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नाबालिग का स्तन दबाना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास माना जाएगा: SC ने रद्द किया HC का ऑर्डर, जानें- क्यों जजों के लिए गाइडलाइन्स बनाने का देना पड़ा आदेश

भारत की न्याय व्यवस्था को दुनिया की सबसे मजबूत और स्वतंत्र न्यायपालिकाओं में गिना जाता है। हम सब यही मानते हैं कि अदालत का दरवाजा खटखटाने पर पीड़ित को न्याय मिलेगा, खासकर जब बात नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण जैसे जघन्य अपराधों की हो। लेकिन पिछले कुछ सालों में हाई कोर्ट्स से आने वाले कुछ फैसले पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

एक 11 साल की बच्ची का स्तन दबाया जाए, पायजामे का नाड़ा खींचकर खोला जाए और उसे सुनसान जगह पर खींच ले जाया जाए और अदालत कह दे कि यह ‘रेप का प्रयास’ भी नहीं है। सोई हुई बच्ची की पैंटी उतारी जाए, चूमा जाए लेकिन ‘पेनिट्रेशन’ नहीं हुआ तो रेप नहीं। कपड़ों के ऊपर से छूना ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क नहीं, इसलिए POCSO के तहत अपराध नहीं। अकेले आदमी का मुँह दबाकर, कपड़े उतारकर रेप करना ‘असंभव’ लगता है, इसलिए आरोपित बरी…

ये वाक्य कोई कल्पना नहीं, बल्कि अलग-अलग हाई कोर्ट्स के लिखित फैसलों से लिए गए हैं। ये फैसले न सिर्फ कानूनी व्याख्या के नाम पर पीड़िताओं की पीड़ा को कमतर आँकते हैं, बल्कि समाज में यह संदेश देते हैं कि अपराधी तकनीकी दाँव-पेच से बच सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में दखल देकर इन्हें पलटा है और जजों के लिए संवेदनशीलता की नई गाइडलाइंस बनाने की बात कही है, लेकिन सवाल बरकरार है कि क्या न्याय सिर्फ कानून की किताबी परिभाषाओं तक सीमित रह जाना चाहिए? या उसे पीड़िता की गरिमा, उसके ट्रॉमा और समाज की सुरक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए?

आगे हम इन्हीं कुछ चर्चित और विवादास्पद फैसलों को विस्तार से देखेंगे और उन फैसलों को समझेंगे कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट को अब जजों के लिए गाइडलाइन्स बनाने जैसा फैसला देना पड़ा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित फैसले पर भड़का SC, गाइडलाइन्स बनाने को कहा

सबसे ताजा और चर्चित मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट का है, जो 2025 में सामने आया था। इसमें 11 साल की एक मासूम बच्ची के साथ तीन युवकों ने घिनौना काम किया। आरोपियों ने बच्ची का स्तन दबाया, पायजामे का नाड़ा खींचकर खोला और उसे पुलिया के नीचे एक सुनसान जगह पर खींचकर ले जाने की कोशिश की। बच्ची के चिल्लाने पर आसपास के लोग दौड़े आए, जिससे आरोपित भाग निकले। निचली अदालत ने इसे रेप का प्रयास मानते हुए IPC की धारा 376 और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत समन जारी किया।

लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने इसे हल्का करार दे दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ स्तन दबाना, नाड़ा तोड़ना और खींचना रेप या रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि आरोपित ने खुद कपड़े नहीं उतारे और आगे का कोई कदम नहीं उठाया। कोर्ट ने इसे सिर्फ महिलाओं की गरिमा भंग करने वाली धारा 354-B में डाल दिया।

यह फैसला आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। लोगों ने कहा कि कोर्ट पीड़िता की तकलीफ को समझने की बजाय कानून की इतनी सख्त व्याख्या कर रहा है कि अपराधी बच निकलें। चार महीने सोच-विचार कर दिया गया यह फैसला संवेदनहीन लग रहा था। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी 2026 को इस फैसले को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि स्तन दबाना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास ही है। कोर्ट ने हाई कोर्ट की टिप्पणियों को ‘अमानवीय, संवेदनहीन और घृणित’ बताया। साथ ही कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) को कमेटी बनाने को कहा, जो जजों के लिए यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता और करुणा की नई गाइडलाइंस तैयार करेगी।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक सिस्टम में संवेदनशीलता की कमी को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जजों को पीड़िता की मानसिक और शारीरिक पीड़ा को समझना चाहिए, न कि सिर्फ कानून की किताबी व्याख्या करना। लेकिन सवाल यह है कि जब तक ऐसी गाइडलाइंस नहीं बनतीं, तब तक कितनी और बच्चियाँ न्याय से वंचित रहेंगी? क्या जजों को ट्रेनिंग की जरूरत नहीं कि वे अपराध की गंभीरता को महसूस करें, न कि अपराधी को बचाने के रास्ते ढूँढें?

छत्तीसगढ़ HC का मामला- बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन रेप नहीं

यह मामला लगभग 20 साल पुराना है, जिसमें एक व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगा था। निचली अदालत ने उसे रेप का दोषी मानकर सजा सुनाई। लेकिन छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपील में फैसला पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि महिला के निजी अंग पर पुरुष अंग रखकर बिना पेनिट्रेशन के स्खलन हो जाना बलात्कार नहीं है। इसके लिए IPC की धारा 375 के तहत पेनिट्रेशन जरूरी है। कोर्ट ने सजा को रेप से बदलकर रेप के प्रयास (धारा 376 के साथ 511) में कर दिया।

कोर्ट ने तर्क दिया कि कानून की व्याख्या सख्ती से करनी चाहिए और अपराध के हर तत्व को साबित होना जरूरी है। कोर्ट ने माना कि यह कृत्य गंभीर है, लेकिन इसे रेप की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता के हिसाब से सजा होनी चाहिए, लेकिन कानूनी प्रावधानों का पालन भी उतना ही जरूरी है।

यह फैसला उठाता है बड़ा सवाल कि क्या कानून की किताबी व्याख्या पीड़िता की गरिमा और ट्रॉमा से ऊपर है? पीड़िता ने जो सहन किया, उसकी मानसिक पीड़ा को कोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया। सिर्फ पेनिट्रेशन न होने की बात पर अपराधी को कम सजा देना क्या न्याय है? ऐसे फैसले अपराधियों को हौसला देते हैं कि अगर पूरा अपराध न कर पाएँ तो सजा भी कम मिलेगी। क्या जजों को यह नहीं सोचना चाहिए कि यौन अपराधों में पीड़िता की सहमति और गरिमा का हनन ही सबसे बड़ा अपराध है?

बॉम्बे हाई कोर्ट का स्किन-टू-स्किन मामला

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने 2021 में एक चौंकाने वाला फैसला दिया था। एक व्यक्ति पर 12 साल की बच्ची का स्तन दबाने का आरोप था। उसने बच्ची को गुड़ का लालच देकर घर बुलाया। निचली अदालत ने POCSO एक्ट के तहत सजा सुनाई। लेकिन जस्टिस पुष्पा गणेदीवाला ने कहा कि कपड़ों के ऊपर से छूना ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क नहीं है, इसलिए यह POCSO के तहत यौन शोषण नहीं। कोर्ट ने इसे सिर्फ IPC की धारा 354 (महिलाओं की लज्जा भंग) में डाला।

कोर्ट ने तर्क दिया कि POCSO एक्ट में यौन शोषण के लिए यौन इरादे से सीधा शारीरिक संपर्क जरूरी है। अगर कपड़े उतारे होते या अंडरगारमेंट में हाथ डाला होता, तब बात अलग होती। जज ने कहा कि मामले में टॉप हटाकर स्तन दबाने की पुष्टि नहीं है, इसलिए यह यौन शोषण नहीं।

यह फैसला बेहद संवेदनहीन लगता है। एक बच्ची के साथ ऐसा व्यवहार और कोर्ट कहता है कि कपड़े के ऊपर से छूना अपराध नहीं? क्या बच्ची की मानसिक ट्रॉमा कपड़ों की मोटाई पर निर्भर करती है? यह फैसला पीड़ितों को न्याय से दूर करता है और अपराधियों को तकनीकी बहाने देता है। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस पर रोक लगाई, लेकिन सवाल है कि ऐसे जज कैसे फैसले देते हैं जो समाज में गलत संदेश जाते हैं?

बॉम्बे हाई कोर्ट का ‘अकेले असंभव’ वाला फैसला

इसी जस्टिस पुष्पा गणेदीवाला ने एक और विवादित फैसला दिया था। एक युवती के साथ रेप के मामले में निचली अदालत ने 26 साल के आरोपी को दोषी ठहराया। लेकिन हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। जज ने कहा कि बिना हाथापाई के मुंह दबाना, कपड़े उतारना और रेप करना अकेले आदमी के लिए ‘बेहद असंभव’ लगता है।

कोर्ट ने पीड़िता के बयान पर शक जताया और कहा कि ऐसी घटना अकेले संभव नहीं। जज का मानना था कि पीड़िता का विरोध न होना और कोई चोट न लगना अपराध को कमजोर करता है। इस आधार पर आरोपी को रेप से बरी कर दिया गया।

यह सोच ही गलत है। क्या रेप सिर्फ तभी होता है जब जबरदस्ती हाथापाई हो? कई बार डर से पीड़िता विरोध नहीं कर पाती। जज का यह कहना कि अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता, पीड़िताओं के अनुभव को नकारता है। ऐसे फैसले अपराधियों को बचाते हैं और पीड़िताओं को शर्मिंदगी महसूस कराते हैं। जस्टिस गणेदीवाला का कार्यकाल बढ़ाया गया, लेकिन ऐसे फैसलों से न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।

कलकत्ता HC- सोई बच्ची की पैंटी उतारी, लेकिन पेनिट्रेशन नहीं तो रेप नहीं

साल 2010 की एक घटना में 11 साल की बच्ची घर में सो रही थी। दीपक सिंघा नाम का व्यक्ति रात को घुसा, बच्ची को दबोचा, चूमा और पैंटी उतारकर रेप की कोशिश की। बच्ची के चिल्लाने पर लोग आए और आरोपित भाग निकला। निचली अदालत ने रेप मानकर आजीवन कारावास की सजा दी। लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने 2022 में सजा कम कर दी। कोर्ट ने कहा कि पेनिट्रेशन नहीं हुआ, इसलिए यह रेप नहीं, सिर्फ रेप का प्रयास है।

कोर्ट ने तर्क दिया कि रेप के लिए कम से कम स्पर्श स्तर का पेनिट्रेशन जरूरी है। पीड़िता और गवाहों ने भी पेनिट्रेशन न होने की बात मानी। कोर्ट ने कहा कि बच्ची के विरोध और लोगों के आने से आरोपित नाकाम रहा।

फिर वही सवाल कि क्या यौन अपराध सिर्फ पेनिट्रेशन तक सीमित है? बच्ची की पैंटी उतारना, चूमना, दबोचना- ये सब क्या कम अपराध हैं? कोर्ट पीड़िता की उम्र और ट्रॉमा को भूल गया। ऐसे फैसले कानून को तकनीकी बनाते हैं और अपराधी को राहत देते हैं। क्या जजों को यह नहीं समझना चाहिए कि बच्चियों के साथ ऐसा व्यवहार जीवनभर का दाग छोड़ता है?

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने भतीजी के साथ रेप की कोशिश में दी थी जमानत

फैयाज अहमद डार पर अपनी नाबालिग भतीजी के साथ रेप की कोशिश का आरोप था। उसने पीड़िता का मुँह टेप से बंद किया, उसके और अपने कपड़े उतारे। लेकिन भाई के आने पर भाग गया। IPC और POCSO के तहत केस चला। लेकिन जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने 2021 में जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि बिना पेनिट्रेशन के यह रेप का प्रयास नहीं, सिर्फ यौन हमला (धारा 354 और POCSO 7/8) है।

जस्टिस संजीव कुमार ने कहा कि कपड़े उतारना तैयारी है, प्रयास नहीं। मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि तैयारी और प्रयास में पतला फर्क है, और जमानत नियम है।

यह फैसला दिखाता है कि कैसे तकनीकी बहाने से अपराधी बाहर घूमते हैं। भतीजी के साथ ऐसा करना कितना घिनौना है, लेकिन कोर्ट ने पेनिट्रेशन न होने को आधार बनाया। क्या परिवार की बच्ची के साथ विश्वासघात की गंभीरता कम है? ऐसे फैसले समाज में डर पैदा करते हैं कि न्याय मिलना मुश्किल है। जजों को पीड़िता की सुरक्षा पहले सोचनी चाहिए, अपराधी की जमानत बाद में।

उम्मीद जगाने वाला है सुप्रीम कोर्ट का फैसला, ये मील का पत्थर

ये तमाम फैसले पढ़कर दिल बैठ जाता है। छोटी-छोटी बच्चियाँ, जो अभी दुनिया को समझ भी नहीं पाईं, उनके साथ जो होता है, वह सिर्फ शरीर पर हमला नहीं, उनकी पूरी जिंदगी पर वार होता है। लेकिन जब अदालतें तकनीकी दलीलों में उलझकर अपराध को हल्का कर दें, तो पीड़िता को लगता है कि उसकी चीख कोई सुन ही नहीं रहा। न्याय का मतलब सिर्फ कानून की किताब पढ़ना नहीं, उस किताब को इंसानी दर्द से जोड़ना भी है।

सुप्रीम कोर्ट का 10 फरवरी 2026 का फैसला और जजों के लिए संवेदनशीलता की नई गाइडलाइंस बनाने का आदेश एक बड़ी उम्मीद जगाता है। यह बताता है कि सबसे ऊपरी अदालत पीड़िताओं की पीड़ा समझ रही है। अब जरूरत है कि ये गाइडलाइंस सिर्फ कागज पर न रहें। जजों की ट्रेनिंग में पीड़िताओं की कहानियाँ शामिल हों, मनोवैज्ञानिकों की राय ली जाए, ताकि हर बेंच पर बैठा जज यह महसूस करे कि उसके एक शब्द से एक मासूम का पूरा बचपन बच या बर्बाद हो सकता है।

हम सबको भी सोचना होगा। जब तक समाज में बच्चियों को सुरक्षित नहीं माना जाएगा, तब तक अदालतें कितनी ही कोशिश कर लें, न्याय अधूरा रहेगा। उम्मीद है, यह नया कदम सच में बदलाव लाएगा और हर बच्ची को भरोसा दिलाएगा कि उसकी आवाज सुनी जाएगी। क्योंकि न्याय तब ही पूरा होता है, जब वो प्रभावित पक्ष को पूरी तरह से न्याय दे।

8 साल में 3000 किमी+ के एक्सप्रेस-वे, 7 चालू और दर्जन भर निर्माणाधीन: योगी सरकार ने UP को रफ्तार की पटरी पर दौड़ाया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे से जुड़ा किस्सा सुनाते हुए बताया है कि किस तरह अखिलेश यादव की सरकार के दौरान बिना जमीन अधिग्रहण के ही टेंडर दे दिए गए थे। इस एक्सप्रेस वे के लिए अखिलेश सरकार में ₹15,200 करोड़ का DPR बनाया गया। वहीं, योगी सरकार आने के बाद एक्सप्रेस वे की चौड़ाई बढ़ी और टेंडर की कीमत भी घटकर ₹11,800 करोड़ रह गई।

सीएम योगी द्वारा बताई गई यह कहानी सिर्फ एक एक्सप्रेस वे बनने की नहीं है बल्कि उस कड़ी का एक हिस्सा है जिसके तहत एक्सप्रेस वे का एक नेटवर्क बनाकर पूरे UP को जोड़ा जा रहा है। योगी सरकार ने मात्र 8 साल में 3000 किमी से अधिक एक्सप्रेस-वे बनाए हैं और UP सबसे अधिक एक्सप्रेस वे वाला राज्य बन गया है। UP में 7 एक्सप्रेस-वे बन गए हैं और करीब एक दर्जन पर काम चल रहा है कुछ में करीब-करीब आखिरी चरण में पहुँच गया है। इतना ही नहीं 7 एक्सप्रेस वे जोड़ने की परियोजना भी शुरू की गई है ताकि उत्तर से दक्षिण तक सीधी कनेक्टिविटी हो।

देश में सबसे ज्यादा एक्सप्रेस-वे वाला राज्य

उत्तर प्रदेश जल्द ही भारत का ऐसा पहला राज्य बन जाएगा, जहाँ 22 एक्सप्रेस वे होंगे। फिलहाल राज्य में 7 एक्सप्रेस वे चल रहे हैं। इनमें आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे और ग्रेटर नोएडा-आगरा एक्सप्रेस वे को छोड़कर बाकी सबका निर्माण योगी काल में हुआ है या हो रहा है। गंगा एक्सप्रेस वे मेरठ से प्रयागराज को जोड़ रहा है, जो सबसे लंबा है। यमुना एक्सप्रेस वे का विस्तार अभी जारी है। यह जेवर को जोड़ता है, जहाँ इंटरनेशनल एयरपोर्ट बन रहा है।

3 एक्सप्रेस वे का शिलान्यास हो चुका है, जिस पर काम चल रहा है। इसके अलावा 12 नए एक्सप्रेस वे विकसित करने की योजना है, यानी राज्य में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। 12 नए एक्सप्रेस वे में जो चालू होने हैं उनमें गंगा एक्सप्रेस वे , नोएडा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, विंध्य एक्सप्रेस वे और गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेस वे शामिल हैं।

इनके माध्यम से छोटे कस्बों और दूर दराज के इलाकों को जोड़ा जा रहा है ताकि विकास को रफ्तार के साथ आखिरी छोर तक पहुँचाया जा सके और राज्य को आर्थिक प्रगति को ‘रास्ता’ दिखाया जा सके। उद्योग-व्यापार और सप्लाई चेन को बढ़ावा मिल सके। इससे राज्य में निवेश आए और रोजगार के नए अवसर पैदा हों।

गंगा एक्सप्रेस वे समेत 12 के निर्माण का प्रस्ताव

12 नए एक्सप्रेस वे में जो प्रस्तावित हैं उनमें गंगा एक्सप्रेस वे, नोएडा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, विंध्य एक्सप्रेस वे, और गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेस वे शामिल हैं, जो प्रदेश को 22 एक्सप्रेस वे वाला देश का प्रमुख राज्य बना देंगे।

  • गंगा एक्सप्रेस वे राज्य में निर्माणाधीन सबसे लंबा हाईवे है। मेरठ से प्रयागराज को जोड़ने वाली 6 लेन वाली सड़क का काम करीब करीब पूरा हो गया है। 594 किमी का ये हाईवे 2026 में औपचारिक तौर पर शुरू हो जाएगा। पूर्वी यूपी से पश्चिम को इसके माध्यम से जोड़ा जा रहा है, ताकि आवाजाही आसान हो सके।
  • लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस वे लखनऊ और कानपुर को जोड़ेगा। यब 63 किलोमीटर का होगा, जिसे पूरा करने में मात्र 45 मिनट लगेंगे। व्यावसायिक दृष्टिकोण से ये फायदेमंद होगा।
  • अलीगढ़ संभल हाईवे का निर्माण अलीगढ़ से संभल को जोड़ने के लिए किया जा रहा है। ये सड़क एनएच 32 और एनएच 509 को जोड़ेगी।
  • गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे 91 किलोमीटर का लंबा लिंक रोड़ बन रहा है जो फिलहाल 4 लेन का है लेकिन भविष्य में इसे 6 लेन का बनाया जाएगा। इससे गोरखपुर आजमगढ़, अंबेडकर नगर और संत कबीर नगर जैसे जिले कनेक्ट होंगे। विंध्य एक्सप्रेस वे का निर्माण वाराणसी से सोनभद्र को जोड़ने के लिए किया गया है यह गंगा एक्सप्रेस वे से भी जुड़ेगी।

7 एक्सप्रेस-वे को जोड़ने वाला प्रोजेक्ट

राज्य में बरेली से आगरा, झाँसी, ललितपुर कॉरिडोर बनाने को योगी सरकार ने मंजूरी दी है। 547 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर से 7 एक्सप्रेस-वे जुड़ेंगे। इस पर 7000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। प्रस्तावित कॉरिडोर सिर्फ एक नई सड़क परियोजना नहीं बल्कि प्रदेश के एक्सप्रेस वे नेटवर्क को ‘ग्रिड मॉडल’ में जोड़ने की रणनीति का केंद्र है। ये 6 सड़कों वाला एक्सप्रेस वे होगा, जो नेपाल के बॉर्डर के पास तक जाएगा।

ये प्रोजेक्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्य के ज्यादातर एक्सप्रेस-वे और हाईवे पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में हैं। ये तराई क्षेत्रों को कवर नहीं करते और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे छोड़ कर यहाँ हाई स्पीड रोड नहीं है। ऐसे में नॉर्थ साउथ कॉरिडोर पूरा होने से राज्य की तस्वीर बदल जाएगी। नेपाल से मध्यप्रदेश तक और पूर्वांचल से बुंदेलखंड तक इससे जुड़ जाएगा।

यूपी में जो 7 एक्सप्रेस वे चल रहे हैं उनमें यमुना एक्सप्रेस वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, दिल्ली मेरठ एक्सप्रेस वे, पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे नोएडा ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे शामिल हैं।

यमुना एक्सप्रेस वे– यह एक्सप्रेस वे ग्रेटर नोएडा से आगरा तक जाता है। यह 165.5 किमी लंबा है। यह 8 लेन वाले कंक्रीट निर्मित हाई-स्पीड कॉरिडोर है। यह नोएडा-आगरा के बीच यात्रा समय को 2-3 घंटे कम करता है।

आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे– यह देश का पहला ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे है। इसकी लंबाई 302 किलोमीटर है। 2016-2017 में बनकर तैयार हुआ था। यह 6-लेन का एक्सप्रेस वे आगरा और लखनऊ को जोड़ता है और इसका उद्देश्य यात्रा समय को कम करना है।

दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे– 96 किमी लंबा, 14-लेन वाला दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे भारत के सबसे चौड़े मार्ग में से एक है। यह दिल्ली के निजामुद्दीन पुल को मेरठ के परतापुर को जोड़ता है। यह यात्रा के समय को 2-3 घंटे से घटाकर मात्र 45-60 मिनट कर देता है।

पूर्वांचल एक्सप्रेस वे- ये लखनऊ से गाजीपुर तक 341 किलोमीटर तक लंबा है। 6 लेन वाले इस एक्सप्रेस वे पर सुल्तानपुर में 3.2 किलोमीटर की हवाई पट्टी भी है, इससे 3.5-4 घंटे में गाजीपुर से लखनऊ तक की दूरी पूरी की जा सकती है।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे– यह चित्रकूट से इटावा तक जाता है, जिसकी लंबाई 296 किलोमीटर है। यह आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे से भी जुड़ा हुआ है।

नोएडा- ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे- नोएडा के महामाया फ्लाईओवर को ग्रेटर नोएडा के परी चौक से जोड़ने वाला एक 6-लेन हाईवे है। यह बेहतर कनेक्टिविटी के लिए जाना जाता है।

गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे– गोरखपुर से आजमगढ़ तक 4-लेन एक्सप्रेस वे है, जो गोरखपुर को पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के माध्यम से लखनऊ और दिल्ली से जोड़ता है। यह ₹7283 करोड़ से अधिक की लागत से बना है।

अखिलेश यादव के शासनकाल में खर्च ज्यादा, काम कम

अखिलेश यादव कहते रहे हैं कि उनके द्वारा शुरू किए गए योजनाओं से ‘समाजवादी’ शब्द हटाकर योगी सरकार ने इसे अपना नाम दे दिया। उनकी सरकार में 22 दिसंबर 2016 को पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का शिलान्यास हुआ था। अखिलेश यादव का कहना है कि योगी सरकार ने इसे लटकाया, बल्कि टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद निरस्त कर दिया। उनके झूठ की पोल उस वक्त खुल गई जब विधानसभा में सीएम योगी ने तथ्यों के साथ पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की जानकारी दी।

इस आधी-अधूरी परियोजना में जमीन का अधिग्रहण किए बगैर टेंडर जारी कर दिए गए थे। जबकि नियम है कि जब तक एक्सप्रेस-वे के लिए 80 फीसदी जमीन का अधिग्रहण नहीं हो जाता, टेंडर जारी नहीं किए जाते हैं। 2016 में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की चौड़ाई 110 मीटर और 390 किमी लंबा बनना था।

प्रोजेक्ट की लागत ₹15,200 करोड़ बताई गई। लेकिन जब 2019 में योगी सरकार ने इस प्रोजेक्ट को अमली जामा पहनाया तो इसकी चौड़ाई 120 मीटर हो गई और प्रोजेक्ट का खर्च भी घट कर ₹11,800 करोड़ हो गया। यानी राज्य को ₹3400 करोड़ रुपए की बचत हुई। इतना ही नहीं सड़क की चौड़ाई भी 10 मीटर बढ़ाई गई। सीएम योगी कहते हैं कि कोई भी प्रोजेक्ट किसी भी सरकार ने शुरू किया हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। जो राज्य के हित में है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।

लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे बनने के दौरान हुए करप्शन- बीजेपी

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, जिसका फोटो सोशल मीडिया पर डालकर अखिलेश यादव अपने शासन के दौरान ‘विकास’ को दर्शाते हैं, उस प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। एक्सप्रेस- वे के बनने से पहले किसानों से जमीन कौड़ियों के भाव खरीदकर एसपी नेताओं और उनके परिजनों ने सरकार को प्रोजेक्ट के लिए ये जमीनें बेची। इस दौरान जमकर मुनाफा कमाया गया। यहाँ तक कि आगरा के तत्कालीन डीएम जुहैर बिन सगीर पर आरोप लगा कि उन्होंने एक्सप्रेस वे बनने से पहले अपने रिश्तेदारों को एक्सप्रेस वे वाली जमीन खरीदवाई और फिर मुनाफा कमा कर सरकार को बेच दिया। डीएम जुहैर को अखिलेश यादव का चहेता कहा जाता था। एक्सप्रेस-वे के लिए न केवल जमीन अधिक दाम पर खरीदी गई बल्कि चहेतों को अलग-अलग ठेके भी दिए गए।

अखिलेश यादव ने फैलाया झूठ

अखिलेश यादव एक्सप्रेस वे को लेकर बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं। उन्होंने गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे की ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम पर कहा था कि ‘व्यवस्था’ किसी एडवांस मैनेजमेंट सिस्टम से नहीं, सही नीयत से शासन-प्रशासन चलाने से सुधरती है। अखिलेश यादव मात्र डेढ़ एक्सप्रेस वे बना पाए, उसको लेकर भी कई आरोप लगे। पूर्वांचल का आधा काम भी पूरा नहीं हुआ और योगी सरकार ने कम खर्च पर उससे अच्छा और चौड़ा एक्सप्रेस वे बना कर उनको जवाब भी दे दिया।

टेक्सास में भगवान हनुमान की प्रतिमा पर ट्रंप के समर्थक ने उठाए सवाल, भारतवंशियों ने जमकर लताड़ा: कहा- यह हिंदुओं के पैसों की जमीन पर है

अमेरिका के टेक्सास में शुगरलैंड स्थित श्री अष्टलक्ष्मी मंदिर में भगवान हनुमान की 90 फीट ऊँची विशाल प्रतिमा पर एक बार फिर विवाद सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ता ने प्रतिमा की वीडियो शेयर की है और इसकी मौजूदगी पर सवाल उठाया है। इस पर भारतवंशियों ने उन्हें जमकर लताड़ लगाई है।

सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर रिपब्लिकन के कार्यकर्ता कार्लोस टर्सियोस ने वीडियो शेयर कर लिखा, “यह इस्लामाबाद, पाकिस्तान या भारत का नई दिल्ली नहीं है। यह अमेरिका के टेक्सास राज्य का शुगर लैंड शहर है। तीसरी दुनिया से आए एलियंस धीरे-धीरे टेक्सास और पूरे अमेरिका में बढ़ते जा रहे हैं। आखिर अमेरिका की तीसरी सबसे बड़ी मूर्ति यह क्यों है?”

बता दें कि ‘स्टैच्यू ऑफ यूनियन’ नाम से मशहूर भगनाव हनुमान की ये प्रतिमा अमेरिका की सबसे ऊँची प्रतिमाओं में से एक है। इस प्रतिमा का अनावरण अगस्त 2024 में हुआ था और इसे भारत के प्रसिद्ध मूर्तिकारों द्वारा तैयार किया गया है। यह प्रतिमा भगवान हनुमान को खड़े हुए आशीर्वाद मुद्रा में दर्शाती है, जो शक्ति, भक्ति और साहस का प्रतीक है। प्रतिमा के चलते यह स्थान टेक्सास और आसपास के राज्यों में रहने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ता को भारतवंशियों ने लताड़ा

टेक्सास में भगवान हनुमान की प्रतिमा वाले पोस्ट पर रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ता कार्लोस टर्सियोस को भारतवंशियों ने मिलकर लताड़ा। उनके पोस्ट पर वसंत भट्ट नाम यूजर ने प्रतिक्रिया दी, “यह निजी जमीन पर बना है, जिसे हिंदुओं ने अपने पैसों से खरीदा है। सांस्कृतिक बहस आप लोग सालों पहले ही हार चुके हैं और आने वाले चुनाव भी हारने वाले हैं। आपका ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाला नारा अब सिर्फ पुरानी नस्लवादी सोच जैसा दिखता है।”

आँचल नाम के एक्स यूजर ने कहा, “इसमें गलत क्या है? भारत में भी कई ऐसे धर्मों के पूजा स्थल हैं जिनकी शुरुआत भारत में नहीं हुई। वैसे भी, भारत दुनिया के उन शीर्ष 20 देशों में है जहाँ ईसाइयों की बड़ी आबादी है। हमारे ईसाई भाई-बहन भारत में उतनी ही आज़ादी के साथ रहते हैं जितनी भारतीय हिंदू रहते हैं।”

वहीं ‘हिंदू ऑफ वर्ल्ड’ ने कहा, “इतने ‘बहादुर’ बन रहे हो कि गदा पकड़े एक भगवान की मूर्ति से ही डर लग रहा है।” उन्होंने आगे कहा, “भगवान हनुमान निस्वार्थ सेवा का प्रतीक हैं, शायद तुम्हारी समझ वाली ईसाई धर्म की सोच में यही बात छूट गई। अगर तीसरी दुनिया जैसा व्यवहार देखना है, तो आईने में देखो- नफरत, डर और अज्ञान ही किसी गिरते समाज की असली निशानी होती है।”

उन्होंने यह भी कहा, “तुम एक मूर्ति को ‘हमला’ बता रहे हो, लेकिन असल में तुम्हारा अपना मन कड़वाहट और अज्ञान से भरा हुआ है। मूर्ति की ऊँचाई पर रोते रहो, शायद एक दिन तुम्हारी समझ भी उतनी ऊँची हो जाए।”

एक भारतवंशी ‘कार्तिक गाडा’ ने अमेरिका में बोले जाने वाली भाषाओं का चार्ट पेश करते हुए कहा कि अमेरिका में बोली जाने वाली भाषाओं के आँकड़ों से साफ दिखता है कि करीब 4.1 करोड़ घरों में स्पेनिश बोली जाती है, जबकि टॉ-10 भाषाओं में कोई भी भारतीय भाषा शामिल नहीं है।

उन्होंने कहा कि घर की भाषा किसी समुदाय के घुलने-मिलने का बड़ा संकेत होती है, इसीलिए इस आधार पर अभी तुलना करना सही नहीं है। उन्होंने टर्सियोग पर तंज कसते हुए कहा कि इस हिसाब से तुम्हें अभी लंबा रास्ता तय करना है, तब जाकर तुम भारतीय-अमेरिकियों के बराबर घुलने-मिलने की बात कर सकते हो।

ट्रंप के नेता भी प्रतिमा पर सवाल उठाने पर लताड़े जा चुके

यह पहली बार नहीं है, जब किसी अमेरिकी ने टेक्सास में भगवान हनुमान की प्रतिमा पर सवाल खड़े किए हों। इससे पहले भी रिपब्लिकन पार्टी के नेता और डोनाल्ड ट्रंप के करीबी अलेक्जेंडर डंकन में विवादित टिप्पणी कर चुके हैं, जिसे लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी।

सितंबर 2025 में अलेक्जेंडर डंकन ने भी ‘एक्स’ पर भगवान हनुमान की प्रतिमा का वीडियो शेयर करते हुए सवाल किया था, “हम टेक्सास में इस मूर्ति को क्यों बनने दे रहे हैं? हम एक ईसाई राष्ट्र हैं।” उन्होंने बाइबिल का हवाला देते हुए कहा था कि ईश्वर के अलावा किसी और देवता की पूजा करना और मूर्तियाँ बनाना गलत है। तब भी डंकन के इस बयान ने अमेरिकी हिंदू समुदाय के गुस्से को बढ़ा दिया था।

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) ने उनके बयान की कड़ी आलोचना की थी और इसे हिंदू-विरोधी तथा भड़काऊ करार दिया था। संगठन ने रिपब्लिकन पार्टी से माँग की है कि वे डंकन के खिलाफ कार्रवाई करें, क्योंकि उनके बयान से न केवल धार्मिक भावनाएँ आहत हुई, बल्कि यह अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन के भी खिलाफ है, जो हर धर्म को समान स्वतंत्रता देता है।

‘सवर्णों की शादी नार्सिसिस्टिक, आंदोलन एंटी-डेमोक्रेटिक’: मिलिए गलगोटिया के अंबेडकरवादी डीन रविकांत किसाना से, जिसकी यूनिवर्सिटी ने AI समिट में भारत को कराया शर्मिंदा

इस समय गलगोटिया यूनिवर्सिटी गलत वजहों से सुर्खियों में है। दिल्ली में चल रहे इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में इस यूनिवर्सिटी ने एक रोबोट डॉग को अपनी इनोवेशन बताकर प्रदर्शित किया। नाम दिया ‘ओरियन’। दावा किया कि यह उनके छात्रों और फैकल्टी की मेहनत का नतीजा है। लेकिन सच सामने आते ही हंगामा मच गया। यह रोबोट डॉग असल में चीन की कंपनी यूनिट्री का कमर्शियल प्रोडक्ट Go2 था, जो भारत में आसानी से खरीदा जा सकता है।

सोशल मीडिया पर लोग इसे फ्रॉड बता रहे हैं। आयोजकों ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी के स्टॉल को तुरंत खाली करने का आदेश दे दिया। पूरी दुनिया के सामने भारत की एक यूनिवर्सिटी ने झूठ बोलकर देश की छवि खराब की। लोग पूछ रहे हैं कि ऐसी यूनिवर्सिटी जो झूठ और धोखे पर चलती है, वहाँ शिक्षा का क्या स्तर होगा? खैर, ये सवाल उठा तो हमने इंटरनेट की दुनिया खंगाली और जो कुछ मिला, वो हम आपके सामने रख रहे हैं।

मिलिए गलगोटिया यूनिवर्सिटी के अंबेडरकारी डीन रविकांत से

गलगोटिया यूनिवर्सिटी के लिबरल एजुकेशन स्कूल के डीन हैं डॉ. रविकांत किसाना। खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले किसाना की किताब और बयान भी विवादों में रहते हैं। उनकी किताब “Meet the Savarnas: Indian Millennials Whose Mediocrity Broke Everything” में सवर्ण समाज पर तीखा हमला किया गया है। वे सवर्णों की शादियों को ‘नार्सिसिस्टिक यानि आत्ममुग्ध बताते हैं। यही नहीं, यूजीसी के खिलाफ चले सवर्ण आंदोलनों को ‘एंटी-डेमोक्रेटिक’ कहने से भी नहीं चूकते हैं। खैर, ऐसे व्यक्ति को डीन बनाने वाली यूनिवर्सिटी अब AI समिट में पकड़ी गई है। क्या यह संयोग है या यूनिवर्सिटी की सोच का आईना?

कौन हैं रविकांत किसाना?

रविकांत किसाना खुद को ‘बफेलो इंटेलेक्चुअल’ कहते हैं। वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और पॉडकास्ट भी चलाते हैं। उनकी बायोग्राफी में लिखा है कि वे अम्बेडकरवादी संगठनों जैसे नालंदा अकादमी, वर्धा के साथ मिलकर काम करते हैं। पहले वे फ्लेम यूनिवर्सिटी, IIM कोझीकोड, वोक्सेन यूनिवर्सिटी और NLSIU बेंगलुरु जैसे संस्थानों में पढ़ा चुके हैं।

नवंबर 2025 में इंडिया फेस्टिवल ऑफ पॉडकास्टिंग (IFP) में उन्हें स्पीकर के तौर पर बुलाया गया था, जहाँ उन्हें गलगोटिया यूनिवर्सिटी का डीन और प्रोफेसर बताया गया। जनवरी 2026 में उनके लिंक्डइन प्रोफाइल पर भी यही पद लिखा है – ‘Dean, School of Liberal Education & Languages, Professor, Galgotias University।’

किसाना की विशेषज्ञता क्रिटिकल कास्ट स्टडीज और एथनोग्राफिक रिसर्च में है। लेकिन उनकी लेखनी मुख्य रूप से सवर्ण समाज की आलोचना पर केंद्रित है। वे सवर्णों को ‘कूल, क्लूलेस कस्टोडियंस ऑफ कास्ट प्रिविलेज’ कहते हैं। उनकी किताब में सवर्ण मिलेनियल्स की औसतता (Mediocrity) को भारत की कई समस्याओं की जड़ बताया गया है।

किताब में सवर्णों पर क्या-क्या हमले?

साल 2025 में पेंगुइन रैंडम हाउस से छपी किताब ‘Meet the Savarnas’ में किसाना ने सवर्ण जीवन के हर पहलू को निगेटिव अंदाज में पेश किया है। किताब की शुरुआत में ही वे कहते हैं, “सवर्ण इस किताब को पढ़ें, पचाएँ, आत्ममंथन करें या गुस्सा हों- यह उनकी अपनी पहचान से मिलने का मौका है। अगर उन्हें खुद का चेहरा पसंद नहीं आता, तो यह उनकी अंदरूनी समस्या है।”

एक अध्याय में वे सवर्ण शादियों का वर्णन करते हैं, “एक सामान्य सवर्ण शादी में परिवार के विभिन्न गुट आपस में प्रतिस्पर्धा और साजिश करते हैं। आखिरकार सवर्ण शादी परिवार की विभिन्न शाखाओं में फैली एक कभी न खत्म होने वाली सागा का सिर्फ एक एपिसोड होती है। हर साल कई शादियाँ होती रहती हैं। नए कानून हर शादी में जटिलता बढ़ाते हैं, जबकि व्यक्तिगत शादियों की सेहत और बच्चों का जन्म परिवार की समृद्धि से अंक घटाते हैं। यह तमाशा इतना भव्य और दिखावा भरा होता है कि इसे महत्वपूर्ण मानना ही पड़ता है। लेकिन असल में यह स्पेक्टेकल जितना महत्वपूर्ण लगता है, उतना ही नार्सिसिस्टिक (स्वार्थी और आत्ममुग्ध) भी है।”

किसाना आगे लिखते हैं कि सवर्ण युवा अपनी जवानी में रेडिकल पोज बनाते हैं, लेकिन शादी के बाद वही अंकल-आंटी बन जाते हैं जिनके खिलाफ वे बगावत करते थे। उनकी एक इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा है, “शादी वह पॉइंट है जहाँ सवर्ण अपनी युवावस्था के रेडिकल पोज को छोड़कर ठीक वैसे ही अंकल-आंटी बन जाते हैं जिनके खिलाफ वे बगावत करते थे।”

किताब में सवर्ण आंदोलनों को भी एंटी-डेमोक्रेटिक बताया गया है। किसाना का दावा है कि सवर्ण हमेशा खुद को ‘सेल्फ-मेड’ मानते हैं, अपनी सफलता को सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष का नतीजा बताते हैं, जबकि यह ऐतिहासिक विशेषाधिकारों का परिणाम है। वे ‘ग्लास फ्लोर’ की बात करते हैं – सवर्णों के नीचे एक अदृश्य फ्लोर होता है जो उन्हें गिरने नहीं देता, जबकि दूसरों को तोड़ता है।

एक रिव्यू में लिखा गया, “किसाना की किताब सवर्णों की नाजुक संरचना को किताबी रूप में पहली बार खोलकर रख देती है। यह पढ़ना मजेदार है, लेकिन सवर्णों के लिए शायद असहज करने वाला।”

गलगोटिया कैंपस बना नफरत फैलाने का अड्डा

खास बात ये है कि रविकांत किसाना न सिर्फ खुद सवर्णों के खिलाफ आग उगलता है, बल्कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी के कैंपस को भी सामाजिक न्याय की आड़ में नफरत फैलाने का अड्डा बनाया जा चुका है। गलगोटिया के कैंपस में ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जहाँ खुलेआम नफरत परोसी जाती रही है। ऐसे ही एक कार्यक्रम का पोस्टर भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे देखकर समझ सकते हैं कि जिस यूनिवर्सिटी में ऐसी गतिविधियाँ चलती हों, वहाँ इनोवेशन के नाम पर किस तरह का फ्रॉड होता होगा।

फोटो साभार: X_Ruchhan

किसाना के विवादित सोच पर लोग उठा रहे उंगली

किसाना के बयानों से विवाद स्वाभाविक है। सोशल मीडिया पर लोग उन्हें सवर्ण-विरोधी बताते हैं। एक हालिया पोस्ट में उन्हें ब्राह्मणिकल माइंड को ‘कोलोनाइजर का माइंड’ कहते हुए कोट किया गया। लोग पूछ रहे हैं कि ऐसे विचार रखने वाले व्यक्ति को एक बड़ी यूनिवर्सिटी का डीन बनाना कितना सही है? क्या यह जातीय विभाजन को बढ़ावा नहीं देता?

गलगोटिया यूनिवर्सिटी पहले से ही अपनी डिग्री की गुणवत्ता को लेकर आलोचना झेलती रही है। लोग इसे ‘डिग्री मिल’ कहते हैं। अब AI समिट में चीनी रोबोट को अपना बताकर पकड़े जाने से यह आलोचना और तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है कि यह यूनिवर्सिटी फ्रॉड है और इसे बंद कर देना चाहिए। इसी मौके पर किसाना का डीन होना फिर से चर्चा में आ गया। लोग कह रहे हैं- जो यूनिवर्सिटी इनोवेशन के नाम पर झूठ बोलती है, वहाँ डीन के पद पर ऐसा व्यक्ति है जो समाज को जाति के नाम पर बाँटने का काम करता है।

भारत को शर्मिंदा करने का सिलसिला

AI समिट में हुआ धोखा सिर्फ यूनिवर्सिटी की नहीं, पूरे देश की बदनामी है। प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत के सपने के सामने एक यूनिवर्सिटी ने चीनी प्रोडक्ट को अपना बताकर धोखा दिया। यूनिवर्सिटी ने बाद में सफाई दी कि यह सिर्फ लर्निंग के लिए था, लेकिन पहले दावे कुछ और थे। यह झूठ देश के सामने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करता है।

ऐसी यूनिवर्सिटी में अगर डीन कोई ऐसा व्यक्ति हो जो समाज के बड़े वर्ग को निशाना बनाता हो, तो सवाल उठते हैं कि वहाँ शिक्षा का स्तर क्या है? क्या ऐसी संस्थाएँ युवाओं को एकता सिखाएँगी या विभाजन?

रविकांत किसाना की विचारधारा उनकी व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वे समाज को जोड़ने का काम करें न कि बाँटने का। गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ताजा कारनामा दिखाता है कि संस्थान की प्राथमिकता क्या है। देश को ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो इनोवेशन और एकता सिखाएँ न कि समाज में झूठ फैलाकर विभाजनकारी बातों को बढ़ावा दे।

बांग्लादेश चुनाव में ‘सब चंगा’ लेकिन ECI ‘तुगलकी आयोग’: ममता बनर्जी की ‘खास’ वोट बैंक को साधने की रणनीति

पश्चिम बंगाल की राजनीति में विरोधाभासों का दौर नया नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हालिया बयानों ने नैतिकता और तर्क को एक नए धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक ओर वे पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए चुनावों को ‘अत्यंत शांतिपूर्ण’ बताकर वहाँ की व्यवस्था के प्रति अपना अटूट प्रेम जाहिर कर रही हैं, जबकि हकीकत में वहाँ अल्पसंख्यकों पर जुल्म और हिंसा का हंगामा मचा हुआ है।

दूसरी ओर, वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की रीढ़ यानी भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को ‘तुगलकी’ और ‘वाशिंग मशीन’ जैसे शब्दों से नवाज रही हैं। यह विडंबना ही है कि जिन्हें घर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में खोट नजर आता है, उन्हें सीमा पार की धांधली और खून-खराबे में शांति दिखाई दे रही है।

बांग्लादेश का ‘खूनी चुनावी सच’ और ममता की तारीफ

ममता बनर्जी का यह बयान कि बांग्लादेश के चुनाव कितने शांतिपूर्ण रहे, वास्तव में उन हजारों पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जिन्होंने वहाँ चुनावी हिंसा और मजहबी कट्टरवाद को झेला है। रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव के दौरान अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 10 लोगों की मौत हुई और 2500 से ज्यादा लोग घायल हुए।

वहाँ हिंदुओं के घरों को आग के हवाले किया गया और अल्पसंख्यकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। लेकिन ममता दीदी को यह सब ‘शांतिपूर्ण’ नजर आता है। शायद उनके लिए ‘शांति’ की परिभाषा केवल सत्ता के समीकरणों तक ही सीमित है।

ममता बनर्जी का बांग्लादेश के लिए यह प्रेम अकारण नहीं है, बल्कि यह उनकी खास वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा लगता है। जिस देश में पत्रकारों को पीटा जा रहा है और जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठन सड़कों पर हंगामा कर रहे हैं, वहाँ ममता बनर्जी को सब कुछ ‘हरा-भरा’ नजर आ रहा है।

यह प्रेम केवल कूटनीतिक नहीं है, बल्कि यह एक गहरी तुष्टीकरण की राजनीति की ओर इशारा करता है। जब एक लोकतांत्रिक मुख्यमंत्री पड़ोसी देश की अस्थिरता और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर आँख मूँदकर वहाँ के चुनावों को सर्टिफिकेट बाँटती हैं, तो सवाल उठना लाजमी है।

चुनाव आयोग पर ‘तुगलकी’ वार

भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) निष्पक्ष चुनाव के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, लेकिन ममता बनर्जी के लिए अब एक ‘राजनीतिक दुश्मन’ बन चुका है। उन्होंने चुनाव आयोग को ‘मोहम्मद बिन तुगलक’ और ‘भाजपा की वाशिंग मशीन’ करार दिया है। ममता बनर्जी का कहना है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक अधिकारों को धो रहा है।

दिल्ली की सड़कों पर काला शॉल ओढ़कर विरोध प्रदर्शन करना और सुप्रीम कोर्ट तक भागना, ममता की उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें वे खुद को हमेशा ‘बेचारा’ और केंद्र सरकार को ‘तानाशाह’ साबित करने की कोशिश करती हैं।

ममता बनर्जी का आयोग पर यह हमला तब और तेज हो गया जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गड़बड़ी पाई गई। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के इशारे पर 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और इसकी तुलना ‘रावण द्वारा सीता के अपहरण’ से कर दी।

ममता बनर्जी जनता को यह कहकर भड़का रही हैं कि निर्वाचन आयोग आतंकियों जैसा व्यवहार कर रहा है। जब एक मुख्यमंत्री संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ इस तरह की भाषा का प्रयोग करती हैं, तो वे सीधे तौर पर अराजकता को निमंत्रण देती हैं। उनका यह कहना कि ‘अगर कुछ लोग 420 हैं, तो मैं 440 वोल्ट हूँ,’ डराने और धमकाने वाली राजनीति का प्रमाण है।

बांग्लादेशी चुनावों में धांधली के आरोप

ममता बनर्जी भले ही बांग्लादेश के चुनावों को शांतिपूर्ण कहें, लेकिन वहाँ के जमीनी हालात और खुद वहाँ के नेता कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं। जमात के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन ने खुलेआम चुनाव में अनियमितताओं और धांधली के आरोप लगाए हैं।

जमात-ए-इस्लामी के सहायक महासचिव हामिद उर रहमान आजाद ने साफ कहा कि ‘शुरुआत अच्छी थी, लेकिन अंत बहुत खराब हुआ।’ उन्होंने आरोप लगाया कि जाली वोट डाले गए, काले धन का प्रवाह हुआ और चुनाव के नतीजों में ओवरराइटिंग और गड़बड़ी की गई। कई जगहों पर पोलिंग एजेंटों के हस्ताक्षर तक गायब थे।

हैरानी की बात यह है कि जब बांग्लादेश के भीतर से ही 32 निर्वाचन क्षेत्रों में दोबारा गिनती की माँग उठ रही है और वहाँ की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, तब ममता बनर्जी को वहाँ सब कुछ ‘साफ’ दिखाई देता है। क्या वे उन रिपोर्ट्स को नहीं पढ़तीं जिनमें बताया गया है कि धांधली की कवरेज कर रहे पत्रकारों पर हमले हुए और जमात समर्थकों के घरों को फूँका गया?

भ्रष्ट अधिकारियों को ‘प्रमोशन’ का इनाम

लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब कोई सरकार गलत काम करने वाले अधिकारियों के साथ खड़ी हो जाए। भारतीय निर्वाचन आयोग ने बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गंभीर गड़बड़ी और लापरवाही के आरोप में 7 अधिकारियों (AERO) को निलंबित किया। कायदे से एक मुख्यमंत्री को जाँच का समर्थन करना चाहिए था, लेकिन ममता बनर्जी ने घोषणा कर दी कि वे इन अधिकारियों को ‘प्रमोट’ करेंगी।

वे कहती हैं कि ‘जिन अधिकारियों को ईसी (EC) डिमोट करेगा, हम उन्हें अच्छी जगह पोस्टिंग देंगे और प्रमोशन देंगे।’ यह सीधे तौर पर निर्वाचन आयोग को चुनौती है और उन अधिकारियों को शह देना है जो निष्पक्ष काम करने के बजाय सत्ता के एजेंट बनकर काम करते हैं।

‘घर में आग, पड़ोस में राग’

ममता बनर्जी की राजनीति अब ‘आंदोलन’ से हटकर ‘अराजकता’ की ओर मुड़ती दिख रही है। एक मुख्यमंत्री का यह दोहरा मापदंड रोंगटे खड़े करने वाला है। जिस बांग्लादेश में हिंदुओं के मंदिर तोड़े गए, जहाँ चुनावी हिंसा में हजारों लोग लहूलुहान हुए, वहाँ उन्हें ‘शांति’ की खुशबू आती है।

क्या यह इसलिए है क्योंकि वहाँ की स्थिति पर सवाल उठाने से उनका खास वोट बैंक नाराज हो जाएगा? वहीं दूसरी ओर, अपने ही देश की उस संस्था (ECI) को वे तुगलकी और आतंकवादी जैसा व्यवहार करने वाला बता रही हैं, जिसने उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता दिया।

यह कैसी राजनीति है जहाँ दागी अधिकारियों को ‘सुरक्षा कवच’ दिया जाता है और संवैधानिक संस्थाओं को सरेआम बेइज्जत किया जाता है? ममता जी कहती हैं कि वे ‘सत्य को उजागर’ करेंगी, लेकिन क्या वे उन 500 से ज्यादा घरों और दुकानों का सच देख पा रही हैं जो बांग्लादेश में चुनावी हिंसा की भेंट चढ़ गए? भारतीय लोकतंत्र को ‘वाशिंग मशीन’ कहना आसान है, लेकिन अराजकता को ‘प्रमोशन’ देना बहुत महँगा पड़ेगा।

सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जब एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सड़कों पर लोगों को भड़काने लगे और गलत को सही बताने की जिद पर अड़ जाए, तो नुकसान केवल एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक ढाँचे का होता है। ममता बनर्जी का यह ‘बांग्लादेश प्रेम’ और ‘भारतीय आयोग से नफरत’ केवल एक राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि एक खतरनाक मानसिकता का परिचायक है जो केवल ‘अराजकता’ में ही अपना भविष्य देखती है।

हमारे खिलाफ चल रहा ‘प्रोपेगैंडा कैंपेन’: चीनी रोबोट डॉग को लेकर विवाद के बाद गलगोटिया ने खुद को ही बताया पीड़ित, जानें- कैसे गलत है यूनिवर्सिटी का दावा

गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने 17 और 18 फरवरी की रात खुद को विक्टिम दिखाते हुए एक रिलीज में कहा कि उसके खिलाफ ‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा कैंपेन’ चलाया जा रहा है। यह उस बीच हुआ जब यूनिवर्सिटी को AI इम्पैक्ट समिट 2026 में अपने AI इकोसिस्टम के हिस्से के रूप में चीनी रोबोट डॉग दिखाने पर आलोचना का सामना करना पड़ा। हालाँकि, विश्वविद्यालय के अपने पुराने बयानों, अब डिलीट किए गए DD इंडिया वीडियो और NewsVoir के जरिए जारी प्रेस रिलीज में पूरी तस्वीर कुछ और ही दिखती है।

‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा’ पोस्ट और इनकार

हालिया प्रेस रिलीज में विश्वविद्यालय ने कहा, “यूनिवर्सिटी, फैकल्टी और छात्र अपने विश्वविद्यालय के खिलाफ प्रोपेगैंडा कैंपेन से गहरे आहत हैं।” विश्वविद्यालय ने दावा किया कि रोबोटिक प्रोग्रामिंग पहल केवल छात्रों को AI से परिचित कराने के लिए थी और इसमें ‘वैश्विक रूप से उपलब्ध उपकरण और संसाधनों’ का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने चेतावनी दी कि नेगेटिविटी फैलाना छात्रों के मनोबल को नुकसान पहुँचा सकता है।

इससे पहले जारी एक स्पष्टीकरण में गलगोटिया ने कहा, “स्पष्ट कर दें कि गलगोटिया ने यह रोबोडॉग नहीं बनाया है, न ही हमने ऐसा दावा किया है।” इसमें यूनिट्री रोबोडॉग को केवल एक लर्निंग टूल बताया गया और कहा गया कि विश्वविद्यालय ने इसे कभी स्वदेशी विकास के रूप में पेश नहीं किया। विश्वविद्यालय का कहना था कि उसने कभी भी रोबोडॉग बनाने का ‘दावा’ नहीं किया। लेकिन मौजूद रिकॉर्ड से अलग ही तस्वीर सामने आती है।

डिलीट किए जाने से पहले DD के वीडियो में क्या आया नजर?

AI इम्पैक्ट समिट 2026 में भारत मंडपम में DD इंडिया के अब डिलीट किए गए वीडियो में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह रोबोटिक डॉग को विश्वविद्यालय के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ द्वारा विकसित बताया था। सोशल मीडिया पर इस डिलीट किए गए वीडियो का क्लिप तेजी से शेयर किया जा रहा है।

मूल क्लिप डिलीट किए जाने से पहले लोगों द्वारा खूब शेयर किया गया था। समिट में रोबोडॉग को केवल खरीदे गए डिवाइस के रूप में नहीं बल्कि विश्वविद्यालय के अपने ‘डेवलपमेंट इकोसिस्टम’ के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।

350 करोड़ रुपए का AI इकोसिस्टम और ORION रीब्रांडिंग

दिलचस्प बात यह है कि NewsVoir के जरिए वितरित की गई विश्वविद्यालय की प्रेस रिलीज में खुद विरोधाभास दिखात है। इसकी हेडलाइन में लिखा गया, “गलगोटिया यूनिवर्सिटी पविलियन AI इम्पैक्ट समिट 2026 में 350+ करोड़ रुपए के AI शोकेस के साथ प्रमुख आकर्षण के रूप में उभरा।” प्रेस रिलीज में कहा गया कि विश्वविद्यालय ने ‘कम्प्रीहेंसिव 350+ करोड़ रुपए का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इकोसिस्टम’ पेश किया।

रिलीज में कहा गया कि पविलियन का मुख्य आकर्षण ORION (ऑपरेशनल रोबोटिक इंटेलिजेंस नोड) था, जो ‘प्रतिनिधियों के साथ लाइव इंटरैक्ट करता और रोबोटिक्स व इंटेलिजेंट सिस्टम्स इंटीग्रेशन का प्रदर्शन करता था’।

चीनी यूनिट्री रोबोडॉग को ORION के रूप में रीब्रांड किया गया और विश्वविद्यालय के AI ड्रिवन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर के हिस्से के रूप में पेश किया गया। हालाँकि, दिक्कत यह थी कि रोबोट पर अभी भी यूनिट्री का ब्रांडिंग दिखाई दे रहा था। यानी प्रोडक्ट का नाम बदल दिया गया लेकिन निर्माता के मार्किंग्स नहीं हटाए गए।

गलगोटिया की मासूम बनने की कोशिश

विश्वविद्यालय द्वारा ग्लोबल तकनीक छात्रों के सीखने के लिए इम्पोर्ट करना कोई नई बात नहीं है। गलगोटिया ने खुद लिखा कि ‘इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती’ और छात्रों को अत्याधुनिक उपकरणों से अवगत कराया जाना चाहिए। लेकिन मुद्दा केवल तकनीक खरीदने का नहीं है बल्कि इसे पेश करने का तरीका है।

एक बड़े अंतरराष्ट्रीय समिट में, रोबोट का नाम ORION रखा गया, 350+ करोड़ रुपए के AI इकोसिस्टम के तहत दिखाया गया, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का हिस्सा बताया गया, राष्ट्रीय मीडिया द्वारा बढ़ावा मिला और सरकारी हैंडल पर शेयर किया गया। इसके बाद आलोचना को ‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा’ कहना और यह दावा करना कि ऐसा कभी नहीं कहा गया, विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाता है।

ड्रोन सॉकर

एक और दावा, जो प्रोफेसर नेहा सिंह ने DD न्यूज़ से किया, वह था ड्रोन सॉकर का। यह मूल रूप से एक बॉल के अंदर फिट किया गया ड्रोन है।उन्होंने कहा, “इसके एंड-टू-एंड इंजीनियरिंग से लेकर इसके एप्लिकेशन तक सब कुछ विश्वविद्यालय में हुआ है। और यह भारत का पहला ड्रोन सॉकर एरेना है, जो आप गलगोटिया कैंपस में देख सकते हैं। यहाँ छात्र इसे उड़ाते हैं और इसे नए तरीकों से विकसित कर रहे हैं, इसमें मजबूत और बेहतर फीचर्स जोड़ रहे हैं।”

हालाँकि, सोशल मीडिया यूजर्स ने बताया कि यह ड्रोन काफी हद तक स्ट्राइकर V3 ARF सॉकर ड्रोन जैसा है, जो Skyball द्वारा बेचा जाता है और इसका इस्तेमाल ड्रोन गेम में होता है। इसकी कीमत लगभग $453 (करीब 40,000 रुपए) है।

निष्कर्ष

विवाद का मुद्दा यह नहीं कि छात्र ग्लोबल तकनीक से सीख रहे हैं या विश्वविद्यालय विदेशी हार्डवेयर खरीद रहे हैं। असली मुद्दा यह है कि इन प्रोडक्ट्स को ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर कैसे पेश किया गया और जब सवाल उठे तो कैसे बचाव किया गया। विश्वविद्यालय ने ऐसा दिखाने की कोशिश की कि उसने इन उन्नत तकनीकों को इन-हाउस विकासित किया जो सच नहीं था। सवाल उठने पर उन्होंने कहानी बदलकर खुद को मासूम और आलोचना को भी प्रोपेगैंडा बताकर खारिज करने की कोशिश की।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

जिस ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के विरोध में थीं सोनिया गाँधी, उसे NGT ने दी मंजूरी: जानें- क्या है ₹92000 करोड़ की यह परियोजना जिससे सिंगापुर को पछाड़ देगा भारत

देश के सबसे बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट ग्रेट निकोबार परियोजना को एनजीटी ने मंजूरी दे दी है। 92,000 करोड़ रुपए से बनने वाला यह प्रोजेक्ट भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा। सैन्य रणनीति, सुरक्षा, व्यापार और पर्यावरण के दृष्टिकोण से अंडमान निकोबार का सबसे निचला द्वीप ग्रेट निकोबार काफी अहम है। सरकार को उम्मीद है कि 2040 तक ये पूरी तरह तैयार हो जाएगा।अगर ये प्रोजेक्ट पूरी तरह बन जाता है तो भारत को एक ‘हॉगकॉग’ या ‘सिंगापुर’ मिल जाएगा। भारत हिन्द महासागर में चीन पर बढ़त बना लेगा।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। एनजीटी की कोलकाता स्थिति ईस्टर्न जोनल बेंच ने परियोजना को सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण बताते हुए मंजूरी दी, साथ ही यहाँ पर्यावरण के पर्याप्त सुरक्षा के उपाय किए जाने का शर्त भी लगाया।

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट

सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का जलडमरूमध्य वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है। यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरता है। इसे हिन्द महासागर का ‘चोक प्वांइट पॉलिटिक्स’ का केन्द्र भी माना जाता है।

इस प्रोजेक्ट के कई आयाम है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट। पावर प्लांट, जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से फायदा

भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन जाएगा, लाखों नौकरियाँ पैदा होगी। अभी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट ज्यादा होने से परेशानी आ रही है। जब ग्रेट निकोबार में आधुनिक पोर्ट बनेगा तो कंटेनर सीधे यहाँ पहुँचेंगे। समय के साथ-साथ खर्च भी कम होंगे। दूसरे देशों की शिप भी पहुँचेगी और भारत को समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मिलेगी। इतना ही नहीं सुरक्षा की दृष्टिकोण से भी ये प्रोजेक्ट काफी अहम है। इस प्रोजेक्ट पर 92000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्यौकफ्यू और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाहों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। एक तरह से उसने समुद्र में भारत को घेरने की कोशिश की है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाए। इस प्रोजेक्ट से निगरानी और सैनिकों की मौजूदगी आसान हो जाएगी। इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए भी ये काफी अहम है।

साल 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया। 90000 करोड़ रुपए का ये प्रोजेक्ट शिपिंग, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्रालय के तहत बनेगा और इसे केंद्र से पैसा मिलेगा। इसे चार चरणों में बनाया जाएगा। पहला चरण 2028 तक पूरा होगा, जो 40 लाख TEU (कंटेनर) संभालेगा। 2058 तक ये बंदरगाह 1.6 करोड़ कंटेनर तक संभालने के काबिल हो जाएगा।

ये सिर्फ एक और बंदरगाह बनाने की बात नहीं है, बल्कि ये भारत की समुद्री कमजोरी को ठीक करने का मौका है। भारत के पूर्वी तट के ज्यादातर बंदरगाहों की गहराई 8-12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए कम है। दुनिया के बड़े बंदरगाह 12-20 मीटर गहरे हैं, जो 1.65 लाख टन से ज्यादा के जहाज संभाल सकते हैं। इसीलिए भारत का 25% कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से जाता है। इससे हर साल 1,500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान और अर्थव्यवस्था को 3,000-4,500 करोड़ का झटका लगता है।

गलाथिया बे की 18-20 मीटर की प्राकृतिक गहराई और पूर्व-पश्चिम समुद्री रास्ते के पास इसकी जगह इसे इस निर्भरता को खत्म करने के लिए बिल्कुल सही बनाती है। रणनीतिक तौर पर ये भारत को बांग्लादेश और म्यांमार के कार्गो के लिए सिंगापुर से मुकाबला करने की ताकत देता है, जहाँ अभी 70% से ज्यादा कार्गो विदेशी बंदरगाहों से जाता है।

कॉन्ग्रेस कर रही है विरोध

कॉन्ग्रेस और पर्यावणविद इसके दीर्घकालीन पर्यावरण क्षति को लेकर विरोध कर रहे हैं। परियोजना का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस और पर्यावरणविद का मानना है कि इससे जैव विविधता, पारिस्थिकी तंत्र और शेरोन जैसे जनजातीय समुदाय को नुकसान होगा, जिनकी आबादी पहले ही सैकड़ों में बची है।

परियोजना के विरोध में कई याचिकाएँ कोलकाता हाईकोर्ट में अभी लंबित हैं। इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी ने कहा कि ‘शोम्पेन और निकोबारी जनजातीय का अस्तित्व दाँव पर है’ और ‘भारत की आने वाली पीढ़ियाँ इस बड़े पैमाने की तबाही को नहीं झेल सकतीं।’ लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी कुछ नहीं कह रही हैं।

भारत का 40% से ज्यादा ट्रांसशिपमेंट कोलंबो से होता है, जहाँ चीन एक टर्मिनल चलाता है और उसने वहाँ अरबों रुपये लगाए हैं। श्रीलंका बीजिंग के कर्ज में डूबता जा रहा है और वहाँ चीनी जासूसी जहाज भी रुकते हैं। इससे भारत की कमजोरी साफ दिखती है। ऐसे में गलाथिया बे का विरोध करना पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि रणनीतिक भूल है।

भारत अब विदेशी बंदरगाहों का इस्तेमाल और चीन के दबदबे को हिन्द महासागर में झेल नहीं सकता। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर्यावरण को नष्ट करने का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, नौकरियाँ पैदा करने और भारत को समुद्री ताकत बनाने का प्रोजेक्ट है।

PM मोदी ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान को लिखा पत्र, भारत आने का दिया न्यौता: क्या हैं कूटनीतिक मायने?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान और उनके परिवार को भारत की आधिकारिक यात्रा का निमंत्रण दिया है। यह निमंत्रण प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के माध्यम से सौंपा जो तारिक रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में ढाका पहुँचे थे।

बीते मंगलवार (17 फरवरी 2026) को बांग्लादेश के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने शपथ ली। इस अवसर पर भारत की ओर से लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ढाका पहुँचे और शपथ ग्रहण समारोह के बाद तारिक रहमान से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का पत्र उन्हें सौंपा। तारिक रहमान ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की भारी बहुमत जीत के बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है।

PM मोदी ने पत्र में क्या लिखा?

PM मोदी ने तारिक रहमान को बधाई देते हुए पत्र में लिखा, “आपकी जीत इस बात का प्रमाण है कि बांग्लादेश के लोगों ने आप पर भरोसा और विश्वास जताया है और आपके नेतृत्व में देश को शांति, स्थिरता और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए जो जनादेश दिया है। दो करीबी पड़ोसी देशों के रूप में भारत और बांग्लादेश के बीच गहरा संबंध है जो हमारे साझा इतिहास, सांस्कृतिक जुड़ाव और हमारे लोगों की शांति व समृद्धि की आकांक्षाओं पर आधारित है।”

पीएम मोदी ने आगे लिखा, “मैं आपके साथ मिलकर हमारे बहुआयामी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने, क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने और कनेक्टिविटी, व्यापार, तकनीक, शिक्षा, कौशल विकास, ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा, साथ ही सांस्कृतिक और जन-संपर्क गतिविधियों सहित विभिन्न क्षेत्रों में हमारे साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने की आशा करता हूँ। दो तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में, भारत और बांग्लादेश वास्तव में एक-दूसरे के सतत विकास के लिए प्रेरक बन सकते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा में मदद कर सकते हैं और आपसी समृद्धि सुनिश्चित कर सकते हैं।”

उन्होंने उन्हें आमंत्रण देते हुए लिखा, “मैं इस अवसर का उपयोग करते हुए आपको, डॉ. जुबैदा रहमान और आपकी बेटी जैमा के साथ सुविधाजनक समय पर भारत आने का आमंत्रण देता हूँ। भारत में आपका हार्दिक स्वागत होगा।”

पत्र को लेकर क्या है विश्लेषकों का मत?

विश्लेषकों का मानना है कि भारत-बांग्लादेश के बीच मजबूत पारस्परिक संबंधों और क्षेत्रीय सहयोग को ध्यान में रखते हुए यह निमंत्रण दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूती प्रदान करेगा। शपथ ग्रहण समारोह में भारत की भागीदारी और प्रधानमंत्री मोदी का संदेश बांग्लादेश में भारत की सकारात्मक छवि को और सुदृढ़ करने वाला माना जा रहा है।

इस पत्र को लेकर राजनयिकों का मानना है कि यह कदम उस बड़े प्रयास का हिस्सा है जिसमें यूनुस की पिछली सरकार के दौरान बिगड़े भारत-बांग्लादेश संबंधों को सुधारा जा रहा है। उस समय दोनों देशों के बीच सहयोग कम हो गया था और बयानबाजी भी काफी तीखी थी, जिससे रिश्तों में खटास साफ दिखी थी। नई दिल्ली को बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हुए हमलों के मामले में उचित प्रतिक्रिया न मिलने और भारतीय सरकार व मीडिया की लगातार की जा रही आलोचनाओं पर चिंता थी।

ऐसे माहौल में, PM मोदी का रहमान को व्यक्तिगत संदेश देना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पुराने मतभेद भुलाकर अब सीधे राजनीतिक संवाद के जरिए विश्वास फिर से बनाया जा सकता है। शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय लोकसभा अध्यक्ष की मौजूदगी ने यह संदेश और भी मजबूत कर दिया कि भारत, बांग्लादेश के नए नेतृत्व के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार और उत्साहित है।

खालिदा जिया के निधन पर PM मोदी ने भेजा था शोक संदेश

पिछले साल दिसंबर में जब बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और तारिक रहमान की माँ खालिदा जिया का निधन हुआ तब प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के जरिए रहमान को शोक पत्र भेजा था। पत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए लिखा कि उन्हें जून 2015 में ढाका में बेगम साहिबा से हुई मुलाकात और बातचीत की याद बहुत जीवंत है।

उन्होंने लिखा था कि बेगम साहिबा एक मजबूत इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय वाली नेता थीं और वे बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव भी हासिल कर चुकी थीं। उन्होंने न केवल बांग्लादेश के विकास में बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

फडणवीस सरकार ने महाराष्ट्र में 5% मुस्लिम आरक्षण किया रद्द, 2014 में कॉन्ग्रेस- NCP सरकार ने अध्यादेश लाकर दिया था कोटा

महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से कमजोर माने जाने वाले मुस्लिमों को दिए जा रहे 5 फीसदी आरक्षण को खत्म कर दिया है। 2014 में ये व्यवस्था लागू की गई थी लेकिन देवेन्द्र फडणवीस सरकार ने 17 फरवरी 2026 को इस आदेश को रद्द कर दिया।

सरकारी आदेश के मुताबिक, 2014 में जिन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिमों को विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (SBC-A) के तहत आरक्षण दिया गया था, वह आदेश अब समाप्त कर दिया गया है। इसमें सरकारी और अर्ध सरकारी नौकरियों में सीधी भर्ती और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के दौरान आरक्षण मिलता था। इसपर रोक लग गई है। नए आदेश के बाद मुस्लिमों को जारी किया जाने वाला जाति प्रमाणपत्र और वैधता प्रमाणपत्र पर भी रोक लग गई है। 2014 का यह आदेश अनिश्चित स्थिति में था, जिसे सरकार ने रद्द कर स्थिति साफ कर दी है।

महाराष्ट्र में जुलाई 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार ने मुस्लिमों और मराठा आरक्षण को अध्यादेश के जरिए लागू किया था। मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण और मुस्लिम समुदाय को 5 फीसदी आरक्षण दिया गया था। इससे राज्य में आरक्षण कुल 73 फीसदी हो गया था। दोनों आरक्षण का प्रस्ताव तत्कालीन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नसीम खान ने कैबिनेट के सामने रखा था, जिसे मंजूरी मिल गई थी। इसके बाद मुस्लिमों में पात्रता प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश दिए गए।

बॉम्बे हाईकोर्ट में दी गई चुनौती

हालाँकि 2014 में ही इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने 14 नवंबर 2014 को अंतरिम आदेश जारी कर 16 फीसदी मराठा आरक्षण पर रोक लगा दी, क्योंकि इससे 50 फीसदी आरक्षण की सीमा का उल्लंघन हो रहा था, लेकिन मुस्लिम आरक्षण को बरकरार रखा था। 2019 में हाईकोर्ट ने मराठा आरक्षण को वैध ठहराया, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में रद्द कर दिया।

अध्यादेश की अवधि समाप्त हो चुकी है

फडणवीस सरकार का कहना है कि जिस अध्यादेश के जरिेए मुस्लिम आरक्षण लागू किया गया, उसकी अवधि खत्म हो चुकी है। ये कानून में तब्दील नहीं हुआ है इसलिए अवधि समाप्त होते ही अध्यादेश के आदेश भी खत्म हो जाते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने संबंधित आदेश को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया है।

सरकार के मुताबिक, ये आदेश सरकारी रिकॉर्ड को दुरुस्त करने के लिए दिया गया है। हालाँकि जानकार बता रहे हैं कि मुस्लिम आरक्षण राज्य का संवेदनशील मुद्दा है इसको लेकर राज्य में प्रतिक्रिया हो सकती है।

उपसचिव का भी तबादला

अल्पसंख्यक विभाग के उप सचिव मिलिंद शेनॉय का ट्रांसफर कर दिया गया है। माना जा रहा है कि ये कार्रवाई 28 जनवरी से 2 फरवरी 2026 के बीच 75 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों को रिकॉर्ड समय में अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने को लेकर हुए विवाद के बाद लिया गया। कई फाइलों पर पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद डिजिटल हस्ताक्षर मिले, इसके बाद कहा गया कि मंत्री के निधन के बाद इतनी जल्दी इतनी फाइल क्लियर कैसे हुई। विवाद के बाद सीएम फडणवीस ने सारी मंजूरियाँ रद्द कर दी।

‘पायजामे का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश’: SC ने पलटा इलाहाबाद HC का आदेश, CJI बोले- इसे हल्के में लेना समाज के लिए खतरनाक

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 फरवरी 2026) को अहम फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला को गलत तरीके से छूना और उसके पायजामे की नाड़ा खोलना ‘रेप की कोशिश’ नहीं माना जा सकता।

शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अगर कोई आरोपित किसी लड़की का पायजामा खोलने की कोशिश करता है, उसके कपड़े से छेड़छाड़ करता है और उसे जबरन खींचता है, तो यह केवल छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न नहीं बल्कि साफतौर पर ‘रेप की कोशिश’ की श्रेणी में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य को हल्के में लेना कानून और समाज, दोनों के लिए खतरनाक है।

अदालत ने यह भी माना कि हाई कोर्ट का नजरिया कानून की सही व्याख्या नहीं करता और इससे गलत संदेश जा सकता है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला खारिज कर दिया और कहा कि इस मामले में रेप की कोशिश से जुड़ी धाराएँ लागू होंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुओ मोतो (Suo Motu) यानी खुद संज्ञान लिया, क्योंकि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ NGO ‘वी द वीमन’ (We the Women) सहित वरिष्ठ वकीलों और एक्सपर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था कि यह निर्णय ‘संवेदनहीन’ और कानून के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई में जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस एनवी अनजारिया की बेंच ने इस मामले में सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि किसी अपराध को कोशिश मानने के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह पूरी तरह अंजाम तक पहुँच जाए। अगर आरोपित ने ऐसा ठोस कदम उठा लिया हो जिससे साफ पता चले कि उसका इरादा अपराध करने का था और वह उस दिशा में आगे बढ़ चुका था, तो उसे कोशिश माना जाएगा।

अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपित का व्यवहार स्पष्ट रूप से गंभीर यौन हमले की दिशा में था और इसे हल्के अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में BNS की धारा 376 को धारा 511 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो बलात्कार की कोशिश से जुड़ी है। साथ ही POCSO कानून की धारा 18 भी लागू होगी, जो नाबालिग के साथ पेनिट्रेटिव यौन अपराध की कोशिश से संबंधित है।

अदालत ने यह भी कहा कि नाबालिगों के मामलों में अदालतों को ज्यादा संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए और तकनीकी आधार पर गंभीर धाराएँ हटाना न्याय के उद्देश्य के खिलाफ है।शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के उस हिस्से को पूरी तरह रद्द कर दिया जिसमें बलात्कार की कोशिश की धारा हटाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मामला उन्हीं गंभीर धाराओं के तहत आगे बढ़े जैसा निचली अदालत ने पहले तय किया था।

क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला?

दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 17 मार्च 2025 को एक विवादित फैसला सुनाया था, जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी थी। यह आदेश जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने दिया था। मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले से जुड़ा था, जहाँ एक 11 साल की नाबालिग बच्ची के साथ छेड़छाड़ का आरोप था। घटना साल 2021 की बताई गई थी।

मामले के अनुसार, दो आरोपितों पर आरोप था कि उन्होंने बच्ची के साथ जबरदस्ती की, उसके स्तन पकड़े, उसका पायजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे एक सुनसान जगह की ओर खींचने की कोशिश की। निचली अदालत ने इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए आरोपितों को BNS की धारा 376 (रेप) और POCSO एक्ट की धारा 18 (रेप की कोशिश) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया था।

लेकिन 17 मार्च 2025 के अपने फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध त्थ्यों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि आरोपितों ने ‘रेप करने की पूरी कोशिश’ की थी। अदालत ने कहा कि सिर्फ पायजामे का नाड़ा तोड़ना और शरीर के ऊपरी हिस्से को पकड़ना, अपने आप में ‘रेप की कोशिश’ साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि कथित तौर पर कपड़े पूरी तरह नहीं उतारे गए थे।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि यह कृत्य गंभीर है, लेकिन इसे गंभीर यौन उत्पीड़न माना जाएगा, न कि रेप की कोशिश। इसीलिए अदालत ने BNS की धारा 354(b) और POCSO एक्ट की धारा 9/10 के तहत मुकदमा चलाने को सही ठहराया।