प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (15 अप्रैल 2026) को कर्नाटक के मांड्या जिले स्थित आदिचुंचनगिरि में श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर का उद्घाटन किया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक ऐसी परंपरा को सम्मान देने का अवसर था, जिसने वर्षों तक समाज सेवा, शिक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य किया है।
उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री ने मंदिर में पूजा-अर्चना की और संत परंपरा को भारत की सांस्कृतिक शक्ति बताया। इस मौके पर उन्हें एक विशेष ‘मैसूर पगड़ी’ पहनाई गई, जिसने लोगों का खास ध्यान खींचा।
पगड़ी मैसूर के कलाकार नंदन सिंह ने पाँच दिनों में तैयार की थी, जो नलवाड़ी कृष्णराज वाडियार की पारंपरिक शैली से प्रेरित थी और बनारसी कपड़े से बनी थी। इसमें गंधभेरुंडा का पारंपरिक डिजाइन उकेरा गया था, जो कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
#WATCH | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक के मांड्या में श्री क्षेत्र आदिचुंचनगिरी में श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर का उद्घाटन किया।
श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर, श्री आदिचुंचनगिरी महासंस्थान मठ के 71वें पादरी श्री श्री श्री डॉ. बालगंगाधरनाथ महास्वामीजी को समर्पित एक स्मारक है। pic.twitter.com/OBPhYgaCK3
श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर लगभग 80 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ है और इसे बनने में करीब दस वर्षों का समय लगा। यह मंदिर पारंपरिक द्रविड़ वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसकी भव्यता और बारीक नक्काशी इसे खास बनाती है।
मंदिर की संरचना में होयसला, चालुक्य, चोल और गंगा काल की स्थापत्य शैलियों का सुंदर समावेश किया गया है, जो भारतीय शिल्पकला की विविधता और समृद्धि को दर्शाता है। ऊँचे गोपुरम, विशाल प्रांगण और पत्थरों पर की गई जटिल नक्काशी इसे दक्षिण भारत के प्रमुख आध्यात्मिक स्थलों में शामिल करती है।
यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है, जहाँ कला और आध्यात्मिकता का अद्भुत मेल देखने को मिलता है।
भैरवैक्य का अर्थ और शैव परंपरा से जुड़ाव
‘भैरवैक्य’ शब्द का अर्थ है भगवान भैरव में लीन होना या उनके साथ एकत्व प्राप्त करना। भगवान भैरव को भगवान शिव का गण और उनके उग्र स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर उसी प्राचीन शैव परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसमें साधना, तपस्या और आत्मिक एकाग्रता के माध्यम से ईश्वर के साथ एकत्व प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
आदिचुंचनगिरि मठ को एक सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है, जहाँ वर्षों से साधकों ने तप कर आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। इस स्थान की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण देशभर से श्रद्धालु यहाँ दर्शन और साधना के लिए आते हैं।
डॉ बालगंगाधरनाथ महास्वामीजी: जीवन, संघर्ष और समाज सेवा
यह मंदिर आदिचुंचनगिरि महासंस्थान मठ के 71वें पीठाधिपति बालगंगाधरनाथ स्वामीजी की स्मृति में बनाया गया है। उनका जन्म 18 जनवरी 1945 को कर्नाटक में गंगाधरैया के रूप में हुआ था और वे कन्नड़ वोक्कालिगा समुदाय से संबंध रखते थे, जो एक कृषि प्रधान समाज माना जाता है।
बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिकता और अनुशासन की ओर था। कम उम्र में ही वे मठ से जुड़ गए और नाथ परंपरा में दीक्षित होकर गुरु-शिष्य परंपरा के तहत शिक्षा और साधना प्राप्त की। उन्होंने अपने जीवन में धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे समाज सेवा से जोड़ा।
उनके नेतृत्व में मठ ने शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबों की मदद के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। उन्होंने कई स्कूल, कॉलेज और अस्पताल स्थापित किए, जिससे लाखों लोगों को लाभ मिला।
उनके कार्यों के लिए उन्हें 2010 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 13 जनवरी 2013 को 64 वर्ष की आयु में किडनी फेलियर के कारण केंगेरी स्थित बीजीएस ग्लोबल अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद भी उनके विचार और कार्य समाज को प्रेरित करते रहे हैं।
मठ की परंपरा, वर्तमान नेतृत्व और मंदिर का उद्देश्य
आदिचुंचनगिरि महासंस्थान मठ दक्षिण भारत का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है, जिसकी परंपरा सदियों पुरानी है। यह मठ नाथ संप्रदाय की गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाता रहा है और समाज में आध्यात्मिकता के साथ-साथ सेवा कार्यों के लिए भी जाना जाता है।
वर्तमान में इस मठ का नेतृत्व निर्मलानंदनाथ स्वामीजी कर रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में इस भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ, जिसे उन्होंने अपने गुरु को समर्पित एक श्रद्धांजलि के रूप में विकसित किया। यह मंदिर किसी देवी-देवता को समर्पित नहीं, बल्कि एक महान संत की स्मृति में बनाया गया स्मारक है।
इसका उद्देश्य केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों को सेवा, शिक्षा और मानवता के मूल्यों की ओर प्रेरित करना भी है।
आस्था, विरासत और प्रेरणा का केंद्र
श्री गुरु भैरवैक्य मंदिर आज आस्था, संस्कृति और सेवा का संगम बन चुका है। इसकी भव्यता, आध्यात्मिक महत्व और इसके पीछे छिपी सेवा की भावना इसे एक विशेष पहचान देती है। यह मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के लिए एक पवित्र स्थल है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखते हैं।
यहाँ आकर केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और सेवा के मूल्यों को भी महसूस किया जा सकता है। यही कारण है कि यह मंदिर आने वाले समय में दक्षिण भारत के प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों में अपनी खास जगह बनाएगा।
संसद के विशेष सत्र में गुरुवार (16 अप्रैल 2026) को भारी हंगामे, तीखी नोकझोंक और विपक्षी घेराबंदी के बीच मोदी सरकार ने 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश कर दिया है। इस बिल को सदन के पटल पर रखने की प्रक्रिया ही किसी बड़े राजनीतिक संग्राम से कम नहीं रही।
विपक्ष द्वारा मत विभाजन (वोटिंग) की माँग के बाद जब आँकड़े सामने आए, तो सरकार के पक्ष में 207 वोट पड़े, जबकि बिल को पेश करने के विरोध में 126 सदस्यों ने मतदान किया। इस मतदान के साथ ही साफ हो गया कि सरकार न केवल संख्या बल में मजबूत है, बल्कि वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव करने के लिए पूरी तरह तैयार है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा बिल पेश किए जाने के साथ ही भारत में लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं को 33% आरक्षण देने की दिशा में विधिवत कार्यवाही शुरू हो गई है।
अमित शाह बनाम विपक्ष: मुस्लिम आरक्षण और जनगणना पर तीखी बहस
बिल पेश होने के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने आरक्षण के भीतर आरक्षण का मुद्दा उठाया। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जब तक मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा तय नहीं होता, इस महिला आरक्षण का कोई औचित्य नहीं है। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि ‘भारत का संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता, और यह पूरी तरह गैर-संवैधानिक है।’
जब अखिलेश यादव ने इस पर सवाल उठाए, तो अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा कि ‘अगर समाजवादी पार्टी को मुस्लिम महिलाओं की इतनी ही चिंता है, तो वे अपने कोटे की सभी सीटें उन्हें दे दें, हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है।’ अखिलेश यादव ने सरकार पर जनगणना को लेकर ‘धोखा’ देने का आरोप लगाया, जिस पर अमित शाह ने सदन को आश्वस्त किया कि जनगणना का कार्य जारी है और सरकार पहले ही निर्णय ले चुकी है कि यह जनगणना जातिगत आधार पर ही संपन्न हो रही है।
क्या है 131वाँ संविधान संशोधन बिल? 543 से 850 सीटों का सफर
इस विधेयक का मूल उद्देश्य लोकसभा की सीटों की संख्या में 56% का भारी इजाफा करना है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा 543 सीटों का ढांचा 1971 की जनगणना पर आधारित है, जो आज की आबादी के हिसाब से अप्रासंगिक हो चुका है। 1971 में एक सांसद लगभग 10 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 25 से 30 लाख तक पहुँच गई है।
इस बिल के माध्यम से सरकार एक शक्तिशाली परिसीमन आयोग का गठन करेगी। इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश करेंगे। इसमें चुनाव आयुक्तों के साथ-साथ राज्यों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। यह आयोग जनसंख्या के ताजा आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करेगा और सीटों की संख्या को 850 तक ले जाएगा।
अनुच्छेद 82 में बदलाव: जनगणना और परिसीमन का नया लिंक
अब तक के नियम के अनुसार, परिसीमन केवल 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने के बाद ही संभव था। लेकिन इस नए बिल में अनुच्छेद 82 में संशोधन का प्रस्ताव है। इसके तहत ‘जनगणना’ की परिभाषा को लचीला बनाया जा रहा है ताकि सरकार को यह अधिकार मिले कि वह संसद द्वारा निर्धारित किसी भी जनगणना (जैसे जारी जनगणना 2024-25) के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू कर सके।
विपक्ष इसी बात का विरोध कर रहा है। कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल और सपा नेताओं का आरोप है कि सरकार जनगणना और परिसीमन को अलग-अलग करके संवैधानिक परंपराओं को तोड़ रही है। हालाँकि, सरकार का कहना है कि यह बदलाव इसलिए जरूरी है ताकि महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जा सके, न कि 2034 तक इंतजार किया जाए।
महिला आरक्षण: ‘सुपरफास्ट’ मोड में 33% कोटा
इस बिल की सबसे बड़ी विशेषता महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में 33% सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करना है। अब तक यह माना जा रहा था कि महिला आरक्षण जनगणना और परिसीमन की लंबी प्रक्रिया के बाद ही लागू हो पाएगा, जिसमें 10 साल भी लग सकते थे।
लेकिन इस नए संशोधन के जरिए सरकार ने इसे ‘फास्ट-ट्रैक’ पर डाल दिया है। बिल के प्रावधानों के अनुसार, सीटों के विस्तार के साथ ही महिला आरक्षण को प्रभावी बना दिया जाएगा, जिससे 2029 में देश की संसद का स्वरूप पूरी तरह बदला हुआ नजर आएगा।
दक्षिण भारत का कड़ा विरोध: ‘काला कानून’ और क्षेत्रीय शक्ति का डर
विधेयक के पेश होने से पहले ही इसके खिलाफ दक्षिण (साउथ) भारत के राज्यों में भारी रोष देखने को मिला। DMK सांसद टीआर बालू ने इन बिलों को ‘सैंडविच बिल’ कहा, जो आपस में गुंथे हुए हैं और दक्षिण की आवाज दबाने के लिए लाए गए हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने बिल के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इसकी कॉपी जलाई और इसे ‘काला कानून’ करार दिया।
दक्षिण के राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल किया, लेकिन अब उन्हें इसकी ‘सजा’ मिल रही है। उनका डर है कि अगर आबादी के आधार पर सीटें बढ़ीं, तो उत्तर भारत की सीटों में भारी उछाल आएगा और संसद में दक्षिण का प्रभाव नगण्य हो जाएगा। स्टालिन ने चेतावनी दी है कि यदि दक्षिण की ताकत कम की गई, तो पूरा राज्य सड़कों पर होगा। तेलंगाना के CM रेवंत रेड्डी ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की माँग की।
वर्तमान आँकड़ों के अनुसार, दक्षिण के पाँच राज्यों के पास 129 सीटें हैं। परिसीमन के बाद, उत्तर भारत के राज्यों (जैसे यूपी, बिहार, राजस्थान) की सीटें दक्षिण के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ेंगी। विपक्ष इसे ‘फेडरलिज्म’ (संघवाद) पर हमला बता रहा है। वहीं, बीजेपी नेता के अन्नामलाई ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री यह सुनिश्चित करेंगे कि दक्षिण की किसी भी सीट में कटौती न हो, बल्कि वहाँ भी सीटों की संख्या बढ़ेगी (जैसे तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 होने का अनुमान है)।
संविधान और 1971 के ‘फ्रीज’ का असली सच
संविधान का नियम बहुत सीधा है, जिस राज्य में जितनी ज्यादा आबादी, वहाँ उतनी ज्यादा लोकसभा सीटें होनी चाहिए। लेकिन 1976 में सरकार ने एक अस्थायी रोक लगा दी थी कि सीटें 1971 की आबादी के हिसाब से ही रहेंगी, ताकि राज्यों में जनसंख्या कंट्रोल करने का डर न रहे। बाद में इस रोक को 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया।
अब दिक्कत यह है कि उत्तर भारत में आबादी बहुत बढ़ गई है, जिससे वहाँ का एक सांसद करीब 30 लाख लोगों की जिम्मेदारी संभाल रहा है, जबकि दक्षिण में एक सांसद पर सिर्फ 15 लाख लोगों का बोझ है। इस रोक को हमेशा के लिए जारी रखना उन वोटर्स के साथ अन्याय होगा जिनकी आबादी बढ़ी है, क्योंकि यह ‘हर वोट की बराबर कीमत’ के लोकतांत्रिक नियम के खिलाफ है।
क्या दक्षिण को वाकई ‘सजा’ मिल रही है?
विपक्ष का कहना है कि यह दक्षिण के राज्यों के साथ नाइंसाफी है, लेकिन केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी राज्य की पुरानी सीटें कम नहीं की जाएँगी। सच तो यह है कि नई जनगणना के हिसाब से सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी। हाँ, यह जरूर है कि उत्तर भारत की आबादी ज्यादा है, इसलिए वहाँ सीटें दक्षिण के मुकाबले ज्यादा बढ़ेंगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दक्षिण को कुछ नहीं मिलेगा।
कुछ दल इसे इलाके के सम्मान और ताकत से जोड़कर विरोध कर रहे हैं, पर कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि आबादी कम रखने के बदले ज्यादा सीटें दी जाएँ। आखिर किसी भी राज्य का बजट, सरकारी योजनाएँ और खर्चे भी तो वहाँ की आबादी के हिसाब से ही तय होते हैं।
मोदी सरकार का ‘हाइब्रिड फॉर्मूला’ और समाधान
2026 की जनगणना के बाद भी उत्तर और दक्षिण के बीच आबादी का अंतर 2011 के अनुमानों के मुताबिक ही रहने वाला है। केंद्र सरकार ने इस बिल में आबादी की परिभाषा में बदलाव का प्रस्ताव दिया है, जिससे संसद को यह तय करने का अधिकार मिलेगा कि किस जनगणना को आधार बनाया जाए।
इससे मोदी सरकार को वह कानूनी रास्ता मिल गया है जिससे लोकसभा का विस्तार भी हो सके और दक्षिण की सीटों को नुकसान पहुँचाए बिना अनुच्छेद 81 का पालन भी हो। संभव है कि सरकार एक ‘हाइब्रिड फॉर्मूला’ लेकर आए जिससे दक्षिण की सीटें कम न हों और प्रतिनिधित्व का संतुलन भी बना रहे।
संसद में 207 बनाम 126 की इस लड़ाई ने साफ कर दिया है कि आगामी दिन भारतीय राजनीति के लिए बहुत गहमागहमी वाले होंगे। एक तरफ सरकार इसे ‘सशक्त भारत और सशक्त नारी’ का कदम बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे ‘चुनावी फायदा और संवैधानिक धांधली’ कह रहा है। 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक केवल सीटों की संख्या नहीं बढ़ाएगा, बल्कि यह भारत के क्षेत्रीय संतुलन, महिला प्रतिनिधित्व और आने वाले दशकों की राजनीति की दिशा भी तय करेगा।
महाराष्ट्र में TCS नासिक के BPO में 2021 से चल रहे धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न का खुलासा होने पर पूरा देश सन्न रह गया है। इसने देश में साजिश कर हिन्दू महिलाओं को कैसे लव ट्रैप में फँसा कर धर्मांतरण के लिए विवश किया जा रहा है इसका भी जीता जागता उदाहरण है।
पहले चुप्पी साध रखी थी वामपंथी लिबरल ग्रुप ने
इस मामले में पहले तो वामपंथी लिबरल मीडिया को साँप सुंघ गया और उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब उनके बचाव के लिए मुस्लिम टीम लीडर्स द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न को ‘रिलेशनशिप’ का नाम दिया जा रहा है। साथ ही ‘मुस्लिम टारगेट’ कह कर घटना की गंभीरता को कमतर करने की कोशिश की जा रही है।
इस मामले में 9 FIR दर्ज होने के बाद दानिश शेख, तौसीफ अत्तार, रज़ा मेमन, शाहरुख कुरैशी, आसिफ अंसारी, शफी शेख, अश्विनी चाननी के साथ-साथ एचआर अधिकारी निदा खान को गिरफ्तार कर लिया गया है। निदा खान ने हिंदू लड़की कर्मचारियों को भर्ती करने में मदद की। उन्हें बुर्का, हिजाब और इस्लामी रीति-रिवाज अपनाने के लिए मजबूर किया और फिर जानबूझकर उनके यौन शोषण की शिकायतों को दबा दिया।
इससे पता चलता है कि इस्लामी कट्टरपंथी कंपनी में हिन्दू लड़कियों को फँसाने के लिए किस हद तक सक्रिय थे। इसके बावजूद, चूँकि आरोपी मुस्लिम हैं, इसलिए इस्लामी-वामपंथी लिबरल ग्रुप अब इसके बचाव में सामने आ गए हैं।
IMPORTANT: twist in Nashik TCS story? All the more important to have a proper, transparent inquiry and not an investigation driven by social media outrage. JUSTICE must be done based on FACTS and not an AGENDA. https://t.co/zX7VuxUjD5
राजदीप सरदेसाई का कहना है कि न्याय तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। एजेंडे के आधार पर नहीं। भाई एजेंडा तो आप चला रहे हैं मुस्लिम कट्टरपंथियों को ‘निर्दोष’ दिखाने का। जाँच पारदर्शी और निष्पक्ष हो, यह सभी चाहते हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में एक आरोपित की पत्नी का हवाले देते हुए कहा जा रहा है कि शिकायत करने वालों और आरोपित दानिश शेख के रिश्ते में कड़वाहट आ गई थी। इसलिए ये मामला उजागर हुआ। ये ‘रिलेशनशिप’ का मामला था। ये भी कहा गया है कि ‘सभी मामलों को एक साथ जोड़ दिया गया।’
जाँच में सामने आया है कि ये मामला एक नहीं अनेक है, जो 2021 से चल रहा है। मजबूर हिन्दू लड़कियों को जॉब देकर उनका फायदा उठाना। यौन उत्पीड़न करना और इस्लाम कबूलने का दबाव बनाना- एक जैसा पैटर्न है। इसमें शामिल सभी मुस्लिम टॉप लीडर्स हैं, जो आसानी से अपनी टीम की लड़कियों का फायदा उठा रहे थे। इतना ही नहीं जिन लड़कियों ने हिम्मत करके एचआर तक अपनी शिकायत दर्ज करवाई। उस पर निया खान ने एक्शन होने ही नहीं दिया। मामले को दबा दिया।
ऐसी चीजों का बचाव करना बहुत ही शर्मनाक है। एसआईटी जाँच कर रही है और उसमें सारी बातों का खुलासा भी हो जाएगा। दरअसल जहाँ मुस्लिम शामिल होते हैं, वामपंथी इस्लामी कट्टरपंथी उनके बचाव में आ जाते हैं। इतिहास गवाह है कि इनलोगों ने आतंकवादियों को भी सही ठहराने की कोशिश की। मुसलमानों पर लगे हर आरोप की लीपा पोती कर, उन्हें कमतर आँकने की कोशिश करते रहे हैं।
इस्लामी-वामपंथी गुट एकजुट होकर हिंदू पीड़ितों की पीड़ा को कम करके आँकने और जिहादियों को बचाने की कोशिश करता है। हिन्दुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाने वाला मीडिया संस्थान ‘द वायर’ ने पहले टीसीएस नासिक कांड पर चुप्पी साध ली। ‘द क्विंट और ‘स्क्रॉल’ ने भी यही किया।
इस्लामी पहचान बता ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश
लेकिन, इस्लामी कट्टरपंथी प्रोपेगेंडा बाज अरफा खानम शेरवानी ने फौरन ही आरोपितों की इस्लामी पहचान का सहारा लेकर उन्हें ‘पीड़ित’ बताने में देर नहीं लगाई। उसने कहा कि कुछ चुनिंदा लोगों (मुस्लिमों) को मुश्किल से नौकरी मिलती है, उन्हें भी अब टारगेट किया जा रहा है।
A new wave of targeting Muslims- not the paan vendor or street hawker this time, but the educated, skilled, employed. The aim is clear: make even the few who’ve secured jobs in this majoritarian system unemployable.
दरअसल ये प्रवृत्ति इस्लामी-वामपंथी इकोसिस्टम की पहचान बन चुकी है। ये लोग अपराध का विश्लेषण धर्म के आधार पर करते हैं। वे यह तय करते हैं कि ‘अपराध’ की निंदा की जानी चाहिए या उसे कम करके आँका जाना चाहिए।
अरफा खानम ने पीड़ित हिन्दू महिलाओं के बारे में बोलना भी जरूरी नहीं समझा, बल्कि कह दिया कि मुस्लिमों के खिलाफ साजिश की जा रही है। उसका कहना है, ‘इस बहुसंख्यकवादी व्यवस्था में जिन गिने-चुने लोगों को नौकरियाँ मिली हैं, उन्हें भी बेरोजगार बना देना है।’
लिबरल वामपंथियों के पसंदीदा फे डिसूजा ने काफी दिनों तक इस पर मौनधारण कर लिया। लेकिन जब लिखा तो उसमें ‘गंभीरता’ नहीं थी। उनका पूरा ध्यान आरोपितों का नाम छिपाने में लगा रहा। पीड़ित हिंदू महिलाओं की गरिमा और उनकी सुरक्षा उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।
Another angle Of TCS.⚡
There are rumors Among Tcs Employers. And the story here According to Tcs Employers. In Nashik, some Muslim boys working at TCS had achieved great success through their hard work. These handsome Muslim boys who were growing in the company had friendly… pic.twitter.com/DHMJIw9XiO
नसरीन खान को पूरी घटना में हिन्दुओं द्वारा मुस्लिम आरोपितों से ‘जलना’ समझ में आया। उसने 5 साल से ज्यादा वक्त से कई महिलाओं के साथ हो रहे यौन शोषण को अफवाह करार दे दिया। ‘सी ग्रेड’ की फिल्मी कहानी की तरह उसने बताया, ‘TCS में काम करने वाले कुछ मुस्लिम लड़कों ने अपनी कड़ी मेहनत से बहुत बड़ी सफलता हासिल की थी। कंपनी में आगे बढ़ रहे इन स्मार्ट मुस्लिम लड़कों के अपने जूनियर हिंदू महिला सहकर्मियों के साथ दोस्ताना संबंध थे। यह बात कंपनी के कुछ हिंदू लड़कों को रास नहीं आई, और वे उनकी तरक्की से जलने लगे।’
वह यह भी बताती है कि TCS का माहौल अच्छा था, क्योंकि रमजान का भी सम्मान किया जाता था। वह यह भी कह रही है कि हिन्दुओं को निदा खान से चिढ़ थी, क्योंकि वह मुस्लिम थी। इसके बाद VHP और बजरंग दल का नाम लेते हुए उसने HR मुस्लिम लड़की को फँसाने का आरोप लगा दिया।
Do you see the amount of whitewashing going on in this comment, anon? Imagine how dumb and doomed one has to be to do such wordcelling in defense of those people. pic.twitter.com/xKBcPws3iM
एक टैटू आर्टिस्ट इस्लाम की जानकार बनकर अपराधियों को बचाने की कोशिश करती है। श्यामली पांडा जानना चाहती हैं कि ‘जबरदस्ती धर्म बदलने से उन्हें आखिर क्या फायदा होता है?’ साथ ही दलील भी दे दी कि इस्लाम में धर्म को लेकर कोई जबरदस्ती नहीं है, चाहे वह दबाव से हो या ताकत से।
उन्होंने सवाल उठाया कि यह कैसे मुमकिन है कि अपराधी उन पर नमाज पढ़ने का दबाव डालें, तब जब वह उस वक्त खुद नमाज पढ़ेंगे। साथ ही ये भी तर्क दिया है कि बीफ खाने से कोई मुस्लिम नहीं बन जाता और न ही वह हिन्दू धर्म से बाहर हो जाता है। घटना को लेकर उसने कह दिया कि यह इस देश में मुसलमानों को इंसान न समझने की एक और कोशिश है।
इस्लाम की इस जानकार को न तो भारत का इतिहास पता है और न ही भारत में आतंकी घटनाओं के पीछे की वजह जानने में दिलचस्पी है। भारत का इतिहास इस्लामी आक्रांताओं की ज्यादतियों से पटा पड़ा है। ‘इस्लामी जिहाद’ का नारा बुलंद करने वाले ‘इस्लामिक स्टेट’, ‘जैश-ए-मोहम्मद’ और ‘लश्कर-ए-तैयबा’ जैसे खूंखार आतंकी संगठन मुस्लिम कट्टरपंथियों की देन हैं।
बेगुनाहों के खून से इनके हाथ रंगे हुए हैं। आतंकवाद फैलाने के लिए ये लोग इस्लाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। बांग्लादेश- पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ ज्यादती इन्हें नजर नहीं आती। हिन्दुओं की इन देशों में घटती आबादी, जबरदस्ती धर्मांतरण, मासूम लड़कियों को उठाकर जबरदस्ती धर्मांतरण कर निकाह कर लेना, इन्हें नजर नहीं आता। आखिर ‘इस्लाम’ में ये गलत है, तो इस्लामिक देशों में ये घटनाएँ होती कैसे हैं?
Been in IT for 5 years, and I’ll say this clearly:
Muslim men in IT are among the most disciplined, hardworking, and resilient professionals. They stay calm under pressure and consistently deliver at a high level.
Their only consistent ask? Time and space for Namaz. And if…
खोखले तर्क और खुद को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश फहीम खान ने भी अपने ट्वीट में की है। 5 साल से इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम कर रहे फहीम खान का कहना है कि आईटी के क्षेत्र में काम कर रहे ‘मुस्लिम’ सबसे ज्यादा अनुशासित, मेहनती होते हैं। वे दबाव में भी शांत रह कर अच्छा काम करते हैं। वे सिर्फ नमाज पढ़ने के लिए समय और जगह चाहते हैं, और अगर काम का बोझ ज्यादा हो, तो देर तक रुक कर काम पूरा होने के बाद ही जाते हैं।
उन्होंने कहानी बना कर मुस्लिम कर्मचारियों को ‘द बेस्ट’ बताने की कोशिश की। लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आता कि कोई धर्म मेहनती या अनुशासित नहीं बनाता। यह व्यक्तिगत गुण होते हैं। अगर ऐसा होता तो इस्लामिक देश अपराध और अराजकता मुक्त होता।
महिला पुलिस के खुलासे का भी विरोध
पूर्व पत्रकार इरेना अकबर ने घटना को गलत तरीके से पेश करने की कोशिश की। साथ ही इस मामले का भंडाफोड़ करने के लिए गुप्त रूप से फर्म में गई महिला पुलिसकर्मियों की भी आलोचना की और उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि उनका ध्यान कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर होना चाहिए, न कि निजी कार्यालयों की बातचीत सुनने पर।
एक और बयान में आरोपितों का बचाव करते हुए कहा गया कि प्राइवेट क्षेत्र में मुसलमानों को ठीक वैसे ही निशाना बनाया गया है, जैसे सरकारी क्षेत्र में किया जाता है। कहने का मतलब है कि भारत में मुस्लिमों के साथ ‘भेदभाव’ किया जाता है। ये आरोप उस देश में लगाए जा रहे हैं जहाँ दशकों तक मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए शाहबानों केस सुर्खियाँ बनीं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दूसरे संस्थान सक्रिय हैं। वक्फ बोर्ड के पास संपत्तियों का अंबार है।
यौन उत्पीड़न करने वालों का विरोध न कर घटना को मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश ने इनकी असलियत सामने ला दी है।
Muslims will be targeted in private sector just as they were discriminated in Govt sector jobs
Now HR policy will be dictated by hindutva & muslims will be punished similarly how they face problems in housing sector
इस्लामो-वामपंथी हमेशा ही अपराधों और अपराधियों के खिलाफ बोलने से पहले उसके धर्म को देखते हैं। वे हिंदुओं से जुड़ी हर छोटी-बड़ी घटना की जमकर निंदा करते हैं। कई मामलों में तो पूरे हिन्दू समुदाय को शर्मसार करने की कोशिश की जाती है, मनगढ़ंत तरीके ढूँढ लिए जाते हैं, लेकिन गलती से मामला इस्लामी कट्टरपंथ से जुड़ा हो, तो बंगले झाँकने लग जाते हैं। सबसे ताजा उदाहरण दिल्ली में 28 साल के तरुण कुमार की हत्या का है। उसे कट्टरपंथियों ने पीट-पीट कर जान ले ली। पूरा मामला सामने आने के बाद मृतक का ही चरित्रहनन करने की कोशिश करने लगे।
टीसीएस मामले में भी इस्लामी वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों की करतूत वैसी ही है। अपराधी मुस्लिम निकले तो उन्हें पीड़ित दिखाओ, समाज को ‘मुस्लिम विरोधी’ साबित करने की कोशिश करो, भले ही इसमें कई पीड़ित महिलाओं की सिसकियाँ दब जाए, उनकी जिंदगी उजड़ जाए और वह इंसाफ की भीख माँगते-माँगते पूरी जिंदगी गुजार दे।
दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा में हाल ही में हजारों फैक्टरी मजदूर वेतन बढ़ाने की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आए। इस दौरान जमकर बवाल हुआ गाड़ियों, शोरूम और कंपनियों में तोड़फोड़ की गई। इस हिंसा में नक्सलियों से लेकर पाकिस्तान तक के कनेक्शन की बात सामने आई है। इस हिंसा के बाद ऑपइंडिया ने इसके कुछ प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत की है जिन्होंने इस पूरे मामले को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी हैं।
क्या है पूरा मामला?
इस मामले में हिंसा की शुरुआत सोमवार (13 अप्रैल 2023) से हुई और हजारों श्रमिक सड़कों पर आए गए। फेज-2 और सेक्टर-62 समेत कई इलाकों में प्रदर्शन के दौरान हालात बिगड़ गए और कुछ उपद्रवी तत्वों ने वाहनों-कंपनियों में तोड़फोड़ की, यहाँ तक कि कुछ गाड़ियों में आग भी लगा दी गई।
अगले दिन तक हिंसा जारी रही। मंगलवार (14 अप्रैल 2026) को लगातार दूसरे दिन मजदूरों ने सड़कों पर उतरकर बवाल किया। मंगलवार को फैक्ट्री कर्मचारी कुछ जगहों पर सड़कों पर उतर आए और जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो बवाल हो गया।
मामले में पुलिस ने 300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है और इस मामले में 7 FIR दर्ज की गई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि सोमवार को करीब 42000 कर्मी सड़कों पर उतरे और 80 अलग-अलग जगहों पर उपद्रव किया।
इस दौरान फेस-2 इलाके की एक फैक्ट्री के बाहर शुरू हुई आगजनी सेक्टर-67, 63 में भी फैल गई। साथ ही, मदरसन में भी 3-4 गाड़ियों को आग लगा दी गई। दावा किया जा रहा है कि इस पूरे प्रदर्शन के दौरान 100 से अधिक गाड़ियों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई। इस दौरान उपद्रवियों ने पुलिसकर्मियों पर पथराव किया और मीडियाकर्मियों के साथ भी बदसलूकी की।
प्रत्यक्षदर्शियों ने ऑपइंडिया को क्या बताया?
घटना के प्रत्यक्षदर्शियों ने ऑपइंडिया को इस हिंसा को लेकर बताया कि कैसे ऑफिस में पूरा झुंड घुस रहा था और तोड़फोड़ करते हुए बाहर निकल रहा था। धर्मेंद्र सिंह नाम के एक व्यक्ति ने बताया की “हुआ ये था कि बाहर से अचानक भीड़ आई और उन्होंने एकदम से हमला कर दिया। भीड़ मतलब ये लगा लो पूरा झुंड था, 300-500 तक लोग थे, रोड भरी हुई थी।”
उन्होंने आगे कहा, “पहले इन्होंने पत्थरबाजी की, फिर यहाँ पर गाड़ियों में तोड़फोड़ की। बाहर जो गाड़ियाँ खड़ी थीं, उन में आग लगा दी। हम लोग अपनी जान बचाने के लिए अंदर चले गए। अंदर तक घुस गए थे, करीब 40-45 गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए। हमें तो ये भी नहीं पता कि आग कैसे लगाई गई, हमारा मकसद तो बस अपनी जान बचाना था।”
इसी तरह एक अन्य ने बताया प्रत्यक्षदर्शी अरुण कुमार ने बताया की “कुछ नहीं, पब्लिक आई इधर से करीब 200-250 आदमी थे, महिलाएँ भी थीं। कंपनी बंद थी फिर भी पत्थर फेंकने लगे, गेट तोड़ दिया, कैमरे भी तोड़ दिए। हमसे बोले कि कंपनी दिखाओ अंदर चल के, हमने कहा कोई नहीं है। 12 कैमरे तोड़कर निकाल ले गए, गेट का सरिया तक तोड़ दिया। अंदर घुस गए और बस उपद्रव कर रहे थे, पत्थर मार रहे थे उनका कोई मोटिव नहीं था।”
इसी तरह कुछ लोगों ने बताया कि उनकी कंपनी बंद थी उसके बाद भी वे लोग ताला तोड़कर अंदर घुस गए और तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी। सिक्योरिटी रूम कंप्यूटर डेस्कटॉप सब डैमेज कर दिया। कई लोगों ने कहा कि वे बाहर के लोग थे, हाथ में डंडा और पत्थर लेकर घुस गए और तोड़फोड़ करने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा कि अगर माँग है तो धरना दो, हड़ताल करो लेकिन तोड़फोड़ करना गलत है।
घटनास्थल के पास मौजूद दुकानदारों का कहना है कि वे चार-पाँच साल से दुकान लगा रहे हैं लेकिन ऐसा माहौल उन्होंने नहीं देखा और अब दुकान पर लोग नहीं रहे हैं। विक्रम राणा नाम के एक व्यक्ति ने बताया, “ये महावीरा कंपनी के वर्कर थे, वहीं से शुरू हुआ था उसके बाद आसपास के लोग भी जुड़ गए पहले डेढ़ घंटे सब नॉर्मल था फिर दो-तीन बजे के बाद पत्थर बाजी शुरू हो गई।”
उन्होंने आगे बताया, “400-500 लोग थे, हमारे ऑफिस पर भी पत्थर मारे गए, हमारा कोई पर्सनल मामला नहीं था। माँगें जायज हो सकती हैं लेकिन तरीका गलत है।”
इस पूरे उपद्रव के दौरान 10 पुलिसकर्मियों सहित कुल 30 लोग घायल हुए। औद्योगिक इकाइयों और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा है, जिसकी भरपाई का अनुमान करीब 3000 करोड़ रुपए लगाया गया है।
वहीं पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बताया कि अफवाह फैलाने वाले कई ग्रुप्स की पहचान की गई है। करीब 50 X (ट्विटर) हैंडल के जरिए लोगों को हिंसा के लिए उकसाया गया। पुलिस के मुताबिक, इन हैंडल्स के जरिए QR कोड भेजकर लोगों को ग्रुप में जोड़ा जा रहा था और ‘सड़कों पर आओ, पुलिस को पीटो’ जैसे मैसेज फैलाए जा रहे थे।
पुलिस का कहना है कि एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हैंडल भी जाँच में सामने आया है। ये सभी हैंडल घटना से पिछले 24 घंटों में बनाए गए और इनका इस्तेमाल भ्रामक जानकारी फैलाने के लिए किया गया।
पुलिस का कहना है कि यह पूरी साजिश सुनियोजित लगती है जिसमें मजदूरों से जुड़े मुद्दे को आधार बनाकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई। इस बीच डीजीपी राजीव कृष्ण ने साफ कहा कि हिंसा और आगजनी में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई होगी। साथ ही नुकसान की भरपाई भी उपद्रवियों से ही कराई जाएगी।
महाराष्ट्र के नासिक में TCS कंपनी में हिंदू युवतियों के शोषण और धर्मांतरण की साजिशों के बीच सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के वर्क कल्चर को लेकर चर्चा हो रही है। इस बीच आईवियर रिटेल कंपनी लेंसकार्ट (Lenskart) के ‘हिंदू विरोधी नियमों’ को लेकर भी सोशल मीडिया पर विवाद छिड़ गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला लेंसकार्ट के कर्मियों को ट्रेनिंग के दौरान दिए जाने वाले परिचयात्मक दस्तावेज (Introductory Document) से जुड़ा हुआ है। इस दस्तावेज में ‘ग्रूमिंग और यूनिफॉर्म से जुड़े नियम’ बताए गए हैं। 23 पन्नों के इस डॉक्यूमेंट में लिखा गया है, “इसमें वे सभी ग्रूमिंग (साफ-सफाई और सलीके से तैयार रहने) से जुड़े नियम शामिल हैं जिन्हें लेंसकार्ट के सभी कर्मचारी फॉलो करते हैं।”
इसी परिचयात्मक दस्तावेज के कुछ पन्ने अब सोशल मीडिया पर वायरल हैं और इन पन्नों में ‘हिंदू विरोधी बातें’ कही गई हैं। डॉक्यूमेंट में 7 नंबर पेज पर लिखा गया है कि लेंसकार्ट के कर्मियों के लिए कलावा और बिंदी पहनाना मना है जबकि कर्मचारी हिजाब पहन सकते हैं।
इसमें लिखा गया है, “अगर आप हिजाब/पगड़ी पहनते हैं, तो उसका रंग काला होना चाहिए। हिजाब ऐसा होना चाहिए जो छाती तक मध्यम रूप से ढका रहे। रंग-बिरंगे पत्थरों वाली अंगूठियाँ (जैसे काला, नीला, हरा, लाल आदि) पहनने की अनुमति नहीं है। बिंदी और क्लचर भी पहनना मना है। साथ ही, धार्मिक धागे या कलाई में पहनने वाले बैंड को भी हटाना जरूरी है।”
लेंसकार्ट के परिचयात्मक दस्तावेज का पेज
इस डॉक्यूमेंट में जूते-कपड़े-घड़ी आदि चीजों को लेकर भी बताया गया है कि किस तरह की चीजें कर्मी पहनते हैं और किस तरह की नहीं। इसी दस्तावेज के एक और हिस्से को लेकर विवाद है। इसके पेज नंबर 10 पर सिंदूर लगाने को लेकर भी टिप्पणी की गई है। इसमें कहा गया है कि अगर कोई सिंदूर लगाता है तो उसे बहुत कम लगाना चाहिए और वह माथे पर फैलना नहीं चाहिए।
लेंसकार्ट के परिचयात्मक दस्तावेज का पेज
इसके अलावा लेंसकार्ट से जुड़े कुछ और डॉक्यूमेंट भी सामने आए हैं जिसमें इसी तरह की बातें कही गई हैं। लेखिका शेफाली वैद्य ने X पर ‘लेंसकार्ट स्टाइल गाइड’ (Lenskart style guide) की एक तस्वीर शेयर की है जिसमें बिंदी ना लगाने और हिजाब पहनने की बातें कही गई हैं।
शेफाली वैद्य ने अपने पोस्ट में लिखा, “पीयूष बंसल (लेंसकार्ट के फाउंडर) अपने कर्मचारियों से कहते हैं कि हिजाब ठीक है लेकिन बिंदी/तिलक/कलावा नहीं। लेंसकार्ट जैसी कंपनी, जो एक हिंदू बहुल भारत में काम करती है, जहाँ ज्यादातर कर्मचारी और ग्राहक हिंदू हैं, इस पर आप क्या कहेंगे?”
So I confirmed, this is genuine. This is what @peyushbansal tells his employees, hijab is okay, but bindi/tilak/Kalawa is not, for @Lenskart_com, a company that exists in Hindu majority Bharat, where most of the employees and consumers are Hindu! What do you say to this? This is… https://t.co/jQ2EPdWPJMpic.twitter.com/SWfOajOjpo
जैसे ही सोशल मीडिया पर ये पेज सामने आए लोगों को गुस्सा फूट पड़ा। कई लोगों ने लेंसकार्ट को बॉयकाट करने का अभियान शुरू करने की वकालत की तो कई ने कहा कि वे अब कभी लेंसकार्ट से कोई सामान नहीं खरीदेंगे।
एक यूजर ने लिखा, “पीयूष बंसल ये क्या बेतुका नियम है? बिंदी, कलावा और सिंदूर से काम का माहौल कैसे खराब हो सकता है या यह कैसे भेदभाव पैदा करते हैं? इस तरह की पाबंदियाँ क्यों लगाई जा रही हैं? अब से लेंसकार्ट से कुछ नहीं खरीदेंगे।” एक अन्य ने लिखा, “मैं लेंसकार्ट से कभी चश्मा नहीं खरीदूँगा। अब हिजाब पहनने वाली महिलाएँ ही चश्मे खरीदें। कृपया कर्मचारियों को नमाज पढ़ने और रमजान में रोजा रखने का तरीका भी सिखा दो।”
हमें लेंसकार्ट के स्टोर पर क्या पता चला?
इस मामले पर लेंसकार्ट की प्रतिक्रिया जानने के लिए हमने HR विभाग की एक वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत की लेकिन उन्होंने इस मामले पर कोई जवाब देने से इनकार कर दिया। इस मामले में लेंसकार्ट की प्रतिक्रिया के लिए हमने उन्हें ई-मेल भी भेजा है जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है और जवाब आने पर यह खबर अपडेट कर दी जाएगी।
इस बीच हम दिल्ली में लेंसकार्ट के एक स्टोर में पहुँचे और वहाँ काम करने वाले कर्मियों से इन वायरल खबरों पर उनकी प्रतिक्रिया और इस मामले की सच्चाई जाननी चाही। स्टोर पर काम करने वाले एक कर्मी ने हमें नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि यह डॉक्यूमेंट बिल्कुल सही है और हर कर्मी को इसमें दिए हुए नियमों और शर्तों का पालन करना होता है।
हमें स्टोर में लोगों को चश्मे दिखा रहे उस कर्मी से पूछा कि ‘क्या होगा अगर कोई कर्मी किसी दिन गलती से कलावा या कोई अन्य ऐसी चीज पहनकर आ जाए जिसकी इसमें मनाही हो’। उन्होंने हमें बताया कि ऐसा होने पर उस कर्मी को उस दिन के लिए बाहर जाने के लिए कह दिया जाता है और वो चाहे तो इन नियमों को मानकर काम करते रह सकता है।
कलावा, जिससे लोगों की धार्मिक आस्था जुड़ी है और उसे हटाना या काटना कई लोगों के लिए मुश्किल होता है। इसे लेकर जब हमने पूछा तो कर्मी ने हमें बताया कि अगर किसी को कलावा पहनना भी है तो वो उसे ‘स्लीव्स’ के भीतर छिपाकर पहन सकता है। यानी किसी भी अन्य व्यक्ति या ग्राहक को उसका कलावा नजर नहीं आना चाहिए।
लेंसकार्ट का एक स्टोर
जाहिर तौर पर कलावे-बिंदी जैसी चीजें लैब जैसे किसी महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्र में नियमों के चलते प्रतिबंधित हो सकती है लेकिन स्टोर पर काम करने वालों के लिए इससे कोई दिक्कत नहीं नजर आता है। लेंसकार्ट के उन कर्मी ने हमें बताया कि कलावा, बिंदी और सिंदूर को लेकर बनाए नियम तो सभी कर्मियों पर लागू हैं और लैब जैसी सेंसेटिव जगहों पर ये नियम और भी कड़े हैं। हालाँकि, उन्होंने इस बारे में विस्तार से कोई जानकारी हमें नहीं दी।
उनसे जब हमने पूछा कि ‘इस तरह के बाध्यकारी नियमों से काम करना मुश्किल होता है’ तो उन्होंने कहा कि कंपनी हमें इन नियमों के जरिए प्रोफेशनल बनाने की कोशिश कर रही है। हालाँकि, ‘कलावा पहनने से कोई अनप्रोफेशनल कैसे हो जाता है’ पूछे जाने पर उन्होंने चुप्पी साध ली।
स्टोर पर बैठे कर्मचारी के लिए कलावा-बिंदी पर रोक ‘धार्मिक हस्तक्षेप’!
इस पूरे मामले में एक सवाल जो खड़ा होता है वो ये कि अगर किसी लैब या मशीन वाले काम में कलावा, बिंदी या सिंदूर पर रोक लगाई जाती है तो उसे समझा जा सकता है। वहाँ सुरक्षा का सवाल होता है कलावा या उसका धागा मशीन में फँस सकता है, बिंदी या सिंदूर किसी महत्वपूर्ण मशीन या अन्य चीज में गिर सकता है जिससे काम प्रभावित हो सकता है।
लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब यही नियम एक सामान्य स्टोर या शोरूम में काम करने वाले कर्मचारी पर लागू किए जाते हैं। क्योंकि यहाँ उसका काम सिर्फ ग्राहकों से बात करना और सामान बेचना है। ऐसे माहौल में अगर किसी कर्मचारी को कहा जाए कि वह कलावा न पहने, बिंदी न लगाए या सिंदूर न लगाए तो यह सिर्फ ‘प्रोफेशनल लुक’ का मामला नहीं रह जाता बल्कि यह उसकी निजी और धार्मिक पहचान से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
भारत जैसे देश में जहाँ धर्म और संस्कृति रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं, वहाँ ये चीजें सिर्फ ‘सजावट’ नहीं होतीं बल्कि आस्था और पहचान का प्रतीक होती हैं। ऐसे में अगर इन्हें हटाने के लिए कहा जाए तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह नियम वास्तव में तटस्थ (Neutral) हैं या किसी खास पहचान को दबाने की कोशिश है।
अगर कोई नियम काम की जरूरत के कारण है (जैसे सुरक्षा) तो वह उचित माना जा सकता है। लेकिन अगर वही नियम बिना ठोस कारण के केवल ‘दिखावे’ या ‘इमेज’ के नाम पर लागू किया जाए तो मामला भेदभाव तक पहुँच जाता है। अगर एक सेल्समैन कलावा पहनकर या माथे पर छोटी बिंदी लगाकर काम कर रहा/रही है और इससे कंपनी के काम या ग्राहक अनुभव पर कोई असर नहीं पड़ रहा तो उसे रोकने का तर्क बेमानी हो जाता है।
नौकरी चाहिए है? तो पहले नमाज पढ़ो… सैलरी हाइक या प्रमोशन चाहिए है? तो पहले बीफ खाओ… महाराष्ट्र के नासिक में मुस्लिम कट्टरपंथियों के ‘कॉरपोरेट जिहाद’ का शिकार बनी हिंदू युवतियों और महिलाओं ने ऐसे आरोप लगाए थे। आइए समझते हैं कि विवाद क्या था और इसी क्षेत्र में काम करते हुए मेरा क्या अनुभव रहा।
हाल ही में महाराष्ट्र के नासिक में ‘कॉरपोरेट जिहाद’ का मामला सामने आया है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की एक BPO ऑफिस में हिंदू महिला कर्मचारियों को निशाना बनाकर उन्हें किस तरह इस्लामी जिहाद में फँसाया जा रहा था और इसको लेकर चर्चा हो रही है। सभी आरोपि मुस्लिम हैं और कंपनी में अच्छी और प्रभावशाली पोस्ट पर काम कर रहे थे। इस विवाद के सामने आने के बाद से BPO और KPO की कार्यप्रणाली को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने का मेरा अनुभव भी शायद समाज के लिए उपयोगी हो सकता है।
मेरा अनुभव
जब पूरा शहर रात के अँधेरे में सो रहा होता है, तब इन चमकती हुई काँच की इमारतों में हजारों युवा जाग रहे होते हैं। आज मैं यह खुलासा करूँगा कि कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल और आधुनिकता के नाम पर यहाँ क्या चल रहा है। आज ऑपइंडिया पर मैं अपना निजी अनुभव साझा कर रहा हूँ।
मैंने BPO और KPO सेक्टर में सालों तक काम किया है। मैंने वहाँ का माहौल देखा है, नेटवर्क देखा है और वहाँ की मानसिकता को करीब से अनुभव किया है। नासिक में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 6 मुस्लिम टीम लीडर तो बस शुरुआत भर हैं। आज मैं इस बारे में बात करूँगा कि इन दफ्तरों के अंदर असली खेल कैसे खेला जाता है।
BPO-KPO सेक्टर के अंदर की सच्चाई
इस सेक्टर में नौकरी पाने के लिए आपको किसी बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं होती। थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानने भर से ही आपको 20-30 हजार रुपए की नौकरी मिल जाती है। यहाँ मुख्य रूप से दो तरह के लोग काम करते हैं। एक तरफ वे लोग होते हैं जो बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते और एक ही जगह पर लंबे समय तक टिके रहना चाहते हैं। दूसरी तरफ कॉलेज जाने वाले हिंदू युवक-युवतियाँ होते हैं जो अपने खर्च निकालने के लिए रात में काम करते हैं।
मैं भी अपने कॉलेज के दिनों में अपने खर्च निकालने के लिए ऐसे ही एक BPO में रात की शिफ्ट में काम किया करता था। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि जब कोई मुस्लिम व्यक्ति टीम लीडर (TL), ट्रेनर या HR जैसी किसी ऊँची पोस्ट पर पहुँच जाता है तो वह वहाँ के पूरे माहौल (ecosystem) को ही बदल देता है। वह बड़ी आसानी से अपने मजहब के युवाओं को इंटरव्यू पास करवाकर उन्हें इस सिस्टम के अंदर ले आता है।
हिंदू युवा आमतौर पर 2-3 साल में अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करके दूसरे क्षेत्रों में चले जाते हैं। लेकिन ये लोग सालों तक एक ही जगह पर टिके रहते हैं, क्योंकि इन्हें आगे और पढ़ाई करने की जरूरत नहीं होती। इसका नतीजा यह होता है कि वे ट्रेनिंग से लेकर मैनेजमेंट तक की सभी अहम कुर्सियों पर काबिज हो जाते हैं और जब सत्ता उनके हाथों में आ जाती है तो उनका असली खेल शुरू होता है। और तब उनका असली निशाना होती हैं- नई-नई आई हुईं हिंदू लड़कियाँ।
सीक्रेट मुस्लिम वॉट्सऐप ग्रुप
नासिक के TCS केस में पुलिस जाँच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि इन जिहादियों ने ऑफिस के अंदर एक सीक्रेट मुस्लिम वॉट्सऐप ग्रुप बनाया हुआ था। इस ग्रुप में ऑफिस की हिंदू लड़कियों की तस्वीरें शेयर की जाती थीं। वहाँ इस तरह की चर्चाएँ होती थीं कि ‘आज किसका नंबर है?’, ‘कौन-सी लड़की कमजोर है जो जल्दी जाल में फँस जाएगी?’, ‘किसे किस तरह ब्लैकमेल करना है?’।
जो लड़की अपने टीम लीडर को अपना रक्षक मानती थी, वही टीम लीडर डिजिटल ग्रुप में उसी लड़की की बोली लगा रहा था। यह एक ‘डिजिटल मंडी’ थी, जहाँ हिंदू बेटियों की अस्मिता के सौदे हो रहे थे।
टीम आउटिंग और ब्लैकमेलिंग की रणनीति
मुझे याद है कि जब मैं काम करता था, तब ये लोग ‘टीम आउटिंग’ या ‘टीम डिनर’ के नाम पर बहुत जोर देते थे। नासिक के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। ये जिहादी पूरी टीम को आउटिंग पर ले जाते, जहाँ हिंदू लड़कियों का शारीरिक शोषण किया जाता, उनके आपत्तिजनक फोटो और वीडियो बनाए जाते और फिर धर्मांतरण के लिए ब्लैकमेलिंग शुरू कर दी जाती।
नासिक के अंबड पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत में ऐसी बातें सामने आई हैं जिन्हें सुनकर खून खौल उठता है। कंपनी के मुस्लिम टीम लीडर्स और मैनेजर्स ने जैसे एक नियम बना दिया था कि अगर सैलरी हाइक या प्रमोशन चाहिए तो नमाज पढ़नी होगी और गौमांस खाना होगा।
हिंदू पुरुष भी टारगेट
ये लोग सिर्फ लड़कियों को ही नहीं बल्कि हिंदू लड़कों को भी निशाना बनाते हैं। उन्हें नशे की आदत में धकेलना, उनकी आस्था को तोड़ना और धीरे-धीरे उन्हें इस्लामी विचारधारा की ओर मोड़ना, यह सब ऑफिस के AC केबिन में बैठकर किया जाता है।
रात के समय जब कोई निगरानी करने वाला नहीं होता, तब ये जिहादी ऑफिस को अपने प्रचार का केंद्र बना देते हैं। नाइट शिफ्ट का सबसे बड़ा फायदा इन्हें यह मिलता है कि रात में पूरी दुनिया सो रही होती है। ब्रेक के नाम पर लड़कियों को बाहर ले जाना, होटलों में जाना तो यह सब आम बात बना दी जाती है। CCTV भले ही ऑफिस के फ्लोर पर लगे होते हैं लेकिन पार्किंग या बाहर क्या हो रहा है, इसकी कोई परवाह नहीं करता।
पूरे देश में फैला है नेटवर्क
नासिक पुलिस की कार्रवाई से यह साफ होता है कि यह कोई एक-दो लोगों का मामला नहीं बल्कि एक सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। महाराष्ट्र पुलिस ने फिलहाल 6 लोगों को पकड़ा है लेकिन क्या इतना ही काफी है? गुजरात से लेकर दिल्ली तक कई कंपनियों में ऐसे मामलों को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
असल में ऐसी कंपनियों के HR और मैनेजमेंट की भी जाँच होनी चाहिए। हर कंपनी की Prevention of Sexual Harassment (POSH) कमेटी में संतुलित और जवाबदेह प्रतिनिधित्व होना चाहिए ताकि पीड़ित महिलाओं को सही न्याय मिल सके।
माता-पिता से भी अपील है कि वे इस बात पर ध्यान दें कि उनके बेटे-बेटियाँ किस कंपनी में काम कर रहे हैं, उनका टीम लीडर कौन है और कार्यस्थल का माहौल कैसा है। कॉर्पोरेट कल्चर के नाम पर किसी भी तरह के शोषण या दबाव को नजरअंदाज न करें। अगर किसी के पास ऐसी कोई जानकारी हो, तो संबंधित अधिकारियों तक जरूर पहुँचाएँ क्योंकि समय पर उठाई गई आवाज किसी की जिंदगी बचा सकती है।
(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
महाराष्ट्र में अमरावती जिले से सामने आया मामला समाज की कई परतों को उजागर करता है। एक तरफ जहाँ मुस्लिम युवक मोहम्मद अयान अहमद तनवीर ने 180 लड़कियों को अपने जाल में फँसाया, उनके साथ 350 से ज्यादा अश्लील वीडियो बनाए और इनमें से 100 वीडियो वायरल भी कर दिए। दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस है, जो ऐसे गंभीर मामलों में पीड़िताओं को कठघरे में खड़ा करने से बाज नहीं आती।
इस पूरे मामले में कॉन्ग्रेस की ‘टुच्ची’ सोच को पूरी तरह उजागर करते कॉन्ग्रेस नेत्री यशोमती चंद्रकांत ठाकुर का पीड़िताओं पर सवाल उठाते बयान सामने आया है। उन्होंने उन पीड़िताओं को लेक्चर दिया- “लड़कियों में अक्ल नहीं है क्या? क्या लड़कियों ने अपनी बुद्धि खो दी है?”
🔴#BREAKING | "Didn't the girls have any sense" : Congress leader Yashomati Thakur on Maharashtra exploitation case pic.twitter.com/3aX4i44I8B
दिलचस्प बात यह है कि यशोमती ठाकुर 2019 से 2022 तक कॉन्ग्रेस और शिवसेना के गठबंधन वाली सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री रह चुकी हैं। यानी जिस पद पर रहते हुए यशोमती ठाकुर से महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान की आस थी, वही कॉन्ग्रेस नेता आज पीड़ित लड़कियों पर सवाल उठा रही है।
सीधी बात है कि ये सिर्फ एक बयान नहीं है, ये कॉन्ग्रेस पार्टी की मानसिकता है। ये वही सोच है जो हर बार रेप, छेड़छाड़ या यौन शोषण के मामलों में अपराधी पर सवाल उठाने के बजाए लड़कियों को ही नसीहत देने लगती है। कभी उनके कपड़ों पर, कभी उनकी समझ पर, कभी उनके फैसलों पर। हर बार राजनीतिक बयानबाजी में निशाना पीड़िता ही बनती हैं।
और ये पहली बार नहीं हुआ है। कॉन्ग्रेस के नेताओं का ट्रैक रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए, ऐसे बयान बार-बार सामने आते हैं। कर्नाटक विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर केआर रमेश कुमार का वो शर्मनाक बयान कौन भूल सकता है- “जब रेप होना ही है, तो लेटो और मजे लो।” यही नहीं कॉन्ग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया खुलेआम कहते हैं- “खूबसूरत लड़की दिख जाए तो दिमाग विचलित हो जाता है।” केरल कॉन्ग्रेस के नेता मुल्लापल्ली रामचंद्रन तो इससे भी आगे निकल जाते हैं और कहते हैं- “जिस लड़की का रेप हो, उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए।” वहीं अमरगौड़ा पाटिल जैसे नेता तो रेप पीड़िता के परिवार को ही झूठा करार देने लगते हैं।
ये कोई एक-दो फिसलती जुबान के उदाहरण नहीं हैं, ये उसी पुरानी, टुच्ची और गैर-जिम्मेदार सोच की झलक है जो अंदर तक बैठी हुई है।
और बात यहीं खत्म नहीं होती। जब राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी हाथरस की पीड़िता से मिलने जाते हैं, तब जो वीडियो सामने आई, उसने भी बहुत कुछ साफ कर दिया। जिस वक्त पूरे देश में गुस्सा और संवेदना का माहौल था, उस समय दोनों भाई-बहन का कार में हँसी-मजाक करते हुए जाना ये दिखाता है कि गंभीरता कितनी है। साफ है, ये सिर्फ अलग-अलग नेताओं की गलती नहीं है।
सबसे खतरनाक बात ये है कि इस तरह के बयान सीधे-सीधे अपराधियों को राहत देते हैं। जब देश की एक पार्टी के नेता ही पीड़ितों को दोष देने लगेंगे, तो अपराधियों का हौसला क्यों नहीं बढ़ेगा? उन्हें तो यही लगेगा कि गलती उनकी नहीं, बल्कि लड़कियों की ही है।
आखिर में साफ शब्दों में कहें तो कॉन्ग्रेस की समस्या बयान नहीं, पूरी सोच है। बार-बार वही गिरी हुई बातें, वही पीड़ितों को कठघरे में खड़ा करने की आदत ये दिखाती है कि ये कोई गलती नहीं बल्कि जड़ जमा चुकी मानसिकता है। जिस पार्टी के नेताओं को रेप जैसे गंभीर अपराध में भी संवेदनशीलता नहीं दिखती, वो महिलाओं की सुरक्षा की बात करें, ये खुद एक मजाक लगता है। सच यही है कि कॉन्ग्रेस के लिए ऐसे मुद्दे गंभीर नहीं, सिर्फ राजनीति का सामान है। और जब तक ये सोच नहीं बदलेगी, तब तक इनके बयान भी ऐसे ही जहरीले और शर्मनाक आते रहेंगे।
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी TCS की नासिक BPO यूनिट में यौन उत्पीड़न और धर्मांतरण के आरोपों से भारत हिल गया है। अब तक सात गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं। इसमें कंपनी की एचआर मैनेजर और मुख्य आरोपित निदा खान भी शामिल हैं। गिरफ्तार किए गए आरोपितों में आसिफ अंसारी, शफी शेख, शाहरुख कुरैशी, रजा मेमन, दानिश शेख और तौसिफ अत्तर शामिल हैं।
जाँच करने वालों का कहना है कि एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम अब इसकी जाँच भी कर रही है कि निदा खान ने कंपनी में किस तरह से लड़कियों पर दबाव डाला। निदा खान के नेटवर्क के अंदर फाइनेंशियल लिंक, डिजिटल फुटप्रिंट की जाँच भी हो रही है।
इस मामले को लेकर एक रिसॉर्ट से CCTV फुटेज जब्त किया गया है, जहाँ एक पीड़िता पर हमला किया गया था। बताया जा रहा है कि यह रैकेट 2021 से एक्टिव था। इसमें कमजोर कर्मचारियों को टारगेट किया जाता था और इसके लिए ‘बाहरी फंडिंग’ की आशंका भी है। पीड़ितों को धमकाने के लिए एक और HR अधिकारी जाँच के दायरे में है। अब तक 9 FIR दर्ज की गई है।
पीड़िताओं ने आरोप लगाा है कि टीम लीडर्स, जैसे- आसिफ अंसारी, तौसीफ अत्तर, दानिश शेख, रजा मेमन, शाहरुख कुरैशी, शफी शेख आदि ने उन्हें अच्छी सैलरी, प्रमोशन और नौकरी के बेहतर अवसर का लालच देकर फँसाया।
इसके बाद शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाला। ब्लैकमेल किया गया। कुछ मामलों में बलात्कार तक के आरोप लगे हैं। हिन्दू लड़कियों को नमाज पढ़ने, रोजा रखने, माँसाहार करने और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। इस जिहादी नेटवर्क का भंडाफोड़ तब हुआ, जब अंडरकवर महिला पुलिस ने कंपनी में शामिल होकर सच सामने लाया।
कौन है निदा खान
30 साल की निदा खान सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं। वह नासिक TCS के BPO यूनिट में HR मैनेजर के तौर पर काम करती थी और कंपनी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी यानी ICC का भी हिस्सा थी।
उसके काम में कर्मचारियों की शिकायतों को दूर करना, कार्यस्थल में कर्मचारियों की सुरक्षा का ध्यान रखना और POSH (यौन उत्पीड़न की रोकथाम) एक्ट के नियमों का पालन करना शामिल था। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, वह पुणे के कामकाज से जुड़ी थीं और कहा जाता है कि उन्होंने जनवरी में कंपनी से इस्तीफा दे दिया था। हालाँकि, उनके खिलाफ लगाए गए आरोप उनके प्रोफेशनल काम की वजह से खास तौर पर गंभीर हैं।
HR head Nida Khan was playing a key role in the jihadist conspiracy at TCS Nashik.
She helped recruit Hindu women, pushed them to adopt burqas, hijabs, and Islamic customs, and then deliberately suppressed their complaints of sexual exploitation.
जाँच में ये बात सामने आई है कि लंबे वक्त तक कई महिलाएँ परेशान थीं, उन्होंने एचआर अधिकारी निदा खान को जानकारी भी दी, लेकिन न तो उनकी शिकायतें दर्ज हुई और न ही कोई कार्रवाई की। जाँचकर्ताओं का मानना है कि निदा खान ने शायद आरोपों का जवाब नहीं दिया और न ही आलाधिकारियों को शिकायतों की जानकारी दी।
नासिक सिटी पुलिस कमिश्नरेट के मुंबई नाका और देवलाली कैंप पुलिस स्टेशनों में FIR दर्ज कराने वाली कई हिंदू महिलाओं ने कहा कि उनके यौन उत्पीड़न की शिकायतों को नजरअंदाज किया गया। कुछ शिकायत करने वालों ने यह भी कहा कि उन पर चुप रहने का दबाव बनाया गया था। अब यह भी जानने की कोशिश की जा रही है कि क्या निदा खान ने जानबूझकर आरोपितों को बचाने की कोशिश की?
आखिर पीड़िताओं के बार-बार किए गए दावों को क्यों खारिज कर दिया। 78 ईमेल और चैट मैसेज मिलने के बाद भी उसने अपने सीनियर्स को इस बारे में क्यों नहीं बताया। निदा खान की कॉल डिटेल्स में भी पता चला है कि आरोपितों से उसकी बातचीत होती रहती थी।
शिकायत करने वालों के मुताबिक, वह POSH कमेटी की मेंबर थीं, लेकिन उन्होंने इस मामले में कोई एक्शन नहीं लिया, बल्कि पीड़िताओं को ये समझाने की कोशिश की कि बिजनेस की दुनिया में ऐसी घटनाएँ आम हैं।
निदा खान की भर्ती प्रक्रिया के पैटर्न की जाँच
जाँच के मुताबिक, निदा खान ने हिंदू लड़कियों को इस्लामिक परंपरा सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्हें अपने विश्वास में लिया और झूठे वादे किए। फिर उन्हें मुस्लिम महिलाओं की तरह बुर्का, हिजाब और दूसरे कपड़े पहनने के लिए मजबूर किया। वह मामले के खुलासे के वक्त पुणे ऑफिस से जुड़ गई थी। इसलिए नासिक से पुणे तक पुलिस की टीम जाँच में जुटी है। वह किन लोगों से मिली, कहाँ कहाँ की यात्राएँ की, इन सब का भी पता लगाया जा रहा है।
खास बात यह है कि निदा खान का नाम पहली आधिकारिक शिकायत में भी दर्ज है। इसमें दानिश शेख और तौसीफ अत्तर के साथ उसका नाम एक 23 साल की दलित हिंदू पीड़िता ने दर्ज कराया था। शिकायतकर्ता ने बताया कि जुलाई 2022 से फरवरी 2026 तक तीनों ने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में गलत बातें कहीं, जिससे उसकी धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं। उसने दानिश पर रेप का आरोप लगाया। दानिश पहले से शादीशुदा है और उसके 2 बच्चे हैं। उसने शादी का झाँसा देकर उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया, जबकि तौसीफ ने वर्कप्लेस पर उसके सामने सेक्सुअल प्रपोजल रखे।
इस मामले की जाँच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया गया है। एसआईटी ये भी जाँच कर रही है कि ये सिस्टम की विफलता थी या व्यक्तिगत मामला था। पुलिस उनके बैंक खातों की भी जाँच कर रही है, ताकि किसी तरह के लेन-देन का पता लगाया जा सके।
पीएम मोदी ने 14 जनवरी को भारत रत्न डॉक्टर भीमराव रामजी अंबेडकर की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान निर्माता के देश निर्माण की कोशिशें बहुत मोटिवेट करने वाली हैं। उनका जीवन और काम आने वाली पीढ़ियों को एक न्यायपूर्ण और आगे बढ़ने वाला समाज बनाने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
Tributes to Dr. Babasaheb Ambedkar on his birth anniversary. His efforts towards nation building are deeply motivating. His life and work continue to inspire generations to build a just and progressive society. pic.twitter.com/MWHUTlpf9Y
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर 85 साल पहले महाराष्ट्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक शाखा में आए थे। संघ के विश्व संवाद केंद्र (वीएसके) ने विदर्भ में कहा कि अंबेडकर ने अपने दौरे के दौरान कहा था कि कुछ मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद वह आरएसएस को अपनेपन की भावना से देखते हैं। उन्होंने दौरा कर उन आरोपों को भी झुठलाया, जो उस वक्त सामाजिक संगठन पर लग रहे थे। यह आरएसएस की निस्वार्थ योगदान को दर्शाता है। आरएसएस पर तीन बार प्रतिबंध लगा, लेकिन यह बेदाग बाहर निकला। उस वक्त संगठन को लेकर मनगढ़ंत सूचना फैलाई गई थी।
सतारा की शाखा में पहुँचे थे डॉक्टर अंबेडकर
डॉ. अंबेडकर ने दो जनवरी 1940 को सतारा जिले के कराड में आरएसएस की शाखा का दौरा किया। उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित भी किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “हालाँकि कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन मैं संघ को अपनेपन की भावना से देखता हूँ।” 9 जनवरी, 1940 को पुणे के मराठी दैनिक ‘केसरी’ में डॉ. आंबेडकर के आरएसएस शाखा का दौरा करने के बारे में एक खबर प्रकाशित हुई थी।
(साभार-Arise Bharat)
आरएसएस विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी की किताब ‘डॉ. अंबेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’में भी इसका जिक्र किया गया है, इसमें आरएसएस और डॉ. अंबेडकर के बीच संबंधों के बारे में बताया गया है। किताब के आठवें अध्याय में ठेंगड़ी कहते हैं कि डॉ. आंबेडकर को आरएसएस के बारे में पूरी जानकारी थी। संघ के स्वयंसेवक नियमित रूप से अंबेडकर के संपर्क में रहते थे और उनसे चर्चा करते थे।
डॉक्टर अंबेडकर यह भी जानते थे कि आरएसएस हिंदुओं को एकजुट करने वाला एकमात्र अखिल भारतीय संगठन है। वह इस बात से भी वाकिफ थे कि हिंदुत्व की बात करने वाले दूसरे संगठनों से आरएसएस बिल्कुल अलग है। आरएसएस के विकास की गति को लेकर उनके मन में संदेह था। इस दृष्टि से डॉ. आंबेडकर और आरएसएस के बीच संबंधों का विश्लेषण करने की आवश्यकता है।
(साभार-Arise Bharat)
संघ ने इस आरोप को भी गलत साबित कर दिया है कि वह केवल ब्राह्मणों के लिए है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 1934 में वर्धा में आरएसएस शिविर का दौरा किया था, जहाँ उन्होंने महसूस किया कि संघ में विभिन्न जातियों और धर्मों के स्वयंसेवक शामिल थे। वहाँ उन्होंने खुद अनुभव किया कि शिविर में कोई भी स्वयंसेवक अपनी या अन्य स्वयंसेवकों की जाति जानने में दिलचस्पी नहीं रखता था। सभी के मन में एक ही भावना थी कि हम सभी हिंदू हैं। इसलिए स्वयंसेवकों ने अपनी दैनिक गतिविधि सहजता से की।
यह देख कर गाँधीजी बहुत हैरान हुए। उन्होंने आरएसएस संस्थापक डॉ. हेडगेवार के साथ वार्ता की और अस्पृश्यता उन्मूलन कार्यक्रम के सफल कार्यान्वयन के लिए उन्हें बधाई दी।
चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की कि संशोधन प्रक्रिया के अंतिम चरण में 27,16,393 मतदाता अयोग्य पाए गए। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले राजनीतिक और मीडिया गुटों ने मुस्लिम-पीड़ित की कहानी को हवा देना शुरू कर दिया।
“Political turmoil in Indian border state as nine million lose voting rights” हेडलाइन के साथ इस आर्टिकल में स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने एक तरह का डर का माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने नाम हटाए जाने को राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करते हुए इसे ‘वोटिंग अधिकार छिन जाने’ का मामला बताया, जो राज्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। अपने इस एकतरफा लेख में कोलकाता के इस तथाकथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ ने खासतौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाए जाने की एक काल्पनिक कहानी को ज्यादा उभारने की कोशिश की।
इस आर्टिकल में चालाकी से आँकड़े, भौगोलिक संदर्भ, राजनीतिक बयान और सहानुभूति जगाने वाली व्यक्तिगत कहानियों को इस तरह पेश किया गया है कि पाठक खुद ही इन बिंदुओं को जोड़कर एक कथित साजिश का अंदाजा लगाने लगें। मानो बंगाल के मुस्लिमों के वोटिंग अधिकार छीनने की कोशिश हो रही हो, जो आमतौर पर BJP के खिलाफ वोट करते हैं।
12 अप्रैल 2026 को प्रकाशित BBC के इस आर्टिकल में लिखा गया है, “भारत की बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जो काफी हद तक खुली और कुछ हिस्सों में नदी के किनारे-किनारे गुजरती है। इसका एक बड़ा हिस्सा बंगाल से होकर जाता है। यही वजह है कि राज्य में प्रवासन और मतदाता सूची को लेकर होने वाली बहस को एक संवेदनशील और राजनीतिक रूप दे दिया गया है।”
स्निगधेंदु भट्टाचार्य ने इशारों-इशारों में यह जताने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट ने सही फैसला नहीं लिया, जब उसने सभी ‘विवाद सुलझाए बिना ही इस अप्रैल में चुनाव कराने की अनुमति दे दी।’ उन्होंने यह भी लिखा की इस वजह से ‘करीब 27 लाख मतदाताओं का भविष्य अब भी अनिश्चित’ बना हुआ है।
बंगाल SIR में मतदाता हटाना पारदर्शी जाँच या मुस्लिमों का मत छीनने की कोशिश?
गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58.25 लाख नाम हटाए थे। ये वे लोग थे जो या तो मृत पाए गए, कहीं और शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से अनुपस्थित थे या जिनके नाम दोहराए गए थे। इसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई। फिर 28 फरवरी को अंतिम सूची से करीब 5 लाख और नाम हटाए गए, जिससे कुल मिलाकर हटाए गए नामों की संख्या करीब 91 लाख के आसपास पहुँच गई।
शुरुआत में 60.06 लाख मतदाताओं को जाँच के दायरे में रखा गया था, जिनमें से लगभग आधे लोग अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हटाए गए, जहाँ 11 लाख संदिग्ध मतदाताओं में से 4.55 लाख से ज्यादा अयोग्य निकले। मुर्शिदाबाद की सीमा बांग्लादेश से लगती है। यहाँ बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ और भीड़ जुटाकर हिंसा जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में अयोग्य मतदाताओं का सामने आना इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जा रहा है। मालदा और अन्य सीमावर्ती जिलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली।
सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटना और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ की बढ़ती संख्या जैसे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन जिलों की धार्मिक जनसंख्या संरचना को बदलने की एक सुनियोजित कोशिश हो सकती है। हालाँकि, इस पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले गुट यह कहानी गढ़ रहें है कि चुनाव आयोग और BJP मिलकर मुस्लिमों को मनमाने तरीके से वोटिंग अधिकार से वंचित कर रहे हैं।
चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि हटाए गए ज्यादातर नाम सामान्य श्रेणियों में आते हैं। जैसे मृतक, लंबे समय से अनुपस्थित, स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट हो चुके लोग, दिए गए पते पर न मिलने वाले या फर्जी एंट्रीज। मतदाता सूची में इस तरह की गड़बड़ियाँ आम होती हैं और SIR अभियान का मकसद ही इन्हें ठीक करना था। यह प्रक्रिया सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि अब तक शामिल 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इसी उद्देश्य से चलाई गई। ताकि घोस्ट वोटर, पलायन और पुरानी एंट्रीज जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके।
SIR में चुनाव आयोग ने तय प्रक्रिया का पालन किया, जबकि उसे राज्य की TMC सरकार के दबाव और विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन BBC के आर्टिकल में इस बात का जिक्र तक नहीं है कि चुनाव आयोग के अधिकारी लगातार दबाव में काम कर रहे थे और मालदा में तो न्यायिक अधिकारियों को अपने काम के दौरान इस्लामी भीड़ की हिंसा तक झेलनी पड़ी। जाहिर है, ये बातें उस ‘मुस्लिम पीड़ित’ वाली कहानी में फिट नहीं बैठतीं, जिसे पेश करने की कोशिश की गई है।
BBC के आर्टिकल में दावा किया गया है, “राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक, जिन 27 लाख मामलों पर स्थिति स्पष्ट नहीं है, उनमें करीब 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कुल मिलाकर हटाए गए 90 लाख नामों में से 31.1 लाख यानी लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी से ज्यादा है।”
हालाँकि, BBC की इस कहानी के उलट सच यह है कि जिन 27 लाख मामलों को ‘अभी तय नहीं’ बताया जा रहा है, या जिन 27,16,393 मतदाताओं के नाम हटाए गए। उन्हें बिना जाँच के बाहर नहीं किया गया। बल्कि हर मामले की न्यायिक समीक्षा हुई। इन नामों को कुछ गड़बड़ियों की वजह से चिन्हित किया गया था और करीब 705 न्यायिक अधिकारियों ने इनकी जाँच की। यह पूरी प्रक्रिया हाई कोर्ट की निगरानी में और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हुई। कुल 60.06 लाख मामलों में से 32.68 लाख लोगों को योग्य माना गया, जबकि 27.16 लाख को अयोग्य घोषित किया गया।
सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, उनके लिए आपत्ति दर्ज कराने का रास्ता भी खुला है। इसके लिए 19 खास ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहा वे अपील कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान कराने की अनुमति जरूर दी है और यह भी कहा कि दूसरे राज्यों में SIR प्रक्रिया ‘सुचारू रूप’ से पूरी हुई, जबकि बंगाल में ‘कानूनी विवादों’ के चलते स्थिति अलग रही। साथ ही, शीर्ष अदालत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि बिना SIR या चुनाव को रोके पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा और तय समयसीमा का ध्यान रखा जाए।
वहीं BBC के आर्टिकल में ‘राजनीतिक दलों’ के आँकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया, “हटाए गए 90 लाख नामों में से 3.11 लाख यानी करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि राज्य की आबादी में उनकी 27 प्रतिशत हिस्सेदारी से ज्यादा हैं।”
लेकिन BBC ने इस बात को नजरअंदाज किया कि कुल संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा नाम हिंदुओं के ही हटाए गए, जो करीब 63 प्रतिशत हैं। यहाँ तक कि कुछ हिंदू बहुल इलाकों जैसे पश्चिम बर्धमान और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय वाले क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। इसके बावजूद BBC का आर्टिकल SIR प्रक्रिया को इस तरह पेश करता है मानो यह बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ और किसी ‘मुस्लिम-विरोधी साजिश’ से जुड़ा मामला हो, जिससे राज्य में डर और तनाव का माहौल बन सकता है।
चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी जाँच के बाद की गई है, न कि किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए। मुस्लिम मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। इसके बावजूद BBC ने कमजोर दलीलों और अस्पष्ट वजहों के सहारे अपनी साजिश वाली कहानी को सही ठहराने की कोशिश की है।
अगर एक पल के लिए मान भी लें कि चुनाव आयोग और BJP ने मिलकर चुनावी सूची को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, तो फिर सवाल उठता है कि खुद को हिंदू समर्थक बताने वाली पार्टी ऐसी प्रक्रिया क्यों होने देंगी, जिसमें हटाए गए नामों में 63 प्रतिशत हिंदू हों? और बंगाल में पहली बार जीत हासिल करने की कोशिश कर रही BJP आखिर ऐसा खुद को नुकसान पहुँचाने वाला कदम क्यों उठाएगी?
इसके बावजूद द वायर, न्यूजलॉन्ड्री, द क्विंट और आर्टिकल-14 जैसे प्लैटफॉर्म्स के लिए लिखने वाले स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने आधिकारिक आँकड़ों या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को तवज्जो देने के बजाए कुछ चुनिंदा उदाहरणों और TMC जैसे दलों के सूत्रों पर ज्यादा भरोसा किया। यहाँ तक कि द क्विंट में अपने एक आर्टिकल में उन्होंने बंगाल के SIR अभियान को ‘घोषित किए बिना लागू किया NRC’ तक बता दिया।
वोटर लिस्ट फ्रीज होने के चलते हटाए गए मतदाता बंगाल चुनाव में नहीं कर सकते वोट
जिन मतदाताओं के नाम स्थायी रूप से हटा दिए गए हैं, उन्हें सिर्फ इस वजह से दोबारा वोट देने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम हैं। चुनाव आयोग पहले ही बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर चुका है यानी जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश नहीं देता, तब तक इसमें नए नाम नहीं जोड़े जा सकते।
इस बात की पुष्टि 13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर दी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोमल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं और जिनकी दोबारा शामिल होने की अर्जी लंबित है, उन्हें आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह टिप्पणी कोर्ट ने उस समय की जब 13 लोगों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिन्होंने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ कोर्ट से दखल देने की माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी याचिका को ‘समय से पहले’ बताया और उन्हें पहले अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने की सलाह दी।
TMC नेता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट से कहा था कि करीब 16 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें चुनाव में वोट देने की इजाजत दी जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा, “यह बिल्कुल संभव नहीं है। अगर ऐसा किया गया, तो इशसे जुड़े लोगों के वोटिंग अधिकारों को ही रोकना पड़ेगा।”
वहीं जस्टिस बागची ने बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 34 लाख अपीलें दायर की गई हैं। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता (कुरैशा यासमीन और अन्य) पहले ही अपील ट्रिब्यूनल के पास जा चुके हैं… ऐसे में हमें लगता है कि उनकी चिंता अभी समय से पहले की है। अगर उनकी माँग मान ली जाती है, तो उसके जरूरी कानूनी परिणाम भी सामने आएँगे।”
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने का आवेदन 9 अप्रैल 2026 या उसके कुछ दिन बाद मंजूर हो जाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और वह वोट दे सकेगा। लेकिन कोर्ट ने यह भी बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों के मामले अभी लंबित हैं, उन्हें चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
BBC आर्टिकल के लेखक की हिंदू-विरोधी, BJP-विरोधी और कभी प्रो-TMC आर्टिकल लिखने की आदत
हालाँकि, स्निधेंदु भट्टाचार्य का बार-बार ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाना हैर करने वाला नहीं है, क्योंकि पहले भी वह हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ लिखे गए आर्टिकल को लेकर चर्चा में रहे हैं।
इतना ही नहीं चुनावों के दौरान उनके TMC के पक्ष में लिखे गए आर्टिकल का भी एक रिकॉर्ड रहा है, जिससे उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठते रहे हैं।
जहाँ तक बंगाल का सवाल है, यह उन राज्यों में शामिल है जहाँ बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के मामले ज्यादा सामने आते हैं। पिछले तीन साल में 2600 से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और वापस भेजा गया है। राज्य के कुल 10 जिले ऐसे हैं जो बांग्लादेश की सीमा से जुड़े हुए हैं। जैसे उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। ऐसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ और उससे जुड़े मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं।
सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की जातीय और भाषा की समानता की वजह से आवाजाही को पकड़ना हमेशा मुश्किल रहा है। इसी का फायदा उठाकर कई बांग्लादेशी घुसपैठिए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम बताए जाते हैं, यहाँ स्थानीय पहचान पत्र बनवाने और मतदाता सूची में अपने नाम जुड़वाने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में SIR जैसे अभियान के जरिए उनकी पहचान करना और उन्हें मतदाता सूची से हटाना एक तरीका माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या कुछ राजनीतिक दल और उनके समर्थक मीडिया समूह ऐसे लोगों को वोटबैंक के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
पिछले साल भी ऐसा देखा गया था कि जैसे ही नवंबर 2025 में SIR के दूसरे चरण के तहत घर-घर जाकर जाँच की घोषणा हुई, कई अवैध घुसपैठियों में घबराहट फैल गई। कुछ लोगों ने तो यह भी माना कि वे बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में आए थे। इसके बाद अचानक कई लोगों का वहाँ से चले जाना इस बात का संकेत था कि उन्हें पकड़े जाने का डर था।
वहीं, यह भी हैरानी की बात नहीं मानी जा रही कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे पत्रकार को मंच दिया, जिन्होंने इस मुद्दे पर ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाया। BBC पर पहले भी भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लगते रहे हैं। चाहे 2022 की लीसेस्टर हिंसा हो, 2020 के दिल्ली दंगे या फिर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ घटनाों की कवरेज।
यह हैरानी की बात नहीं है कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे एक पक्षपाती ‘स्वतंत्र पत्रकार’ को मंच दिया, जिन्होंने बंगाल के SIR को लेकर मुस्लिम पीड़ित वाली कहानी पेश की। ब्रिटेन के इस मीडिया संस्थान पर पहले भी कई बार भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लग चुके हैं। चाहे 2022 में लीसेस्टर की हिंसा की कवरेज हो, 2020 के दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग या फिर हिंदू-घृणा वाले पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर जैसे लोगों को नरम छवि में दिखाना। इन सभी मामलों में उस पर सवाल उठे हैं।इसके अलावा ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भारत के तेल भंडार को लेकर डर फैलाने वाली खबरें हो या 2024 में बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी नरसंहार को छिपाने का प्रयास करने जैसे उदाहरण हों।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)