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मंदिरों को मिले दान से कमाई करने के कॉन्ग्रेस सरकार के मंसूबों को झटका, BJP-JDS की एका से बिल विधान परिषद में नहीं हुआ पास: लगे जय श्रीराम के नारे

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के मंदिरों की कमाई पर अधिक टैक्स वसूलने के मंसूबों पर पानी फिर गया है। इस सम्बन्ध में लाया गया विधेयक कर्नाटक के विधान परिषद में पारित नहीं हो पाया। भाजपा और जेडीएस के गठबंधन ने इस विधेयक को संयुक्त रूप से विधान परिषद में गिरा दिया।

75 सदस्यों वाली कर्नाटक विधान परिषद में मन्दिरों की कमाई पर टैक्स लगाने वाले इस विधेयक को ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया। कर्नाटक विधान परिषद में कॉन्ग्रेस सरकार अल्पमत में है। कर्नाटक के इस उच्च सदन में भाजपा के पास 35 और जेडीएस के पास 8 सदस्य हैं। एक सदस्य निर्दलीय भी है जबकि कॉन्ग्रेस के पास यहाँ मात्र 30 ही सदस्य हैं। एक पद अभी रिक्त है।

ऐसे में कॉन्ग्रेस सरकार का ‘कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक 2024’ विधान परिषद में पारित नहीं हो सका। कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार इस विधेयक के जरिए वार्षिक ₹1 करोड़ से अधिक दान पाने वाले मंदिरों से उनकी कमाई का 10% जबकि ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक दान पाने वाले मंदिरों से 5% टैक्स वसूलना चाहती थी।

इससे पहले यह विधेयक कर्नाटक विधानसभा में लाया गया था। सत्ता में होने के चलते विधानसभा में कॉन्ग्रेस सरकार को बहुमत है, इसलिए यहाँ यह विधेयक बिना किसी समस्या के पारित हो गया था। 224 सदस्यों वाली इस विधानसभा में इसे 135 कॉन्ग्रेस विधायकों का समर्थन हासिल हुआ था। इसके बाद इसे विधान परिषद के समक्ष रखा गया, जहाँ यह पारित नहीं हुआ।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि विधान परिषद में इस विधेयक के समर्थन में सत्ता पक्ष के 7 सदस्यों ने ‘हाँ’ कहा, जबकि 18 विपक्षी सदस्यों ने ‘ना’ कहा। इसके बाद भाजपा विधान परिषद सदस्यों ने सदन में जय श्री राम के नारे भी लगाए। हालाँकि, इस विधेयक को सरकार दोबारा इस सदन में पेश कर सकती है, लेकिन इसकी संभावना कम मानी जा रही है। यह भी कयास लग रहे हैं कि इसे अब लोकसभा चुनावों के बाद ही लाया जाएगा।

मंदिरों की कमाई से सबंधित इस विधेयक का राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा और जेडीएस लगातार विरोध कर रहे थे। उन्होंने सरकार पर हिन्दू विरोधी होने का आरोप लगाया था। कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष बी वाई विजयेन्द्र ने इस मामले में कहा था कि सरकार हिन्दू मंदिरों के दान से अपना खजाना भरना चाहती है।

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा ने भी इस विधेयक को लेकर कहा था कि आखिर हिन्दू मंदिर ही टैक्स के दायरे में क्यों लाए जा रहे हैं और बाकी मजहबों के पाक स्थलों को इस दायरे में क्यों नहीं लाया जा रहा।

खुद 5 कंपनी की डायरेक्टर, शादी से इनकार पर TV एंकर को भाड़े के गुंडों से उठवाया: नजर रखने के लिए कार में लगवा रखी थी ट्रैकिंग डिवाइस

शादी करने के लिए 31 साल की एक महिला ने टीवी म्यूजिक चैनल के एंकर को भाड़े के गुंडों से उठवा लिया। महिला की पहचान भोगिरेड्डी त्रिशा के रूप में हुई है। वह 5 स्टार्टअप कंपनियों में डायरेक्टर है।

घटना हैदराबाद की है। एंकर प्रणव को 11 फरवरी 2024 को अगवा किया गया था। बाद में पिटाई कर उसे छोड़ दिया गया था। पुलिस ने 22 फरवरी को त्रिशा को गिरफ्तार किया। 4 अपहरणकर्ता भी पकड़ लिए गए हैं।

रिपोर्टों के अनुसार करीब दो साल पहले त्रिशा ने प्रणव की प्रोफाइल एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर देखी थी। इसके बाद उसने चैट करना शुरू कर दिया। दिलचस्प यह है कि यह प्रोफाइल प्रणव की तस्वीर लगाकर किसी अज्ञात व्यक्ति ने बना रखी थी। उसने अच्छे रिटर्न का वादा करते हुए निवेश के लिए कथित तौर पर 40 लाख रुपए भी ले लिए। पैसे मिलने के बाद उसने त्रिशा को इग्नोर करना शुरू कर दिया जिसके बाद उसे इस फर्जीवाड़े का एहसास हुआ।

रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला हैदराबाद के थाना क्षेत्र उप्पल का है। डिजिटल मार्केटिंग का काम करने वाली त्रिशा ने ठगे जाने के बाद एंकर प्रणव की तलाश शुरू की। प्रणव का नंबर मिलने के बाद उसने उससे संपर्क किया। प्रणव ने अपनी फर्जी प्रोफाइल को लेकर साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाने की बात कही। लेकिन महिला ने प्रणव को लगातार मैसेज भेजने शुरू कर दिया। थोड़े समय तक इसे अनदेखा करने के बाद प्रणव ने महिला का नंबर ब्लॉक कर दिया। इस से वह नाराज हो गई। वह किसी भी हाल में प्रणव से शादी करना चाहती थी। उस पर नजर रखने के लिए त्रिशा ने उसकी कार में ट्रैकिंग डिवाइस लगवा दी।

इसके बाद 11 फरवरी को महिला ने 4 गुंडों को भेज प्रणव का अपहरण करवा लिए। प्रणव को उठाकर त्रिशा के ऑफिस ले जाया गया। यहाँ उसकी पिटाई की गई। पिटाई के डर से प्रणव ने भविष्य में महिला से बातचीत जारी रखने का भरोसा दिया। उसके बाद उसे छोड़ दिया गया। बाहर निकलने के बाद प्रणव ने उप्पल पुलिस स्टेशन में मुकदमा दर्ज करवाया। पुलिस ने 22 फरवरी को भोगिरेड्डी त्रिशा और अपहरण में शामिल उसके 4 सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया है। इन सभी पर IPC की धारा 363, 341 व 342 के तहत कार्रवाई की गई है। मामले की जाँच जारी है।

UCC की दिशा में बढ़ा असम: मुस्लिम निकाह- तलाक रजिस्ट्रेशन वाला कानून निरस्त, बोले CM सरमा- बाल विवाह पर लगेगी रोक

असम ने वर्ष 1935 में बनाए गए मुस्लिम विवाह और तलाक रजिस्ट्रेशन अधिनियम (Muslim Marriages and Divorces Registration Act 1935) को रद्द कर दिया है। इसकी जानकारी सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर दी है। उन्होंने कहा है कि इससे अंतर्गत शादी की कानूनी आयु ना पूरी करने वालों का भी निकाह हो रहा था।

सीएम हिमंता ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “23 फरवरी, 2024 को असम कैबिनेट ने दशकों पुराने असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम को निरस्त करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। भले ही दूल्हा और दुल्हन की उम्र 18 और 21 ना हुई हो, जैसा कि कानूनन होना चाहिए, के विवाह का पंजीकरण भी इसके अंतर्गत हो रहा था। यह निर्णय असम में बाल विवाह पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”

इससे पहले असम सरकार में मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने इस विषय में मीडिया से बात की। उन्होंने मीडिया को बताया, “असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम 1935, जिसके आधार पर अब तक 94 मुस्लिम रजिस्ट्रार राज्य में मुस्लिम निकाहों का पंजीकरण कर रहे थे और तलाक का निर्णय कर रहे थे, उसे निरस्त कर दिया गया है। आज की कैबिनेट बैठक में इस अधिनियम को हटा दिया है।”

उन्होंने आगे बताया, “इसके परिणामस्वरूप आज के बाद इस अधिनियम के जरिए मुस्लिम विवाह या तलाक का पंजीकरण नहीं हो सकेगा। हमारे राज्य में एक विशेष विवाह अधिनियम है, इसलिए हम चाहते हैं कि सभी विवाह, विशेष विवाह अधिनियम के तहत हों।” बरुआ ने इस कानून को औपनिवेशिक काल का कानून बताया और कहा कि इससे राज्य में बाल विवाह पर रोक लगेगी। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से असम में बाल विवाह पर एक्शन चल रहा है, इसके अंतर्गत 1000 से अधिक गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं।

क्या था मुस्लिम विवाह अधिनियम?

यह अधिनियम वर्ष 1935 में अंग्रेजों द्वारा लाया गया था। यह अधिनियम वर्ष 1935 में अंग्रेजों द्वारा लाया गया था। यह असम के मुस्लिमों के लिए विवाह पंजीकरण और तलाक के नियम बनाता था। इसके अंतर्गत कोई भी मुस्लिम व्यक्ति, जिसे सरकार अधिकृत कर दे, मुस्लिम निकाह को पंजीकृत कर सकता था। इसी के साथ वह तलाक का पंजीकरण भी कर सकता था। इसके लिए वह एक शुल्क भी ले सकता था। इस अधिनियम के तहत एक इलाके में दो मुस्लिम रजिस्ट्रार नियुक्त किए जाने थे, जिनमें से एक सुन्नी और एक शिया होता।

असम सरकार का मानना है कि इस नियम का लाभ उठा कर ऐसे निकाह भी पंजीकृत हो रहे थे, जो कि कानूनी मान्यता पूरी नहीं करते। चूंकि इस अधिनियम में निकाह की न्यूनतम आयु का जिक्र नहीं था, ऐसे में 18 वर्ष से कम की बच्चियों का निकाह भी हो रहा था।

हालाँकि, अब सरकार ने इस पर रोक लगा दी है। वर्तमान में असम के भीतर 94 ऐसे मुस्लिम रजिस्ट्रार हैं, जो कि निकाह और तलाक का पंजीकरण करते हैं। सरकार अब इनका रजिस्ट्रार का पद खत्म कर देगी। असम सरकार ने कहा है कि इन सभी को एक बार ₹2 लाख का मुआवजा भी दिया जाएगा।

UCC की दिशा में एक बड़ा कदम

असम सरकार का यह निर्णय समान नागरिक संहिता (UCC) की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। गौरतलब है कि हाल ही में उत्तराखंड में UCC को विधानसभा की मंजूरी मिली है। इसके अंतर्गत सभी धर्मों के लोगों के विवाह, तलाक और विरासत जैसे मुद्दों को लेकर नियम बनाए गए हैं। इसमें भी बहुविवाह जैसे मामलों पर रोक लगाई गई है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले ही कहते आए हैं कि वह राज्य में UCC लागू करेंगे।

ऐसे में मुस्लिमों के लिए अलग से बनाया कानून खत्म करना UCC का रास्ता साफ़ करता है। CM सरमा राज्य में बाल विवाह, बहुविवाह और तीन तलाक के धुर विरोधी रहे हैं। इसके खिलाफ वह लगातार बोलते रहे हैं। अब असम में मुस्लिम निकाह का पंजीकरण विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत होगा।

डीडी न्यूज के कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के दौरान NSUI कार्यकर्ताओं का हंगामा, कॉन्ग्रेस नेता उदित राज के ओएसडी की अगुवाई में पत्रकारों पर हमला, शो के प्रोड्यूसर को पीटा

डीडी न्यूज के मशहूर डिबेट शो ‘2 टूक’ की रिकॉर्डिंग के समय दूरदर्शन के स्टूडियो में हंगामे और मारपीट की खबर सामने आ रही है। इस दौरान एनएसयूआई से जुड़े कार्यकर्ताओं और कॉन्ग्रेस नेता उदित राज के समर्थकों ने स्टूडियो में जमकर हंगामा किया। यही नहीं, उदित राज के ओएसडी की अगुवाई में पत्रकारों पर भी हमला किया, जिसमें दो टूक शो के प्रोड्यूसर पर पीछे से हमला किया गया।

जानकारी के मुताबिक, ये मामला शुक्रवार (23 फरवरी 2024) का है, जब वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव के शो ‘दो टूक’ की रिकॉर्डिंग हो रही थी। इस कार्यक्रम के फॉर्मेट के मुताबिक ही सवाल-जवाब का सिलसिला चल ही रहा था कि कार्यक्रम में शामिल होने पहुँचे एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने हंगामा खड़ा कर दिया। उन्होंने शो के प्रोड्यूसर पर भी हमला कर दिया। हंगामा कर रहे लोगों को रोकने की कोशिश कर रहे अशोक श्रीवास्तव के साथ भी बदतमीजी की गई।

इस मामले की जानकारी सार्वजनिक हुई पूर्व सांसद और कॉन्ग्रेस नेता उदित राज के दावे से। उदित राज ने दावा किया कि शो की रिकॉर्डिंग के दौरान एंकर से सवाल जवाब पूछने पर लोगों को मारा पीटा गया। उन्होंने एक्स पर लिखा, “दूरदर्शन स्टूडियो में डिबेट की रिकॉर्डिंग के समय मोदीभक्ति के बारे में जब एंकर से सवाल पूछा तो मारा पीटा गया। नया ट्रेंड स्थापित हो रहा है।”

हालाँकि तुरंत ही वहाँ मौजूद रहे लोगों ने उदित राज के दावे की हवा निकाल दी। डीडी न्यूज के वरिष्ठ संवाददाता लाल चंद्र सिंह ने उदित राज को जवाब देते हुए लिखा, “बिल्कुल ग़लत, 4 गुंडे पहले से ही प्लान करके आए थे और उन लोगों ने सब कुछ अपनी योजना के मुताबिक ही किया। ऐंकर उनको कह रहे थे कि हम आपके पास माइक लेकर आ रहे हैं लेकिन उनको लगा कि इससे तो उनका प्लान पूरा नहीं होगा तो उन्होंने हंगामा कर दिया, धक्कामुक्की की और मारपीट भी की। मत कीजिए।”

इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव का भी बयान सामने आया है। उन्होंने कहा, “आज मेरे कार्यक्रम दो टूक की रिकॉर्डिंग के दौरान जेएनयू से एनएसयूआई के कुछ लड़के आए थे और उदित राज के कुछ लोग थे, उन्होंने प्रोग्राम की रिकॉर्डिंग शुरू होते ही हंगामा और बदतमीजी शुरू कर दी। मैने और मेरे प्रोड्यूसर ने उन्हें रोका तो कुछ लड़कों ने मेरे प्रोड्यूसर पर पीछे से हमला कर दिया। बाद में मैं बीच बचाव में आया और एक हमलावर को पकड़ लिया। इससे पहले मैं उसे पकड़ कर सिक्योरिटी को देता कुछ लोगों ने घेर कर मुझे भी गिरा दिया। बाद में पता चला कि इनमें उदित राज का ओएसडी भी शामिल था, जो लड़कों को भड़का रहा था। और अब उदित राज इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। अभी शक ये भी है कि कुछ लड़के शराब पिए हुए थे। फिलहाल मामले को पुलिस देख रही है।”

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि हमलावरों के निशाने पर वो भी थे। उन्होंने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से आगे कहा, “कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने जो वहाँ मौजूद थे और जो दूसरे गेस्ट प्रोग्राम में आए थे, उन्होंने यह भी बताया है कि कुछ लड़के हंगामे के दौरान ही ये बात कर रहे थे कि चार-पाँच लोगों को पीटकर यहाँ से निकल लो, इन लोगों के निशाने पर मैं भी था।”

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव ने उदित राज को करारा जवाब दिया। उन्होंने लिखा, “उदित राज जी, आपको झूठ बोलने और कुतर्क करने की पुरानी बीमारी है। डीडी न्यूज़ की कई टीवी डिबेट्स में आपके झूठे तर्कों को बेनकाब किया गया है और इसीलिए आप दुश्मनी की भावना से भरकर अब इस स्तर पर उतर आये हैं कि मिथ्या आरोप लगाने लगे हैं।” उन्होंने आगे लिखा, “खास बात है कि जो उदित राज अनर्गल आरोप लगा रहे हैं, वो खुद मौके पर मौजूद नहीं थे।”

पत्रकार कीर्ति वढेरा ने डीडी न्यूज के पत्रकारों और टीम पर हमले को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी को निशाने पर लियाष उन्होंने लिखा, “मीडिया लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है और मीडिया पर हमला कतई बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए। कॉन्ग्रेस के पास कुछ बचा नहीं है, ऐसे में वो वरिष्ठ पत्रकारों पर हमले कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कहा कि एनएसयूआई के गुंडे ऑडियंस के तौर पर घुसे और शो के दौरान हंगामा किया। उन्होंने एंकर और पूरे प्रोडक्शन टीम को नुकसान पहुँचाया, वहीं कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता उनकी मदद करते दिखे।

बता दें कि उदित राज सोशल मीडिया पर कई बार झूठ फैलाते रहे हैं। उनपर सोशल मीडिया के माध्यम से अनर्गल टिप्पणी के मामले में केस भी दर्ज हो चुका है। चूँकि इस मामले में सीधे-सीधे उनके ओएसडी का नाम सामने आ रहा है, ऐसे में वो विक्टिम कार्ड खेलकर अब सहानुभूति बटोरने में लगे हैं।

वायनाड में चर्च ने जमीन कब्जाया, सरकार ने ₹100 प्रति एकड़ पर दे दिया पट्टा: केरल HC ने रद्द किया आवंटन, कहा- यह जनजाति समाज के सीने में चाकू घोंपने जैसा

केरल उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा कल्लोदी सेंट जॉर्ज फोरेन चर्च को सिर्फ 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से 5.5358 हेक्टेयर (लगभग 13.7 एकड़) भूमि के आवंटन को रद्द कर दिया है। केरल सरकार ने यह आवंटन साल 2015 में किया था। चर्च ने उस भूमि पर अतिक्रमण कर लिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने उस सरकारी भूमि को चर्च को आवंटित कर दिया था।

जस्टिस पीवी कुन्हिकृष्णन ने कहा कि सरकार का यह निर्णय जनजातीय समुदायों के लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, क्योंकि जिले में सैकड़ों भूमिहीन जनजातीय समुदाय के लोग कृषि तथा आवासीय भूखंडों की प्रतीक्षा कर रहे थे। कोर्ट ने कहा कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाले किसी लाभ के हकदार नहीं हैं। अतिक्रमण वाली संपत्ति आवंटित करने में कोई सार्वजनिक हित नहीं है।

कोर्ट ने कहा, “गरीब भूमिहीन जनजातीय समुदाय को लोग अपनी आजीविका और कृषि के लिए भूमि पाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं… ऐसी स्थिति में एक्सटेंशन पी 5 (सरकारी आदेश) के तहत भूमि असाइनमेंट की शक्तियों का उपयोग करते हुए 5वें प्रतिवादी (चर्च) को बड़ी सरकारी भूमि सौंपी जाती है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “मेरी राय है कि यह न केवल अवैध है, बल्कि याचिकाकर्ताओं (जनजातीय समुदाय को लोगों) सहित जनजातीय समुदाय के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह वायनाड में हमेशा मुस्कुराते रहने वाले मासूम जनजातीय लोगों के दिलों पर चाकू से वार करने के अलावा और कुछ नहीं है।” बता दें कि वायनाड में जनजातीय समुदाय के लोगों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है।

न्यायालय ने कहा, “किसी भी व्यक्ति को सरकारी भूमि की रजिस्ट्री पर असाइनमेंट का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने और उस पर अवैध निर्माण करने से अतिक्रमणकारियों को कोई अधिकार नहीं मिलेगा। सरकारी भूमि को वंचितों को आवंटित किया जाना चाहिए, न कि अमीर और शक्तिशाली लोगों को।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि चर्च को वर्तमान बाजार मूल्य पर संपत्ति खरीदने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि चर्च सहमत नहीं है तो सरकार को भूमि वापस ले लेनी चाहिए और इसे पात्र व्यक्तियों में वितरित करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि चर्च जमीन खरीदता है तो उसकी बिक्री से प्राप्त पूरी राशि का उपयोग वायनाड में जनजातीय समुदाय के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।

दरअसल, कोर्ट का यह फैसला वायनाड में भूमिहीन जनजातीय समुदाय से आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा दायर याचिका पर दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि जुलाई-अगस्त 2001 में 32 जनजातीय लोगों की भूख से मौत हो गई थी। विरोध प्रदर्शन के बाद राज्य सरकार के साथ सात सूत्री समझौता हुआ था। इसमें उन्हें पाँच एकड़ जमीन देने की बात कही गई थी।

कोर्ट को यह बताया गया कि चर्च ने 1962 के बाद से वायनाड जिले के मननथावडी तालुक में 5.5358 हेक्टेयर भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण किया था। चर्च ने उस भूमि का पट्टाया (भूमि दस्तावेज) प्राप्त करने के लिए कई जगहों पर आवेदन किया, लेकिन वह खारिज हो गया। इसके बाद राज्य सरकार ने ₹100 प्रति एकड़ की दर से भूमि सौंपने के लिए एक सरकारी आदेश जारी किया गया था।

संदेशखाली में TMC नेता की चप्पलों से पिटाई, घर पर हमला कर भीड़ ने की तोड़फोड़: शेख शाहजहाँ का करीबी है अजीत मेईती

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में महिलाओं का गुस्सा एक बार फिर से फूट पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने टीएमसी नेता शेख शाहजहाँ के सहयोगी को जमकर पीटा। अजीत मेईती पर आरोप है कि वो शेख शाहजहाँ का नाम लेकर स्थानीय लोगों पर धौंस जमाता है और उनकी जमीनों पर कब्जे करता है। स्थानीय लोगों के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए दो ग्राम पंचायत इलाकों में धारा-144 लागू कर दी गई है। लोगों ने अजीत के घर पर तोड़फोड़ भी की।

जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना के संदेशखाली में टीएमसी नेता शेख शाहजहाँ के खिलाफ महिलाओं का गुस्सा एक बार फिर से फूट पड़ा। महिलाओं ने शेख शाहजहाँ के करीबी अजीत मेईती के घर पर तोड़फोड़ की और उनकी पिटाई भी कर दी। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने उसके घर में तोड़फोड़ की। प्रदर्शनकारियों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस नेता के अजीत मेईती की मोटरसाइकिल में तोड़फोड़ की और उन पर जमीन हड़पने में शामिल होने का आरोप लगाया।

इस बीच, शुक्रवार (23 फरवरी 2024) को एक तालाब के किनारे बने गार्ड रूप में आग लगाने की घटना ने लोगों को और भड़का दिया। स्थानीय लोगों ने इसके लिए टीएमसी नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

संदेशखाली में महिलाओं और स्थानीय लोगों के समूह ने टीएमसी नेता शेख शाहजहाँ के भाई सिराजुद्दीन शेख की संपत्तियों को भी आग के हवाले कर दिया। उन्होंने संदेशखाली के कछारी इलाके में सिराजुद्दीन की संपत्ति को आग लगा दी। ग्रामीणों का आरोप है कि सिराजुद्दीन शेख और उसके लोगों ने गाँव वालों की जमीन हड़प ली है और इसी वजह से उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया। इस घटनाक्रम के दौरान भारी संख्या में पुलिस भी पहुँच गई।

बता दें कि बीजेपी की महिला सांसद लॉकेट चटर्जी की अगुवाई में संदेशखाली का दौरा करने जा रही टीम को प्रशासन ने रोक लिया। चटर्जी के साथ अग्निमित्र पॉल भी थे और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक टीम भी। लेकिन उन्हें संदेशखाली जाने की इजाजत नहीं दी गई।

बीजेपी ने जारी किया संदेशखाली पर वीडियो

इस बीच बीजेपी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर संदेशखाली मुद्दे पर एक डॉक्यूमेंट्री जारी की है। डॉक्यूमेंट्री में संदेशखाली की महिलाएँ अपने ऊपर हुए अपराधों के बारे में बता रही हैं। बीजेपी ने एक्स पर 20 मिनट का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “एक सच जो हमें चौंका देगा। एक सच जो हमें पीड़ा पहुँचाएगा। एक सच जो हमारी अंतरात्मा को झकझोर देगा। #संदेशखाली का सच, जिसे ममता बनर्जी छिपाने की कोशिश कर रही हैं…”

8 फरवरी से शुरू हुआ विवाद

बता दें कि 8 फरवरी को संदेशखाली में पहली बार हिंसा भड़की थी। स्थानीय महिलाओं के समूह ने टीएमसी नेता शेख शाहजहाँ का विरोध करते हुए गंभीर आरोप लगाए। महिलाओं ने शाहजहाँ की अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों पर हमला किया और शिबु हाजरा की पोल्ट्री फार्म में आग लगा दी। उन्होंने संदेशकाली थाने का भी घेराव किया और तीनों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस हिंसा के मामले में शिबु हाजरा और उत्तम सरदार को गिरफ्तार किया है। वहीं, शेख शाहजहाँ अब तक फरार है।

पहले तेजस्वी यादव की मंच पर दिखा शॉर्प शूटर मोहम्मद कैफ, फिर बंद कमरे में मिलन की तस्वीरें हुई वायरल: सीवान में पत्रकार की हत्या में भी जा चुका है जेल

बिहार में 1990 के दशक को जंगलराज कहा जाता है। उस दौरान हत्या, बलात्कार, अपहरण, डकैत आदि अपराध ने संगठित रूप ले लिया था और उसे राजनेताओं का संरक्षण भी हासिल था। ये राजद के संस्थापक और उनकी पत्नी राबड़ी देवी का दौैर था। उस दौर को आज उनके बेटे तेजस्वी यादव फिर याद दिलाई, जब शार्प शूटर के साथ उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं।

दरअसल, बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा महागठबंधन का साथ छोड़ने के बाद वहाँ के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। इसे साधने के लिए तेजस्वी यादव जन विश्वास यात्रा पर निकले हैं। इसी यात्रा में तेजस्वी यादव जब गुुरुवार (22 फरवरी 2024) को सिवान के टड़वा पहुँचे। वहाँ उनके साथ कुख्यात शूटर मोहम्मद कैफ उर्फ बंटी भी दिखा।

मोहम्मद कैफ सिर्फ रैली के दौरान ही तेजस्वी यादव के साथ नहीं था, बल्कि अतिथि भवन का एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस फोटो में तेजस्वी यादव के साथ मोहम्मद कैफ बैठा हुआ दिख रहा है। इसमें तेजस्वी यादव कैफ के साथ हाथ मिलाते हुए दिख रहे हैं। इसके साथ ही एक अन्य तस्वीर में वो कैफ के साथ बैठे हुए दिख रहे हैं।

ये वही मोहम्मद कैफ है, जिसे सिवान के कुख्यात गैंगस्टर मोहम्मद शहाबुद्दीन के बहन के लड़के यूसुफ की हत्या में जेल जा चुका है। इतना ही नहीं, सिवान के भाजपा सांसद रहे ओमप्रकाश यादव के प्रेस प्रतिनिधि श्रीकांत भारतीय की हत्या में भी मोहम्मद कैफ का नाम आया है। वह सिवान के गैंगस्टर शहाबुद्दीन के साथ भी कई बार दिख चुका है और उनका सहयोगी रहा है।।

मोहम्मद कैफ उर्फ बंटी का शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब और बेटे ओसामा शहाब से भी नजदीकी है। कहा जा रहा है कि गैंगस्टर से सांसद बने मोहम्मद शाहबुद्दीन की मौत के बाद खाली हुए उनके आपराधिक साम्राज्य पर कब्जा करना चाहता है। इसलिए वह अक्सर राजनीतिक गतिविधियों में भी दिखता है। अग्निवीर योजना के विरोध में उसने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और जेल गया था।

कैफ पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या का भी आरोपित बनाया गया था। पत्रकार राजदेव रंजन की हत्याकांड में मोहम्मद कैफ को पुलिस द्वारा प्राथमिक अभियुक्त बनाया गया था। पूछताछ के बाद सीबीआई ने उसे जेल भेज दिया था। बाद में उसे क्लीन चिट मिल गई थी। मोहम्मद कैफ पर दर्जनों मामले में लंबित हैं। वह कई बार जेल भी जा चुका है।

मंच पर और तेजस्वी यादव से व्यक्तिगत तौर पर मिलने के बाद सामने आई तस्वीरों के प्रसारित होने के बाद मोहम्मद कैफ ने बताया कि वह पिछले दो साल से जमानत पर बाहर है। उसने यह भी बताया कि वह सिवान में बच्चों को अपने ‘कैफ क्रिकेट एकेडमी’ में प्रशिक्षण दे रहा है। उस पर रंगदारी, लेबी सहित मारपीट के कई मामले दर्ज हैं।

एक कुख्यात क्रिमिनल के साथ तेजस्वी यादव के मिलने पर राजनीतिक भूचाल आ गया है। भाजपा ने इसको लेकर सवाल उठाया है। बिहार भाजपा ने ट्वीट करके तेजस्वी यादव से पूछा है कि वे जन विश्वास यात्रा निकाल रहे हैं या अपराधी विश्वास यात्रा? भाजपा ने तेजस्वी पर वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया है। साथ ही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को ‘राष्ट्रीय जहरीला दल’ कहा है।

भाजपा ने अपने ट्वीट ने लिखा है, “तेजस्वी यादव जी ‘जन विश्वास यात्रा’ निकाल रहे या ‘अपराधी विश्वास यात्रा?’ वोटबैंक के लिए अंधे तेजस्वी यादव ने पत्रकार राजदेव रंजन यादव जी के खून के छींटे से रंगे हत्यारे के साथ मंच साझा कर गुंडाराज की झलक फिर से पेश की है। वोट बैंक के लिए ये समाज और सिद्धांत सब कुछ गिरवी रख देंगे!”

बता दें कि मोहम्मद कैफ पहले युवा राजद से जुड़ा था। कुछ दिन राजद में रहने के बाद उसने राजद से नाता तोड़ लिया था। साल 2020 में हुए विधानसभा में वह रघुनाथपुर सीट से विधायकी का चुनाव भी लड़ा था। उसे बिहार के एक क्षेत्रीय दल ने अपना उम्मीदवार बनाया था। हालाँकि, इस चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा था। अब माना जा रहा है कि वह फिर राजद के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहा है।

DDA ने जो ‘अवैध’ मस्जिद ढहाई, वहाँ शब-ए-बारात पर नमाज पढ़ना चाहते थे मुस्लिम: हाई कोर्ट ने नहीं दी इजाजत, दिल्ली वक्फ बोर्ड को झटका

दिल्ली के महरौली इलाके में 30 जनवरी 2024 को अखूंदजी मस्जिद और बहरुल उलूम मदरसे पर बुलडोजर कार्रवाई हुई थी। दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने सरंक्षित रिज क्षेत्र में अवैध निर्माण को लेकर यह कार्रवाई की थी। ढहाई गई इस मस्जिद में मुस्लिम शब-ए-बारात पर नमाज पढ़ना चाहते थे। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने इसके लिए इजाजत देने से इनकार कर दिया है।

दिल्ली वक्फ बोर्ड की प्रबंध समिति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर शब-ए-बारात के दिन मस्जिद की जमीन पर बिना रोक-टोक आवाजाही की अनुमति माँगी थी। आज (23 फरवरी 2024) दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस पुरुषइंद्र कुमार कौरव ने यह कहते हुए याचिका खारिज की दी कि अब यह साइट डीडीए के नियंत्रण में है। इससे जुड़ी मुख्य याचिका पर 07 मार्च को सुनवाई होनी है। उन्होंने मौजूदा स्थिति का हवाला देते हुए नए सिरे ये निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए यथास्थिति बहाल रखने को कहा।

वकील शम्स ख्वाजा ने इस दौरान दिल्ली वक्फ बोर्ड की प्रबंध समिति की ओर से दलीलें दी। याचिका में कहा गया था कि शब-ए-बारात (प्रायश्चित की रात) पर मुस्लिम खुद और अपने पूर्वजों के पापों के लिए अल्लाह से माफी माँगते हैं। अखूंदजी मस्जिद 700 साल पुरानी थी। सालों से वहाँ नमाज अदा की जा रही थी। स्थानीय लोगों का एक कब्रिस्तान भी था। लिहाजा उन्हें शब-ए-बारात पर इस जगह पर बेरोकटोक आवाजाही की इजाजत दी जाए। हालाँकि दिल्ली वक्फ बोर्ड के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह मस्जिद न तो 700 साल पुरानी है और न ही वक्फ की प्रॉपर्टी है।

गौरतलब है कि डीडीए की कार्रवाई के बाद मुस्लिम पक्ष ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद अदालत ने उसे यथास्थिति बहाल रखने को कहा था। अदालत ने कहा था कि यह निर्देश केवल उसी हिस्से को लेकर है जहाँ अखूंदजी मस्जिद थी। उसका निर्देश संरक्षित क्षेत्रों में अन्य अवैध निर्माण पर कार्रवाई से डीडीए को नहीं रोकती। मुस्लिम पक्ष का दावा है कि इस मस्जिद का निर्माण करीब सात सौ साल पहले रजिया सुल्तान के शासनकाल में हुआ था। वहीं डीडीए का कहना है कि संरक्षित क्षेत्र में कब्जा कर जो अवैध निर्माण किए गए थे उनमें यह मस्जिद और मदरसा भी शामिल था।

टिकटॉक पर बैन से भारत ने दुनिया को दिखाया रास्ता: अमेरिका हुआ मुरीद, कहा- चीनी चालों का नाकाम करने का नई दिल्ली का तरीका लाजवाब

अमेरिका के शीर्ष टेक सिक्योरिटी अधिकारी ने कहा कि भारत सरकार ने टिकटॉक पर बैन लगाकर जिस तरह से चीन को चुनौती दी है, वो बेमिसाल है। भारत सरकार ने साल 2020 में टिकटोक को बैन कर दिया था, इसके बाद अमेरिका समेत कई देशों ने चीनी कंपनियों के खिलाफ इस तरह के कदम उठाए। कुछ ऐसा ही कहा भारत की पहली यात्रा पर आए अमेरिका के शीर्ष तकनीकी सुरक्षा अधिकारी ब्रेंडन कैर ने। उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने जिस तरह से चीनी खतरे से निपटा, वो शानदार है।

अमेरिकी संघीय संचार आयोग (एफसीसी) के कमिश्नर ब्रेंडन कैर अपनी पहली भारत यात्रा पर हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान इकोनॉमिक टाइम्स के साथ खास बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा कि चीन की तरफ से खड़े किए जा रहे सुरक्षा की चिंताओं का भारत सरकार ने जिस तरह से सामना किया और चीन की चालों को जिस तरह से नाकाम किया, वो काबिले-तारीफ है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रैंडन कैर ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेजी से बढ़ रही है और उसके सामने जिस तरह की सुरक्षा चुनौतियाँ बढ़ रही है, उससे भारत सरकार ने जिस कड़ाई से निपटा, वो दुनिया के लिए एक मॉडल की तरह है। उन्होंने कहा कि शॉर्ट-वीडियो प्लेटफॉर्म टिकटॉक और टेलीकॉम उपकरण आपूर्तिकर्ता हुआवेई और जेडटीई पर भारत की कार्रवाई ने “चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) द्वारा उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए उचित और मजबूत कार्रवाई के मामले में स्वर्ण मानक स्थापित किया है।” कैर ने कहा कि अमेरिका इस मामले में भारत से ‘सीख’ ले सकता है। साथ ही उन्होंने अमेरिका और भारत को मिल कर काम करने की सलाह दी।

कैर ने कहा कि चीन और उसके सहयोगी देशों द्वारा सेंसरशिप और इंटरनेट पर जिस तरह से पकड़ बनाकर रखते हैं और उस पर तमाम पाबंदियाँ लगाते हैं, वो गलत है। यही नहीं, चीनी कंपनियाँ दूसरे देशों में काम करने के दौरान जो डाटा इकट्ठा करती हैं, उसका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है। ऐसे में तमाम देशों को डाटा के लोकलाइजेशन पर ध्यान रखने की जरूरत है। ताकी इंटरनेट पर किसी एक देश का आधिपत्य न रके। उन्होंने चीन और उसके सहयोगी देशों की ओर से इंटरनेट पर राजनीतिक, धार्मिक वजहों से पाबंदियाँ लगाने की भी निंदा की।

भारत ने साल 2020 में लगाया था टिकटोक पर बैन

बता दें कि भारत सरकार ने साल 2020 टिकटॉक के साथ ही सैकड़ों चीनी ऐप्स पर बैन लगा दिया था। भारत सरकार ने डाटा की सुरक्षा को लेकर ये कदम उठाया था और राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इन ऐप्स को बैन करने का आदेश जारी किया था। ऐसे अधिकतर ऐप्स का मालिकाना हक बाइटडांस नाम की चीनी कंपनी के पास है। भारत से काफी देर बार जून 2023 में अमेरिका ने भी ऐसा कदम उठाया और सरकारी अधिकारियों के टिकटॉक के उपयोग पर बैन लगा दिया। यही नहीं, अमेरिका ने हुआवेई और जेडटीई समेत पाँच चीनी कंपनियों से दूरसंचार उपकरणों की बिक्री और आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। वहीं, भारत ने इन कंपनियों के सामानों की जाँच का स्तर बढ़ा दिया है।

CAA पर मुस्लिमों को किया गुमराह: अजमेर दरगाह के दीवान ने कबूला, कहा- कोर्ट के बाहर हो काशी-मथुरा का समाधान

राजस्थान के अजमेर में स्थित मुस्लिमों के लिए पाक मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दीवान एवं सजदानशीं सैयद ज़ैनुल आबेदीन ने CAA और मथुरा-काशी को लेकर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि CAA उन लोगों के लिए है, जो दूसरे देशों से प्रताड़ित होकर भारत आते हैं और यहाँ नागरिकता के आवेदन करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि काशी और मथुरा के मंदिर के मामले को कोर्ट के बाहर आपसी बातचीत से हल कर लेना चाहिए।

जब सैयद जैनुल आबेदीन से पूछा गया कि क्या CAA कानून मुस्लिमों को खिलाफ है। इस पर सैयद जैनुल आबेदीन ने कहा, “पार्लियामेंट के अंदर होम मिनिस्टर कह रहा है भाई। मैं थोड़े कह रहा हूँ। पार्लियामेंट के अंदर सबने ये कहा है कि CAA कानून बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार से जो माइग्रेट होकर यहाँ आए हैं और वर्तमान में यहाँ रह रहे हैं उनके लिए है।”

उन्होंने आगे कहा, “इन देशों से आने वाले लोगों दिया गया क्या इंडियन सिटीजनशिप? नहीं दी गई। ये कानून उनके लिए ही है। हिंदुस्तान का मुसलमान डर क्यों रहा है? ये उनके लिए नहीं है। इससे सिटीजनशिप कैंसिल नहीं होती है। बस बात खत्म।” बता दें कि देश के मुस्लिमों में ये प्रोपेगेंडा फैलाई गई थी कि CAA कानून मुस्लिमों की नागरिकता खत्म करने के लिए लाई गई है।

सैयद आबेदीन ने CAA को लेकर ही नहीं, बल्कि वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी ढाँचा विवाद तथा मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि शाही ईदगाह ढाँचे को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि काशी और मथुरा के विवाद को आपसी सहमति से दोनों पक्षों को मिलकर सुलझा लेना चाहिए। आबेदीन ने कहा कि इससे दोनों पक्षों के बीच कटुता नहीं रहेगी।

सैयद आबेदीन ने कहा, “मथुरा और काशी का विवाद अभी कोर्ट के सामने विचाराधीन है। इसलिए उसके ऊपर कोई कमेंट नहीं कर सकते। हमारा जो पुराना एक्सपीरियंस है, उसके हिसाब से हम चाहते हैं कि इस मसले का हल कोर्ट के बाहर बैठकर तय हो सकता है तो सबसे ज्यादा बेहतर है दोनों पक्षों के लिए। उससे दोनों पक्षों के अंदर कटुता भी नहीं रहेगी। अमन और शांति रहेगी।”

उन्होंने कहा, “कोर्ट के फैसले से तो जिसके पक्ष में फैसला आएगा, वह खुश होगा और जिसके हक में नहीं होगा, उसके दिल में कटुता रहेगी। तो ऐसा क्यों करना? ये देश वो पुराना नहीं है। जितने राजे-रजवाड़े, महाराजा थे, उनका एक धर्मगुरु होता था। ये धर्म के मामले में उनसे परामर्श लेकर फैसले लिया करते थे। आज जो एक नई बात पैदा की है इन्होंने कि धर्म और राजनीति….।”

धर्म और राजनीति के मिश्रण पर सैयद आबेदीन ने कहा, “गोरखपुर प्रेस सबसे ज्यादा मशहूर है इंडिया के अंदर। गीता प्रेस। उसका 1957 का एडिशन ‘श्री कल्याण’ है। बहुत मोटी बुक है। उस किताब के पेज नंबर 771 और 772 का श्लोक कहता है कि अगर राजनीति को धर्म से अलग कर दिया जाएगा तो राजनीति विधवा हो जाएगी और धर्म को राजनीति से अलग कर दिया जाएगा तो धर्म विधुर (जिसकी पत्नी की मृत्यु हो गई हो) हो जाएगा।”