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मणिपुर में कुकी समूह की अनुसूचित जनजाति स्टेटस पर सवाल: सीएम बीरेन सिंह समीक्षा के लिए बनाएँगे कमिटी, मैतेई बोले- ये शरणार्थी हैं

मणिपुर में मैतेई समूह को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल करने के निर्णय का कुकी समुदाय ने विरोध किया था और राज्य में हिंसा भड़क उठी थी। अब राज्य सरकार ने कुकी को दी गई अनुसूचित जनजाति की स्टेटस पर विचार करना शुरू कर दिया है और इसके लिए एक कमिटी बनाई है। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने मंगलवार (9 जनवरी 2024) को कहा कि राज्य के अनुसूचित जनजाति की सूची से कुकी समुदाय को हटाने के प्रस्ताव पर सर्व-जनजाति समिति निर्णय लेगी।

मुख्यमंत्री का यह बयान केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार से कुकी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाने के प्रस्ताव पर विचार करने के अनुरोध के बाद आया है। इससे पहले रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के राष्ट्रीय सचिव महेश्वर थौनाओजाम ने माँग की थी कि केंद्र सरकार सही ढंग से निर्धारित करे कि मणिपुर की अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसे होना चाहिए। उन्होंने मैतेई लोगों को सूची में शामिल करने का मामला भी उठाया।

थौनाओजम के प्रतिनिधित्व में 13 दिसंबर 2023 को इस बाबत माँग पत्र भेजा गया था। इसके बाद जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने 26 दिसंबर 2023 को मणिपुर सरकार के जनजातीय एवं पहाड़ी मामलों के विभाग को इस बारे में पत्र भेजा और कहा कि सूची में से किसी को हटाने या शामिल करने के लिए राज्य सरकार की सिफारिश की जरूरत होगी। इसको देखते हुए अब राज्य सरकार ने कमेटी बनाने का फैसला लिया है। यह कमिटी निर्णय करेगी कि कुकी को ST वर्ग में रखना चाहिए या नहीं।

महेश्वर थौनाओजाम ने कहा कि यह एक विषम स्थिति है कि कुकियों को मणिपुर में एसटी का दर्जा प्राप्त है, जबकि मैतेइयों को नहीं। थौनाओजम ने कहा कि भारत की पूर्ववर्ती ब्रिटिश सरकार के रिकॉर्ड, ऐतिहासिक आँकड़े और चेथारोन खुम्पाबा राजपरिवार के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा, “रॉयल क्रॉनिकल ऑफ द किंग्स ऑफ मणिपुर के हिसाब से मणिपुर में रहने वाले कुकी सभी शरणार्थी/प्रवासी हैं। दूसरी ओर मैतेई लोग मणिपुर की मूल जनजातियों के वंशज हैं।”

इस मामले में मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने मंगलवार को कहा कि राज्य सरकार समिति की सिफारिश मिलने के बाद इस मामले पर अपना रूख स्पष्ट करेगी। उन्होंने कहा, “वे (कुकी समुदाय) मणिपुर की (अनुसूचित जनजाति) सूची में शामिल हैं, लेकिन उन्हें कैसे शामिल किया गया था, इसकी समीक्षा की आवश्यकता है। इसके लिए हमें सभी जनजातियों (सभी समूह) से मिलाकर एक समिति बनानी होगी।”

यदि समिति कुकी समुदाय को अनुसूचित जनजाति सूची से हटाने की सिफारिश करती है तो केंद्र सरकार को इस सिफारिश पर विचार करना होगा। केंद्र सरकार मंजूरी देगी कुकी समुदाय का अनुसूचित जनजाति खत्म हो किया जाएगा। यदि समिति उन्हें ST में रहने की सिफारिश करती है तो केंद्र इस पर विचार करेगा और उसकी मंजूरी के बाद इसे ST वर्ग में बनाए रखा जाएगा।

बता दें कि मणिपुर पिछले साल मई से जातीय हिंसा से दहल रहा है और 180 से अधिक लोग मारे गए हैं। मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे की माँग के विरोध में पहाड़ी जिलों में ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ आयोजित किए जाने के बाद 3 मई को हिंसा भड़क उठी थी।

गौरतलब है कि मणिपुर की आबादी में मैतेई लोगों की संख्या लगभग 53 प्रतिशत है और वे ज्यादातर इम्फाल घाटी में रहते हैं। वहीं, नागा और कुकी की कुल आबादी करीब 40 प्रतिशत है और वो मुख्यत: पहाड़ी जिलों में रहते हैं।

अमेरिका में कार रैली, फ्रांस में ‘राम रथ यात्रा’, इस्लामी मुल्कों में लाइव प्रसारण: वैश्विक होगा प्राण-प्रतिष्ठा समारोह, एफिल टॉवर से लेकर टाइम्स स्क्वायर तक होगा राममय

राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका और यूरोप तक के श्रद्धालु उत्साहित हैं। फ्रांस का एफिल टॉवर हो या न्यूयॉर्क का टाइम्स स्क्वायर, हर जगह विशाल पर्दों पर राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के प्रसारण की तैयारी है। इतना ही नहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका के विभिन्न इलाकों में कार रैली भी निकाली जाएगी। यहाँ तक कि इस्लामी मुल्कों में भी रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा अनुष्ठान का लाइव प्रसारण होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद कार्यक्रम की तैयारियों की निगरानी कर रहे हैं।

लोगों के उत्साह का आलम देखिए कि अयोध्या में होने वाले इस कार्यक्रम को लेकर विदेश तक में लोग इंतज़ार कर रहे हैं। इस तरह से अब ये एक वैश्विक कार्यक्रम बन रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नज़रें बनी हुई हैं। फ्रांस की राजधानी पेरिस में 21 जनवरी, 2023 को ‘राम रथ यात्रा’ भी प्रस्तावित है, जिसमें पूरे यूरोप से श्रद्धालु जुट रहे हैं। साथ ही एफिल टॉवर के पास भी कार्यक्रम का आयोजन होगा। अमेरिका के टाइम्स स्क्वायर पर तो राम मंदिर के शिलान्यास के कार्यक्रम का भी लाइव प्रसारण हुआ था, अब प्राण-प्रतिष्ठा के कार्यक्रम का होगा।

नॉर्थ अमेरिका के कई इलाकों, कनाडा में भी मंदिरों में 22 जनवरी को धार्मिक आयोजन होंगे, विशेष पूजा-अर्चना होगी। कैलिफोर्निया, वाशिंगटन और शिकागो सहित USA के कई शहरों में कार रैलियाँ होंगी। भारतीय समय के अनुसार 12:30 बजे कार्यक्रम होना है। उस दौरान जहाँ पेरिस में सुबह होगी, वहीं अमेरिका में रात होगी। चूँकि 500 वर्षों के संघर्ष के बाद रामलला अपने मंदिर में विराजने जा रहे हैं, इसीलिए श्रद्धालुओं ने तैयारियाँ भी ख़ास कर के रखी हैं।

पेरिस में रहने वाले अविनाश मिश्रा ने बताया कि इस ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बनते हुए यूरोप के लोग पेरिस में ‘राम रथ यात्रा’ में भाग लेंगे और एफिल टॉवर के पास प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम का लाइव प्रसारण देखेंगे। उन्होंने इस यात्रा का नक्शा शेयर करते हुए श्रद्धालुओं से इसका हिस्सा बनने की अपील की। ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट ने भी इस कार्यक्रम से जुड़ी सूचना को रीट्वीट किया है। अविनाश ने कहा कि इस प्राण-प्रतिष्ठा आयोजन का लाइव प्रसारण देखना श्रद्धालुओं के लिए सौभाग्य की बात है।

नॉर्थ अमेरिका और कनाडा में ‘द मांडू मंदिर एम्पावरमेंट काउंसिल’ ने कई देवस्थानों में कार्यक्रम की योजना बनाई है। वाशिंगटन और शिकागो के बाद अब कैलिफोर्निया में कार रैली होनी है। श्रद्धालुओं ने कहा कि भले ही वो सदेह अयोध्या में उपस्थित रहने में अक्षम हैं, लेकिन भगवान राम उनके हृदय में रहते हैं और वो उनकी वापसी से हर्षित हैं। न्यूयॉर्क सिटी के मेयर एरिक एडम्स ने कहा कि ये एक हिन्दुओं की जनसंख्या को देखते हुए ये एक बहुत महत्वपूर्ण घटना है, ये आध्यात्मिकता के पथ पर बढ़ने और त्योहार मनाने का एक अच्छा अवसर है।

इतना ही नहीं, 160 अलग-अलग देशों में कई कार्यक्रमों का आयोजन होना है। VHP (विश्व हिन्दू परिषद) ने इसकी रूपरेखा तैयार की है। 50 देशों में बड़े आयोजन होने हैं। अमेरिका में 300, मॉरीशस में 100, UK में 25, ऑस्ट्रेलिया में 30 और कनाडा में 30 लोकेशनों से अयोध्या में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम का लाइव प्रसारण होगा। आयरलैंड, फिजी, इंडोनेशिया और जर्मनी में भी बड़े-बड़े कार्यक्रम होंगे, जहाँ लाइव प्रसारण दिखाया जाएगा।

अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और फिजी समेत 50 देशों के प्रतिनिधियों को अयोध्या इस समारोह में उपस्थित रहने के लिए बुलाया गया है। इंडोनेशिया और सऊदी अरब जैसी इस्लामी मुल्कों में भी लाइव स्ट्रीमिंग की योजना है। हवन पूजा और हनुमान चालीसा पाठ जैसे कार्यक्रम 160 देशों में होने हैं। एक तरह से यूपी भी इस कार्यक्रम के जरिए विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान बना रहा है। दुनिया भर में हिन्दू पुनरुत्थान की एक इस नई गाथा के लोग साक्षी बनेंगे।

सोने-चाँदी से बना 8 KG का चरणपादुका लेकर नंगे पाँव अयोध्या चले श्रीनिवास शास्त्री: रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से पहले CM योगी को करेंगे भेंट

रामलला अद्वितीय हैं तो उनके भक्त भी अनोखे हैं। उनके ऐसे ही एक भक्त 64 साल के चल्ला श्रीनिवास शास्त्री हैं। प्रभु की शक्ति और प्रेरणा से वे उम्र को बौना साबित करते हुए अपने सिर पर 8 किलोग्राम की चरण पादुका लेकर वे नंगे पाँव हैदराबाद से अयोध्या आ रहे हैं। वे जिस रास्ते पर भगवान चले थे, उस रास्ते पर पैदल चलते हुए 15 जनवरी 2024 को अयोध्या पहुँचेंगे।

चाँदी से बनी और सोने से मढ़ी ये चरण पादुका वो 16 जनवरी 2024 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपेंगे। श्रीनिवास शास्त्री कहते हैं कि वो उस रास्ते से अयोध्या आ रहे हैं, जिस रास्ते पर चलकर भगवान श्रीराम रामेश्वरम से अयोध्या से पहुँचे थे। शास्त्री के मुताबिक, वे जिन रास्तों से आ रहे हैं, उन रास्तों का नक्शा डॉक्टर राम अवतार ने बहुत शोध के बाद बनाया।

एएनआई ने चल्ला श्रीनिवास शास्त्री के हवाले से मंगलवार (9 जनवरी 2024) को लिखा कि वह भगवान राम की ‘वनवास’ यात्रा को प्रतिबिंबित करते हुए अयोध्या-रामेश्वरम मार्ग पर चल रहे हैं। शास्त्री ने उल्टे क्रम का पालन करते हुए यानी रामेश्वरम से अयोध्या के लिए 20 जुलाई 2023 को अपनी यात्रा शुरू की थी। वे रास्ते में भगवान राम द्वारा स्थापित शिवलिंगों के पास रुके।

उन्होंने ये भी बताया कि वे अब तक ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात से होते हुए चित्रकूट पहुँचे हैं। यहाँ से अयोध्या की दूरी 272 किलोमीटर है। उनका लक्ष्य अगले 5 दिनों में अयोध्या पहुँचना है। उनका कहना है कि भगवान राम के लिए तैयार की गई चरण पादुका में 1 किलोग्राम सोना और 7 किलोग्राम चाँदी का इस्तेमाल किया गया है। इस खड़ाऊँ की कीमत करीब 65 लाख रुपए है।

श्रीनिवास शास्त्री ने कहा कि उनकी योजना है कि वे अयोध्या में अपना घर बनाएँ और यहीं आकर बस जाएँ। उन्होंने कहा कि उनके पिता ने कारसेवा की थी। पिता अब नहीं रहे तो वे उनकी इच्छा पूरी कर रहे हैं। बता दें कि 64 वर्षीय शास्त्री साउथ फिल्म इंडस्ट्री में काम कर चुके हैं। वो अयोध्या भाग्यनगर सीताराम फाउंडेशन के संस्थापक भी हैं। वो इससे पहले राम मंदिर के लिए चाँदी की 5 ईंटें दान कर चुके हैं।

उनका कहना है कि राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही उन्होंने अपना आगे का जीवन भगवान राम को समर्पित करने का फैसला कर लिया। वो राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले अयोध्या पहुँचने और रामलला की चरण पादुका को सौंपने को लेकर खासे उत्साहित हैं। बता दें कि ‘प्राण प्रतिष्ठा’ समारोह 16 जनवरी 2024 से शुरू होकर सात दिनों तक चलेगा।

पीएम मोदी 22 जनवरी 2024 को भव्य राम मंदिर का उद्घाटन करेंगे। इस समारोह के लिए कई अहम शख्सियतों को निमंत्रण भेजा गया है। भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या महान आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखती है। श्री राम जन्मभूमि तीरथ क्षेत्र ट्रस्ट ने समारोह के लिए 4,000 संतों को आमंत्रित किया है।

अ से अनपढ़ से लेकर ज्ञ से ज्ञानी तक, वैज्ञानिक है हिन्दी: आर्थिक महाशक्ति बनेगा भारत तो यही होगी वैश्विक भाषा, अब अंग्रेजी की दासता से मुक्त होने की बारी

भाषा का लेकर चंदन, आओ कर लें अभिनंदन
कि गर्व से हिन्दी बोलें, चलो हिन्दी के हो लें

संपूर्ण विश्व में एकमात्र भारत ही ऐसा देश है जो न केवल भौगोलिक क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से विशाल है अपितु हमें तो इस बात का भी गर्व है कि हमारे देश में लगभग 1652 विकसित एवं समृद्ध बोलियाँ प्रचलित हैं। इन बोलियों का प्रयोग करने वाले विभिन्न समुदाय अपनी-अपनी बोली को महत्वपूर्ण मानने के साथ-साथ उसे बोली के स्थान पर भाषा कह कर पुकारते हैं और उनमें से कुछ बोलियाँ ऐसी हैं भी जिनमें वे सभी गुण विद्यमान हैं जो किसी भी समर्थ भाषा में होने चाहिए।

ऐसे विराट और समृद्धशाली राष्ट्र में स्वाधीनता आंदोलन के काल में सम्पूर्ण देश के लिए संपर्क भाषा का चयन करना अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण कार्य था। यह देश अपनी दासता की जंजीरों को तोड़ फेंकने के लिए तो संगठित था परन्तु एक संपर्क भाषा की अनिवार्यता अनुभव करते हुए भी इस प्रश्न पर सहमति नहीं हो पा रही थी कि विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में से किसे सम्पूर्ण देश के लिए संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त किया जाए।

गहन विचार-विमर्श करने के उपरान्त स्वतन्त्रता संग्राम में जुटे हुए लगभग सभी प्रमुख नेता, राजनीतिज्ञ, क्रांतिकारी, साधु-संत और विद्वतजन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हिन्दी ही वह भाषा है जो सभी को एक सूत्र में पिरोने का सामर्थ्य रखती है, यही भाषा सेतु बनकर भावनात्मक स्तर पर सम्पूर्ण देश को एक करेगी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात जो उन्हें लगी वह यह थी कि हिन्दी की अपनी स्वतंत्र लिपि है – देवनागरी लिपि – जो श्रेष्ठ वैज्ञानिक लिपि है और अपनी विशेषताओं के कारण सर्वगुण नागरी है।

विश्व पटल पर हिन्दी

यह सर्वविदित है की विश्व की समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत ही है परन्तु इस देवभाषा का यदि कोई उत्तराधिकारी है तो वह हिन्दी ही है। अपनों के ही द्वारा दीन-हीन कहलाते हुए, अपमान का दंश झेलते हुए भी हिन्दी पूर्ण विश्वास से आगे बढ़ती चली गई और आज स्थिति यह है की यह भाषा वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी है। विश्वभर में हिन्दी का वर्चस्व तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। आज वह विश्व के सभी महाद्वीपों तथा महत्वपूर्ण राष्ट्रों- जिनकी संख्या लगभग एक सौ चालीस है- में किसी न किसी रूप में प्रयुक्त होती है।

वर्तमान में वह बोलने वालों की संख्या के आधार पर चीनी के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा बन गई है। इस बात को सर्वप्रथम सन 1999 में ‘मशीन ट्रांसलेशन समिट’ अर्थात् यांत्रिक अनुवाद नामक संगोष्ठी में टोकियो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर होजुमि तनाका ने भाषाई आँकड़े पेश करके सिद्ध किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, विश्वभर में चीनी भाषा बोलने वालों का स्थान प्रथम और हिन्दी का द्वितीय है। अंग्रेजी तो तीसरे क्रमांक पर पहुँच गई है।

इसी क्रम में कुछ ऐसे विद्वान अनुसंधित्सु भी सक्रिय हैं जो हिन्दी को चीनी के ऊपर अर्थात् प्रथम क्रमांक पर दिखाने के लिए प्रयत्नशील हैं। डॉ जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने भाषा शोध अध्ययन 2005 के हवाले से लिखा है कि, विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या एक अरब दो करोड़ पच्चीस लाख दस हजार तीन सौ बावन (1,02,25,10,352) है जबकि चीनी बोलने वालों की संख्या केवल नब्बे करोड़ चार लाख छह हजार छह सौ चौदह (90,04,06,614) है।

यदि यह मान भी लिया जाए कि आँकड़े झूठ बोलते हैं और उन पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं किया जा सकता तो भी इतनी सच्चाई निर्विवाद है कि हिंदी बोलने वालों की संख्या के आधार पर विश्व की दो सबसे बड़ी भाषाओं में से है।

इक्कीसवीं सदी की भाषा

इस उत्तर आधुनिक काल में एक ओर जापान जैसे महान राष्ट्र की 60% प्रतिशत से अधिक आबादी लगभग 60 वर्ष को छूते हुए बुढ़ापे की ओर बढ़ गई है वहीं आज से लगभग 15 सालों के अंतर्गत अमेरिका और यूरोप का भी कुछ यही हाल होने वाला है। ऐसे में, विशाल जनसंख्या वाला भारत एक युवा राष्ट्र है, जिसे हम अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मान सकते हैं। हमारे अलावा चीन भी अभी युवा और भारी जनसंख्या वाला देश है और यह बात आने वाले समय में दोनों ही देशों को लाभान्वित करेगी, जिसका कुछ हद तक परिणाम भी अब देखने को मिल रहा है। यह दौर विश्व भर में भारत के साथ-साथ हिन्दी के भी भाग्योदय का दौर है।

हमारे देश में 1980 के बाद 64 करोड़ से ज्यादा बच्चे पैदा हुए हैं, जो विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षित हो रहे हैं। वे सन् 2025 तक पूर्ण विकसित और विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित होकर अपनी सेवाएँ देने के लिए विश्व के समक्ष उपलब्ध होंगे। वे विश्व के सबसे तरुण मानव संसाधन होंगे जिस कारण दुनियाभर में उनकी पूछ होगी। यही तरुण भारत जब विश्व के विभिन्न देशों की व्यवस्था और विकास परिचालन का सशक्त हस्ताक्षर बनेगा तब उसके साथ हिन्दी भी जाएगी।

जब भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनेगा, व्यापार और उत्पादन दोनों ही भारत पर अधिक निर्भर होगा तब वैश्विक मंच पर स्वतः ही हिन्दी महत्वपूर्ण भूमिका का वहन करेगी। इतिहास में इसने भारत को जोड़ा था भविष्य में यह वैश्विक एकता का प्रतीक बनेगी और विश्वभाषा कहलाएगी।

वैज्ञानिक और पूर्णतः समर्थ भाषा

वह दिन बीत गए जब हिन्दी को असमर्थ बोलकर उसकी अवमानना की जाती थी, अब वह समर्थ भाषा के रूप में ख्याति प्राप्त है। विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं में स्थान पाने वाली अन्य भाषाओं में भी हिन्दी जैसा गुण और तत्व नहीं है। यह एक ऐसी भाषा है जिसका सफर अ अनपढ़ से लेकर ज्ञ ज्ञानी तक परिलक्षित होता है। हमारी देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता तो सर्वमान्य है। देवनागरी में लिखी जाने वाली भाषाएँ उच्चारण पर आधारित हैं।

हिन्दी की शाब्दी और आर्थी संरचना प्रयुक्तियों के आधार पर सरल व जटिल दोनों है। हिंदी भाषा का अन्यतम वैशिष्ट्य यह है कि उसमें संस्कृत के उपसर्ग तथा प्रत्ययों के आधार पर शब्द बनाने की अभूतपूर्व क्षमता है। वर्तमान में हिन्दी के पास पच्चीस लाख से ज्यादा शब्दों की सेना है। संसार की अन्यान्य भाषाओं के बहुप्रयुक्त शब्दों को उदारतापूर्वक ग्रहण करने का सामर्थ्य केवल हिन्दी में है।

इस भाषा की वैज्ञानिकता और सुव्यवस्था की छोटी सी झलक प्रस्तुत पंक्तियों से स्पष्ट होती है,

“सुनो क, ख, ग, घ, कंठ से उच्चरा, वहीं त, थ, द, ध दंत के हैं स्वरा,

ट, ठ, ड, ढ़ मूर्धन्य हुआ, य, र, ल, व अंतव्य हुआ, प, फ, ब, भ हैं ओष्ठे…”

संसार की बदलती चिंतनात्मकता तथा नवीन जीवन स्थितियों को व्यंजित करने की भरपूर क्षमता हिंदी भाषा में है, हमें इस दिशा में अब केवल अधिक बौद्धिक तैयारी तथा सुनियोजित विशेषज्ञता के साथ अपने कदम को बढ़ाने की आवश्यकता है।

साहित्य के क्षेत्र में

भारत माँ की गोद में जिसका, भोला बचपन बीता है

तुलसी ने मानस को रचकर, जनमानस को जीता है

सूर, कबीर, मीरा जिसके, थे सब रस के दीवाने

और बिहारी, घनानंद की ये ही मात पुनीता है

साहित्य जगत में हिन्दी की सृजन धारा लगभग बारह सौ सालों (आठवीं शताब्दी से लेकर वर्तमान में इक्कीसवीं शताब्दी) से प्रवाहित हो रही है। उसका काव्य साहित्य तो संस्कृत के बाद विश्व के श्रेष्ठतम साहित्य की क्षमता रखता है। उसमें लिखित उपन्यास एवं समालोचना भी विश्वस्तरीय है। आज हिंदी में विश्व का महत्त्वपूर्ण साहित्य अनुसृजनात्मक लेखन के रूप में उपलब्ध है और उसके साहित्य का उत्तमांश भी विश्व की दूसरी भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से जा रहा है।

‘पद्मावत’, ‘रामचरित मानस’ तथा ‘कामायनी’ जैसे महाकाव्य विश्व की किसी भी भाषा में नहीं हैं। कबीर, तुलसी, सुर, जायसी, बिहारी, देव, घनानंद, गुरु गोबिंद सिंह, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रासद, पन्त, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, अज्ञेय आदि कवियों की रचनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है हिंदी में अपने भावों और विचारों को अभिव्यक्त करने की अद्भुत और अलौकिक शक्ति है। हमारे साहित्य का आंगन तो मुंशी प्रेमचंद जी की अद्वितीय कृतियों से भरा-पुरा है।

वर्तमान समय में हिन्दी का कथा साहित्य भी फ्रेंच, रूसी तथा अंग्रेजी के लगभग समकक्ष है। आज हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में जितने रचनाकार सृजन कर रहे हैं उतने तो बहुत सारी भाषाओं के बोलने वाले भी नहीं हैं। केवल संयुक्त राज्य अमेरिका में ही दो सौ से अधिक हिंदी साहित्यकार सक्रिय हैं जिनकी पुस्तकें छप चुकी हैं। समृद्धशाली हिन्दी साहित्य पूरे संसार में सम्मानित हो रहा है। हिन्दी केवल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ही राष्ट्र भाषा नहीं है बल्कि पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, फिजी, मॉरीशस, गुयाना, त्रिनिदाद तथा सुरीनाम जैसे देशों की सम्पर्क भाषा भी है।

वह भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के बीच खाड़ी देशों, मध्य एशियाई देशों, रूस, समूचे यूरोप, कनाडा, अमेरिका तथा मैक्सिको जैसे प्रभावशाली देशों में रागात्मक जुड़ाव तथा विचार-विनिमय का सबल माध्यम है। हिन्दी के विकास रथ में हमें विधि, विज्ञान, वाणिज्य तथा नवीनतम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पाठ-सामग्री का तेज़ी से निर्माण करना होगा। आज आवश्यकता है भारतीय जनमानस को अपनी हिन्दी के प्रति जागरूक होने की, उसे गर्व से व्यवहृत करने की।

हम अंग्रेजों की दासता से तो मुक्त हो गए अब अंग्रेजी की बारी है। हमारा अँग्रेजी तथा विश्व कि किसी अन्य भाषा से कोई द्वेष नहीं है, हमें उन्हें अवश्य सीखना चाहिए, उनके समृद्ध साहित्य का आस्वादन करना चाहिए, उनमें उपलब्ध तकनीकी ज्ञान के भण्डार को आत्मसात करना चाहिए परन्तु इन सबके बीच अपनी हिन्दी का यथोचित सम्मान भी करना चाहिए।

(लेखिका शुभांगी उपाध्याय, कलकत्ता विश्वविद्यालय में Ph.D शोधार्थी हैं।)

जिन्होंने दिया ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे’ का नारा, उनको भी मिला प्राण-प्रतिष्ठा का न्योता: मिलिए कारसेवक बाबा सत्यनारायण से

राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कई ऐसे नारे आए जिन्होंने हिंदुओं में उत्साह का संचार किया। ऐसा ही एक नारा है- रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे। इस नारे के प्रणेता बाबा सत्यनारायण मौर्य हैं। इस कारसेवक को भी 22 जनवरी 2024 को अयोध्या के भव्य राम मंदिर में भगवान रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने का न्योता मिला है।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के करीब सात हजार लोग उपस्थित रहेंगे। अपने स्वप्न को यथार्थ बनते देखने के लिए बाबा मौर्य भी इस दिन अयोध्या में रहेंगे। वे कहते हैं कि ये​ उस समय का संघर्ष ही है जिसके कारण आज यह क्षण आया है।

बाबा सत्यनारायण मौर्य वह नाम है, जो कारसेवा के दौरान ऊर्जा का संचार करते थे। एक चित्रकार के तौर पर वे दीवारों पर भगवान राम की चित्र उकेरते तो मंच से अपने संबोधन के जरिए कारसेवकों में जोश भर देते थे। 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की नींव रखी थी। उसके बाद दैनिक भास्कर करते हुए बाबा सत्यनारायण मौर्य ने कहा था कि मंदिर बनना कई जीवन के सपनों के सच होने जैसा है।

घुमक्कड़ बाबा के तौर पर मशहूर सत्यनारायण मौर्य ने इंदौर, उज्जैन और मुंबई को अपना ठिकाना बना रखा है। पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद ही उन्होंने खुद को पूरी तरह राम मंदिर आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया था। पढ़ाई के दौरान ही वे उज्जैन की दीवारों को नारों से रंगने लगे थे।

मूल रूप से बाबा माैर्य राजगढ़ के रहने वाले हैं। उनके पिता शिक्षक थे। उनके भाई-बहन भी शिक्षक बने। पोस्टग्रेजुएट बाबा गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। लेकिन शिक्षक बनने की जगह उन्होंने कारसेवक बन राम की सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। रामधुन ऐसी लगी कि 1990 में दोस्तों के संग अयोध्या चले आए और अयोध्या की गली-गली में राम मंदिर की अलख जगाने निकल पड़े। पेंटिंग के शौकीन बाबा के हाथ गेरु पड़े या पेंट वो वहाँ हर दीवार पर रामलला की छवि उकेरने लगे।

विवादित ढाँचा विध्वंस के बाद अयोध्या में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर बैनर के कपड़े से अस्थायी मंदिर बनाया था। विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन प्रमुख अशोक सिंघल भी उनके नारों के कायल थे। उनके कहने पर बाबा ने दिल्ली भेजकर गाने और नारों की कैसेट रिकाॅर्ड करवाई थी। ये नारे बाद में हर मंच की जान बन गए। उज्जैन के एक कार्यक्रम में मंच से बाबा ने ‘रामलला हम आएँगे मंदिर वहीं बनाएँगे’ का नारा दिया था।

(फोटो साभार: दैनिक भास्कर)

सत्यनारायण मौर्य के अनुसार ‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएँगे’ नारे के साथ उस समय कई लाइनें जुड़ीं। ऐसी ही एक पंक्ति थी ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे’। यह खूब लोकप्रिय हुई। उन्होंने ‘रक्त देंगे, प्राण देंगे मंदिर का निर्माण करेंगे’ जैसे कई और नारे भी दिए थे।

दशरथ महल में जीवंत होगा रामलला का बचपन, योगी सरकार ने सँवारा: अखिलेश राज में धूल फाँकती रह गई थी फाइल

अयोध्या के नवनिर्मित राम मंदिर में 22 जनवरी 2024 को होने वाली रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियाँ अंतिम चरण में हैं। इसी के साथ प्रभु श्रीराम से जुड़े ऐतिहासिक चिह्नों को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार संरक्षित करने का प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में जल्द ही अयोध्या में स्थित दशरथ महल नए रूप में नजर आएगा।

यूपी की योगी सरकार ने दशरथ महल की वह आभा लौटाई है, जो कभी त्रेता युग में हुआ करती थी। कहा जाता है कि महाराज दशरथ ने त्रेता युग में इस महल की स्थापना की थी। इस दशरथ महल में आने वाले लोगों को प्रभु श्रीराम के बाल्यकाल के चरणों की अनुभूति होगी। योगी सरकार ने दशरथ महल को सँवारने का कार्य फरवरी 2021 में शुरू किया था।

दशरथ महल में योगी सरकार ने सत्संग भवन, नया प्रवेश द्वार, रात्रि विश्राम गृह और श्रद्धालु सहायता केंद्र बनाया है। इन सब पर ₹3 करोड़ का खर्चा किया है। इसमें बाकी कामों को 22 जनवरी 2024 तक पूरा कर लिया जाएगा। दरअसल, दशरथ महल को संवारने की योजना अखिलेश सरकार के दौरान वर्ष 2013 में भी आई थी लेकिन वह मात्र कागजों पर ही सिमट कर रह गई।

साल 2013 में ₹2.4 करोड़ से इसके विकास को लेकर प्रस्ताव आया था, लेकिन यह एक मेज से दूसरे मेज तक घूमता रहा। लालफीताशाही और इसको विकसित करने की इच्छा ना होने के चलते कभी भी महल का विकास संभव नहीं हो सका। हालाँकि, योगी सरकार ने इसका अधिकांश काम पूरा करा लिया है।

दशरथ महल में बनाए गए यात्री रात्रि निवास और श्रद्धालु सहायता केंद्र का काम पूरा हो चुका है। प्रवेश द्वार का काम भी लगभग पूरा है। अब सत्संग भाव को लेकर काम चल रहा है। सत्संग भवन को लेकर अब कई स्तर पर काम किया जा रहा है। सत्संग भवन में स्टेज को पहले ही बना लिया गया है।

यहाँ पर नए तरीके से टाइल, खिड़की और दरवाजों का काम चल रहा है। कहा जा रहा है कि इस सत्संग भवन में एक बार में 300 से 350 श्रद्धालु एक साथ बैठकर कीर्तन कर सकेंगे। सत्संग भवन को लेकर काम 1 दिसम्बर 2023 को चालू हुआ था, जिसे 22 जनवरी 2024 तक पूरा किया जाना है।

यहाँ नई तरीके की लाइटिंग का भी कम किया गया है। दीवालों पर नई पेंटिंग बनाई गई हैं। इन पेंटिंग में प्रभु राम के जीवन से जुड़ी हुई कथाएँ उकेरी गई हैं। प्रवेश द्वार को भी इसी हिसाब से बनाया गया है। अयोध्या आने वाले श्रद्धालु यहाँ आकर रात्रि में रुक सकेंगे और सहायता भी पा सकेंगे।

शिंदे की ही शिवसेना, स्पीकर के फैसले से उद्धव ठाकरे को झटका: महाराष्ट्र के CM बने रहेंगे एकनाथ

असली-नकली शिवसेना वाले विवाद पर महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर ने विधानसभा में 1200 पन्ने के फैसले के मुख्य बिंदु रखे। उन्होंने 34 याचिकाओं की सुनवाई के बाद फैसला सुनाया है। इस मामले में शिंदे गुट के 40 विधायकों और ठाकरे गुट के 14 विधायकों की सदस्यता पर फैसला लिया। मुख्य मामला शिंदे गुटे 16 विधायकों की सदस्यता का था, जिसके बाद अब पूरा फैसला आ चुका है। राहुल नार्वेकर ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट का जिक्र किया और चुनाव आयोग के फैसले को भी आधार बनाया। ऐसे में शिवसेवा के शिंदे गुट के सभी विधायकों की सदस्यता बच गई है। उन्होंने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना बताया। उन्होंने इस फैसले के लिए ‘असली शिवसेना’ की पहचान को भी अहम बताया था।

स्पीकर राहुल नार्वेकर ने 21 जून, 2022 के हिसाब से शिंदे गुट को असली शिवसेना माना है और उद्धव गुट की सभी दलीलों को खारिज कर दिया है। राहुल नार्वेकर ने कहा कि शिंदे गुट की तरफ से पार्टी व्हिप की नियुक्ति सही थी। इस फैसले के साथ ही एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों की कुर्सी तो बची ही है, शिंदे का मुख्यमंत्री पद भी बरकरार रहेगा।

शिवसेना पार्टी के संविधान को लेकर राहुल नार्वेकर ने फैसला देते समय सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के फैसले को सामने रखा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों ने पार्टी के अलग-अलग संविधान को रखा था। वहीं, चुनाव आयोग ने 2018 के संविधान को मानने से मना कर दिया था, इसी आधार पर राहुव नार्वेकर ने भी फैसला सुनाया। उन्होंने शिवसेना के 1999 के संविधान को ही आधार बनाकर फैसला दिया और शिंदे गुट को असली शिवसेना माना है। राहुल नार्वेकर ने कहा कि 21 जून, 2022 को ही पार्टी का विभाजन माना जा सकता है। राहुल नार्वेकर ने एकतरफा तरीके से एकनाथ शिंद को पार्टी से निकालने को भी गलत माना, जो कि उस समय के पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे की तरफ से किया गया था।

महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर को ये फैसला लेना था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को हर हाल में 31 दिसंबर, 2023 तक फैसला लेने के लिए कहा था, लेकिन 15 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 10 दिनों की आखिरी मोहलत दी थी। इसी के बाद 10 जनवरी को ये फैसला आया है। इस मामले में स्पीकर ने शिवसेना के दोनों गुटों के विधायकों की सुनवाई पूरी कर ली थी। उन्होंने पहले कहा था कि दोपहर में ही फैसला आ जाएगा। फिर ये समय शाम को 4 बजे का तय हुआ और आखिरकार देर शाम इस मुद्दे पर फैसला आया।

करीब 18 माह पहले एकनाथ शिंदे की अगुवाई में शिवसेना के विधायकों ने बगावत कर दी थी। शिंदे गुट के विधायकों ने बीजेपी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बना ली थी और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इस मामले में राहुल नार्वेकर के पास शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट के 16 विधायकों की सदस्यता पर फैसला सबसे पहले करना था। इस मामले में दोनों तरफ से 34 याचिकाएँ दायर की गई थी, जिन्हें 6 हिस्सों में बाँट दिया गया था। इसमें से 4 हिस्से शिवसेना के उद्धव ठाकरे के ग्रुप की तरफ से दाखिल गए हैं, तो 2 हिस्से शिंदे गुटे की तरफ से थे।

बता दें कि चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और सिंबल शिंदे गुट को दे दिया था। चुनाव आयोग ने शिवसेवा ने साल 1999 के संविधान को ध्यान में रखते हुए फैसला किया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अब भी कई याचिकाएँ चल रही हैं।

शिवसेना का एकनाथ शिंदे गुट: एकनाथ शिंदे, संजय शिरसत, अब्दुल सत्तार, लता सोनावाने, भरत गोगावले, संदीपन भुमरे, तानाजी सावंत, यामिनी जाधव, प्रकाश सूर्वे, अनिल बाबर, बालाजी किन्नीकर, संजय रायमुल्कर, बालाजी कल्याणकर और महेश शिंदे, चिमनराव पाटिल, रमेश बोरनारे। इनके अलावा भी कई विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटकी थी।

शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुटः सुनील प्रभु, रविंद्र वाईकर, सुनील राउत, वैभव नाइक, अजय चौधरी, संजय पटनीस, प्रकाश फाटेरपेकर, रमेश कोरगांवकर, राजन विचारे, नितिन देशमुख, कैलाश पाटिल और राहुल पाटिल। इस गुट के दो विधायकों- आदित्य ठाकरे और रुतुजा लाटके के खिलाफ अयोग्यता का प्रस्ताव नहीं रखा गया था।

‘अम्मी नाबालिग बच्चों की अभिभावक नहीं, बेवा को संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं’: शरिया के आगे गोदरेज समूह बेबस, ₹227 करोड़ की लैंड डील फँसी

नागपुर में ₹227 करोड़ की एक जमीन को लेकर गोदरेज प्रॉपर्टीज और अग्रवाल परिवार के बीच चल रहे विवाद के बीच मुस्लिम पर्सनल लॉ फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में सामने आया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक विधवा को जमीन बेचने या उसे ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं देता है। अब इस इस्लामी कानून का सहारा लेकर विधवा के वारिस करोड़ों रुपए बनाने का जुगाड़ लगा रहे हैं।

क्या है गोदरेज से जुड़ा जमीन विवाद और मुस्लिम पर्सनल लॉ का रोल

यह पूरा मामला 1988 का है। महाराष्ट्र के नागपुर के बेसा इलाके के घोगली गाँव में अब्दुल वहाब नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति के पास 58 एकड़ भूमि थी। अब्दुल वहाब की मौत के बाद यह भूमि उसकी विधवा खैरुन्निसा ने अग्रवाल परिवार को बेच दिया। इस जमीन को कितने में बेचा गया, इसकी जानकारी नहीं आई है। बेची गई इस जमीन में खैरुन्निसा के 8 बच्चों का हिस्सा भी शामिल था।

जमीन की बिक्री के समय मधुकर पुरोहित नाम के एक आदमी को अब्दुल वहाब के बच्चों का देखरेख करने वाला नियुक्त किया गया था। पुरोहित ने ही बच्चों की तरफ से जमीन की बिक्री के कागजों पर हस्ताक्षर किया था। आगे चलकर वर्ष 2022 में इसी जमीन को अग्रवाल परिवार ने गोदरेज प्रॉपर्टीज को ₹227 करोड़ में बेच दी।

हालाँकि, इस जमीन के सौदे पर अब्दुल वहाब के एक बेटे अब्दुल बशीर ने प्रश्न खड़े करते हुए मुकदमा दायर कर दिया। अब्दुल बशीर ने दावा किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कहता है कि शौहर की मौत के बाद उसकी विधवा उसके बच्चों की देखरेख के लिए वैध अभिभावक नहीं हो सकती। इसीलिए वह बच्चों का हिस्सा नहीं बेच सकती। ऐसे में जमीन की बिक्री अवैध है।

इस मामले में नागपुर के एक सिविल जज ने निर्णय दिया कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत उठाए गए इस प्रश्न को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत पिता की मौत के बाद उसके बच्चों का सम्पत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार तुरंत बन जाता है। इस जमीन को तभी बाँटा जा सकता है, जब कोई वारिस यह चाहे। इसके लिए कोर्ट में अर्जी दाखिल की जा सकती है।

इस मामले में कोर्ट ने कहा कि यह मुकदमा इसलिए भी जायज है, क्योंकि इस पर अधिकार रखने वाले लोग कभी इससे बाहर हुए ही नहीं। ऐसे में 34 वर्षों के बाद दायर किया गया मामला कोर्ट के अंदर सुना जा सकता है। अब ऐसे में आगे और मामलों की सुनवाई की जा सकेगी।

गोदरेज को जमीन मिलने में एक और रोड़ा

इस मामले में अक्टूबर 2022 में एक और मुकदमा किया गया। यह मुकदमा अब्दुल वहाब के बेटे अब्दुल जब्बार की तरफ से मुनव्वरा बेगम ने दायर किया। अब्दुल जब्बार मानसिक रूप से स्थिर नहीं है। इस मामले में कहा गया कि जब्बार की अम्मी ने बिना कोई वैध अभिभावक नियुक्त किए उसका हिस्सा बेच दिया। ऐसे में उनके मानसिक स्वास्थ्य कानून का भी उल्लंघन किया है।

मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि अब्दुल वहाब की विधवा से जमीन खरीदने वाले अग्रवाल परिवार को इस जमीन से मोटा मुनाफा हुआ है। उन्होंने यह जमीन गोदरेज को ₹227 करोड़ में बेची है, जो कि उन्होंने 1988 में काफी कम दामों में खरीदी होगी। वहीं, साल 1988 में अब्दुल वहाब के वारिसों को छोटी-मोटी रकम मिली होगी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में कमियाँ और इसका दुरूपयोग

जहाँ एक ओर कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर मामले का निपटारा कर रहा है, वहीं इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ की कमियाँ भी जाहिर हो रही हैं। यह मामला दिखाता कि धार्मिक कानून के जरिए कैसे एक विधवा महिला के अधिकारों को छीना जा रहा है। मुस्लिम महिला को उसके अधिकारों वंचित करने वाले ऐसे कई मामले सामने आ सकते हैं।

अब्दुल वहाब के वारिसों ने इस मामले में जहाँ दशकों तक कुछ नहीं किया, वहीं अब वह इस बड़ी डील को देखकर सक्रिय हो गए हैं। वे इस बड़ी बिजनेस डील को लटकाकर मोटा पैसा बनाना चाह रहे हैं। इस मामले से यह समस्या भी सामने आई है कि जो बड़े कॉर्पोरेट विकास के लिए जमीनें खरीदते हैं, वे बाद में जाकर कानूनी पचड़ों में फँस जाते हैं।

समस्या यह है कि भारत में अभी भी यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं है जो विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में समान रूप से प्रभावी हों। ऐसे में मजहबी कानूनों को अपनी मनमर्जी से उपयोग करने की खुली छूट कई समस्याएँ पैदा करती हैं, जैसा कि इस मामले में देखा जा रहा है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता

यदि देश में सभी लोगों पर एक समान यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होता तो ऐसे मामले में कानूनी पचड़ा नहीं फँसेगा। इस मामले में विधवा के अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे। भारत को ऐसे मामले में कानून बनाने की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत है, जहाँ बिजनेस डील एवं सम्पत्ति से जुड़े मामले और विधवाओं के अधिकार सुरक्षित किए जा सकें।

कानूनी पचड़े में फँसी ₹227 करोड़ की यह गोदरेज की डील दिखाती है कि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता क्यों है। तथ्य ये है कि 2022 में एक 34 वर्ष पुरानी जमीन की बिक्री को चुनौती दी गई है, वह भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत।

रामानंदी पद्धति से होगी रामलला की पूजा-अर्चना, माँ सीता ने हनुमान को दी थी इसकी दीक्षा: इसके माहात्म्य के बारे में जानिए सब कुछ

अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है। 22 जनवरी, 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम है। रामलला को नए गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा। भगवान राम इस मंदिर में बाल अवस्था में होंगे। ऐसे में पूजा-पाठ के दौरान भी इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा और उनका वैसे ही ध्यान रखा जाएगा जैसे एक बालक का रखा जाता है। ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि मंदिर में रामानंदी संप्रदाय की पद्धतियों से पूजा-पाठ होगा। ऐसे में आपके मन में भी ये सवाल उठ रहा होगा कि ये ‘रामानंदी’ संप्रदाय क्या है?

ये हिन्दुओं के सबसे बड़े संप्रदायों में से एक है, जो समानतावादी विचारधारा पर चलता है। इस पंथ की शुरुआत स्वयं भगवान श्रीराम से मानी जाती है। एक एक वैष्णव संप्रदाय है, अतः श्रीहरि के अन्य अवतारों की पूजा पर भी जोर देता है। रामानंदी संप्रदाय के लोग शाकाहार का पालन करते हैं। साथ ही वो रामानंद के विशिष्टाद्वैत सिद्धांत पर चलते हैं। इनमें भी ‘त्यागी’ और ‘नागा’ नाम के 2 समूह हैं। जहाँ ‘त्यागी’ वो हैं दीक्षा के लिए राख का इस्तेमाल करते हैं, जबकि ‘नागा’ साधु सामान्यतः दुनिया से विरक्त रहते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि नागा साधु इसमें कहाँ से आ गए। असल में कुछ साधुओं को व्यापारियों और अन्य साधु-संतों की रक्षा के लिए हथियार धारण करना पड़ा, उन्हें उनके मार्गों पर पहरा देना पड़ा। इसके लिए उन्हें मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक से लोहा लिया। यही निडर और लड़ाकू समूह ‘नागा’ के रूप में जाने गए। अंग्रेजों ने इन्हें शस्त्रविहीन करने के लिए बड़ा अभियान चलाया। वैष्णव समाज सामान्यतः अहिंसा को मानता है। यही कारण है जो वो शाकाहार का पालन करते हैं।

मान्यता है कि रामानंदी संप्रदाय की दीक्षा सबसे पहले माँ सीता ने हनुमान को दी थी, फिर हनुमान से ये क्रमशः ब्रह्मा, वशिष्ठ, पराशर, वेद-व्यास, शुकदेव, बोधायन, गंगाधराचार्य, सदानंदाचार्य, रमेश्वरनन्दाचार्य, द्वारानंदाचार्य, देवानंदाचार्य, श्यामानन्दाचार्य, श्रुतानंदाचार्य, चिदानंदाचार्य, पुरानंदाचार्य, श्रीयानंदाचार्य, हर्यानंदाचार्य, राघवनंदाचार्य और फिर रामानंदाचार्य तक पहुँची। हमें रामानंदी संप्रदाय के बारे में जानने से पहले रामानंद और विशिष्टाद्वैत के बारे में जानना पड़ेगा

मध्यकाल में रामभक्ति का बिगुल बजाने वाले रामानंद

रामानंद भारतीय इतिहास के मध्यकाल में एक महान संत हुए हैं। उत्तर भारत की गंगा घाटी में भ्रमण करने वाले रामानंद को एक कवि के रूप में भी जाना गया, भक्त-कवि। आधुनिक काल में रामानंदी संप्रदाय के संस्थापक के रूप में उन्हें ही जाना जाता है। 14वीं-15वीं शताब्दी में भारत में जब भक्तिकाल में कई संतों का उद्भव हो रहा था, रामानंद उसी के शुरुआती दौर में सक्रिय रहे। वो एक महान समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने जाति या लिंग भेद को धता बताते हुए अपने शिष्यों के रूप में हर वर्ग को स्वीकार किया।

सिखों की सबसे पवित्र पुस्तक ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ में भी रामानंद की ‘बाणी’ को जगह दी गई है। ब्राह्मण परिवार में जन्मे रामानंद के संप्रदाय को ‘बैरागी’ संप्रदाय के रूप में भी जाना गया। उनके जीवनकाल के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, लेकिन उल्लेख है कि उनका जन्म प्रयागराज में हुआ था। रामानंद की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा राघवानंद के अंतर्गत हुई थी, जो उस समय विशिष्टाद्वैत के बड़े विद्वान हुआ करते थे। उन्हें नाथ संप्रदाय से भी प्रभावित बताया जाता है।

रामानंद तत्ववाद की जगह भक्ति पर जोर देते थे। भगवान की शरण में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और जीव्-ईश्वर के बीच कोई भेद नहीं है – ये उनका मत था। आदिग्रन्थ में रामानंद के एक पद को देखिए – ‘कत जाईऐ रे घर लागो रंगु’, जिसका अर्थ है – कहाँ भटकूँगा, मुझे अपने हृदय में ही आनंद मिल रहा है। ‘तथ्यै नि कुछू संसार, हमारे राम को नाम आधार’ में राम नाम की महिमा बताई है। रामानंद पर भक्तिकाल के एक और महान कवि रामानुज का प्रभाव था, उनके ही शिष्यों में कुछ पीढ़ी बाद वो हुए थे।

रामानंद सगुन उपासना और राम भक्ति के प्रवर्तकों में से थे। रामानंद सामान्यतः लोकभाषा में लिखते थे, लेकिन उनके लिखे अधिकतर ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं हैं या उनमें काफी मिश्रण है। उन्होंने रामावतार का प्रचार-प्रसार किया। ऐसा नहीं है कि वो वर्णाश्रम के विरोधी थी, कर्मशास्त्र में वो ग्रंथों के हिसाब से मत रखते थे लेकिन भगवद्भक्ति में उन्हें किसी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं था। ‘हरि को भजे सो हरि को होई’ वाला भावना के तहत वो चलते थे।

कई जगह कबीर के गुरु के रूप में भी रामानंद को चित्रित किया है, लेकिन इसके समर्थन में कोई पुष्ट मत नहीं है। ‘श्री रामार्चन पद्धति’ उनके द्वारा लिखित है, जिसमें उन्होंने स्वयं को रामानुज की परंपरा का बताया है। स्वामी रामानंद ने वैकुंठलोकवासी विष्णु की जगह उनके लौकिक अवतार राम को प्राथमिकता दी, सबके लिए रामभक्ति का द्वार खोला। ‘वैष्णवमताब्जभास्कर’ भी उनके द्वारा रचित ग्रन्थ है। रामानंद के शिष्य अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी ने जयपुर से 10 किलोमीटर दूर गलता में संप्रदाय की गद्दी स्थापित की थी।

क्या है विशिष्टाद्वैत दर्शन? हिन्दू धर्म की शाखाओं में से एक

ये आचार्य रामानुज ने मुख्य तौर पर प्रतिपादित किया गया सिद्धांत है। इसके तहत माना गया है कि ये संसार और जीवात्मा, दोनों ही ब्राह्मण से भिन्न हैं लेकिन वे ब्रह्म से ही उद्भूत हुए हैं। इसमें समझाया गया है कि ब्रह्म से संसार का वही संबंध है जो सूर्य का उनकी किरणों से है। इस तरह ब्रह्म एक होकर भी अनेक है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने जगत को माया बता कर मिथ्या करार दिया था, लेकिन रामानुज का कहना था कि ये जगत ब्रह्म की ही सृष्टि है इसीलिए ये माया नहीं हो सकता।

एक तरह से देखें तो रामानुजाचार्य ने निर्गुण ब्रह्मवाद और सगुण ईश्वरवाद के बीस सामंजस्य बिठाने का प्रयास किया। अब इस परंपरा में इष्टदेव का भेद हुआ तो शाक्त, शैव और वैष्णव संप्रदाय बने। वैष्णवों में 4 संप्रदाय मुख्य हैं – रामानुजाचार्य का श्रीसंप्रदाय (विशिष्टाद्वैत), मध्वाचार्य/आनंदतीर्थ का ब्रह्मसंप्रदाय (द्वैत), विष्णुस्वामी और वल्लभाचार्य का रूद्रसंप्रदाय (शुद्धाद्वैत) और निम्बकाचार्य का सनकसंप्रदाय (द्वैताद्वैत)। इसी तरह आगे चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय को ‘मध्वगौड़ीय’ या अचिन्त्यभेदाभेद कहा गया।

विशिष्टाद्वैत के तहत रामानुज चित्त (चेतन भोक्ता जीव), अचित्त (जड़ भोग्य जगत) और ईश्वर (दोनों का अंतर्यामी) – इन 3 तत्वों में विश्वास रखते हैं। उन्होंने चित्त व अचित्य को न सिर्फ नित्य माना है, बल्कि दोनों को परस्पर स्वतंत्र भी तय है। हालाँकि, उनके हिसाब से ये दोनों ईश्वर पर आश्रित हैं। यानी, ये दोनों शरीर की तरह हैं और उनकी आत्मा है ईश्वर। रामानुज के हिसाब से आत्मा द्वारा धारण किया जाए और अर्थसिद्धि के लिए उपयोग में लाया जाए, जबकि आत्मा वो है शरीर को धारण करे और शरीर का साध्य हो।

क्या है रामानंदी पद्धति, जिससे राम मंदिर में होगी पूजा

विशिष्टाद्वैत को अगर हम साधारण शब्दों में समझें तो इसका सीधा मतलब है कि हम ईश्वर का ही हिस्सा हैं, जीव ईश्वर से अलग तो है लेकिन उसका ही एक भाग है। जीव को जगदीश्वर को पाना है। इसके लिए 2 चीजें प्रमुख हैं – अहं का त्याग और समर्पण। वैष्णव संप्रदाय के मूल में यही है – अपने अहंकार का त्याग कर के भक्ति कीजिए, भजन कीजिए, स्वयं को ईश्वर के समक्ष समर्पित कीजिए। समर्पण का भाव रामानंदी संप्रदाय की पूजा पद्धति में भी प्राथमिक है।

‘ओम रामाय नमः’ – इस मन्त्र के जरिए भगवान श्रीराम की पूजा की जाती है। अयोध्या श्रीराम की जन्मस्थली है, इसीलिए वहाँ के अधिकतर मंदिर रामानंदी संप्रदाय की पूजा-पद्धति को अपनाते हैं। बिना जाति-पाति के भेद के हर कोई ईश्वर की भक्ति में लीन रहे, ये इसका उद्देश्य है। वैष्णव संप्रदाय के प्राचीन मंदिरों में पूजा-अर्चना बैरागी भक्तों द्वारा ही की जाती है। अयोध्या में भी रामानंदी संप्रदाय के साधु-संतों को लाया जाएगा। 13 अखाड़ों में ‘दिगंबर’ और ‘निर्वाणी’ अखाड़ा वैष्णवों के हैं।

इस परंपरा के तहत गुरु अपने शिष्य को कान में दीक्षा देते हैं। साथ ही ‘उर्ध्व पुण्ड्र’ वाला तिलक लगाते हैं। काशी स्थित पंचगंगा मठ भी रामानंदी संप्रदाय के प्राचीन मठों में से है। भक्त पीपा को भी रामानंद का ही शिष्य माना गया। रामचरितमानस की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास भी इसी परंपरा में हुए हैं। राम मंदिर में भी भक्तों द्वारा प्रसाद चढ़ाने की कोई प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि वो ‘भाव’ लेकर रामलला का दर्शन करेंगे, ट्रस्ट द्वारा ही उन्हें प्रसाद दिया जाएगा।

रामलला की 32 वर्षों से पूजा कर रहे महंत सत्येंद्र दास बताते हैं कि बाल स्वरूप में रामलला के पालन-पोषण, खानपान और पसंद-नापसंद का भी ध्यान रखा जाता है। शयन से उन्हें उठाया जाता है, चंदन-शहद से स्नान कराया जाता है, दोपहर को विश्राम कराया जाता है, सायं को भोग लगा कर आरती की जाती है। चूँकि भगवान बालरूप में हैं, उनका संरक्षक बन कर ये सब पूरा किया जाता है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद भी पूजन विधि यही रहेगी, लेकिन इसका स्वरूप भव्य हो जाएगा।

सोनिया-खड़गे कोई नहीं जा रहे अयोध्या… क्योंकि कॉन्ग्रेस के लिए राम मंदिर हिंदुओं का नहीं, RSS/BJP का इवेंट, उनका राजनीतिक प्रोजेक्ट

इस समय पूरी दुनिया अयोध्या की तरफ देख रही है, जहाँ 22 जनवरी 2024 को रामलला के मंदिर में भव्य प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का आयोजन होना है। इस कार्यक्रम में हजारों गणमान्य लोगों को बुलाया जा रहा है, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी ने अब इस कार्यक्रम में शामिल होने से ही मना कर दिया है। कॉन्ग्रेस ने एक पत्र जारी कर इस आयोजन को राजनीतिक करार दिया है और कहा कि वो अधूरे मंदिर में होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से दूर रहेगी। पार्टी ने साफ कर दिया है कि सोनिया गाँधी, कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे।

हम निमंत्रण को करते हैं अस्वीकार: कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के महासचिव जयराम रमेश द्वारा पत्र जारी कर पार्टी के फैसले की जानकारी दी गई है। पत्र में लिखा गया है, “पिछले महीने, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी एवं लोकसभा में कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी को अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन का निमंत्रण लिया।”

पत्र में आगे लिखा गया है, “भगवान राम की पूरा-अर्चना करोड़ों भारतीय करते हैं। धर्म मनुष्य का व्यक्तिगत विषय होता आया है, लेकिन बीजेपी और आरएसएस ने वर्षों से अयोध्या में राम मंदिर को एक राजनीतिक परियोजना बना दिया है। स्पष्ट है कि एक अर्धनिर्मित मंदिर का उद्घाटन केवल चुनावी लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है। 2019 के माननीय सर्वोच्च न्यायायल के निर्णय को स्वीकार करते हुए एवं लोगों की आस्था के सम्मान में मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गाँधी एवं अधीर रंजन चौधरी बीजेपी और आरएसएस के इस आयोजन के निमंत्रण को ससम्मान अस्वीकार करते हैं।”

कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा जारी किया गया पत्र (फोटो साभार : X_INCIndia)

कॉन्ग्रेस पार्टी ने साफ तौर पर भगवान राम के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को राजनीतिक कदम करार दे दिया है। खास बात ये है कि इसी कॉन्ग्रेस पार्टी की जब केंद्र में सरकार थी, तब सुप्रीम कोर्ट में शपथ लेकर सरकार ने भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, दुनिया भर के हिंदुओं की इच्छा पूरी हुई, तो एक बार फिर से कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने कदम से साबित कर दिया है कि वो सनातन परंपरा और हिंदुओं से कितनी नफरत करती है।

अखिलेश यादव ने भी किया इनकार

बता दें कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी राम लला के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। लाइव हिंदुस्तान के मुताबिक, अखिलेश यादव को विहिप के नेता आलोक कुमार निमंत्रण देने गए थे, लेकिन अखिलेश यादव ने ये कहते हुए आमंत्रण पत्र को लेने से मना कर दिया कि वो आलोक कुमार को नहीं जानते। वो किसी ‘ऐरे-गैरे से निमंत्रण नहीं’ लेंगे। उन्होंने कहा कि जब भगवान राम बुलाएँगे, तो वो खुद जाएँगे। इससे पहले अखिलेश ने कहा था कि वो कार्यक्रम में शामिल होने का बुलावा मिलने पर जाएँगे, हालाँकि अब उन्होंने मना कर दिया है।

22 जनवरी को होगी प्राण प्रतिष्ठा

गौरतलब है कि आगामी 22 जनवरी को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए तैयारियाँ जोरों-शोरों से हो रही हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित रहेंगे। इनके अतिरिक्त 3000 वीआईपी समेत 7000 लोगों को निमंत्रण भेजे गए हैं। ट्रस्ट का कहना है कि लगभग 15000 लोगों के आने का इंतजाम होगा।