Home Blog Page 723

जियाउल हक़ ने मजहब छिपा कर हिन्दू लड़की को फाँसा, नशीला पदार्थ खिला बेहोश कर के किया बलात्कार: इस्लाम कबूलने के लिए धमकी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ‘लव जिहाद’ का मामला सामने आया है। यहाँ बुधवार (14 अगस्त, 2024) को एक मुस्लिम युवक पर मज़हब छिपा कर हिन्दू महिला से रेप करने और बाद में अश्लील वीडियो दिखा कर ब्लैकमेल करने की शिकायत दर्ज हुई है। आरोपित का नाम जियाउल हक उर्फ़ जिया है। जिया ने पीड़िता पर इस्लाम कबूल कर के खुद से निकाह का भी दबाव बनाया। मना करने पर पीड़िता की पिटाई भी हुई। जियाउल हक ने पीड़िता के अलावा कुछ अन्य हिन्दुओं को भी इसी तरफ से रेप कर के ब्लैकमेल किया है। मंगलवार (20 अगस्त, 2024) को पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

यह मामला मध्य लखनऊ के थाना क्षेत्र महानगर का है। यहाँ 14 अगस्त को हिन्दू महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में पीड़िता ने बताया है कि वह मुस्लिम समुदाय के एक डॉक्टर के यहाँ घेरलू काम करती है। इसी घर के पास मूल रूप से बाराबंकी जिले के रहने वाला ड्राइवर जियाउल हक रहता था। जियाउल हक ने खुद को हिन्दू बता कर पीड़िता से दोस्ती कर लिया। एक दिन जियाउल पीड़िता को होटल में चाय-पानी करवाने के बहाने ले गया। यहाँ उसने पीडिता को नशीला पदार्थ दे कर बेहोश कर दिया और फिर उसके साथ रेप किया।

आरोप है कि रेप के दौरान जियाउल हक ने पीड़िता की अश्लील फोटो और वीडियो बना लीं। इन्हीं तस्वीरों को वायरल करने का डर दिखा कर जिया पीड़िता से कई बार अलग-अलग जगहों पर रेप किया। कुछ दिनों बाद आरोपित ने वीडियो डिलीट करने के नाम पर पीड़िता से 1 लाख रुपए माँगे। पीड़िता ने जैसे-तैसे कर के थोड़े-बहुत पैसे जियाउल हक को दे भी दिए। पैसे लेने के बावजूद आरोपित ने पीड़िता के अश्लील फोटो और वीडियो उसके कुछ रिश्तेदारों को भेज दिए। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।

आरोप है कि कुछ दिनों बाद बाद जियाउल पीड़िता पर इस्लाम कबूल कर के खुद से निकाह करने का दबाव बनाने लगा। इस से परेशान हो कर पीड़िता ने आरोपित का नंबर ब्लॉक कर दिया। नंबर ब्लॉक होने के बाद भी जियाउल अलग-अलग नम्बरों से फोन और मैसेज कर के पीड़िता को परेशान करने लगा। जब पीड़िता ने वो नंबर भी ब्लॉक कर दिए तो जिया आते-जाते रास्ते में छेड़खानी करने लगा। एक दिन उसने पीड़िता को रोक कर कहा, “अगर मुझ से शादी नहीं करोगी तो तुम्हारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। अब धमकी नहीं दूँगा। ये सब कर के दिखाऊँगा।”

जियाउल की धमकियों से पीड़िता ने खुद को बेहद डिप्रेशन में बताया। उसने अपनी जान-माल के खतरे की भी आशंका जताई है। शिकायत में OBC वर्ग की एक अन्य हिन्दू का नाम लिखते हुए दावा किया गया है कि जियाउल हक ने उसे भी इसी तरह से प्रताड़ित किया था। पुलिस ने जियाउल हक उर्फ़ जिया पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115 (2), 123, 308 (2), 352, 351 (2), 126 (2), 77 और 64 के साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म सम्परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत FIR दर्ज की है।

मंगलवार को पुलिस ने जियाउल को गिरफ्तार कर लिया। मामले में जाँच व अन्य कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

बिल्ली छींका फोड़े तो मोदी दोषी, लेकिन ममता बनर्जी को ‘विलेन’ मत बनाओ… YouTuber के लिए क्रूर रेप-हत्या ‘छोटी घटना’, रिहाना-पन्नू नहीं बोले इसीलिए बता रहा ‘बाहरी हाथ’

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में शुक्रवार (9 अगस्त, 2024) की रात एक महिला डॉक्टर के बलात्कार और क्रूर हत्या एक ‘छोटी घटना’ थी। जी हाँ, आपने बिलकुल ठीक पढ़ा है। वो DDLJ का डायलॉग अपने सुना होगा – “बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं।” गला दबाना, प्राइवेट पार्ट्स में जख्म देना, नाक से लेकर आँख तक से खून बहाना, हड्डियाँ तोड़ डालना – ये सब तो ‘छोटी बातें’ ही हैं न?

जिस कॉलेज में वो पढ़ने गई थी, जिस अस्पताल में उसे अपनी हुनर और प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका मिला था, उसी कॉलेज, उसी अस्पताल की दीवारों से टकरा-टकरा कर उसका सिर फोड़ दिया गया। छोड़िए, ‘छोटी घटना’ है। परिवार को फोन कर के कहा जाता है कि उसकी बेटी बीमार है, फिर उन्हें अस्पताल बुलाया जाता है और कहा जाता है कि आपकी बेटी ने आत्महत्या कर ली है। माँ वहाँ अस्पताल के प्रशासकों के पाँव पर गिर-गिर कर अपनी बेटी की एक झलक देखने की विनती करती रहती हैं।

कोलकाता के RG Kar मेडिकल कॉलेज रेप-हत्या में लीपापोती

आखिरकार उन्हें जब अपनी बेटी को देखना का मिलता रहता है और वो उसे उस अवस्था में देखती हैं, जिसमें कोई अपने दुश्मन को भी देख कर काँप जाए जबकि ये तो उनकी अपनी थी। पाँव 90 डिग्री पर मुड़े हुए और शरीर के कई हिस्सों से खून आता हुआ। कोई अनाड़ी भी देख कर समझ जाए कि बलात्कार और हत्या है ये। फिर जल्दबाज़ी में लड़की का अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। कोलकाता पुलिस सिर्फ एक शख्स को गिरफ्तार कर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करती है, फिर मामला CBI के पास जाता है।

देश भर के डॉक्टर विरोध प्रदर्शन करते हैं, पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य सेवाएँ ठप्प हो जाती हैं। TMC नेता अरूप चक्रवर्ती कहते हैं कि डॉक्टरों को लोग पीटेंगे तो कोई बचाने नहीं आएगा। पार्टी के एक अन्य नेता उदयन गुहा कहते हैं कि CM की तरफ उठने वाली उँगलियों को तोड़ डाला जाएगा। सीएम ममता बनर्जी, जो कि राज्य की गृह और स्वास्थ्य मंत्री भी हैं, एक रैली निकाल कर न्याय की माँग करती हैं। वही ममता बनर्जी, जिनके शासनकाल में हुई इस घटना के बाद पुलिस क्राइम सीन को सुरक्षित रखने में भी विफल हो जाती है।

अचानक से वहाँ कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर दिया जाता है। आधी रात के समय अचानक से गुंडों की एक भीड़ अस्पताल में घुस कर प्रदर्शनकारी डॉक्टरों को पीटती है और घटनास्थल पर तोड़फोड़ मचाती है। सांसद सागरिका घोष और महुआ मोइत्रा CBI को गाली देकर इतिश्री कर लेती हैं। जिस पश्चिम बंगाल में विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ताओं की हत्या होती है, वहाँ किनके गुंडों ने ये सब किया होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है। हमने संदेशखली में शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गों द्वारा जनजातीय समाज की महिलाओं का यौन शोषण और चोपरा में ताजेमुल की शरिया अदालत में महिलाओं को बाँध कर पीटे जाते हुए देखा है।

इन सभी घटनाओं के बीच कोलकाता पुलिस क्या कर रही होती है? कोलकाता पुलिस चुन-चुन कर उन सभी को नोटिस भेज रही होती है, जिन्होंने भी इस घटना में न्याय की आवाज़ उठाई। ये नया नहीं है, संदेशखली वाली घटना की रिपोर्टिंग के समय भी ‘रिपब्लिक’ मीडिया संस्थान के पत्रकार को गिरफ्तार किया गया था। न किसी ने ममता बनर्जी को तानाशाह कहा, न उनकी तुलना हिटलर से की, न कोई अभिव्यक्ति की आज़ादी का झंडा लेकर पश्चिम बंगाल गया।

सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल का ‘झूठ’, 2001 से ही संदिग्ध मौतें

इस ‘छोटी घटना’ के बारे में जितनी बात करें उतना कम है। आपको दिसंबर 2012 में दिल्ली में ‘निर्भया’ की बस में गैंगरेप और हत्या की खबर के बारे में पता होगा। उस घटना के बाद सरकार को कानून में संशोधन करना पड़ा था। तब भी देश भर में कैंडल मार्च से लेकर अन्य तरह के विरोध प्रदर्शन तक हुए थे। ‘निर्भया’ की माँ, जिन्होंने न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, वो भी कह रही हैं कि ममता बनर्जी विफल हो गई हैं। एकाध अपवाद वाली घटनाओं को लेकर भारत को ‘लिंचीस्तान’ कहने वाले लोग पश्चिम बंगाल की घटना को लेकर मुँह में दही जमा कर चुप हैं।

जब सुप्रीम कोर्ट में मामला जाता है तो कपिल सिब्बल वहाँ झूठ बोल कर TMC सरकार को बचाने की कोशिश करते हैं। वहीं कपिल सिब्बल जो सपा के राज्यसभा सांसद भी हैं और सपा उस I.N.D.I. गठबंधन का हिस्सा है जो बात-बात में महिला अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करता है। CJI डीवाई चंद्रचूड़ अब उनसे पूछते हैं कि जब गुंडे अस्पताल में घुसे थे तब पुलिस कहा थी, तो वो जवाब नहीं दे पाते। हत्या की FIR दर्ज करने में देरी क्यों हुई, मुख्य न्यायाधीश के इस सवाल का भी उनके पास कोई जवाब नहीं होता।

असल में इस ‘छोटी घटना’ के पीछे 2001 से लेकर अब तक का पूरा इतिहास है। तब अगस्त में सौमित्र बिस्वास अपने कमरे में फंदे पर लटके हुए मिले थे। फरवरी 2003 में अरिजीत दत्ता की मौत को आत्महत्या बताया गया। फरवरी 2003 में प्रवीण गुप्ता ने आत्महत्या की कोशिश की। अक्टूबर 2016 में प्रोफेसर गौतम पाल का सड़ा-गला शरीर उनके फ़्लैट से मिला। 2020 में पॉलोमी साहा के बारे में बताया गया कि उन्होंने छठी मंजिल से कूद कर आत्महत्या की है। ये सारी घटनाएँ इसी कॉलेज से जुड़ी हैं।

आपको हाथरस की घटना याद है? TMC के नेता सितंबर 2020 में हुई इस घटना के बाद भागते-भागते हाथरस पहुँचे थे, पूरे देश का मीडिया वहाँ जमा था। बाद में अदालत ने कहा कि इसमें गैंगरेप का कोई सबूत नहीं है। फिर भी ये एक दुःखद घटना थी। लेकिन, अब यही टीएमसी के नेता अपने राज्य में हुई घटना को लेकर आवाज़ क्यों नहीं उठा रहे? अब TMC का आरोप है कि भाजपा और लेफ्ट मिल कर भ्रम फैला रहा है, तो क्या पीड़िता का परिजन भी भ्रम फैला रहे हैं क्योंकि पिता ने कहा कि हड़बड़ी में अंतिम संस्कार किया गया।

हाथरस से लेकर कोलकाता के बीच 4 साल बीत गया, नहीं बीता तो कुछ राजनीतिक दलों का अपने शासन वाले राज्य में होने वाले अपराधों को छिपाना और भाजपा शासित राज्यों में अपवाद वाली घटनाओं में भी अपना एजेंडा देख कर बातें करना। एक YouTuber है श्याम मीरा सिंह नाम का। कहता है ममता बनर्जी सरकार ने तो कुछ ज़्यादा ही कार्रवाई कर दी इस मामले में, और माहौल ऐसा बनाया गया जैसे ‘कुछ बड़ा घटा हो’ और पश्चिम बंगाल में कुछ गलत हो रहा हो।

श्याम मीरा सिंह कहता है – ये ‘छोटी बात’, विरोध प्रदर्शन ‘पेड’

उसे गर्व है इस पर कि उसने मृतका के परिवार को न्याय दिलाने के लिए आवाज़ उठाते हुए वीडियो नहीं बनाया, उसने धिक्कारा है ध्रुव राठी जैसे अपने गिरोह के लोगों को जिन्होंने जनता के दबाव में वीडियो बना दिया। वो भी ध्रुव राठी ने वीडियो क्या बनाया था, उसने तो अन्य राज्यों की घटनाएँ गिना कर ये बताने की चेष्टा की थी कि पश्चिम बंगाल की घटना को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। श्याम मीरा सिंह के अनुसार, बलात्कार-हत्या की घटना को लेकर आवाज़ उठाने का अर्थ है भाजपा के जाल में फँसना।

श्याम मीरा सिंह का कहना है कि कोलकाता की इस जघन्य वारदात पर जो भी टीवी शो बने, YouTube वीडियो बने या फिर ‘X’ पर पोस्ट हुए, वो सब भाजपा की तरफ से पेड थे। क्या दिल्ली में ‘निर्भया’ और यूपी में हाथरस वाली घटना के समय भी जो हुआ सब पेड था? ये सब तो उस समय भी हुआ था। अबकी तो खुलेआम लीपापोती की कोशिश हो रही है, घटना वीभत्स भी है। श्याम मीरा सिंह का कहना है कि ममता बनर्जी को विलेन बनाया गया। यही गिरोह जब थप्पड़ मारने की किसी घटना को सीधे मोदी से जोड़ कर प्रधानमंत्री का इस्तीफा माँगता है, तब किसे विलेन बना रहा होता है?

इसका ये भी मानना है कि लेफ्ट का एक धड़ा भी इसका शिकार बन गया क्योंकि उसने वीडियो बनाए। भाई, वो वीडियो TMC सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से बचाने के लिए ही बने थे। अगर किसी ने कह ही दिया कि बलात्कार पीड़िता के परिवार को न्याय दो, तो क्या ये प्रोपेगंडा हो गया? श्याम मीरा सिंह कह रहा कि दबाव में वीडियो बनाए गए, जबकि इसमें 95% फेक न्यूज़ थे। क्या था फेक न्यूज़? बलात्कार, हत्या, नग्न लाश, टूटी हड्डियाँ, आँख-नाक से बहता खून, हड़बड़ी में अंतिम संस्कार, प्रिंसिपल का तुरंत स्थानांतरण, FIR में देरी, गुंडों का अस्पताल में घुसना – इनमें से क्या था फेक न्यूज़?

ऐसा लग रहा जैसे बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ भड़की हिंसा वाली स्क्रिप्ट को इसने इस मामले में भी घुसा दिया है। इसका कहना है कि इंस्टाग्राम पर पोस्ट आते थे, फिर उन्हें स्टोरी में लगा लिया जाता था। ऐसा ही तो होता है? गाज़ा में हमले को लेकर ‘All Eyes On Rafah’ वाला स्टेटस को इजरायल के खिलाफ सारी सेलेब्रिटियों ने लगाया था और सेम ही स्टोरी थी सबकी। सबको पता है कि CBI हफ्ता भर में जाँच की रिपोर्ट नहीं देती, वो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के ढोल नहीं पीटती, उसका मुख्य लक्ष्य होता है अदालत में अपराधियों को सज़ा दिलाना।

इसीलिए, पश्चिम बंगाल पुलिस को बचाने के लिए CBI को गाली देने का ये नया तरीका ईजाद किया गया है क्योंकि इन्हें पता है कि बात-बात में सीबीआई प्रतिक्रिया देने नहीं आएगी। ड्रग्स से लेकर अश्लील फिल्मों तक की शूटिंग जैसी चर्चाओं को इसने बिना जाँच अफवाह और कृत्रिम करार दिया है। फिर 2001 से लेकर कोरोना काल तक हुईं संदिग्ध मौतों पर इसका क्या कहना है? और हाँ, ये चर्चाएँ डॉक्टर ही आपस में कर रहे हैं, आसमान से उड़ कर नहीं आ गईं ये बातें, वहीं रहने-पढ़ने-ड्यूटी करने वालों ने दबी जुबान से ये सब बताया है।

खुल के कैसे बोलें? जो प्रभावशाली लोग हैं सोशल मीडिया के उन्हें तक नोटिस भेज दिया जा रहा है, फिर ये लोग तो उसी राज्य में उसी पार्टी के शासनकाल में रहते हैं और उस स्थान से उनका दाना-पानी जुड़ा हुआ है। अभी जाँच के निष्कर्ष कहाँ हैं, अदालत में चार्जशीट कहाँ गई है जो श्याम मीरा सिंह कह रहा है कि सारी खबरें फर्जी निकलीं? क्या CBI ने इसका कान में कुछ बता दिया है चुपके से? और ये दुष्प्रचार फैलाने वाले ‘बाहरी हाथ’ कौन हैं? जॉर्ज सोरोस है, एमनेस्टी है, या फिर बीबीसी है?

श्याम मीरा सिंह के अनुसार, कोलकाता में बलात्कार-हत्या की घटना ‘बड़ी बात’ नहीं

‘किसान आंदोलन’ के दौरान कनाडा-अमेरिका से जो वीडियो आते थे वो अंदरूनी हाथ थे या बाहरी हाथ? श्याम मीरा सिंह समेत पूरा गिरोह उस दौरान समर्थन में था न। नूपुर शर्मा के खिलाफ ‘सर तन से जुदा’ गिरोह सक्रिय हुआ और क़तर से जो बयान आया था वो कौन सा हाथ था? रिहाना का ट्वीट भारत के किस गाँव से किया गया था? शाहीन बाग़ के समर्थन में उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे दंगाइयों के साथ कहाँ का हाथ था? निर्भया से लेकर हाथरस तक के दौरान हुए आंदोलनों में कहाँ के हाथ थे, श्याम मीरा सिंह को कुछ पता है तो बताए।

जब अपने मालिकों की सरकार में कोई जघन्य से जघन्य वारदात भी हो तो उसकी एक लाइन की खबर छापना भी ‘Conspiracy Theory’ हो जाती है लेकिन जो लोग ये कहते हैं कि CAA नागरिकता छीनने वाला कानून है – झूठे होने के बावजूद उनका समर्थन करना ‘Reality Theory’ है। यही है भारत के इस गिरोह की सच्चाई। श्याम मीरा सिंह इसी गिरोह का नया टुंटपुँजिया है। अभी बड़ा हो रहा है। टूलकिट पर चलने वाले अब भाजपा पर टूलकिट का आरोप लगा रहे हैं।

सिलाई सिखाने के बहाने धर्मांतरण रैकेट चला रही थी किरण राजपूत, जैकी पठान से निकाह कर बनी मुस्लिम: घर में हिन्दू लड़की को बंधक बना दानिश से करवाया रेप

मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले सोमवार (12 अगस्त, 2024) को एक हिन्दू लड़की को बंधक बना कर रेप करवाए जाने का मामला सामने आया था। यहाँ दानिश नाम के युवक पर हिन्दू लड़की से बलात्कार का आरोप लगा था। यह रेप जैकी पठान के मकान में बंधक बना कर हुआ था। इसी केस में जैकी पठान की बीवी किरण और उसके भाई निक्की पठान को भी नामजद किया गया था। अब किरण ने पुलिस की पूछताछ में नए खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि वो पहले हिन्दू थीं जो जैकी पठान से से निकाह के बाद मुस्लिम बन गई थी। इसके बाद किरण हिन्दू लड़कियों को ब्रेनवॉश करने में जुट गईं थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस की पूछताछ के बाद किरण राजपूत एक मास्टरमाइंड के तौर पर सामने आईं हैं। वो मूल रूप से महाराष्ट्र के मुंबई की रहने वाली हैं। 4 साल पहले सोशल मीडिया पर किरण की दोस्ती शाजापुर के जैकी पठान से हुई। गाड़ियाँ चलाने वाले जैकी पैठान पर डीजल चोरी का पहले से केस दर्ज है। कुछ दिनों बाद किरण राजपूत ने अपना घर छोड़ दिया और मुंबई से शाजापुर आ कर जैकी के साथ रहने लगीं। यहाँ पर उन्होंने अपने परिवार से रिश्ता खत्म कर के इस्लाम कबूल कर लिया। हालाँकि, किरण ने अपना नाम नहीं बदला।

शाजापुर में 28 वर्षीया किरण ने सिलाई सिखाने का काम शुरू कर दिया। सिलाई सीखने कई हिन्दू लड़कियाँ भी आने लगीं जिन्हें किरण इस्लाम की तारीफ सुनाया करती थीं। सिलाई सीखने पीड़िता की एक सहेली भी आया करती थी। पीड़िता की पढ़ाई छूट चुकी थी। वह भी अपनी सहेली के साथ किरण राजपूत के सिलाई सेंटर जाने लगी। यहीं पर पीड़िता का ब्रेनवॉश किया गया। कुछ दिनों बाद विश्वास में पूरी तरह से लेते हुए किरण ने पीड़िता की दोस्ती अपने देवर दानिश से करवाई। बाद में किरण ने पीड़िता और दानिश को अपने ही घर पर मिलवाना शुरू कर दिया।

बताया जा रहा है कि दानिश काफी पहले से ही पीड़िता से इंस्टाग्राम पर जुड़ा हुआ था। कुछ ही दिनों के बाद दानिश पीड़िता के घर के भी चक्कर लगाने लगा। इस से लड़की के घर वालों को शक हुआ। पीड़िता के पिता ने अपनी बेटी को डाँट लगाई। इस डाँट का असर पड़ा और लड़की ने दानिश से दूरी बना ली। लड़की को खुद से दूर होता देख 10 अगस्त को दानिश पीड़िता के घर पहुँच गया। यहाँ पीड़िता के पिता ने उसे डाँट कर भगा दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी को भी डाँटा।

इसी डाँट से नाराज हो कर लड़की किरण के घर चली गई। यहाँ पहले से शौहर जैकी और देवर निक्की मौजूद थे। इन सभी ने पीड़िता से हमदर्दी का झूठा नाटक किया और पीठ पीछे चुपके से दानिश को बुला लिया। इस बीच किरण राजपूत पीड़िता को ले कर एक कमरे में गई। वहाँ पीछे से दानिश को भी बुला लिया गया। बाद में किरण राजपूत, उनके शौहर जैकी और देवर निक्की की मिलीभगत से दानिश ने पीड़िता से रेप किया। कहीं मुँह खोलने पर पीड़िता के पूरे परिवार को खत्म करने की धमकी मिली।

पीड़िता को लम्बे समय से घर पर न पा कर उसके परिजन खोजबीन में जुट गए। इसी तलाश में वो किरण राजपूत के घर भी गए। आरोप है कि किरण राजपूत और उनके शौहर सहित देवर ने पीड़ित परिवार को मारा-पीटा। इसी बीच हिन्दू संगठन के सदस्य पुलिस के साथ पहुँच गए। आरोपितों ने पुलिस पर भी पत्थरबाजी की। आखिरकार पुलिस ने घर से पीड़िता को बरामद कर लिया। फ़िलहाल सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। हिन्दू संगठनों ने सभी आरोपितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की माँग की है।

मोहम्मद आलम ने बुक किया जो कमरा, उसमें मिली लड़की की क्षत-विक्षत लाश: गला रेत कर हत्या, शरीर के अन्य हिस्सों पर भी 5 बार चाकू से वार

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक लड़की की गला काट कर हत्या कर दी गई है। मंगलवार (20 अगस्त, 2024) को पीड़िता का क्षत-विक्षत शव एक होटल में मिला है। शरीर पर चाकुओं के कई घाव मौजूद थे। होटल का कमरा मोहम्मद आलम नाम के युवक की ID पर रविवार (18 अगस्त, 2024) से बुक था। मोहम्मद आलम सोमवार (19 अगस्त, 2024) से फरार है। आशंका जताई जा रही है कि उसी ने लड़की की हत्या की है। फ़िलहाल पुलिस मामले की जाँच और मोहम्मद आलम की तलाश कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना बरेली जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र की है। यहाँ रोडवेज इलाके के होटल ‘प्रीत पैलेस’ में रविवार (18 अगस्त, 2024) को मोहम्मद आलम नाम के युवक ने 20 वर्षीया लड़की के साथ कमरा बुक करवाया। 1 दिन बाद सोमवार को वह कमरे से बाहर जाता हुआ दिखाई दिया। होटल के स्टाफ ने सोचा कि लड़की कमरे में ही है। अगर आलम कहीं जा भी रहा होगा तो लौट कर आ जाएगा। यह अनुमान गलत साबित हुआ और मोहम्मद आलम 24 घंटे बाद तक नहीं लौटा।

मंगलवार को होटल के कमरे से बदबू आने लगी। किसी अनहोनी की आशंका के चलते होटल के मैनेजर ने पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर दरवाजा खुलवाया तो अंदर लड़की की लाश पड़ी मिली। लड़की की हत्या गर्दन काट कर दी गई थी। शरीर के कुछ अन्य हिस्सों पर भी पर चाकुओं के 5 वार थे। कमरे का पंखा और AC चल रहा था। एक कोने में पानी की बोतल पड़ी मिली है। पुलिस ने केस दर्ज कर के प्रथम दृष्टया मोहम्मद आलम को संदिग्ध मानते हुए जाँच शुरू कर दी।

पीड़िता की शिनाख्त के प्रयास किए जा रहे हैं। होटल स्टाफ से भी पूछताछ चल रही है। मोहम्मद आलम व लड़की द्वारा जमा किए गए पहचान पत्रों की भी सत्यता जाँची जा रही है। मौके पर फॉरेंसिक टीम को बुलाया गया। फॉरेंसिक टीम ने आशंका जताई है कि लड़की की हत्या या तो सोते हुए की गई है या बेहोश कर के। पुलिस को आशंका है कि मोहम्मद आलम पीडिता को कत्ल करने के ही मकसद से सोची-समझी साजिश बना कर कमरे में लाया था। वह मूलतः बरेली जिले के थाना क्षेत्र आजमनगर का रहने वाला है। पीड़िता के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।

जिस अब्दुल समद ने UP की महिला कॉन्स्टेबल को कुचला, उसकी अम्मी ने स्कूल में घुस बच्चियों पर बरसाए थे हंटर: नाना ने आतंकियों को इनाम का किया था ऐलान

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में बसपा सरकार के मंत्री रहे हाजी याकूब के नाती (बेटी के बेटे) ने बाइक से UP पुलिस की महिला कॉन्स्टेबल को कुचलने का प्रयास किया है। आरोपित का नाम अब्दुल समद उर्फ़ साद है। साद के साथ इस करतूत में मुस्लिम समुदाय का एक अन्य नाबालिग भी शामिल था। पुलिस ने FIR दर्ज कर के दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। घायल सिपाही का अस्पताल में इलाज चल रहा है। घटना रविवार (18 अगस्त 2024) की है।

यह घटना मेरठ के थाना क्षेत्र नौचंदी की है। यहाँ की SHO आदेश कौर ने सोमवार (19 अगस्त, 2024) को अपने थाने में केस दर्ज करवाया है। शिकायत में उन्होंने बताया कि रविवार की रात वो अपने थाने के कुछ अन्य पुलिसकर्मियों के साथ गश्त और वाहनों की चेकिंग कर रहीं थीं। रात लगभग 10:22 पर हापुड़ अड्डे की तरफ से एक काले रंग की BMW बाइक तेज रफ्तार में आती दिखी। इस बाइक पर 2 लड़के सवार थे। पुलिस ने इस बाइक को रुकने का इशारा किया। आरोप है कि रुकने के बजाय आरोपितों ने महिला कॉन्स्टेबल जौहरा परवीन को जान से मार डालने की नीयत से उन पर बाइक चढ़ा दी।

बाइक की जोरदार टक्कर से महिला सिपाही जमीन पर गिर पड़ीं। उनको काफी चोटें आईं। साथी पुलिसकर्मी घायल सिपाही को बचाने में जुट गए। तभी एक अन्य सिपाही देवपाल ने भागने की कोशिश कर रहे दोनों बाइक सवारों में से एक को दबोच लिया। यह आरोपित मुस्लिम समुदाय का एक नाबालिग निकला जिसे गिरफ्तार कर लिया गया। दूसरा आरोपित बाइक ले कर भाग निकला। पूछताछ में हिरासत में लिए गए आरोपित ने अपने साथी का नाम अब्दुल समद उर्फ़ साद बताया।

पूछताछ के आधार पर पुलिस ने आरोपित अब्दुल समद को भी दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया। इन दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109, 121 (1) और 132 के तहत कार्रवाई की गई है। दोनों आरोपितों को कानूनी प्रक्रियाओं के बाद अदालत में पेश किया गया है। घायल महिला सिपाही का इलाज अस्पताल में चल रहा है। उनके सिर और आँखों के पास चोटें आईं हैं। फ़िलहाल कॉन्स्टेबल की हालत खतरे से बाहर है। पुलिस मामले में जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई कर रही है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

अब्दुल की अम्मी भी हंटर से पीट चुकी है बच्चियों को

जिस अब्दुल समद के खिलाफ मेरठ पुलिस की महिला सिपाही को कुचलने का आरोप लगा है उसकी अम्मी आशमा भी लेडी डॉन के तौर पर चर्चित रह चुकी हैं। 10 जुलाई 2017 को उन पर मेरठ के सदर बाजार थाने में FIR दर्ज हुई थी। इस FIR में एक नाबालिग बच्ची के पिता ने बताया था कि उनकी बेटी को पीटने के लिए आशमा अपने लगभग आधे दर्जन साथियों के साथ स्कूल में घुस गईं थीं। तब आशमा के हाथों में हंटर था जिस से उन्होंने नाबालिग छात्राओं की पिटाई की थी।

पुलिस ने इस मामले में IPC की धारा 504, 506, 323 और 147 के तहत FIR दर्ज की थी। ऑपइंडिया के पास यह FIR कॉपी भी मौजूद है। इसके अलावा आशमा पर स्कूल प्रशासन ने भी इसी केस में एक अलग से FIR दर्ज करवाई थी। तब हाजी याकूब कुरैशी ने वीडियो फुटेज में दिख रही महिला को अपनी बेटी की हमशक्ल बता कर बचाने का प्रयास किया था।

कट्टरपंथी याकूब ने किया था सिर तन से जुदा का समर्थन

बताते चलें कि हाजी याकूब मूलतः माँस बेचने का कारोबार करते हैं। उनकी मीट फैक्ट्री चलती है। उसका मेरठ में एक अस्पताल भी चलता था। याकूब ने फ्रांसीसी मैगजीन शार्ली एब्दो के पेरिस स्थित दफ्तर पर हुए हमले को भी सही ठहराते हुए कहा था कि इस्लाम धर्म और पैगंबर की शान में गुस्ताखी किसी भी सूरत में माफ नहीं की जा सकती। इसके हमलावरों को भी याकूब कुरैशी ने 51 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी। योगी सरकार आने के बाद याकूब की बदजुबानी पर लगाम लगाया गई।

बुधवार (6 अप्रैल, 2022) को उसके अस्पताल को नियमों के विरुद्ध पाए जाने पर सील कर दिया गया था। इसी के साथ हाजी याकूब की मीट फैक्ट्री पर भी कार्रवाई की गई थी।

हिरोइनों के लिए नरक है फिल्म इंडस्ट्री, 15 मर्दों का ग्रुप ‘माफिया’ तय करता है सब कुछ: हेमा कमेटी की रिपोर्ट ने मलयालम सिनेमा को किया नंगा, चमक-दमक के पीछे यौन शोषण का अँधेरा

कास्टिंग काउच के मामलों से भरी पड़ी फिल्म इंडस्ट्री का काला सच क्या है ये कोई नहीं जानता। हम लोग मीडिया में आने वाली खबरों से केवल मामले का अंदाजा लगाते हैं लेकिन हकीकत उससे भी भयानक होती है। हाल में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के काले चेहरे को बयान करती हेमा कमेटी की रिपोर्ट पब्लिक हुई है। इस रिपोर्ट में सैंकड़ों महिला कर्मियों से बात की गई है जिन्होंने इसे बताया कि कैसे वो इस इंडस्ट्री का हिस्सा होते हुए यौन उत्पीड़न झेल रही हैं।

वैसे तो ये रिपोर्ट पाँच साल पहले ही केरल सरकार के पास पहुँच गई थी, लेकिन इसे सार्वजनिक अब किया गया है। कहा जा रहा है कि आरटीआई के दबाव में आकर केरल सरकार ने 295 पेजों की इस रिपोर्ट को जारी किया वो भी तब जब प्रारंभिक ड्रांफ्ट से 60 के आसपास पन्ने हटा दिए गए। ये रिपोर्ट न केवल फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं पर बीत रही आपबीती को बताती है बल्कि पुरुषों के उस समूह के राज भी खोलती है जिन्हें लेकर कहा जाता है कि वो ही इस इंडस्ट्री पर कब्जा किए हुए हैं।

आगे बढ़े उससे पहले जान लेते हैं कि हेमा कमेटी क्या है

दरअसल, साल 2017 में 14 फरवरी को मलयालम फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री अपनी कार से कोच्चि जा रही थीं, तभी उन्हें रास्ते में अगवा कर लिया गया और फिर उनका उन्हीं की कार में यौन उत्पीड़न हुआ। जानकारी जब खबरों में आई तो हर कोई सन्न रह गया। पुलिस ने उस समय तो आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया लेकिन इस घटना ने तमाम हिरोइनों की सुरक्षा पर सवाल उठा दिए। आंदोलन तेज होता गया।

जब दबाव सरकार पर पड़ा तो मजबूर होकर वारदात के पाँच महीने बाद जुलाई में केरल हाईकोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस हेमा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी गठित हुई। इसी कमेटी को जो टास्क दिया गया उसमें पूरी मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में महिला कलाकारों, सहयोगियों और अन्य स्टाफ की सेवा शर्तें, काम के बदले समुचित मेहनताना, शूटिंग स्थल पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजामात आदि को लेकर रिपोर्ट देना था।

आदेशानुसार, कमेटी ने सैकड़ों की संख्या में महिला कलाकारों, टेक्नीशियन्स तथा अन्य से बातचीत की। उनके बयान रिकॉर्ड किए और फिर 2019 के आखिर में अपनी रिपोर्ट ले जाकर सीएम विजयन को दी। कमेटी ने इस रिपोर्ट के साथ इस मामले में विस्तृत जाँच के लिए न्यायाधिकरण के गठन की सिफारिश भी की। हालाँकि केरल सीएम ने उस पर सुनवाई तो दूर… इस रिपोर्ट को ही पब्लिक नहीं होने दिया।

लोगों ने इस मुद्दे को बार-बार उठाया, मगर सरकार ने इसे सार्वजनिक करने से मना कर दिया। विधानसभा में बताया गया कि अगर ये रिपोर्ट सार्वजनिक हुई तो निजता का उल्लंघन होगा। बाद में पांच आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों ने केरल राज्य सूचना आयोग से संपर्क किया तो उसने 6 जुलाई 2024 को आदेश दिया कि आयोग के सामने गवाही देने वालों की निजता बरकरार रखते हुए रिपोर्ट को कंट्रोल रिलीज किया जाए।

क्या-क्या है हेमा कमेटी की रिपोर्ट में

आज ये रिपोर्ट सार्वजनिक है। इस पर तमाम खबरें प्रकाशित हैं। इन्हीं स्रोतों को आधार बनाकर यदि बताएँ तो इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे मलयालम इंडस्ट्री को पुरुषों का एक समूह नियंत्रित करता है। वहीं महिलाएँ यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं वो भी उन लोगों द्वारा जिनका इंडस्ट्री में अच्छा खासा नाम है।

इसके अलावा इसमें ये भी बताया गया है कि इंडस्ट्री में शुरुआत से ही उनके साथ शोषण शुरू हो जाता है। उन्हें कभी ‘अडजस्ट’ करने को कहा जाता है तो कभी ‘कॉम्प्रोमाइज’ करने को। जब महिलाएँ इसका विरोध करती हैं तो उन्हें टॉर्चर झेलना पड़ता है। कभी बेसिक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है तो कभी वेतन देने में भेदभाव किया जाता है।

कार्यस्थल पर उनके आगे नशे करना, दुर्व्यवहार करना, घटिया कमेंट करना भी रिपोर्ट पढ़कर सामान्य बातें लगती है। इसके अलावा कॉन्ट्रैक्ट में काम की जानकारी दिए बिन नग्न सीन कराने की शिकायत भी रिपोर्ट से पता चलती है।

जैसे, उदाहरण के लिए एक महिला एक्ट्रेस ने जानकारी दी कि उसे फिल्म के दौरान बताया ही नहीं गया था कि सीन के लिए कितना नग्न होना पड़ेगा। उसे बस कहा गया था कि उसमें उसकी बैक दिखाई जाएगी। हालाँकि बाद में जब सीन करना हुआ तो पता चला उसमें लिक-लॉक भी है और अन्य चीजें भी। एक्ट्रेस ने वो सीन करने से मना कर दिया और कहा कि उसे ये सब पहले नहीं बताया गया था।

इसी तरह एक मामले में तीन महीने की तैयारी की शूटिंग के बाद, एक निर्देशक ने अचानक एक अभिनेत्री को बताया कि उसे नग्न सीन करना होगा और लिप लॉक भी। महिला एक्ट्रेस ने मना किया बावजूद इसके उससे वो सीन कराया गया और अगले दिन बाथटब सीन के साथ अधिक रिवीलिंग सीन करने को कहा गया।

एक अन्य मामले में अभिनेत्री को एक शख्स के साथ सीन करने को मजबूर होना पड़ा जो पहले उसका शोषण कर चुका था। अभिनेत्री के चेहरे पर असहजता दिख रही थी लेकिन डायरेक्टर ने उससे वजह जानने की बजाय उसे सीन लेट करने के लिए फटकारा था।

इन सबके अलावा रिपोर्ट बताती है कि कैसे इंडस्ट्री में वेतन देते समय लिंग असमानता साफ झलकती है। बिन कॉन्ट्रैक्ट काम करवाया जाता है। वहीं जो कॉन्ट्रैक्ट साइन कराए जाते हैं उसमें अक्सर वेतन से जुड़ी बातें रेखांकित नहीं होतीं। बाद में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले उचित वेतन तक नहीं मिलता। इसी तरह केवल महिला कलाकार इस भेदभाव को नहीं झेलते बल्कि कलाकारों के साथ तकनीशियनों को भी ये झेलना पड़ता है। कॉन्ट्रैक्ट न होने के कारण न उनके काम के घंटे तय होते हैं और न ही सैलरी। रिपोर्ट में एक मामला पढ़ने को मिलता है जहाँ एक अभिनेत्री को 32 दिन की शूटिंग के लिए उसे केवल 8 हजार रुपए दिए गए थे। वहीं दूसरे मामले में, एक अभिनेत्री को 20 दिनों के काम के लिए 50,000 रुपए देने का वादा किया गया था, लेकिन उसे मिले सिर्फ 4000 रुपए ही थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जाँच के दौरान निर्देशकों, निर्माताओं और अभिनेताओं समेत 15 बड़े शॉट्स से जुड़े एक पुरुष समूह का पता चला है। उनके अनुसार इंडस्ट्री में यही पावर ग्रुप तय करता है कि इंडस्ट्री में किसे रहना चाहिए और किसे फिल्मों में काम देना चाहिए। रिपोर्ट में इन शक्तिशाली समूह को माफिया भी बताया गया है जो अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का करियर बर्बाद कर देते हैं।

ग्लैमर की दुनिया का सच

235 पन्नों की रिपोर्ट से ये कुछ बिंदु हैं जो अभी तक उभर कर सामने आए हैं। इसे देख भले ही मन में सवाल उठें कि आखिर एक इंडस्ट्री से इतनी घटनाएँ सामने आती हैं और कोई कुछ कहता कैसे नहीं, लेकिन हकीकत यह है कि ये समस्या सिर्फ मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की नहीं है। ये समस्या बॉलीवुड इंडस्ट्री में भी है और सामान्य कॉर्पोरेट जगत में भी। हेमा कमेटी की रिपोर्ट ने तो बस इस बिंदु को और पुख्ता किया है कि कार्यक्षेत्रों में लिंग असमानता और कास्टिंग काउच जैसी बातें हवाई नहीं हैं।

वेतन असमानता की समस्या महिलाएँ ग्लैमर की दुनिया में भी झेल रही हैं। उनके साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के मामले वहाँ भी हो रहे हैं जहाँ कोई सोच नहीं सकता। बस इन पर चर्चा इसलिए नहीं क्योंकि सोशल मीडिया पर इतनी चमक-दमक दिखाई जाती है कि हम मानने को तैयार ही नहीं होते कि ये भी एक कड़वा सच है। अगर कोई खुलकर इस मुद्दे पर बोले भी तो हम सोशल एक्टिविटी से अंदाजा लगाते हैं कि उसके साथ जो हो रहा है वो सही है या नहीं। नतीजा ये होता है कि महिलाएँ बोलने से घबराने लगती हैं कि कहीं पुलिस तक बात जाने पर उनके चरित्र पर ही सवाल न खड़े हो जाएँ।

क्या है लेटरल एंट्री, कब से हुई इसकी शुरुआत, क्यों मोदी सरकार ने UPSC को भर्ती विज्ञापन पर रोक का दिया आदेश: जानिए सब कुछ

यूपीएससी में लेटरल एंट्री को लेकर बहस छिड़ने के बीच मंगलवार (20 अगस्त 2024) को केंद्र सरकार ने लेटरल एंट्री के विज्ञापन पर रोक लगाने का आदेश दिया है। इस संबंध में कार्मिक मंत्री ने यूपीएससी चेयरमैन को पत्र लिखकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर सीधी भर्ती के विज्ञापन पर रोक लगाई जाए। कार्मिक मंत्री ने पत्र में कहा कि सरकार ने यह फैसला लेटरल एंट्री के व्यापक पुनर्मूल्यांकन के तहत लिया है।

केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्री जितेंद्र सिंह की ओर से यूपीएससी के चेयरमैन को जो पत्र भेजा गया है, उसमें कहा गया है कि ये पद विशेषीकृत हैं। ऐसी नियुक्‍तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं रहा है। सामाजिक न्‍याय सुनिश्‍चित कराने के प्रधानमंत्री के लक्ष्‍य के मद्देनजर इस तरह की नियुक्‍तियों की समीक्षा करने और इसमें सुधार लाने की जरूरत है, इसलिए यूपीएससी से लेटरल एंट्री के विज्ञापन को निरस्‍त करने का अनुरोध किया जाता है।

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जो लेटर यूपीएससी को लिखा है, उसमें कॉन्ग्रेस पर भी जमकर निशाना साधा गया है। लेटर में केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि सैद्धांतिक तौर पर सीधी भर्ती की अवधारणा का समर्थन 2005 में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग की तरफ से किया गया था, जिसकी अध्यक्षता वीरप्पा मोइली की तरफ से की गई थी।

इस पत्र में कहा गया है कि अधिकतर लेटरल एंट्रीज 2014 से पहले की थी और इन्हें एडहॉक स्तर पर किया गया था। प्रधानमंत्री का विश्वास है कि लेटरल एंट्री हमारे संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के समान होनी चाहिए, विशेष रूप से आरक्षण के प्रावधानों के संबंध में किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।

इस मामले में केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा, “आज प्रधानमंत्री जी ने सामाजिक न्याय को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, पिछले 3-4 दिनों से लेटरल एंट्री का मामला चल रहा था। हमारे PMO में राज्य मंत्री जो DoPT भी देखते हैं, उन्होंने UPSC को पत्र लिखा है कि जब तक आरक्षण का पूरा प्रावधान नहीं हो जाता, तब तक आप इसे वापस ले लें। इससे पता चलता है कि प्रधानमंत्री जी सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध हैं। हालाँकि ये सच है कि लेटरल एंट्री की शुरुआत कॉन्ग्रेस के जमाने से हुई। आरक्षण के मुद्दे पर प्रधानमंत्री जी हमेशा गरीबों के साथ खड़े नजर आते हैं। इस फैसले में भी प्रधानमंत्री जी SC, ST और पिछड़ों के साथ खड़े नजर आते हैं।”

क्या है लेटरल एंट्री?

नौकरशाही मे लेटरल एंट्री सरकार के पीछे सरकार की मंशा है कि निजी क्षेत्र के लोगों के अनुभव का लाभ भी उसे मिले। ऐसे अनुभवी लोगों की भर्ती के लिए ही सरकार यह कदम उठा रही है। इसके अंतर्गत सरकार अनुभव के आधार पर इन लोगों की भर्ती करती है। इनको केंद्र सरकार में सचिव स्तर के पद और सुविधाएँ दी जाती हैं। ऐसे आवेदकों की भर्ती के लिए सरकार उनके अनुभव और साक्षात्कार के आधार पर होती है। इनकी सेवा भी नियमित अवधि के लिए होती है और संविदा पर की जाती है। वर्तमान भर्ती में यह सीमा 3 वर्ष रखी गई है।

किसने दिया था लेटरल एंट्री का सुझाव?

UPA सरकार ने वर्ष 2005 में प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) का गठन किया था। इसके अध्यक्ष केन्द्रीय मंत्री वीरप्पा मोईली थे। वीरप्पा मोईली की अध्यक्षता वाले इस पैनल ने देश के कई क्षेत्रो में सुधार को लेकर अपने सुझाव दिए थे। इन्हीं सुझावों में एक रिपोर्ट प्रशासनिक सुधारों पर आधारित थी। यह रिपोर्ट नवम्बर 2008 में केंद्र सरकार को सौंपी गई थी। लगभग 380 पन्नों की इस रिपोर्ट में लेटरल एंट्री के सुझाव का जिक्र है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि ARC नौकरशाही के पदों पर लेटरल एंट्री का सुझाव देती है।

रिपोर्ट में केंद्र सरकार के कुछ पदों पर 3 वर्षों के लिए लेटरल एंट्री की बात कही गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि निजी क्षेत्र के लोगों को सरकार में काम करने का मौक़ा दिया जाना चाहिए और इसी तरह सरकारी अफसरों को भी बाहरी क्षेत्र में काम करने की छूट दी जानी चाहिए। लेटरल एंट्री की भर्तियो को लेकर आयोग ने कहा था कि इससे उच्च पदों पर काम करने के लिए सरकार को ऐसे लोग मिलेंगे जो उस क्षेत्र के विशेषज्ञ होंगे। इसके लिए अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों का उदाहरण भी दिया गया था।

कब हुई लेटरल एंट्री की शुरुआत?

कॉन्ग्रेस सरकार के अलावा नीति आयोग ने भी 2017 में ऐसी ही सिफारिश की थी। नीति आयोग ने 40 पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती करने की सिफारिश की थी। 2018 में मोदी सरकार ने पहली बार लेटरल एंट्री के जरिए विशेषज्ञों को सरकार में शामिल करने के लिए विज्ञापन निकाले थे। इसी क्रम में ही इस बार भी 45 अलग-अलग पदों पर भर्ती निकाली गई है, जिसे फिलहाल सरकार ने रोक दिया है।

रेप के बाद हुई जिसकी हत्या उसके परिजनों से डॉक्टर बन मिले ममता बनर्जी के ‘समर्थक’, सुप्रीम कोर्ट की याचिका बता करवाए दस्तख़त: पीड़ित परिवार के वकील का खुलासा

कोलकाता के RG Kar मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में बलात्कार के बाद हत्या की शिकार बनी अंडर ट्रेनी डॉक्टर के परिजनों के साथ जालसाज़ी का प्रयास किया गया है। यह आरोप पीड़िता के पिता द्वारा नियुक्त वकील विकासरंजन भट्टाचार्य ने लगाए हैं। मंगलवार (20 अगस्त, 2024) को एक फेसबुक पोस्ट के जरिए उन्होंने बताया कि कुछ धोखेबाजों ने खुद को डॉक्टर बता कर पीड़िता के परिजनों से संपर्क किया। वकील के नाम पर कुछ कागजातों पर दस्तख़त भी करवाए गए हैं। एडवोकेट भट्टाचार्य ने ममता बनर्जी की भी आलोचना की है।

सीनियर अधिवक्ता विकासरंजन भट्टाचार्य ने 20 अगस्त को अपनी फेसबुक प्रोफ़ाइल पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने लिखा कि जब वो दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचे तो उन्हें पता चला कि कुछ संदिग्ध लोगों ने डॉक्टर के वेश में पीड़िता के घर वालों से मुलाकात की है। ये जालसाज अपने साथ कोई कागज लाए थे जिसे वो सुप्रीम कोर्ट की याचिका बता रहे थे। उन्होंने इस पर दस्तख़त करवाने के लिए विकास रंजन भट्टाचार्य का नाम लिया। इन जालसाज़ों को ममता बनर्जी का कट्टर समर्थक बताते हुए वकील ने आशंका जताई है कि वो लोग ममता बनर्जी के ‘भक्त’ थे।

बिकासरंजन भट्टाचार्य की फेसबुक पोस्ट

एडवोकेट विकासरंजन भट्टाचार्य ने माँग की है कि इस पूरे मामले की जाँच और जालसाजों पर कार्रवाई होनी चाहिए। उनका दावा है कि जालसाजों के पास कई गुप्त राज भी हो सकते हैं। वकील भट्टाचार्य ने पीड़िता के परिजनों को पैसे की पेशकश करने वाली ममता बनर्जी की भी आलोचना की। उन्होंने लिखा, “आप देखिए, पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री की भूमिका बहुत निंदनीय है। जहाँ भी बलात्कार होता है, वह तुरंत पीड़ित के परिवार से संपर्क करने की कोशिश में जुट जातीं हैं और उन्हें पैसे दे कर कहती हैं कि सब कुछ खत्म हो गया है।”

एडवोकेट विकासरंजन भट्टाचार्य ने आगे लिखा, “दुर्भाग्य से उन्होंने (ममता बनर्जी) ने रेप पीड़िताओं के लिए रेट कार्ड तय कर रखे हैं।” वकील का मानना है कि बलात्कार की पीड़िताएँ कानूनी तौर पर मुआवजे के हकदार ज़रूर हैं, लेकिन जाँच पूरी होने तक इंतजार करना चाहिए। वकील का आरोप है कि के केस में गवाहों को भी खरीदने की कोशिश होती है। बकौल विकसरंजन आरजी कर मेडिकल कॉलेज पीड़िता के साथ भी यही हुआ था लेकिन पीड़िता के परिजनों ने पैसे लेने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि वो मुख्यमंत्री के खेल का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे।

अधिवक्ता विकासरंजन भट्टाचार्य भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से राज्यसभा सांसद भी हैं। बताते चलें कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान, उन्होंने उल्लेख किया कि अस्पताल पर हमला करने वाली भीड़ का मकसद उस सेमिनार वाले कमरे को खराब करना था जहाँ ये घृणित अपराध हुआ था। हालाँकि, यह भीड़ भटक कर उस मंज़िल पर पहुँच गई थी। यहाँ भीड़ ने उस कमरे को तहस-नहस कर दिया था ताकि अपराध के सबूतों को मिटाया जा सके। इस हमले का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।

वायरल हो रहे इस वीडियो में एक व्यक्ति को यह कहते सुना गया, “चलो सेमिनार वाले कमरे में चलते हैं। “इसके बाद भीड़ ने कमरे में तोड़फोड़ शुरू कर दी थी। इस तोड़फोड़ का शिकार इमारत में मौजूद कुल 18 विभाग हुए थे। इन विभागों में इमरजेंसी रूम, गहन देखभाल इकाई और उच्च निर्भरता इकाई के साथ-साथ भंडारण कक्ष, पुरुष वार्ड, वॉशरूम शामिल हैं। भीड़ में मौजूद लगभग 7000 हमलावरों ने CCTV कैमरों को भी तोड़ डाला था। इस दौरान अस्पताल में तैनात पुलिसकर्मियों ने वॉशरूम में छिप कर अपनी जान बचाई थी। तब अस्पताल की नर्सों ने पुलिसकर्मियों की छिपने में मदद की थी।

डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए नेशनल टास्क फोर्स, आर जी कर अस्पताल CISF के हवाले: कोलकाता हॉरर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, FIR में देरी पर बंगाल सरकार से पूछे सख्त सवाल

कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर के साथ हुए रेप और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो से 22 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट माँगी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया है। ये अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टर्स की सुरक्षा को लेकर रिपोर्ट देगा। टास्क फोर्स 3 सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट देगी, जबकि 2 महीने के भीतर फाइनल रिपोर्ट सौंपेगी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता रेप-मर्डर मामले में सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सुनवाई की। सीजेआई ने कहा कि डॉक्टर्स की सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए टास्क फोर्स बना रहे हैं, इसमें 9 डॉक्टर्स को शामिल किया गया है, जो मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा, वर्किंग कंडीशन और उनकी बेहतरी के उपायों की सिफारिश करेगी। टास्क फोर्स में केंद्र सरकार के पाँच अधिकारी भी शामिल किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जिस टास्ट फोर्स का गठन किया है, उसका नेतृत्व सर्जन वाइस एडमिरल आरती सरीन एवीएसएम, वीएसएम करेंगे। नेशनल टास्क फोर्स मेडिकल पेशेवरों की सुरक्षा, कार्य स्थितियों और कल्याण से संबंधित सिफारिशें करेगा। नेशनल टास्क फोर्स को तीन सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट और 2 महीने के भीतर अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

टास्ट फोर्स में इन्हें किया गया शामिल

आरके सरियन, सर्जन वाइस एडमिरल, डॉ. नागेश्वर रेड्डी, मैनेजिंग डायरेक्टर एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल गैस्ट्रोलॉजी, डॉ. एम. श्रीनिवास, डायरेक्टर AIIMS, दिल्ली, डॉ. प्रतिमा मूर्ति, NIMHANS, बेंगलुरू, डॉ. गोवर्धन दत्त पुरी, डायरेक्टर, AIIMS, जोधपुर, डॉ. सौमित्र रावत, गंगाराम अस्पताल के मैनेजिंग मेंबर, प्रोफेसर अनीता सक्सेना, कार्डियोलॉजी हेड, AIIMS, दिल्ली, प्रोफेसर पल्लवी सापरे, डीन- ग्रांट मेडिकल कॉलेज, मुंबई और डॉ. पदमा श्रीवास्तव, न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट, AIIMS। इसके अलावा भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, भारत सरकार के गृह सचिव, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, नेशनल मेडिकल कमीशन के अध्यक्ष और नेशनल बोर्ड ऑफ इग्जामिनर्स के अध्यक्ष होंगे।

कोर्ट ने सीबीआई से 22 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट और राज्य सरकार से घटना की रिपोर्ट माँगी है। आरजी कर अस्पताल की सुरक्षा का जिम्मा सीआईएसएफ को दिया गया। केस की अगली सुनवाई 22 अगस्त को होगी।

सुरक्षा की जिम्मेदारी सीआईएसएफ पर

इस मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा, “15 अगस्त की रात को जब आरजी कर अस्पताल में तोड़फोड़ की घटनाएँ हुईं, तो भीड़ ने पुरुष और महिला डॉक्टरों पर हमला किया। पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों के संगठन (प्रोटेक्ट द वॉरियर्स) की ओर से पेश अपराजिता सिंह ने एक वरिष्ठ रेजिडेंट द्वारा घटना का विवरण देते हुए एक ईमेल रिकॉर्ड पर रखा है। अस्पताल में 700 रेजिडेंट डॉक्टर हैं। ज्यादातर रेजिडेंट अपनी ड्यूटी छोड़ चुके हैं और अब 30-40 महिला और 60 पुरुष डॉक्टर रह गए हैं। डॉक्टरों के लिए अपनी ड्यूटी करने के लिए सुरक्षित माहौल बनाए रखना जरूरी है। इसलिए हमें एसजी मेहता ने आश्वासन दिया है कि सुरक्षा में सीआईएसएफ की तैनाती की जाएगी।”

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “हमने इस मामले को स्वत: संज्ञान लेने का फैसला इसलिए किया, क्योंकि यह कोलकाता के अस्पताल में हुई किसी विशेष हत्या से संबंधित मामला नहीं है। यह पूरे भारत में डॉक्टरों की सुरक्षा से संबंधित व्यवस्थागत मुद्दों को उठाता है। सबसे पहले, सुरक्षा के मामले में हम सार्वजनिक अस्पतालों में युवा डॉक्टरों खासकर महिला डॉक्टरों के लिए सुरक्षा की स्थिति के अभाव के बारे में बहुत चिंतित हैं, जो काम की प्रकृति और लिंग के कारण अधिक असुरक्षित हैं। इसलिए हमें राष्ट्रीय सहमति विकसित करनी चाहिए। काम की सुरक्षित स्थिति बनाने के लिए एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल होना चाहिए। अगर महिलाएँ काम की जगह पर नहीं जा सकतीं और सुरक्षित महसूस नहीं कर सकतीं तो हम उन्हें समान अवसर से वंचित कर रहे हैं। हमें यह सुनिश्चित करने के लिए अभी कुछ करना होगा कि सुरक्षा की स्थिति लागू हो।”

सीजेआई ने कहा कि न्यायालय महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरे देश में अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर सिफारिशें देने के लिए पूरे देश के डॉक्टरों को शामिल करते हुए “राष्ट्रीय टास्क फोर्स” बना रहा है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि महाराष्ट्र, केरल, तेलंगाना आदि जैसे कई राज्यों ने डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए राज्य कानून बनाए हैं। हालाँकि, ये कानून संस्थागत सुरक्षा मानकों की कमियों को दूर नहीं करते हैं। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “जैसे-जैसे अधिक से अधिक महिलाएं कार्यबल में शामिल होती जा रही हैं…..देश जमीनी स्तर पर चीजों को बदलने के लिए एक और बलात्कार का इंतजार नहीं कर सकता।”

आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम मुद्दे उठाए, जिनमें…

  • नाइट ड्यूटी करने वाले मेडिकल पेशेवरों को आराम करने के लिए पर्याप्त कमरे नहीं दिए जाते हैं। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग ड्यूटी रूम नहीं हैं।
  • इंटर्न, रेजीडेंट और सीनियर रेजीडेंट से 36 घंटे की ड्यूटी करवाई जाती है, जहाँ अक्सर स्वच्छता और सफाई की बुनियादी स्थितियाँ नहीं होती हैं।
  • अस्पतालों में सुरक्षा कर्मियों की कमी अपवाद से कहीं अधिक आम बात है।
  • मेडिकल देखभाल पेशेवरों के पास पर्याप्त शौचालय की सुविधा नहीं है।
  • मेडिकल पेशेवरों के ठहरने के स्थान अस्पतालों से दूर हैं और परिवहन सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं।
  • अस्पतालों की निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों का न होना या उनका ठीक से काम न करना।
  • मरीजों और उपस्थित लोगों के लिए सभी जगहों पर बेरोकटोक पहुंच है।
  • प्रवेश द्वार पर हथियारों की जाँच का अभाव।
  • अस्पताल के अंदर डिंग और खराब रोशनी वाली जगहें।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रिंसिपल के आचरण, एफआईआर दर्ज करने में देरी और 14 अगस्त को सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन के दौरान अस्पताल में हुई तोड़फोड़ पर भी राज्य से सवाल पूछे। सीजेआई ने कहा, “सुबह-सुबह अपराध का पता चलने के बाद अस्पताल के प्रिंसिपल ने इसे आत्महत्या का मामला बताने की कोशिश की। माता-पिता को कुछ घंटों तक शव देखने की अनुमति नहीं दी गई…।”

सिब्बल ने कहा कि यह गलत जानकारी है। उन्होंने कहा कि राज्य सभी तथ्यों को रिकॉर्ड में रखेगा। सीजेआई ने सवाल किया कि आरजी कर अस्पताल से इस्तीफा देने के बाद प्रिंसिपल को दूसरे अस्पताल का प्रभार क्यों दिया गया। इसके बाद पीठ ने एफआईआर के समय के बारे में सवाल किया। सिब्बल ने कहा कि “अप्राकृतिक मौत” का मामला तुरंत दर्ज किया गया था और दावा किया कि एफआईआर दर्ज करने में कोई देरी नहीं।

सीजेआई ने बताया कि शव का पोस्टमार्टम दोपहर 1 बजे से शाम 4.45 बजे के बीच किया गया। शव को अंतिम संस्कार के लिए रात करीब 8.30 बजे माता-पिता को सौंप दिया गया। हालाँकि, एफआईआर रात 11.45 बजे ही दर्ज की गई। सीजेआई ने पूछा, “रात 11.45 बजे एफआईआर दर्ज की गई? अस्पताल में कोई भी एफआईआर दर्ज नहीं करता? अस्पताल के अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या पोस्टमार्टम से यह पता नहीं चलता कि पीड़िता के साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या की गई?”

सीजेआई ने आगे पूछा, “प्रिंसिपल क्या कर रहे थे? पहले इसे आत्महत्या के रूप में पेश करने का प्रयास क्यों किया गया?” सीजेआई ने राज्य से 14 अगस्त को “रात को वापस लो” विरोध अभियान के दौरान अस्पताल में हुई तोड़फोड़ की घटनाओं पर भी सवाल किया।

जिस बच्ची से मोईद-राजू खान ने किया रेप, उसे मारने अस्पताल में घुस गया था सपा नेता: अब निरस्त हो सकता है राशिद खान का शस्त्र लाइसेंस, पुलिस ने घर पे चस्पाया नोटिस

उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में नाबालिग बच्ची से गैंगरेप के आरोपित मोईद खान के मददगार सपा नेता राशिद खान के खिलाफ भी प्रशासन ने कार्रवाई तेज कर दी है। जिला प्रशासन राशिद खान के शस्त्र लाइसेंसों को निरस्त कर सकता है। इस बाबत पुलिस ने उनके घर पर मंगलवार (20 अगस्त 2024) को बाकायदा ‘कारण बताओ नोटिस’ भी चस्पा कर दी है। नोटिस का जवाब देने के लिए राशिद खान को 29 अगस्त तक का समय दिया गया है। अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले राशिद खान पर 1 अगस्त को पीड़िता को अस्पताल में घुस कर केस वापस लेने की धमकी देने की FIR दर्ज है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, समाजवादी पार्टी से भदरसा के नगर पंचायत अध्यक्ष के आवास पर मंगलवार की सुबह कोतवाली नगर पुलिस सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारी पहुँचे। उनके हाथ में ‘कारण बताओ नोटिस’ थी जिसे उन्हें राशिद खान को तामील करवाना था। राशिद खान घर पर मौजूद नहीं था, इसीलिए नियमानुसार नोटिस को उसके घर पर चस्पा करवा दिया गया है। इस नोटिस में राशिद खान को जवाब देने के लिए इसी माह 29 अगस्त तक की समय सीमा दी गई है।

बताते चलें कि राशिद खान को अपना बयान दर्ज करवाने के लिए अयोध्या पुलिस पहले ही नोटिस भेज चुकी है। इस नोटिस के बावजूद राशिद पुलिस के आगे बयान दर्ज करवाने नहीं गए। अपने खिलाफ दर्ज FIR में अग्रिम जमानत लेने के लिए राशिद खान अदालत भी गए थे। हालाँकि, अदालत ने उनकी अपील ख़ारिज कर दी थी और पुलिस के आगे पेश हो कर जाँच में सहयोग करने के लिए कहा था। हालाँकि अदालत से मिली 3 दिनों की समयसीमा के बावजूद राशिद खान अब तक पुलिस के आगे पेश नहीं हुए।

बताते चलें कि शिकायत कॉपी में आरोप है कि राशिद खान ने पहले पीड़िता के घर जा कर मुकदमे को वापस लेने की धमकी दी थी। अपनी बात न मानने पर उसने लड़की व उसके परिवार वालों को खत्म करने की धमकी दी थी। जब उसकी बात नहीं मानी गई तब वो अपने 2 साथियों सहित गुरुवार (1 अगस्त 2024) की रात 11 बजे महिला जिला अस्पताल के उस कमरे के पास पहुँच गया था जिसमें पीड़िता का इलाज चल रहा था। आरोप है कि राशिद व उसके साथी पीड़िता की हत्या करना चाहते थे।

इस शिकायत पर राशिद व उसके 2 सहयोगियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की धारा 333 (जबरदस्ती किसी के घर में घुसने) और बीएनएस की धारा 351(3) (आपराधिक धमकी देने) के तहत मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस ने इसी केस में राशिद खान को पहले भी नोटिस जारी कर के बयान देने के लिए बुलाया था लेकिन वो हाजिर नहीं हुए। गौरतलब है कि राशिद खान का समाजवादी पार्टी में काफी ऊँचा रुतबा है। वह अखिलेश यादव से हाथ मिलाता है और समाजवादी पार्टी के तमाम बड़े नेताओं के साथ मंच को साझा करता है।