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चक्रवात ‘फ़ानी’ से बचाव के लिए 1000 करोड़ रुपए का राहत फंड तैयार, Navy भी मुस्तैद

चक्रवात ‘फानी’ को हिंदुस्तान की ओर रुख कर आगे बढ़ता देखते हुए गृह मंत्रालय ने कमर कसनी शुरू कर दी है। इन्हीं तैयारियों के अंतर्गत ₹1000 करोड़ से अधिक का एक फंड उन चार राज्यों के लिए तैयार किया गया है जिनके इस चक्रवात की चपेट में आने की सम्भावना है। यह चारों राज्य भारत के पूर्वी समुद्र तट पर हैं।

पैसा सीधे राज्यों के आपदा रिस्पॉन्स फंड में

यह धनराशि चारों राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और ओडिशा की राज्य सरकारों के आपदा रिस्पॉन्स फंड में सीधे जमा की जाएगी। तमिलनाडु को ₹309.75 करोड़, आंध्र प्रदेश ₹200.25 करोड़, ओडिशा को ₹340.875 करोड़ और पश्चिम बंगाल को ₹235.50 करोड़ दिए जाएँगे। कल (सोमवार) शाम से हाई अलर्ट पर चल रहे यह राज्य इस राशि का उपयोग नुक्सान की रोकथाम और प्रभावित लोगों की सहायता के लिए करेंगे।

नेवी भी चौकस, बंगाल की खाड़ी में है तूफ़ान का उद्गम  

फ़ानी तूफ़ान का उद्गम बंगाल की खाड़ी में चेन्नै से 690 किमी और तमिलनाडु के ही अन्य शहर मछलीपट्टनम से 760 km दक्षिणपूर्व में बताया जा रहा है। गृहमंत्रालय के एक अधिकारी ने आज शाम को ही यह जानकारी दी कि पहले उत्तर की ओर बढ़ते इस तूफ़ान के बारे में अनुमान है कि 1 मई (कल, बुधवार) की शाम के आसपास यह ओडिशा की तरफ़ मुड़ जाएगा।

पूर्वी नेवल कमांड (ENC) को भी हाई अलर्ट पर मानवीय सहायता के लिए तैयार रहने को कहा गया है, इस आशय से नेवी के एक प्रवक्ता ने मंगलवार शाम को जानकारी दी है। चेन्नै और विशाखापत्तनम स्थित भारतीय नेवी के पोतों को आपदा सहायता, बचाव अभियान, मेडिकल सहायता आदि के लिए स्टैंडबाई पर रखा गया है। इन पोतों पर डॉक्टरों, दवाओं, कपड़ों, बचाव अभियान की रबर नावों सहित सभी सामग्री को संग्रहित कर लिया गया है।

नेवी कमांड स्थिति पर पैनी नजर रखे है और चारों राज्यों की राज्य सरकार के साथ लगातार संपर्क और समन्वय स्थापित किए हुए है

PM मोदी के खिलाफ लड़ रहे महागठबंधन प्रत्याशी तेज बहादुर का खारिज हो सकता है नामांकन, EC ने भेजा नोटिस

वाराणसी लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की तरफ से पीएम मोदी के खिलाफ मैदान में उतारे गए बीएसएफ के बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव का नामांकन खारिज हो सकता है। जानकारी के मुताबिक, सोमवार को सपा की तरफ से दाखिल किए गए एक नामांकन पत्र की जाँच करते हुए निर्वाचन आयोग के पर्यवेक्षक ने नोटिस जारी करते हुए तेज बहादुर से एक अनापत्ति प्रमाण पत्र माँगा है।

आयोग की ओर से जारी किए गए नोटिस में तेज बहादुर को निर्देश दिए गए हैं कि वह बीएसएफ से एक अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर आएँ, जिसमें यह स्पष्ट हो कि उन्हें नौकरी से किस वजह से बर्खास्त किया गया। निर्वाचन आयोग ने इस प्रमाण पत्र को जमा करने के लिए बुधवार (मई 1, 2019) को दोपहर 11 बजे तक का वक्त दिया है। अगर तेज बहादुर समय रहते अनापत्ति पत्र जमा नहीं कर पाते हैं, तो उनका नामांकन खारिज हो सकता है।

वहीं, इससे पहले तेज बहादुर ने निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में जो पर्चा भरा था उसमें प्रस्तावकों के नाम को लेकर गड़बड़ियाँ पायी गई थी, जिसकी वजह से उसे रद्द कर दिया गया है।

सपा के प्रदेश प्रवक्ता मनोज राय धूपचंडी ने इसे बीजेपी की साजिश करार देते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती कि तेज बहादुर यादव नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरें। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि भाजपा के इशारे पर पर्यवेक्षक ने 24 घंटे के भीतर बीएसएफ में भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्तगी को लेकर अनापत्ति प्रमाणपत्र माँगा है और राजनीतिक साजिश के कारण ही ऐसा जान-बूझकर किया गया है। हालाँकि, अभी तक जिला प्रशासन की ओर से इसे लेकर कोई बयान नहीं दिया गया है।

बता दें कि,पहले समाजवादी पार्टी ने वाराणसी लोकसभा सीट से शालिनी यादव को अपना प्रत्याशी बनाया था, लेकिन बाद में पार्टी ने बीएसएफ से बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव को अपना कैंडिडेट बताते हुए पार्टी नेताओं के माध्यम से उनका भी नामांकन करा दिया। मगर तेज बहादुर यादव के चुनाव लड़ने पर अभी भी संशय बरकरार है।

गौरतलब है कि तेजबहादुर यादव ने बीएसएफ में खाने को लेकर शिकायत की थी। उन्होंने वहाँ दिए जाने वाले भोजन को लेकर वीडियो बनाया था और उसे सोशल मीडिया में वायरल कर दिया था। उनके ख़िलाफ़ 2 मोबाइल फोन लेकर ऑपरेशनल ड्यूटी पर जाने और भोजन की गुणवत्ता को लेकर ग़लत अफवाह फैलाने का मामला साबित हुआ था, जिसके बाद बीएसएफ ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए तेज बहादुर यादव को बर्खास्त कर दिया था।

वाराणसी में राड़ा होना तय: SP जुटा शालिनी यादव को मनाने में, नामांकन वापस न लेने से बढ़ीं तेज बहादुर की मुश्किलें

किसी भी शर्त पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हराने की मशक्कत में जुटे SP और कॉन्ग्रेस की माथापच्ची के कारण वाराणसी लोकसभा सीट पर हर दिन नया मनोरंजन देखने को मिल रहा है। एक ओर जहाँ SP द्वारा सेना में मिलने वाली पीली दाल का वीडियो बनाने से चर्चा में आए BSF से बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव को टिकट दिए जाने के बाद मीडिया उनके समर्थन में माहौल बनाने में जुटा है, वहीं SP अभी अंदरूनी समस्याओं से ही जूझती नजर आ रही है।

आसान काम नहीं है शालिनी यादव को मनाना

BSF के पूर्व जवान तेज बहादुर के लिए समाजवादी पार्टी (SP) ने जिस शालिनी यादव का टिकट काटा है, वो पूर्वांचल के बड़े राजनीतिक घराने से संबंध रखती हैं। शालिनी यादव अब भी PM नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी से उम्मीदवार हैं क्योंकि उन्होंने अभी तक अपना नामांकन वापस नहीं लिया है। माना जा रहा है कि शालिनी यादव का अपना जनाधार है, इसलिए SP के नए उम्मीदवार और BSF के बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। शायद इसीलिए पार्टी अब शालिनी को मनाने में जुटी हुई है।

शालिनी यादव पूर्वांचल में कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता रहे श्यामलाल यादव की बहू हैं। श्यामलाल यादव 1984 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर वाराणसी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। वो राज्यसभा के उप सभापति रहे थे। श्यामलाल 1957 से 1962 और 1967 से 1968 तक UP विधानसभा के सदस्य और केंद्रीय कृषि मंत्री भी रह चुके हैं। कुल मिलाकर शालिनी यादव बनारस के एक बड़े कॉन्ग्रेस परिवार से ताल्लुक रखती हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि वो 22 अप्रैल को ही कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देकर SP में शामिल हुई थीं। ऐसे में उन्हें मनाना SP के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।

शालिनी ने वाराणसी के मेयर पद का चुनाव लड़ा था और उन्हें सवा लाख वोट मिले थे। हालाँकि, वो हार गई थीं। वो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में ग्रेजुएट हैं। नामांकन वापसी के मामले पर शालिनी यादव की नाराजगी SP की परेशानी बढ़ा रही है।

यदि शालिनी यादव अपना नामांकन वापस नहीं लेती हैं, तो तेज बहादुर के साथ ही SP की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं। शालिनी का टिकट काटना एक तरह से महिलाओं का अपमान भी है, वो भी तब, जबकि पूर्वांचल में वैसे ही बहुत कम महिलाएँ मैदान में हैं।

शालिनी यादव ने अभी अपना नामांकन वापस नहीं लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, उनका कहना है कि अगर अखिलेश यादव कहेंगे, तो वह अपना नामांकन वापस ले लेंगी। साथ ही, उन्होंने कहा है कि अगर पार्टी की तरफ से नहीं कहा जाएगा तो वो ऐसा नहीं करेंगी और चुनाव लड़ेंगी। इस पूरे प्रकरण में BJP का कोई नुकसान नहीं है, लेकिन SP का वोट प्रतिशत जरूर कम हो सकता है। इसका कारण यह है कि शालिनी यादव तेज बहादुर के मुकाबले एक गंभीर प्रत्याशी हैं।

बता दें कि BSF से बर्खास्त तेज बहादुर ने सोमवार को नामांकन के अंतिम दिन समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल किया है। जबकि, वो पहले ही निर्दलीय तौर पर भी नामांकन कर चुके थे।

मायावती ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना, MP की कमलनाथ सरकार से समर्थन वापस लेने की दी धमकी

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए कॉन्ग्रेस को यूपी के सपा, बसपा और रालोद के गठबंधन से बाहर कर बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही झटका दे चुकी हैं और अब मायावती एक बार फिर से कॉन्ग्रेस को मध्य प्रदेश में बड़ा झटका देने जा रही हैं। मायावती ने मंगलवार (अप्रैल 30, 2019) को ट्वीट कर कॉन्ग्रेस को सार्वजनिक तौर पर धमकी भी दे दी है। दरअसल, मध्यप्रदेश के गुना- शिवपुरी लोकसभा सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ खड़े बसपा प्रत्याशी लोकेंद्र सिंह राजपूत कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए हैं, जिसके बाद से बसपा सुप्रीमो मायावती कॉन्ग्रेस पर भड़की हुई हैं।

मायावती ने ट्वीट कर दोनों राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कॉन्ग्रेस पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया है। मायावती ने अपने ट्वीट में लिखा है कि सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के मामले में कॉन्ग्रेस भी बीजेपी से कम नहीं है। मध्य प्रदेश के गुना लोकसभा सीट पर बसपा उम्मीदवार को कॉन्ग्रेस ने डरा-धमकाकर जबर्दस्ती बैठा दिया है, लेकिन बसपा अपने चुनाव चिह्न पर ही लड़कर इसका जवाब देगी और अब कॉन्ग्रेस सरकार को समर्थन जारी रखने पर भी पुनर्विचार करेगी।

इसके साथ ही मायावती ने एक और ट्वीट करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेसी नेताओं द्वारा जो यह प्रचार किया जा रहा है कि भाजपा भले ही जीत जाए, लेकिन बसपा-सपा गठबंधन को नहीं जीतना चाहिए, यह कॉन्ग्रेस पार्टी के जातिवादी, संकीर्ण व दोगले चरित्र को दर्शाता है। इसलिए लोगों का यह मानना सही है कि बीजेपी को केवल हमारा गठबंधन ही हरा सकता है। लोग सावधान रहें।

बता दें कि लोकसभा चुनाव 2019 में भले ही कॉन्ग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन नहीं हुआ है, लेकिन पिछले साल नवंबर में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद जब कॉन्ग्रेस खुद के बल पर सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुई, तो प्रदेश में कॉन्ग्रेस को समाजवादी पार्टी, बसपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिला और फिर कमलनाथ के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी थी।

क्या स्वरा भास्कर की अभिव्यक्ति उनकी FoE और दूसरे व्यक्ति की FoE यौन कुंठा है?

लोकतंत्र में यह पहली बार देखने को मिला है कि जिस व्यक्ति को जो तरीका बेहतर लग रहा है, वो उसी को ढाल बनाकर, उसके समर्थन में हर संभव तर्क देते हुए उसे जायज ठहरा रहा है। बॉलीवुड में ‘नारीवाद’ की नई परिभाषा गढ़कर महिलाओं को अपमानित करने वाली स्वरा भास्कर और विवादों का रिश्ता नया नहीं है। ‘वीरे दी वेडिंग‘ फिल्म में खुलकर अपने ‘मन की बात‘ करने वाली स्वरा भास्कर को बहुत आसानी से नारीवाद का चेहरा बना कर पेश किया जाने लगा है। यह वर्तमान समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि महिलाओं के अधिकारों को उसके शारीरिक सुख और जबरन फूहड़पन मात्र से जोड़कर पेश कर देने से वो समाज में महिलाओं की नई पहचान दिलाने वाले ठहराए जाने लगते हैं।

इस फिल्म में स्वरा भास्कर ने हस्तमैथुन के दृश्य को फिल्माया था और इस दृश्य को एक बड़े वर्ग ने महिलाओं के प्रति रूढ़िवादिता को ख़त्म करने वाला एक ऐतिहासिक कदम भी बताया था। इस दृश्य के बाद से ही स्वरा भास्कर एक बड़ा नाम बन गई। युवाओं को नारीवाद, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता आदि मामलों पर ‘नई दिशा’ देने की जो जिम्मेदारी स्वरा भास्कर, कॉमेडी के नाम पर स्वयं कॉमेडी, यानी कुणाल कामरा, मल्लिका दुआ और AIB जैसे नव-क्रांतिकारियों ने उठाई है, वह मात्र एक दोयम दर्जे का भोंडापन है।

आम चुनावों के बीच नव-क्रांतिकारियों की तर्ज पर ही सोशल मीडिया पर तख्तियों के माध्यम से अपने विचार प्रकट करने वाले एक ट्विटर यूज़र ने मतदाताओं से इस चुनाव में समझदारी से अपने मताधिकार का प्रयोग करने की बात उठाई है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी राय भी दी है कि अपनी ऊँगली का इस्तेमाल ‘वीरे दी वेडिंग’ फिल्म वाली स्वरा भास्कर की तरह ना करें, बल्कि समझदारी से मतदान करने के लिए करें। लेकिन इस अपील से लिबरल समूह और खुद स्वरा कुछ नाराज नजर आ रहे हैं।

बस इस एक सन्देश के बाद लिबरल गैंग में माहौल ‘धुआँ-धुआँ’ हो गया। ‘प्लाकार्ड गाय’ को यौन कुंठित और बीमार बताया जाने लगा है। यहाँ तक की स्वरा भास्कर को उन्ही की फिल्म के दृश्य की याद दिलाने पर वो भड़क जाती है और उनका ट्रॉल समूह लोगों को बीमार साबित करने पर उतर आता है।

कॉन्ग्रेस के पार्टी ‘प्रवक्ता’ कुणाल कामरा के ‘कॉमेडी’ के नाम पर बनाए जाने वाले वीडियो से अभिव्यक्ति की आजादी, लोकतंत्र की हत्या, लिबरल, एनार्की, फासिज़्म, ‘माई लाइफ माई रूल्ज़’ जैसे शब्दकोश विकसित करने वाले लोगों का दूसरों की अभिव्यक्ति की आजादी से किलस जाना नई बात नहीं है।

नव-लिबरल्स की इस नई फसल को यह समझना अभी बाकी है कि अभिव्यक्ति की आजादी हमेशा आत्यंतिक होती है और यह दोनों ओर से समान रूप से जायज ही होती है। सामान्य शब्दों में इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि स्वरा भास्कर की अभिव्यक्ति को उनका ‘अधिकार’ और प्लाकार्ड का समर्थन करने वालों की अभिव्यक्ति को यौन कुंठा और बिमारी बता देना ही सबसे बड़ी मानसिक कुंठा है।

यह हास्यास्पद बात है कि स्वरा भास्कर जैसे लोग आज उन लोगों के समर्थन में खड़े हैं जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश विरोधी बयान देने के बाद आज खुलकर चन्दा माँगकर संसद पहुँचने का सपना देख रहे हैं। FoE को गाली अगर किसी ने बनाया है, तो वो यही लोग हैं। लेकिन जब आज यही अभिव्यक्ति इनके विपरीत काम कर रही है, तब इन्हें पसीना छूट रहा है।

हालाँकि, प्रतिक्रिया करने वालों को भी समझना चाहिए कि स्वतन्त्रता और अधिकारों के साथ ही जिम्मेदारी भी होती है। कथित लिबरल गैंग की तरह ही यदि अपने हर अधिकार का शोषण के स्तर तक इस्तेमाल किया जाने लगे तो उस अधिकार की प्रासंगिकता पर ही सवाल लगने शुरू हो जाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यदि आज मजाक बनकर रह गई है, तो उसमें सबसे बड़ा योगदान इंटेरनेट पर सस्ते कॉमेडियंस के वीडियो देखकर बने इन नव-लिबरल्स का ही है।

‘बकवास’ है राहुल गाँधी की नागरिकता वाली याचिका, 2015 में सुप्रीम कोर्ट से कुछ ऐसे बचे थे RaGa

आज राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर सियासी बवाल खड़ा हो गया है। काग़ज़ातों से ख़ुलासा हुआ है कि वह लंदन की एक कम्पनी के डायरेक्टर और सेक्रटरी थे और उस कम्पनी के रजिस्ट्रेशन फॉर्म में उन्होंने ख़ुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। संविधान के आर्टिकल 84(a) में लिखा हुआ है कि सांसद का चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए। इसके अलावा आर्टिकल 9 में इस बात का जिक्र किया गया है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने विदेशी नागरिकता ली है, वह भारत का नागरिक नहीं हो सकता। राहुल गाँधी अगर ब्रिटिश नागरिक हैं, जैसा कि 2003 के काग़ज़ातों से ख़ुलासा हुआ है, तो 2004, 2009, 2014 और 2019 में उनका सांसद का चुनाव लड़ना संविधान के ख़िलाफ़ है। अगर वह विदेशी नागरिक हैं तो भारतीय नागरिक नहीं हो सकते।

क्या आपको पता है कि 2015 में इसी प्रकार का एक पीआईएल दाखिल किया गया था जिसमें काग़ज़ातों के साथ राहुल गाँधी की नागरिकता पर सवाल खड़े किए गए थे। इस पीआईएल को सुप्रीम कोर्ट ने रिजेक्ट कर दिया था। इस पीआईएल में इस मामले को लेकर सीबीआई जाँच की माँग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस एच एल दत्तू और जस्टिस अमिताव राय की पीठ ने उन काग़ज़ातों की ‘प्रमाणिकता’ पर सवाल खड़े किए थे और यह भी पूछा था कि इन काग़ज़ातों को किस तरह से हासिल किया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को तुच्छ करार देते हुए कहा था कि क्या कोर्ट अब जाँच के लिए घुमना-फिरना शुरू कर दे? इसके साथ ही अदालत ने इस याचिका को औचित्यहीन और तुच्छ करार दिया था। इस पीआईएल के दाखिल होने के कुछ सप्ताह पहले ही भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने राहुल गाँधी की ब्रिटिश नागरिकता को लेकर ख़ुलासे किए थे और साथ ही डाक्यूमेंट्स भी पेश किए थे। उन्होंने पीएम मोदी को भी पत्र लिखा था। आज मंगलवार (अप्रैल 30, 2019) को राहुल गाँधी को गृह मंत्रालय द्वारा अपनी नागरिकता को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए जो नोटिस भेजा है, उसका आधार सुब्रह्मण्यम स्वामी के ख़ुलासे ही हैं।

मोदी के ग्रेजुएशन की डिग्री बनाम राहुल का बर्थ सर्टिफ़िकेट: सबूत नहीं माँगोगे शोना बाबू?

माताजी इटली की हैं। पिता जी भारत के प्रधानमंत्री थे। शादी हुई थी, तब प्रधानमंत्री दादी थीं। बालक पैदा हुआ, सबके सामने पैदा हुआ ऐसा बहन प्रियंका गाँधी का ताजा बयान है। बालक का नाम रखा गया राहुल। सुब्रह्मण्यम स्वामी कहते हैं कि असली नाम राओल विंची है, लेकिन हम उतने भीतर नहीं जाएँगे क्योंकि हम इन बातों पर चालीस मिनट के सत्रह प्राइम टाइम नहीं करते कि देश जानना चाहता है।

देश को कुछ नहीं जानना होता है। देश जान भी ले तो क्या कर लेगा इस सूचना का? लेकिन लोग लगे रहे, केस हुआ, सूचना का अधिकार इस्तेमाल किया गया, डिग्रियाँ निकलवाई गईं, डिग्री सही निकली तो उसे ही फेक कहा जाने लगा। मतलब यह है कि मतलब इस बात से नहीं था कि मोदी कितना पढ़ा लिखा है, बल्कि मतलब इससे था कि इनका झूठ सच साबित हो जाए। हुआ कुछ नहीं, खलिहर पत्रकार नौटंकी करते रहे और ‘देश जानना चाहता है’ के नाम पर वाहियात बातें परोसते रहे।

मुझे भी इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गाँधी का नाम राओल है कि राकरेला। नाम चाहे जो भी हो, वो रहेगा राहुल गाँधी ही जिसका दैनिक कार्य है सहजता से झूठ बोलना और देश की हर संस्था को अपनी जेब का सिक्का समझकर जहाँ-तहाँ उछालते रहना। कभी सीआरपीएफ़ पर झूठ, कभी सैन्य कार्रवाई पर झूठ, कभी सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर झूठ और बाकी टाइम तो प्रपंच चलता ही रहता है।

इसलिए, ऐसे आदमी के शर्ट में एक छेद हो, तो उँगली डाल कर पूरा फाड़ कर देख ही लेना चाहिए कि भाई तुम्हारे 2009, 2014 और 2019 के चुनावी हलफ़नामे में इतने बदलाव क्यों हैं? आखिर बैकऑप्स नामक कम्पनी का डायरेक्टर प्रियंका को चुनावों के तुरंत पहले क्यों बना दिया गया था? ऐसे काग़ज़ात क्यों बाहर आ रहे हैं जिसमें राहुल गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया है? फिर भारत में जो दस्तावेज हैं उसमें कुछ और क्यों लिखा हुआ है?

इससे हासिल क्या होगा? वही, जो मोदी की डिग्री का पोस्टमॉर्टम कर के हुआ था। अगर मोदी को डिग्री के नाम पर घेरने वाला आदमी इंग्लैंड में व्यवसाय करने के लिए ब्रितानी हो जाता है, और भारत में चुनाव लड़ने के लिए भारतीय, तो फिर रवीश कुमार के गंभीर शब्दों में, “इसकी जाँच क्यों नहीं करवा ली जाए। अगर इतने लोग कह रहे हैं तो क्या दिक्कत है, जाँच करा ली जाए।”

इससे किसी बात पर फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, बस यह बात जाननी ज़रूरी है कि वह व्यक्ति जो सत्ता के शीर्ष पर बैठना चाहता है, उसकी पार्टी के मुख्यमंत्री देश के बड़े राज्यों में हैं जहाँ मिलिट्री एवम् अन्य सुरक्षा संबंधी संस्थान हैं, उसकी प्रतिबद्धता एक व्यवसाय के लिए अंग्रेज़ होने से है, एक चुनाव के लिए भारतीय होने से है, या फिर उस हिन्दुस्तान से जहाँ उसकी बहन ने कहा कि वो सबके सामने पैदा हुए थे।

सवाल यह उठता है कि इस आदमी ने नागरिकता के बारे में झूठ क्यों लिखा। कहीं तो लिखा ही, या तो भारत के दस्तावेज़ों में, या ब्रिटेन के। अंग्रेज़ों को अगर पागल बनाया तो ठीक है क्योंकि उन्होंने दो सौ साल राज किया, तो थोड़ी टैक्स चोरी भी अगर कर ली तो माफ किया जाए, लेकिन भारत सरकार को उस कमाई का टैक्स दिया कि नहीं?

टैक्स भी छोड़िए, बस यह बता दीजिए कि सच क्या है। ब्रिटेन के अंग्रेज़ ही हैं तो कोई दिक्कत नहीं। आपकी माताजी को देश के लोगों ने दस साल ‘प्रधानमंत्री’ के तौर पर स्वीकारा ही है। उन्होंने देश चलाया है। आप भी चला लीजिएगा, इसमें संदेह नहीं। लेकिन देश की राष्ट्रीय सुरक्षा की चाभी क्या ऐसे व्यक्ति के हाथ में दी जा सकती है जो इटली में राओल विंची है, लंदन में ब्रिटिश नागरिक है, और भारत में राहुल गाँधी है जिसके कुर्ते की जेब फटी हुई है, जो दीवारों में कुछ ढूँढता रहता है, जो आँख मारता है, जो प्यार की बातें करता है, जो महिलाओं की बात करते हुए पता नहीं क्या-क्या बोल जाता है!

बंगाल में पत्रकारों की पिटाई पर चुप्पी Editors Guild के ‘गुप्त’ रोग का परिचायक

भारत में ग़रीब ऑटो वालों से लेकर करोड़ों कमाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकीलों तक, सभी की अपनी एक अलग यूनियन है। इस एकता का प्रभाव यह होता है कि उनमें से अगर किसी एक को भी कोई दिक्कत आती है तो पूरा समूह उसके साथ खड़ा हो जाता है। ऐसे ही भारत में डिजाइनर पत्रकारों का भी एक प्रतिनिधिमंडल है, समूह है, दल है या यूँ कहिए गिरोह है। यह एडिटर्स गिल्ड है। एडिटर्स गिल्ड भी एक प्रकार के ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित है, जिसे सीधी भाषा में ‘गुप्ता’ रोग भी कहा जा सकता है। आख़िर शेखर गुप्ता जैसे ‘निष्पक्ष’ पत्रकार जिस गिरोह के अध्यक्ष हों, उसके बारे में और कहा भी क्या जा सकता है? चाहे मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या फिर आईआईटी के हॉस्टलों में मिल रहे खाने की भी जाति बता देना, इन सब में शेखर बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहते हैं या यूँ कहिए कि वो ऐसे कार्यक्रमों के योजनाकार होते हैं।

एडिटर्स गिल्ड इतना हिम्मती है कि ये मेघालय हाईकोर्ट के किसी निर्णय पर तो अफ़सोस जता सकता है लेकिन इतना कुटिल भी है कि बंगाल में पत्रकारों के पीटे जाने पर चुप्पी साध सकता है। एडिटर्स गिल्ड राहुल गाँधी द्वारा किसी पत्रकार पर की गई टिप्पणी को लेकर भाजपा नेताओं की आलोचना कर सकता है। जी हाँ, आपने बिलकुल सही पढ़ा। जैसा कि हमें पिछले कुछ दिनों में पता चला है, प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेना अब इस देश में पाप हो गया है। अगर प्रधानमंत्री गिरोह विशेष को इंटरव्यू नहीं देते तो सिर्फ़ वही नहीं बल्कि उनका इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार भी ख़राब हो जाते हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इसी तरह एएनआई की सम्पादक स्मिता प्रकाश पर टिप्पणी की थी। उनकी भी गलती यही थी- प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेना।

पत्रकारों के हितों की बात करने वाले एडिटर्स गिल्ड से जनता ने राहुल के उस बयान के ख़िलाफ़ बयान जारी करने की माँग की थी, जिसमें उन्होंने स्मिता के बारे में कहा था कि वो सवाल भी ख़ुद पूछ रही थीं और जवाब भी ख़ुद दे रही थीं। लोगों द्वारा लगातार आवाज़ उठाने के बाद एडिटर्स गिल्ड ने चुप्पी तोड़ते हुए एक बयान तो जारी किया था, लेकिन उसमें राहुल गाँधी द्वारा स्मिता प्रकाश पर की गई टिप्पणी को लेकर आपत्ति जताने से ज्यादा पुराने घिसे-पिटे मुद्दों पर भाजपा नेताओं को निशाना बनाया गया था। यही एडिटर्स गिल्ड आज एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उस दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली सहित कई बड़े नेताओं ने एडिटर्स गिल्ड पर निशाना साधा था। लेकिन एडिटर्स गिल्ड के मुखिया गुप्ता जी हैं। गुप्ता जी उन बातों को गुप्त ही रखते हैं, जिनसे ममता और राहुल जैसे नेताओं की छवि को चोट पहुँचे।

आइए सबसे पहले जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में ऐसा हुआ क्या, जिसके कारण एडिटर्स गिल्ड की आलोचना की जानी चाहिए। पश्चिम बंगाल स्थित आसनसोल में सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों पर हमले किए। लाठी-डंडों से लैस तृणमूल के गुंडों ने सजीव और निर्जीव वस्तुओं के बीच फ़र्क़ को नज़रअंदाज़ करते हुए गाड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और रास्ते में आए लोगों की पिटाई की। इसी जद में रिपब्लिक टीवी के पत्रकार भी आ गए। क्या महिला और क्या पुरुष, तृणमूल के गुंडों ने कोई फ़र्क़ नहीं किया। इतना ही नहीं, सरकार द्वारा पोषित गुंडों ने वहाँ चुनाव कवर कर रहे पत्रकारों को खदेड़ दिया और कैमरामैन से लेकर क्रू में शामिल अन्य लोगों पर भी हमले किए।

बंगाल में हिंसा को लेकर न सिर्फ़ एडिटर्स गिल्ड बल्कि बुद्धिजीवियों के हर खेमे में चुप्पी है। भाजपा और संघ कार्यकर्ता केरल और बंगाल में मरने के लिए ही होता है, ऐसा मानकर चलने वाले बुद्धिजीवियों के समूह को उस वक़्त गहरा धक्का लगता है जब अदालत की कार्यवाही को रिपोर्ट करने से हाईकोर्ट किसी पत्रकार को रोक देता है। इन्हें तब और ज्यादा गहरा धक्का लगता है जब किसी भाजपा शासित राज्य में किसी पत्रकार पर अन्य कारणों से एकाध हज़ार का अर्थदंड लगाया जाता है। लेकिन, जब कर्नाटक में एक-एक कर पत्रकारों को गिरफ़्तार किया जाने लगता है तो फिर एडिटर्स गिल्ड उसी ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित हो जाता है, जिसमें नियम है कि भाजपा-विरोधी शासित राज्यों में पत्रकारों पर ज़ुल्म भी हो तो उस पर कुछ नहीं बोलना है और भाजपा शासित राज्य में किसी पत्रकार की सीढ़ियों से गिरकर ऊँगली में चोट भी लगती है तो एक ‘Condemnation Letter’ जारी कर दिया जाता है।

इस ‘गुप्त’ या ‘गुप्ता’ रोग की कुछ विशेषताएँ हैं। इसमें न सिर्फ़ बंगाल में पत्रकारों की पिटाई को लेकर आँख-नाक-कान बंद रखना होता है बल्कि विरोध प्रदर्शन करने उतरे सैंकड़ों पत्रकारों की आवाज़ को भी बड़ी चालाकी से नज़रअंदाज़ कर देना होता है। पिछले वर्ष बंगाल में हुए पंचायत चुनावों के दौरान भी पत्रकारों पर कम अत्याचार नहीं किए गए थे। लेकिन, एडिटर्स गिल्ड ने लोकसभा चुनाव से पहले बंगाल सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर कोई अपील नहीं की। अगर एडिटर्स गिल्ड चाहता तो पिछले चुनावों से सबक लेते हुए पहले से ही आवाज़ उठा सकता था ताकि इस चुनाव में तृणमूल और वाम के गुंडें ऐसा न करें, लेकिन अफ़सोस यह कि पत्रकारों का हितैषी होने का दावा करने वाले एडिटर्स गिल्ड ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

एडिटर्स गिल्ड अटॉर्नी जनरल द्वारा ‘द हिन्दू’ जैसे शक्तिशाली अख़बार की आलोचना करने पर उसके साथ खड़ा होकर अटॉर्नी जनरल के बयान की निंदा करता है लेकिन प्रेस और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सैंकड़ों पत्रकार, कैमरामैन और टेक्निकल स्टाफ जब कोलकाता की सड़कों पर उतर अपने ख़िलाफ़ हो रही हिंसा का विरोध प्रदर्शन करते हैं, तब इस गिरोह के कानों में जूँ तक नहीं रेंगती। अगर आप एडिटर्स गिल्ड के ट्विटर पेज की पड़ताल करेंगे तो पाएँगे कि वहाँ केवल न्यूज़लॉन्ड्री और ‘द प्रिंट’ जैसे ख़ास मीडिया पोर्टल्स के लिंक्स शेयर किए जा रहे हैं और उनका पिछला बयान 7 मार्च को आया था, जो मेघालय हाई कोर्ट के निर्णय को लेकर था। उससे पहले उन्होंने उन पत्रकारों के बचाव में बयान दिया था, जो पहले से ही वीआईपी स्टेटस रखते हैं।

अगर राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त जैसे हाई प्रोफाइल, सक्षम, अमीर और पाँच सितारा पत्रकारों को कोई ट्विटर पर ‘रे’ भी बोल दे तो एडिटर्स गिल्ड इस चीज की निंदा में खड़ा होने में देर नहीं लगाता लेकिन जो निचले स्तर के पत्रकार हैं, ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं या गिरोह विशेष के ‘दुश्मन’ चैनलों में काम कर रहे हैं, अगर उन्हें बंगाल में नंगा कर के भी घुमाया जाता है तो एडिटर्स गिल्ड तो छोड़िए, गुप्ताजी या उनके किसी भी साथी की तरफ से चूँ की आवाज़ भी नहीं आती। ‘द प्रिंट’ की पत्रकार को इंटरव्यू के दौरान चिदंबरम खुली धमकी देते हैं लेकिन ‘अपने’ अगर बेइज्जत भी करते हैं तो चलेगा क्योंकि ‘अपने तो अपने होते हैं।’ यहाँ तक कि गुप्ताजी की अपनी वेबसाइट ‘द प्रिंट’ भी इसी ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित है जिसमें बंगाल से जुड़ी ऐसी ख़बरों को प्राथमिकता नहीं दी जाती क्योंकि इससे ‘अपनों’ के ख़फ़ा होने का ख़तरा है।

सब कुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है लेकिन मीडिया में इसे लेकर शांति है। बंगाल में तृणमूल और केरल में वाम द्वारा संचालित हिंसा राजनीतिक हिंसा है, जिसमें दोनों पक्षों की ग़लती होती है जबकि अगर कोई पेशेवर अपराधी किसी पत्रकार की व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण हत्या कर दे तो इसमें अपराधियों के तार भाजपा से जबरन जोड़ने की कोशिश की जाती है। आम लोगों पर हो रही हिंसा को गिरोह विशेष नज़रअंदाज़ करता है और अपने पेशे के लोगों पर हो रहे अत्याचार को भी छिपाता है। एडिटर्स गिल्ड को पता है कि किस मामले को उठाकर उसे बड़ा बना देना है और किस मामले को जनता तक पहुँचने से रोकना है। उसे पता है कि ‘अपनों’ को फ़ायदा कैसे पहुँचे और यह भी ध्यान रखना है कि उन्हीं ‘अपनों’ को नुकसान न हो। बाकि जो ‘दुश्मन’ हैं, उन्हें नुकसान पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़नी है।

ये हिन्दू ‘बनने’ का मौसम आ गया है, हिन्दू-विरोध पर आधारित था नेहरूवादी सेक्युलरिज्म: जेटली

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने विपक्षी पार्टियों में स्वयं को हिन्दू दिखाने के लिए लगी होड़ पर कटाक्ष करते हुए अपने फेसबुक ब्लॉग पर लिखा कि अब तो सबके हिन्दू ‘बनने’ का मौसम आ गया है। उन्होंने कल शाम लिखी इस पोस्ट में नेहरूवादी सेक्युलरिज्म, उसमें छिपे हिन्दू धर्म के लिए तिरस्कार को भी रेखांकित किया। जेटली ने उन दिनों को भी याद किया जब “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं” के नारे वाले स्टीकरों को विश्व हिन्दू परिषद ने प्रारंभ किया था, और भाजपा समेत चुनिन्दा संगठनों ने उसे उठाया और उसके लिए समाज की मुख्यधारा से तिरष्कृत भी हुए।

‘हिन्दू धर्म को पिछड़ा मानने पर आधारित है नेहरूवादी सेक्युलरिज्म’

जेटली ने भारत में मुख्यधारा के (छद्म) सेक्युलरिज्म को हिन्दू धर्म/हिंदुत्व के विरोध पर आधारित बताते हुए लिखा कि इसके जनक  नेहरू का मानना था कि हिंदुत्व पिछड़ा, कट्टरपंथी और दकियानूसी/अन्धाकरवादी है। वह इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में रुकावट मानते थे।

जेटली ने इस सैद्धांतिक हिन्दूफोबिया पर आधारित सेक्युलरिज्म के निर्वाचन में प्रतिबिंबित होने की प्रक्रिया का भी सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। बकौल जेटली, बहुपक्षीय निर्वाचन वाली राजनीतिक प्रणाली का फायदा उठाते हुए कॉन्ग्रेस समेत कई दलों ने हिन्दू समाज को खंडित कर समुदाय विशेष और एक किसी जाति को अपना वोट बैंक बना कर रखा। समुदाय विशेष को डराने और उनका ध्रुवीकरण करने के लिए हिन्दू एकता के खिलाफ एक हौव्वा खड़ा करने की कोशिश की

उन्होंने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि इस गोलबंदी को तोड़ने वाली पहली आवाज 1980 और 1990 के दशक में श्री लालकृष्ण आडवाणी की थी। उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि हालाँकि मज़हबी या पंथिक आग्रह भारत के राष्ट्र-राज्य का आधार नहीं हो सकते, पर सेक्युलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं को निशाने पर भी नहीं लिया जा सकता है। उनकी आधुनिक भाषा ने एक बड़ी आबादी को आकर्षित करना शुरू किया (जोकि पहले संघ परिवार-भाजपा/जनसंघ को बूढ़े/दकियानूसी लोगों का गुट मानती थी)। बहुसंख्यक समुदाय हालाँकि अभी भी सहिष्णु और उदार था पर आडवाणी के आह्वाहन पर अनवरत क्षमायाचना की मुद्रा से बाहर आने लगा था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कैसे राजीव गाँधी का शाहबानो मामले में कथित अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए हर हद पार कर देना और मनमोहन सिंह का ‘अल्पसंख्यकों’ को देश के संसाधनों का पहला हकदार बताना कॉन्ग्रेस द्वारा हिन्दुओं में जागृत हो रही इस चेतना को नज़रंदाज़ करने को ही दिखाता है।

‘मध्य वर्ग की आकंक्षाओं में भी है हिंदुत्व’

जेटली ने हिंदुस्तान की बदलती हुई सामाजिक-आर्थिक स्थिति का ज़िक्र करते हुए इसे मध्यम वर्ग को एकत्रित और विस्तृत करने वाला बताया। उन्होंने इसे आकांक्षी, बिना कट्टरपंथी आग्रहों के धार्मिक और राष्ट्रीय सुरक्षा में दिलचस्पी लेने वाला बताया। वह सेक्युलरिज्म की परिभाषा में बहुसंख्यकों पर दुराग्रही हमला स्वीकार नहीं करेगा। उनकी राय 370, आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बहुत स्पष्ट और पुख्ता है। उन्होंने सबरीमाला और राम मंदिर के मुद्दों पर मध्यम वर्ग की क्रुद्ध प्रतिक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे आजतक हिन्दुओं को गलियाँ दे-देकर ही अपनी दुकानें चलाने वालों की ‘प्रतिक्रिया’ को लेकर चिंतित कर दिया है।

‘राहुल गाँधी: जेएनयू वालों की तरफदारी से जनेऊ-धारी तक का सफ़र’

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का उदाहरण देते हुए जेटली ने कटाक्ष किया कि 2004, 2009, 2014 के चुनावों में अपना पंथिक आग्रह छिपा कर बैठे राहुल गाँधी कैसे अचानक से “जनेऊ-धारी ब्राह्मण” बन बैठे, और मंदिरों के चुनावी चक्कर लगाने प्रारंभ कर दिए।

उन्हें घेरते हुए जेटली ने पूछा कि उनका महबूबा मुफ़्ती-उमर अब्दुल्ला के अप्रत्यक्ष अलगावादी सुरों पर क्या रुख है? अयोध्या और सबरीमाला के मुद्दे पर उनकी राय स्पष्ट करने की चुनौती जेटली ने राहुल गाँधी को दी। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी लपेटते हुए जेटली ने लिखा कि राहुल गाँधी अफस्पा हटाना और सेना की ताकत को कमजोर करना चाहते हैं। जेटली ने यह भी याद दिलाया कि राहुल गाँधी ने जेएनयू काण्ड के अभियुक्तों के समर्थन में विश्वविद्यालय का दौरा किया था और आजतक अपने वहाँ जाने को लेकर कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है।

‘दिग्विजय सिंह: हिन्दू आतंकवाद के पेटेंट-धारी बने गर्वित हिन्दू’

कॉन्ग्रेस के ही दूसरे नेता दिग्विजय सिंह, जिन्हें राहुल गाँधी का पहला राजनीतिक शिक्षक माना जाता है, को भी जेटली ने नहीं बख्शा। जेटली के बाटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी बताने वाले बयान और आजमगढ़ जाकर मारे गए आतकंवादियों के परिजनों से मिलने को याद दिलाते हुए जेटली ने कटाक्ष किया कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ सिद्धांत का दिग्विजय सिंह के पास पेटेंट है, क्योंकि इसका पहला उपयोग उन्होंने ही किया था। जेटली ने आगे लिखा कि आज राजनीतिक मजबूरियों के चलते दिग्विजय ‘गर्वित हिन्दू’ हो गए हैं।

आम आदमी पार्टी

अरविन्द केजरीवाल की ‘आप’ पर प्रहार करते हुए जेएनयू मामले में उनकी भूमिका भी याद दिलाई। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे न केवल देश-विरोधी नारे लगाने वालों का नैतिक और राजनीतिक समर्थन किया गया, बल्कि आम आदमी पार्टी के नियंत्रण वाले दिल्ली सचिवालय ने दिल्ली पुलिस को आरोपियों पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने वाली फाइल दबा कर रखी। जेटली ने आरोप लगाया कि आप का दिल जिहादियों को दिया हुआ है।

उन्होंने आप की पूर्वी दिल्ली प्रत्याशी आतिशी ( सिंह/मार्लेना) का भी जिक्र करते हुए उनके जीवन-भर अपनी मार्क्सवादी-वामपंथी पृष्ठभूमि को उभारने और अब चुनाव के लिए ‘क्षत्राणी/राजपूतानी’ बन जाने को दोहरे मानदंडों का चरम बताया।

‘नव-परिवर्तितों के लिए बड़ी सुविधा का मौसम हैं निर्वाचन’

हिंदुस्तान की अधिकांश आबादी को राष्ट्रभक्त और इससे इत्तेफाक न रखने वालों को हाशिए पर पड़े अपवाद बताते हुए जेटली ने इस बात कर अफ़सोस जाहिर किया कि हाशिए पर पड़े इन अपवादों को मीडिया और सोशल मीडिया उनकी वस्तुस्थिति से कहीं अधिक तवज्जो दे उनके शोर को विस्तार दे रहा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसे लोग मीडिया और सोशल मीडिया पर चाहे जितनी हाइप पा लें, निर्वाचन में जनता उन्हें नकार देगी- यही लोकतंत्र की ताकत है। अंतिम वाक्य में उन्होंने निर्वाचन-काल को नए-नए ‘परिवर्तित’ हुए लोगों के परिवर्तन के लिए सबसे अनुकूल मौसम बताया।

‘हाँ, मै भी चौकीदार हूँ’ वायरल रैप सॉन्ग ने खोली कॉन्ग्रेस के झूठों की पोल, देखें वीडियो

राहुल गाँधी का जब हर झूठ बेनकाब होने लगा तो उन्होंने मोदी के ‘चौकीदार’ शब्द को पकड़ लिया। और, कह डाला कि “चौकीदार चोर है”, फिर से कॉन्ग्रेसियों और उनके पक्षकारों ने उनको यह फील करवा दिया कि मोदी जो अपनी सभाओं में ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगवाता है, यह उसी की काट है। बस इसी नारे की खुमारी में चुनाव की नैया पार हो जाएगी।

फिर क्या था राहुल गाँधी अपनी हर सभा में ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगवाने लगे। इससे एकबारगी बीजेपी समर्थक भी कुछ परेशान हुए कि यह कैसा ढीठ इंसान हैं, जो एक झूठ को नारे की तरह प्रयोग कर रहा है।

तब हर बार की तरह कमान फिर से मोदी जी ने संभाली और उन्होंने “मैं भी चौकीदार’ अभियान शुरू कर दिया। उनके देखा-देखी, मोदी समर्थकों, सरकार के मंत्रियों ने भी इसमें सक्रियता से भाग लेना शुरू कर दिया। और कमाल तो तब हो गया जब पीएम, भाजपा अध्यक्ष, गृह मंत्री, सरकार के अन्य वरिष्ठ मंत्री, भाजपा के शीर्ष पदाधिकारियों, और सोशल मीडिया पर पार्टी के समर्थकों ने अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ जोड़ लिया।

यहाँ तक की राहुल ने इस नारे में सुप्रीम कोर्ट को भी शामिल करना चाहा। इसके लिए भी उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा और कोर्ट से माँफी माँगनी पड़ी। कॉन्ग्रेस का यह वार भी नाकाम हुआ। खिसियाई कॉन्ग्रेस और उसके समर्थक भौचक्के रह गए। उनके पक्षकार जगह-जगह चौकीदारों के बाईट ले, इसकी काट ढूँढने लगे लेकिन कुछ काम नहीं आया। ‘मैं भी चौकीदार’ के शोर ने कॉन्ग्रेस और उनके पक्षकारों की एलिटिस्ट मानसिकता को बेनकाब कर दिया।

अब तो कॉन्ग्रेस को जवाब देने के लिए ऐसे कई यूजर जनरेटेड वीडियो आ चुके हैं। जिसमें देश के युवाओं ने खुद कमान संभल ली है, जो कॉन्ग्रेस को उसी की भाषा में करारा जवाब दे रहे हैं। कॉन्ग्रेस की स्थिति अब खिसियाई बिल्ली खम्भा नोचे वाली हो गई है। आप भी देखिए देश कैसे जवाब दे रहा है।