Monday, July 15, 2024
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रामानंदी पद्धति से होगी रामलला की पूजा-अर्चना, माँ सीता ने हनुमान को दी थी इसकी दीक्षा: इसके माहात्म्य के बारे में जानिए सब कुछ

रामानंद तत्ववाद की जगह भक्ति पर जोर देते थे। भगवान की शरण में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और जीव्-ईश्वर के बीच कोई भेद नहीं है - ये उनका मत था। आदिग्रन्थ में रामानंद के एक पद को देखिए - 'कत जाईऐ रे घर लागो रंगु', जिसका अर्थ है - कहाँ भटकूँगा, मुझे अपने हृदय में ही आनंद मिल रहा है।

अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है। 22 जनवरी, 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम है। रामलला को नए गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा। भगवान राम इस मंदिर में बाल अवस्था में होंगे। ऐसे में पूजा-पाठ के दौरान भी इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा और उनका वैसे ही ध्यान रखा जाएगा जैसे एक बालक का रखा जाता है। ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि मंदिर में रामानंदी संप्रदाय की पद्धतियों से पूजा-पाठ होगा। ऐसे में आपके मन में भी ये सवाल उठ रहा होगा कि ये ‘रामानंदी’ संप्रदाय क्या है?

ये हिन्दुओं के सबसे बड़े संप्रदायों में से एक है, जो समानतावादी विचारधारा पर चलता है। इस पंथ की शुरुआत स्वयं भगवान श्रीराम से मानी जाती है। एक एक वैष्णव संप्रदाय है, अतः श्रीहरि के अन्य अवतारों की पूजा पर भी जोर देता है। रामानंदी संप्रदाय के लोग शाकाहार का पालन करते हैं। साथ ही वो रामानंद के विशिष्टाद्वैत सिद्धांत पर चलते हैं। इनमें भी ‘त्यागी’ और ‘नागा’ नाम के 2 समूह हैं। जहाँ ‘त्यागी’ वो हैं दीक्षा के लिए राख का इस्तेमाल करते हैं, जबकि ‘नागा’ साधु सामान्यतः दुनिया से विरक्त रहते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि नागा साधु इसमें कहाँ से आ गए। असल में कुछ साधुओं को व्यापारियों और अन्य साधु-संतों की रक्षा के लिए हथियार धारण करना पड़ा, उन्हें उनके मार्गों पर पहरा देना पड़ा। इसके लिए उन्हें मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक से लोहा लिया। यही निडर और लड़ाकू समूह ‘नागा’ के रूप में जाने गए। अंग्रेजों ने इन्हें शस्त्रविहीन करने के लिए बड़ा अभियान चलाया। वैष्णव समाज सामान्यतः अहिंसा को मानता है। यही कारण है जो वो शाकाहार का पालन करते हैं।

मान्यता है कि रामानंदी संप्रदाय की दीक्षा सबसे पहले माँ सीता ने हनुमान को दी थी, फिर हनुमान से ये क्रमशः ब्रह्मा, वशिष्ठ, पराशर, वेद-व्यास, शुकदेव, बोधायन, गंगाधराचार्य, सदानंदाचार्य, रमेश्वरनन्दाचार्य, द्वारानंदाचार्य, देवानंदाचार्य, श्यामानन्दाचार्य, श्रुतानंदाचार्य, चिदानंदाचार्य, पुरानंदाचार्य, श्रीयानंदाचार्य, हर्यानंदाचार्य, राघवनंदाचार्य और फिर रामानंदाचार्य तक पहुँची। हमें रामानंदी संप्रदाय के बारे में जानने से पहले रामानंद और विशिष्टाद्वैत के बारे में जानना पड़ेगा

मध्यकाल में रामभक्ति का बिगुल बजाने वाले रामानंद

रामानंद भारतीय इतिहास के मध्यकाल में एक महान संत हुए हैं। उत्तर भारत की गंगा घाटी में भ्रमण करने वाले रामानंद को एक कवि के रूप में भी जाना गया, भक्त-कवि। आधुनिक काल में रामानंदी संप्रदाय के संस्थापक के रूप में उन्हें ही जाना जाता है। 14वीं-15वीं शताब्दी में भारत में जब भक्तिकाल में कई संतों का उद्भव हो रहा था, रामानंद उसी के शुरुआती दौर में सक्रिय रहे। वो एक महान समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने जाति या लिंग भेद को धता बताते हुए अपने शिष्यों के रूप में हर वर्ग को स्वीकार किया।

सिखों की सबसे पवित्र पुस्तक ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ में भी रामानंद की ‘बाणी’ को जगह दी गई है। ब्राह्मण परिवार में जन्मे रामानंद के संप्रदाय को ‘बैरागी’ संप्रदाय के रूप में भी जाना गया। उनके जीवनकाल के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, लेकिन उल्लेख है कि उनका जन्म प्रयागराज में हुआ था। रामानंद की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा राघवानंद के अंतर्गत हुई थी, जो उस समय विशिष्टाद्वैत के बड़े विद्वान हुआ करते थे। उन्हें नाथ संप्रदाय से भी प्रभावित बताया जाता है।

रामानंद तत्ववाद की जगह भक्ति पर जोर देते थे। भगवान की शरण में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और जीव्-ईश्वर के बीच कोई भेद नहीं है – ये उनका मत था। आदिग्रन्थ में रामानंद के एक पद को देखिए – ‘कत जाईऐ रे घर लागो रंगु’, जिसका अर्थ है – कहाँ भटकूँगा, मुझे अपने हृदय में ही आनंद मिल रहा है। ‘तथ्यै नि कुछू संसार, हमारे राम को नाम आधार’ में राम नाम की महिमा बताई है। रामानंद पर भक्तिकाल के एक और महान कवि रामानुज का प्रभाव था, उनके ही शिष्यों में कुछ पीढ़ी बाद वो हुए थे।

रामानंद सगुन उपासना और राम भक्ति के प्रवर्तकों में से थे। रामानंद सामान्यतः लोकभाषा में लिखते थे, लेकिन उनके लिखे अधिकतर ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं हैं या उनमें काफी मिश्रण है। उन्होंने रामावतार का प्रचार-प्रसार किया। ऐसा नहीं है कि वो वर्णाश्रम के विरोधी थी, कर्मशास्त्र में वो ग्रंथों के हिसाब से मत रखते थे लेकिन भगवद्भक्ति में उन्हें किसी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं था। ‘हरि को भजे सो हरि को होई’ वाला भावना के तहत वो चलते थे।

कई जगह कबीर के गुरु के रूप में भी रामानंद को चित्रित किया है, लेकिन इसके समर्थन में कोई पुष्ट मत नहीं है। ‘श्री रामार्चन पद्धति’ उनके द्वारा लिखित है, जिसमें उन्होंने स्वयं को रामानुज की परंपरा का बताया है। स्वामी रामानंद ने वैकुंठलोकवासी विष्णु की जगह उनके लौकिक अवतार राम को प्राथमिकता दी, सबके लिए रामभक्ति का द्वार खोला। ‘वैष्णवमताब्जभास्कर’ भी उनके द्वारा रचित ग्रन्थ है। रामानंद के शिष्य अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी ने जयपुर से 10 किलोमीटर दूर गलता में संप्रदाय की गद्दी स्थापित की थी।

क्या है विशिष्टाद्वैत दर्शन? हिन्दू धर्म की शाखाओं में से एक

ये आचार्य रामानुज ने मुख्य तौर पर प्रतिपादित किया गया सिद्धांत है। इसके तहत माना गया है कि ये संसार और जीवात्मा, दोनों ही ब्राह्मण से भिन्न हैं लेकिन वे ब्रह्म से ही उद्भूत हुए हैं। इसमें समझाया गया है कि ब्रह्म से संसार का वही संबंध है जो सूर्य का उनकी किरणों से है। इस तरह ब्रह्म एक होकर भी अनेक है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने जगत को माया बता कर मिथ्या करार दिया था, लेकिन रामानुज का कहना था कि ये जगत ब्रह्म की ही सृष्टि है इसीलिए ये माया नहीं हो सकता।

एक तरह से देखें तो रामानुजाचार्य ने निर्गुण ब्रह्मवाद और सगुण ईश्वरवाद के बीस सामंजस्य बिठाने का प्रयास किया। अब इस परंपरा में इष्टदेव का भेद हुआ तो शाक्त, शैव और वैष्णव संप्रदाय बने। वैष्णवों में 4 संप्रदाय मुख्य हैं – रामानुजाचार्य का श्रीसंप्रदाय (विशिष्टाद्वैत), मध्वाचार्य/आनंदतीर्थ का ब्रह्मसंप्रदाय (द्वैत), विष्णुस्वामी और वल्लभाचार्य का रूद्रसंप्रदाय (शुद्धाद्वैत) और निम्बकाचार्य का सनकसंप्रदाय (द्वैताद्वैत)। इसी तरह आगे चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय को ‘मध्वगौड़ीय’ या अचिन्त्यभेदाभेद कहा गया।

विशिष्टाद्वैत के तहत रामानुज चित्त (चेतन भोक्ता जीव), अचित्त (जड़ भोग्य जगत) और ईश्वर (दोनों का अंतर्यामी) – इन 3 तत्वों में विश्वास रखते हैं। उन्होंने चित्त व अचित्य को न सिर्फ नित्य माना है, बल्कि दोनों को परस्पर स्वतंत्र भी तय है। हालाँकि, उनके हिसाब से ये दोनों ईश्वर पर आश्रित हैं। यानी, ये दोनों शरीर की तरह हैं और उनकी आत्मा है ईश्वर। रामानुज के हिसाब से आत्मा द्वारा धारण किया जाए और अर्थसिद्धि के लिए उपयोग में लाया जाए, जबकि आत्मा वो है शरीर को धारण करे और शरीर का साध्य हो।

क्या है रामानंदी पद्धति, जिससे राम मंदिर में होगी पूजा

विशिष्टाद्वैत को अगर हम साधारण शब्दों में समझें तो इसका सीधा मतलब है कि हम ईश्वर का ही हिस्सा हैं, जीव ईश्वर से अलग तो है लेकिन उसका ही एक भाग है। जीव को जगदीश्वर को पाना है। इसके लिए 2 चीजें प्रमुख हैं – अहं का त्याग और समर्पण। वैष्णव संप्रदाय के मूल में यही है – अपने अहंकार का त्याग कर के भक्ति कीजिए, भजन कीजिए, स्वयं को ईश्वर के समक्ष समर्पित कीजिए। समर्पण का भाव रामानंदी संप्रदाय की पूजा पद्धति में भी प्राथमिक है।

‘ओम रामाय नमः’ – इस मन्त्र के जरिए भगवान श्रीराम की पूजा की जाती है। अयोध्या श्रीराम की जन्मस्थली है, इसीलिए वहाँ के अधिकतर मंदिर रामानंदी संप्रदाय की पूजा-पद्धति को अपनाते हैं। बिना जाति-पाति के भेद के हर कोई ईश्वर की भक्ति में लीन रहे, ये इसका उद्देश्य है। वैष्णव संप्रदाय के प्राचीन मंदिरों में पूजा-अर्चना बैरागी भक्तों द्वारा ही की जाती है। अयोध्या में भी रामानंदी संप्रदाय के साधु-संतों को लाया जाएगा। 13 अखाड़ों में ‘दिगंबर’ और ‘निर्वाणी’ अखाड़ा वैष्णवों के हैं।

इस परंपरा के तहत गुरु अपने शिष्य को कान में दीक्षा देते हैं। साथ ही ‘उर्ध्व पुण्ड्र’ वाला तिलक लगाते हैं। काशी स्थित पंचगंगा मठ भी रामानंदी संप्रदाय के प्राचीन मठों में से है। भक्त पीपा को भी रामानंद का ही शिष्य माना गया। रामचरितमानस की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास भी इसी परंपरा में हुए हैं। राम मंदिर में भी भक्तों द्वारा प्रसाद चढ़ाने की कोई प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि वो ‘भाव’ लेकर रामलला का दर्शन करेंगे, ट्रस्ट द्वारा ही उन्हें प्रसाद दिया जाएगा।

रामलला की 32 वर्षों से पूजा कर रहे महंत सत्येंद्र दास बताते हैं कि बाल स्वरूप में रामलला के पालन-पोषण, खानपान और पसंद-नापसंद का भी ध्यान रखा जाता है। शयन से उन्हें उठाया जाता है, चंदन-शहद से स्नान कराया जाता है, दोपहर को विश्राम कराया जाता है, सायं को भोग लगा कर आरती की जाती है। चूँकि भगवान बालरूप में हैं, उनका संरक्षक बन कर ये सब पूरा किया जाता है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद भी पूजन विधि यही रहेगी, लेकिन इसका स्वरूप भव्य हो जाएगा।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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