रिलायंस ग्रुप ने कॉन्ग्रेस पर पलटवार करते हुए करारा जवाब दिया है। अभी हाल ही में राहुल गाँधी ने अनिल अम्बानी को क्रोनी कैपिटलिस्ट करार दिया था। रिलायंस ग्रुप ने जवाब देते हुए कहा कि यूपीए सरकार के दौरान भी उन्हें 1 लाख करोड़ रुपए के कॉन्ट्रैक्ट्स मिले थे। रिलायंस समूह ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हुए एक मिथ्या आरोपों का अभियान चला रहे हैं। रिलायंस ग्रुप ने राहुल गाँधी के दावों पर जवाब देते हुए आगे कहा:
“कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने जो दावे किए हैं, उनका न तो उन्होंने कोई आधार बताया है और न ही इन बयानों को जायज ठकराने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत पेश किया है। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दस वर्षों के कार्यकाल में 2004 से 2014 के दौरान अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप को बिजली, दूरसंचार, सड़क, मेट्रो सहित ढाँचागत क्षेत्र की एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं का ठेका मिला था।“
@reliancegroup would like to remind @RahulGandhi that during UPA regime, from 2004-14, govt handed Mr Ambani and Reliance Group over Rs 1 lakh crore of projects towards nation building in power, telecom, road, metro, etc. 4/5
रिलायंस ग्रुप ने राहुल गाँधी को गैर-ज़िम्मेदार करार दिया। राहुल गाँधी द्वारा अनिल अम्बानी को बेईमान कहे जाने को भी रिलायंस ग्रुप ने असत्य करार दिया। समूह ने पूछा की अगर अनिल अम्बानी के लिए राहुल ने जो बातें कहीं हैं वो सच हैं, तो फिर उनकी सरकार ने 10 वर्षों तक एक क्रोनी कैपिटलिस्ट और एक बेइमान व्यवसायी की मदद क्यों की? राहुल ने अम्बानी को राजनीतिक साँठ-गाँठ से काम करने वाला पूंजीपति बताया था। समूह ने कहा कि हमारे चेयरमैन पर उनके द्वारा लगाए गए सारे आरोप झूठे हैं।
राहुल गांधी जी गला फाड़ कर मोदी सरकार पर 30000 करोड़ की रकम अनिल अम्बानी जी की जेब में डालने का आरोप लगा रहे है। इसका खंडन करते हुए रिलायंस के अनिल अंबानी ग्रुप ने ट्वीट करके कहा है कि 2004 से 2014 के बीच ग्रुप की जेब में एक लाख करोड़ से ज्यादा राहुल जी की सरकार ने डाले थे।
रिलायंस ने राहुल गाँधी से स्पष्ट करने को कहा कि आख़िर उनकी सरकार ने एक दशक तक रिलायंस और अम्बानी को इतने कॉन्ट्रैक्ट्स दिए ही क्यों? बता दें कि पीएम मोदी पर हमला करते वक्त राहुल गाँधी अक्सर अनिल अम्बानी का नाम लेते हैं और कहते हैं कि मोदी ने अम्बानी की जेब में हजारों करोड़ डाल दिया। हालाँकि, उनका आँकड़ा बदलता रहता है। इसी तरह कपिल सिब्बल अम्बानी की आलोचना भी करते हैं और फिर उनके लिए अदालत में ज़िरह भी करते हैं।
बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को निर्देश दिया है कि वे 11 लड़कियों की कथित रूप से हत्या मामले की जाँच पर 3 जून तक स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की तरफ से बताया गया कि 11 लड़कियाँ गायब हैं, जिनकी हत्या का संदेह है।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 जून को होगी। शुक्रवार (मई 3, 2019) को सीबीआई ने स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर कहा था कि 11 हत्याओं के मामले में मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर समेत अन्य लोगों की भूमिका की जाँच हो रही है। जाँच एजेंसी को शक है कि जो 11 लड़कियाँ गायब हैं, उनकी हत्या कर दी गई है। फिलहाल उन लोगों के खिलाफ चार्जशीट की गई है जो शेल्टर होम में आते जाते थे।
Muzaffarpur shelter home case: Supreme Court asks CBI to complete investigation into the alleged murder of 11 girls, in two weeks time. SC posts the matter for hearing on June 3 and asks CBI to file a status report.
सीबीआई ने सनसनीखेज का खुलासा करते हुए कहा था कि एक आरोपित के कहने पर श्मशान के एक खास स्थान की खुदाई करने पर वहाँ से हड्डियों की पोटली बरामद हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले सभी आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) एक्ट समेत विभिन्न धाराओं में आरोप तय करते हुए मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया था।
गौरतलब है कि, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की रिपोर्ट सामने आने के बाद इस बात का खुलासा हुआ था कि बिहार के मुजफ्फरपुर में गैर सरकारी संस्थान (NGO) द्वारा संचालित एक आश्रय गृह में कई लड़कियों के साथ कथित रुप से बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया। इस शेल्टर होम में रहने वाली 42 लड़कियों में से 34 लड़कियों के साथ यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई थी। मामला सामने आने पर शुरू में इसकी जाँच राज्य पुलिस कर रही थी, लेकिन फिर बाद में इसे सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर समेत 21 आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया था।
मीडिया पोर्टल ‘द क्विंट’ ने नवरात्र के दौरान एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें उपवास के गुण-दोष की व्याख्या की गई थी। हालाँकि, इस वीडियो में चीजों को बायोलॉजिकल ढंग से समझाने की कोशिश की गई थी, लेकिन इसके हेडिंग में कहा गया था कि जानिए उपवास आपके शरीर के लिए आरोग्यवर्धक है या नहीं? ठीक इसी तरह रमज़ान के लिए भी क्विंट ने एक ट्वीट डाला – शब्दों के साथ थोड़ा ‘सेकुलर’ होकर! इसमें साफ़-साफ़ हेडिंग में ही उपवास (यहाँ रोज़ा) के फायदे गिना दिए गए। इतना ही नहीं, इसमें कुछ सस्पेंस की बात नहीं रखी गई और कह दिया गया कि रोज़ा रखने से फलाना-फलाना वैज्ञानिक फ़ायदे होते हैं। सबसे पहले नवरात्रि के दौरान क्विंट द्वारा शेयर की गई वीडियो को देखिए।
इस वीडियो में शुरुआत में तो सभी धर्मों और अन्ना हजारे तक को दिखाया गया है लेकिन क्लिप में उदाहरण के तौर पर सिर्फ और सिर्फ नवरात्रि को ही लिया गया है। अभी रमजान वाले पोस्ट के बाद जब किसी ने इस पर आवाज़ उठाई तो इस वीडियो में दिख रही पत्रकार ने शुरुआत में दिखाए गए चित्र को लेकर डिफेंड करते हुए लिखा कि ये सभी धर्मों के लिए था और उन्होंने नवरात्रि सिर्फ़ उदाहरण के तौर पर लिया। अब ज़रा रमजान के समय डाली गई पोस्ट को देखिए और समझिए कि कैसे नवरात्रि और रमजान के समय डाली गई चीजों से अलग-अलग नैरेटिव बन कर आते हैं। ये सब ‘Headline Framing’ का कमाल है, जो त्यौहार बदलते ही बदल जाता है। और ‘मीडिया समूह’ ऐसा करके ‘मीडिया गिरोह’ में तब्दील हो जाता है।
रमज़ान के दौरान रोज़ा के फ़ायदे बताता ‘The Quint’
कुल मिलाकर बात यह कि नवरात्री के दौरान उपवास के फ़ायदे और नुकसान दोनों दिखाए जाते हैं। हेडलाइन ऐसे बनाए जाते हैं, जिसको पढ़-सुन कर ऐसा लगे कि उपवास करने से न जाने क्या-क्या नुकसान होते हैं। लेकिन जब रमजान के दौरान रोज़ा की बात आती है, तो वही मीडिया गिरोह उसके गुणगान पर उतर आता है। उपवास और रोज़ा भले ही दो धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली एक ही पद्धति हो, लेकिन ‘The Quint’ जैसे मीडिया गिरोह इसे दो अलग-अलग चश्मे से देखते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई द्वारा गठित तीन सदस्यीय जाँच पैनल ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है। जाँच पैनल को सीजेआई रंजन गोगोई के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों का कोई सबूत नहीं मिला। इस पैनल का नेतृत्व जस्टिस एसए बोडबे कर रहे थे। उन्होंने बताया कि पैनल की रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश एवं दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को सबमिट कर दी गई है। चूँकि यह एक अनौपचारिक जाँच थी, इसीलिए इस जाँच की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
#Breaking: In-House committee clears Chief Justice of India Ranjan Gogoi, says no substance in allegations of former Employee. pic.twitter.com/5B6x72XXdy
बता दें कि 20 अप्रैल को कई मीडिया पोर्टल्स द्वारा प्रकाशित की गई रिपोर्ट्स में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन शोषण के आरोप लगाने की बात कही गई थी। उक्त महिला कर्मचारी जस्टिस गोगोई के आवास स्थित दफ्तर में कार्यरत थीं। उस महिला द्वारा 22 जजों को दी गई एफिडेविट के आधार पर ये आरोप लगाए गए थे। उस एफिडेविट में महिला ने यौन शोषण की दो घटनाओं का जिक्र किया था। महिला का आरोप था कि जब उन्होंने यह सब करने से इनकार किया, तब उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।
#Breaking : In-House Committee Finds No Substance In Allegations Against CJI, Report Not Liable To Be Made Publichttps://t.co/L6bUuij6x1
पिछले दिनों थप्पड़ कांड के कारण सुर्खियों में रहने वाले दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक और वीडियो सोमवार (मई 6, 2019) को सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस वीडियो में केजरीवाल जहाँ रोड शो करते नजर आ रहे हैं वहीं कुछ लोग ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते भी सुनाई पड़ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर आप समर्थकों ने इस घटना के पीछे भाजपा के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार बताया है। खबरों के मुताबिक वीडियो दिल्ली के करावल नगर का है। यहाँ सोमवार को केजरीवाल प्रचार के लिए पहुँचे थे।
Hahaha ?? Delhi ka Mawаli CM Arvind Kejriwal greeted with “Modi Modi Modi” Chants as he takes out Road Show surrounded by Police to avoid another #Slарgate ? pic.twitter.com/UOCBuaml1j
शनिवार (मई 4, 2019) को मोतीनगर में थप्पड़ वाली घटना के बाद वीडियो में अरविंद केजरीवाल के चारों ओर कड़ी सुरक्षा देखने को मिल रही है।
बता दें कि जनता के बीच प्रचार के दौरान ‘मोदी-मोदी’ नारे सुनने वाले केजरीवाल पहले नेता नहीं हैं इससे पहले राहुल गाँधी, कन्हैया कुमार और उर्मिला मातोंडकर की भी रैली के दौरान या उनके भाषण के बीच में मोदी समर्थकों ने नारेबाजी की थी।
प्रोपेगेंडा और झूठों के काले जाल को लाल बैकग्राउंड पर यूएसबी की फोटो के साथ ‘द वायर’ ने अपना न सिर्फ लोगो बनाया है, बल्कि उनका ध्येय भी यही है कि प्रपंच अपनी पूर्णता में, इस पोर्टल पर रिस-रिस कर फैलता रहे। आज जिस व्यक्ति के विचारों को इन्होंने जगह दी है, और जिन बातों को तथाकथित संपादन के बाद भी रहने दिया है, वो बताता है कि ‘द वायर’ की प्रतिबद्धता कम से कम इस देश या पत्रकारिता के लिए तो बिलकुल भी नहीं है।
पीडीपी कश्मीर की एक राजनैतिक पार्टी है जिसकी मुखिया महबूबा मुफ़्ती हैं। महबूबा मुफ़्ती ने आतंकियों को माटी के सपूत कहने से लेकर, भारत से कश्मीर को अलग करने, तिरंगा न फहराने जैसे कई प्रलाप किए हैं। उस पार्टी के प्रवक्ता भी उसी रौ में रहते हैं। वहीद-उर-रहमान पारा नामक पीडीपी प्रवक्ता ने ‘द वायर’ से बातचीत की, और ‘द वायर’ ने उनके प्रोपेगेंडा को अपने फर्जीवाड़ों के पोर्टल पर प्रमुखता से जगह दी।
आतंकी के जनाज़े में आई भीड़ की फोटो के साथ ‘द वायर’ का प्रोपेगेंडा
शुरुआत ही इस तरह से हुई है कि ‘द वायर’ और पारा दोनों के लक्ष्य को कोई भी समझदार व्यक्ति आराम से समझ जाएगा। ध्यान रहे कि इन पोर्टलों को सम्पादक बहुत ही सावधानी से, जानबूझकर शब्दों और घटनाओं को चुनते हैं। जब पारा ने लिखा कि उनके गाँव में कोई गाय मरती है तो पूरा गाँव मातम करने आता है, तो फिर लतीफ़ टाइगर (हाल ही में मारा गया आतंकी) तो किसी का बेटा था, उसे तो उन्होंने क्रिकेट खेलते और पढ़ते देखा था। कितना आसान है यह कहना कि हाँ, वो आतंकी था, और हमारी विचारधाराएँ अलग थीं, लेकिन वो क्रिकेट खेलता था।
आप यह समझिए कि कैसे एक आतंकी को नॉर्मल बताने की कोशिश हो रही है। जैसे वो हेडमास्टर का बेटा था, उसका बेटा तो दसवीं में पास कर गया, फ़लाँ आतंकी तो एक अच्छा पिता था, उसकी माँ आजकल रो रही है। ये सारी बातें आपको एक हार्डकोर आतंकी को मानवीय बताने के लिए इस्तेमाल होती है। वही कार्य ‘द वायर’ पर पीडीपी प्रवक्ता कर रहे हैं। जब आपने उसे क्रिकेट खेलते देखा, तो जब उसने बैट की जगह एके-47 उठा ली, तब क्यों नहीं देखा?
गाय की मौत पर इकट्ठा होने वाला संवेदनशील गाँव उस बच्चे को पहली ही बार बहकने पर, इकट्ठा होकर क्यों नहीं समझाने आया कि बेटा, हथियार मत उठाओ? तब आपके गाँव की संवेदना और नैतिकता कहाँ थी! और आप एक गाय को बीच में ले आते हैं? क्या गाय ने किसी पर ग्रेनेड फेंका था, या किसी परिवार का भरण-पोषण करती थी? किस हिसाब से गाय की मृत्यु और आतंकी की मौत एक समान हो जाती है? ये तो पारा जी वही सम्प्रदाय और वामपंथी लम्पटों वाला एंगल घुसा रहे हैं जहाँ गाय किसी आतंकी को समकक्ष सहजता से घुसा दी गई है!
आप यह समझिए कि लिखने वाला कितनी शातिरता से कुछ बातें ऐसे लिखता है जैसे वो बिलकुल सामान्य हो, “दस हजार लोग एक साथ आ जाते हैं जनाज़े में, बिना किसी आमंत्रण के।” किसी आतंकी के जनाज़े में आ जाने से यह साबित नहीं हो जाता कि वो सही कर रहे हैं। आप तो उस ब्रीड के लोग हैं जो आज तक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों को, बहुमत के बावजूद, अपनी सरकार नहीं मानते, फिर ये दस हजार के एक जगह इकट्ठा होने से क्या साबित करना चाह रहे हैं? बड़ी संख्या होने से उस विचारधारा को सही मान लिया जाए?
आतंक-विरोधी ऑपरेशन पर सवाल
घाघ आदमी ने तथ्यों को अपने हिसाब से मरोड़ कर आगे लिखा कि लोगों में भावुकता चरम पर है क्योंकि पहली बार सरकार ने चुनावों के आसपास आतंकरोधी ऑपरेशन में रुचि दिखाई है। यहाँ पर पारा ने तो राजनीतिक कारणों से झूठ लिख दिया लेकिन ‘द वायर’ के सम्पादक सो रहे थे कि उन्होंने यह कन्फर्म करना ज़रूरी नहीं समझा कि लतीफ़ टाइगर, बुरहान वनी गैंग का ग्यारहवाँ सदस्य था, जो कि देर से मरा, पर मार दिया गया।
बुरहान वनी का गैंग जिसके सारे सदस्य नर्क पहुँचाए जा चुके हैं
बुरहान वानी के ग्रुप फोटो के सारे 11 आतंकियों को सेना ने चुनावों के परे मारा है। सेना को चुनावों से क्या मतलब? ये ऑपरेशन तो काफी समय से चल रहा था, और आतंकियों को एक के बाद एक, घेर कर, सूचना के मुताबिक़ मारा जा रहा है। इसमें चुनाव कहाँ से आ गया?
लिखने वाले ने अनभिज्ञता में सिर्फ चुनाव को ही नहीं घसीटा बल्कि अमरनाथ यात्रा के दौरान उन इलाकों में ऑपरेशन पर रोक लगने की बात को ले आए। रोक तो रमज़ान में भी लगी थी। अमरनाथ यात्रा पर फिर भी हमला हुआ था। और आतंकियों को सेना ने घेरना शुरु कर दिया था। रमज़ान में तो इस्लामी आतंक हमेशा बाकी महीनों से ज़्यादा ही डैमेज पहुँचाता है।
पुराने इस्लामी युद्धों को अगर भूल भी जाएँ, जिसमें बद्र, मक्का, गुआदालाते, अल ज़ल्लाक़ा, हात्तिन, ऐन जलुत शामिल हैं, तो भी हाल के सालों में लगभग 15 आतंकी हमले हर दिन की औसत से 2006 से 2015 के बीच हुए हैं। 2016 में 400, 2017 में 300 हमले रमज़ान के दौरान हुए हैं। ये सूचना आपको ग्लोबल टेरर डेटाबेस की वेबसाइट से मिल जाएगी। आप कुछ जानकारी इस लिंक पर भी पा सकते हैं।
चुनावों के दौर में हिंसा, हिंसा के दौर में चुनाव
फिर किस लिहाज से कश्मीर में सेना ऑपरेशन रोक दे? पारा जी लिखते हैं कि लोग डेमोक्रेसी से दूर होते हैं। सही बात तो यह है कि जिस चुनाव के दौरान सेना को आप संवेदना के नाम पर रुकने की बात कह रहे हैं, क्या वही संवेदना आतंकी भी दिखाएँगे? क्या आपका गाँव इस बात को समझा पाएगा कि चुनाव हो जाने दो, फिर अपने हथियार उठाना? वो तो इन मौक़ों पर इकट्ठा होंगे, अपनी मुहिम को मज़बूती प्रदान करेंगे, संसाधन जुटाएँगे और हमला करेंगे। जब सामने वाला पक्ष आँख मूँद कर मरने को निकल पड़ा हो, तो सेना उससे गोली छोड़ कर और कैसे बात कर पाएगी? वैसे आत्मसमर्पण का रास्ता तो हमेशा खुला हुआ ही है।
आगे ‘द वायर’ और वहीद-उर-रहमान का कवि हृदय दुःखी हो जाता है कि कश्मीर लगातार उठते जनाजों में ही उलझ गया है। वो कहते हैं कि इस मातमी माहौल में हम उनसे यह नहीं कह सकते कि वोट दो। भाई मेरे, जब तुम यह भी नहीं समझा सकते कि एके 47 मत उठाओ, तुम यह भी नहीं समझा सकते कि हिंसा का रास्ता मौत की तरफ ले जाता है, और यह भी नहीं समझा सकते कि चुनावों में मतदान करो और अपने मतलब की सरकार चुनो, तो फिर लोकतंत्र की प्रक्रिया पर सवाल क्यों उठा रहे हो? बच्चों को स्कूलों में, मदरसों में, मस्जिद की नमाजों के बाद यह बताओ कि कोई पाँच सौ रुपए देकर पत्थर उठाने कहे तो वो ऐसा न करें, बल्कि प्रेम की बात करें, और हर मानव मात्र को प्यार से देखें जैसे कि वो उनका परिवार हो।
चुनावी प्रक्रिया पर सवाल
पारा जी ने यह सवाल उठाए हैं कि तीन चरणों में चुनाव क्यों हो रहे हैं! बंगाल में सात चरणों में हो रहे हैं, बिहार में भी सात चरणों में हो रहे हैं। कारण सीधा सा है कि संवेदनशील जगह है, यहाँ ज्यादा सुरक्षा चाहिए और अलग-अलग चरणों में चुनाव होने से लोग ज्यादा सुरक्षित रहते हैं। ये तो चुनावी प्रक्रिया को बेहतर और सुचारू रूप से चलाने के लिए है। पारा जी ने सुरक्षा वाली बात को पकड़ कर घुमाया और यहाँ तक कह दिया कि जब सब कुछ ठीक हो जाए, हिंसा का सिलसिला थम जाए, तब ही चुनाव कराना चाहिए। लेकिन वो यह नहीं बता पाए कि ऐसा शुभ दिन कब आएगा कश्मीर में।
आगे शब्दों के चुनाव पर फिर से मुझे आपत्ति है लेकिन वहीद साहब के पास ‘द वायर’ के संपादक हैं, तो वो कह सकते हैं कि ‘They are enforcing democracy!’ आप कहिए वॉव! मतलब पूरी दुनिया डेमोक्रेसी से चल रही है, और पारा जी के लिए चुनावी प्रक्रिया लोकतंत्र जबरदस्ती ठूँसने जैसा है। अगर लोकतंत्र एन्फोर्स न किया जाए, तो क्या इस्लाम की ख़िलाफ़त हो कश्मीर में? क्या हम आतंकियों के हवाले कर दें कश्मीर, कि भाई लो चला लो तुम लोग?
आगे उन्होंने फिर से एक बेकार-सा आरोप मढ़ा है कि अगर कम लोग वोट देंगे तो जनादेश के साथ छेड़-छाड़ करना आसान हो जाएगा। ये मेरी समझ में नहीं आया कि 6,000 लोग ही वोट देने आएँगे तो उनके वोटों के साथ मेनिपुलेशन कैसे होगा। क्या ईवीएम पर शक हो रहा है? या, बिना किसी पुख़्ता तर्क के यह कहा जा रहा है?
आतंकियों के लिए सॉफ़्ट कॉर्नर
तर्क तो खैर इस बात के पीछे भी कुछ नहीं है कि जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध के बाद वहाँ एक ख़ालीपन की स्थिति बनी है जिसे पारा साहब भरना चाहते हैं। आखिर वैसी मजहबी संस्था के लिए ऐसा सॉफ़्ट कॉर्नर क्यों है जो आतंकी गतिविधियों में मदद पहुँचाता हो? अगर वहीद साहब के हिसाब से वहाँ के लोग उनके समर्थन में हैं, तो गलती लोगों की है, न कि सरकार की जिसने उन्हें बैन किया है। यहाँ पर भी जनाज़े की भीड़ वाला तर्क मत लगाइए कि ज्यादा लोग हैं तो वो सही हो जाएगा।
लेख के अंतिम हिस्सों में जो लिखा गया है वो बहुत निंदनीय है। कहा गया कि पुलवामा हमले में बलिदान हुए जवानों को जिस तरह से रिपोर्ट किया गया वो राजनैतिक कारणों से ऑप्टिक्स, यानी दिखावे के लिए इस्तेमाल हुआ। मतलब इतने जवानों को आतंकियों ने एक मिनट में उड़ा दिया और उस पर अगर देश में चर्चा हो रही है तो वो दिखावा है? वहीद ने स्वीकारा कि ‘हाँ, पुलवामा में 50-60 आतंकी सक्रिया हैं, और कई हत्याएँ हुई हैं।’ ये बात इतनी सहजता से लेखक ने लिख दी मानो एक इलाके में इतने आतंकियों का होना सामान्य बात है।
इसकी जगह वो कहते हैं कि पुलवामा को हमें वहाँ के केसर, दूध और सेव के लिए याद करना चाहिए जो कि इसकी पहचान है। बिलकुल पहचान है। पुलवामा भारत का हिस्सा है और हमें गर्व है वहाँ के हर घास के तिनके पर भी, लेकिन आतंकी हमले और वहाँ के आतंकी भी उसकी एक पहचान बनने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें दबाना बहुत आवश्यक है। ऐसा बिलकुल नहीं है कि हम पुलवामा के हर व्यक्ति को आतंकी मानते हैं। बिलकुल नहीं, वो मेरी ही तरह के भारतीय नागरिक हैं, जिन्हें आतंकी कहना सर्वथा अनुचित है। लेकिन हाँ, अगर वो आतंकियों के जनाजों में न जाएँ तो अच्छा ऑप्टिक्स होगा देश के लिए।
अंत में लेखक के भीतर का ‘मजहब’ जग गया और तर्क की तिलांजलि देते हुए वो कह बैठे कि हिन्दू इंडिया के विचार को मुस्लिम कश्मीर में बेचना गलत है। हिन्दू इंडिया क्या, पूरी दुनिया को हिन्दू विचारों से चलना चाहिए फिर न तो क्रूसेड होंगे, न बद्र की लड़ाई, न इस्लामी आतंक और लूट की घटनाएँ, न मतपरिवर्तन के लिए तलवारों और रुपयों का प्रयोग, पूरे जगत में शांति होगी। आप अपना मज़हब न छोड़ें लेकिन सनातन दर्शन के दो-तीन वाक्य भी लोग जीवन में उतार लें, तो सारी समस्या ही निपट जाएगी।
‘मुस्लिम कश्मीर’ क्या होता है? शिव और माँ शारदा की धरती मुस्लिम किस हिसाब से हो गई? इस्लामी आक्रान्ताओं ने वहाँ से हिन्दुओं को खदेड़ दिया तो वो मुस्लिम कश्मीर हो गया? और वहीद-उर-रहमान जैसे पढ़े लिखे लोग इस तरह के वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं, जिसे ‘द वायर’ छाप भी देता है! कश्मीर को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है ‘हिन्दू इंडिया’ के विचारों की। यही वो हीलींग टच है जिससे वहाँ के लोगों का भला हो सकता है। आप बेशक अपना मज़हब रखिए लेकिन सनातन विचारों से चलने से जीवन बेहतर हो जाएगा।
लेखक ने लिखा कि जब आतंकी मरते हैं तो संदेश यह जाता है कि एक मुस्लिम को गैरमुस्लिम ने मार दिया। यह संदेश क्यों जाता है, यह तो पता नहीं लेकिन जनाज़े की भीड़ इस बात पर ज़रूर मुहर लगाती दिखती है कि वो जो कुत्ते की मौत मरा है, उसके अपराध ‘हिन्दू इंडिया’ के ऊपर हुए थे। वो इसी में खुश रहते हैं। ये अजम्पशन मैं बिलकुल उसी आधार पर कर रहा हूँ जिस आधार पर पारा साहब ने कश्मीरी आतंकियों की मौत में आतंकी को सेना द्वारा न्यूट्रलाइज करना न मानकर, समुदाय विशेष वाले की हिन्दू द्वारा हत्या मान लेते हैं।
जबकि सत्य यह है कि अधिकतर बार किसी को पता भी नहीं होता कि आतंकी को मारने वाला जवान किस धर्म या मज़हब का था। मरने वालों में तो कश्मीरी मुस्लिम अफसर और सैनिक भी रहे हैं। मरने वाले बलिदानियों में तो कश्मीर पुलिस के भी अफसर रहे हैं। लेकिन पारा जैसे नेताओं को उससे ज़्यादा मतलब कहाँ रहा। उन्हें तो आतंकी की मौत और एक निरीह गाय की मृत्यु में कोई अंतर ही नहीं दिखता।
पश्चिम बंगाल में पत्रकारों व भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमलों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। चुनाव के दौरान हो रही एक से बढ़कर एक हिंसक वारदातों के बीच तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने एक बार फिर पत्रकारों पर धावा बोला। ख़बरों के अनुसार, बैरकपुर लोकसभा क्षेत्र अंतर्गत आमडांगा में न्यूज़ एक्स के पत्रकार तपस सेनगुप्ता और उनके कैमरामैन सहित पूरी टीम, चुनाव को कवर कर रही थी। तभी तृणमूल के गुंडों ने उन पर हमला कर दिया। आज पाँचवे चरण के तहत बैरकपुर में भी मतदान चालू है। न्यूज़ एक्स टीम की कार को भी नुकसान पहुँचाया गया और तोड़फोड़ की गई। पत्रकार सेनगुप्ता को सिर में चोट आई है।
Shame! Shocking! @MamataOfficial TMC workers attacked Tapas Sengupta, one of the best reporters of @NewsX . 30 minutes back we got message from him: Our car vandalised by TMC. I’m bleeding from head. Reaching hospital.
तपस सेनगुप्ता न्यूज़ एक्स के सीनियर कोरेस्पोंडेंट हैं। उनके व उनके साथ काम कर रहे कैमरामैन के अलावा कार चला रहे ड्राइवर पर भी हमला किया गया। भाजपा ने एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के पत्रकारों पर इस तरह के हमले को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर हमला बोला है। सेनगुप्ता ने कहा कि उस जगह से हिंसा की ख़बरें आई थीं, जिसका पता लगाने वो लोग वहाँ गए थे लेकिन तभी तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता उग्र हो गए और उन पर हमला बोल दिया। बंगाल पुलिस के सामने ही यह सब हुआ लेकिन वो मूकदर्शन बनी रही और किसी ने भी पत्रकारों की मदद नहीं की।
भाजपा ने चुनाव आयोग से ममता बनर्जी की पार्टी पर कार्रवाई करने की माँग की। भाजपा ने पश्चिम बंगाल के राज्य प्रशासन पर भी तृणमूल कॉन्ग्रेस की मदद का आरोप लगाया। कॉन्ग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि यह पश्चिम बंगाल जैसे राज्य के लिए एक कलंक है। उन्होंने टीएमसी को इस हमले के लिए ज़िम्मेदार ठहराया। पत्रकारों ने जब तृणमूल नेताओं से इस बाबत संपर्क करने की कोशिश की तो उधर से कोई जवाब नहीं आया।
बैरकपुर में लोकसभा का चुनाव काफ़ी दिलचस्प है क्योंकि यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस की तरफ से भारत के पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी मैदान में हैं। तृणमूल कॉन्ग्रेस से 4 बार विधायक रहे अर्जुन सिंह को भाजपा ने यहाँ से टिकट दिया है। अर्जुन सिंह हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं। अर्जुन सिंह स्थानीय स्तर पर अपने संपर्क और बूथ प्रबंधन के लिए जाने जाते हैं। वह पहले त्रिवेदी के चुनाव प्रबंधक रह चुके हैं। जहाँ त्रिवेदी की निगाह यहाँ जीत की हैट्रिक लगाने पर है, वहीं भाजपा यहाँ की 40% हिन्दी भाषी जनसंख्या को देखते हुए मोदी फैक्टर पर भी ज़ोर लगा रही है। पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक, अर्जुन सिंह ने तृणमूल को कई सफलताएँ दिलाई हैं।
अभी उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर के एक दूरदराज गाँव में जाना हुआ। गाँव की चौपाल में ग्रामीण चर्चा कर रहे थे कि कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार में राहुल गाँधी के बिज़नेस साझेदार को 20 हजार करोड़ के पनडुब्बी रक्षा सौदे में ऑफसेट ठेका मिलने का खुलासा बताता है कि गाँधीपरिवार की दलाली व भ्रष्टाचार का खेल कितना शातिराना है। बीस इक्कीस साल का एक नौजवान कह रहा था, “गाँधी परिवार ही अपने आप में घोटाला है, नेहरू से लेकर राहुल और प्रियंका तक खुद को निरंकुश राजा मानते हुए भ्रष्टाचार को जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं।”
इस चर्चा से याद आया कि महात्मा गाँधीके निजी सचिव रहे वी कल्याणम ने अक्टूबर 2011 में सार्वजनिक मंच से कहा था, “आज देश में भ्रष्टाचार चरम पर है और इसके लिये मैं जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार मानता हूँ। ब्रिटिश राज में इतना भ्रष्टाचार नहीं था। लेकिन आजादी के तुरंत बाद भ्रष्टाचार शुरू हो गया और आज यह करोड़ों में होता है।” कल्याणम 1943 से 1948 तक महात्मा गाँधीके निजी सचिव रहे थे। उनका कहना था, “नेहरू वैसे ही ईमानदार थे, जैसे कि मनमोहन सिंह। आज के भ्रष्टाचार के लिये मनमोहन सिंह भी जिम्मेदार हैं। मनमोहन सिंह व्यक्तिगत रूप से बहुत ईमानदार थे, लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार का संरक्षण किया। ऐसा ही नेहरू ने किया।”
1947 में आजादी मिलने के बाद जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बन गए तो इसके एक महीने के भीतर ही महात्मा गाँधीके पास 50 चिट्ठियाँ आई थीं, जिसमें से दस चिट्ठियाँ देश में चल रहे भ्रष्टाचार के शिकायत की थीं। कल्याणम बताते हैं कि नेहरू के लिये भ्रष्टाचार मुद्दा ही नहीं था। एक व्यक्ति ने जब नेहरू से बढ़ रहे भ्रष्टाचार की शिकायत की तो उन्होंने जवाब दिया, “भद्र पुरुष, इन छोटे-मोटे भ्रष्टाचार की चिंता मत करो।” तब उस व्यक्ति ने नेहरू को करारा जवाब देते हुए कहा, “श्रीमान, छोटा भ्रष्टाचार छोटे भ्रूण की तरह है जो बढ़ता जाता है।”
कहा जाता है कि उस समय के तीन व्यक्ति अति भ्रष्ट थे और ये तीनों नेहरू के बेहद करीबी भी थे। इनमें से एक थे नेहरू के रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन, वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी और पंजाब के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो। इनके भ्रष्टाचार के किस्से उजागर होने के बाद भी नेहरू ने इन्हें बर्खास्त करने के बजाय ईनाम दिया और कैबिनेट में रखे रहे। मेनन वही थे, जिनकी संलिप्तता देश के पहले रक्षा घोटाले यानी जीप घोटाले में सामने आई थी, लेकिन नेहरू ने उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया नहीं।
बाकी भ्रष्ट लोगों को भी नेहरू ने मंत्रिमंडल में रखकर संरक्षण दिया। इसीलिये इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मेनन, कृष्णामचारी आदि केवल चेहरा थे, भ्रष्टाचार के असली सरपरस्त तो नेहरू थे। कल्याणम द्वारा बताए गये इस सच को सुनकर भ्रष्टाचार के उन मामलों की मॉडस ऑपरेंडी पता चलती है, जिनमें गाँधीपरिवार का नाम आया। वह मॉडस ऑपरेंडी यह है कि भ्रष्टाचार के लिये चेहरा किसी और रखो ताकि सीधा लिंक न आए।
नेहरू के समय हुये मूंदड़ा घोटाले का तरीका याद कीजिये। कलकत्ता के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा से जुड़े घोटाले को आज़ाद भारत के पहले ऐसे घोटाले के तौर पर याद किया जाता है जिसे तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जोड़कर देखा गया। 1957 में मूंदड़ा ने सरकारी इंश्योरेंस कंपनी एलआईसी के ज़रिए अपनी छह कंपनियों में 12 करोड़ 40 लाख रुपए का निवेश कराया। यह निवेश सरकारी दबाव में एलआईसी की इन्वेस्टमेंट कमेटी की अनदेखी करके किया गया।
जब तक एलआईसी को पता चला उसे कई करोड़ का नुक़सान हो चुका था। इस घोटाले का खुलासा नेहरू के दामाद फिरोज गाँधीने ही किया था। प्रश्न उठता है कि यह सरकारी दबाव क्या था? क्या यह दबाव प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू की तरफ से आया होगा? इस घोटाले को नेहरू ख़ामोशी से निपटाना चाहते थे क्योंकि इससे उनका नाम जुड़ रहा था और उन्होंने अपने वित्तमंत्री टीटी कृष्णमचारी को बचाने की कोशिश भी की। इस घोटाले में भी हरिदास मूंदड़ा और कृष्णमचारी को मोहरा बनाकर गाँधी परिवार ने बच निकलने की कोशिश की।
फिर इंदिरा राज में हुये ऑयल घोटाला, मारुति घोटाला आदि। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय को यात्री कार मारुति बनाने का लाइसेंस मिला था। वर्ष 1973 में सोनिया गाँधी को मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड का प्रबंध निदेशक (एमडी) बनाया गया, हालाँकि सोनिया के पास इसके लिए जरूरी तकनीकी योग्यता नहीं थी। बताया जा रहा है कि कंपनी को सरकार की ओर से टैक्स, फंड और कई छूट मिली थी।
स्विस मैगजीन स्विजर इलस्ट्रिअरटिन ने नवंबर 1991 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें कहा कि राजीव गाँधी का स्विस बैंक में खाता है जिसमें 13,200 करोड़ रुपये जमा हैं। इस रिपोर्ट को गाँधी परिवार ने आज तक न कभी नकारा है न ही रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए इस पत्रिका के खिलाफ कोई मुकदमा ही किया है। इसका अर्थ यह क्यों न माना जाए कि यह रिपोर्ट सच है। राजीव गाँधीके ऊपर लगा 1497 करोड़ रुपए के बोफोर्स दलाली कांड अभी भी लोगों के दिमाग में ताजा है। मैगज़ीन ने छापा था कि स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने भारतीय सेना को अपनी 155 एमएम हॉवित्जर तोपें बेचने के लिये कमीशन के रूप में 64 करोड़ रुपए राजीव गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं को दिए थे। स्वीडन के पूर्व पुलिस चीफ स्टेन लिंडस्ट्राम ने बोफोर्स दलाली मामले के दस्तावेज लीक किए थे तो ये मामला बाहर आया।
बोफोर्स मामले में एक मोहरा इटली का बिचौलिया ओट्टावियो क्वात्रोची भी था। आरोप लगा था कि इसी बिचौलिये क्वात्रोची के जरिये बोफोर्स का कमीशन राजीव गाँधी तक पहुँचा था। क्वात्रोची वही व्यक्ति था जो राजीव गाँधीके प्रधानमंत्रित्व काल में गाँधी परिवार का बेहद करीबी था और राजीव की मौत के बाद 21 बार सोनिया गाँधीसे मिला था। इंडिया टुडे ने 8 जनवरी 2011 को एक विस्तृत रिपोर्ट में क्वात्रोची और राजीव गाँधी व सोनिया गाँधी के बीच संबंधों को उजागर किया था। क्वात्रोची राजीव गाँधी के समय प्रधानमंत्री आवास में बेरोकटोक जाता था और विदेशी दौरे के समय खुद राजीव गाँधी परिवार व बच्चों के साथ क्वात्रोची के घर जाते थे। सोनिया गाँधी क्वात्रोची के घर रुकती थीं।
लेकिन वी पी सिंह की सरकार जाने के बाद कॉन्ग्रेस सरकार आई और राजीव गाँधी द्वारा बोफोर्स खरीद में दलाली खाने की जाँच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और फिर लीपापोती कर दी गयी। भारत सरकार ने क्वात्रोची के लंदन के दो बैंक खातों को वहाँ की सरकार से कहकर फ्रीज करा दिया था, लेकिन 2004 में अटल जी की सरकार जाने के बाद यूपीए सरकार आई तो दिसम्बर 2005 में केंद्र सरकार ने क्वात्रोची के इन फ्रीज खातों को फिर खुलवा दिया, ताकि वह अपना पैसा निकालकर ले जा सके। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस राज में क्वात्रोची व अन्य आरोपितों के नाम हटाने की साजिश भी रची गई। तब भी यह प्रश्न उठा था कि क्या दलाल क्वात्रोची पर केंद्र की कॉन्ग्रेस सरकार की इस मेहरबानी का राज सोनिया गाँधी से उसके संबंधों के कारण है?
अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद में रिश्वत खाने के आरोपों से घिरी कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी का नाम इटली के मिलान शहर की अदालत में चले इस मामले के मुकदमे के फैसले के पृष्ठ संख्या 193 और 204 पर चार बार आया है। इसमें उनके नाम की स्पेलिंग Signora Gandhi लिखा गया था। इस अदालत ने कहा कि सोनिया गाँधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने बिचौलिये के जरिए 125 करोड़ रुपए कमीशन लिया। कुल 225 करोड़ रुपए रिश्वत की लेनदेन हुई, जिसमें से 52 प्रतिशत हिस्सा कॉन्ग्रेस के नेताओं को दिया गया। 28 प्रतिशत सरकारी अफसरों को और 20 प्रतिशत एयरफोर्स के अफसरों को मिला। इस केस में तब के एयरफोर्स चीफ एसपी त्यागी को भी आरोपी बनाया गया।
सोनिया व राहुल गाँधी के नेशनल हेराल्ड घोटाले, राहुल की बहन प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा का बीकानेर जमीन घोटाला, डीएलफ जमीन स्कैम की पड़ताल करने पर साफ होता है कि नेहरू काल के भ्रष्टाचार की इसी विरासत और इसी मॉडस ऑपरेंडी को आगे बढ़ाया। नेशनल हेराल्ड मामले में गाँधी परिवार पर अवैध रूप से नेशनल हेराल्ड की मूल कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) की संपत्ति हड़पने का आरोप है।
वर्ष 1938 में कांग्रेस ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई थी। यह कंपनी नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज नाम से तीन अखबार प्रकाशित करती थी जो 1 अप्रैल, 2008 को बंद हो गए। मार्च 2011 में सोनिया और राहुल गाँधीने ‘यंग इंडिया लिमिटेड’ नाम की कंपनी खोली और एजेएल को 90 करोड़ का ब्याज-मुक्त लोन दिया। एजेएल यंग इंडिया कंपनी को लोन नहीं चुका पाई। इस सौदे की वजह से सोनिया और राहुल गाँधी की कंपनी यंग इंडिया को एजेएल की संपत्ति का मालिकाना हक मिल गया।
इस कंपनी में मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के 12-12 प्रतिशत शेयर हैं, जबकि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के 76 प्रतिशत शेयर हैं। यानी नेशनल हेराल्ड गबन मामले में भी गाँधी परिवार ने वही खेल किया कि पहले फ्राड के लिये मोहरों से एक कंपनी बनाई और उस कंपनी के जरिये नेशनल हेराल्ड की संपत्ति अपने पास मंगवाकर हड़प ली। वाड्रा के जमीन घोटालों में भी यही तरीका अपनाया कि दूसरों के नाम से हजारों एकड़ जमीन सरकार से ली और फिर इसे अपने नाम करवा कर ऊँचे दाम पर बेचकर मुनाफा कमाया।
इसी प्रकार ताजा मामला कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार द्वारा 2011 में 20 हजार करोड़ के स्कॉर्पीन पनडुब्बी घोटाले में राहुल गाँधी के बिजनेस पार्टनर उलरिक मैकनाइट को ऑफ़सेट ठेका दिलाने का है। इसमें कहानी यह है कि राहुल गाँधी ने ब्रिटेन में ‘Backop’ लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई और इस कंपनी का 65 प्रतिशत स्वामित्व स्वयं और 35 प्रतिशत मैकनाइट का रखा। ये दोनों इसके संस्थापक निदेशक थे। यह कंपनी 2003 से 2009 तक रही। फिर 2.5 लाख रुपए की दिखावे की नाममात्र की पूंजी से भारत में इसी नाम से कंपनी का गठन किया और उसमें अपनी बहन और कांग्रेस की वर्तमान महासचिव प्रियंका गाँधी को सह निदेशक बनाया।
इस कंपनी में राहुल गाँधी का स्वामित्व 83 प्रतिशत शेयर के साथ था। 2010 में इस भारतीय कंपनी को भी बंद करने का दिखावा किया गया। 2011 में स्कॉर्पीन पनडुब्बी की फ्रांसीसी निर्माता कंपनी नवल ग्रुप (पूर्व में डीसीएनएस) ने भारत की विशाखापत्तनम के फ्लैश फोर्ज प्राइवेट लिमिटेड को मुंबई के मझगांव डाक लिमिटेड (एमडीएल) में बनाए जा रहे स्कॉर्पीन पनडुब्बी के क्रिटिकल पुर्जों की आपूर्ति के लिए ऑफ़सेट ठेका दिया। 2011 में ही भारतीय कंपनी फ्लैश फोर्ज ने ब्रिटेन की कंपनी ऑप्टिकल आर्मर का अधिग्रहण किया।
8 नवंबर, 2012 में जिस दिन दो व्यक्ति ऑप्टिकल आर्मर कंपनी में निदेशक बनाए गए, राहुल के बिजनेस पार्टनर उलरिक मैकनाइट को भी कंपनी ने निदेशक बनाया और उन्हें कंपनी का 4.9 प्रतिशत शेयर भी आवंटित किया। 2013 में फ्लैश फोर्ज ने ब्रिटेन की कंपनी कंपोजिट रेजिन डेवलपमेंट लिमिटेड का अधिग्रहण किया और इसी साल मैकनाइट ने फ्लैश फोर्ज के दो निदेशकों के साथ निदेशक का पद ग्रहण किया।
अब जरा भ्रष्टाचार के इस खेल में गाँधीपरिवार की भूमिका की पड़ताल करें तो तमाम प्रश्न खड़े होते हैं। 2011 में यूपीए सरकार के समय अपने बिजनेस पार्टनर को स्कॉर्पीन पनडुब्बी का ऑफसेट ठेका दिए जाने से पूर्व 2009 में शातिराना तरीके से बैकआप्स लिमिटेड ब्रिटेन को बंद घोषित किया गया। क्या इसलिये कि स्कॉर्पीन के ऑफ़सेट मिलने पर राहुल गांधी, प्रियंका गाँधी और गाँधी परिवार के सदस्यों से सीधा लिंक न मिले? इसके लिए इनका तरीका वही नेशनल हेराल्ड वाला रहा। पहले एक कंपनी बनाओ, फिर उस कंपनी में पूंजी डालकर ‘व्हाइट’ बनाओ, कंपनी बंद करो और दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके पूंजी स्थानांतरित करो और फिर धीरे से अपना नाम हटाने के बाद सरकारी ठेके दिलवाओ।
पहले एक व्यक्ति के साथ कंपनी खोलना और उसके बाद दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके उसमें उस व्यक्ति को स्वामित्व दिलवाना और अपनी सरकार में उस व्यक्ति को सरकारी ठेका दिलाना। ये घटनाक्रम इस धारणा की ओर ले जाता है कि राहुल गाँधी द्वारा बैकऑप्स कंपनी बनाने का उद्देश्य यूपीए की कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान ठेका पाना था।
राफेल डील में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर झूठा आरोप लगाने वाले राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस यूपीए सरकार द्वारा अपनी ही कंपनी के साझेदार को रक्षा सौदे में ऑफ़सेट दिलाने पर चुप आखिर क्यों है? यह सवाल तो उठेगा ही कि स्कॉर्पीन पनडुब्बी के ऑफसेट ठेके का लाभ राहुल गाँधी, प्रियंका और गाँधी परिवार तक पहुँचाने के लिये कंपनी बनाने, खत्म करने का दिखावा करने और फिर दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करने का नाटक किया गया, ठीक नेशनल हेराल्ड के एजेएल की तरह?
दरअसल, गाँधी परिवार के शासनकाल में सामने आए सभी घोटालों का तरीका यही रहा कि उसमें सामने मोहरे रखे गए, जबकि पर्दे के पीछे गाँधी परिवार उन मोहरों का संरक्षण करता रहा। नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव, सोनिया, राहुल, प्रियंका और राबर्ट वाड्रा से जुड़ी भ्रष्टाचार की हर कहानी में कोई न कोई ऐसा किरदार मिलेगा, जो गाँधी परिवार का बेहद करीबी होगा और उनकी सरपरस्ती में लाखों-करोड़ों के घोटाले करेगा, लेकिन जब घोटाले पकड़े जाएँगे तो गाँधी परिवार हाथ झाड़कर यह कह देगा कि उससे उसका क्या लेना-देना?
भारत में गाँधी परिवार दिखावे के लिए गरीब बना रहेगा और विदेशों में बड़ी-बड़ी कारोबारी कम्पनियाँ चलाएगा। सवाल तो यह है कि क्या गाँधी परिवार का ये कारोबार तकनीकी और शातिर चाल के जरिये भारत के सरकारी व रक्षा सौदों में दलाली का खेल जारी रखने का है? इन मामलों की निष्पक्ष जाँच हो जाए तो गाँधी परिवार का बच्चा-बच्चा जेल जा सकता है। हालाँकि अब तक गाँधी परिवार के सदस्यों के भ्रष्टाचार की दास्तानें सुनाई जाती रही हैं और उनके भ्रष्टाचार का सबूत देते दस्तावेज भी सामने आए हैं, लेकिन अब लगता है कि अपनी शातिर चालों से बचने वाले गाँधी परिवार के पाप का घड़ा भर चुका है और उनके कर्मों का हिसाब भारत का कानून करेगा।
कश्मीर में एक शख्स को मानव ढाल बनाकर सुर्खियों में आए मेजर लीतुल गोगोई की वरिष्ठता 6 महीने घटा दी गई है। साथ ही उनका तबादला भी जम्मू-कश्मीर से बाहर कर दिया गया। जानकारी के मुताबिक, गोगोई को कड़ी फटकार लगाते हुए सिर्फ पेंशन के लिए वरिष्ठता में छह महीने की कमी करने की सजा दी गई है। उनकी सामान्य तैनाती को लेकर उन पर लगे अनुशासनिक सतर्कता पाबंदी हटा ली गई है। मेजर गोगोई पर यह कार्रवाई महिला के साथ दोस्ती के मामले में हुई है।
Army sources: Army has awarded loss of six months seniority to Major Leetul Gogoi in the case related to meeting a lady source in a hotel in Srinagar on May 23, 2018. The officer is now being posted out of Kashmir Valley as he has completed his tenure there.
बता दें कि, मेजर गोगोई और उनके ड्राइवर समीर मल्ला को दो चीजों के लिए कोर्ट मार्शल में दोषी ठहराया गया। पहला, स्थानीय महिला से दोस्ती करने और दूसरा, ड्यूटी के दौरान ऑपरेशनल एरिया से दूर रहने के लिए। मल्ला को क्या सजा मिलेगी, इसका फैसला उनके कंपनी कमांडर पर सौंपा गया था, जिसमें उन्हें कड़ी फटकार लगाई गई है। मल्ला पर अवैध तरीके से गायब रहने का आरोप था। साल 2017 में, मल्ला की प्रादेशिक सेना में नियुक्ति हुई थी। उनकी तैनाती राष्ट्रीय राइफल्स के 53 सेक्टर में थी। राष्ट्रीय राइफल्स जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करता है।
गौरतलब है कि 23 मई 2018 को मेजर गोगोई और उनका ड्राइवर 18 साल की लड़की के साथ जबरन होटल में घुसने का प्रयास कर रहे थे। इस दौरान उनका होटल स्टाफ के साथ विवाद हो गया और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उनको हिरासत में ले लिया। गोगोई और मल्ला के खिलाफ ‘समरी ऑफ एविडेंस’ फरवरी में पूरी की गई थी, जिसके बाद कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू की गई। आर्मी कोर्ट ने आरोपी और गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए और फिर बाद में उन्हें सजा सुनाई गई। बता दें कि, उस लड़की ने गवाही देने से मना कर दिया था और कहा था कि उसके द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान को ही अंतिम बयान माना जाए। लड़की ने बताया था कि उसकी मेजर गोगोई के साथ दोस्ती फेक फेसबुक आईडी के जरिए हुई थी, जिसमें गोगोई ने अपना नाम उवैद अरमान बताया था।
मेजर गोगोई अप्रैल 2017 में चर्चा में आए थे। उस वक्त कश्मीर के बडगाम में उपचुनाव हो रहे थे। इसी दौरान कुछ पत्थरबाजों ने उनके काफिले पर हमला किया। जिससे बचने के लिए उन्होंने एक पत्थरबाज को अपनी गाड़ी पर बाँधकर उसे अपनी ढाल बनाया था।
गुजरात से एक सुखद ख़बर आई है। सौराष्ट्र क्षेत्र में बोटाद ज़िले के जंगलों में घुसकर आतंक रोधी दस्ते ने एक ऐसे खूँखार गैंगस्टर को धर दबोचा, जिसके ऊपर लूट, हत्या और सकरी अधिकारियों पर हमले सहित कई मामलों में वांछित था। एटीएस को काफ़ी दिनों से उसकी तलाश थी। लेकिन इससे भी अच्छी बात यह है कि एटीएस की जिस टीम ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया, उसमें चार सदस्य थे। आपको यह जान कर ख़ुशी होगी कि ये चारों ही महिलाएँ हैं। एक फोटो सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हो रही है जिसमें ये चारों ही महिला अधिकारी खड़ी हैं और पकड़ा गया वॉन्टेड अपराधी नीचे डरा-सहमा बैठा हुआ है। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे महिला सशक्तिकरण की बानगी बताया और उन महिला अधिकारियों की प्रशंसा की।
गिरफ़्तार अपराधी का नाम जुसाब अल्लारखा है। उस पर कई लूट के मामले दर्ज हैं। सरकारी अधिकारियों पर वह कई बार हमले भी कर चुका है। अधिकारियों के अनुसार, जब जूनागढ़ के जंगलों में एटीएस की महिलाओं व इस अपराधी का आमना-सामना हुआ, तो वह थोड़ी देर भी टिक नहीं सका। अपनी जान बचाने के लिए उसने तुरंत ही घुटने टेक दिए। इसके बाद महिला अधिकारियों ने उसे गिरफ़्तार कर लिया। इसे एक बड़ी क़ामयाबी के रूप में देखा जा रहा है। फिरौती के कई मामलों में शामिल यह अपराधी पुलिस के लिए कई दिनों से सिरदर्द बना हुआ था।
गुजरात एटीएस की जांबाज़ महिला अधिकारीगण और पकड़ा गया अपराधी अल्लारखा
पिछले वर्ष पैरोल पर छूटने के बाद अल्लारखा फरार हो गया था। इसके बाद वह फिर से कई आपराधिक घटनाओं में संलग्न रहा। वह अपराध करने के बाद जंगलों में छुप जाता था। इस कारण पुलिस को भी उसे पकड़ने में ख़ासी मुश्किलें आ रही थीं। इसके बाद यह मामला एटीएस को सौंपा गया, जिसे इन चार महिला अधिकारियों ने बख़ूबी पूरा किया। महिला पीएसआइ की एक टीम को हाल ही में एटीएस में शामिल किया गया है। इनके नाम हैं- संतोजबेन ओडेडरा, नितिमिका गोहिल, अरुणाबेन गामिती और शकुन्तला मल।
ऐसा नहीं था कि यह ऑपरेशन आसान रहा। महिला अधिकारियों को मुखबिरों द्वारा कुछ इनपुट्स मिले थे। मुखबिरों द्वारा बताए गए स्थान तक पहुँचने के लिए चारों महिला अधिकारियों को घने जंगल में लगभग डेढ़ घंटे तक पैदल चलना पड़ा। मुस्तैदी रखने और अपनी उपस्थिति छिपाने के लिए गाड़ी का इस्तेमाल नहीं किया गया। रात को ही जंगल में पहुँच कर इन अधिकारियों ने सुबह होने का इन्तजार किया और फिर अपराधी पर धावा बोला। अपराधी अल्लारखां अपने पास न तो मोबाइल रखता था और न ही कोई गाड़ी। वह घोड़े का इस्तेमाल करता था।