसद में बार-बार यह ज्ञान देता है कि भारत में शांतिप्रियों को सही तरीके से ट्रीट नहीं किया जा रहा! जहाँ भारतीय संविधान से परे जा कर, मज़हब के आधार पर सरकार छात्रवृतियाँ दे रही है, उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए तलाक़ जैसी कुप्रथाओं पर कानून ला रही है, अपने कोर वोटर का क्रोध झेल कर भी कट्टरपंथियों के लिए हाथ खोले तैयार है, उस पर यह आरोप! भारत के मुस्लिम हर जगह अल्पसंख्यक नहीं हैं। वस्तुतः वो दूसरे सबसे बड़े बहुसंख्यक हैं और कई राज्यों और जिलों में पूर्णरूपेण बहुसंख्यक हैं। लेकिन इन्हें राष्ट्र के स्तर पर अल्पसंख्यक मान कर योजनाएँ बनती हैं।

और ये अल्पसंख्यक क्या करता है? कश्मीर से हिन्दुओं को खदेड़ता है। फिर कैराना में वहाँ के परिवारों का वो हाल करता है कि वो एक के बाद एक पूरा इलाक़ा छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। ये शांतिप्रिय जहाँ बहुसंख्यक होते हैं वहाँ मेरठ के प्रह्लादनगर जैसी स्थिति पैदा होती है जहाँ शांतिप्रिय आबादी हिन्दुओं की बच्चियों को स्कूल और ट्यूशन जाते वक्त छेड़ती है, घरों के आगे गाड़ी लगाती है ताकि विवाद हो और ये अपना शक्ति प्रदर्शन कर सकें। अंततः, वो इलाक़ा भी खाली होने लगता है। ये घटनाएँ इक्की-दुक्की नहीं है, ये कहीं न कहीं होती ही रहती है। बस आप तक पहुँचती नहीं है।

इसीलिए इनकी लॉबी अब थप्पड़ मार कर विडियो बनाती है, उसमें ‘जय श्री राम’ बुलवाती है, और ख़बरें आने लगती हैं कि मोदी के शपथ ग्रहण के बाद कितने लोगों को राम के उद्घोष न करने पर हिन्दुओं ने मारा। कुछ घटनाएँ हुई हैं, सच भी हैं लेकिन वो अभी भी ‘पीटने’ तक ही सीमित हैं, लेकिन बिग बीसी जैसे मीडिया हाउस से लेकर ‘वायर’ तक अब यह प्रपंच बाँच रहा है कि ‘जय श्री राम’ तो हथियार बनता जा रहा है। सबा नकवी जैसे पत्रकार अचानक से ‘जय श्री राम’ मामलों के जानकार बन कर सामने आ रहे हैं और बता रहे हैं कि नारा तो ‘जय सिया राम’ हुआ करता था, ‘जय श्री राम’ तो ये है, और वो है!

मतलब, जिस नारे के नाम पर बम फोड़े जा रहे हैं, लोगों के ऊपर ट्रक चढ़ाया जा रहा है, मास शूटिंग हो रही हो, आत्मघाती हमले हो रहे हैं, उस ‘अल्लाहु अकबर’ नारे की व्याख्या कोई नहीं करता कि इसको चिल्लाते हुए कितने आतंकियों ने कितने बेगुनाहों की जान ली। तुलनात्मक रूप से चार लोगों को पीटना, हजारों लोगों को मौत की नींद सुला देने से ज्यादा खतरनाक है! इसी को विशुद्ध दोगलापन कहते हैं। यही कारण है कि इन लोगों को इनके हर आर्टिकल के नीचे गालियाँ ही पड़ती हैं। इनका सत्य सेलेक्टिव है, बनावटी है, और शाम तक झूठ साबित हो जाने वाला है। लेकिन शाम को ये माफी नहीं माँगते।

आख़िर इन दंगाई इमामों, मीडिया वालों और इन दंगाइयों के हिमायतियों पर कोई सही कार्रवाई क्यों नहीं होती? ये तो सीधे तौर पर देश की बुनियाद पर हमला कर रहे हैं। ये तो कैमरे के सामने टोपी पहन कर उकसाते हैं कि अगर पुलिस ने उनके बताए लोगों को गिरफ़्तार नहीं किया तो वो जुमे के दिन ऐसा करेंगे जो कभी हुआ नहीं! अबे तुम हो क्या? दो कौड़ी के दंगाई इमाम जो काली-पीली टोपी पहन कर अपने मज़हब का नाम लेकर दंगा करने की धमकी देता है? पुलिस अब इनके हिसाब से जाँच करे क्योंकि ये टोपी लगाते हैं? ये और कुछ नहीं है, यही है कि ये जो कहें वही हो वरना झारखंड की घटना पर सूरत के चौराहे पर ये निकल आएँगे और पत्थरबाज़ी से लेकर आगज़नी करते हुए पुलिस पर हमला कर देंगे।

ये सब काम नमाज के बाद होता है। आप ठहर कर सोचिए कि इतना पाक काम करने के बाद ये किस भावना से बाहर निकलते होंगे, कहाँ पड़े पत्थर उठाते होंगे, आग लगाने का सामान जुटाते होंगे और फिर पुलिस पर ही टूट पड़ते होंगे! लोग बताते थकते नहीं कि नमाज पढ़ते वक्त जो शारीरिक कार्य होते हैं, वो कितने वैज्ञानिक होते हैं और ये हिन्दुओं के योग के कितना करीब है। लोग बताते हैं कि इससे मानसिक शांति मिलती है। मैं सारी बातें मानता हूँ लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आता कि नमाज पढ़ने के बाद कोई भीड़ पुलिस पर हमला कैसे बोल देती है!

मेरा समझ में ये नहीं आता कि एक इमाम इतना क्रोधित हो कर झूठी बात के आधार पर पुलिस और प्रशासन को धमकी कैसे देता है? मेरी समझ में ये नहीं आता कि ऐसे इमामों को इमाम किस आधार पर बनाया जाता है? ये आदमी इतना गुस्से में क्यों है? ये मज़हबी पद पर बैठा व्यक्ति आतंकियों की भाषा कैसे बोल लेता है और वृहद् समाज इसे स्वीकार कैसे लेता है? इस पर चर्चा क्यों नहीं होती कि ऐसे इमाम आख़िर एक शांतिपूर्ण मज़हब का नाम क्यों खराब कर रहे हैं। मुझे तो निजी तौर पर कई बार इस अतिशांतिप्रिय मज़हब को लेकर आंतरिक दुःख होता है कि ऐसे इमाम और ऐसे बच्चे झूठ बोल कर नाम खराब कर रहे हैं। ऐसा बिलकुल ही निंदनीय है। ऐसे इमामों पर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि इस्लाम अपने असली रूप में बचा रहे।