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शादी का झाँसा दे किया रेप, फिर इस्लाम कबूलने का बनाने लगा दबाव: बोली पीड़िता- मौलवी के पास ले गया, पूजा करने से रोका

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शादी का झाँसा देकर एक युवती से रेप और फिर उस पर धर्मांतरण का दबाव बनाने का मामला सामने आया है। आरोपित की पहचान अफीफउल्ला के तौर पर हुई है। पीड़िता के अनुसार उसे पूजा करने से रोका गया। उसे मौलवी के पास ले जाया गया। इस्लाम कबूलने से इनकार करने पर उसके साथ मारपीट की गई।

पीड़िता ने 9 जनवरी 2024 को लखनऊ में इस संबंध में रिपोर्ट दर्ज करवाई। लेकिन नोएडा से मामला जुड़ा होने की वजह से इसे नोएडा पुलिस को ट्रांसफर किया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, लखनऊ की रहने वाली 27 साल की हिंदू पीड़िता नोएडा की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात रामपुर के रहने वाले अफीफउल्ला से हुई। अफीफउल्ला ने युवती से दोस्ती गाँठी। उससे शादी का वादा किया।

युवती का आरोप है कि उसे भरोसे में लेने के बाद अफीफउल्ला अपने साथ एक होटल में ले गया और वहाँ रेप किया। विरोध करने पर उसने शादी करने की बात करके उसे चुप करा दिया। शादी के नाम पर अफीफउल्ला युवती को अलग-अलग होटल में ले जाकर उसके साथ जिस्मानी रिश्ते बनाता रहा। बाद में जब युवती ने उससे शादी करने के लिए कहा तो वो इसके लिए राजी नहीं हुआ।

अमर उजाला में 11 जनवरी 2024 को प्रकाशित संबंधित खबर

पीड़िता के अनुसार अफीफउल्ला ने उसकी मुलाकात अपनी बहनों ऊरसा और हमना से भी कराई थी। इनके सामने भी शादी करने का भरोसा दिलाया था। लेकिन बाद में वह शादी करने के लिए इस्लाम कबूलने का दबाव डालने लगा। कथित तौर पर इसके लिए अफीफउल्ला उसे एक मौलवी के पास भी लेकर गया था। इस मौलवी ने भी मजहब बदलने को कहा। युवती का आरोप है कि अफीफउल्ला उसे इस्लामिक किताबें भी लाकर देता था और इस्लामिक कार्यक्रमों में भी लेकर जाता था।

पीड़िता के अनुसार आरोपित ने उससे कहा कि उसके मजहब में गैर इस्लामिक लड़की से शादी करने की मनाही है। इसलिए उसे इस्लाम कबूलना होगा। वह पीड़िता के पूजा-पाठ करने का भी विरोध करता था। कथित तौर पर युवती जब इस्लाम कबूलने को राजी नहीं हुई तो उसने अपनी बहनों के साथ मिलकर उससे मारपीट की।

लखनऊ थाने के इंस्पेक्टर अखिलेश कुमार के मुताबिक पीड़त युवती की शिकायत पर अफीफउल्ला के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। घटना नोएडा की है, इसलिए केस की विवेचना नोएडा पुलिस करेगी। शीघ्र ही यह केस नोएडा ट्रांसफर किया जाएगा।

आसमान में जलती थी लाल बत्ती, नीचे कारसेवकों पर होने लगती थी फायरिंग: बलिदानियों के परिजनों का दावा, नरसंहार में MP रहे मुन्नन खाँ को भी बताया शामिल

समाजवादी पार्टी के नेता और अखिलेश यादव के करीबी स्वामी प्रसाद मौर्य ने बुधवार (10 जनवरी 2024) को एक विवादित बयान दिया। इस बयान में उन्होंने सन 1990 में कारसेवा करने गए रामभक्तों को उपद्रवी बताया है और मुलायम सिंह यादव के आदेश के गोली चलाने को सही ठहराया। इस बयान का पूरे देश के अलावा समाजवादी पार्टी में भी विरोध हो रहा है।

ऑपइंडिया की टीम ने अयोध्या के स्थानीय निवासियों के साथ बलिदानी व जीवित कारसेवकों के परिजनों से मिलकर सन 1990 में हुए उस सामूहिक नरसंहार की जानकारी जुटाई। इस दौरान हमें नरसंहार में मुन्नन खाँ नाम के नेता के शामिल होने की जानकारी मिली। इस दौरान उन कारसेवकों की भी हत्या किए जाने की जानकारी मिली जो कि विवादित ढाँचे से काफी दूर थे।

सांसद मुन्नन खाँ को किसने दिया था नरसंहार का अधिकार ?

सन 1990 में अयोध्या में तैनात रहे एक पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया से बात की। अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर उस पूर्व पुलिस अधिकारी ने बताया कि साल 1990 में उन्हें जानकारी मिली थी कि बलरामपुर जिले का सांसद मुन्नन खाँ अपने साथियों के साथ कारसेवकों पर हमला करने वालों में शामिल था। मुन्नन खाँ का पूरा नाम ‘फसी उर रहमान’ था।

इस पूर्व अधिकारी ने हमें बताया कि कारसेवकों पर मुन्नन खाँ द्वारा किए गए हमले की जानकारी स्थानीय प्रशासन से लेकर शासन तक थी। हालाँकि, तब की राजनीति में उसका कद इतना बड़ा था कि उस पर कार्रवाई होना तो दूर की बात थी, उसका नाम भी सामने नहीं आया। घटना के चश्मदीद रुदौली के कुछ जीवित बचे कारसेवकों ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में मुन्नन खाँ का नाम लिया।

इन कारसेवकों ने बताया कि मुन्नन खाँ अपने साथियों के साथ एक बस में पुलिस की वर्दी पहनकर घूम रहा था। वह सड़क से पैदल जा रहे कारसेवकों से कहता था, “आओ बस में बैठ जाओ। चलो तुम्हें अयोध्या का प्रसाद दिला दें।” जहाँ कारसेवकों को पैदल चलने पर भी पकड़ लिया जा रहा था, वहाँ मुन्नन खाँ को नकली पुलिस बन बस लेकर घूमने की छूट कैसे मिली, ये किसी भी कारसेवक को नहीं पता।

बलिदानी कारसेवक राम अचल गुप्ता के बेटे संजय और राम बहादुर वर्मा के पुत्र काली सहाय ने भी कारसेवकों के नरसंहार में सांसद मुन्नन खांँ को सीधे तौर पर शामिल बताया। कुछ स्थानीय निवासियों का कहना है कि मुन्नन खाँ ने अपने साथियों सहित कारसेवकों पर न सिर्फ बमबारी की थी, बल्कि पुलिस बनकर कई रामभक्तों को बस में बैठाकर कहाँ ले गया ये आज तक किसी को पता नहीं है।

मुन्नन खाँ साल 1985 से 1989 तक गोंडा जिले के अंतर्गत आने वाले कटरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक था। इसके बाद वह साल 1989 से साल 1991 तक बलरामपुर जिले से सांसद रहा। मुन्नन खाँ को कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं का करीबी माना जाता था। गोंडा जिले के एक चौराहे का नाम भी मुन्नन खाँ के नाम पर रखा गया है। साल 2009 में मुन्नन खाँ की मौत हो गई।

स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान से आहत बलिदानी कारसेवकों के परिजन यह जानना चाहते हैं कि मुन्नन खाँ द्वारा कारसेवकों की हत्या समाजवादी पार्टी के समर्थकों द्वारा किस रूप में कानून सम्मत है? मुन्नन खाँ के काले कारनामों और आपराधिक इतिहास के साथ उसके बेहद शातिर दिमाग के बारे में हम जल्द ही अपनी दूसरी रिपोर्ट में बताएँगे।

जो ढाँचे से काफी दूर थे, उनकी भी हत्या

गोंडा जिले के निवासी शिवदयाल मिश्रा नाम के एक कारसेवक ने ऑपइंडिया से बात की। सन 1990 की कारसेवा में उनके पैर में 2 गोली लगी थी। उन्होंने हमें बताया कि जिस जगह उन्हें गोली मारी गई थी, वह गोंडा जिले की सीमा थी। यह जगह ढाँचे से काफी दूर है। उन्होंने उस दौरान पुलिस की गोलीबारी से डरकर अस्थाई कैम्पों में सरकारी आदेश पर जो डॉक्टर बैठे थे, वे भी कैम्प छोड़ कर भाग गए थे।

बलिदानी कारसेवक महावीर प्रसाद अग्रवाल के बेटे अभिषेक ने पहले अपने पिता की हत्या और बाद में उस पर आए मुलायम सिंह यादव के बयान से खुद को बेहद आहत बताया। अभिषेक का कहना है कि 2 नवंबर 1990 को उनके पिता को गोली कारसेवकपुरम के पास मारी गई थी, जो कि विवादित ढाँचे से काफी दूर है।

वहीं बलिदानी रमेश पांडेय के बेटे सुरेश ने ऑपइंडिया को बताया कि उनके पिता को गोली शहीद गली के पास मारी गई थी। शहीद गली वो जगह है, जहाँ कई रामभक्तों का नरसंहार हुआ था। यह जगह भी विवादित ढाँचे से काफी दूर है और बीच में हनुमानगढ़ी पड़ता है।

बलिदानी राम अचल गुप्ता के बेटे संजय ने ऑपइंडिया को बताया कि 2 नवंबर 1990 को उनके पिता को विवादित ढाँचे से काफी दूर अयोध्या कोतवाली के आगे गोली मारी गई थी। उनके भाई रामतेज उस समय कारसेवा में मौजूद थे। वो सन 1990 में हुए नरसंहार के चश्मदीद जीवित गवाह हैं। रामतेज ने बताया कि गोलीबारी के दौरान सभी कारसेवक एक जगह बैठकर भगवान राम का भजन गा रहे थे।

निहत्थे कारसेवकों पर हेलीकॉप्टर से भी चली थीं गोलियाँ

ऑपइंडिया को अयोध्या के स्थानीय बुजुर्गों ने भी बताया कि सन 1990 में कारसेवक निहत्थे ही आए थे। अयोध्या जिले में रुदौली क्षेत्र के कारसेवक रघुवर सिंह का दावा है कि 2 नवंबर 1990 को तो उन सभी को जन्मभूमि का दर्शन करवाने के लिए जमा किया गया था और फिर गोलियाँ बरसा दी गई थीं। 30 अक्टूबर 1990 को एक हेलीकॉप्टर विवादित ढाँचे के 10 किलोमीटर की परिधि में घूम रहा था।

ऑपइंडिया से बात करते हुए बलिदानी कारसेवक वासुदेव गुप्ता की बेटी सीमा गुप्ता ने कहा कि उनके पिता और अन्य रामभक्तों को मारने का इशारा हेलीकॉप्टर से किया गया था। तब आसमान में उड़ता एक हेलीकॉप्टर हरे रंग की बत्ती जलाकर पूरे अयोध्या में घूम रहा था। जिस जगह पर हेलीकॉप्टर नीचे की तरफ उड़ान भरता और उसकी बत्ती लाल हो जाती, वहीं पुलिस गोलियाँ चलानी शुरू कर देती। 30

एक अन्य बलिदानी राम सेवक वर्मा के बेटे काली सहाय ने हमें बताया कि हेलीकॉप्टर की लाल बत्ती का संकेत मिलते ही ना सिर्फ जवान गोलियाँ चला रहे थे, बल्कि हेलीकॉप्टर से भी कुछ हथियारबंद लोग गोलियाँ चला रहे थे। बकौल काली सहाय वर्मा, उनके पिता के शरीर में तिरछे एंगल से छर्रे घुसे थे। काली सहाय को आशंका है कि उनके पिता को ये गोलियाँ हेलीकॉप्टर से मारी गई थीं।

गोलियाँ बरसाने वाली टीम के लीडर मोहम्मद उस्मान और जेएस भुल्लर

अयोध्या में रहने वाले तमाम बुजुर्गों और बलिदानी कारसेवकों को आज भी मोहम्मद उस्मान और सरदार जेएस भुल्लर के नाम याद हैं। ये दोनों अधिकारी पैरामिलिट्री के थे। जेएस भुल्लर अपनी टीम सहित अयोध्या के महाराजा इंटर कॉलेज में कैम्प करता था। सन 1990 में दिखाई गई क्रूरता के चलते स्थानीय निवासियों को महाराजा इंटर कॉलेज की वो जगह भी याद है, जहाँ भुल्लर नहाया करता था।

एक स्थानीय निवासी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर भुल्लर से जुड़ी एक घटना बताई। उस व्यक्ति ने कहा, “30 अक्टूबर 1990 में लखनऊ से गोली चलाने का आदेश लेकर हेलीकॉप्टर आया। तब अयोध्या में तैनात UP पुलिस के जवानों के हाथ काँपने लगे। पुलिस के जवान कारसेवकों पर गोली नहीं चलाना चाहते थे। वो हवा में गोलियाँ चला रहे थे।”

उस व्यक्ति ने आगे बताया कि हवा में गोली चलाते देखकर जेएस भुल्लर पुलिस के इन जवानों के पास आया और डाँटने लगा। जेएस भुल्लर ने सामने से गुजर रहे एक रामभक्त के सिर को निशाना बनाकर गोली मारी। गोली लगते ही रामभक्त गिर गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। तब भुल्लर ने हँसते हुए कहा कि ‘ऐसे चलाई जाती है गोली’।

वहीं, गोलियाँ बरसा रही दूसरी टीम को मोहम्मद उस्मान लीड कर रहा था। उस्मान CRPF में डिप्टी कमांडेंट रैंक पर तैनात बताया जाता है। शहीद गली और दिगंबर अखाड़े के पास हुए कारसेवकों के सामूहिक नरसंहार के दौरान उस्मान और उसकी टीम की ही मौजूदगी बताई जाती है। इस दौरान इन सभी ने रामभक्तों के पैरों के बजाय सीधे सिर और सीने में गोलियाँ मारी थीं।

अयोध्या के बुजुर्ग तिब्बती पुलिस का नाम बहुत लेते हैं। असल में वो तिब्बती पुलिस ITBP की बटालियन बताई जा रही है। इसे तब अयोध्या में तैनात किया गया था। ऑपइंडिया से बात करने वाले सन 1990 में अयोध्या में तैनात पुलिस अधिकारी ने भी बताया कि UP पुलिस ने कारसेवकों पर गोलियाँ नहीं चलाई थीं।

इस पूर्व अधिकारी ने कहा कि गोलियाँ चलाने के लिए बाहर से फ़ोर्स बुलाई गई थी। अयोध्या नरसंहार के बाद स्थानीय जिलों में एक कविता भी चर्चित हुई थी। इस कविता के बोल थे, “काँप धरती उठी आसमाँ रो पड़ा, जब अयोध्या में गोली चलाई गई।” इसी कविता में आगे पढ़ा जाता था, “जब UP की सेना ने इनकार की तो तिब्बत से सेना बुलाई गई।”

अब गाय का मांस बेचेंगे फेसबुक वाले जुकरबर्ग? ड्राई फ्रूट्स और बियर खिला-पिलाकर करेंगे तैयार, मुस्लिम यूजर बोला- हलाल से आएगा स्वाद

मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने बीफ खाने के लिए गायों को पालना शुरू किया है। हाल में उन्होंने इसकी जानकारी अपने सोशल मीडिया पोस्ट में दी। पोस्ट देख कयास लगने लगे कि शायद ये उनका नया बिजनेस प्लान हो क्योंकि उन्होंने दावा किया है कि उनका मकसद दुनिया का सबसे बेहतर बीफ बनाना है।

उन्होंने बताया कि उन्होंने हवाई द्वीप के ‘काउआई आइलैंड’ हिस्से में अपना फार्म खोला है, जिसका नाम ‘कोलाऊ रैंच’ है। यहाँ वह जापानी और स्कॉटिश नस्लों के गायें पाल रहे हैं। इन्हें खाने में बीयर और मैकाडामिया मेवे वाला भोजन दिया जाता है।

9 जनवरी 2024 को लिखे अपने पोस्ट में उन्होंने कहा, “मेरा मकसद दुनिया में सबसे उच्च गुणवत्ता वाला गोमांस बनाना है। मवेशी वाग्यू और एंगस हैं और ये मैकाडामिया मील खाकर और बीयर पीते हुए बड़े होंगे। इसे हम यहाँ खेत में उगाते और पैदा करते हैं। हम चाहते हैं कि पूरी प्रक्रिया स्थानीय और पूरी तरह से एक हो।”

उन्होंने आगे कहा, “हर गाय हर साल 5000-10000 पाउंड भोजन खाती है इसके लिए कई एकड़ में मैकाडामिया के पेड़ लगाने होंगे। मेरी बेटियाँ मैक के पेड़ लगाने और हमारे कई जानवरों की देखभाल में मदद करती हैं। हम अभी भी सफर के शुरुआती दौर में हैं और हर सीज़न में इसमें सुधार करना मज़ेदार है। मेरे सभी प्रोजेक्ट में ये सबसे स्वादिष्ट है।”

जुकरबर्ग ने बताया है कि उनका ये खेत तैयार होने की प्रकिया पहले चरण में है। ये उनका फैमिली प्रोजेक्ट है। उनकी बेटियों ने 1400 एकड़ में फैले खेत पर कई मैकाडामिया पेड़ लगाए हैं।

बताते चलें कि मैकाडामिया एक तरह का मेवा पैदा करता है जिसे मार्क गायों को खिलाएँगे और फिर उन्हीं गायों का बीफ बनाएँगे।

पेटा ने दी मार्क जुकरबर्ग को नसीहत- टेक्नॉलजी पर ध्यान दो

मार्क के इस पोस्ट के बाद उनके पोस्ट पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं हैं। पेटा ने इस पोस्ट को देख लिखा- “तुम टेक्नॉलजी से ही जुड़े रहो। ये प्रोजेक्ट जानवरों को मार रहा है और आपके बच्चों को भी सदमा देगा। करने के लिए कई अन्य प्रोडक्टिव काम है। जैसे नए शाकाहारी खाद्य पदार्थ बनाना जो जानवरों को बचाते हैं, ग्रह की मदद करते हैं और मानव स्वास्थ्य में सुधार करते हैं।

जुकरबर्ग के इस पोस्ट को देखने के बाद कई भारतीयों ने मेटा को बॉयकॉट करने की बात कही।

वहीं कुछ यूजर थे जिन्हें ये पोस्ट देख बहुत आनंद आया। एक मुस्लिम यूजर ने उन्हें कहा, “इसे हलाल सर्टिफाइड रखना, तो ज्यादा स्वादिष्ट होगा”

वहीं कुछ लोगों ने जुकरबर्ग के इस ऐलान पर कहा कि वह ऐसे लोगों का मखौल उड़ा रहे हैं जो अपनी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं या फिर वेजिटेरियन हैं। यूजर्स ने उन्हें कहा कि वो ये काम छोड़कर कुछ और कर लें क्योंकि गायों को मारना ठीक नहीं है। भारत में इनकी पूजा होती है।

‘लाल कृष्ण आडवाणी का आना जरूरी, सब चाहते हैं वे आएँ’: रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साक्षी बनेंगे ‘रामरथी’, 22 जनवरी को अयोध्या में होंगे

22 जनवरी 2024 को अयोध्या के भव्य राम मंदिर में भगवान रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा होगी। बीजेपी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवाणी भी इस अवसर के साक्षी बनेंगे। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने दी है।

आडवाणी 96 वर्ष के हैं। ऐसे में शुरुआत में उम्र के कारण उनके इस समारोह में शामिल होने को लेकर संशय था। उल्लेखनीय है कि आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा के जरिए राम मंदिर आंदोलन को घर-घर पहुँचा दिया था।

आलोक कुमार के अनुसार आडवाणी के परिवार को आश्वस्त किया गया है कि इस दौरान उन्हें सभी जरूरी मेडिकल सुविधाएँ मुहैया कराई जाएँगी। विहिप नेता ने कहा है कि लालकृष्ण आडवाणी का इस कार्यक्रम में आना महत्वपूर्ण है। सब उनकी उपस्थिति चाहते थे। इसके लिए जो भी आवश्यकता होगी वो सारी व्यवस्थाएँ की जाएँगी।

19 दिसंबर 2023 को विहिप और संघ के नेताओं ने आडवाणी को उनके घर पहुँचकर न्योता दिया था। आलोक कुमार ने बताया है कि इस दौरान भी इस बात पर चर्चा हुई थी कि यदि आडवाणी अयोध्या आते हैं तो क्या-क्या व्यवस्था करने की आवश्यकता होगी। वीएचपी नेता कहा है, “हमको प्रसन्नता है कि 96 वर्ष की आयु में और अपने स्वास्थ्य के ठीक न होने के बावजूद उन्होंने आना स्वीकार किया है।”

वहीं लाल कृष्ण आडवाणी ने इस अवसर पर उ​पस्थिति को सौभाग्य का योग बताया है। उन्होंने कहा है, ” यह बड़ा सौभाग्य का योग है कि ऐसे भव्य प्रसंग पर प्रत्यक्ष उपस्थिति का अवसर मिला है। श्रीराम का मंदिर यह केवल एक पूजा की दृष्टि से अपने आराध्य का मंदिर, केवल ऐसा प्रसंग नहीं है। इस देश की पवित्रता और इस देश की मर्यादा की स्थापना पक्की होने का यह प्रसंग है।”

उन्होंने कहा, “हम प्रत्यक्ष वहाँ उपस्थित रहेंगे, उस प्रसंग को देखेंगे, उसमें सहयोगी बनेंगे। यह कहीं किसी जन्म में पुण्य हुआ होगा उसी का फल हमको मिल रहा है। ये तो माँग के भी न मिलने वाला अवसर है, वो मिला है। जरूर उसमें रहूँगा।” गौरतलब है कि प्राण-प्रतिष्ठा से एक हफ्ते पहले 16 जनवरी से अयोध्या में अनुष्ठान शुरू हो जाएँगे।

180 में केवल 37 मुस्लिम, फिर अल्पसंख्यक संस्थान कैसे: सुप्रीम कोर्ट का AMU से सवाल, बचाव में बोले कपिल सिब्बल- इनकी हालत SC से भी बदतर

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सवाल खड़े हुए हैं। केंद्र ने कहा है कि एएमयू कभी अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हो सकता क्योंकि ये किसी विशेष मजहब या मजहबी संप्रदाय का विश्वविद्यालय नहीं है। इसे राष्ट्रीय महत्व वाला संस्थान घोषित किया गया है। वहीं एएमयू का कहना है कि सिर्फ इसलिए कि संस्थान में सरकार की दखल है इसके कारण यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्ज नहीं छीना जा सकता।

केंद्र ने उठाया मुद्दा

केंद्र की ओर से इस मामले में एएमयू सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर अपनी लिखित दलील में कहा कि विश्वविद्यालय हमेशा से राष्ट्रीय महत्व का संस्थान रहा है, यहाँ तक कि आजादी के पहले से भी। यूनिवर्सिटी की स्थापना 1875 में हुई थी।

केंद्र ने कहा कि जिस संस्थान को राष्ट्रीय महत्व मिला है वो गैर अल्पसंख्यक ही होना चाहिए। केंद्र ने बताया कि राष्ट्रीय महत्व वाला संस्थान होने के बावजूद भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एडमिशन प्रोसिजर अलग हैं।

सुप्रीम कोर्ट का सवाल

केंद्र की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यों वाली पीठ ने यूनिवर्सिटी से पूछा है जब विश्वविद्यालय के 180 सदस्यों में 37 ही मुस्लिम हैं तो फिर ये संस्थान अल्पसंख्यक संस्थान कैसे हुआ। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश शर्मा ने विश्वविद्यालय से कहा कि वह अब यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा क्यों दिया जाए इस बात को साबित करें।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का पक्ष

विश्वविद्यालय की ओर से इस मामले की पैरवी राजीव धवन ने की। उन्होंने कहा कि संविधान के आर्टिकल 30 (1) के तहत, सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और प्रशासित करने का अधिकार है। उन्होंने यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्ज को बनाए रखने के लिए दलील दी कि 1875 में मुहम्मदम एंगो-ओरिएंटल कॉलेज ने स्थापना की थी, जो 1920 में एएमयू बन गया।

सीजेआई ने इस दौरान सवाल किया कि क्या प्रशासन के 180 सदस्यों में से 37 के मुस्लिम होने से ये दावा कमजोर नहीं होता। इसपर धवन ने कहा कि संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा दिलाए रखने के लिए बिलकुल जरूरी नहीं है कि सौ फीसद स्टाफ समुदाय द्वारा ही नियंत्रित किया जाए।

धवन ने दलील दी कि स्थापना के बाद से इस यूनिवर्सिटी के सारे वीसी मुस्लिम रहे। इसलिए इसे अल्पसंख्यक द्वारा प्रशासित संस्थान कहा जाएगा। यहाँ बताया गया कि एएमयू की अन्य खासियतें भी इस्लाम से जुड़ी है। ऐसे में सिर्फ इसलिए कि मैनेजमेंट में सरकार का दखल है, इसके अल्पसंख्यक चरित्र को खारिज नहीं किया जा सकता। इस संस्थान को मुस्लिमों के उत्थान के लिए स्थापित किया गया था।

दलितों से बद्तर हैं मुस्लिमों की हालत

वहीं कपिल सिब्बल ने इस मामले पर दलील देते हुए कहा, “मैं ये बताना चाहता हूँ कि शिक्षा के मामले में मुसलमान अनुसूचित जातियों (SC) से भी नीचे हैं। ये तथ्य हैं। हमें पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बनाया गया है और खुद को सशक्त बनाने का एकमात्र तरीका शिक्षा का माध्यम है और अधिकांश लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में अल्पसंख्यक बहुत कम हैं और केवल बहुसंख्यक हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें सशक्त नहीं बनाया गया है।”

दशकों से चल रही AMU पर बहस

गौरतलब है कि एनडीए सरकार ने साल 2016 में ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में उठाया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कोई अल्पसंख्याक संस्थान नहीं है। उन्होंने एस अजीज बाशा केस में कोर्ट के 1967 के फैसले को आधार बनाकर ये दावा किया, जहाँ इस यूनिवर्सिटी को केंद्रीय यूनिवर्सिटी माना गया था। सरकार ने कहा था कि ये केंद्रीय यूनिवर्सिटी है क्योंकि इसे फंड सरकार से मिलता है। इसके बाद इस मामले पर 7 जजों की पीठ ने सुनवाई की जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने की।

‘अजमेर की मस्जिद में फिर से गूँजेंगे मंत्र’: अब ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ की बारी, संस्कृत कॉलेज और मंदिर को इस्लामी आक्रांताओं ने किया था ध्वस्त

अजमेर की ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ मस्जिद को फिर से देवालय बनाने की माँग ने जोर पकड़ लिया है। बीजेपी सांसद रामचरण बोहरा ने कहा है कि जल्द ही इस जगह पर फिर से संस्कृत के मंत्र गूँजेंगे। उन्होंने इस जगह को मूल स्वरूप में लाने के लिए केंद्रीय संस्कृति, पर्यटन व पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री जी किशन रेड्डी जी को पत्र भी लिखा है।

इस्लामी आक्रांताओं ने सैकड़ों हिंदू देवस्थानों को ध्वस्त कर उन पर मस्जिदें खड़ी कर दी थी। इनमें से एक ढाई दिन का झोपड़ा भी है। आज जिसे ‘ढाई दिन का झोपड़ा‘ कहा जाता है, वह मूल रूप से विशालकाय संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कंठभरन महाविद्यालय) हुआ करता था। यह ज्ञान और बुद्धि की हिंदू देवी माता सरस्वती को समर्पित मंदिर था।

1192 ई. में, मुहम्मद गोरी ने महाराजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर अजमेर पर अधिकार कर लिया था। उसने अपने गुलाम सेनापति कुतुब-उद-दीन-ऐबक को शहर में मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। ऐसा कहा जाता है कि उसने ऐबक को 60 घंटे के भीतर मंदिर स्थल पर मस्जिद के एक नमाज सेक्शन का निर्माण करने का आदेश दिया था ताकि वह नमाज अदा कर सके। चूँकि, इसका निर्माण ढाई दिन में हुआ था, इसीलिए इसे ‘अढाई दिन का झोपड़ा’ नाम दिया गया।

इस मस्जिद को दोबारा मूल स्वरूप में लाने की मांग ने ऐसे समय में जोर पकड़ा है, जब अयोध्या में भगवान रामलला की 22 जनवरी 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा होनी है। अयोध्या में भी रामजन्भूमि पर बाबर के नाम से इस्लामी आक्रांताओं ने ढाँचा खड़ा कर दिया था। करीब 500 साल के संघर्ष के बाद इस जगह पर अब भव्य राम मंदिर आकार ले रहा है।

जयपुर के सांसद रामचरण बोहरा ने केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी को लिखे पत्र में कहा है, “ढाई दिन का झोपड़ा जो कि 12वीं सदी में महाराज विग्रहराज चौहान द्वारा देवालय और संस्कृत शिक्षण केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था, उसे 1294 ई. में मोहम्मद गौरी के कहने पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने तोड़ दिया था। यह केंद्र वेद पुराणों का प्रसारक होने के साथ ही संस्कृति शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।”

पत्र में उन्होंने लिखा है, “दासता का यह चिह्न आज भी भारतीय समाज के लिए कलंक है। अत: इसे मूल स्वरूप में परिवर्तित करने के लिए यह पत्र आपके विचारार्थ प्रस्तुत है। इससे महाराज विग्रहराज के लोकोत्तर व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही पुरातन एवं महात्वपूर्ण संस्कृत शिक्षण केंद्र पुन: स्थापित हो सकेगा, जोकि सनातन धर्म के संरक्षण एवं विस्तार में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।”‘

बोहरा ने यह पत्र 9 जनवरी 2024 को लिखा है। इस ठीक एक दिन पहले उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय के 78वें दीक्षांत समारोह के दौरान अपने संबोधन में भी इसका जिक्र किया था। उन्होंने कहा था, “ढाई दिन के झोपड़ा को बनाने के लिए वहाँ मौजूद संस्कृत विद्यालय को तोड़ दिया गया। अब बो दिन दूर नहीं जब एक बार फिर से यहाँ संस्कृत भाषा में लिखे मंत्र गूँजेंगे।” इस दौरान मंच पर राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र भी मौजूद थे।

बता दें कि ये ढ़ाई दिन का झोपड़ा, मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से महज 500 मीटर की दूरी पर है। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग की तरफ से संरक्षित किया गया है। इसमें स्थित मस्जिद की देखरेख राजस्थान मुस्लिम वक्फ बोर्ड करता है। ढाई दिन के झोपड़ा पर ऑपइंडिया का विस्तृत लेख आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

‘मालदीव में मत करो फिल्म शूटिंग, भारत में स्थान खोजो’: FWICE ने दिखाई देश के साथ एकजुटता, पर्यटन को बढ़ावा देने की अपील

मालदीव के मंत्रियों द्वारा भारत पर आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने के कारण उपजा बवाल अब मालदीव पर भारी पड़ गया। बड़ी-बड़ी हस्तियों और कंपनियों ने तो पहले ही उसे बॉयकॉट करने का निर्णय ले लिया था। लेकिन अब फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एंप्लॉयज (FWICE) ने भी एक प्रेस रिलीज जारी करके मालदीव में शूटिंग करने का विरोध किया है और अपील की है कि भारत में ही स्थान देखकर वहाँ शूट कर लिया जाए।

10 जनवरी 2024 को FWICE ने प्रेस रिलीज जारी कर सभी फिल्म प्रोड्यूसर से मालदीव में अपनी शूटिंग बुकिंग रद्द करने की अपील की। उन्होंने इस रिलीज में निर्माताओं से फिल्म शूटिंग के लिए भारत में समान स्थानों को चुनने और भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने का आग्रह किया।

FWICE ने अपनी रिलीज में बताया कि वो ये फैसला मालदीव के तीन मंत्रियों द्वारा भारत के खिलाफ जारी की गई अपमानजनक टिप्पणी के कारण ले रहे हैं। FWICE ने विश्व स्तर पर सम्मानित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गई ‘गैरजिम्मेदाराना’ और ‘घटिया’ टिप्पणियों की भी निंदा की है।

फ्वाइस ने सभी फिल्म निर्माताओं से शूटिंग के लिए वैकल्पिक स्थान चुनने की अपील करते हुए कहा, “देश और इसकी व्यापक संस्कृति के साथ एकजुटता दिखाते हुए, FWICE के सदस्यों ने अपने शूटिंग स्थानों के लिए मालदीव का बहिष्कार करने का फैसला किया है। इसके बजाय, FWICE अपने सदस्यों से अपने शूटिंग उद्देश्य के लिए भारत में समान स्थानों को चुनने और भारत में पर्यटन के विकास में योगदान देने की अपील करता है।

रिलीज में आगे लिखा गया, “भारत और दुनियाभर के सभी निर्माताओं को सलाह दी जाती है कि वे मालदीव में किसी भी शूटिंग या प्रोडक्शन से जुडी योजनाएँ न बनाएँ। हम सभी अपने प्रधानमंत्री और अपने राष्ट्र के प्रति पुरजोर समर्थन में खड़े हैं।” इस रिलीज पर फ्वाइस के मुख्य सलाकार अशोक पंडित, अध्यक्ष बीएन तिवारी, जनरल सेक्रेट्री अशोक दुबे और कोषाध्यक्ष गंगेश्वर श्रीवास्तव का भी नाम है।

बता दें कि मालदीव विवाद के बाद से अब तक तमाम लोग मालदीव का बॉयकॉट कर चुके हैं। भारत की बड़ी-बड़ी हस्तियाँ जो वहाँ छुट्टियाँ मनाने जाती थीं, वो भी खुलकर भारतीय द्वीपों का प्रचार कर रही हैं। यहाँ तक इजरायल ने भी खुले में भारत को सपोर्ट किया है। दूसरी ओर लगातार मालदीव की फ्लाइट बुकिंग, होटल बुकिंग कैंसिल होने की खबरें हैं।

‘ये आत्मघाती फैसला’: कॉन्ग्रेस ने ठुकराया राम मंदिर का न्योता तो बोले प्रमोद कृष्णम, गुजरात के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने कहा – राम हम सबके आराध्य देव

कॉन्ग्रेस पार्टी ने अयोध्या में निर्माणाधीन भव्य राम मंदिर के गर्भगृह में 22 जनवरी, 2024 को होने वाली भगवान रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए मिला न्योता ठुकरा दिया है। INC के जनरल सेक्रेटरी (कम्युनिकेशंस) जयराम रमेश ने एक बयान जारी कर के आरोप लगाया कि RSS और भाजपा ने राम मंदिर को राजनीतिक परियोजना बना दिया है, साथ ही निर्माण पूरा हुए बिना राम मंदिर का उद्घाटन चुनावी फायदे के लिए किया जा रहा है।

उन्होंने लिखा कि कॉन्ग्रेस की संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का न्योता मिला था, लेकिन ये सभी नेता इस कार्यक्रम में उपस्थिति नहीं दर्ज कराएँगे। अब कॉन्ग्रेस के ही वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के इस कदम का विरोध करना शुरू कर दिया है। संभल स्थित कल्किधाम पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने इस फैसले का विरोध किया है।

उन्होंने कहा कि श्री राम मंदिर के निमंत्रण को ठुकराना बेहद दुर्भाग्य पूर्ण और आत्मघाती फ़ैसला है। उन्होंने कहा कि आज उनका दिल टूट गया। वहीं गुजरात विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष, राज्य में कॉन्ग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, पार्टी के मीडिया पैनलिस्ट एवं पोरबंदर से विधायक अर्जुन मोधवाडिया ने भी इस फैसले का विरोध किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भगवान श्री राम आराध्य देव हैं, यह देशवासियों की आस्था और विश्वास का विषय है।

अर्जुन मोधवाडिया ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी को ऐसे राजनीतिक निर्णय लेने से दूर रहना चाहिए था। जहाँ भारत ही नहीं बल्कि 160 देशों में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर तैयारी चल रही है, ऐसे समय में भारत में यहाँ की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी द्वारा इस तरह का व्यवहार किए जाने से लोग हतप्रभ हैं। अमेरिका में कार रैलियाँ निकल रही है, पेरिस में ‘राम रथ यात्रा’ निकल रही है और इस्लामी मुल्कों में भी आयोजन के लाइव प्रसारण की तैयारी है।

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा है कि कॉन्ग्रेस पार्टी का प्रभु श्री राम विरोधी चेहरा राष्ट्र के सम्मुख प्रस्तुत हो चुका है। इंडी एलायंस ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में बार-बार सनातन धर्म का अनादर किया है। अब उनके नेताओं द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा के पुण्य आमंत्रण को ठुकराना उनके सनातन विरोधी सोच को दर्शाता है। 10,000 से भी अधिक VIP अतिथि राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में पहुँच रहे हैं, जिनमें देश भर के नेता, सेलेब्स और साधु-संत शामिल हैं।

बिट्टू बजरंगी के घर पहुँचे मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, गोरक्षक के भाई को जला दिया गया था जिंदा: एक माह इलाज के बाद हुई थी महेश पांचाल की मौत

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर बुधवार (10 जनवरी 2024) को गौसेवक बिट्टू बजरंगी के घर फरीदाबाद पहुँचे। उन्होंने बिट्टू बजरंगी के भाई महेश पांचाल को कुछ हमलावरों ने ज्वलनशील पदार्थ डालकर जिंदा जला दिया था। करीब एक माह तक जिंदगी के लिए जूझने के बाद पांचाल की दिल्ली के AIIMS में मौत हो गई थी। सीएम खट्टर ने बिट्टू बजरंगी को ढाँढस बंधाया और महेश के हत्यारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया।

सीएम खट्टर ने कहा- हत्यारे बचेंगे नहीं

बिट्टू बजरंगी के घर पहुँचे मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने उनके भाई महेश की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित करके श्रद्धांजलि दी। उन्होंने एक्स पर लिखा, “श्री बिट्टू बजरंगी जी के फरीदाबाद स्थित निवास पर जाकर उनके भाई स्वर्गीय श्री महेश जी के निधन पर आत्मीय संवेदनाएँ प्रकट की। इस दुःख की घड़ी में शोकाकुल परिवारजनों का ढाढ़स बँधाया और ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। ॐ शांति!!”

बताते चलें कि 13 दिसम्बर 2023 को बिट्टू बजरंगी के भाई महेश को जान से मारने का प्रयास किया गया था। हमलावरों ने महेश के ऊपर फरीदाबाद की दाबुआ कॉलोनी में थिनर डाल कर आग लगा दी थी। महेश को अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ से उन्हें दिल्ली रेफर कर दिया गया था। उनका दिल्ली के AIIMS में इलाज चल रहा था। करीब एक माह तक जिंदगी के लिए जूझते रहे महेश की 8 दिसंबर को मौत हो गई थी।

महेश का शव जब फरीदाबाद पहुँचा तो लोग आक्रोशित हो गए थे। आक्रोशित लोगों ने बल्लभगढ़-सोहना रोड को जाम कर दिया और आरोपितों की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की थी। इस दौरान लोगों ने ‘जय श्रीराम’, ‘महेश के हत्यारों को फाँसी दो’, ‘महेश हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’ और ‘मुस्लिम मरे तो लिंचिंग हिंदू मरे तो मौन है, पूछ सको तो पूछ लो ये प्रशासन कौन है’ के नारे लगाए थे।

इस मामले में फेक न्यूज फैला रहा था जुबैर

इसको लेकर फरीदाबाद पुलिस के पास मामला दर्ज करवाया गया था, जिसकी जाँच हरियाणा पुलिस की SIT कर रही है। इसको लेकर 22 दिसम्बर को ‘हिन्दुतान टाइम्स’ में लीना धनखड़ नाम की एक पत्रकार ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। खबर में लिखा था कि फरीदाबाद पुलिस ने कहा है कि बिट्टू बजरंगी के भाई अलाव में गिरकर जले थे। उनकी हत्या के प्रयास के कोई सबूत नहीं हैं।

हालाँकि, ऑपइंडिया से बातचीत में पुलिस ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की इस खबर को नकार दिया था। फरीदाबाद के ACP ने इस खबर के बारे में बताए जाने पर पूछा कि आखिर पुलिस में किसने इस केस को फेक बता दिया? उन्होंने कहा कि ये बात ठीक है कि अभी इस मामले में आरोपित के खिलाफ सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि केस फर्जी होने की बात कही गई है। उन्होंने इसकी पुष्टि की थी कि बिट्टू बजरंगी के भाई जल गए हैं।

इसके बाद बिट्टू बजरंगी अपने भाई की हत्या के प्रयास को झूठा बताकर फेक न्यूज फैलाने के आऱोप में ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी थी। बिट्टू बजरंगी ने कहा था कि जुबैर ने उनके और उनके भाई के बारे में पहले भी अफवाहें फैलाई थी। इस बार उनके झूठी मीडिया रिपोर्ट के आधार पर इस घिनौनी कार्रवाई को अंजाम दिया, जबकि उनका भाई जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था।

रावण ने ठुकराया हश्र हम जानते हैं, कॉन्ग्रेस ने ठुकराया हश्र हम देखेंगे

कॉन्ग्रेस पार्टी का प्रभु श्री राम विरोधी चेहरा राष्ट्र के सम्मुख प्रस्तुत हो चुका है। इंडी एलायंस ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में बार-बार सनातन धर्म का अनादर किया है। अब उनके नेताओं द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा के पुण्य आमंत्रण को ठुकराना उनके सनातन विरोधी सोच को दर्शाता है।

यह कहना है कि मोदी सरकार की मंत्री स्मृति ईरानी का। उनका यह बयान 22 जनवरी 2024 की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण कॉन्ग्रेस की ओर से ठुकराने के बाद आया है।

बौद्धिक जुगाली करने वाले चाहें तो इसे एक कॉन्ग्रेस विरोधी नेता की कुंठा बताकर खारिज कर सकते हैं। लेकिन उन सवालों का क्या जो कॉन्ग्रेस के भीतर से उठ रहे हैं। कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम कॉन्ग्रेस के ही हैं। उन्होंने पार्टी के इस फैसले पर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा है- श्री राम मंदिर के ‘निमंत्रण’ को ठुकराना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और आत्मघाती फैसला है। आज दिल टूट गया।

जुगालीबाजों की पत्तलचाटुकार औलादें पार्टी नेतृत्व के साथ आचार्य प्रमोद कृष्णम के हालिया संबंधों का उल्लेख कर उन्हें ‘नाराज फूफा’ बताकर उनकी चिंताओं को भी खारिज कर सकते हैं। अर्जुन मोढवाडिया गुजरात में कॉन्ग्रेस के विधायक हैं। राज्य के पार्टी अध्यक्ष रह चुके हैं। विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे हैं। पार्टी के प्रवक्ता हैं। उन्होंने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है, “भगवान श्री राम आराध्य देव हैं। यह देशवासियों की आस्था और विश्वास का विषय है। कॉन्ग्रेस को ऐसे राजनीतिक निर्णय लेने से दूर रहना चाहिए था।’

असल में कॉन्ग्रेस का यह फैसला आरोप-प्रत्यारोप वाली सामान्य राजनीतिक शब्दावली तक ही सीमित नहीं है। अपने ही कुछ नेताओं की नाराजगी का जोखिम ही इसमें सिमटा हुआ नहीं है। यह उस पार्टी के लिए खुद की ही कब्र खोदने जैसा है जो पहले ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और अब ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के जरिए भारत की राजनीति में अपने लिए फिर से जमीन बनाने की कोशिश में है। जो पिछले कई सालों से वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। जिसके सामने दो ही विकल्प हैं। पहला, इस संकट से निजात पाने का कोई तरीका तत्काल ढूँढ़ना। दूसरा, इतिहास के पन्नों में समा जाना। ऐसा लगता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी ने अपने लिए दूसरा विकल्प ही चुनकर रखा है।

मोदी सरकार में यह दूसरा मौका है जिसने कॉन्ग्रेस को पुराने पापों से मुक्ति पाने का अवसर प्रदान किया है। लेकिन कॉन्ग्रेस ने दोनों ही मौकों को बढ़-चढ़कर गँवाया है। कॉन्ग्रेस चाहती तो 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर पर जवाहर लाल नेहरू के किए भूलों का पिंडदान कर सकती थी। पर उसने तुष्टिकरण की राजनीति के लिए उस समय भी राष्ट्रहित को दरकिनार कर अपना पिंडदान करने का विकल्प चुना था।

अब रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के निमंत्रण ने कॉन्ग्रेस को अयोध्या पर नेहरू से लेकर सोनिया गाँधी तक किए गए पापों से मुक्ति का एक झटके में अवसर उपलब्ध कराया था। लेकिन उसने राम मंदिर को ‘हिंदुओं का नहीं, RSS/BJP का इवेंट, उनका राजनीतिक प्रोजेक्ट’ बताकर अपने लिए उन्हीं पापों के साथ दफन होने का विकल्प चुना है।

कॉन्ग्रेस ने इस मामले में वैसा ही रवैया दिखाया है, जैसा त्रेता में रावण ने दिखाया था। समुद्र पार कर जब भगवान श्रीराम ने अपनी सेना के साथ लंका के बाहर पड़ाव डाला था, तब उन्होंने भी अंगद को भेजकर रावण को पाप से मुक्ति का अवसर प्रदान किया था। इसी तरह यह जानते हुए भी कि नेहरू अयोध्या से रामलला की मूर्ति को हटवाना चाहते थे, कॉन्ग्रेस की शह पर वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या को लेकर प्रपंच रचे, जिस सरकार को सोनिया गाँधी पर्दे के पीछे से हाँक रही थी उसने कोर्ट में हलफनामा देकर राम के अस्तित्व को नकार दिया था, कॉन्ग्रेस के एक ही नेता ने वकील का चोगा पहनकर रामजन्मभूमि पर फैसले को यह कहकर लटकाने की कोशिश की चुनाव होने हैं, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने फिर भी निमंत्रण भेजकर कॉन्ग्रेस को इस पुण्य क्षण का साक्षी बनने और पाप से मुक्ति का अवसर दिया था।

कॉन्ग्रेस नेताओं को निमंत्रण भेजना राम की मर्यादा का पालन करना है। हिंदुओं ने अपनी ओर से हिंदू घृणा से सनी पार्टी के साथ भी इस मर्यादा का पालन किया। लेकिन कॉन्ग्रेस का अहंकार देखिए, उसने इसमें भी राजनीति दे​खी, ठीक वैसे ही जैसे रावण ने प्रभु श्रीराम में सामान्य वनवासी देखा था।

इस भूल की कीमत रावण ने केवल अपने नाश से ही नहीं चुकाई। अपने बंधु-बांधवों के नाश से ही नहीं चुकाई। इसकी कीमत आज भी रावण हर साल दहन होकर चुकाता है। कॉन्ग्रेस ने भी अपने लिए वही रास्ता चुना है।

गोस्वामी तुलसीदास जानते थे कि अहंकार और सनातन से घृणा करने वाले हर समय में होंगे। इसलिए वे लिखकर गए हैं- सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहहु मुनिनाथ, हानि लाभ जीवन मरन जस अपजस विधि हाथ। विधाता ने रावण को अवसर दिया। कौरवों को भी। आज कॉन्ग्रेस को भी। लेकिन कॉन्ग्रेस ने अपने लिए वही चुना है जो विधाता ने उसके लिए लिख रखा है। हमारी पीढ़ियाँ इनका भी हश्र देखेंगी। फैज के शब्दों में कहें तो लाजिम है कि हम भी देखेंगे।