असली-नकली शिवसेना वाले विवाद पर महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर ने विधानसभा में 1200 पन्ने के फैसले के मुख्य बिंदु रखे। उन्होंने 34 याचिकाओं की सुनवाई के बाद फैसला सुनाया है। इस मामले में शिंदे गुट के 40 विधायकों और ठाकरे गुट के 14 विधायकों की सदस्यता पर फैसला लिया। मुख्य मामला शिंदे गुटे 16 विधायकों की सदस्यता का था, जिसके बाद अब पूरा फैसला आ चुका है। राहुल नार्वेकर ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट का जिक्र किया और चुनाव आयोग के फैसले को भी आधार बनाया। ऐसे में शिवसेवा के शिंदे गुट के सभी विधायकों की सदस्यता बच गई है। उन्होंने शिंदे गुट को ही असली शिवसेना बताया। उन्होंने इस फैसले के लिए ‘असली शिवसेना’ की पहचान को भी अहम बताया था।
स्पीकर राहुल नार्वेकर ने 21 जून, 2022 के हिसाब से शिंदे गुट को असली शिवसेना माना है और उद्धव गुट की सभी दलीलों को खारिज कर दिया है। राहुल नार्वेकर ने कहा कि शिंदे गुट की तरफ से पार्टी व्हिप की नियुक्ति सही थी। इस फैसले के साथ ही एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों की कुर्सी तो बची ही है, शिंदे का मुख्यमंत्री पद भी बरकरार रहेगा।
शिवसेना पार्टी के संविधान को लेकर राहुल नार्वेकर ने फैसला देते समय सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के फैसले को सामने रखा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों ने पार्टी के अलग-अलग संविधान को रखा था। वहीं, चुनाव आयोग ने 2018 के संविधान को मानने से मना कर दिया था, इसी आधार पर राहुव नार्वेकर ने भी फैसला सुनाया। उन्होंने शिवसेना के 1999 के संविधान को ही आधार बनाकर फैसला दिया और शिंदे गुट को असली शिवसेना माना है। राहुल नार्वेकर ने कहा कि 21 जून, 2022 को ही पार्टी का विभाजन माना जा सकता है। राहुल नार्वेकर ने एकतरफा तरीके से एकनाथ शिंद को पार्टी से निकालने को भी गलत माना, जो कि उस समय के पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे की तरफ से किया गया था।
Shiv Sena MLAs' disqualification case | Maharashtra Assembly Speaker Rahul Narwekar observes, "There is no consensus on the constitution submitted by both the parties (two factions of Shiv Sena) to the EC. The two parties have different points of views on leadership structure.… pic.twitter.com/4YE4gzeecZ
महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर को ये फैसला लेना था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को हर हाल में 31 दिसंबर, 2023 तक फैसला लेने के लिए कहा था, लेकिन 15 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 10 दिनों की आखिरी मोहलत दी थी। इसी के बाद 10 जनवरी को ये फैसला आया है। इस मामले में स्पीकर ने शिवसेना के दोनों गुटों के विधायकों की सुनवाई पूरी कर ली थी। उन्होंने पहले कहा था कि दोपहर में ही फैसला आ जाएगा। फिर ये समय शाम को 4 बजे का तय हुआ और आखिरकार देर शाम इस मुद्दे पर फैसला आया।
करीब 18 माह पहले एकनाथ शिंदे की अगुवाई में शिवसेना के विधायकों ने बगावत कर दी थी। शिंदे गुट के विधायकों ने बीजेपी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बना ली थी और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इस मामले में राहुल नार्वेकर के पास शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट के 16 विधायकों की सदस्यता पर फैसला सबसे पहले करना था। इस मामले में दोनों तरफ से 34 याचिकाएँ दायर की गई थी, जिन्हें 6 हिस्सों में बाँट दिया गया था। इसमें से 4 हिस्से शिवसेना के उद्धव ठाकरे के ग्रुप की तरफ से दाखिल गए हैं, तो 2 हिस्से शिंदे गुटे की तरफ से थे।
बता दें कि चुनाव आयोग ने शिवसेना का नाम और सिंबल शिंदे गुट को दे दिया था। चुनाव आयोग ने शिवसेवा ने साल 1999 के संविधान को ध्यान में रखते हुए फैसला किया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अब भी कई याचिकाएँ चल रही हैं।
शिवसेना का एकनाथ शिंदे गुट: एकनाथ शिंदे, संजय शिरसत, अब्दुल सत्तार, लता सोनावाने, भरत गोगावले, संदीपन भुमरे, तानाजी सावंत, यामिनी जाधव, प्रकाश सूर्वे, अनिल बाबर, बालाजी किन्नीकर, संजय रायमुल्कर, बालाजी कल्याणकर और महेश शिंदे, चिमनराव पाटिल, रमेश बोरनारे। इनके अलावा भी कई विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटकी थी।
शिवसेना का उद्धव ठाकरे गुटः सुनील प्रभु, रविंद्र वाईकर, सुनील राउत, वैभव नाइक, अजय चौधरी, संजय पटनीस, प्रकाश फाटेरपेकर, रमेश कोरगांवकर, राजन विचारे, नितिन देशमुख, कैलाश पाटिल और राहुल पाटिल। इस गुट के दो विधायकों- आदित्य ठाकरे और रुतुजा लाटके के खिलाफ अयोग्यता का प्रस्ताव नहीं रखा गया था।
नागपुर में ₹227 करोड़ की एक जमीन को लेकर गोदरेज प्रॉपर्टीज और अग्रवाल परिवार के बीच चल रहे विवाद के बीच मुस्लिम पर्सनल लॉ फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में सामने आया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक विधवा को जमीन बेचने या उसे ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं देता है। अब इस इस्लामी कानून का सहारा लेकर विधवा के वारिस करोड़ों रुपए बनाने का जुगाड़ लगा रहे हैं।
क्या है गोदरेज से जुड़ा जमीन विवाद और मुस्लिम पर्सनल लॉ का रोल
यह पूरा मामला 1988 का है। महाराष्ट्र के नागपुर के बेसा इलाके के घोगली गाँव में अब्दुल वहाब नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति के पास 58 एकड़ भूमि थी। अब्दुल वहाब की मौत के बाद यह भूमि उसकी विधवा खैरुन्निसा ने अग्रवाल परिवार को बेच दिया। इस जमीन को कितने में बेचा गया, इसकी जानकारी नहीं आई है। बेची गई इस जमीन में खैरुन्निसा के 8 बच्चों का हिस्सा भी शामिल था।
जमीन की बिक्री के समय मधुकर पुरोहित नाम के एक आदमी को अब्दुल वहाब के बच्चों का देखरेख करने वाला नियुक्त किया गया था। पुरोहित ने ही बच्चों की तरफ से जमीन की बिक्री के कागजों पर हस्ताक्षर किया था। आगे चलकर वर्ष 2022 में इसी जमीन को अग्रवाल परिवार ने गोदरेज प्रॉपर्टीज को ₹227 करोड़ में बेच दी।
हालाँकि, इस जमीन के सौदे पर अब्दुल वहाब के एक बेटे अब्दुल बशीर ने प्रश्न खड़े करते हुए मुकदमा दायर कर दिया। अब्दुल बशीर ने दावा किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कहता है कि शौहर की मौत के बाद उसकी विधवा उसके बच्चों की देखरेख के लिए वैध अभिभावक नहीं हो सकती। इसीलिए वह बच्चों का हिस्सा नहीं बेच सकती। ऐसे में जमीन की बिक्री अवैध है।
इस मामले में नागपुर के एक सिविल जज ने निर्णय दिया कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत उठाए गए इस प्रश्न को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत पिता की मौत के बाद उसके बच्चों का सम्पत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार तुरंत बन जाता है। इस जमीन को तभी बाँटा जा सकता है, जब कोई वारिस यह चाहे। इसके लिए कोर्ट में अर्जी दाखिल की जा सकती है।
इस मामले में कोर्ट ने कहा कि यह मुकदमा इसलिए भी जायज है, क्योंकि इस पर अधिकार रखने वाले लोग कभी इससे बाहर हुए ही नहीं। ऐसे में 34 वर्षों के बाद दायर किया गया मामला कोर्ट के अंदर सुना जा सकता है। अब ऐसे में आगे और मामलों की सुनवाई की जा सकेगी।
गोदरेज को जमीन मिलने में एक और रोड़ा
इस मामले में अक्टूबर 2022 में एक और मुकदमा किया गया। यह मुकदमा अब्दुल वहाब के बेटे अब्दुल जब्बार की तरफ से मुनव्वरा बेगम ने दायर किया। अब्दुल जब्बार मानसिक रूप से स्थिर नहीं है। इस मामले में कहा गया कि जब्बार की अम्मी ने बिना कोई वैध अभिभावक नियुक्त किए उसका हिस्सा बेच दिया। ऐसे में उनके मानसिक स्वास्थ्य कानून का भी उल्लंघन किया है।
मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि अब्दुल वहाब की विधवा से जमीन खरीदने वाले अग्रवाल परिवार को इस जमीन से मोटा मुनाफा हुआ है। उन्होंने यह जमीन गोदरेज को ₹227 करोड़ में बेची है, जो कि उन्होंने 1988 में काफी कम दामों में खरीदी होगी। वहीं, साल 1988 में अब्दुल वहाब के वारिसों को छोटी-मोटी रकम मिली होगी।
मुस्लिम पर्सनल लॉ में कमियाँ और इसका दुरूपयोग
जहाँ एक ओर कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर मामले का निपटारा कर रहा है, वहीं इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ की कमियाँ भी जाहिर हो रही हैं। यह मामला दिखाता कि धार्मिक कानून के जरिए कैसे एक विधवा महिला के अधिकारों को छीना जा रहा है। मुस्लिम महिला को उसके अधिकारों वंचित करने वाले ऐसे कई मामले सामने आ सकते हैं।
अब्दुल वहाब के वारिसों ने इस मामले में जहाँ दशकों तक कुछ नहीं किया, वहीं अब वह इस बड़ी डील को देखकर सक्रिय हो गए हैं। वे इस बड़ी बिजनेस डील को लटकाकर मोटा पैसा बनाना चाह रहे हैं। इस मामले से यह समस्या भी सामने आई है कि जो बड़े कॉर्पोरेट विकास के लिए जमीनें खरीदते हैं, वे बाद में जाकर कानूनी पचड़ों में फँस जाते हैं।
समस्या यह है कि भारत में अभी भी यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं है जो विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में समान रूप से प्रभावी हों। ऐसे में मजहबी कानूनों को अपनी मनमर्जी से उपयोग करने की खुली छूट कई समस्याएँ पैदा करती हैं, जैसा कि इस मामले में देखा जा रहा है।
यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता
यदि देश में सभी लोगों पर एक समान यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होता तो ऐसे मामले में कानूनी पचड़ा नहीं फँसेगा। इस मामले में विधवा के अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे। भारत को ऐसे मामले में कानून बनाने की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत है, जहाँ बिजनेस डील एवं सम्पत्ति से जुड़े मामले और विधवाओं के अधिकार सुरक्षित किए जा सकें।
कानूनी पचड़े में फँसी ₹227 करोड़ की यह गोदरेज की डील दिखाती है कि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता क्यों है। तथ्य ये है कि 2022 में एक 34 वर्ष पुरानी जमीन की बिक्री को चुनौती दी गई है, वह भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत।
अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन रहा है। 22 जनवरी, 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम है। रामलला को नए गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा। भगवान राम इस मंदिर में बाल अवस्था में होंगे। ऐसे में पूजा-पाठ के दौरान भी इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा और उनका वैसे ही ध्यान रखा जाएगा जैसे एक बालक का रखा जाता है। ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि मंदिर में रामानंदी संप्रदाय की पद्धतियों से पूजा-पाठ होगा। ऐसे में आपके मन में भी ये सवाल उठ रहा होगा कि ये ‘रामानंदी’ संप्रदाय क्या है?
ये हिन्दुओं के सबसे बड़े संप्रदायों में से एक है, जो समानतावादी विचारधारा पर चलता है। इस पंथ की शुरुआत स्वयं भगवान श्रीराम से मानी जाती है। एक एक वैष्णव संप्रदाय है, अतः श्रीहरि के अन्य अवतारों की पूजा पर भी जोर देता है। रामानंदी संप्रदाय के लोग शाकाहार का पालन करते हैं। साथ ही वो रामानंद के विशिष्टाद्वैत सिद्धांत पर चलते हैं। इनमें भी ‘त्यागी’ और ‘नागा’ नाम के 2 समूह हैं। जहाँ ‘त्यागी’ वो हैं दीक्षा के लिए राख का इस्तेमाल करते हैं, जबकि ‘नागा’ साधु सामान्यतः दुनिया से विरक्त रहते हैं।
आप सोच रहे होंगे कि नागा साधु इसमें कहाँ से आ गए। असल में कुछ साधुओं को व्यापारियों और अन्य साधु-संतों की रक्षा के लिए हथियार धारण करना पड़ा, उन्हें उनके मार्गों पर पहरा देना पड़ा। इसके लिए उन्हें मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक से लोहा लिया। यही निडर और लड़ाकू समूह ‘नागा’ के रूप में जाने गए। अंग्रेजों ने इन्हें शस्त्रविहीन करने के लिए बड़ा अभियान चलाया। वैष्णव समाज सामान्यतः अहिंसा को मानता है। यही कारण है जो वो शाकाहार का पालन करते हैं।
मान्यता है कि रामानंदी संप्रदाय की दीक्षा सबसे पहले माँ सीता ने हनुमान को दी थी, फिर हनुमान से ये क्रमशः ब्रह्मा, वशिष्ठ, पराशर, वेद-व्यास, शुकदेव, बोधायन, गंगाधराचार्य, सदानंदाचार्य, रमेश्वरनन्दाचार्य, द्वारानंदाचार्य, देवानंदाचार्य, श्यामानन्दाचार्य, श्रुतानंदाचार्य, चिदानंदाचार्य, पुरानंदाचार्य, श्रीयानंदाचार्य, हर्यानंदाचार्य, राघवनंदाचार्य और फिर रामानंदाचार्य तक पहुँची। हमें रामानंदी संप्रदाय के बारे में जानने से पहले रामानंद और विशिष्टाद्वैत के बारे में जानना पड़ेगा
मध्यकाल में रामभक्ति का बिगुल बजाने वाले रामानंद
रामानंद भारतीय इतिहास के मध्यकाल में एक महान संत हुए हैं। उत्तर भारत की गंगा घाटी में भ्रमण करने वाले रामानंद को एक कवि के रूप में भी जाना गया, भक्त-कवि। आधुनिक काल में रामानंदी संप्रदाय के संस्थापक के रूप में उन्हें ही जाना जाता है। 14वीं-15वीं शताब्दी में भारत में जब भक्तिकाल में कई संतों का उद्भव हो रहा था, रामानंद उसी के शुरुआती दौर में सक्रिय रहे। वो एक महान समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने जाति या लिंग भेद को धता बताते हुए अपने शिष्यों के रूप में हर वर्ग को स्वीकार किया।
सिखों की सबसे पवित्र पुस्तक ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ में भी रामानंद की ‘बाणी’ को जगह दी गई है। ब्राह्मण परिवार में जन्मे रामानंद के संप्रदाय को ‘बैरागी’ संप्रदाय के रूप में भी जाना गया। उनके जीवनकाल के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, लेकिन उल्लेख है कि उनका जन्म प्रयागराज में हुआ था। रामानंद की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा राघवानंद के अंतर्गत हुई थी, जो उस समय विशिष्टाद्वैत के बड़े विद्वान हुआ करते थे। उन्हें नाथ संप्रदाय से भी प्रभावित बताया जाता है।
रामानंद तत्ववाद की जगह भक्ति पर जोर देते थे। भगवान की शरण में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और जीव्-ईश्वर के बीच कोई भेद नहीं है – ये उनका मत था। आदिग्रन्थ में रामानंद के एक पद को देखिए – ‘कत जाईऐ रे घर लागो रंगु’, जिसका अर्थ है – कहाँ भटकूँगा, मुझे अपने हृदय में ही आनंद मिल रहा है। ‘तथ्यै नि कुछू संसार, हमारे राम को नाम आधार’ में राम नाम की महिमा बताई है। रामानंद पर भक्तिकाल के एक और महान कवि रामानुज का प्रभाव था, उनके ही शिष्यों में कुछ पीढ़ी बाद वो हुए थे।
रामानंद सगुन उपासना और राम भक्ति के प्रवर्तकों में से थे। रामानंद सामान्यतः लोकभाषा में लिखते थे, लेकिन उनके लिखे अधिकतर ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं हैं या उनमें काफी मिश्रण है। उन्होंने रामावतार का प्रचार-प्रसार किया। ऐसा नहीं है कि वो वर्णाश्रम के विरोधी थी, कर्मशास्त्र में वो ग्रंथों के हिसाब से मत रखते थे लेकिन भगवद्भक्ति में उन्हें किसी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं था। ‘हरि को भजे सो हरि को होई’ वाला भावना के तहत वो चलते थे।
कई जगह कबीर के गुरु के रूप में भी रामानंद को चित्रित किया है, लेकिन इसके समर्थन में कोई पुष्ट मत नहीं है। ‘श्री रामार्चन पद्धति’ उनके द्वारा लिखित है, जिसमें उन्होंने स्वयं को रामानुज की परंपरा का बताया है। स्वामी रामानंद ने वैकुंठलोकवासी विष्णु की जगह उनके लौकिक अवतार राम को प्राथमिकता दी, सबके लिए रामभक्ति का द्वार खोला। ‘वैष्णवमताब्जभास्कर’ भी उनके द्वारा रचित ग्रन्थ है। रामानंद के शिष्य अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी ने जयपुर से 10 किलोमीटर दूर गलता में संप्रदाय की गद्दी स्थापित की थी।
क्या है विशिष्टाद्वैत दर्शन? हिन्दू धर्म की शाखाओं में से एक
ये आचार्य रामानुज ने मुख्य तौर पर प्रतिपादित किया गया सिद्धांत है। इसके तहत माना गया है कि ये संसार और जीवात्मा, दोनों ही ब्राह्मण से भिन्न हैं लेकिन वे ब्रह्म से ही उद्भूत हुए हैं। इसमें समझाया गया है कि ब्रह्म से संसार का वही संबंध है जो सूर्य का उनकी किरणों से है। इस तरह ब्रह्म एक होकर भी अनेक है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने जगत को माया बता कर मिथ्या करार दिया था, लेकिन रामानुज का कहना था कि ये जगत ब्रह्म की ही सृष्टि है इसीलिए ये माया नहीं हो सकता।
एक तरह से देखें तो रामानुजाचार्य ने निर्गुण ब्रह्मवाद और सगुण ईश्वरवाद के बीस सामंजस्य बिठाने का प्रयास किया। अब इस परंपरा में इष्टदेव का भेद हुआ तो शाक्त, शैव और वैष्णव संप्रदाय बने। वैष्णवों में 4 संप्रदाय मुख्य हैं – रामानुजाचार्य का श्रीसंप्रदाय (विशिष्टाद्वैत), मध्वाचार्य/आनंदतीर्थ का ब्रह्मसंप्रदाय (द्वैत), विष्णुस्वामी और वल्लभाचार्य का रूद्रसंप्रदाय (शुद्धाद्वैत) और निम्बकाचार्य का सनकसंप्रदाय (द्वैताद्वैत)। इसी तरह आगे चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय को ‘मध्वगौड़ीय’ या अचिन्त्यभेदाभेद कहा गया।
विशिष्टाद्वैत के तहत रामानुज चित्त (चेतन भोक्ता जीव), अचित्त (जड़ भोग्य जगत) और ईश्वर (दोनों का अंतर्यामी) – इन 3 तत्वों में विश्वास रखते हैं। उन्होंने चित्त व अचित्य को न सिर्फ नित्य माना है, बल्कि दोनों को परस्पर स्वतंत्र भी तय है। हालाँकि, उनके हिसाब से ये दोनों ईश्वर पर आश्रित हैं। यानी, ये दोनों शरीर की तरह हैं और उनकी आत्मा है ईश्वर। रामानुज के हिसाब से आत्मा द्वारा धारण किया जाए और अर्थसिद्धि के लिए उपयोग में लाया जाए, जबकि आत्मा वो है शरीर को धारण करे और शरीर का साध्य हो।
क्या है रामानंदी पद्धति, जिससे राम मंदिर में होगी पूजा
विशिष्टाद्वैत को अगर हम साधारण शब्दों में समझें तो इसका सीधा मतलब है कि हम ईश्वर का ही हिस्सा हैं, जीव ईश्वर से अलग तो है लेकिन उसका ही एक भाग है। जीव को जगदीश्वर को पाना है। इसके लिए 2 चीजें प्रमुख हैं – अहं का त्याग और समर्पण। वैष्णव संप्रदाय के मूल में यही है – अपने अहंकार का त्याग कर के भक्ति कीजिए, भजन कीजिए, स्वयं को ईश्वर के समक्ष समर्पित कीजिए। समर्पण का भाव रामानंदी संप्रदाय की पूजा पद्धति में भी प्राथमिक है।
‘ओम रामाय नमः’ – इस मन्त्र के जरिए भगवान श्रीराम की पूजा की जाती है। अयोध्या श्रीराम की जन्मस्थली है, इसीलिए वहाँ के अधिकतर मंदिर रामानंदी संप्रदाय की पूजा-पद्धति को अपनाते हैं। बिना जाति-पाति के भेद के हर कोई ईश्वर की भक्ति में लीन रहे, ये इसका उद्देश्य है। वैष्णव संप्रदाय के प्राचीन मंदिरों में पूजा-अर्चना बैरागी भक्तों द्वारा ही की जाती है। अयोध्या में भी रामानंदी संप्रदाय के साधु-संतों को लाया जाएगा। 13 अखाड़ों में ‘दिगंबर’ और ‘निर्वाणी’ अखाड़ा वैष्णवों के हैं।
इस परंपरा के तहत गुरु अपने शिष्य को कान में दीक्षा देते हैं। साथ ही ‘उर्ध्व पुण्ड्र’ वाला तिलक लगाते हैं। काशी स्थित पंचगंगा मठ भी रामानंदी संप्रदाय के प्राचीन मठों में से है। भक्त पीपा को भी रामानंद का ही शिष्य माना गया। रामचरितमानस की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास भी इसी परंपरा में हुए हैं। राम मंदिर में भी भक्तों द्वारा प्रसाद चढ़ाने की कोई प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि वो ‘भाव’ लेकर रामलला का दर्शन करेंगे, ट्रस्ट द्वारा ही उन्हें प्रसाद दिया जाएगा।
रामलला की 32 वर्षों से पूजा कर रहे महंत सत्येंद्र दास बताते हैं कि बाल स्वरूप में रामलला के पालन-पोषण, खानपान और पसंद-नापसंद का भी ध्यान रखा जाता है। शयन से उन्हें उठाया जाता है, चंदन-शहद से स्नान कराया जाता है, दोपहर को विश्राम कराया जाता है, सायं को भोग लगा कर आरती की जाती है। चूँकि भगवान बालरूप में हैं, उनका संरक्षक बन कर ये सब पूरा किया जाता है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद भी पूजन विधि यही रहेगी, लेकिन इसका स्वरूप भव्य हो जाएगा।
इस समय पूरी दुनिया अयोध्या की तरफ देख रही है, जहाँ 22 जनवरी 2024 को रामलला के मंदिर में भव्य प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का आयोजन होना है। इस कार्यक्रम में हजारों गणमान्य लोगों को बुलाया जा रहा है, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी ने अब इस कार्यक्रम में शामिल होने से ही मना कर दिया है। कॉन्ग्रेस ने एक पत्र जारी कर इस आयोजन को राजनीतिक करार दिया है और कहा कि वो अधूरे मंदिर में होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से दूर रहेगी। पार्टी ने साफ कर दिया है कि सोनिया गाँधी, कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे।
हम निमंत्रण को करते हैं अस्वीकार: कॉन्ग्रेस
कॉन्ग्रेस के महासचिव जयराम रमेश द्वारा पत्र जारी कर पार्टी के फैसले की जानकारी दी गई है। पत्र में लिखा गया है, “पिछले महीने, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी एवं लोकसभा में कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी को अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन का निमंत्रण लिया।”
पत्र में आगे लिखा गया है, “भगवान राम की पूरा-अर्चना करोड़ों भारतीय करते हैं। धर्म मनुष्य का व्यक्तिगत विषय होता आया है, लेकिन बीजेपी और आरएसएस ने वर्षों से अयोध्या में राम मंदिर को एक राजनीतिक परियोजना बना दिया है। स्पष्ट है कि एक अर्धनिर्मित मंदिर का उद्घाटन केवल चुनावी लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है। 2019 के माननीय सर्वोच्च न्यायायल के निर्णय को स्वीकार करते हुए एवं लोगों की आस्था के सम्मान में मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गाँधी एवं अधीर रंजन चौधरी बीजेपी और आरएसएस के इस आयोजन के निमंत्रण को ससम्मान अस्वीकार करते हैं।”
कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा जारी किया गया पत्र (फोटो साभार : X_INCIndia)
कॉन्ग्रेस पार्टी ने साफ तौर पर भगवान राम के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को राजनीतिक कदम करार दे दिया है। खास बात ये है कि इसी कॉन्ग्रेस पार्टी की जब केंद्र में सरकार थी, तब सुप्रीम कोर्ट में शपथ लेकर सरकार ने भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, दुनिया भर के हिंदुओं की इच्छा पूरी हुई, तो एक बार फिर से कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने कदम से साबित कर दिया है कि वो सनातन परंपरा और हिंदुओं से कितनी नफरत करती है।
अखिलेश यादव ने भी किया इनकार
बता दें कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी राम लला के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है। लाइव हिंदुस्तान के मुताबिक, अखिलेश यादव को विहिप के नेता आलोक कुमार निमंत्रण देने गए थे, लेकिन अखिलेश यादव ने ये कहते हुए आमंत्रण पत्र को लेने से मना कर दिया कि वो आलोक कुमार को नहीं जानते। वो किसी ‘ऐरे-गैरे से निमंत्रण नहीं’ लेंगे। उन्होंने कहा कि जब भगवान राम बुलाएँगे, तो वो खुद जाएँगे। इससे पहले अखिलेश ने कहा था कि वो कार्यक्रम में शामिल होने का बुलावा मिलने पर जाएँगे, हालाँकि अब उन्होंने मना कर दिया है।
22 जनवरी को होगी प्राण प्रतिष्ठा
गौरतलब है कि आगामी 22 जनवरी को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए तैयारियाँ जोरों-शोरों से हो रही हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित रहेंगे। इनके अतिरिक्त 3000 वीआईपी समेत 7000 लोगों को निमंत्रण भेजे गए हैं। ट्रस्ट का कहना है कि लगभग 15000 लोगों के आने का इंतजाम होगा।
अयोध्या में नवनिर्मित भव्य श्रीराम मंदिर में भगवान रामलला 22 जनवरी 2024 को विराजने जा रहे हैं। ऐसे में प्रभु की सेवा में श्रद्धालुओं से जो कुछ हो पा रहा है वो वह सब कर रहे हैं। जैसे आगरा के सिख रघुवीर सिंह, जो एक पोस्टकार्ड में 21 हजार बार राम नाम लिखकर उसे रामलला के पास भेजने की तैयारी में लगे हुए हैं। उन्होंने 16 साल पहले एक ही पोस्टकार्ड में 31480 बार राम नाम लिखकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए भेजा था।
बकौल रघुवीर उन्होंने 2007 में फिरोजाबाद के कैला देवी मंदिर में हनुमान भक्तों को कागज पर राम का नाम लिखते देखा था। इसके बाद से ही उनके मन में कुछ अलग करने की इच्छा बलवती होती गई। बस फिर क्या था शुरुआत की पोस्टकार्ड पर 21 हजार बार गुरु नाम लिखकर। इसके बाद राम का नाम 30 हजार से अधिक बार लिखा।
मूल रूप से फिरोजाबाद के रहने वाले रघुबीर अभी आगरा के महर्षि पुरम में रहते हैं। पेशे से एक दवा कंपनी में एरिया मैनेजर रघुवीर ने राम मंदिर उद्घाटन के लिए पाँच महीने पहले उपहार स्वरूप 21 हजार राम नाम लिखा पोस्टकार्ड भेजने का फैसला लिया था। तब से वो रोजाना एक घंटे एक जगह बैठकर पोस्टकार्ड पर रामनाम लिखने का नियम बनाया।
वो पोस्टकार्ड में एक लाइन में लगभग 70 बार राम का नाम लिखते हैं। ये राम नाम इतना अधिक बारीकी से लिखा गया है कि बेहद पास से देखने पर ही राम नाम नजर में आता है। पोस्टकार्ड पर उनके लिखे राम नाम लेंस की मदद लेकर ही सहूलियत से पढ़े जा सकते हैं।
दैनिक जागरण के मुताबिक, रघुबीर को हर बार पाँच बार राम लिखने के बाद पेंसिल की नोंक को नुकीला करना पड़ता है। पहली बार उन्होंने 16 साल पहले पोस्टकार्ड पर राम नाम लिखा था। इसके बाद वो राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के लिए एक बार फिर पोस्टकार्ड पर राम नाम लिख रहे हैं।
रघुबीर बताते हैं कि 20 जनवरी,2024 तक वो पोस्टकार्ड पर राम नाम लिखने का काम पूरा कर लेंगे। इसके बाद पोस्टकार्ड को राममंदिर के लिए पोस्ट कर रवाना कर देंगे।
बताते चलें कि रघुवीर 86 बार रक्तदान कर चुके हैं। इस काम को वो बीते 19 साल से बिना नागा कर रहे हैं। यही नहीं उन्होंने लोगों को रक्तदान में मदद देने के लिए जीवन रक्षक ग्रुप बनाया था। इस ग्रुप में देश भर के रक्तदाता जुड़े। इस वजह से ये लोगों के बीच जीवन रक्षक नाम से भी जाने जाते हैं।
मणिपुर सरकार ने कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा‘ को राजधानी इम्फाल से शुरू करने की अनुमति देने से मना कर दिया है। कॉन्ग्रेस ने राज्य सरकार से 14 जनवरी 2024 को शुरू होने वाली इस यात्रा के लिए अनुमति माँगी थी। इस संबंध में कॉन्ग्रेस के कुछ नेताओं ने मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह से मुलाकात भी की थी।
दरअसल, कॉन्ग्रेस ने मणिपुर की राजधानी इम्फाल के हप्ता कांजेईबंग मैदान से यात्रा शुरू करने की अनुमति माँगी थी। इस मैदान का काफी ऐतिहासिक महत्व है और यह दुनिया के सबसे ऊँचे पोलो ग्राउंड में से एक है। यात्रा चालू करने को लेकर जब मणिपुर सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया तो कॉन्ग्रेस का एक प्रतिनधिमंडल राज्य के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह से मिला जिन्होंने यह अनुमति देने से मना कर दिया।
मणिपुर के मुख्यमंत्री ने अनुमति नहीं देने के पीछे राज्य की क़ानून व्यवस्था का हवाला दिया है। इससे पहले मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह ने कहा था कि कॉन्ग्रेस के इस आवेदन पर विचार सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद किया जाएगा। उधर कॉन्ग्रेस के महासचिव केसी वेणुगोपाल उन राज्यों में तैयारियाँ देख रहे हैं, जहाँ से यह यात्रा निकलनी है।
मणिपुर के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष केशम मेघचन्द्र सिंह ने बताया, “आज एक टीम माननीय मुख्यमंत्री से मिली, जिन्होंने इस यात्रा को हप्ता कांजेईबंग मैदान से निकालने को लेकर अनुमति देने से मना कर दिया। हमने इसको लेकर 2 जनवरी को आवेदन दिया था। यह यात्रा 14 जनवरी को चालू होनी है। मुख्यमंत्री ने स्पष्टतया अनुमति देने से मना कर दिया।” अब कॉन्ग्रेस यात्रा थोबल जिले के खोंगजम स्थित एक निजी स्थल से निकालेगी।
#WATCH | On Congress party's upcoming Bharat Jodo Nyay Yatra, Manipur Congress chief Keisham Meghachandra says, "Today a team of Manipur Congress met the CM. He has declined to give permission for the venue…He declined the request…that he would not give any public lane in… pic.twitter.com/bpnqKzUaPK
यह यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में होगी। इन राज्यों के 85 जिलों से यात्रा गुजरेगी। इस यात्रा को भारत जोड़ो यात्रा की अगली कड़ी बताया जा रहा है, लेकिन इस बार कई बदलाव भी दिखेंगे।
मसलन यह पूरी तरह पद यात्रा नहीं होगी। इस यात्रा में राहुल गाँधी एक विशेष बस से सफर करेंगे। इसमें वह कहीं-कहीं पैदल भी चलेंगे और लोगों से मुलाक़ात करेंगे। भारत न्याय यात्रा को हरी झंडी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे दिखाएँगे और 66 दिवसीय इस यात्रा का समापन 20 मार्च 2024 को मुंबई में होगा।
योगी सरकार ने प्रदेश के मदरसों में काम कर रहे शिक्षकों को दिए जाने वाला मानदेय बंद करने का निर्णय लिया है। इन्हें अब उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से कोई भी मानदेय नहीं दिया जाएगा। इस निर्णय से 21,000 मदरसा शिक्षक प्रभावित होंगे।
इन मदरसा शिक्षकों को वर्ष 1993-94 में केंद्र सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘मदरसा आधुनिकीकरण योजना’ के तहत मदरसों में रखा गया था। यह शिक्षक यहाँ मदरसे में दीनी तालीम लेने वाले बच्चों को सामजिक, विज्ञान, गणित और अन्य व्यावहारिक विषय पढ़ाते थे। इसके जरिए लक्ष्य था कि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे सिर्फ दीन की बातें ना जानकर व्यावहारिक विषयों को भी जानें। इसके तहत मदरसों में स्नातक और परास्नातक शिक्षक रखे गए थे।
इस योजना को वर्ष 2008 में बदल कर ‘स्कीम फॉर प्रोवाइडिंग क्वालिटी एजुकेशन इन मदरसा’ कर दिया गया था। योजना के तहत मदरसों में पढ़ाने वाले शिक्षकों में स्नातक शिक्षकों को ₹6000 और परास्नातक शिक्षकों को ₹12,000 दिए जाते थे। यह मानदेय केंद्र सरकार की तरफ से दिया जाता था। वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने इसमें बदलाव करके मदरसे में पढ़ाने वाले शिक्षकों के मानदेय बढ़ा दिया था।
अखिलेश यादव की सरकार ने 2016 में मदरसे में पढ़ाने वाले इन शिक्षकों के मानदेय में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से ₹2000 स्नातक स्तर पर और ₹3000 परास्नातक के स्तर पर बढ़ाया था। ऐसे में 2016 से स्नातक शिक्षकों को कुल ₹8000 और परास्नातक शिक्षकों को कुल ₹15000 मिलते थे।
हालाँकि, बाद में केंद्र की तरफ से दिया जाने वाला बड़ा हिस्सा वर्ष 2021-22 में बंद कर दिया गया था। केंद्र सरकार की यह योजना ही बंद कर दी गई थी। इसके बाद इन शिक्षकों को वही पैसा मिल रहा था जो कि उत्तर प्रदेश सरकार देती थी। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने अपना हिस्सा बंद करने का निर्णय भी लिया है।
अब उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से इस मानदेय के लिए दिए जाने वाले बजट को रोकने के आदेश दिए हैं। अब बजट में इस मद में कोई भी व्यवस्था ना करने की बात की गई है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके पीछे तकनीकी कारण बताए हैं। योगी सरकार इससे पहले भी मदरसे पर एक्शन ले चुकी है।
बांग्लादेश में एक बार फिर एक हिंदू को सरेआम काट डाला गया है। मृतक का नाम बोरुन घोष है और वो बांग्लादेश की सत्ताधारी पार्टी आवामी लीग के स्थानीय कार्यकर्ता थे। जिस जगह बोरुन की हत्या हुई, उस सीट पर हाल ही में हुए संसदीय चुनाव में आवामी लीग के प्रत्याशी को हार झेलनी पड़ी है।
घटना 9 जनवरी 2024 की शाम 7 बजे के आसपास हुई। हत्यारों ने बोरुन घोष के जेनैदाह जिले के घोषपारा इलाके स्थित उनके घर से बाहर खींच लिया और फिर उनका पैर काट दिया। इसके बाद उनकी हत्या कर दिया। हत्या करने के बाद सभी हत्यारे फरार हो गए। इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
इससे एक दिन पहले ही बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को संसदीय चुनावों में एक बार फिर से जीत मिली थी। हालाँकि, जेनैदाह-2 सीट पर अवामी लीग के प्रत्याशी तहजीब आलम सिद्दीकी सामी को हार का सामना करना पड़ा। तहजीब को निर्दलीय प्रत्याशी नासिर शहरयार ज़ाहेदी ने हराया है।
बीडी न्यूज24 ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 42 साल के बोरुन घोष को घर से निकाल कर उनका पैर काट दिया गया। उन्हें आसपास के लोग अस्पताल लेकर पहुँचे, लेकिन उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। सदर पुलिस स्टेशन के प्रभारी शाहीनुद्दीन ने बताया कि आवामी लीग के कार्यकर्ता की उपद्रवियों ने हत्या कर दी है।
पुलिस ने कहा कि हत्या का मकसद अभी साफ नहीं है। हालाँकि, माना जा रहा है कि बोरुन की हत्या चुनावी रंजिश में की गई है। अवामी लीग (एएल) पार्टी के उम्मीदवार रहे तहज़ीब आलम सिद्दीकी सामी ने बताया कि बोरुन उनकी पार्टी के जिम्मेदार कार्यकर्ता थे। उन्हें राजनीतिक वजहों से निशाना बनाया गया।
वहीं, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मीर आबिदुर ने कहा, “मैं यह नहीं कह सकता कि बरुन राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल थे या नहीं। हमने जाँच शुरू कर दी है।” हालाँकि, अवामी लीग के नेताओं ने पुष्टि की कि वह राजनीतिक रूप से सक्रिय थे।
जिला अवामी लीग के उपाध्यक्ष अब्दुल खालेक ने कहा कि बोरुन तहज़ीब आलम सिद्दीकी सामी के समर्थक थे। सत्तारूढ़ अवामी लीग पार्टी इकाई के संयुक्त महासचिव कनक कांति दास के अनुसार, बोरुन के बड़े भाई अरुण कुमार घोष विपक्षी वर्कर्स पार्टी के स्थानीय नेता हैं।
धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हमले मुस्लिम-बहुल बांग्लादेश में आम हैं। वहाँ इस्लामी समूह ग्रामीण इलाकों में मंदिरों और हिंदुओं को निशाना बनाते हैं। हालाँकि, शेख हसीना की अवामी लीग सरकार ने चरमपंथी ताकतों पर कार्रवाई की है। इसके बावजूद अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा जारी है।
इस्लाम के कथित अपमान के नाम पर केरल के प्रोफेसर टीजे जोसेफ का हाथ काटने के मास्टरमाइंड सवाद को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने धर दबोचा है। जाँच एजेंसी ने 13 साल बाद मंगलवार (9 जनवरी 2024) की रात को आरोपित को हिरासत में लेने में कामयाबी मिली। सवाद के सिर पर 10 लाख रुपए का इनाम था।
सवाद को बुधवार (10 जनवरी 2024) की सुबह कोच्चि स्थित एनआईए के कार्यालय लाया गया। आज से 13 साल पहले 4 जुलाई 2010 को केरल के प्रोफेसर टीजे जोसेफ पर इस्लाम के अपमान का आरोप लगाकर उनका हाथ काट दिया गया था। इसके बाद से ही मुख्य आरोपित सवाद फरार चल रहा था।
एनआईए की भगोड़ा ट्रैकिंग विंग को एक गुप्त सूचना मिली कि 37 साल का सवाद कन्नूर के पास मट्टनूर में है। इसके बाद NIA ने बेराम के एक किराए के मकान में छापा मारा और उसे हिरासत में ले लिया।सवाद यहाँ पिछले पाँच महीने से अपनी बीवी और दो बच्चों के साथ रह रहा था और बढ़ई का काम कर रहा था।
सवाद ने बेराम में अपने आसपास के लोगों को अपना नाम शाहजहाँ बताया था। एर्नाकुलम के असमन्नूर के नूलेली में मुदस्सेरी हाउस का रहने वाला है। वहीं, उसकी बीवी कासरगोड़ की रहने वाली है। बेराम आने से पहले वह कन्नूर में कई जगहों पर छिपकर रहता था। कहा जाता है कि बीच में वह खाड़ी देशों में नौकरी के लिए भी गया था।
सवाद उन 7 लोगों के समूह में शामिल था, जिन्हें प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने प्रोफेसर जोसेफ पर हमले के लिए चुना था। प्रोफेसर टीजे जोसेफ थोडुपुझा में स्थित न्यूमैन कॉलेज में मलयालम भाषा के प्रोफेसर थे। सावद ने प्रोफेसर पर यह हमला एर्नाकुलम के मुवत्तुपुझा में उनके घर के पास किया था।
साल 2013 में दायर एनआईए की चार्जशीट के अनुसार, सवाद ने प्रोफेसर के कार के शीशे तोड़ दिए और प्रोफेसर को जबरदस्ती बाहर खींच लिया और उन पर चाकू और एक छोटी कुल्हाड़ी से हमला किया। परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों को जोसेफ को बचाने से रोकने के लिए देशी बम फेंका था।
सवाद ने जोसेफ की दाहिनी हथेली काटते हुए कहा था, “जिस हाथ ने इस्लाम का अपमान किया है, वह भविष्य में किसी काम का नहीं रहेगा।” इस वारदात को अंजाम देने के तुरंत बाद सवाद बेंगलुरु भाग गया और वहाँ लगभग 13 साल तक अंडरग्राउंड रहा था। उसके सिर पर NIA ने 10 लाख रुपए का इनाम रखा था।
इतना ही नहीं, सवाद के खिलाफ इंटरपोल रेड-कॉर्नर नोटिस भी जारी किया गया था। इस मामले में कम से कम 54 आरोपित थे। सवाद ही अकेला आरोपित था, जो फरार था। इस केस की सुनवाई एनआईए अदालत में दो चरणों में हुई थी। इसमें से 19 लोगों को दोषी ठहराया गया था। सुनवाई के पहले चरण में 31 आरोपितों के खिलाफ ट्रायल चला था।
इसमें 10 आरोपितों को अप्रैल 2015 में UAPA के साथ-साथ विस्फोटक अधिनियम के तहत भी दोषी पाया गया था। 3 अन्य आरोपितों को अपराधियों को शरण देने का दोषी पाया गया था। वहीं, 3 अन्य को अपराधियों को शरण देने का दोषी पाया गया था। वहीं, 18 अन्य आरोपितों को बरी कर दिया गया था।
दूसरे चरण में 11 जुलाई 2023 को NIA की विशेष अदालत ने इस मामले में 6 आरोपितों को दोषी ठहराया था और 5 लोगों को दोषमुक्त कर दिया था। जिन्हें दोषी साबित किया गया है, उनके नाम हैं – नस्सर, साजिल, नजीब, नौशाद, कुंजू और अयूब। वहीं शफीक, अजीज, रफ़ी, ज़ुबैर और मंसूर को दोषमुक्त करार दिया गया।
महाराष्ट्र के नवी मुंबई में शोएब शेख नामक एक शख्स ने अपनी गर्लफ्रेंड अमित कौर का गला दबा कर उन्हें मार डाला। मृतका एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर थी। वो जुई नगर ब्रांच में पदस्थापित थी। 3 महीने पहले ही दोनों की मुलाकात हुई थी। शोएब शेख 24 साल का है, जबकि उसकी गर्लफ्रेंड उससे 11 साल बड़ी थी। सितंबर 2023 से दोनों एक-दूसरे को डेट कर रहे थे। अमित कौर का अपने पति से तलाक हो चुका था और उसकी एक किशोर बेटी भी है।
सोमवार (8 जनवरी, 2024) को महिला का जन्मदिन भी था। शोएब शेख ने प्लान बनाया कि जन्मदिन का जश्न खत्म होने के बाद वो उसे मार डालेगा। उसे शक था कि उसकी गर्लफ्रेंड का किसी अन्य मर्द से अफेयर है। साकी-नाका के असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर वाल्मीकि कोरे ने आरोपित को धर-दबोचने में सफलता पाई है। DCP दत्ता नलावडे ने बताया कि शोएब शेख ने गर्लफ्रेंड अमित कौर की मुंबई के एक लॉज में हत्या किए जाने का आरोप कबूल कर लिया है।
सोमवार को जब अमित कौर दफ्तर से आ गई, तब शेख उससे मिला। लॉज में चेक-इन करने के बाद दोनों ने साथ मिल कर महिला का जन्मदिन मनाया। दोनों ने रूम बुक करने के लिए अपने-अपने आइकार्ड्स का इस्तेमाल किया था। आधी रात को शोएब को लॉज के कर्मचारियों ने बहार निकलते देखा, लेकिन उन्हें उसे लेकर कुछ संदेहास्पद नहीं लगा। पुलिस ने जब दरवाजा खोला, तभी वहाँ अमित कौर की लाश पड़ी हुई मिली। गला दबा कर उनकी हत्या की गई थी।
तुर्भे के सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर रवींद्र दौंडकर ने ये जानकारी दी है। शोएब शेख स्कूल ड्रॉपआउट है। वो हत्या के बाद साकी-नाका स्थित अपने घर लौट आया। वो अपने एक रिश्तेदार के गैराज में काम करता था। रात के करीब 2 बजे किसी शख्स ने पुलिस को फोन कॉल कर सूचना दी कि उसके पड़ोसी ने कुछ गड़बड़ किया है। शेख को पकड़ कर थाने लाया गया, जहाँ पूछताछ में उसने हत्या का आरोप कबूला। साकी-नाका पुलिस ने फिर तुर्भे थाने से संपर्क किया और लॉज में पहुँच कर लाश को बरामद किया।
A 35-year-old manager with a bank was killed in a Turbhe lodge by a youth she met online a few months ago over suspicion that she was cheating on him.https://t.co/qv0ZEn9YZX
शोएब शेख को तुर्भे पुलिस थाने को सौंप दिया गया है। पीड़िता GTB नगर में अपनी माँ के साथ रहती थी। जबकि उसकी किशोर बेटी उसके पूर्व पति के साथ रहती है। अमित रवींद्र कौर को ‘एमी’ नाम से भी जाना जाता है। वो IDFC बैंक में काम करती थी। पुलिस ने धारा-302 (हत्या) सहित IPC की अन्य धाराएँ लगा कर शोएब शेख को जेल भेज दिया है। पुलिस से भी उसने बताया है कि उसकी गर्लफ्रेंड उसे धोखा दे रही थी, इसीलिए उसने उसकी हत्या कर दी।