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नौकरी के बदले जमीन हड़पने का खेल: कोर्ट ने लालू-राबड़ी समेत 41 लोगों पर किए आरोप तय, जानिए कौन सी थीं वो 7 डील जिसने पूरे नेटवर्क की पोल खोली

बिहार की राजनीति में दशकों से अपनी धाक जमाने वाले लालू प्रसाद यादव के परिवार के लिए ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाला एक ऐसा चक्रव्यूह बन गया है, जिससे निकलना उनके लिए अब और भी कठिन होता जा रहा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार समेत 41 लोगों पर आरोप तय कर दिए हैं। कोर्ट ने माना है कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता का दुरुपयोग कर चलाया गया एक संगठित नेटवर्क था।

एक संगठित आपराधिक नेटवर्क का उदय

यह कहानी शुरू होती है साल 2004 में, जब देश में यूपीए-1 की सरकार बनी और लालू प्रसाद यादव को रेल मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। 2004 से 2009 के अपने इस पाँच साल के कार्यकाल के दौरान लालू यादव ने रेलवे के विकास के कई दावे किए, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल चल रहा था। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी की कि यह मामला पहली नजर में किसी साधारण भ्रष्टाचार जैसा नहीं, बल्कि एक ‘संगठित आपराधिक नेटवर्क‘ जैसा दिखाई देता है।

अदालत का मानना है कि सत्ता, पद और प्रभाव का ऐसा दुरुपयोग कम ही देखने को मिलता है, जहाँ सरकारी नियुक्तियों को एक निजी सौदेबाजी की वस्तु बना दिया गया। कोर्ट ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनकी बेटियों मीसा भारती और हेमा यादव, और उनके बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप यादव समेत कुल 41 आरोपितों के खिलाफ आरोप (Charges) तय कर दिए हैं। यह एक ऐसा पड़ाव है जहाँ से अब लालू परिवार को कोर्ट में लंबे ट्रायल का सामना करना होगा।

नौकरी के बदले जमीन: सरकारी पद का निजी इस्तेमाल

जाँच एजेंसियों (CBI और ED) का दावा है कि लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए एक बेहद शातिर तरीका अपनाया। रेलवे में ग्रुप-डी (चतुर्थ श्रेणी) की नौकरियों के लिए कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया, न ही कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बजाय, उन लोगों को चुना गया जो नौकरी के बदले अपनी जमीन लालू परिवार के नाम करने को तैयार थे।

इस घोटाले का पैमाना इतना बड़ा है कि लालू परिवार ने इसके जरिए बिहार के पटना जैसे महत्वपूर्ण इलाकों में 1 लाख स्क्वायर फीट से ज्यादा जमीन अपने कब्जे में ले ली। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन बेशकीमती जमीनों के लिए जो कागजी भुगतान दिखाया गया, वह महज 26 लाख रुपए था। जबकि सीबीआई के मुताबिक, उस समय के सरकारी सर्कल रेट के हिसाब से भी इनकी कीमत 4.39 करोड़ रुपए से ज्यादा थी। अगर बाजार भाव की बात करें, तो यह कीमत सर्कल रेट से भी चार से छह गुना ज्यादा थी। यानी करोड़ों की संपत्ति को सिर्फ कुछ लाख रुपए में, और कई बार तो ‘गिफ्ट’ के नाम पर हथिया लिया गया।

बिना विज्ञापन और अधूरे आवेदनों पर मेहरबानी

जाँच में यह बात भी सामने आई कि नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ाई गईं। आमतौर पर सरकारी नौकरियों के लिए विज्ञापन जारी किए जाते हैं, परीक्षाएँ होती हैं और इंटरव्यू होते हैं, लेकिन यहाँ मामला उल्टा था। उम्मीदवारों ने मुंबई, जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर जैसे रेलवे जोनों के लिए आवेदन दिए।

कई मामलों में तो आवेदन मिलने के महज तीन दिन के भीतर ही नौकरी को मंजूरी दे दी गई। आश्चर्य की बात यह है कि कई उम्मीदवारों के आवेदन फॉर्म अधूरे थे, उनके पते तक साफ नहीं थे, फिर भी उन्हें रेलवे में ‘नियुक्त’ कर दिया गया। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उनके परिवार की जमीन की रजिस्ट्री लालू परिवार के किसी न किसी सदस्य के नाम हो चुकी थी।

7 बड़ी डील्स: जिनसे खुला भ्रष्टाचार का पूरा काला चिट्ठा

सीबीआई ने इस पूरे घोटाले को साबित करने के लिए सात प्रमुख डील्स का हवाला दिया है।

डील-1 (किशुन देव राय और राबड़ी देवी): 6 फरवरी 2008 को पटना के रहने वाले किशुन देव राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट की जमीन राबड़ी देवी को सिर्फ 3.75 लाख रुपए में बेच दी। इस रजिस्ट्री के होते ही उसी साल किशुन देव राय के परिवार के तीन सदस्यों ‘राज कुमार सिंह, मिथिलेश कुमार और अजय कुमार’ को मध्य रेलवे मुंबई में नौकरी दे दी गई।

डील-2 (संजय राय और राबड़ी देवी): फरवरी 2008 में ही पटना के महुआबाग के संजय राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट जमीन फिर से राबड़ी देवी के नाम कर दी। कीमत वही 3.75 लाख रुपए रखी गई। इस जमीन के ‘सौदे’ के बदले संजय राय के परिवार के दो सदस्यों को रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी मिल गई।

डील-3 (किरण देवी और मीसा भारती): नवंबर 2007 का मामला और भी बड़ा था। किरण देवी ने अपनी 80,905 वर्ग फीट की विशाल जमीन महज 3.70 लाख रुपए में लालू की बेटी मीसा भारती के नाम कर दी। इसके ठीक बाद 2008 में उनके बेटे अभिषेक कुमार को मुंबई सेंट्रल रेलवे में नियुक्त कर दिया गया।

डील-4 (हजारी राय और एके इन्फोसिस्टम): फरवरी 2007 में हजारी राय ने अपनी 9,527 स्क्वायर फीट जमीन ‘एके इन्फोसिस्टम प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी को बेची। इसके बदले उनके भतीजों दिलचंद कुमार और प्रेम चंद कुमार को रेलवे में नौकरी मिली। दिलचस्प बात यह है कि 2014 में इस पूरी कंपनी का मालिकाना हक और नियंत्रण राबड़ी देवी और मीसा भारती ने अपने हाथ में ले लिया, जिससे जमीन सीधे उनके पास आ गई।

डील-5 (लाल बाबू राय और राबड़ी देवी): पटना के लाल बाबू राय के बेटे लाल चंद कुमार को 2006 में जयपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। इसकी ‘फीस’ के तौर पर मई 2015 में लाल बाबू राय ने अपनी 1,360 वर्ग फीट जमीन 13 लाख रुपए में राबड़ी देवी के नाम कर दी।

डील-6 (बृज नंदन राय, हृदयानंद चौधरी और हेमा यादव): इस डील में एक बिचौलिए का इस्तेमाल दिखा। 2008 में बृज नंदन राय ने अपनी जमीन हृदयानंद चौधरी को बेची। हृदयानंद वही व्यक्ति थे जिन्हें 2005 में हाजीपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। 2014 में हृदयानंद ने यह जमीन एक ‘गिफ्ट डीड’ के जरिए लालू की दूसरी बेटी हेमा यादव को दान (Gift) कर दी।

डील-7 (विशुन देव राय, ललन चौधरी और हेमा यादव): यहाँ भी वही तरीका अपनाया गया। विशुन देव राय ने अपनी जमीन ललन चौधरी को दी। ललन के पोते पिंटू कुमार को 2008 में मुंबई रेलवे में नौकरी मिली। बाद में 2014 में ललन चौधरी ने वह जमीन हेमा यादव को ट्रांसफर कर दी।

नाबालिग बच्चों के नाम पर संपत्ति का खेल

CBI की चार्जशीट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव को लेकर है। 14 जून 2005 की एक डील का जिक्र है, जहाँ एक पिता ने अपने बेटे को नौकरी दिलाने के बदले महज 5,700 रुपए (पाँच हजार सात सौ) में दो कीमती जमीनें राबड़ी देवी के संरक्षण में तेजस्वी और तेज प्रताप के नाम कर दीं।

उस समय ये दोनों भाई नाबालिग थे। जाँच एजेंसी का कहना है कि यह इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचार की योजना कितनी पहले से और कितनी गहराई तक तैयार की गई थी कि बच्चों के भविष्य के नाम पर तब से ही संपत्तियाँ बटोरना शुरू कर दिया गया था।

कानूनी कार्रवाई का सफर: 2022 से 2026 तक

इस घोटाले पर कानूनी शिकंजा 2022 में कसना शुरू हुआ, जब CBI ने लालू परिवार के खिलाफ एक नई FIR दर्ज की और दिल्ली-बिहार के 17 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की। इसके बाद ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से भी जाँच शुरू की।

मई 2025 तक आते-आते CBI ने पुख्ता सबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल की, जिसमें लालू यादव को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। 24 अगस्त को हुई छापेमारी के बाद जाँच एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि नौकरी पाने वाले कई उम्मीदवार अयोग्य थे और उन्होंने फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया था।

राजनीतिक भविष्य पर मंडराते बादल

राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने का मतलब है कि अब यह मामला ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) सही पाया गया है और अब गवाहों के बयान और जिरह शुरू होगी। लालू प्रसाद यादव पहले से ही चारा घोटाले के कई मामलों में सजायाफ्ता हैं और खराब स्वास्थ्य के चलते जमानत पर हैं। अब उनके साथ उनके दोनों बेटों (तेजस्वी और तेज प्रताप) और बेटियों पर भी जेल जाने की तलवार लटक रही है।

कोर्ट की टिप्पणियों ने यह साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में जब पद का इस्तेमाल ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ बनाने के लिए किया जाता है, तो कानून की नजरों से बचना नामुमकिन होता है। अब सबकी नजरें कोर्ट के ट्रायल पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि बिहार का यह शक्तिशाली राजनीतिक परिवार इस कानूनी भंवर से निकल पाएगा या नहीं।

‘UK यूनिवर्सिटीज में पल रहा कट्टरपंथ, हमारे बच्चे नहीं पढ़ेंगे वहाँ’: जानिए क्या है ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जिसे ब्रिटेन में बैन कराना चाहता है UAE, सुनवाई न होने पर छात्रों की स्कॉलरशिप रद्द की

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने युवाओं के बीच इस्लामी कट्टरपंथ को रोकने के मकसद से एक बड़ा कदम उठाया है। यूएई ने ब्रिटेन (UK) में पढ़ाई करने के इच्छुक अपने नागरिकों को दी जाने वाली फंडिंग में भारी कटौती कर दी है। यूएई का यह फैसला उस समय आया है जब ब्रिटेन ने इस्लामी आतंकवादी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया।

ब्रिटेन (UK) के साथ बिगड़ते संबंधों के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ब्रिटिश संस्थानों को उन ग्लोबल यूनिवर्सिटीज की लिस्ट से बाहर कर दिया है, जिनके लिए स्कॉलरशिप और डिग्री सर्टिफिकेशन की अनुमति दी जाती थी। ‘फाइनांशियल टाइम्स’ (FT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अबू धाबी का यह कड़ा कदम उन चिंताओं से उपजा है कि ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में इस्लामी कट्टरपंथ का गंभीर खतरा बढ़ रहा है।

‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, जब ब्रिटिश अधिकारियों ने यूएई से विदेशी विश्वविद्यालयों की संशोधित सूची में से अपने संस्थानों के नाम गायब होने पर सवाल किया, तो यूएई के अधिकारियों ने पुष्टि की कि यह कटौती जानबूझकर की गई है। इस चर्चा की जानकारी रखने वाले एक सूत्र के हवाले से बताया गया कि यूएई प्रशासन नहीं चाहता कि उनके बच्चे ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में जाकर कट्टरपंथ का शिकार हों।

आँकड़ों से पता चलता है कि शैक्षणिक वर्ष 2023-24 के दौरान ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज में ‘इस्लामी कट्टरपंथ’ के लक्षण दिखने की वजह से 70 छात्रों के नाम ‘प्रिवेंट डी-रेडिकलाइजेशन प्रोग्राम’ (कट्टरपंथ विरोधी कार्यक्रम) के पास भेजे गए थे। हालाँकि, ब्रिटेन में पढ़ने वाले कुल 30 लाख छात्रों की तुलना में यह संख्या बहुत छोटी है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह आँकड़ा लगभग दोगुना हो गया है।

पिछले 10 सालों में यूएई ने अपने देश के भीतर कट्टरपंथियों पर बहुत कड़ा शिकंजा कसा है और 2014 में ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। यूएई लंबे समय से यह माँग कर रहा है कि ब्रिटेन को भी मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए, लेकिन ब्रिटेन अब तक ऐसा करने से कतरा रहा है।

ब्रिटेन की ढिलाई से बढ़े कट्टरपंथियों के हौसले: UAE ने मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े संगठनों को किया ब्लैकलिस्ट

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने जनवरी 2025 में ब्रिटेन में मौजूद 8 संगठनों को ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसे इस्लामी आतंकी संगठन से संबंध रखने के कारण ब्लैकलिस्ट कर दिया। इन संगठनों की पहचान ‘कैंब्रिज एजुकेशन एंड ट्रेनिंग सेंटर लिमिटेड’, ‘IMA6INE लिमिटेड’, ‘वेम्बली ट्री लिमिटेड’, ‘वस्ला फॉर ऑल’, ‘फ्यूचर ग्रेजुएट्स लिमिटेड’, ‘यास फॉर इन्वेस्टमेंट एंड रियल एस्टेट’, ‘होल्डको यूके प्रॉपर्टीज लिमिटेड’ और ‘नफेल कैपिटल’ के रूप में हुई है।

हैरानी की बात यह है कि कट्टरपंथी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर मिस्र, सऊदी अरब और खुद यूएई जैसे प्रमुख मुस्लिम देशों ने भी बैन लगा रखा है। इसके विपरीत, ब्रिटेन जैसा ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश इस संगठन के खिलाफ नरम रुख अपनाए हुए है। उसने अब तक न तो इसे बैन किया है और न ही इसे आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठन घोषित किया है।

ब्रिटेन इन दिनों तेजी से बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और धर्मांतरण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने ब्रिटेन में अपना नेटवर्क उन छात्रों और कट्टरपंथी निर्वासितों के जरिए फैलाया है, जो अपने देशों में हुई कार्रवाई के बाद वहाँ शरण लेने पहुँचे थे। ये संगठन दक्षिण एशिया के उन कट्टरपंथियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जो जमात-ए-इस्लामी का प्रतिनिधित्व करते हैं और अबुल आला मौदूदी के विचारों को बढ़ावा देने के लिए बने हैं।

साल 2024 में, पूर्व कम्युनिटी सेक्रेटरी माइकल गोव ने ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) को स्पष्ट रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा संगठन बताया था। इससे पहले 2015 में भी ब्रिटिश सरकार की एक समीक्षा में यह खुलासा हुआ था कि MAB पर पूरी तरह से मुस्लिम ब्रदरहुड का वर्चस्व है।

एक सरकारी समीक्षा में विस्तार से बताया गया है कि कैसे ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने पिछले पाँच दशकों के दौरान धीरे-धीरे ब्रिटेन में अपना आधार मजबूत किया है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध तक, इस संगठन ने इराक और फिलिस्तीन जैसे मुद्दों का इस्तेमाल करके ब्रिटेन में बसे दूसरी पीढ़ी के मुस्लिमों को एकजुट करना और उन्हें अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया था।

1990 के दशक तक, मुस्लिम ब्रदरहुड ने अपनी जिहादी विचारधारा को फैलाने और नए समर्थकों को लुभाने के लिए कई तरह के संगठन खड़े कर लिए थे। 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से किसी भी संगठन ने खुलकर अपनी पहचान मुस्लिम ब्रदरहुड के रूप में नहीं बताई और इस संगठन की सदस्यता हमेशा की तरह एक ‘राज’ ही बनी रही।

इसके बावजूद, मुस्लिम ब्रदरहुड ने कई सालों तक ‘इस्लामिक सोसाइटी ऑफ ब्रिटेन’ (ISB) को अपने हिसाब से चलाया, ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) पर अपना दबदबा बनाए रखा और ‘मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन’ (MCB) को स्थापित करने व चलाने में अहम भूमिका निभाई। MAB ने फिलिस्तीन और इराक जैसे मुद्दों के जरिए राजनीति में सक्रियता बढ़ाई और चुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे। वहीं, MCB ने सरकार के साथ बातचीत का रास्ता साफ किया। इतना ही नहीं, MAB ने सुरक्षा मुद्दों पर पुलिस के साथ मिलकर काम किया और उत्तरी लंदन की एक मस्जिद से कट्टरपंथी प्रचारक अबू हमजा को बाहर निकालने में मदद की, जिसके बाद से उस मस्जिद के प्रबंधन में MAB की अहम भूमिका बनी हुई है।

2015 की रिपोर्ट से लिया गया अंश जिसका टाइटल है: मुस्लिम ब्रदरहुड रिव्यू: मुख्य निष्कर्ष

समीक्षा में यह भी सामने आया कि ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ अपने विभिन्न संगठनों के जरिए ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर चंदा (फंड) इकट्ठा कर रहा है। ‘यूके इस्लामिक मिशन’ (UKIM) और ‘इस्लामिक फोरम फॉर यूरोप’ (IFE) जैसे ब्रदरहुड के नियंत्रण वाले संगठन ब्रिटेन में दर्जनों मस्जिदें चला रहे हैं। ये संगठन फिलिस्तीनी आतंकी समूह ‘हमास’ के खुले समर्थक रहे हैं।

2015 की इस रिपोर्ट में आगे बताया गया कि भले ही ब्रिटेन में मुस्लिम ब्रदरहुड खुद को ‘अल-कायदा’ और कट्टरपंथी सलाफवाद का विरोधी बताता हो, लेकिन सच्चाई कुछ और है। ब्रिटिश सरकार की जाँच में पाया गया कि यह संगठन प्रतिबंधित आतंकी समूहों का समर्थन करता है और आतंकवाद पर इसके विचार ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों, मूल्यों और सुरक्षा के बिल्कुल खिलाफ हैं।

हैरानी की बात यह है कि 2015 की समीक्षा में मुस्लिम ब्रदरहुड की जिहादी प्रवृत्तियों का कच्चा चिट्ठा सामने आने के बावजूद, ब्रिटिश सरकार ने इसे बैन नहीं किया। सरकार का तर्क था कि ब्रिटेन के भीतर इस संगठन की किसी आतंकी गतिविधि में शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की पूरी काला-चिट्ठा: खौफनाक इतिहास से लेकर ग्लोबल जिहाद तक

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ की स्थापना साल 1928 में मिस्र के एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी। इस संगठन की नींव पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद खत्म होते इस्लामी मूल्यों को बचाने के नाम पर रखी गई थी। अल-बन्ना ने इसे एक ‘पैन-इस्लामिस्ट’ आंदोलन के रूप में शुरू किया था, जिसका शुरुआती जोर समाज सेवा और इस्लामी वकालत पर था।

अपने शुरुआती सालों में, मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र की कमजोर सरकारों की कमियों का फायदा उठाकर गरीबों और अनपढ़ लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनवाईं। इसके साथ ही, उसने धर्मनिरपेक्षता और साम्राज्यवाद के ‘इलाज’ के रूप में इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की सर्वोच्चता) का प्रचार करना शुरू किया। मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा (मोटो) यह साफ कर देता है कि भले ही शुरुआत में यह सीधे तौर पर हिंसा से न जुड़ा रहा हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा से इसका मूल रास्ता रहा है।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ का मूल नारा (मोटो) उनके इरादों को पूरी तरह साफ करता है, “अल्लाह हमारा उद्देश्य है; पैगंबर हमारे नेता हैं; कुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; और अल्लाह की राह में मरना हमारी सर्वोच्च इच्छा है।”

1930 के दशक तक, हज़ारों सदस्यों के साथ यह संगठन राजनीति में कदम रख चुका था। हालाँकि, इस कट्टरपंथी संगठन की ‘सीक्रेट अपैरेटस’ (al-Nizam al-Khas) नाम की एक पैरामिलिट्री विंग भी थी, जो राजनीतिक हत्याओं और जिहादी हिंसा को अंजाम देती थी। साल 1948 में, इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने के कारण ‘सीक्रेट अपैरेटस’ के सदस्यों ने मिस्र के प्रधानमंत्री महमूद अल-नोकराशी पाशा की हत्या कर दी थी। इसके बदले में, 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने संगठन के संस्थापक हसन अल-बन्ना की हत्या कर दी।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की गुप्त शाखा (Secret Apparatus) के सदस्यों को कड़ा शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था, जिसमें हथियार चलाना और गुप्त अभियानों को अंजाम देना शामिल था। धोखे और गोपनीयता (तक़िया) का सहारा लेकर ये जिहादी राजनीतिक दलों, सेना, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शिक्षण संस्थानों और एनजीओ तक में घुसपैठ कर उन्हें भीतर से खोखला कर देते हैं। ब्रिटेन जैसे देशों में भले ही वे सीधे तौर पर हिंसा न कर रहे हों, लेकिन मीडिया, राजनीति और चैरिटी के जरिए अपना जिहादी एजेंडा आगे बढ़ाना आज भी जारी है।

मिस्र में साल 2012 में इस संगठन ने चुनाव जीता और मोहम्मद मुर्सी राष्ट्रपति बने, लेकिन 2013 में जनरल अब्दुल फतह अल-सीसी के नेतृत्व में हुए सैन्य तख्तापलट ने उन्हें सत्ता से हटा दिया। इसके बाद मिस्र में इस संगठन को बैन कर ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया गया। आज भी मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका की कई सरकारें इसे अपनी स्थिरता के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में, टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने भी मुस्लिम ब्रदरहुड और ‘काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस’ को ‘विदेशी आतंकवादी और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन’ मानने का ऐलान किया है।

यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस जैसे देश पहले ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। अप्रैल 2025 में जॉर्डन ने भी इस समूह पर तब बैन लगा दिया, जब उसने रॉकेट और ड्रोन के जरिए हमलों की साजिश रचने वाले इसके सदस्यों को गिरफ्तार किया।

मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की ‘जमात-ए-इस्लामी’ को भी प्रभावित किया था। भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैसे सिमी (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं के खिलाफ जिहादी हमलों और भारत को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने की साजिशों में शामिल रहे हैं, वे भी मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों से प्रेरणा लेते हैं। भारत में सक्रिय आतंकी समूहों को उकसाने के अलावा, इस संगठन ने 2021 में भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुँचाने के लिए ‘भारतीय उत्पादों के बहिष्कार‘ (#BoycottIndianProducts) का अभियान चलाया था। वहीं 2023 में, पैगंबर मुहम्मद के सम्मान की रक्षा के बहाने इस संगठन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने की गहरी साजिश रची थी।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

CBI का छापा, सोनिया का पास्ता मेकर और इंदिरा गाँधी: ममता बनर्जी के ‘दखल’ से चर्चा में 49 साल पुराना किस्सा

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के चुनावी प्रबंधन का काम देखने वाली I-PAC कंपनी पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान जो ड्रामा हुआ, उसे ऑन टीवी हर किसी ने देखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कंपनी के मालिक के घर पहुँची और जरूरी फाइलें, लैपटॉप और अन्य दस्तावेज लेकर निकल गईं। उनका यह रवैया देख हर कोई हैरान रह गया कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ऐसा कैसे किया जा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक नाम ने जाँच एजेंसियों से बचने के लिए असामान्य कदम उठाए हों। इतिहास में ऐसा एक बड़ा उदाहरण 1977 का है जिसका जिक्र कैथरीन फ्रैंक की किताब- इंदिरा- द लाइन ऑफ इंदिरा नेहरू में पढ़ने को मिलता है।

फ्रैंक कैथरीन की किताब, जिसमें घटना का जिक्र है (फोटो साभार: अमेजन)

जब इंदिरा गाँधी के घर पड़ी CBI की रेड

ये वो समय था जब 1977 में आपातकाल के बाद जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों और दुरुपयोग की जाँच करना था। आयोग ने इंदिरा गाँधी को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन वह हर बार अपने वकील फ्रैंक एंथनी की सलाह पर आयोग के समक्ष पेश होने से इनकार करती रहीं और इसे असंवैधानिक और गैरकानूनी भी ठहरा दिया।

एक तरफ इंदिरा गाँधी लगातार शाह कमीशन से बचने की कोशिशों में लगी हुईं थीं। दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों की पड़ताल शुरू थी। किताब में लिखे अंश के अनुसार, 3 अक्तूबर 1977 का दिन आया। उनके घर 12 विलिंगडन क्रेसेंट पर सीबीआई की रेड पड़ी। उनके बेटे संजय और बहू मेनका लॉन पर बैडमिंटन खेल रहे थे। दो सीबीआई अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने आए और इंदिरा गाँधी से कहा कि वे हिरासत में ली जाती हैं। हालाँकि, इंदिरा ने ऐसा होने की उम्मीद लगाई हुई थी और शायद इससे निपटने की उनकी रणनीति भी तैयार थी।

सीबीआई अधिकारियों से उस समय इंदिरा गाँधी ने पैकिंग के लिए समय माँगा और घर के भीतर चली गईं। करीबन 5 घंटे वह घर में रहीं और शाम के 8 बजे वह सफेद साड़ी (हरी बॉर्डर वाली) पहनकर भीड़ के आगे आईं। बताया जाता है कि इन पाँच घंटों में इंदिरा गाँधी ने घर के भीतर बहुत कुछ किया। उन्होंने अपने समर्थकों को बुलाया, प्रेस को सूचित किया, परिजनों से बात की और सामान बाँधा, जिसमें सबसे हैरान करने वाली चीज थी सोनिया गाँधी का एक पास्ता मेकर।

कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

किताब में एक अफवाह के तौर पर ही सही, लेकिन ये बताया गया है इंदिरा गाँधी के सामान में उस समय पास्ता मेकर मिलने की कोई वजह नहीं थी सिवाय इसके कि उन्होंने इससे उन दस्तावेजों को नष्ट किया जो उनके लिए समस्या बन सकते थें।

कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

इसके बाद क्या सब हुआ ये इतिहास में दर्ज है। इंदिरा गाँधी ने तब इस गिरफ्तारी को अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भुनाया। बाद में सुनवाई हुई। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ठोस सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर दिया। और ये चर्चा कभी नहीं हुई कि वो कागज क्या थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने पास्ता मेकर में डालकर काट दिया।

आज जब मीडिया में ममता बनर्जी से जुड़ी खबरें आई है तो ये किस्सा और भी प्रांसगिक हो गया कि कैसे इंदिरा गाँधी ने चालाकी से न केवल 5 घंटे में अपने लिए समर्थन बटोरा बल्कि अपने खिलाफ रखें सबूतों को भी नष्ट कर दिया। ये सच है कि उस समय इंदिरा के पक्ष में जैसे लोग आए 1978 में उन्हें उसका सीधा फायदा हुआ, मगर बंगाल में स्थिति ऐसी नहीं देखने को मिल रही। लोग ममता बनर्जी की हरकत पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। ईडी उनकी हरकत के खिलाफ हाई कोर्ट चला गया है। वहीं बंगाल सीएम ने भी इस मामले में अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत दी है। देखना यही है कि इस घटना को बंगाल की जनता कैसे लेगी?

अब AI बनेगा आपका सेहत का साथी: OpenAI ने लॉन्च किया ChatGPT Health, आपके मेडिकल रिकॉर्ड से देगा सटीक सलाह, जानें कैसे काम करेगा यह नया फीचर

कैलिफोर्निया में सैन फ्रांसिस्को की कंपनी OpenAI ने बुधवार (7 जनवरी 2026) को ChatGPT Health पेश किया है। यह खास फीचर लोगों के हेल्थ ऐप्स और मेडिकल रिकॉर्ड्स को सुरक्षित तरीके से जोड़ने की सुविधा देता है। इसे दुनिया के 60 देशों के 260 से ज्यादा डॉक्टरों ने मिलकर तैयार किया है ताकि यूजर्स को सेहत से जुड़ी बेहतर जानकारी मिल सके।

यूजर्स अब ChatGPT के एक सुरक्षित और अलग हिस्से में सेहत से जुड़े सवाल पूछ सकेंगे। खास बात यह है कि आप इसमें अपने मेडिकल रिकॉर्ड और फिटनेस ऐप्स को जोड़ सकते हैं, ताकि AI आपकी अपनी जानकारी के आधार पर सटीक जवाब दे सके।

OpenAI का कहना है, “आप सुरक्षित तरीके से अपना हेल्थ डेटा लिंक कर सकते हैं ताकि आपको काम की सलाह मिले। इसे डॉक्टरों की मदद से बनाया गया है ताकि लोग अपनी सेहत का बेहतर ख्याल रख सकें। पर ध्यान रहे, यह डॉक्टरों का साथ देने के लिए है, उनकी जगह लेने के लिए नहीं।”

डॉक्टर की जगह नहीं, बस मदद के लिए है यह सिस्टम

OpenAI ने साफ किया है कि यह नया फीचर डॉक्टरों की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद के लिए है। कंपनी के मुताबिक, लोग पहले से ही सेहत से जुड़ी जानकारी के लिए ChatGPT का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। एक स्टडी में सामने आया है कि दुनिया भर में हर हफ्ते करीब 23 करोड़ लोग अपनी बीमारियों के बारे में सवाल पूछते हैं। अक्सर लोग देर रात, क्लिनिक बंद होने के बाद यहाँ आते हैं, क्योंकि उस वक्त कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता और गूगल पर जानकारी ढूँढना उलझन भरा हो जाता है।

OpenAI की अधिकारी फिजी सिमो का कहना है कि इस नए फीचर का मकसद यूजर्स को अपनी सेहत के प्रति जागरूक और भरोसेमंद बनाना है। उन्होंने बताया कि आज के समय में हेल्थकेयर सिस्टम इतना उलझा हुआ है कि अच्छी सुविधा मिलने के बाद भी लोग परेशान रहते हैं। ऐसे में AI डॉक्टर और मरीज दोनों के लिए एक मददगार साथी साबित हो सकता है।

सिमो ने जोर देकर कहा कि “AI इलाज की जगह नहीं ले सकता”, लेकिन यह पेचीदा मेडिकल सिस्टम को समझने में बहुत काम आ सकता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह ढेर सारी मुश्किल जानकारियों को इकट्ठा करके उन्हें बहुत आसान भाषा में समझा देता है।

सेहत का डेटा रहेगा सुरक्षित, आपकी मर्जी से होगा लिंक

OpenAI ने साफ किया है कि आपकी सेहत से जुड़ी जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। यूजर्स अपनी पसंद के मुताबिक Apple Health, इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड्स (फिलहाल सिर्फ अमेरिका में) और MyFitnessPal, Peloton या Weight Watchers जैसे ऐप्स को लिंक कर पाएँगे। जब आप इसकी इजाजत देंगे, तभी ChatGPT आपकी लैब रिपोर्ट, नींद का पैटर्न, कसरत और खान-पान के आधार पर आपको सलाह देगा।

कंपनी ने बताया कि कोई भी डेटा अपने आप लिंक नहीं होगा। कंपनी ने बताया कि कोई भी डेटा अपने आप लिंक नहीं होगा। यूजर्स को एक-एक करके खुद उन ऐप्स को चुनना होगा जिन्हें वे लिंक करना चाहते हैं। इस काम के लिए OpenAI ने अमेरिकी कंपनी b.well के साथ हाथ मिलाया है। यह कंपनी लाखों डॉक्टरों और अस्पतालों से मेडिकल रिकॉर्ड इकट्ठा करती है और उन्हें इस तरह तैयार करती है कि AI उन्हें आसानी से समझ सके। सबसे खास बात यह है कि डेटा पर पूरा कंट्रोल आपका होगा। अगर आप कभी भी अपना रिकॉर्ड डिस्कनेक्ट करना चाहें, तो कर सकते हैं। जैसे ही आप डिस्कनेक्ट करेंगे, कंपनी आपके सारे डेटा को अपने सिस्टम से पूरी तरह डिलीट कर देगी।

OpenAI ने इस सिस्टम को इस तरह तैयार किया है कि यह बातचीत के दौरान आपकी निजी जानकारी को सेव नहीं करेगा। आप जब चाहें अपनी चैट डिलीट कर सकते हैं और 30 दिनों के अंदर उसे सर्वर से पूरी तरह हटा दिया जाएगा। आपकी सारी चैट और डेटा हमेशा सुरक्षित (encrypted) रहता है, और सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए आप ‘मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन’ (MFA) भी ऑन कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी सेहत से जुड़ी जानकारी ChatGPT के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग रखी जाएगी। ChatGPT हेल्थ का अपना अलग सिस्टम, मेमोरी और फाइलों का रिकॉर्ड होगा। कंपनी ने साफ किया है कि आपकी सेहत से जुड़ी बातचीत का इस्तेमाल उनके मुख्य AI मॉडल को ट्रेनिंग देने के लिए नहीं किया जाएगा। सुरक्षा के लिहाज से, अगर आप सामान्य चैट में सेहत से जुड़ा कोई सवाल पूछते हैं, तो खुद ChatGPT आपको सुरक्षित ‘हेल्थ चैट’ वाले हिस्से में जाने की सलाह दे सकता है।

बिना डराए सही जानकारी देने वाला प्लेटफॉर्म

OpenAI के मुताबिक, ChatGPT Health को इस तरह तैयार किया गया है कि यह आपको डराने के बजाय सही जानकारी दे और जरूरत पड़ने पर आपको डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे। कंपनी की अधिकारी फिजी सिमो ने भरोसा दिलाया है कि मॉडल को जानकारीपूर्ण बनाया गया है ताकि यह ‘अलार्मिंग’ या डरावना न लगे। इस फीचर को धीरे-धीरे रोलआउट किया जाएगा ताकि अनुभव के आधार पर इसमें सुधार होता रहे। फिलहाल इसके लिए आपको वेटलिस्ट (Waitlist) में शामिल होना होगा।

यह सुविधा उन यूजर्स के लिए है जो यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र, स्विट्जरलैंड और यूके से बाहर रहते हैं। इसमें ChatGPT फ्री, गो, प्लस और प्रो प्लान वाले सभी यूजर्स शामिल हो सकेंगे। शुरुआत में यह सुविधा बीटा टेस्टिंग के लिए एक छोटे ग्रुप को दी जाएगी, लेकिन कंपनी का लक्ष्य इसे जल्द ही सभी यूजर्स (फ्री यूजर्स समेत) के लिए उपलब्ध कराना है।

ChatGPT Health की लॉन्चिंग ठीक उसी समय हुई है जब रेगुलेटर्स (सरकारी निगरानी संस्थाएँ) हेल्थ टेक्नोलॉजी की जाँच-परख कर रहे हैं। इसकी लॉन्चिंग से एक दिन पहले, अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर मार्टी मकारी ने एक बड़ी घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि एजेंसी अब उन वियरेबल गैजेट्स (जैसे स्मार्टवॉच) और सॉफ्टवेयर की निगरानी कम करेगी जिनका मकसद लोगों को स्वस्थ जीवन के लिए प्रोत्साहित करना है।

मार्टी मकारी ने ChatGPT का जिक्र करते हुए इसे एक ऐसा प्रोडक्ट बताया जिसका प्रचार किया जाना चाहिए। हालाँकि, इसके साथ ही उन्होंने एक चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि इस तरह की तकनीक के साथ सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चिंताओं का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

सुविधा के साथ प्राइवेसी का बड़ा खतरा

पिछले कुछ सालों में तकनीक और AI की दुनिया पूरी तरह बदल गई है। एक तरफ तो इन बदलावों ने हमारी जिंदगी बहुत आसान बना दी है, लेकिन दूसरी तरफ हमारी प्राइवेसी (निजी जानकारी) पर बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।

दुनिया की बड़ी टेक कंपनियाँ प्राइवेसी के मामले में अक्सर विवादों में रहती हैं। जैसे Meta (Facebook) का ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ स्कैंडल, जहाँ करोड़ों लोगों की जानकारी उनकी मर्जी के बिना ले ली गई थी। इसी तरह, TikTok जैसे चीनी ऐप्स पर भी डेटा चोरी के आरोप लगे हैं, जिसकी वजह से कई देशों में इन्हें बैन कर दिया गया। यहाँ तक कि YouTube पर भी यूजर्स की निजी जानकारी इकट्ठा करने के आरोप लगते रहे हैं।

अब OpenAI ने भी ‘ChatGPT Health’ को लेकर बड़े दावे किए हैं कि वे सेहत से जुड़ी जानकारी को सुरक्षित रखेंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि कई कंपनियाँ ऐसे वादे करती रही हैं जो बाद में खोखले साबित हुए। हो सकता है कि OpenAI इस मामले में अलग साबित हो, लेकिन जब तक वे अपने वादे को पूरी तरह निभाकर नहीं दिखाते, तब तक सुरक्षा को लेकर डर बना ही रहेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

ध्रुव राठी के एआई ऐप ‘AI Fiesta’ पर डेटा चोरी को यूट्यूबर ने किया एक्सपोज तो उन्हें जर्मनी के नंबर से आया कॉल: वीडियो डिलीट करने की दी धमकी, जानिए पूरा मामला

यूट्यूबर अनुभव गुप्ता ने 7 जनवरी को X (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए खुलासा किया कि उन्हें एक धमकी भरा कॉल आया है, जिसमें उनसे ध्रुव राठी और उनके AI ऐप ‘AI Fiesta’ के खिलाफ बनाया गया ‘एक्स्पोज वीडियो’ हटाने को कहा गया। 22 दिसंबर को पब्लिश किए गए इस वीडियो में गुप्ता ने गंभीर आरोप लगाए थे कि राठी बड़े पैमाने पर डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने इस ऐप से जुड़ी मार्केटिंग और बिजनेस करने के तरीकों को भी भ्रामक और संदिग्ध बताया था।

गुप्ता के अनुसार, उन्हें यह कॉल तब आई जब उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा। अनुभव गुप्ता ने बताया कि फोन करने वाले ने उनसे वीडियो हटाने की माँग की। गुप्ता ने उस फोन नंबर का भी ज़िक्र किया जिससे उन्हें कॉल आया था, जिसमें जर्मनी का कंट्री कोड (+49) लगा हुआ था। X पर उस नंबर को शेयर करते हुए उन्होंने दावा किया कि इस कॉल का मकसद उन्हें डरा-धमकाकर वीडियो डिलीट करवाना था, जबकि उनका कहना है कि वीडियो में दी गई जानकारी पूरी तरह से ऐप से जुड़ी पब्लिक पॉलिसी और डॉक्यूमेंट्स पर आधारित है।

अपनी पोस्ट में अनुभव गुप्ता ने लिखा, “मेरा वीडियो हटाने के लिए मुझे एक धमकी भरा कॉल आया है, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे ध्रुव राठी आपका डेटा चुरा रहे हैं। मैं इसे नहीं हटाऊँगा ‘जर्मन शेफर्ड’।” उनके इस बयान को उनके फॉलोअर्स ने काफी सपोर्ट किया और सिर्फ X पर ही इसे 450 से ज्यादा बार रीपोस्ट और 2,000 से अधिक लाइक्स मिले।

अनुभव गुप्ता ने AI Fiesta के बारे में क्या बताया?

22 दिसंबर के अपने वीडियो में अनुभव गुप्ता ने बताया कि ‘AI Fiesta’ न केवल यूजर्स के प्रॉम्प्ट्स (सवालों) को स्टोर करता है, बल्कि AI के जरिए दिए गए जवाबों को भी सेव करता है। उनका कहना था कि इस तरीके से यूज़र्स द्वारा डाली गई बेहद निजी, राजनीतिक और संवेदनशील जानकारी कंपनी के पास सुरक्षित रह सकती है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आमतौर पर लोग वेबसाइट्स या ऐप्स का इस्तेमाल करते समय उनकी प्राइवेसी पॉलिसी और टर्म्स एंड कंडीशंस नहीं पढ़ते। यूज़र्स अक्सर बिना सोचे-समझे इन शर्तों पर सहमति दे देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, उन्हें इसके संभावित नतीजों का अंदाजा भी नहीं होता।

अनुभव गुप्ता ने कहा कि डेटा को स्टोर करने की यह बात ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी में साफ तौर पर लिखी गई है, जो यूजर्स की सुरक्षा और उनकी मर्जी (इंफॉर्म्ड कंसेंट) पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इस मामले में ऑपइंडिया ने जब खुद जाँच की, तो उन्होंने पुष्टि की कि AI Fiesta की प्राइवेसी पॉलिसी में बिल्कुल वही बातें लिखी हैं जिनका दावा अनुभव गुप्ता ने अपने वीडियो में किया है।

स्रोत: AI Fiesta

अनुभव गुप्ता ने आगे बताया कि यह ऐप यूजर्स के IP एड्रेस और ‘डिवाइस इंफॉर्मेशन’ जैसी जानकारी इकट्ठा करता है। उनका तर्क है कि ‘डिवाइस इंफॉर्मेशन’ एक बहुत ही धुंधला और गोल-मोल शब्द है, जिसका इस्तेमाल जानबूझकर किया गया है ताकि यूजर्स की हरकतों (बिहेवियरल ट्रैकिंग) और उनकी लोकेशन पर बारीकी से नजर रखी जा सके।

अनुभव गुप्ता ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर ऐसा डेटा लीक होता है या गलत हाथों में पड़ता है, तो यूजर्स फिशिंग, प्रोफाइलिंग या टारगेटेड मैनिपुलेशन (सोच-समझकर की जाने वाली हेरफेर) का शिकार हो सकते हैं।

गुमराह करने वाले प्रचार और नकली भरोसे के आरोप

अनुभव गुप्ता ने वीडियो में एक और बड़ा आरोप AI Fiesta की मार्केटिंग और इसके झूठे दावों को लेकर लगाया है। उनका कहना है कि ऐप ने ’36 घंटों में 3 मिलियन ARR’ (Annual Recurring Revenue) का आँकड़ा प्रचारित किया ताकि मार्केट में एक आर्टिफीसियल हाइप बनाई जा सके और लोगों को लगे कि यह ऐप बहुत बड़ी कमर्शियल सक्सेस है। अनुभव गुप्ता का तर्क है कि यह दावा पूरी तरह से भ्रामक है और इसका मकसद सिर्फ उन यूजर्स को अपनी ओर खींचना है जो पैसे देकर सर्विस लें, जबकि मार्केट में पहले से ही कई AI टूल्स बिल्कुल फ्री में उपलब्ध हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि AI Fiesta ने गूगल प्ले स्टोर पर ‘बॉट-जनरेटेड’ या खरीदे गए रिव्यूज का सहारा लिया है। गुप्ता ने सबूत के तौर पर कई 5-स्टार रिव्यूज की ओर इशारा किया, जिनमें एक जैसे शब्द, एक जैसा सेंटेंस स्ट्रक्चर और कॉमन कीवर्ड्स बार-बार दोहराए गए थे, जो यह साफ दिखाते हैं कि ये फीडबैक असली नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसे नकली रिव्यूज सिर्फ इसलिए खरीदे जाते हैं ताकि ऐप को इस्तेमाल करने की सोच रहे संभावित ग्राहकों को गुमराह किया जा सके।

स्रोत: गूगल प्ले स्टोर

ऑपइंडिया ने अनुभव गुप्ता द्वारा किए गए इन दावों की क्रॉस-चेकिंग की और उन्हें सही पाया, जैसा कि यहाँ दिए गए स्क्रीनशॉट्स से भी साफ होता है। इन दोनों स्क्रीनशॉट सेट्स में तीन ऐसे 5-स्टार रिव्यूज देखे जा सकते हैं, जिनमें लगभग एक जैसी भाषा और शब्दों का इस्तेमाल किया गया है।

स्रोत: गूगल प्ले स्टोर

गोपनीयता समर्थक बनाम डेटा संग्रहकर्ता

इस पूरे खुलासे के केंद्र में वह बात थी जिसे गुप्ता ने ध्रुव राठी का ‘दोगुलापन’ (हिपोक्रेसी) बताया। गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि राठी ने अपनी पब्लिक इमेज एक ऐसे इंसान की बनाई है जो लोगों को डेटा के गलत इस्तेमाल, निगरानी (सर्वेलांस) और प्राइवेसी के खतरों के बारे में चेतावनी देता है। लेकिन इसके ठीक उलट, उनके अपने ऐप ‘AI Fiesta’ की नीतियांँ यूजर डेटा स्टोर करने, IP एड्रेस इकट्ठा करने और डिवाइस की तमाम जानकारियाँ लेने की अनुमति देती हैं।

स्रोत: AI Fiesta

अनुभव गुप्ता ने आगे यह भी आरोप लगाया कि ऐप की शर्तों (Terms) में ऐसे डिस्क्लेमर दिए गए हैं जो कहते हैं कि कोई भी सिस्टम पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। गुप्ता का तर्क है कि ऐसा करके कंपनी ने खुद को एक सुरक्षा कवच दे दिया है, ताकि भविष्य में अगर कोई डेटा लीक या ‘डेटा ब्रीच’ होता है, तो वे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बच सकें।

जवाबदेही और अधिकार क्षेत्र पर सवाल

अनुभव गुप्ता ने ऐप के कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि ‘AI Fiesta’ अमेरिका के डेलावेयर (Delaware) में रजिस्टर्ड है, और उनका तर्क है कि इसे ‘देश का सबसे बड़ा AI प्लेटफॉर्म’ बताकर प्रमोट करना भ्रामक है। गुप्ता का कहना है कि जब इस ऐप का रजिस्ट्रेशन, डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर और लीडरशिप भारत में स्थित ही नहीं है, तो इसे भारतीय पहचान के साथ ब्रांड करना गलत है।

स्रोत: Ai Fiesta

यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव राठी पर किसी को डराने-धमकाने का आरोप लगा हो। इससे पहले सितंबर 2023 में, यूट्यूबर कैरोलिना गोस्वामी और उनके पति ने भी आरोप लगाया था कि ध्रुव राठी के ‘सपोर्टर्स‘ ने यूरोप में उन पर हमला किया था, क्योंकि उन्होंने राठी के वीडियो का फैक्ट-चेक किया था।

इस बीच, ऑपइंडिया ने अनुभव गुप्ता से संपर्क कर धमकी वाले कॉल और ध्रुव राठी पर किए गए उनके खुलासे के बारे में और जानकारी माँगी है। अगर उनकी ओर से कोई जवाब आता है, तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

आए दिन राजनीतिक हत्याएँ और गैंगवार, नशे के अड्डे से लेकर खालिस्तानी आंतकवाद तक: जानें कैसे AAP सरकार में पंजाब में बढ़ रहा अपराध?

अमृतसर के मैरीगोल्ड मैरिज पैलेस में रविवार (4 जनवरी 2026) को उस समय सनसनी फैल गई, जब आम आदमी पार्टी (AAP) के सरपंच जरमैल सिंह की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। CCTV फुटेज में दिखा कि थ्री-पीस सूट पहने दो हमलावर शादी समारोह में बेखौफ अंदर घुसे, 50 वर्षीय ग्रामप्रधान के पास पहुँचे और बेहद करीब से सिर में गोली मार दी।

गोली चलने के बाद शादी में मौजूद लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे, जबकि हमलावर मौके से फरार हो गए। घटना के कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया पर सामने आए एक पोस्ट में गैंगस्टर प्रभ ने इस हत्या की जिम्मेदारी ली। वैसे तो पंजाब में हिंसा की घटनाएँ नई नहीं हैं, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के एक स्थानीय नेता की इस तरह खुलेआम हत्या ने पूरे राज्य में कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पुलिस व्यवस्था पूरी तरह विफल होने का आरोप लगाया। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री मान के पास ही राज्य का गृह मंत्रालय भी है।

एक्स पर एक अन्य पोस्ट में सुखबीर सिंह बादल ने बताया कि साल 2026 के पहले छह दिनों में ही पंजाब में चार हत्याएँ हो चुकी हैं। उन्होंने लिखा कि शुक्रवार (2 जनवरी 2026) को कपूरथला में एक महिला की हत्या हुई, मोगा के भिंडर कलाँ इलाके में एक व्यक्ति को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया, जगराओं के मनुके गाँव में कबड्डी खिलाड़ी गगनदीप की हत्या कर दी गई और इसके अलावा अमृतसर में आम आदमी पार्टी के सरपंच की दिनदहाड़े हत्या हुई।

एक्स पर एक पोस्ट में, भारतीय जनता पार्टी (पंजाब) ने कहा कि राज्य में कोई ‘कानून और व्यवस्था’ नहीं है। पार्टी ने कहा, ‘यह गुंडाराज का शासन है’।

दिनदहाड़े राजनीतिक हत्याएँ

सरपंच की हत्या कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि यह पिछले कुछ महीनों में पंजाब को झकझोर देने वाली राजनीतिक हत्याओं की एक कड़ी का हिस्सा है। सरपंच की हत्या से ठीक 48 घंटे पहले मोगा में कॉन्ग्रेस नेता उमरसीर सिंह को गोलियों से भून दिया गया। बताया गया कि इस हमले के पीछे स्थानीय रंजिश थी, जिसमें आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी का नाम भी सामने आया, जो चिंता का विषय है।

लगातार हुई इन राजनीतिक हत्याओं से एक सत्तारूढ़ दल के नेता और दूसरी विपक्षी पार्टी के नेता की एक कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि पंजाब में अब न तो सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष का कोई नेता खुद को सुरक्षित महसूस कर सकता है।

इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री परगट सिंह ने राज्य में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में पंजाब ने ऐसी अराजकता कभी नहीं देखी।” परगट सिंह समेत कई विपक्षी नेताओं ने हालात को सरकार के नियंत्रण से बाहर बताते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की माँग की।

गौर करने वाली बात यह है कि ये सभी राजनीतिक हत्याएँ दिनदहाड़े, सार्वजनिक जगहों पर की गईं। सरपंच की हत्या के CCTV फुटेज से साफ दिखता है कि हमलावरों को पुलिस की कोई चिंता नहीं थी। इसी तरह उमरसीर सिंह की हत्या के बाद भी आरोपित आसानी से फरार हो गए।

कॉन्ग्रेस विधायक गुरजीत औजला ने आम आदमी पार्टी सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह नाकाम रहने का आरोप लगाया और कहा कि अब छोटे-छोटे स्थानीय विवाद भी खुलेआम जानलेवा हिंसा में बदल रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है जब आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान पंजाब में इतनी बड़ी और चर्चित हत्याएँ हुई हों। साल 2022 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेकिन विवादित गायक और कॉन्ग्रेस नेता सिद्धू मूसेवाला की दिनदहाड़े, आधुनिक हथियारों से की गई हत्या ने राज्य में गैंगवार और संगठित अपराध के बढ़ते खतरे की चेतावनी दी थी।

बाद में यह हत्या गैंग आपसी रंजिश से जुड़ी पाई गई, जिसने राजनीति और संगठित अपराध के खतरनाक गठजोड़ को उजागर किया। इसके बाद हिंसक घटनाओं की संख्या और दुस्साहस लगातार बढ़ता चला गया।

जबरन वसूली, गिरोह और खेल के मैदान में जंग

राजनीति से आगे बढ़कर अब संगठित अपराध गिरोहों ने पंजाब को अपना खेल और जंग का मैदान बना लिया है। नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि राज्य में गैंगस्टरों से फिरौती की कॉल आना अब आम बात हो गई है और इस डर के माहौल में आम लोग खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।

बाजवा ने आरोप लगाया कि गैंग सरगना खुलेआम घूम रहे हैं और प्रशासन ने ग्रामीण इलाकों में लगभग अपना नियंत्रण खो दिया है। वहीं शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने मौजूदा हालात को जंगल राज बताते हुए कहा कि व्यापारी, डॉक्टर, कलाकार और खिलाड़ी सभी फिरौती माँगने वालों के गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं और हिंसक बदला लेना अब सामान्य होता जा रहा है।

कानून-व्यवस्था की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुलाई 2025 में फाजिल्का जिले के अबोहर में प्रसिद्ध कारोबारी संजय वर्मा की उनकी दुकान के बाहर दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। संजय वर्मा मशहूर कपड़ा ब्रांड वियर वेल के सह-संस्थापक थे और उन्हें कुर्ता-पायजामा किंग के नाम से जाना जाता था। इस हत्या के बाद व्यापारियों ने विरोध में हड़ताल भी भी किया था।

राज्य की कुख्यात गैंगवार अब खेल के मैदान तक पहुँच चुकी है। पंजाब के लोकप्रिय ग्रामीण खेल कबड्डी में भी हाल के वर्षों में खून-खराबा देखने को मिला है, क्योंकि अपराधी गिरोह इसके बड़े और मुनाफे वाले टूर्नामेंटों को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं।

दिसंबर 2025 में मोहाली के एक खचाखच भरे स्टेडियम में कबड्डी प्रमोटर कंवर दिग्विजय उर्फ राणा बलाचौरिया की खुद को प्रशंसक बताने वाले हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। यह वारदात अपराध और खेल के खतरनाक गठजोड़ की मिसाल बन गई। करीब 100 करोड़ रुपए के कारोबार वाली कबड्डी अब सट्टेबाजी, गैंग रंजिश और हिसाब-किताब चुकाने का जरिया बनती जा रही है।

अक्टूबर 2025 में जगराओं में मैदान पर हुए विवाद के दौरान 25 वर्षीय खिलाड़ी तेजपाल सिंह को गोली मार दी गई थी। एक महीने बाद समराला में एक अन्य खिलाड़ी गुरविंदर सिंह की हत्या कर दी गई, जिसकी जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने ली थी।

इससे पहले 2022 में जालंधर में एक टूर्नामेंट के दौरान अंतरराष्ट्रीय कबड्डी स्टार संदीप नंगल अंबियाँ की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जाँच में सामने आया कि यह हत्या खेल प्रमोटरों के बीच रंजिश का नतीजा थी।

हर हत्या के साथ मुनाफे वाली कबड्डी दुनिया में अंडरवर्ल्ड का संतुलन बदलता रहा, जहाँ गिरोह टूर्नामेंटों पर कब्जा, सट्टेबाजी और खिलाड़ियों के कॉन्ट्रैक्ट्स पर असर डालने की कोशिश करते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक जाँच अधिकारी ने बताया कि गैंगों की पकड़ इतनी गहरी हो चुकी है कि कई खिलाड़ी चुपचाप मैच हारने के दबाव और गैंग से जुड़े सट्टेबाजों की धमकियों की बात करते हैं।

राज्य में गैंगस्टर कानून के डर के बिना अपनी गतिविधियाँ चला रहे हैं। हालाँकि मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार गैंगवार पर लगाम लगाने के प्रयास भी कर रही है। साल 2022 में राज्य सरकार ने एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF) का गठन किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नवंबर 2025 तक टास्क फोर्स ने 2,209 गैंगस्टरों को गिरफ्तार किया, 21 को ढेर किया, 825 नेटवर्क तोड़े और बड़ी मात्रा में हथियार, वाहन और नशा बरामद किया। बावजूद इसके, आरोप लगते रहे हैं कि बीते कुछ वर्षों में सरकारी चूक के कारण गैंगों को फलने-फूलने का मौका मिला।

प्रताप सिंह बाजवा ने यहाँ तक आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और पुलिस के कुछ लोग चुपचाप गैंगस्टरों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। उनका दावा है कि जो पीड़ित फिरौती की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाते हैं, उन्हें सख्त कार्रवाई का भरोसा देने के बजाय अपराधियों से ही आपस में समझौता कर लेने की सलाह दी जाती है।

बाजवा के ये आरोप बेहद गंभीर हैं, क्योंकि ये जनता की सोच और भरोसे की हकीकत को सामने लाते हैं। आम लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि पुलिस या तो प्रभावशाली गैंग सरगनाओं से निपटने में सक्षम नहीं है या फिर ऐसा करना ही नहीं चाहती।

इसी हालात पर चिंता जताते हुए पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने राज्य को गैंगलैंड बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब में आम लोग डर और खौफ के साए में जी रहे हैं, जबकि गैंगस्टर खुलेआम घूम रहे हैं और कानून उन्हें छू भी नहीं पा रहा है।

नार्को-टेरर स्टेट, ड्रग्स और आतंकी हमले

एक तरफ जहाँ पंजाब में घरेलू अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नशे की गंभीर समस्या का एक और खतरनाक पहलू सामने आता है, जो नर्को-आतंकवाद से जुड़ता है। ओपइंडिया पहले भी पंजाब के संदर्भ में नर्को-आतंकवाद पर विस्तार से रिपोर्ट कर चुका है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक साल 2023 में पंजाब में NDPS एक्ट के तहत 11,589 मामले दर्ज किए गए। यह केरल और महाराष्ट्र के बाद देश में तीसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। खास बात यह है कि इन मामलों में से 7,785 केस नशे की तस्करी से जुड़े थे, न कि सिर्फ व्यक्तिगत सेवन से।

ये आंकड़े साफ बताते हैं कि पंजाब केवल नशे का बाजार नहीं है, बल्कि संगठित ड्रग तस्करी का एक बड़ा ट्रांजिट रूट भी बन चुका है। पाकिस्तान से लगी लंबी सीमा के कारण पंजाब तस्करों के लिए पसंदीदा रास्ता बन गया है। सीमा पार बैठे नेटवर्क ड्रोन, सुरंगों और कूरियर सिस्टम के जरिए न सिर्फ नशा, बल्कि हथियार भी पंजाब में भेज रहे हैं।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने एक बयान में आम आदमी पार्टी सरकार की उदासीनता को नर्को-आतंकवाद के दोबारा सिर उठाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दिसंबर 2022 में तरनतारन में हुए रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड (RPG) हमलों को सीधे तौर पर बढ़ते नशे के कारोबार और कमजोर सीमा सुरक्षा से जोड़ा। वहीं कॉन्ग्रेस नेता राजा वड़िंग ने सोशल मीडिया पर हालात को बेहद गंभीर बताते हुए राज्य और केंद्र सरकार से मिलकर नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पंजाब में इस तरह के हमले पहले भी होते रहे हैं। मई 2022 में एक पुलिस इमारत पर RPG हमला हुआ था, जबकि 2021 में लुधियाना जिला कोर्ट में विस्फोट हुआ। सितंबर 2024 में भी चंडीगढ़ के सेक्टर-10 में धमाका हुआ, जो पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी है। इन घटनाओं से साफ है कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, राज्य समय-समय पर ऐसे हमलों से दहलता रहा है।

इन दुस्साहसी हमलों ने न सिर्फ पड़ोसी राज्यों को चिंता में डाला है, बल्कि केंद्रीय एजेंसियों की भी नींद उड़ाई है। आम पंजाबियों के लिए ये धमाके 1980 और 1990 के दशक के उस दौर की डरावनी याद दिलाते हैं, जब उग्रवाद के दौरान बम धमाके और गोलीबारी आम बात थी।

इसी बीच राज्य में खालिस्तानी अलगाववादी प्रचार भी ज्यादा खुलकर सामने आने लगा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्वयंभू उपदेशक अमृतपाल सिंह का उभार रहा। फरवरी 2023 में उसका कट्टर खालिस्तानी अभियान हिंसा में तब बदल गया, जब उसके समर्थकों ने तलवारों, बंदूकों और श्री गुरु ग्रंथ साहिब को ढाल बनाकर अमृतसर के पास अजनाला थाने पर धावा बोल दिया। वे उसके एक गिरफ्तार साथी की रिहाई की माँग कर रहे थे।

थाने पर हुए इस हमले के दृश्य पूरे देश में दिखाए गए। सैकड़ों लोगों ने बैरिकेड तोड़कर थाने को घेर लिया, कई पुलिसकर्मी घायल हुए और यह राज्य प्रशासन के लिए बड़ी बेइज्जती साबित हुई। सबसे खतरनाक बात यह रही कि भीड़ अपने मकसद में कामयाब रही और अमृतपाल के साथी को छुड़ा ले गई। इससे यह संदेश गया कि कट्टरपंथी पुलिस को खुली चुनौती दे सकते हैं।

इसके बाद कई हफ्तों तक अमृतपाल सिंह पुलिस से बचता रहा, जब तक कि देशव्यापी तलाशी अभियान के बाद उसे गिरफ्तार नहीं कर लिया गया। अजनाला कांड और उसके बाद की खालिस्तान समर्थक गतिविधियों ने यह उजागर कर दिया कि राज्य की आतंक-रोधी व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है।

जाँच के दौरान जब अमृतपाल से जुड़े ठिकानों पर छापे मारे गए, तो अधिकारियों ने बताया कि वह एक निजी मिलिशिया खड़ी कर रहा था। वहाँ से हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट और अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद हुआ। बाद में उसे गिरफ्तार कर असम की जेल में भेज दिया गया और ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया।

हैरानी की बात यह रही कि गंभीर आरोपों में जेल में बंद होने के बावजूद उसे 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई, जिसे उसने जीत भी लिया। हालाँकि सांसद बनने के बावजूद वह जेल में ही रहा और संसद की एक भी बैठक में शामिल नहीं हो सका।

पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए भेजे जा रहे हथियार, विदेश बैठे खालिस्तानी नेताओं के प्रचार वीडियो और पंजाब की धरती पर होने वाले रहस्यमय धमाके ये सभी पिछले दो दशकों में कागजों पर बनी शांति को धीरे-धीरे कमजोर करते जा रहे हैं।

AAP सरकार में पंजाब का हाल

जब 2022 में भगवंत मान ने पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तो उनकी सरकार ने नई शुरुआत का वादा किया था। गैंगवार और नशे पर काबू पाने के लिए कुछ फैसले भी किए गए, लेकिन उनके नतीजे सीमित ही नजर आए।

सरकार की ओर से ड्रग माफिया के घरों पर बुलडोजर चलाने, पंजाब पुलिस की विशेष इकाइयों द्वारा नशे की बरामदगी करने और सीमा पर BSF के साथ मिलकर ड्रोन पकड़ने की कार्रवाई की गई। आम आदमी पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया कि 2024 में 283 ड्रोन, जिनमें हेरोइन, हथियार और गोला-बारूद थे उनको जब्त किया गया। अगस्त 2025 तक 137 ड्रोन और बरामद किए गए। इसके बावजूद राज्य से नशे की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है।

इसी तरह, हत्या, चोरी और अन्य अपराधों में बढ़ोतरी ने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालात ऐसे हो गए कि जज तक चोरी से नहीं बचे। मार्च 2023 में अतिरिक्त सत्र जज रवदीप हुंदल के सरकारी आवास में चोरी हुई, जहाँ चोर नल और गीजर तक उखाड़ ले गए। अक्टूबर 2024 में अमृतसर का एक CCTV वीडियो सामने आया, जिसमें दिनदहाड़े एक महिला ने बहादुरी दिखाते हुए तीन चोरों को अपने घर में घुसने से रोक दिया।

कॉन्ग्रेस के नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की माँग करते हुए कहा कि वह गृह विभाग और पंजाब पुलिस को प्रभावी ढंग से संभालने में विफल रहे हैं। बाजवा ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री में जरा भी आत्मसम्मान है, तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए।

पिछले साल जुलाई में अबोहर के व्यापारी की दिनदहाड़े हत्या के बाद बाजवा ने विधानसभा में कहा था कि आज कोई भी पंजाबी सुरक्षित नहीं है और गैंगस्टर इसलिए बेखौफ हैं क्योंकि प्रशासन सोया हुआ है।

हालाँकि हाल के महीनों में पंजाब पुलिस ने राइफलें, RDX विस्फोटक और हेरोइन की बड़ी खेपें बरामद की हैं, जो यह दिखाती हैं कि अपराध और आतंक का नेटवर्क कितना हथियारबंद और मजबूत है।

लेकिन इन सफलताओं पर लगातार हो रहे हमलों की बेखौफ घटनाएँ भारी पड़ जाती हैं। भाजपा नेता सुनील जाखड़ ने कहा कि हर हत्या के बाद आम आदमी पार्टी सरकार की कान फोड़ने वाली चुप्पी गैंगस्टरों का हौसला और बढ़ा देती है और नियंत्रण में देरी का मतलब है कि हालात हाथ से निकलते जा रहे हैं।

शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत चीमा ने भी मुख्यमंत्री पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने का आरोप लगाया और कहा कि अगर वह हालात नहीं संभाल सकते, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

आँकड़े भी इन चिंताओं की पुष्टि करते हैं। NCRB के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, आम आदमी पार्टी सरकार के शुरुआती साल में पंजाब में संज्ञेय अपराधों (IPC + विशेष कानून) में हल्की बढ़ोतरी हुई थी, हालाँकि 2023 में इसमें थोड़ी गिरावट दर्ज की गई। 2023 में राज्य में कुल 69,944 मामले दर्ज हुए, जिनमें 44,872 IPC अपराध और 25,072 विशेष या स्थानीय कानूनों के तहत मामले थे।

हालाँकि प्रति लाख आबादी पर अपराध दर करीब 228 है, जो कई बड़े राज्यों से कम है, लेकिन अपराधों की प्रकृति लोगों को ज्यादा डरा रही है। हिंसक अपराधों की संख्या और उनका असर साफ दिख रहा है।

2023 में पंजाब में 681 हत्याएँ दर्ज हुईं, यानी हर एक लाख आबादी पर करीब 2.2 हत्याएँ। यह 2022 के 718 मामलों से बस मामूली कम है। दूसरे शब्दों में, राज्य में औसतन रोज दो लोगों की हत्या अब भी हो रही है, जिनमें से कई आपसी रंजिश और गैंगवार से जुड़ी हैं।

संपत्ति से जुड़े अपराध, जैसे चोरी और सेंधमारी, हर साल IPC मामलों का बड़ा हिस्सा बने रहते हैं। पंजाब में चोरी के हजारों मामले दर्ज हुए, जिससे संपत्ति अपराध दर करीब 146 प्रति लाख तक पहुँच गई।

इन आंकड़ों के पीछे नशे का कारक भी अहम है। 2023 में NDPS एक्ट के तहत मामले बढ़कर 11,589 हो गए, यानी 37.6 प्रति लाख आबादी और नशीले पदार्थों की बरामदगी में पंजाब देश के अग्रणी राज्यों में रहा।

NCRB की ताजा रिपोर्ट से साफ तस्वीर उभरती है कि पंजाब में अपराध न सिर्फ संख्या में ज्यादा हैं, बल्कि उनका स्वरूप भी लगातार ज्यादा खौफनाक होता जा रहा है। कुल मिलाकर, पंजाब एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। जिस राज्य ने उग्रवाद के भयावह दौर से निकलने के लिए भारी कीमत चुकाई थी, वह अब नए लेकिन जाने-पहचाने खतरों का सामना कर रहा है।

अब जिम्मेदारी सरकार पर है कि वह सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि काम करके साबित करे कि वह अपराध और आतंक के इस जाल को तोड़ सकती है। अगर सरकार इसमें नाकाम रही, तो जनता का फैसला सख्त होगा और वह पूरी तरह जायज भी होगा।

(मूलरूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

संस्कारों से ही बचेगी संस्कृति, पाश्चात्य अंधानुकरण छोड़ना जरूरी

आज जब पूरा विश्व सनातन संस्कृति की चर्चा कर रहा है, तब यह समझना आवश्यक है कि व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व मानवता के लिए इससे अधिक शुभ और कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। जब हम सच्चे अर्थ में सनातनी बन जाएँ, तभी हम इस संस्कृति की महत्ता को समझ पाएँगे।

वैश्विक समस्याओं का समाधान

वास्तविकता यह है कि विनाश के मुहाने पर खड़ी वैश्विक समस्याओं का समाधान और विश्व मानवता का कल्याण केवल सनातन संस्कृति के आधार पर ही संभव है। यह वह संस्कृति है जो ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्’ की अवधारणा को जीने और आत्मसात करने के मूल्यों में निहित है।

सनातन धर्म या संस्कृति केवल शब्दोच्चार या नारा मात्र नहीं है। यह सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को धारण करने से ही संभव है। हमारे यहाँ मूल्य केवल शब्दों में ही वर्णित नहीं किए गए हैं, बल्कि उन शब्दों को व्यावहारिक जीवन में कसौटी पर परखा भी गया है।

जीवन मूल्यों की कसौटी

सतयुग काल में राजा हरिश्चंद्र को सत्य बोलने की कितनी बड़ी, कठिन, दुःसह, मृत्यु से भी अधिक पीड़ा देने वाली परीक्षा देनी पड़ी, यह जगविदित है। शासकों की संतानें भी उन्हीं ऋषि आश्रमों में शिक्षा प्राप्त करने जाती थीं, जहाँ सभी बालक शिक्षा ग्रहण करते थे। सभी को एक समान नियम और अनुशासन का पालन करना होता था।

आज की तरह नहीं, जब शिक्षा के अलग स्तर, पाठ्यक्रम, सुविधाएँ और वर्ग-भेदित शिक्षा व्यवस्था है। संस्कार, अनुशासन और संयम शिक्षा से दूर हो गए हैं।

प्रयागराज: सनातन मूल्यों का जीवंत प्रतीक

3 जनवरी, पौष मास की पूर्णिमा से सनातन संस्कृति की अवधारणा ऋषि भरद्वाज की तपस्थली तीर्थराज प्रयागराज में त्रिवेणी के तट पर साकार होती है। इस कड़कड़ाती ठंड के बीच हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर नित्य त्रिवेणी में प्रातःकालीन स्नान, जप, तप, दान और ईश्वर चिंतन करते हुए ‘सिया राम मय सब जग जानी’ की अवधारणा को आत्मसात करने का अभ्यास करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का उद्घोष ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ और आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की अवधारणा का सजीव वर्णन यहाँ देखने को मिलता है।

सनातन संस्कृति की व्यापकता

गुरु नानकदेव, संत कबीर साहब जैसे सनातन संस्कृति के अनेक महान संतों और महात्माओं ने अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से परम सत्य को अपने-अपने तरीके से जाना। किसी ने वैष्णव मार्ग, किसी ने शाक्त, किसी ने तंत्र, किसी ने शक्ति उपासना, योग मार्ग, हठयोग, किसी ने भक्ति भाव, किसी ने प्रेम और सेवा, सद्गुरु भक्ति, तो किसी ने प्रकृति की उपासना-नदी, समुद्र, जलाशय, जंगल, जीव-जड़ प्रकृति- सब में उसी एक परम तत्त्व को विभिन्न साधना मार्गों से जानकर मानवता के विकास का मार्ग दिखाया।

उन्होंने मानव के कष्टों से निवारण के उपाय दिए, साथ ही समाज व्यवस्था, राज्य व्यवस्था, न्याय व्यवस्था तथा अर्थ व्यवस्था का मार्गदर्शन किया है।

सनातन संस्कृति असीम और निस्सीम है। यह किसी सीमा में बँधी नहीं है। यह दुनिया की सबसे उदात्त, उदार संस्कृति है और अंतरिक्ष की तरह व्यापक है। इसे जाति, पंथ, संप्रदाय या पूजा पद्धति में आबद्ध नहीं किया जा सकता।

आत्ममंथन का समय

यदि हम अपने को सनातनी मानते हैं, तो हमें सनातन धर्म के मूल्यों को पहले अपने में आत्मसात करना होगा। जाति-पाति की संकीर्ण सोच और अहंकार से ऊपर उठकर सोचना होगा।

राजनीतिक निर्णय व नीतियाँ, राजनीतिक पद-प्रतिष्ठा, प्रशासनिक व्यवस्था, पद-प्रतिष्ठा और भरोसे का आधार यदि कार्य-कुशलता, कार्य-दक्षता, अनुशासन, ईमानदारी, निष्ठा और लोक कल्याण की भावना के बजाय जाति है, तो हम जनता-जनार्दन या राष्ट्र, किसी का भी भला नहीं कर सकते। न ही हम सनातन संस्कृति को सच्चे अर्थ में मानते हैं।

वर्तमान चुनौतियाँ

आज हम सभी की दोहरी जीवन शैली, कार्य प्रणाली और दोहरे जीवन मूल्य जगजाहिर हैं। इससे न हम अपना हित कर सकते हैं, न समाज का। आज जहाँ हम खड़े हैं- हमसे तात्पर्य हमारे पूरे विश्व परिवार से है- हमें बहुत सूक्ष्मता से, बिना जाति-पाति के पूर्वाग्रह के, समाज के नीति-नियंताओं, बुद्धिजीवी समाज, विचार जगत के लोगों, न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था के लोगों की सोच, व्यवस्था और कार्यशैली का मूल्यांकन करना होगा। हमें यह देखना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। क्या यही सनातन संस्कृति के मूल्य हैं?

समाज में बढ़ती विकृतियाँ

आज जिस प्रकार की घटनाएँ सामने आ रही हैं, यदि सनातन संस्कृति के मूल्यों के अनुरूप सोचें, तो सहज ही हम निर्णय कर सकते हैं।

धन के लोभ की अराजक मानसिकता: समाचार माध्यमों से समाज में नित्य घटने वाली क्रूरतम हिंसक घटनाएँ और हत्याएँ सामने आ रही हैं। माँ-पिता, भाई-बहन की हत्याओं की घटनाएँ, नित्य निरंतर बढ़ती महिलाओं और बच्चों के साथ घटित होने वाली घटनाएँ चिंताजनक हैं।

राजनीतिक जीवन के मूल्य: आज हम कहाँ खड़े हैं? किस तरह के लोग और किन उद्देश्यों को लेकर आ रहे हैं? विभिन्न राजनीतिक दलों का नेतृत्व किन लोगों को संरक्षण दे रहा है, किन्हें आगे बढ़ा रहा है? यह सब सनातन मूल्यों के कितना अनुरूप है, यह विचारणीय विषय है।

शिक्षा और स्वास्थ्य: व्यवसायीकरण की त्रासदी

लोक कल्याणकारी सेवाएँ: स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल- उद्योग बन गए हैं। केजी से लेकर हजारों रुपए तक का शुल्क है। आउटसोर्सिंग की नौकरी करके 12, 15, 18, 20–22 हजार रुपए प्रतिमाह पर जीवन यापन करने वाले लोग क्या अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकते हैं? किसी ने विचार किया?

गुणवत्ता के नाम पर जो संस्कार युवा पीढ़ी में सामने आ रहे हैं, वे मूल्यांकन के लिए पर्याप्त हैं। वे माता-पिता बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके बच्चे माता-पिता और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अन्यथा, ओल्ड एज होम हैं। यहाँ तक कि माता-पिता के अंतिम संस्कार में भी अब लोग ऑनलाइन भाग लेने लगे हैं।

चिकित्सा व्यवस्था में तो व्यक्ति वस्तु बनकर रह गया है। मनुष्यता गौण है। केवल मनुष्य शोषण की वस्तु है। व्यापार का धर्म केवल लाभ और हानि है। कोई मानवता और संवेदना नहीं होती। यही अंतर भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में है।

पुनर्विचार की आवश्यकता

हमने पश्चिमी देशों- अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि से प्रभावित होकर जो मॉडल अपनाया, उसके व्यापक परिणाम सामने आ रहे हैं। हरिद्वार की हर की पौड़ी में, काशी में भगवती गंगा जी की आरती, अयोध्या में सरयू मैया सहित विभिन्न तीर्थों में स्नान, आरती और पूजन मन को अत्यंत आह्लादित करने वाला है। परंतु केवल बाह्य आडंबर से सनातन संस्कृति की रक्षा नहीं हो सकती।

हम सभी को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि हमारी सनातन संस्कृति के मूल्य क्या यही हैं? क्या हम सच्चे अर्थ में सनातनी जीवन जी रहे हैं? यदि नहीं, तो अब समय आ गया है कि हम अपने मूल्यों की ओर लौटें, उन्हें अपने जीवन में उतारें और विश्व मानवता के लिए एक मार्गदर्शक बनें।

सनातन संस्कृति केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। आइए, हम इसे अपने आचरण में उतारें और भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने का संकल्प लें।

पाकिस्तान अब खत्म: मुस्लिम Gen Z ने खोली पोल, फौज-सरकार ने लेख डिलीट करवा खुद के पैर पर मारी कुल्हाड़ी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख अमेरिका को ‘खुश’ करने में लगे हैं। वहाँ जोरदार लॉबिंग की जा रही है ताकि छवि सुधारी जा सके। ऑपरेशन सिंदूर के बाद हर महीने $50,000 यानी 45 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। छवि सुधारने में अब तक 9 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। लेकिन Gen Z हुक्मरानों को ये बता रहे हैं कि ‘तुमसे ना हो पाएगा’।

तंगहाली के बीच लॉबिंग में खर्च किए करोड़ों

FARA के दस्तावेज बता रहे हैं कि पाकिस्तान सरकार और उसके थिंक टैंक अमेरिका में अपनी छवि सुधारने में लगे हुए हैं। इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने यूनाइटेड स्टेट्स में लॉबिंग और पब्लिक पॉलिसी आउटरीच पर $900,000 यानी ₹80864097.30 खर्च किए। इस दौरान पाकिस्तानी दूतावास ने अमेरिकी फर्म एर्विन ग्रेव्स स्ट्रैटजी ग्रुप LLC के साथ समझौता किया, ताकि हर अमेरिकी सांसद, अधिकारियों और नीति बनाने वालों तक पहुँच बन सके। मीडिया में नैरेटिव बदलने के लिए एक अमेरिकी कंपनी, कॉर्विस होल्डिंग इंक को लगाया गया ताकि पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के लिए अमेरिकी दौरे के दौरान आर्मी चीफ आसीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने रेयर अर्थ मिनरल्स भी गिफ्ट किए। इसका नतीजा ये रहा कि रेयर अर्थ मिनरल्स और मेटल्स पर पाकिस्तान और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच करार हुआ। दस्तावेज में खोज, माइनिंग, प्रोसेसिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर सहयोग के बारे में बताया गया है, जिसकी $1 ट्रिलियन यानी करीब 8.9 लाख करोड़ रुपए तक इंडिकेटिव कमर्शियल वैल्यू होगी।

बुजुर्गों की इतनी ‘कोशिश’ के बावजूद Gen Z इन्हें देश के लिए ‘बेकार’ बता रहे हैं।

बगावत के लिए तैयार पाकिस्तान के Gen Z

पाकिस्तान के Gen Z का गुस्सा भड़क रहा है। ये लोग सत्ता पर काबिज नेताओं और सेना के अधिकारियों को चुनौती दे रहे हैं। सेना ने एक वायरल लेख को हटवा दिया है, जिसमें उनकी पोल पट्टी खोली कर रख दी गई थी।

देश के हर हिस्से में हो रहे विरोध को कुचलने वाली असीम मुनीर की सेना को एक लेख ने विचलित कर दिया। कैसे पाकिस्तान के सोशल मीडिया यूजर इस मुद्दे पर अपनी सरकार-सेना को घेर रहे हैं, ट्विटर पर इस ट्रेंड को देख कर समझा जा सकता है।

इसमें कहा गया है कि ‘जितना चाहें, आप लोगों को लड़वाएँ’, जेन जी इस पर मीम बनाएगा। दरअसल अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ अर्कांसस में PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी के एक लेख को डिलीट कर दिया गया। इसमें उसने पाकिस्तान के हुक्मरानों को साफ-साफ बताया था कि Gen Z अब उनकी बातों में आने वाला नहीं है और न ही उनके झूठे दावों को मानने वाला है।

इसमें बताया गया है कि नौजवान और जेन जी अब पुराने नेताओं की बातों में नहीं आने वाले हैं। पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था से यह बगावत की शुरुआत है। लेख देखते ही देखते वायरल हो गया। इससे घबराकर लेख को डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया।

पाकिस्तान में अब Gen Z बगावत करने जा रहे हैं। इस बगावत में हिंसा नहीं बल्कि विचार है। विचारों को रोकने के लिए पाकिस्तानी शासन के प्रयास को भी ये लेख बता रहा है। जबरदस्ती चुप करने की कोशिश की जा रही है। बगावत की शुरुआत एक युवा पाकिस्तानी छात्र के विचार से शुरू हुआ है। उसने बताया है कि कैसे देश की युवा पीढ़ी पुराने नेताओं के आदेश मानना ​छोड़ चुकी है।

लेख में साफ कहा गया है कि “आप जितना चाहे उतना लड़ाइयाँ करवा सकते हैं, Gen Z उससे मीम बनाएगा। सभी मेनस्ट्रीम मीडिया को सेंसर कर दो, Gen Z अपनी राय बताने के लिए रंबल, यूट्यूब और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर चला जाएगा। बूमर्स, अब आप विचारों को सेंसर नहीं कर सकते। वे दिन गए जब आप लोगों को बेवकूफ बना सकते थे। अब किसी को बेवकूफ नहीं बनाया सकता है।”

यह लेख एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन पर था, जो अब मौजूद नहीं है यानी जैसा लेखक जोरैन निजमानी ने कहा, ठीक वैसा ही हुआ है। यहाँ सच बताने के लिए यूट्यूब से लेकर दूसरे सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। चैनल पर सेना प्रमुख असीम मुनीर और शहबाज सरकार के खिलाफ खबरें आनी बंद हो गई हैं। इस पर ही Gen Z कह रहा है कि इस तरह की घटिया तरीकों से हुक्मरान नहीं बच सकते। सच को ज्यादा देर तक दबाया नहीं जा सकता।

पाकिस्तानी सेना के हुक्म से हटाया गया लेख

अमेरिका में रहने वाले पाकिस्तानी PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी का ‘इट इज ओवर’ टाइटल वाला यह लेख असल में 1 जनवरी को एक जाने-माने पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर था। हालाँकि कुछ घंटों बाद ही इसे हटा दिया गया। इसके पीछे पाकिस्तान की आर्मी का दबाव था।

दरअसल निजमानी जेन जी के बीच इस लेख की वजह से ‘हीरो’ बन गया। लेख पर रोक के बाद इसका स्क्रीन शॉट जेन जी शेयर कर रहे हैं। जेन जी का गुस्सा आसीम मुनीर की पाकिस्तानी आर्मी पर दिख रहा है। इसे सेंसरशिप कहा जा रहा है और बेबाक लेखन के लिए एक्टर फाजिला काजी और कैसर खान निजमानी के बेटे जोरैन निजमानी की तारीफ की जा रही है।

देशभक्ति जबरन पढ़ाई-सिखाई नहीं जाती- जोरैन निजमानी

लेख में बताया गया है कि पाकिस्तान के सत्ताधारी वर्ग का अब युवा पीढ़ी पर अपना असर खत्म हो गया है। देश के हुक्मरान देशभक्ति को बढ़ाने के लिए स्पॉन्सर लेक्चर, सेमिनार और कैंपेन चला रहे हैं, इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। सरकार के ये सारे प्रयास बेकार हैं।

उन्होंने लिखा, “सत्ता में बैठे बड़े-बूढ़ों पर से युवा पीढ़ी यकीन नहीं कर रही है। ये लोग समझ रहे हैं कि सत्ताधारी बस आम जनता को बरगला रहे हैं। ये लोग स्कूलों और कॉलेजों में देशभक्ति को बढ़ावा देने के लिए चाहे कितने भी वाद-विवाद और सेमिनार कर लें, यह काम नहीं कर रहा है।”

सेना का नाम लिए बिना सारी बातें कही गई है। पीएचडी छात्र निजमानी कहते हैं कि देशभक्ति भाषणों या नारों से नहीं सिखाई जा सकती, बल्कि यह अपने आप बढ़ती है, जब नागरिकों को समान अवसर, भरोसेमंद इंफ्रास्ट्रक्चर, काम करने वाले सिस्टम और गारंटी वाले अधिकार दिए जाते हैं।

उन्होंने कहा, “जब बराबर मौके, अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर और अच्छे सिस्टम हों तो देशभक्ति अपने आप आती ​​है। जब आप आम जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरी करते हैं। उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि उनके अधिकार सुरक्षित हैं, तब आपको स्कूलों या कॉलेजों में जाकर देशभक्ति सिखाने की जरुरत नहीं होती। लोग खुद ही अपने देश को पसंद करते हैं।”

पाकिस्तानी सच्चाई को बता रहा ये लेख हुक्मरानों को इतना कड़वा लगा कि उन्होंने इसे हटवा दिया, क्योंकि जनता असलियत को समझ रही है। हालाँकि लेख Gen Z और Gen Alpha को सेंटर में रख कर लिखा गया है।

इसमें कहा गया है, “युवा दिमाग, Gen Z, Alphas अच्छी तरह जानते हैं कि क्या हो रहा है। देशभक्ति के विचार को ‘बेचने’ की कोशिशों को वे अच्छी तरह समझ रहे हैं। इंटरनेट की वजह से, हमारे पास जो भी थोड़ी बहुत एजुकेशन बची है, उसकी वजह से लोगों तक बातें पहुँच रही हैं। वरना लोगों को अनपढ़ रखने की सत्ता पर बैठे लोगों ने पूरी कोशिश की, लेकिन फेल हो गए। हालाँकि जनता अपनी बात डर की वजह से नहीं कह पा रही है, क्योंकि उसे साँस लेना ज्यादा पसंद है।”

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया की जानकारी लोगों तक पहुँचाना आसान बना दिया है, इसलिए लोगों की सोच को कंट्रोल नहीं किया जा सकता। युवाओं में काफी बेचैनी है, जो लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने आगे कहा, “युवा समझ रहे हैं कि वे सत्ता में बैठे लोगों को चैलेंज नहीं कर सकते, इसलिए देश छोड़ रहे हैं। वे चुपचाप निकल जाना पसंद करेंगे। पीछे मुड़कर भी नहीं देखेंगे क्योंकि उनके दोस्तों ने आवाज उठाई तो उन्हें चुप करा दिया गया।”

पाकिस्तान में लेख हटाने का हो रहा विरोध

डिजिटल प्लेटफॉर्म से लेख हटाने का पाकिस्तान में काफी विरोध हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की कनाडाई विंग ने दावा किया कि आर्टिकल हटाने से यह पक्का हो गया है कि जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती।

पार्टी ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “ज़ोरेन निज़ामानी का आर्टिकल ‘इट इज ओवर’ को हटाया जाना, ये बताता है कि पाकिस्तान का सच क्या है। जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती। Gen Z करप्शन, गैर-बराबरी और दोहरे चरित्र को समझती है। इंसाफ़, नौकरी और इज्जत के बिना प्रोपेगैंडा फेल हो जाता है। पुराने कंट्रोल के तरीके खत्म हो गए हैं, युवा आगे बढ़ गए हैं।”

पाकिस्तानी एक्टिविस्ट मेहलका समदानी ने लिखा, “हैरानी की बात नहीं है कि यह लेख अब एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन से एक्सेस नहीं हो रहा है – ठीक वैसी ही सेंसरशिप जिसके बारे में ज़ोरेन बात करते हैं।”

वकील अब्दुल मोइज़ जाफ़री ने कहा, “यह बहुत बढ़िया लेख है। पाकिस्तान में अपनी नौकरी में फेल हो रहे हर जवान से लेकर हर बूढ़े आदमी के दिल से लिखा गया है।” पाकिस्तान की मानवाधिकार आयोग ने भी लेख हटाने की आलोचना की है और कहा है कि एक्सप्रेस ट्रिब्यून से जोरीन निजमानी का लेख हटाना पाकिस्तान में बोलने की आजादी पर बढ़ती पाबंदियों का उदाहरण है।

पाकिस्तान की ये हालत है कि बलूचिस्तान, पीओके समेत कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। खाने-पीने के लाले पड़े हैं। आम जनता को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो रही। सबकुछ काफी महँगा हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। इस बीच जेन जी का गुस्सा भड़कने लगा है। हुक्मरानों के ऐशो आराम जेन जी को दिख रहे हैं। ऐसे में भारत का एक और पड़ोसी देश जेन जी के गुस्से का शिकार होने के लिए तैयार है।

‘माजिद फ्रीमैन के लिए हो जाओ एकजुट’: लेस्टर हिंदू-विरोधी हिंसा को भड़काने वाले के समर्थन में उतरा कट्टरपंथी संगठन Cage International, भीड़ को कोर्ट के बाहर इकट्ठा होने के लिए उकसाया

सितंबर 2024 में मुस्लिम ‘एक्टिविस्ट’ माजिद फ्रीमैन को 2022 में लेस्टर में हुई हिंदू-विरोधी हिंसा के दौरान भड़काऊ गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई थी। उस पर आरोप था कि उसने उस हिंसा के दौरान हिंदुओं की भूमिका को लेकर झूठी और भ्रामक बातें फैलाई थीं। उस समय माजिद फ्रीमैन ने अदालत में अपने बचाव में कोई दलील भी नहीं दी क्योंकि उसके पास अपने कुकृत्यों को सही ठहराने का कोई आधार नहीं था।

अब ब्रिटेन का NGO कैज इंटरनेशनल (CAGE International) उसकी इन्हीं गतिविधियों को नजरअंदाज करते हुए इस्लामी कट्टरपंथी को निर्दोष साबित करने की कोशिश में एक अभियान चला रहा है और उसकी हिंदू-विरोधी और आपराधिक भूमिका को छिपाने का प्रयास कर रहा है।

CAGE International को पहले CagePrisoners Project के नाम से जाना जाता था। 9 जनवरी को लेस्टर मामले में होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले उसके समर्थन में लोगों को जुटा रहा है। इस संगठन ने एक पर्चे में फ्रीमैन को ‘मानवतावादी’ और ‘एंटी-जेनोसाइड एक्टिविस्ट’ बताया है। इसमें दावा किया गया है कि उसे ‘2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान लेस्टर समुदाय का बचाव करने के अपराध में एक राजनीतिक रूप से प्रेरित मुकदमे में दोषी ठहराया गया’।

CAGE International ने X पर लिखा, “माजिद फ्रीमैन के लिए एकजुट हों। मानवतावादी और प्रो-फिलिस्तीन एक्टिविस्ट माजिद फ्रीमैन ने 2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान, लेस्टरशायर पुलिस की कई नाकामियों के बाद लेस्टर के लोगों के लिए आवाज उठाई थी। उसे पिछले साल एक राजनीतिक मुकदमे में दोषी ठहराया गया। उसके दोबारा ट्रायल में उसके साथ एकजुटता दिखाएँ। हम माजिद के साथ खड़े हैं।”

हिंदू अधिकारों की वकालत करने वाले INSIGHT UK समूह ने इसे लेकर CAGE International पर सवाल उठाए हैं। INSIGHT UK ने संगठन पर ‘विक्टिम-फ्लिपिंग’ का आरोप लगाया है ताकि उसके हिंदू विरोधी कृत्यों को कम करके दिखाया जा सके।

INSIGHT UK ने लिखा, “माजिद फ्रीमैन को दोषी ठहराया गया है। इसके बावजूद CAGE ‘पीड़ित को ही अपराधी’ बता रहा है और एक ऐसा अभियान चला रहा है जो उसे एक सताए गए समुदाय के रक्षक के रूप में पेश कर रहा है और उसके उन कामों को कम करके दिखा रहा है। इसने पहले से ही तनावग्रस्त और हिंसा झेल रहे शहर में हिंदू विरोधी भावनाओं को भड़काया था। CAGE का चरमपंथियों का बचाव करने का लंबा इतिहास है और अब ऐसे व्यक्ति के लिए समर्थन क्यों जुटा रहा है जिसके कामों ने लीसेस्टर में हिंदुओं के लिए नफरत और डर को और बढ़ा दिया?”

माजिद फ्रीमैन की सजा और पूरा मामला

9 सितंबर 2024 को माजिद फ्रीमैन को 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई। उस पर आरोप था कि उसने 2022 में ब्रिटेन के लीसेस्टर शहर में हुए हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान हिंसा भड़काने की कोशिश की और सोशल मीडिया के जरिए झूठ और भ्रामक जानकारी फैलाई। नॉर्थ हैम्पटन मजिस्ट्रेट्स कोर्ट में डिस्ट्रिक्ट जज अमर मेहता ने उसे पब्लिक ऑर्डर ऑफेंस की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने कहा कि फ्रीमैन का इरादा हिंसा करवाने का था और उसने ऐसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जिनका मकसद लोगों को हिंसा के लिए उकसाना था।

जुलाई 2023 में माजिद फ्रीमैन एक और गंभीर मामले में भी घिर चुका था। उस पर आतंकवाद भड़काने और प्रतिबंधित आतंकी संगठन हमास का समर्थन करने के आरोप लगे थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माजिद फ्रीमैन का असली नाम माजिद नोवसार्का है। उसे 9 जुलाई 2023 को काउंटर टेररिज्म से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। अदालत को बताया गया कि 26 दिसंबर 2022 से 20 जून 2023 के बीच फ्रीमैन ने कई बार ऐसे बयान दिए जो हमास जैसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन के पक्ष में थे।

सरकारी वकील बिर्गिटे हागेम ने कोर्ट में कहा था कि माजिद फ्रीमैन 11 मार्च 2015 को सोशल मीडिया के जरिए लोगों को आतंकी गतिविधियाँ करने, उनकी योजना बनाने या दूसरों को इसके लिए उकसाने की कोशिश कर रहा था। इसका संबंध फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ पर हुए 2015 के आतंकी हमले से था।

माजिद फ्रीमैन ने लीसेस्टर में हिंदू विरोधी हिंसा भड़काई

भारत-पाकिस्तान टी20 मैच में 28 अगस्त 2022 को भारत की जीत के बाद लीसेस्टर में तनाव फैल गया। इस दौरान हुई एक झड़प में भारतीय ध्वज का अपमान किया गया। हालात बिगड़ने के बावजूद स्थानीय हिंदू समुदाय ने शांति बनाए रखने की कोशिश की और यहाँ तक कि झंडे का अपमान करने वाले व्यक्ति की मदद भी की।

इसके बावजूद माजिद फ्रीमैन ने हिंदुओं के खिलाफ झूठा प्रचार शुरू किया, जिससे हिंसा और भड़क गई। 30 अगस्त 2022 को उन्होंने यह झूठा दावा किया कि लीसेस्टर में हिंदुओं ने मुसलमानों की मौत जैसे नारे लगाए। बाद में पुलिस जाँच में यह आरोप पूरी तरह गलत पाया गया।

इसी दिन माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह अफवाह भी फैलाई कि लीसेस्टर में कुरान का अपमान किया गया है और इसके लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराया। जाँच में यह दावा भी पूरी तरह झूठा साबित हुआ। हालाँकि, इन झूठी खबरों और भ्रामक दावों के कारण पहले ही माहौल बिगड़ चुका था और तनाव बढ़ गया था।

इसके अलावा माजिद फ्रीमैन ने एक और झूठा आरोप लगाकर माहौल को और भड़काया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू युवकों के एक समूह ने एक मुस्लिम किशोर का पीछा कर उस पर हमला किया, जबकि यह आरोप भी गलत पाया गया। 4 सितंबर 2022 को, जब लीसेस्टर में मुस्लिम भीड़ हिंदुओं पर हमला कर रही थी, उसी दौरान माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया के जरिए अपने समुदाय के लोगों को हिंदुओं के खिलाफ और उकसाया। उनके भड़काऊ पोस्टों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया और हिंसा को बढ़ावा मिला।

लीसेस्टर में हिंदुओं पर 4 से 7 सितंबर के बीच मुस्लिमों ने हमले किए। स्थानीय गणेश चतुर्थी समारोह को भीड़ ने बाधित किया और हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर अंडे फेंके। एक हिंदू पुरुष पर हमला भी हुआ। एक अन्य मामले में, जब माजिद फ्रीमैन ने झूठा दावा किया कि कुछ हिंदू पुरुषों ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की, तो एक हिंदू पुरुष को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया। पुलिस ने बाद में खुलासा किया कि यह पूरी कहानी झूठी थी।

सोशल मीडिया पर माजिद फ्रीमैन की टीम, ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) और अमेरिका स्थित ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) जैसे कट्टरपंथी संगठन लंबे समय से एक खास कहानी को हवा दे रहे हैं। उनका दावा है कि लीसेस्टर हिंसा के दौरान फ्रीमैन ने एक हिंदू व्यक्ति की जान बचाई थी। इस नैरेटिव के जरिए वे फ्रीमैन को हिंसा भड़काने वाले अपराधी के बजाय एक ‘रक्षक’ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

हालाँकि, यह कहानी बिल्कुल वैसी ही लगती है जैसा शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में देखने को मिला था। उस समय भी ‘इस्लामो-लेफ्टिस्ट’ गुटों ने यह नैरेटिव फैलाया था कि ‘मुस्लिम हिंदू मंदिरों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखला बना रहे हैं’। यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि वे आखिर हिंदुओं की रक्षा किससे कर रहे थे?

ठीक यही बात माजिद फ्रीमैन पर भी लागू होती है। फ्रीमैन ने बुनियादी तौर पर अपने ही समुदाय के लोगों को हिंदुओं पर हमला करने के लिए उकसाया था। ऐसे में, जिस भीड़ को उसने खुद भड़काया, उसी भीड़ से कथित तौर पर एक हिंदू को बचा लेने भर से उसके दंगा भड़काने के गुनाह कम नहीं हो जाते। यह दलील देना कि वह रक्षक है, उतना ही बेतुका है जितना आग लगाने वाले का यह कहना कि उसने एक व्यक्ति को जलने से बचा लिया था।

केज इंटरनेशनल की ‘माजिद फ्रीमैन को रिहा करो’ की वकालत

वर्ष 2003 में ‘केजप्रिज़नर्स प्रोजेक्ट’ (CagePrisoners Project) के रूप में शुरू हुआ यह संगठन 2013 में ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) बन गया। अपनी वेबसाइट के अनुसार, यह संस्था उन कैदियों की स्थिति और उनके ठिकाने के बारे में जानकारी देने का काम करती है, जिन्हें ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के तहत पकड़ा गया है। यह डेटा उनके परिवारों, वकीलों, मीडिया और शिक्षाविदों के लिए जुटाया जाता है।

हालाँकि, इस एनजीओ (NGO) का इतिहास विवादों से भरा रहा है। ‘आतंकवाद विरोधी कानूनों’ के दुरुपयोग का विरोध करने के नाम पर यह संस्था कई बार इस्लामी कट्टरपंथियों और यहाँ तक कि खूंखार आतंकवादियों का बचाव करती नजर आई है। इसका एक बड़ा उदाहरण सितंबर 2022 में देखने को मिला, जब ‘केज इंटरनेशनल’ ने मोहम्मद रहीम अल-अफगानी की रिहाई की वकालत की थी। गौरतलब है कि अल-अफगानी खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन का बेहद करीबी सहयोगी रहा है।

इसके अलावा, केज इंटरनेशनल (CAGE International) ‘लेडी अल-कायदा’ के नाम से कुख्यात आफिया सिद्दीकी की रिहाई के लिए भी वकालत कर चुका है। सिद्दीकी फिलहाल अफगानिस्तान में अमेरिकी अधिकारियों पर हमले के जुर्म में दोषी करार दिए जाने के बाद 86 साल की जेल की सजा काट रही है। ऑपइंडिया की एक पिछली रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में अमेरिकी न्याय विभाग ने उसके पास से कई संदिग्ध चीजें बरामद की थीं। इनमें उसके हाथ से लिखे कुछ नोट्स भी शामिल थे, जिनमें बड़े पैमाने पर जनहानि करने वाले हमलों का जिक्र किया गया था।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) फिलिस्तीनी इस्लामिक आतंकी संगठन हमास का भी कट्टर समर्थक है। अगर फिर से माजिद फ्रीमैन की बात करें, तो इसी ‘इस्लामिस्ट एनजीओ’ ने जुलाई 2025 में फ्रीमैन के समर्थन में एक एकजुटता कार्यक्रम आयोजित किया था। इस संस्था ने दावा किया कि फ्रीमैन पर आतंकवाद के आरोप सिर्फ इसलिए लगाए गए हैं क्योंकि उन्होंने फिलिस्तीन के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए कुछ शब्द साझा किए थे।

लीसेस्टर में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा के मामले में माजिद फ्रीमैन को दोषी करार दिए जाने के तुरंत बाद, ‘केज इंटरनेशनल’ने एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इस कट्टरपंथी संगठन ने दावा किया कि फ्रीमैन को एक ‘राजनीति से प्रेरित हिंदुत्व दंगा ट्रायल’ के तहत जेल भेजा गया है।

हैरानी की बात यह है कि इस संगठन ने लीसेस्टर के पीड़ित हिंदुओं को ही ‘हिंदुत्ववादी आंदोलनकारी’ बता दिया और उन्हें 2022 की उस हिंसा का गुनहगार ठहराने की कोशिश की, जो असल में कट्टरपंथियों द्वारा सुनियोजित थी। जबकि सच यह है कि उस समय हिंदू समाज ही इन हमलों का शिकार हुआ था और इस पूरी हिंसा की आग को माजिद फ्रीमैन द्वारा फैलाई गई झूठी खबरों (डिसइन्फॉर्मेशन) ने ही हवा दी थी।

लीसेस्टर में हुई हिंसा को लेकर ‘केज इंटरनेशनल’ ने बेहद गंभीर और भ्रामक दावा किया है। इस संगठन का कहना है कि ‘2022 में लीसेस्टर में ‘हिंदुत्व’ से प्रेरित जो दंगे हुए, उनमें लीसेस्टरशायर पुलिस और विशेष रूप से चीफ कांस्टेबल रॉब निक्सन स्थिति को संभालने में पूरी तरह नाकाम रहे। पुलिस ने मुस्लिम मोहल्लों में हिंदुत्ववादी आंदोलनकारियों को अर्धसैनिक शैली (paramilitary-style) में मार्च करने की इजाजत दी, जिससे सीधे तौर पर सामुदायिक तनाव पैदा हुआ।’

हालाँकि, सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। भले ही माजिद फ्रीमैन, मोहम्मद हिजाब (एक अन्य कट्टरपंथी और हिंसा का मुख्य उकसाने वाला) और उनके समर्थक लगातार ‘हिंदुत्व’ और हिंदुओं को इस हिंसा का दोषी ठहराने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने उनके इस प्रोपेगेंडा की धज्जियाँ पहले ही उड़ा दी हैं। कोर्ट की जाँच में यह साफ हो चुका है कि हिंदुओं के खिलाफ हिंसा सुनियोजित थी।

अब, 9 जनवरी को होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले, ‘केज इंटरनेशनल’ (मुख्य रूप से पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश मुस्लिम चलाते हैं) कट्टरपंथियों को लीसेस्टर क्राउन कोर्ट के बाहर जुटने के लिए उकसा रहा है। इसे ‘एकजुटता’ दिखाने का नाम दिया जा रहा है, लेकिन जानकारों के बीच यह चिंता बढ़ गई है कि यह एकजुटता नहीं, बल्कि अदालती कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए ‘शक्ति प्रदर्शन’ की एक सोची-समझी कोशिश है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण में अड़ंगा डाल नेहरू ने की शुरुआत, वही लीगेसी आगे बढ़ाता रहा गाँधी परिवार: प्रवेश के बाद राहुल गाँधी ने खुद को बताया ‘गैर-हिंदू’

सोमनाथ का नाम आते ही इतिहास अपनेआप बोलने लगता है। वह मंदिर, जिसे बार-बार तोड़ा गया, बार-बार लूटा गया, पर हर बार हिंदू समाज ने उसे फिर खड़ा किया। मंदिर के इसी संघर्ष को 1000 साल पूरे होने जा रहे हैं, जब 1026 ईस्वी में मुस्लिम शासक महमूद गजनवी ने मंदिर पर आक्रमण किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी बताया और कहा कि यह संदेश देता है कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं।

इसी बीच राहुल गाँधी का नाम भी सोमनाथ मंदिर से चर्चा में आया है। राहुल गाँधी का वह पुराना किस्सा, जिसपर कॉन्ग्रेसियों ने खूब पाखंड फैलाया। जब साल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर गए थे। उस वक्त मंदिर के विजिटर रजिस्टर की एक एंट्री को लेकर विवाद हुआ।

मंदिर के रजिस्टर में धर्म के कॉलम में राहुल गाँधी का धर्म ‘ईसाई’ दर्ज बताया गया। बाद में इस पर तर्क भी दिए गए, लेकिन सवाल वहीं का वहीं रहा। कॉन्ग्रेस के पास स्पष्टीकरण के लिए कुछ नहीं था, बल्कि लोगों को और ज्यादा भ्रम में डाल दिया गया। बात यहाँ आकर टिकी कि राहुल गाँधी का गैर-हिंदू रजिस्टर में नाम लिखा गया। लेकिन आज भी राहुल गाँधी के ‘ईसाई’ होने का लोगों का सवाल ज्यों की त्यों ही है।

यह राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस की वही सोच है, जो बार-बार हिंदू आस्था के सवाल पर असहज दिखाई देती है। यह कोई एक घटना या बयान की बात नहीं है, बल्कि एक लंबी राजनीतिक और वैचारिक परंपरा का हिस्सा है। राहुल गाँधी खुद को हिंदू बताते हैं, मंदिर-मंदिर दर्शन करते हैं, लेकिन जब बात धार्मिक पहचान की आती है तो तस्वीर धुँधली हो जाती है।

सोमनाथ सिर्फ राहुल गाँधी की एक यात्रा का मुद्दा नहीं है। यह उस विरासत का हिस्सा है, जिसे उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस दशकों से लेकर चल रही है। आजादी के बाद जब देश ने तय किया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण होगा, तब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके पक्ष में थे। सरदार पटेल ने इसे हिंदू समाज के आत्मसम्मान से जोड़ा।

लेकिन उस समय राहुल गाँधी के परनाना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पुनर्निमाण से असहज थे। उन्होंने खुलकर कहा था कि देश को धार्मिक पुनर्निमाण से दूर रहना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रपति के उद्घाटन में जाने पर भी आपत्ति जताई। यह तथ्य इतिहास का हिस्सा है।

क्यों राहुल गाँधी का साल 2017 के उस किस्से से लेकर नेहरू के सोमनाथ विरोध तक एक ही धागे में जुड़े दिखते हैं। क्यों यह कॉन्ग्रेस पार्टी की वही हिंदू-विरोधी लीगेसी है। यह कोई अचानक पैदा हुई सोच नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही वह असहजता है। जो हिंदू आस्था के सवाल पर बार-बार सामने आती रही है। राहुल गाँधी का सोमनाथ जाना और फिर विजिटर रजिस्टर में धर्म को लेकर उठा विवाद नेहरू की सोमनाथ मंदिर पर असहजता का आधुनिक रूप लगता है, जैसे इतिहास खुद वर्तमान को आईना दिखा रहा हो।

समय बदला, पीढ़ियाँ बदलीं लेकिन यह असहजता बनी रही। कभी राम मंदिर आंदोलन को कट्टरता कहकर खारिज किया गया। कभी काँवड़ यात्रा पर सवाल उठाए गए कि सड़कें क्यों रोकी जाती हैं। कभी दीपावली पर पटाखों को लेकर नैतिकता का पाठ पढ़ाया गया।

कॉन्ग्रेस की राजनीति में यह पैटर्न बार-बार उभरता है। हिंदू आस्था को या तो संदेह की नजर से देखा जाता है या फिर उसे राजनीतिक रूप देकर असहज मान लिया जाता है। राहुल गाँधी का साल 2017 वाला सोमनाथ मंदिर का किस्सा इसी लंबे सिलसिले की एक कड़ी बन जाता है। यह किस्सा छोटा हो सकता है, लेकिन यह उस बड़ी कहानी को मजबूती देता है जिसमें कॉन्ग्रेस और हिंदू आस्था के बीच दूरी साफ दिखाई देती है।

यही वजह है कि जब आज सोमनाथ पर हुए आक्रमण के 1000 साल पूरे होने की बात होती है, तो सिर्फ महमूद गजनवी की बात नहीं होनी चाहिए। बल्कि यह भी जरूरी है कि आज की राजनीति उस इतिहास से क्या सीख लेती है।

एक तरफ प्रधानमंत्री खुलकर सोमनाथ को भारत की अटूट आस्था का प्रतीक बताते हैं और दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस की वही पुरानी असहजता बार-बार सामने आती है। यही कारण है कि समस्या सिर्फ घटना या बयान की नहीं, बल्कि उस लीगेसी की है, जो हिंदू आस्था को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते।

सोमनाथ आज भी खड़ा है, वो भी पहले से अधिक मजबूत। शायद यही इस देश की सबसे बड़ी सच्चाई है।