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मदरसे में पढ़ने गई थी 8 साल की बच्ची, मौलवी ने किया बलात्कार: कोर्ट ने सुनाई 23 साल की सजा

उत्तर प्रदेश के नोएडा में पिछले साल 8 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म मामले में एक स्थानीय अदालत ने मौलवी को दोषी करार देते हुए 23 साल की सजा सुनाई है। साथ ही मौलवी पर ₹2.10 लाख का जुर्माना भी लगाया है।

सबा करीम नाम का यह मौलवी बिहार के किशनगंज इलाके का रहने वाला है। साल 2018 में नोएडा सेक्टर-49 में स्थित पुलिस थाने में पीड़िता के परिजनों ने मौलवी के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी। जिसके आधार पर पूरे मामले की सुनवाई हुई।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर की फोटो

खबरों के मुताबिक बच्ची पिछले साल की 13 जनवरी को सेक्टर-49 कोतवाली के बरौला स्थित मदरसे में पढ़ने गई थी। जहाँ मौलवी ने उसके साथ दुष्कर्म किया। घटना मालूम चलने पर बच्ची के परिजनों ने मामले में कानून का सहारा लिया और उनकी शिकायत के आधार पर दोषी मौलवी को गिरफ्तार किया गया।

जब कोर्ट में मामले की सुनवाई हुई तो बच्ची ने तुरंत मौलवी को पहचान लिया और पूरी घटना के बारे में बताया। बच्ची के मेडिकल टेस्ट में भी बलात्कार की पुष्टि हो चुकी है।

न्यायाधीश ने गवाहों और सबूत के आधार पर सबा करीम को बलात्कार के लिए 10 साल और POCSO एक्ट के तहत 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उसे 2 लाख रुपए जुर्माना देने का आदेश भी दिया गया। इसके अलावा छेड़खानी के आरोप में भी मौलवी को 3 साल की सजा भी मुकर्रर की गई है। छेड़खानी के लिए उस पर 1000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। बता दें कि दोषी पर ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी और जेल में बिताए उसके वक्त को सजा में शामिल किया जाएगा।

जनता के लिए अलग और MLA के लिए अलग कानून! क्या सरकार भेजेगी अपने विधायक को जेल?

भीड़ और उसके द्वारा की जाने वाली हिंसा की बातें तो हो रहीं हैं, मगर पूरे तौर पर नहीं हो रहीं। भीड़ ने असंवैधानिक कृत्य किए हों, कानून अपने हाथों में ले लिया हो, ऐसा भारत में पहली बार तो नहीं हुआ। हाल के समय में ऐसा तो कई बार आंदोलनों के नाम पर हो चुका है। ये राजस्थान के गुर्जर आंदोलनों के समय भी हुआ था, जब कथित रूप से आन्दोलनकारियों ने रेल की पटरियाँ उखाड़ दी थीं। इसी वर्ष फ़रवरी में गुर्जर नेता करोड़ी सिंह बैंसला अपने बेटे के साथ “राष्ट्रहित” में भाजपा में शामिल हो गए हैं। उस समय भी उन्होंने आठ दिन से राजस्थान में चल रहे आन्दोलन को रोकने की बात की और अपने समर्थकों से अवरोधों को हटा लेने कहा।

बिलकुल ऐसा ही तब भी हुआ था जब हरियाणा में जाट आन्दोलन कुछ दिन चला। फ़रवरी 2016 में हुए इस आन्दोलन में तो कथित रूप से 12 लोगों को मार डाला गया था और कथित “आन्दोलन” के दौरान दंगाइयों ने करोड़ों की संपत्ति भी लूट ली थी। इस आन्दोलन को रोकने के लिए पुलिस के अलावा सेना भी बुलानी पड़ी थी। फ़रवरी 2016 में ही ये आन्दोलन राजस्थान के भरतपुर जैसे इलाकों तक भी पहुँच चुका था और तब की मुख्यमंत्री सिंधिया ने आन्दोलनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील शुरू कर दी थी। कई जाट नेताओं ने इस दौरान शांति बनाए रखने की अपील की, जिससे किसी के कान पर जूँ भी नहीं रेंगी। अंततः जब जाटों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण की माँग राज्य सरकार द्वारा मान ली गई तब जाकर कहीं आन्दोलन थमा।

ऐसा ही एक आन्दोलन “पद्मावत” फिल्म को लेकर भी शुरू हो गया था। हिंसा के स्तर पर देखें तो इसमें कोई लूट या हत्या जैसी घटनाएँ नहीं हुई थीं। एक अंतर ये भी था कि दूसरे आंदोलनों को हिंसक बताने से परहेज रखती पेड परंपरागत मीडिया ने इस बार आन्दोलनकारियों के लिए खुलकर “राजपूत गुंडे” जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया। बाकी आंदोलनों में होती हिंसा पर ऐसा क्यों नहीं हुआ, और इस आन्दोलन में “गुंडे” शब्द कैसे इस्तेमाल हुआ, ये अलग चर्चा का विषय हो सकता है। इस आन्दोलन में नतीजे के तौर पर फिल्म प्रतिबंधित नहीं हुई, नेतागण या राजनैतिक दल भी समर्थन में नहीं उतरे थे। इसके वाबजूद फिल्म में कई दृश्यों में फेरबदल करना पड़ा था।

ऐसे आंदोलनों की कड़ी को और आगे बढ़ाएँ तो अफवाहों पर आधारित एक और भी हिंसक आन्दोलन हुआ था। इस आन्दोलन में ऐसा मान लिया गया था कि असंवैधानिक एट्रोसिटीज एक्ट को सरकार हटाने जा रही है। सच्चाई ये थी कि एक असंवैधानिक काले कानून पर सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठा दिया था। मामला बस इतना था कि इस एक्ट में जाँच से पहले गिरफ़्तारी होनी चाहिए या नहीं, इस पर विचार करने कहा गया था। इस हिंसक आन्दोलन में भी मौतें हुईं। हाँ एट्रोसिटीज एक्ट के डर से पेड परंपरागत मीडिया इस बार किसी को “गुंडा” घोषित करने का साहस नहीं जुटा पाई। जैसा कि पहले भी होता था, वैसे ही एट्रोसिटीज एक्ट में बिना जाँच गिरफ़्तारी और जेल की असंवैधानिक परम्परा कायम रही।

एक “पद्मावत” फिल्म पर हुए विरोध को छोड़ दें तो बाकी सभी में भाजपा सरकारों का झुकना, या कहिए कि माँगें मान लेना साफ़ नजर आता है। गुर्जर आन्दोलन के करोड़ी सिंह बैंसला अब भाजपा में हैं। जाट आन्दोलन में भी माँगें मानी गईं। एट्रोसिटीज एक्ट पर भाजपा नेताओं ने ही जोर शोर से समर्थन दिया था और बिना जाँच गिरफ़्तारी को कायम रखा था। लेकिन, किन्तु, परन्तु, अब भाजपा की नैतिकता नजर नहीं आ रही। जब मामला भाजपा के ही एक विधायक पर बन रहा है तो एट्रोसिटीज एक्ट के तहत बिना जाँच गिरफ़्तारी के प्रावधान कहीं खो गए हैं। उनकी बेटी-दामाद द्वारा उन पर लगाए गए आरोपों में उनकी एट्रोसिटीज एक्ट में फ़ौरन गिरफ़्तारी होनी चाहिए।

बाकी बड़ा सवाल यह है कि कानून के शासन और नैतिकता, मूल्यों, आदर्शों की बातें करने वाली योगी सरकार क्या जनता के लिए अलग और अपने विधायक के लिए अलग मापदंड अपनाएगी? नेताजी के लिए “भीड़” का समर्थन आएगा, इस डर से नेताजी को छोड़ा भी जा सकता है! या फिर नेताजी भी वैसे ही जेल जाएँगे जैसे इस मामले में कोई साधारण व्यक्ति गया होता?

फुटपाथ पर सोता हूँ, मोबाइल भी किसी ने चुरा लिया: ओडिशा BJP MLA ने सुनाई अपनी व्यथा

अक्सर ऐसा देखा गया है कि नेता जी जैसे ही विधायक बनते हैं पॉश इलाके वाले बंगले में रहना शुरू कर देते हैं। लेकिन ओडिशा में एक ऐसा मामला देखने को आया है जहाँ भारतीय जनता पार्टी के तीन बार विधायक रह चुके मोहन चरण माँझी फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं। क्योंकि नवीन पटनायक सरकार ने उन्हें न तो कोई बंगला आवंटित किया है और न ही कोई सरकारी गेस्ट हाउस दिया है।

ओडिशा विधानसभा में बीजेपी के चीफ व्हिप मोहन चरण माँझी ने शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष के सामने उठाया। माँझी तीन बार से कियोनझार के विधायक हैं, लेकिन उन्हें अभी तक ओडिशा सरकार की तरफ से भुवनेश्वर में घर आवंटित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि विधायक की शपथ लेने के एक महीने के बाद भी उन्हें घर नहीं मिला है। माँझी की समस्या सुनने के बाद विधानसभा अध्यक्ष एसएन पात्रो ने कहा कि उनकी सारी परेशानियाँ दूर की जाएँगी और उन्होंने इस बारे में बात करने के लिए अपने कक्ष में बुलाया।

माँझी ने बताया कि दो दिन पहले फुटपाथ पर सोने के दौरान उनका फोन चोरी हो गया, उनके निजी सचिव पर भी कुछ लोगों ने हमला किया। उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्होंने गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव को भी बताया और कहा कि उन्हें कमरा आवंटित कर दें, लेकिन उन्होंने भी उनकी एक नहीं सुनी। माँझी ने गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव के बारे में बताते हुए कहा, “जब मैं उस अधिकारी से मिलने गया तो उसने ध्‍यान ही नहीं दिया, बैठने के लिए कुर्सी बढ़ाने की बात तो भूल ही जाइए। उन्होंने ये तक इशारा किया कि मैं उनके ऑफिस से निकल जाऊँ।”

बता दें कि, ओडिशा में बीजू जनता दल की सरकार है और बीजेपी यहाँ पर मुख्य विपक्षी दल है। राज्य में लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव हुए थे। जिसके बाद राज्य में बीजेडी ने नवीन पटनायक की अगुवाई में सरकार बनाई।

पति शाहिद नहीं देता था पैसे, परेशान रुखसार ने दूध के लिए रोते 8 महीने के बेटे का घोंटा गला!

उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के छिबरामऊ कस्बे से एक ऐसा वारदात सामने आया है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह काँप जाएगी। खबर के मुताबिक, अपनी औलाद की सलामती के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाने वाली माँ ने अपने ही 8 महीने के बेटे की हत्या कर दी। कारण- क्योंकि वो भूखा था, वो दूध के लिए रो रहा था। 8 महीने का बच्चा अहद तीन दिन से भूखा था और दूध के लिए तेज आवाज में रो रहा था। आर्थिक तंगी से जूझ रही माँ रुखसार को जब भूख से तड़पते अपने बेटे की चीखें बर्दाश्त नहीं हुईं, तो उसने बच्चे की गला दबाकर उसकी चीख को हमेशा के लिए शांत कर दिया।

आरोपित माँ रुखसार का कहना है कि वो अपने बेटे अहद के लिए दूध का इंतजाम नहीं कर पा रही थी। अहद रात से ही दूध के लिए तेज आवाज में रो रहा था। रुखसार का कहना है कि वो उसे रात भर पानी पिलाने की कोशिश करती रही, मगर फिर भी अहद रोए जा रहा था। अहद का इस तरह से रोना रुखसार से बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने गला दबा कर उसे हमेशा के लिए सुला दिया।

नवभारत टाइम्स के गाजियाबाद संस्करण में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

रुखसार की 4 साल की बेटी अनम ने पुलिस को बताया कि उसकी माँ (रुखसार) सुबह काफी गुस्से में थी और उसने गला दबाकर अहद की हत्या कर दी। फिलहाल पुलिस ने रुखसार को हिरासत में ले लिया है। रुखसार का पति शाहिद मुंबई में नौकरी करता है। बीवी से किसी बात को झगड़े के कारण शाहिद 4-5 महीने से घर पर रुपए-पैसे नहीं भेज रहा था। बड़ी मुश्किल से रुखसार अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही थी। इसी दौरान कुछ समय पहले 8 महीने के अहद को खून संबंधित कोई बीमारी हुई। जैसे-तैसे 90 हजार रुपए जुटाकर रुखसार ने आगरा में उसका इलाज करवाया। गुरुवार की शाम को जब फिर से अहद को तेज बुखार आया तो डॉक्टर ने बिना पैसे के दवा देने से इनकार कर दिया। अफसोस! रात भर बच्चे के बुखार और भूख से रोने की तड़प को रुखसार ने शुक्रवार की सुबह उसे सदा के लिए सुला कर शांत कर दी।

शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को अपने बेटे की हत्या कर रुखसार उसके शव के पास ही बैठी रही और किसी को भी शव के पास नहीं आने दिया। हालाँकि, अनम से मिली जानकारी के बाद परिजन और आस-पड़ोस के लोग वहाँ पहुँचे। इससे रुखसार को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया। उसका कहना था कि जब बच्चे भूखे थे, तो कोई नहीं आया और अब भीड़ जमा हो गई है।

हालाँकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का कहना है कि अहद को सुबह ही दूध पिलाया गया था। इस रिपोर्ट में उसके पेट में दूध होने की बात कही गई है। डॉक्टरों ने भी अहद के तीन दिन से भूखे होने की बात को नकार दिया है। उनका कहना है कि बच्चे की आँत भी बिल्कुल सही है। डॉक्टर और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट शायद सरकारी लीपापोती भी हो सकती है। फिलहाल पुलिस जाँच में जुटी है और जाँच के बाद ही खुलासा हो पाएगा कि आखिर क्यों एक माँ ने अपने कलेजे के टुकड़े आठ महीने के बेटे अहद को मौत की नींद सुला दिया!

‘जय श्री राम’ नहीं, क्रिकेट की वजह से हुई बच्चों में लड़ाई: इमाम अहमद मिस्बाही ने फैलाया झूठ

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में क्रिकेट मैच को लेकर मदरसा दारुल उलूम फैज ए आम के छात्रों और कुछ स्थानीय युवकों के बीच आपसी झड़प हुई और बात मारपीट तक पहुँच गई। इस मारपीट के बाद छात्र मदरसा पहुँचे और उन्होंने शहर काजी निसार अहमद मिस्बाही को मामले की जानकारी दी। इसके बाद निसार अहमद मिस्बाही ने आरोप लगाते हुए कहा कि मदरसे के बच्चों से जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाए जा रहे थे और इसका विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई है। निसार अहमद ने इस मारपीट को मॉब लिंचिंग से जोड़ने की कोशिश भी की।

मीडिया द्वारा भी इस खबर को यह कहते हुए प्रकाशित किया गया कि बच्चों से ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाए गए। द क्विंट ने इस घटना पर लिखा है- “उत्तर प्रदेश के उन्नाव में मदरसे के बच्चों को ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया। जब बच्चों ने नारे लगाने से इनकार किया तो उनके साथ मारपीट की गई, उनके कपड़े फाड़ दिए गए और साइकिलें तोड़ दी गईं।”

साथ ही, उन्नाव में जामा मस्जिद के इमाम का आरोप लगाया था कि इस घटना में हिंदूवादी संगठन बजरंग दल के लोग शामिल थे।

हालाँकि पुलिस द्वारा इस मामले की जाँच के बाद स्पष्ट हुआ है कि मजहबी नारे लगवाने के लिए मजबूर करने वाली बात एकदम मनगढंत और झूठी थी।

ADG (कानून-व्यस्था) उन्नाव ने क्रिकेट खेलने को लेकर दो पक्षों में हुई मारपीट की घटना को लेकर बताया कि इस मामले की जाँच में पता चला है कि मदरसे के बच्चों से धार्मिक नारे नहीं लगवाए गए थे। ऐसे झूठे आरोप लगाकर मेरठ और आगरा में भी शांति भंग करने का प्रयास किया गया, लेकिन जिला और पुलिस प्रशासन के चलते यह नाकाम हो गया।

पुलिस का कहना है कि प्रदेश में कहीं भी अफवाह और शांति भंग करने का प्रयास किया जाएगा तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस घटना को लेकर लोकभवन में ADG LO, IG LO और प्रमुख सचिव सूचना की प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि उन्नाव में क्रिकेट खेलने के चलते विवाद हुआ और क्रिकेट की वजह से ही बच्चों में झगड़ा हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों से कोई भी धार्मिक/मजहबी नारे नहीं लगवाए गए। अधिकारियों ने बताया कि उन्नाव, मेरठ और आगरा में असामाजिक तत्वों को गिरफ्तार किया गया है और बिना भेदभाव के लोगों पर कार्रवाई की गई है।

इमाम ने दिया घटना को सांप्रदायिक रंग

उन्नाव के जामा मस्जिद के इमाम निसार अहमद मिस्बाही ने इस घटना को लेकर मनगढंत आरोप लगाते हुए इसे सांप्रदायिक रंग देते हुए भड़काऊ बयान दिया था। इमाम ने कहा, “…आम तौर पर खेलने कहीं न कहीं जाते हैं। गुरुवार 2 बजे नमाज पढ़के हमारे 10-12 बच्चे छोटे-छोटे किसी की 12 साल, 13 साल, 14 साल उम्र है, जीआईसी ग्राउंड रेलवे के पास क्रिकेट खेल रहे थे। चार लड़के आए बड़े-बड़े और… एक्शन क्या है हमारा, अभी तो कोतवाल साहब हमारे आ गए हैं, चौकी इंचार्ज हैं आपके सामने, जो कानूनी प्रक्रिया है, वो की जा रही है, FIR की जा रही है। लेकिन चूँकि प्रशासन को हमने नाम और चेहरे सब सौंप दिए हैं, तीन आदमी की शिनाख्त कर दी है चार में से। कल हमारा जुमा है, अगर जुमा तक गिरफ्तारी नहीं हुई तो फिर हम बहुत… जो एक्शन कहीं भी नहीं हुआ होगा, वो होगा। चूँकि उन्नाव में अमन-शांति बनाने के लिए पूरी कोशिश की गई, और हमारे जिले में प्रशासन ने और हमारे यहाँ की पब्लिक ने ऐसा नहीं होने दिया। इसीलिए चार आदमी ने खराब किया है, अब प्रशासन की जिम्मेदारी है कि ये माहौल न बिगड़ने दे वरना जुमा है, कुछ भी हो सकता है।”

परिवार न होना, सत्ता का लालच न होने की गारंटी नहीं, यकीन न हो तो पढ़े मलिक काफूर की कहानी

अगर आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्ता सुख छोड़ने का लोभ न हो, तो मनुष्य जनहित की सोचेगा और दूसरे कई शासकों की तरह सत्ता-संपत्ति को अपने ही परिवार की बपौती बनाए रखने पर ध्यान नहीं देगा, ऐसा लोग सोचते/मानते हैं। संभवतः इतिहास उलटकर न देखने का ऐसा नतीजा हुआ होगा। इतिहास के हिसाब से देखें तो ऐसा होना जरूरी नहीं है। उदाहरण के तौर पर हम मलिक काफूर को देख सकते हैं।

खम्भात पर हुए 1299 के आक्रमण में अलाउद्दीन खिलजी के एक सिपहसालार ने उसे पकड़ा था। कुछ उस काल के लिखने वाले बताते हैं कि उससे इस्लाम कबूल करवाकर खिलजी को सौंपा गया था। कुछ दूसरे इतिहासकार मानते हैं कि उसे 1000 दीनार की कीमत पर खरीदा गया था, इसीलिए काफूर का एक नाम ‘हजार दिनारी’ भी था। जो भी हो, 1306 आते-आते मलिक काफूर फौज़ी मामलों में अच्छा दखल रखने लगा था।

1309-11 के बीच उसने दक्षिण की ओर कदम बढ़ाए। काकतीय, होयसल और पांड्या जैसे राज्यों पर विजय पाने के बाद उसका दबदबा दरबार में भी काफी बढ़ चुका था। सलीम किदवई जैसे इतिहासकार मानते हैं कि मलिक काफूर और अलाउद्दीन खिलजी में समलैंगिक सम्बन्ध थे। अपने अंतिम दिनों में खिलजी सब कुछ भुला कर काफूर के चक्कर में पड़ा था।

खिलजी के बेटों- खिज्र खान और शादी खान की शादियाँ जिस मनसबदार अलप खान की बेटियों से हुई थी, उससे काफूर की अदावत भी रही। खिलजी की मौत के वक्त जब सत्ता की जंग शुरू हुई तो काफूर ने खबर उड़ाई कि खिज्र खान, उसकी बीवी और उसके ससुर अलप खान ने मिलकर खिलजी को जहर देने की साजिश रची थी। इस अफवाह की वजह से उसे अलप खान का क़त्ल करने का मौका मिल गया।

खिलजी के दो बेटों- ख़िज्र खान और शादी खान को काफूर ने अँधा करवा कर कैद कर दिया। काफूर कुल 30 दिन के आस-पास ही सुल्तान रहा था, वो भी सीधी तरह सुल्तान नहीं! उसने खिलजी के ही बेटे (छह साल के) शिहाबुद्दीन को शासक बनाया और उसकी माँ, यानी खिलजी की विधवा से निकाह रचा लिया। उसके खिलाफ दरबार में ही साजिशें शुरू हो गई थीं।

अलाउद्दीन खिलजी के पूर्व अंगरक्षक मुबश्शिर, बशीर, सालेह और मुनीर, मिलकर काफूर की हत्या की योजना बना रहे थे। शक की वजह से एक रात काफूर ने मुबश्शिर को अपने कमरे में बुलवाया। किस्मत से मुबश्शिर और उसके साथियों के पास बादशाह का अंगरक्षक होने की वजह से काफी पहले से ही हर जगह हथियार ले जाने की इजाजत थी। फ़रवरी, 1316 में किसी रोज जब काफूर ने उसका क़त्ल करने की कोशिश की, तो उल्टा वही मुबश्शिर के हाथों मारा गया।

उसका समलैंगिक और नपुंसक होना उसके खिलाफ जाता था लेकिन फिर भी उसके टूटे-फूटे मकबरे को फ़िरोज़ शाह तुगलक ने ठीक करवाया था। आज उसके मकबरे का भी कहीं पता नहीं चलता। बाकी अगर ऐसा लगता हो कि परिवार, बीवी बच्चों का न होना, लोगों को सत्ता के लालच से दूर रखेगा, तो इतिहास ऐसा नहीं सिखाता। हाँ आपको मानना हो, तो जरूर मान लीजिए।

केरल: कॉलेज में छात्र को चाकू घोंपा, SFI के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम स्थित यूनिवर्सिटी कॉलेज परिसर में शुक्रवार की सुबह तृतीय वर्ष के एक छात्र को चाकू मार दिया गया। छात्र की हालत स्थिर बताई जा रही। इस घटना के पीछे वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई के कार्यकर्ता का हाथ बताया जा रहा है। घटना से गुस्साए छात्रों ने परिसर के गेट पर
एसएफआई के खिलाफ प्रदर्शन किया और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।

पीटीआई के मुताबिक पीड़ित छात्र की पहचान अखिल के रूप में की गई है। वह राजनीति विज्ञान का छात्र है। पुलिस ने बताया कि छात्र को घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उसके सीने में गंभीर चोट आई है।

ख़बर के अनुसार, कुछ दिन पहले, अखिल और उसके दोस्तों ने कॉलेज कैंटीन में गाना गाया था। इस पर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के कार्यकर्ताओं ने आपत्ति दर्ज कराते हुए उसे ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी। दोनों गुटों के बीच बहस के बाद सुलह के लिए शुक्रवार का दिन निर्धारित किया गया था। आरोप लगाया जा रहा है कि जब छात्र संघ के कार्यालय में वार्ता चल रही थी, उसी बीच अखिल पर अचानक चाकू से हमला किया गया।

घटना से नाराज छात्र कॉलेज गेट के बाहर धरने पर बैठ गए। हालात को काबू में रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। छात्रों ने SFI नेतृत्व पर वसूली करने और अपने विरोध-प्रदर्शनों व आंदोलनों में भाग लेने के लिए मजबूर करने का भी आरोप लगाया है।

SFI माक्सर्वादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का छात्र संगठन है। एसएफआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीपी सानू ने कहा है कि यूनिवर्सिटी कॉलेज में SFI छात्र संगठन को भंग कर सुधार के लिए जरूरी कदम उठाए जाएँगे।

AIB की बकचो# वापसी: बच्ची को गाँजा पिला कर चलाना चाहता है कॉमेडी की दुकान

महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार के कारण चर्चा में आई एक संस्था AIB (ऑल इंडिया बकचोद) एक बार फिर दर्शकों के बीच वापसी कर चुकी है। ख़ास बात यह है कि AIB की वापसी के बाद उनकी कार्यप्रणाली और मानसिकता में कोई ख़ास बदलाव नजर नहीं आ रहा है। गत वर्ष मनोरंजन के नाम पर भद्दी गालियाँ, फूहड़ता और निम्नस्तरीय कंटेंट परोसने के बाद ऑल इंडिया बकचोद (AIB) में कार्यरत कई लोग #MeToo कैम्पेन में नाम उजागर होने के बाद से संस्था से हटा दिए गए थे और इसके बारे में AIB की ओर से आधिकारिक घोषणा की गई थी।

हाल ही में AIB ‘नए’ लोगों के साथ सोशल मीडिया पर वापसी करती नजर आई है। AIB ने एक ऐसा वीडियो शेयर किया है, जिसमें स्कूल के बच्चों को स्टेज परफॉर्मेंस के दौरान गाँजा (नशा) इस्तेमाल करते हुए दिखाया गया है। AIB ने यह वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया, जिसकी लोगों द्वारा काफी आलोचना की गई।

दरअसल, जिस वीडियो को AIB ने शेयर किया, वह कुछ कुछ होता है फिल्म के एक दृश्य के साथ एडिटिंग करने के बाद ‘कॉमेडी’ के नाम पर शेयर की गई।

ट्विटर यूजर @D_silent_poet ने यह वीडियो शेयर करते हुए लिखा है कि AIB ने एक बेहद घटिया वीडियो के जरिए वापसी करने का प्रयास किया है। अन्य ट्विटर यूज़र्स ने भी इस वीडियो पर आपत्ति दर्ज की है। फिल्म के इस दृश्य में एक बच्ची स्कूल के एक प्रोग्राम में प्रस्तुति दे रही होती है, जिसमें उसके पिता भी ऑडियंस में मौजूद रहते हैं।

स्पष्ट है कि स्कूल जाने वाली एक बच्ची को नशा (वो भी गांजा) करते हुए दिखाकर AIB ना ही हास्य करने में सफल रहा और ना ही ये साबित कर पाने में कि उनकी वापसी पहले से कुछ ज्यादा बेहतर करने के उद्देश्य से हुई है। अपनी भूल को लगातार मनमर्जी और जानबूझकर करना यही साबित करता है कि यह कुछ ऐसे लोगों का समूह है, जिनके पास रचनात्मकता के नाम पर ना ही पहले कुछ विशेष था और ना ही अब। आज के इस एडिटेड वीडियो से AIB ने जता दिया है कि उनसे नैतिक मूल्यों की उम्मीद करना आज भी अतार्किक ही है।

यौन उत्पीड़न के आरोपों के कारण AIB के संस्थापक और सह संस्थापक इसे अनिश्चित काल तक बंद करने की घोषणा कर चुके थे। इससे पहले AIB के सह संस्थापक तन्मय भट पर भी यौन उत्पीड़न के आरोप लग चुके हैं। तन्मय भट का इतिहास भी हास्य और कॉमेडी के नाम पर कुछ साफ़-सुथरा नहीं है।

हालाँकि, तन्मय भट अब AIB का CEO नहीं है फिर भी AIB द्वारा एडिट किए गए इस वीडियो से जाहिर है कि इस संस्था की कॉमेडी की परिभाषा आज भी वही है, जिसके कारण इनका पतन हुआ था। सोशल मीडिया पर विरोध के बाद AIB ने यह वीडियो फेसबुक से हटा दिया है।

टिकट कैंसिलेशन से रेलवे ने कमाए ₹1,536 करोड़ से ज़्यादा: RTI से ख़ुलासा

क्या आप जानते हैं कि टिकट कैंसिलेशन से इंडियन रेलवे हर साल सैकड़ों करोड़ रुपए कमाता है? वित्त वर्ष 2018-19 में टिकट कैंसल किए जाने के बदले यात्रियों से वसूले गए प्रभार से रेलवे के खजाने में लगभग 1,536.85 करोड़ रुपए जमा हुए। यह खुलासा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत हासिल जवाब से हुआ है।

ख़बर के अनुसार, मध्य प्रदेश के नीमच निवासी RTI कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने शुक्रवार (12 जुलाई) को बताया कि उन्हें रेल मंत्रालय के रेलवे सूचना प्रणाली केंद्र (CRIS) से अलग-अलग अर्जियों पर यह जानकारी मिली है। RTI आवेदन में पूछे गए सवालों के जवाब के अनुसार, रेलवे ने रिज़र्व टिकटों के कैंसिलेशन से 1,518.62 करोड़ रुपए कमाए हैं।

वहीं, अनारक्षित टिकटिंग प्रणाली (UTS) के तहत बुक यात्री टिकटों को रद्द कराए जाने से रेलवे ने 18.23 करोड़ रुपए का राजस्व अर्जित किया।

इसके अलावा RTI कार्यकर्ता गौड़ ने अपने आवेदन में यह भी पूछा था कि क्या टिकट कैंसल करने के बदले यात्रियों से वसूले जाने वाले शुल्क को घटाने के किसी प्रस्ताव पर विचार-विमर्श किया जा रहा है? उन्होंने बताया, “इस सवाल के जवाब का मुझे अब तक इंतज़ार है। रेल टिकट रद्द करने के बदले यात्रियों से वसूले जाने वाले शुल्क को व्यापक जनहित में जल्द घटाया जाना चाहिए।”

पहलू ख़ान के बेटों के ख़िलाफ़ गाय तस्करी का केस फिर से, कोर्ट से मिली अनुमति

राजस्थान में अलवर की एक अदालत ने ग़ैर-क़ानूनी तरीके से गोवंश की ढुलाई के आरोपित पहलू ख़ान के दो बेटों और एक ट्रक ऑपरेटर के ख़िलाफ़ आगे जाँच करने की अनुमति दे दी है। सहायक लोक अभियोजक प्रदीप अग्रवाल ने बताया कि बहरोड के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, एसीजेएम ने इस सिलसिले में दायर प्रार्थना-पत्र को स्वीकार कर लिया है।

अलवर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने कहा, “अदालत ने गौ तस्करी मामले में आगे की जाँच के लिए पुलिस द्वारा दी दलील स्वीकार कर ली है।” इसके आगे उन्होंने बताया, “पहलू ख़ान के बेटे इरशाद ने डीजीपी राजस्थान को एक आवेदन सौंपा था, जो मामले में निष्पक्ष जाँच की माँग कर रहा था। इसके बाद पुलिस ने जाँच के लिए एक आवेदन अदालत में जमा किया और आज अदालत ने इसकी मंज़ूरी दे दी है।”

आपको बता दें कि 1 अप्रैल 2017 को नूंह (हरियाणा) के रहने वाले पहलू ख़ान को अवैध मवेशी तस्करी के शक में दिल्ली-अलवर राजमार्ग पर कथित रूप से पीट-पीटकर मार डाला गया था। ख़ान की मौत के तुरंत बाद राजस्थान पुलिस द्वारा हत्या का मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने पशु तस्करी मामले की जाँच भी शुरू की थी।

अशोक गहलोत ने बोला झूठ: चार्जशीट में गो-तस्कर पहलू खान का नाम नहीं

हाल ही में, राजस्थान पुलिस ने पहलू ख़ान के बेटों के ख़िलाफ़ राजस्थान बोवाइन एनिमल्स (वध पर प्रतिबंध और अस्थायी प्रवासन या निर्यात पर प्रतिबंध), अधिनियम, 1995 के अंतर्गत सेक्शन 5, 7 और 9 के तहत चार्जशीट दायर की थी। राजस्थान पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल करने पर सीएम गहलोत ने झूठ बोला था और कहा था कि चार्जशीट में पहलू ख़ान का नाम नहीं था।