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130 लोगों के सामने ‘नंगा’, रूम से लेकर बरामदे तक घसीट-घसीट कर मारा: 97 लोगों से पूछताछ, जे एस सिद्धार्थन की मौत में SFI के गुंडों की रूह कँपाने वाली हर डिटेल

केरल के वायनाड के एक मेडिकल कॉलेज में फरवरी माह में एक छात्र जे एस सिद्धार्थन की मौत के विषय में नए खुलासे हुए हैं। छात्र की मौत हॉस्टल में रैगिंग के दौरान प्रताड़ना के बाद हुई थी। यह रैगिंग लेने वालों में वामपंथी छात्र संगठन SFI के गुंडे भी शामिल थे। अब इस विषय में एंटी रैगिंग कमिटी की रिपोर्ट आई है।

कमिटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि सिद्धार्थन 15 फरवरी, 2024 को कॉलेज से घर के लिए निकल गया था। हालाँकि, उसे फोन करके वापस हॉस्टल बुलाया गया। सिद्धार्थन 16 फरवरी की सुबह हॉस्टल लौट आया। इसके बाद प्रताड़ना का दौर चालू हुआ।

रिपोर्ट में बताया गया है कि उसे दूसरे हमलावर छात्रों द्वारा कॉलेज के पास एक पहाड़ी पर ले गया गया, यहाँ उसको बुरी तरीके से मारा पीटा गया। उसको मारने पीटने के लिए तार, बेल्ट और ऐसी ही चीजों का उपयोग किया गया। इसके बाद उसे वापस पकड़ कर हॉस्टल लाया गया।

यहाँ कमरा नम्बर 21 में उसे दुबारा प्रताड़ना दी गई। उसके पेट और पीठ पर मुक्के मारे गए। कई छात्र उसे काफी देर तक पीटते रहे। सिद्धार्थन को इसके बाद सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगने को कहा गया। सिद्धार्थन पर आरोप लगाया गया कि उसने एक लड़की से बदतमीजी की थी।

उसे हॉस्टल में मात्र एक अंडरवियर में लाया गया और सबके सामने माफ़ी मँगवाई गई। इसके बाद उसकी हॉस्टल में परेड निकाली गई। इस परेड के दौरान भी उस पर हमले हुए और प्रताड़ना चलती रही। सबके बीच में सिद्धार्थन को पीटा गया। इसके बाद वापस सिद्धार्थन को हॉस्टल के अंदर लाकर प्रताड़ना दी गई।

सिद्धार्थन को इतना मारा गया कि उसके पेट में दर्द उठा। कुछ छात्रों ने उसकी जाँच के बाद कुछ दवा दी। बताया गया कि सिद्धार्थन को खाना तक नहीं दिया गया था। इसके बाद 18 फरवरी को सिद्धार्थन का शव एक बाथरूम में लटकते हुए पाया गया। इस बात की जानकारी डीन को भी दी गई।

कॉलेज और हॉस्टल प्रशासन ने इस पर कार्रवाई करने के बजाय मामला छुपाने का प्रयास किया। कमिटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि सिद्धार्थन को प्रताड़ना देते हुए 130 छात्रों ने देखा। 97 छात्र और शिक्षक इस विषय में कमिटी के सामने पेश हुए। हालाँकि, कई लोग पूरी जानकारी देने बच रहे हैं।

इस मामले का मुख्य आरोपित शिंजो जॉनसन है जिसने सिद्धार्थन को सबसे ज्यादा प्रताड़ना दी। इस मामले में 18 छात्रों को आरोपित बनाया गया था। यह सभी पुलिस की गिरफ्त में हैं। इनमे से कुछ वामपंथी छात्र संगठन SFI के सदस्य थे। सिद्धार्थन के पिता का कहना है कि उनके बेटे को मारा गया है।

उन्होंने पुलिस पर धीमी कार्रवाई का आरोप भी लगाया था। सिद्धार्थन के माता पिता केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से भी मिले थे। उन्होंने सीबीआई जाँच की माँग की थी। CM विजयन ने कहा है कि मामले में राज्य की पुलिस कार्रवाई कर रही है लेकिन राज्य सीबीआई को जाँच सौंपेगा।

हर माँ अपने बेटे को कसम खिलाए कि वोट केजरीवाल को ही देना: दिल्ली के CM की नई राजनीति, कभी खाई थी अपने बच्चों की झूठी कसम

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वोट पाने के अलग तरकीब अपनाई है। अरविंद केजरीवाल अब महिलाओं से कह रहे हैं कि वो ‘मोदी-मोदी’ करने वाले अपने अपने पतियों को खाना ही देने से मना कर दिया है। केजरीवाल ने कहा कि महिलाएँ अपने पतियों को तब तक रात का खाना न दें, जबतक वो मुझे (अरविंद केजरीवाल को) वोट देने के लिए मान न जाएँ। महिलाएँ अपने पतियों को कसम दिलाएँ और तब तक खाना न दें, जबतक वो आप को वोट देने के लिए मान न जाएँ। माँएं अपने बेटों को कसम दिलाएँ कि वो मोदी को वोट न दें, केजरीवाल को वोट दें।

आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल ने दिल्ली में ‘महिला सम्मान समारोह’ नामक एक टाउनहॉल कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि बहुत से लोग पीएम मोदी का नाम जप रहे हैं, लेकिन आपको इसे ठीक करना होगा। केजरीवाल ने महिलाओं कहा कि अगर आपके पति मोदी का नाम जपते हैं, तो उन्हें बताएँ कि आप उन्हें रात का खाना नहीं देंगी।

सीएम केजरीवाल ने महिलाओं से कहा कि वे अपने परिवार के सदस्यों से कसम खाने को कहें कि वे उनका और आप का समर्थन करेंगे। उन्होंने महिलाओं से यह भी कहा कि वे बीजेपी का समर्थन करने वाली अन्य महिलाओं को बताएँ कि केवल आपका भाई केजरीवाल ही आपके साथ खड़ा होगा।

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सोचकर घर नहीं बैठना, वे बहुत बदमाश हैं। क्या पता ईवीएम में कुछ कर रखा हो लेकिन अगर उससे 10 फीसदी वोट इधर-उधर हों तो हमें 20 फीसदी ज्यादा के लिए काम करना है। अब यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप अपने पतियों, भाइयों, पिता और इलाके के अन्य लोगों को उस व्यक्ति को वोट देने के लिए मनाएँ जो उनके लाभ के लिए काम कर रहा है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आगे कहा कि अब तक महिलाओं को सशक्त बनाने के नाम पर धोखाधड़ी की जा रही थी। केजरीवाल से पूछा, पार्टियाँ किसी महिला को कोई पद देती हैं और कहती हैं कि महिलाएं सशक्त हो गई हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि महिलाओं को पद नहीं मिलना चाहिए, उन्हें बड़े पद और टिकट मिलने चाहिए, उन्हें सब कुछ मिलना चाहिए। लेकिन इससे केवल दो या चार महिलाओं को ही फायदा होता है। बाकी महिलाओं को क्या मिलता है।

1000 रुपए का भी दिया वास्ता

दिल्ली सरकार द्वारा अपने 2024-25 के बजट में 18 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं को 1,000 रुपए की मासिक राशि प्रदान करने की योजना की घोषणा के बाद महिलाओं के साथ बातचीत करने के लिए यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। महिलाओं को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा कि मैंने आपकी बिजली मुफ्त कर दी है, उनकी बस टिकट मुफ्त कर दी है और अब मैं महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये दे रहा हूँ। बीजेपी ने उनके लिए क्या किया है? फिर बीजेपी को वोट क्यों दें? इस बार केजरीवाल को वोट दें।

समाज को बचाने के लिए वीर देते थे खुद का बलिदान, महान भारतीय परंपरा का बेंगलुरु में मिला साक्ष्य: बुरी शक्तियों को भगाने के लिए होता था बलिदान

13वीं और 14वीं शताब्दी में बेंगलुरु के वीर समाज को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए खुद का बलिदान देते थे। वह स्वयं का वध करके समाज का उद्धार करते थे। इन्हें समाज में नायक के तौर पर देखा जाता था। यह सभी जानकारियाँ इन बलिदानियों की मूर्तियाँ मिलने के बाद हो रहे एक शोध में सामने आई हैं।

वर्तमान में बेंगलुरु में द मिथिक सोसायटी नाम की एक संस्था यहाँ से प्राप्त अलग अलग मूर्तियों को 3D डिजिटल तरीके से संरक्षित कर रही है। इन्हें बेंगलुरु के अलग अलग हिस्सों से 14 ऐसी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जिनमें से स्वयं के बलिदान देते हुए लोगों को प्रदर्शित किया गया है। शोधकर्ताओं ने बताया है कि प्राचीन बेंगलुरु में यह चलन था कि लोग समाज को बचाने के लिए खुद का बलिदान देने से नहीं कतराते थे।

डेक्कन हेराल्ड को इस शोध के मुखिया उदय कुमार ने बताया, “यह मूर्तियाँ दर्शाती हैं कि इस इलाके में खुद का बलिदान दिया जाता था। ये बलिदान अधिकांश समय समाज में व्याप्त बुराई को दूर करने के लिए दिए जाते थे। इन बलिदान को वीरतापूर्ण कार्य माना जाता था क्योंकि यह समाज या गाँव की भलाई के लिए किया जाता था। आमतौर पर, यह बड़ी समस्याओं जैसे कि सूखे को खत्म करने या फिर महामारी को सही करने के लिए दिए जाते थे।”

यह बलिदान किसी देवी देवता को प्रसन्न करने या कठिन समय में आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद अपना आभार व्यक्त करने के लिए दिए जाते थे। बलिदान के भी एक से अधिक तरीके प्रचलित थे। कुछ लोग तलवार से अपना सर धड़ से अलग कर लेते थे तो कुछ एक ऊँचाई से किसी तलवार पर कूदते थे।

बेंगलुरु के अलग अलग इलाकों में यह मूर्तियाँ मिली हैं। इनमें से कुछ मूर्तियों में सजावट भी दिखती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जिनके शरीर पर गहने आदि दिख रहे हैं, वह बलिदानी राजपरिवार के सदस्य हो सकते हैं। कई मूर्तियाँ पुरातन मंदिरों के निकट पाई गई हैं। बताया गया है कि जिन लोगों ने अपने बलिदान दिए, इतिहास में उनके सम्मान में मूर्तियाँ बनाई गईं।

हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब कर्नाटक में ऐसी मूर्तियाँ पाई गई हैं। इससे पहले 2018 में भी स्वयं का बलिदान देने सम्बंधित मूर्तियाँ कर्नाटक के ही शिवमोगा में पाई गईं थी। इनमें भी जिन लोगों को प्रदर्शित किया गया था, वह स्वयं का बलिदान देते हुए देखे गए थे। बेंगलुरु में पाई गई मूर्तियों के सम्बन्ध में शोधकर्ताओं ने बताया है कि इनकी खोज के बाद आमजनों को इनकी वीरतापूर्ण कहानियों के विषय में बताया जाएगा। इसके लिए एक डिजिटल मानचित्र भी तैयार किया गया है।

जिस अवैध दरगाह से चले थे पत्थर, घायल हुए थे पुलिस वाले… बुलडोजर से अब वो जगह समतल: रातों-रात ध्वस्त किए गए दरगाह का मलबा भी साफ

गुजरात के जूनागढ़ में नगर निगम ने एक बड़ी कार्रवाई की है। यहाँ मजेवाड़ी गेट के पास विवादित अवैध दरगाह को ध्वस्त कर दिया गया है। ध्वस्तीकरण के बाद मलबे को भी रातों-रात हटवा दिया गया। यह कार्रवाई 9-10 मार्च 2024 की रात को की गई है। मौके पर पुलिस प्रशासन मुस्तैद रहा। यह वही दरगाह है, जहाँ पिछले साल एक मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी की थी। तब के बवाल को काबू करते हुए पुलिस के कई जवान घायल हो गए थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह दरगाह जूनागढ़ शहर के बीच में मजेवाडी गेट के पास बनी थी। 9-10 मार्च की रात को यहाँ बड़ी तादाद में प्रशासनिक अमला पहुँचा। प्रशासन के इस जत्थे में पुलिस के जवान और नगर निगम के कर्मचारी थे। कुछ ही देर में बुलडोजर बुलवाया गया और उसे अवैध घोषित दरगाह पर चला दिया गया।

रातों-रात मालवाहक वाहनो में भर कर इस दरगाह का मलबा भी हटवा दिया गया। इस दौरान तालाब दरवाजा स्थित जलाराम मंदिर और रेलवे स्टेशन रोड स्थित रामदेवपीर मंदिर पर भी अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई की गई। हालाँकि हिन्दू समाज ने प्रशासन का पूरा सहयोग किया।

इस से पहले मजेवाड़ी गेट के पास बनी अवैध दरगाह को ध्वस्त करने का प्रयास जून 2023 में किया गया था। तब इस कार्रवाई से पहले नोटिस जारी की गई थी। नोटिस मिलते ही मुस्लिम समुदाय के लोगों की भीड़ बड़ी तादाद में घरों से निकल कर सड़क पर आ गई थी। ‘अल्लाह हु अकबर’ का नारा लगाती इस भीड़ ने पुलिसकर्मियों की हत्या का प्रयास किया था। इस हमले में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए थे, जिसमें महिला स्टाफ भी शामिल थीं। पुलिस वालों को घायल करने के बाद सैकड़ों की यह भीड़ शहर की तरफ बढ़ गई थी।

कट्टरपंथी इस्लामी भीड़ ने तब एक एसटी बस को भी निशाना बनाते हुए भीषण पत्थरबाजी की थी। कई वाहनों में तोड़फोड़ के बाद आग भी लगा दी गई थी। इसी हंगामे के चलते एक बेगुनाह हिन्दू की मौत भी हो गई थी।

इस उपद्रव में बुर्का पहने कई महिलाओं के साथ नाबालिग बच्चों के भी शामिल होने की आशंका जताई गई थी। अतिरिक्त पुलिस बल बुला कर इस हिंसक भीड़ को काबू किया गया था। तब पुलिस ने FIR दर्ज करके कई उपद्रवियों को गिरफ्तार भी किया था। आखिरकार अब इस दरगाह को ध्वस्त कर ही दिया गया।

बताते चलें कि अतिक्रमण के खिलाफ गुजरात सरकार इन दिनों कड़े कदम उठा रही है। कई जगहों से अवैध कब्जेदारी को हटाया जा रहा है। 2 दिन पहले ही कच्छ के खावड़ा इलाके में तीन अवैध मदरसों को बुलडोजर चला कर ध्वस्त किया गया था। इसके अलावा शुक्रवार (8 मार्च) को जामनगर में कुख्यात अपराधी रजाक साइचा और उसके भाई के 2 अवैध बंगलों पर प्रशासन का बुलडोजर चला था।

13 साल की जिस बच्ची से बार-बार रेप, BBC के लिए वो सेक्स के मामले में ‘अनुभवी’… बलात्कारी मोहम्मद भाइयों के ‘संघर्ष’ पर डॉक्यूमेंट्री

बीबीसी ने साल 2016 में अपने कार्यक्रम न्यूजलाइट में एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई थी, जिसमें एक सीरियन परिवार को पीड़ित दिखाते हुए उनके ब्रिटेन पहुँचने की 11 महीने की कड़ी यात्रा को दिखाया गया था। उन पर बाद में रेप और टॉर्चर जैसे दोष साबित हुए और जेल की सजा सुनाई गई, लेकिन बीबीसी लगातार अपनी बेशर्मी दिखाता रहा और ‘सीरियन ग्रूमिंग गैंग’ को मासूम बताता रहा। यही नहीं, उसके पीड़ित 13 साल की बच्ची को ही सेक्स के मामले में ‘अनुभवी’ और ‘नस्लभेदी’ बता डाला। जिसके बाद अब लोगों का गुस्सा बीबीसी पर उतर रहा है।

इस सीरियन ग्रूमिंग गैंग को न्यूकैसल ग्रूमिंग गैंग का नाम दिया जा रहा है, जिसकी अगुवाई मोहम्मद उमर (Md Omer) और मोहम्मद बदरेद्दीन कर रहे थे। इन्हें कोर्ट ने कुल 38 साल 6 महीने की सजा सुनाई है। उन्होंने 13 साल की लड़की का अगस्त 2018 से अप्रैल 2019 के बीच अनगिनत बार रेप किया और मुँह खोलने पर जान से मारने की धमकी दी। पीड़ित ने कहा कि इस गैंग ने उसकी जिंदगी को नर्क बना दिया था। कोर्ट ने मोहम्मद बदरेद्दीन को 6 बार रेप और एक बार हिंसा के लिए 13 साल की कैद की सजा सुनाई है। बदरेद्दीन की उम्र अब 23 साल हो चुकी है, तो उसके भाई उमर को 5 बार रेप और धमकाने के मामले में 18 साल की कैद की सजा सुनाई है।

इस मामले में ग्रूमिंग गैंग के हुजेफा अलेबाउद (23) को रेप के तीन मामलों और यौन हिंसा से जुड़े एक मामले में साढ़े 5 साल की सजा सुनाई गई है, तो हामौद अल सोएमी(21) को तीन यौन हिंसा के मामले में 2 साल की सजा और 180 घंटों की सामुदायिक सेवा की सजा सुनाई सुनाई गई है।

पीड़ित ने बताई आपबीती, सिहर गए लोग

पीड़ित बच्ची ने बताया कि सीरियाई लोगों ने उसे टॉर्चर किया। उसे जब चाहा, तब बुलाया और उसके साथ रेप किया। उन्होंने उसकी जिंदगी को नर्क बना दिया। बदरेद्दीन ने कम से कम 7 बार उसका रेप किया और जान से मारने की धमकी दी। यही नहीं, उसे धमकाया गया कि अगर बुलाने पर वो नहीं आएगी, तो उसे उठाकर दूसरे देश ले जाएँगे। वहीं, बदरेद्दीन ने अपने बचाव में कहा कि उसने ऐसा कुछ नहीं किया है। लड़की सीरियाई लोगों ने से नफरत करती है, इसलिए उस पर ये आरोप लगाए गए। हालाँकि तमाम बयानों, सबूतों के आधार पर अब उन्हें दोषी ठहराया जा चुका है।

बीबीसी ने हर बार किया बेशर्मी से बचाव

डॉक्यूमेंट्री के वॉयसओवर सेगमेंट के दौरान यह दावा किया गया था, ‘सीरियाई अपराधी कई मायनों में उस लड़की की तुलना में कम ‘यौन अनुभवी’ दिखाई देते हैं जिनके बारे में माना जाता था कि उन पर हमला किया गया था।’ बीबीसी ने इन सीरियाईयों के पक्ष में ये कहकर भी इनका बचाव किया कि इन लोगों को अंग्रेजी नहीं आती, इसलिए ब्रिटेन के अधिकारियों ने इनके गलत बयान दर्ज किए, ताकि इन्हें ‘फ्रेम’ किया जा सके। बीबीसी पर कंजर्वेटिव पार्टी के सांसद और पूर्व मंत्री नील ओ’ब्रायन ने हमला बोला, उन्होंने बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री को खराब बताया और यौन अपराधियों को बचाने की कोशिश करने के लिए निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि बीबीसी को माफी माँगनी चाहिए, लेकिन बेशर्म बीबीसी ऐसा करता दिख नहीं रहा।

बीबीसी ने इस मामले में इस परिवार पर बनाई अपनी डॉक्यूमेंट्री का ये कहकर बचाव किया कि उस समय उन लोगों पर कोई आरोप नहीं थे। बाद में बदरेद्दीन और उमर पर यौन अपराधों के लिए मुकदमा चलाया गया औऱ उन्हें दोषी पाया गया।

बंगाल में रामनवमी पर छुट्टी, ममता सरकार में पहली बार हुआ ऐसा: कभी भड़क जाती थीं राम के नाम पर, ‘जय श्री राम’ कहने वालों को बताया था हमलावर

पश्चिम बंगाल में पहली बार रामनवमी पर सार्वजानिक छुट्टी की घोषणा की गई है। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा यह आदेश शनिवार (9 मार्च 2024) को जारी किया गया। इस आदेश में आने वाले 17 अप्रैल 2024 को रामनवमी के पर्व का हवाला दिया गया है। आदेश की प्रति राज्यपाल और प्रदेश के तमाम सीनियर अधिकारियों को भेजी गई है। भाजपा ने इसे बहुत देर में लिया गया फैसला और ममता बनर्जी द्वारा अपनी हिन्दू विरोधी छवि को बदलने की कोशिश करार दिया है।

रामनवमी पर छुट्टी का यह आदेश पश्चिम बंगाल सरकार में वित्त मंत्रालय के ऑडिट डिपार्टमेंट द्वारा जारी किया गया है। 9 मार्च के ही एक नोटिफिकेशन का जिक्र करते हुए इस आदेश में 17 अप्रैल को रामनवमी पर्व पर सार्वजानिक अवकाश होने की घोषणा की गई है। पत्र में राज्य सरकार ने इस निर्णय पर ख़ुशी भी जताई है। भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया प्रभारी अमित मालवीय ने इसे 9 मार्च को ही अपने X हैंडल पर शेयर किया है।

अमित मालवीय ने पश्चिम बंगाल सरकार का यह कदम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हिन्दू विरोधी छवि को बदलने का प्रयास बताया है। हालाँकि उन्होंने कहा कि अब बहुत देर हो चुकी है। भाजपा नेता ने पश्चिम बंगाल सरकार से माँग की है कि वो यह सुनिश्चित करे कि रामनवमी की शोभा यात्राओं पर पत्थरबाजी न होने पाए। इसी कैप्शन में अमित मालवीय ने यह भी लिखा है कि यह छुट्टी उन ममता बनर्जी द्वारा दी जा रही है, जो कभी जय श्री राम का नारा सुनते ही गुस्से से नीली पड़ जाती थीं।

कभी भड़क जातीं थी जय श्री राम सुन कर

अमित मालवीय ने ममता बनर्जी पर राम के नाम पर भड़कने का जो आरोप लगाया है, उस की पुष्टि करती कई घटनाएँ पहले हो चुकी हैं। 30 दिसंबर 2022 को एक कार्यक्रम में जब ममता बनर्जी मंच की ओर जा रहीं थीं, तब समारोह में मौजूद लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए थे। इसके बाद ममता बनर्जी भड़क गईं और उन्होंने मंच पर बैठने से ही इंकार कर दिया था। तब राज्यपाल सीवी आनंद बोस व केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ममता बनर्जी को मनाने की बहुत कोशिश की थी। हालाँकि वो इस कोशिश में नाकाम रहे थे।

एक अन्य घटनाक्रम जनवरी 2021 का था। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती के कार्यक्रम में ममता बनर्जी भी मंच पर थीं। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने तब जय श्री राम और भारत माता की जय के नारे लगाने शुरू कर दिए थे। इस से ममता बनर्जी भड़क गईं थीं और कार्यक्रम को बीच में ही छोड़ कर निकल गईं थीं।

मई 2019 में ममता बनर्जी के काफिले को देख कर कुछ लोगों ने जय श्री राम के नारे लगाए थे। तब ममता बनर्जी अपने काफिले को रोक कर नारा लगाने वालों से भिड़ गईं थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि जय श्री राम बोल रहे लोग उन पर हमला करना चाहते थे। इसी के साथ ममता ने इस नारेबाजी के नाम पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को महिला विरोधी तक कह डाला था।

चुनाव आयुक्त के इस्तीफे पर कॉन्ग्रेस बनी पत्रकार, नेता बन कर सामने आए रवीश कुमार

कई बार व्यक्ति किसी के विरोध में इतना अंधा हो जाता है कि उसे सही चीजें भी गलत दिखने लगती हैं, या जिन बातों का कोई मतलब नहीं होता वो भी तिल का ताड़ बना दी जाती हैं। कई बार तो व्यक्ति अपनी सनक में ‘गलत, गलत, गलत…’ चिल्लाते हुए उस तरह पहुँच जाता है, जहाँ ‘गलत’ लोगों को होना चाहिए, मगर वो अचानक से सही लोग दिखने लगते हैं। कुछ ऐसा ही लग रहा है आजकल रवीश कुमार के साथ। कभी पत्रकार का टैग लगाकर राष्ट्रवादियों को कोसते थे, तो अब यूट्यूबर बनकर पानी-पी पीकर कोसते हैं। ये अलग बात है कि उससे फर्क नहीं पड़ता। ऐसा इसलिए, क्योंकि रवीश कुमार अब स्थाई तौर पर राजनीतिक व्यक्ति बन गए लगते हैं।

यूँ तो बिलो-दि-बेल्ट हमले की उनकी पुरानी आदत रही है, लेकिन इस बार उन्होंने अलग ही रवैया अपनाया है। इस बार वो ‘गलत गलत’ कहते विपक्ष की जगह पहुँच गए हैं, जबकि विपक्ष में वरिष्ठ से वरिष्ठ नेता भी बड़ी शालीनता से सवाल पूछ रहे हैं, जो वाजिब है। ये मामला चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के इस्तीफे से जुड़ा है। जिसमें अरुण गोयल ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया है। हैरानी की बात है कि कल तक अरुण गोयल की तैनाती पर ही छाती पीट रहे रवीश कुमार को अब अरुण गोयल का इस्तीफा खल रहा है। वो खुद को ऐसी स्थिति में देख रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं, जैसे कि उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा हो।

बात नुकसान की नहीं है, बात है जगह बदल लेने की। देखिए, रवीश कुमार अरुण गोयल के इस्तीफे पर क्या लिखते हैं, “अरुण गोयल ने चुनाव आयुक्त के पद से इस्तीफ़ा दिया है। जब इतना साहस किया ही है तो उन्हें प्रेस कांफ्रेंस करनी चाहिए और कारण बताना चाहिए। क्या उन पर किसी का दबाव था? दबाव किस बात को लेकर था? विपक्ष के राज्यों को लेकर रहा होगा या तारीख़ को लेकर हुआ होगा? क्या वे किसी चीज़ की अति से परेशान थे? क्या उनका ईमान गवाही नहीं दे रहा था कि इसके आगे नहीं हो सकता? चुनाव आयुक्त के पद से इस्तीफ़ा हुआ है। फ़क़ीर का इस्तीफ़ा नहीं है कि झोला लेकर पहाड़ पर चल दिए। अगर अरुण गोयल ख़ुद नहीं बताएँगे तो लोग तरह- तरह से सवाल करेंगे। कृपया यह न बताएँ कि निजी और पारिवारिक कारणों से इस्तीफ़ा दिया है।”

इसमें आखिरी दो लाइन पर गौर कीजिए, “अगर अरुण गोयल ख़ुद नहीं बताएँगे तो लोग तरह- तरह से सवाल करेंगे। कृपया यह न बताएँ कि निजी और पारिवारिक कारणों से इस्तीफ़ा दिया है।” क्यों भाई? माई बाप हो? सुप्रीम कोर्ट हो? ईश्वर हो? हो भी, तो किसी से ऐसे सवाल पूछोगे, जिसमें जवाब अपने मान का मिलने की शर्त रख रहे हो? हैरानी इस बात की भी है कि अरुण गोयल से एक तरफ विपक्ष के नेता शालीन तरीके से सवाल पूछ रहे हैं, तो रवीश कुमार एकदम आदेश दे रहे हैं कि अरुण गोयल ये बताएँ कि उन्होंने निजी और पारिवारिक कारणों को छोड़कर किन कारणो से इस्तीफा दिया है। भला ये कैसा सवाल हुआ?

एक बात का जिक्र मैंने शुरुआत में की थी, कि मैग्सेसे अवॉर्ड पाने वाले रवीश कुमार किस जगह पर पहुँच चुके हैं। वो ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ करते हुए ‘खुद ही भेड़िया’ बन चुके हैं। और भेड़िए, सामने खड़े होकर शरीफ हो गए हैं, क्योंकि वो इस बार बिलो-दि-बेल्ट हमला नहीं कर रहे हैं। वैसे ‘भेड़िया’ शब्द सही नहीं होगा, इसीलिए ‘सही और गलत’ शब्द का इस्तेमाल किया। चूँकि रवीश और उसकी ‘अघोषित’ पार्टी लाइन वाले लोग सीधे न बोलते हैं, न समझते हैं, इसलिए इस तरह से समझाना सही लगता है।

इस पूरे मुद्दे पर विपक्ष के वरिष्ठतम नेता क्या कुछ बोल सुन रहे हैं, वो भी जान लीजिए। कॉन्ग्रेस पार्टी के महासचिव और मुख्य प्रवक्ता जयराम रमेश ने एएनआई से कहा, “चुनाव आयोग को स्वतंत्र संस्था होना चाहिए, क्योंकि ये संवैधानिक संस्था भी है। अरुण गोयल ने कल (9 मार्च 2024) को इस्तीफा दिया, इसके पीछे मेरे दिमाग में तीन बातें आती हैं। पहला– क्या उनके और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच कोई मतभेद था? या मोदी सरकार से कोई मतभेद, जो संस्थानों को खुद से हाँकने की कोशिश करती है। दूसरा– ये कोई व्यक्तिगत मामला हो सकता है। तीसरा-उन्होंने इस्तीफा दिया, ताकि वो बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ सकें? आने वाले समय में सच्चाई बाहर आ ही जाएगी।”

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष, और कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे संवैधानिक संस्थानों पर सरकार का हमला बताया। उन्होंने चुनाव आयुक्तों को चुनने की प्रक्रिया में बदलाव पर सवाल उठाए, लेकिन रवीश कुमार की तरह ये नहीं कहा कि ‘इस्तीफे की वजह बताओ, और ये-ये वजह छोड़कर कुछ और वजह बताओ।’

खैर, हम बात कर रहे थे रवीश कुमार का, जो विपक्षी नेताओं की जगह पर बैठने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन उनका दामन इतना मैला हो चुका है कि ‘धरती हिल’ चुकी है। वो जो जगह लेने को बेताब हैं, वो जगह भी अपनी जगह बदल चुकी है, लेकिन रवीश कुमार अपनी जिद में ‘मानसिक दिवालिएपन’ की तरफ बढ़ चुके हैं, क्योंकि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि वो ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ बोलते हुए खुद ‘भेड़िए’ की भूमिका में आ चुके हैं।

जो पाकिस्तान जिंदाबाद कहे, उसको गोली मार दो: कॉन्ग्रेसी मंत्री, ‘पाकिस्तान को बधाई’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, सबको है अधिकार

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री केएन राजन्ना ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारों को लेकर चल रहे मामले पर एक बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान के समर्थकों को गोली मार देनी चाहिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश में अवैध इमारतों पर बुलडोजर एक्शन का समर्थन भी किया है।

के एन राजन्ना ने कहा, “क्या हुआ था? यहाँ कांग्रेस की छवि अच्छी है। यहाँ तक इसमें सुधार हुआ है। अगर किसी ने ये नारे (पाकिस्तान जिंदाबाद) लगाए हैं या पाकिस्तान का समर्थन किया है, तो उसे गोली मार दी जाए। इसमें कुछ गलत नहीं है।”

इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश में अवैध इमारतों पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर भी समर्थन जताया। उन्होंने कहा, “उत्तर प्रदेश में मकान तोड़े जाते हैं। इसके लिए कोई अलग से कानून नहीं है, लेकिन क्या वहाँ कानून-व्यवस्था नियंत्रण में नहीं है? हम इसका विरोध तो नहीं करेंगे।”

राजन्ना का यह बयान हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के बाद कर्नाटक विधानसभा में लगे ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारों को लेकर था। दरअसल, विधानसभा में वोटिंग के बाद जब कॉन्ग्रेस राज्यसभा प्रत्याशी नासिर हुसैन जीते तो उसके बाद यह नारेबाजी हुई थी। इसको लेकर आरोप लगा था कि यहाँ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए।

इस मामले को पहले ढकने की कोशिश हुई थी लेकिन बाद में फॉरेंसिक जाँच में इसकी सत्यता की पुष्टि हुई थी। इस मामले में नारे लगाने वाले कुल 3 आरोपितों को गिरफ्तार किया था। इनके नाम इल्ताज, मुनव्वर और मोहम्मद नाशीपुडी हैं।

फॉरेंसिक रिपोर्ट में कहा गया कि जिस वीडियो पर विवाद हुआ, वो एक सिंगल कैप्चर में बनाई गई थी (यानी उसमें कुछ और जोड़ा-घटाया नहीं गया)। उसमें कुछ भी छेड़छाड़ नहीं हुई है। वहाँ जिस शब्द ‘साब’ के लिए सवाल हो रहा था, वो ‘साब’ नहीं, ‘तान’ था।

हालाँकि, जिन पाकिस्तान के जिंदाबाद कहने वालों को राजन्ना गोली मारने की बात कर रहे हैं, उसी को बधाई देने के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्णय सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रोफेसर के विरुद्ध दर्ज FIR रद्द कर दी थी।

उसके खिलाफ यह FIR पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर बधाई देने और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने पर काला दिन बताने को लेकर दर्ज की गई थी। कोर्ट ने कहा था कि यह बातें कहना अपराध नहीं हो सकता। कोर्ट ने सरकारी निर्णय के विरोध को अधिकार बताया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अगर भारत का कोई नागरिक 14 अगस्त, जो कि उनका स्वतंत्रता दिवस है, पर पाकिस्तान के नागरिकों को शुभकामनाएँ देता है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। यह मेलजोल बढ़ाने का संकेत है। याचिकाकर्ता के उद्देश्यों को केवल इसलिए आशंका के दायरे में नहीं लाया जा सकता क्योंकि वह विशेष मजहब से है।”

UP में सड़क जाम कर नमाज, पुलिस ने लाठियों से दम भर कूटा, खींच-खींच के मारा: वायरल हो रहा वीडियो कहाँ का? क्या है सच्चाई?

हाल ही में दिल्ली के पुलिसकर्मी का नमाजियों को मारने का वीडियो वायरल हुआ था। अब इसी आधार एक और वीडियो वायरल हो रहा है और दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने नमाज पढ़ने वालों पर कार्रवाई की। उन्हें लाठी से मारा, सड़क पर खींचा और पुलिस की गाड़ी में भर कर ले गए। ऑपइंडिया ने इस दावे का फैक्ट चेक किया है।

इस वीडियो को सोशल मीडिया पर अलग-अलग बातें लिख कर शेयर किया जा रहा है। एक्स (पहले ट्विट्टर) पर ‘हम लोग’ नाम के एक अकाउंट ने यह वीडियो डालकर लिखा, “दिल्ली पुलिस ने तो अपने कर्तव्य का पालन करने वाले अधिकारी को बर्खास्त कर दिया इस बीच यूपी में नमाज के लिए सड़कें रोकने का नतीजा।”

एक अन्य यूजर ने सीएम योगी की कानून व्यवस्था को लेकर सख्ती की तरफ इशारा करते हुए लिखा, “यूपी में सड़क पर नमाज ना बाबा ना ….. बाबाजी का ख़ौफ़।”

एक और अकाउंट ने दिल्ली पुलिस के अधिकारी का समर्थन किया और उत्तर प्रदेश में रोड जाम करने के परिणाम के रूप में इस वीडियो को शेयर किया।

एक और यूजर ने यही वीडियो शेयर किया और लिखा, “यह भी सड़क पर नमाज़ पढ़ रहे थे लेकिन ये उत्तर प्रदेश है यहाँ बाबा की पुलिस हर वक्त हर जगह ऑन ड्यूटी रहती है।”

एक और यूजर ने लिखा, “कैसें उत्तर प्रदेश में सड़क जाम करने पे कुटाई होती है”

क्या है वीडियो की सच्चाई?

ऑपइंडिया ने इस वीडियो की पड़ताल करने का फैसला लिया। पहली नजर में यह वीडियो वर्तमान का नहीं लग रहा था, ऐसे में इसकी तह तक जाने का प्रयास किया गया। जिन लोगों ने वीडियो डाले हैं, उन्होंने यह घटना कहाँ की है, यह नहीं बताया है। हालाँकि, इस वीडियो को ध्यान से देखने पर जहाँ पुलिस यह कार्रवाई कर रही है, वहाँ की दुकानों के बोर्ड दिखते हैं। इन पर नीचे इटावा लिखा हुआ है। वीडियो के एक अन्य फ्रेम में भी एक गेट पर इटावा लिखा है।

ऐसे में हमें पता चला कि यह घटना इटावा की है। हालाँकि जब इटावा में नमाज से सम्बंधित हालिया ऐसी कोई घटना के बारे में जानकारी ढूंढी गई तो नहीं मिली। इटावा में हाल में नमाज को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ है। ऐसे में यह वीडियो कहाँ से आई, इसके लिए इसका डिजिटल फुटप्रिंट निकालने की कोशिश की गई।

जब इटावा में नमाज से सम्बंधित ऐसी पुराणी घटनाओं की जानकारी निकाली गई तो पता चला कि यह मामला इटावा में ही हुआ है लेकिन यह वर्तमान का नहीं बल्कि मार्च 2020 यानी आज से लगभग 4 वर्ष पुराना है। इससे सम्बंधित एक वीडियो भी हमें यूट्यूब पर मिली। कुछ खबरें भी उसी दौरान प्रकाशित की गईं थी जिसमें इटावा में नमाजियों को रोके जाने का जिक्र था।

दरअसल, यह वीडियो तब का है जब पूरे देश में कोरोना महामारी को लेकर प्रतिबन्ध लगाए गए थे। इस दौरान लोगों के इकट्ठा होने पर रोक थी। ऐसे में एक साथ नमाज पढ़ने के कारण पुलिस ने यह कार्रवाई की थी और उन्हें तितर बितर किया था। ऐसे में ऑपइंडिया के फैक्ट चेक में यह दावा फेक निकला है कि दिल्ली की तरह उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी नमाजियों पर कार्रवाई की।

सत्ता में धार्मिक व्यक्ति होने से मिलते हैं अच्छे परिणाम, CM योगी इसका उदाहरण: बरेली के जज ने बताया ‘दार्शनिक राजा’

ज्ञानवापी के विवादित ढांचे में वीडियोग्राफी की अनुमति देने वाले जज ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा की है। जज ने CM योगी के धार्मिक व्यक्ति होने के चलते सत्ता में सुखद परिणाम देने वाला बताया है। उन्होंने CM योगी की तुलना महान दार्शनिक प्लेटो के ‘दार्शनिक राजा’ की अवधारणा से की है।

बरेली के एडिशनल सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने 2010 में हुए दंगों की सुनवाई के दौरान CM योगी की प्रशंसा की। इन दंगों में मौलाना तौकीर रजा को आरोपित बनाया गया है। मौलाना को 11 मार्च को इस मामले में पेश होने के लिए कहा गया है। मौलाना पर गंभीर चार्ज लगाए गए हैं।

अपने 10 पेज के आदेश में उन्होंने ज्ञानवापी पर दिए गए निर्णय और अपने परिवार की सुरक्षा के विषय में भी बात की है। उन्होंने मौलाना तौकीर रजा को इन दंगों का मास्टरमाइंड बताया है और कहा है कि वह लगातार कार्रवाई से बचता रहा है।

जज रवि कुमार दिवाकर ने कहा, “सत्ता का मुखिया एक धार्मिक व्यक्ति होना चाहिए क्योंकि धार्मिक व्यक्ति का जीवन भोग-विलास का नहीं बल्कि त्याग और समर्पण का होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सिद्धपीठ गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ जी हैं, जो उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं और उन्होंने इस बात को सही सिद्ध किया है।”

जज दिवाकर ने आगे कहा, “यदि कोई धार्मिक व्यक्ति सिंहासन पर बैठता है, तो यह अच्छे परिणाम देता है। यह महान दार्शनिक प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में ‘दार्शनिक राजा’ की अवधारणा में कहा है। प्लेटो ने कहा था कि हमारे नगर-राज्य में तब तक दुखों का अंत नहीं होगा जब तक यहाँ कोई दार्शनिक राजा न हो।”

जज दिवाकर ने ज्ञानवापी के विषय में 2022 में दिए गए निर्णय पर भी इस फैसले में बात की। उन्होंने कहा कि उनका यह निर्णय कानून के अनुसार था लेकिन फिर भी वह और उनके परिवार के लोग सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने कहा, “मुझे और मेरे परिवार में डर का माहौल इस तरह बना हुआ है कि उसे शब्दों में बताना भी संभव नहीं है। मेरे परिवार में हर कोई एक-दूसरे की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। हमें घर से निकलने से पहले कई बार सोचना पड़ता है। खासकर मेरी मां मेरी सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित रहती हैं।”

उन्होंने कहा कि जबसे उन्होंने ज्ञानवापी के संबंध में निर्णय दिया है, तबसे ही एक समुदाय के लोगों का नजरिया उनके प्रति बदल गया है। ऐसा लगता है जैसे उन्होंने कोई पाप कर दिया हो। उन्होंने कहा कि उनके बच्चे भी उनकी सुरक्षा को लेकर उनसे पूछते हैं। उन्होंने इस दौरान मौलाना तौकीर रजा के सालों तक बचे रहने लेकर भी टिप्पणी की।

उन्होंने कहा, “इस मामले में दंगा भड़काने वाले मास्टरमाइंड मौलाना तौकीर रजा खान का नाम उनके खिलाफ सबूत होने के बाद भी चार्जशीट में शामिल नहीं किया गया। इससे पता चलता है कि तबै के पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और शासन स्तर के अधिकारी अपने कर्तव्यों में असफल थे। उनके द्वारा नियमों का पालन नहीं किया गया और दंगे भड़काने वाले मास्टरमाइंड मौलाना तौकीर रजा खान का बचाव किया गया।”

कोर्ट ने इस मामले में पाया कि मार्च 2010 में मौलाना तौकीर रजा ने मुस्लिमों को इकट्ठा करके एक भड़काऊ भाषण दिया था। इसमें हिन्दुओं का खून बहाने की बात की गई थी। इसके बाद यहाँ दंगे भड़के और आगजनी, लूट और महिलाओं से बदसलूकी की घटनाएँ हुईं। कोर्ट ने इस मामले में कई धाराओं के अंतर्गत मौलाना तौकीर रजा को दोषी पाया।