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भारत मारता रहा, पाकिस्तान नुकसान गिनता रहा: CHPM की रिपोर्ट में खुलासा, कैसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में घुटनों पर आए PAK ने लगाई सीजफायर की गुहार

भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए सैन्य टकराव को लेकर यूरोप के एक इंडिपेंडेंट मिलिट्री इंस्टीट्यूट की अहम रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान को किस तरह नाकों चने चबवा दिए थे। रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान करीब 88 घंटे तक भारत का आसमान पर पूरा नियंत्रण बना रहा। यानी उस समय भारत की वायुसेना पाकिस्तान पर भारी पड़ी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस हवाई बढ़त की वजह से पाकिस्तान सैन्य और रणनीतिक रूप से कमजोर हो गया। हालात इतने बिगड़ गए कि आखिरकार पाकिस्तान को युद्धविराम की अपील करनी पड़ी।

यह रिपोर्ट ‘Operation Sindoor: The India-Pakistan Air War (7–10 May 2025)‘ नाम से प्रकाशित हुई है। इसे स्विट्जरलैंड के पुली शहर में स्थित एक इंडिपेंडेंट मिलिट्री इंस्टीट्यूट The Centre for military history and perspective studies (CHPM) ने जारी किया है। इस रिपोर्ट के लेखक एड्रियन फोंटानेलाज हैं। यह संस्थान 1969 से काम कर रहा है और किसी भी सरकार से जुड़ा नहीं है, इसलिए इसके विश्लेषण को निष्पक्ष माना जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने न केवल अपने सैन्य और नागरिक ठिकानों को अभेद्य सुरक्षा कवच से सुरक्षित रखा बल्कि पाकिस्तान के सैन्य अड्डों पर बेहद सटीक, गहरे और निर्णायक हमले कर उसकी कमर तोड़ दी। इस संघर्ष में यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि कब, कहाँ और किस स्तर तक कार्रवाई होगी यह सब भारत तय कर रहा था जबकि पाकिस्तान सिर्फ नुकसान गिनने को मजबूर था।

पहलगाम हमले के बाद बदली भारत की रणनीति

सैन्य रिपोर्ट के मुताबिक, पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की प्रतिक्रिया इस बार पूरी तरह बदली हुई और कहीं ज्यादा आक्रामक थी। बीते अनुभवों से अलग, इस बार संकट से निपटने की रणनीति न सिर्फ स्पष्ट और सख्त थी, बल्कि हर स्तर पर पूरी तरह तैयार भी दिखी।

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इस बार राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच अभूतपूर्व तालमेल देखने को मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने सशस्त्र बलों को दो-टूक संदेश दे दिया था कि आतंकवाद के खिलाफ आधे-अधूरे कदम नहीं बल्कि निर्णायक, ठोस और परिणाम देने वाली कार्रवाई ही होगी।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के ठिकानों पर पाकिस्तान के भीतर हमले करने की अनुमति दी। साथ ही सेना और वायुसेना को यह छूट दी गई कि वे हालात को देखते हुए कार्रवाई के स्तर को खुद तय करें। 7 और 8 मई की रात जब पाकिस्तान की तरफ से हमलों की पहली कोशिश हुई, तो भारत ने पहले से तैयार दूसरे चरण की सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। इसी कार्रवाई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम दिया गया।

रिपोर्ट साफ कहती है कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक जवाबी हमला नहीं था बल्कि यह पहले से सोची-समझी पहले से बनाई गई योजना और रणनीतिक सैन्य योजना का हिस्सा था, जिसका मकसद पाकिस्तान और आतंकी नेटवर्क पर दबाव बनाना था।

IAF का स्ट्राइक और पाकिस्तानी एयर डिफेंस की कमजोरी

भारतीय वायुसेना (IAF) ने 8 मई 2025 को पाकिस्तान के खिलाफ बड़ा हवाई अभियान शुरू किया। इस दौरान एयर इंटरडिक्शन और एयर स्ट्राइक की गई। इन हमलों का मुख्य मकसद पाकिस्तान की सीमा निगरानी रडार सिस्टम, लंबी दूरी की एयर डिफेंस मिसाइलें (SAM) और एयरफोर्स के अहम ठिकानों को कमजोर करना था।

यूरोपीय सैन्य रिपोर्ट के अनुसार, 8 मई को पाकिस्तान के आठ एयरफोर्स बेस भारतीय हवाई हमलों की चपेट में आए। इसके बाद 9 मई को चार और एयरफोर्स ठिकानों को निशाना बनाया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन लगातार हमलों से पाकिस्तान की वायुसेना को भारी नुकसान पहुँचा और उसके एयर डिफेंस सिस्टम पर सीधा दबाव बना।  

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनियन और पसूर इलाकों में लगे कम से कम दो अर्ली-वॉर्निंग रडार सिस्टम पूरी तरह निष्क्रिय हो गए। ये रडार पाकिस्तान को पहले से हवाई हमले की चेतावनी देने में अहम भूमिका निभाते थे। इसके अलावा भारतीय वायुसेना ने HQ-9 एयर डिफेंस बैटरी को भी निशाना बनाया।

हालाँकि, पाकिस्तान ने यह दावा किया कि उसने 9 मई की सुबह 25 भारतीय ड्रोन मार गिराए लेकिन रिपोर्ट में इस दावे को लेकर कोई ठोस सबूत नहीं बताया गया है। रिपोर्ट का एक बड़ा खुलासा यह भी है कि सीमा के पास पहले से तैनात IAF की S-400 एयर डिफेंस सिस्टम ने पाकिस्तान की वायुसेना को पूरी तरह चौंका दिया। इस सिस्टम की मदद से करीब 300 किलोमीटर दूर उड़ रहे एक एरीये या इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर विमान को मार गिराने में सफलता मिली।

इन हमलों के बाद पाकिस्तान का एयर डिफेंस नेटवर्क लगभग ठप हो गया। कई रडार सिस्टम या तो नष्ट हो गए या फिर हमलों से बचने के लिए बंद कर दिए गए। इसका सीधा फायदा यह हुआ कि भारतीय लड़ाकू विमानों के लिए पाकिस्तान की सीमा के पास और अंदर तक ऑपरेशन करना काफी आसान हो गया।

भारतीय एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान की सैन्य ताकत कमजोर

यूरोपीय सैन्य रिपोर्ट के मुताबिक, 9 मई की शाम पाकिस्तान की ओर से होने वाले संभावित हमले को भारत पहले ही भांप चुका था। जिसके कारण भारतीय वायुसेना ने पहले से तैयार अपनी योजना के तहत 10 मई की रात 2 बजे से 5 बजे के बीच बड़ा और निर्णायक हवाई हमला किया।

इस कार्रवाई में भारतीय वायु क्षेत्र के भीतर से ही Su-30MKI, जैगुआर और राफेल लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया गया। इन विमानों से ब्रह्मोस, SCALP-EG और रैम्पेज जैसी आधुनिक और लंबी दूरी की मिसाइलें दागी गईं। हमलों का दायरा पाकिस्तान के भीतर लगभग 200 किलोमीटर तक फैला हुआ था और कुल सात अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, इन लक्ष्यों में एक एयर डिफेंस SAM बैटरी और पाकिस्तान के पाँच प्रमुख एयर बेस शामिल थे। इस्लामाबाद के पास स्थित नूर खान एयर बेस पर किए गए मिसाइल हमले में पाकिस्तानी वायुसेना का कमांड-एंड-कंट्रोल सेंटर पूरी तरह नष्ट हो गया, जिससे उसे बड़ा झटका लगा।

इसके अलावा मुरीदके एयर बेस, जो पाकिस्तान के MALE ड्रोन बेड़े का मुख्य केंद्र माना जाता है, वहाँ ड्रोन हैंगर और कंट्रोल सेंटर को भारी नुकसान पहुँचा। वहीं रहीम यार खान एयर बेस की रनवे पर हुए हमले से इतना बड़ा गड्ढा बन गया कि यह बेस ऑपरेशन के लायक नहीं रहा।

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि 10 मई की सुबह करीब 10 बजे, जब पाकिस्तान की ओर से जवाबी हमले के संकेत मिले, तो भारतीय वायुसेना ने दूसरी बड़ी हवाई स्ट्राइक को अंजाम दिया। इस बार भी रणनीति वही रही, लेकिन लक्ष्य और ज्यादा अहम और बड़े थे। इस दौरान सरगोधा एयर बेस की रनवे पर हमला कर उसे पूरी तरह तबाह कर दिया गया।

भारतीय वायुसेना के मुताबिक, इन ताबड़तोड़ हमलों में पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 4 से 5 F-16 फाइटर जेट, एक विमान, एक C-130 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, कई MALE ड्रोन, दो रडार सिस्टम, दो कमांड-एंड-कंट्रोल सेंटर और एक SAM बैटरी नष्ट हुई।

हालाँकि पाकिस्तान ने यह दावा किया कि भोलारी में मौजूद  विमान को केवल मामूली नुकसान हुआ और उसे जल्द ठीक कर लिया गया, लेकिन उसने यह भी स्वीकार किया कि इन हमलों में उसके पाँच सैन्यकर्मियों की मौत हुई।

यूरोपीय सैन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लगातार, सटीक और पहले से तय किए गए हवाई हमलों ने पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को तहस-नहस कर दिया। हालात इतने खराब हो गए कि 10 मई की दोपहर तक पाकिस्तानी सैन्य कमान ने भारत से युद्धविराम की अपील करना शुरू कर दिया।

रिपोर्ट स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक जवाबी कार्रवाई नहीं था बल्कि यह भारत की बदलती रणनीतिक सोच, तकनीकी श्रेष्ठता और बढ़ते सैन्य आत्मविश्वास का खुला प्रदर्शन था। लगभग 88 घंटे तक कायम रही हवाई बढ़त ने यह साबित कर दिया कि अब क्षेत्रीय संघर्षों में नियम और शर्तें तय करने की क्षमता भारत के हाथ में है और यही दबाव अंततः पाकिस्तान को सीजफायर के लिए मजबूर करने वाला बना।

सेना युद्ध में, RSS सेवा मोर्चे पर: 1947 से 71 तक युद्ध में राष्ट्रसेवा की कहानी जिसे वाम इतिहास ने किया अनदेखा, नेहरू ने भी संघ को रिपब्लिक डे परेड के लिए भेजा था न्योता

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने शताब्दी वर्ष में है। संघ का राष्ट्रसेवा का 100 साल का लंबा सफर संघर्षों वाला रहा है और इस मौके पर संघ से जुड़े कई पुराने किस्से फिर से चर्चा में हैं। उन्हीं में एक किस्सा संघ की 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में भागीदारी से जुड़ा है। दिलचस्प बात यह कि इस भागीदारी का निमंत्रण किसी और ने नहीं बल्कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिया था। वामपंथी इतिहास के दौर में RSS से जुड़ी ऐसे किस्सों पर धूल जम गई, उन्हें यादों से मिटाने की पूरी कोशिशें की गईं। जानिए युद्धकाल में संघ की सेवा की कहानी-

1962 का युद्ध और RSS की मदद

1962 का भारत-चीन युद्ध देश के लिए एक कठिन दौर था। नेहरू चीन को पक्का दोस्त माने बैठे तो वहीं RSS के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर देश को चेता चुके थे। गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ के अध्याय ‘Fight to Win‘ में लिखा था कि चीन का इतिहास विस्तारवाद से भरा रहा है। उन्होंने नेपोलियन और स्वामी विवेकानंद के उन कथनों का उल्लेख किया जिनमें चीन को भविष्य में मानवता और भारत के लिए खतरा बताया गया था।

1962 में गुरुजी की आशंका सच साबित हुआ और चीन ने भारत पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद जहाँ सैनिक चीन से लोहा ले रहे थे तो वहीं RSS के स्वयंसेवक पूरे देश में सेवा कार्यों में जुट गए। कहीं वे ट्रैफिक व्यवस्था संभाल रहे थे, तो कहीं सिविल डिफेंस में मदद कर रहे थे। बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने रक्तदान किया और सैनिकों के परिवारों की सहायता की। पूर्वोत्तर भारत में जहाँ युद्ध का सीधा असर पड़ा था वहाँ RSS के स्वयंसेवक सेना और स्थानीय लोगों की मदद के लिए बड़ी संख्या में पहुँचे।

स्वयंसेवकों की अनुशासित कार्यप्रणाली और बिना किसी स्वार्थ के की गई सेवा ने सरकार और आम लोगों दोनों पर गहरा असर डाला। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से RSS के राजनीतिक मतभेद रहे, फिर भी 1962 के युद्ध के दौरान संघ की सेवा को उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया।

इसी कारण एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया। वर्ष 1963 के गणतंत्र दिवस पर RSS के स्वयंसेवकों को परेड में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक खास क्षण था, जब सरकार ने पहली बार सार्वजनिक रूप से RSS की भूमिका और योगदान को मान्यता दी।

गणतंत्र दिवस परेड में पहुँचे संघ के स्वयंसेवक

RSS की वेबसाइट के मुताबिक, 26 जनवरी को दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में RSS को भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। बहुत कम समय की सूचना के बावजूद 3000 स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश और बैंड के साथ इस परेड में शामिल हुए थे।

3 फरवरी 1963 के ऑर्गनाइजर में प्रकाशित गणतंत्र दिवस परेड में संघ स्वयंसेवकों की भागीदारी की खबर

उस दिन की याद करते हुए विजय कुमार ने ऑर्गनाइजर को बताया कि वे उस समय शाहदरा के फर्श बाजार में रहते थे और मंडल कार्यवाह की जिम्मेदारी निभा रहे थे। उनके अनुसार, पंडित नेहरू सरकार की ओर से मार्च-पास्ट में शामिल होने का निमंत्रण आया था।

उन्होंने कहा, “उस समय सोहन सिंह पूरे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के संभाग प्रचारक थे। जब सरकारी प्रतिनिधि यह प्रस्ताव लेकर पहुँचे, तो सोहन सिंह ने साफ कहा कि RSS स्वयंसेवक पूरे गणवेश, दंड और घोष के साथ ही परेड में शामिल होंगे। सरकार की ओर से इस शर्त पर विचार करने की बात कहकर प्रतिनिधि लौट गए।”

विजय कुमार (फोटो साभार:ऑर्गनाइजर)

विजय कुमार बताते हैं कि परेड में RSS को पूर्ण गणवेश में शामिल होने की अनुमति की सूचना केवल 24 घंटे पहले मिली। इसके बाद सोहन सिंह जी ने पूरी रात फोन कर-करके स्वयंसेवकों को सूचना दी और बसों की व्यवस्था करवाई। उस दौर में फोन और यातायात के साधन बहुत सीमित थे फिर भी स्वयंसेवकों ने रातभर मेहनत कर सभी को तैयार किया।

उन्होंने बताया, “निर्धारित समय से पहले सभी बसें भर गईं और कई स्वयंसेवक जगह न मिलने के कारण पीछे रह गए। फिर भी लगभग 3000 स्वयंसेवक सुबह 8 बजे तक परेड स्थल पहुँच गए। RSS का दस्ता सबसे अंत में मार्च करने वाला था लेकिन इंतजार के दौरान कोई भी बोर नहीं हुआ क्योंकि शाखाओं की तरह सभी देशभक्ति के गीत जा रहे थे। जब RSS का दस्ता संघ बैंड की धुन पर आगे बढ़ा, तो कमेंटेटर ने कहा कि ‘आप इन अनुशासित लोगों को अच्छी तरह जानते हैं’ यह टिप्पणी स्वयंसेवकों के लिए बेहद प्रेरणादायक थी।”

‘विश्वकर्मा संकेत’ के संपादक के.एल. पाथेला भी उस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी थे। पाथेला बताते हैं कि 26 जनवरी 1963 का दिन वे आज भी नहीं भूले हैं। जब जनकपुरी शाखा के स्वयंसेवकों को परेड में शामिल होने की खबर मिली तो सभी रोमांचित हो उठे। जब RSS का दस्ता सलामी मंच से गुजरा तो दर्शकों ने जोरदार तालियों से स्वागत किया। वे इंडिया गेट तक मार्च करते हुए गए।

पाथेला के अनुसार, 1962 के युद्ध के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। वे गोलाबारी के बीच भी बंकरों तक पहुंचे और जवानों को खीर परोसी। दिल्ली के स्वयंसेवकों ने जवानों के लिए धन इकट्ठा किया, फल खरीदे और रेलवे स्टेशन पर जाकर सैनिकों में वितरित किए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संघ को परेड में बुलाने पर कई लोगों ने नेहरू की आलोचना भी की थी। इस पर नेहरू ने कहा, “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।”

देश सेवा और सुरक्षाबलों के प्रति संघ के समर्पण की यह इकलौती कहानी नहीं है। जब-जब भारत संकट में रहा था, तब-तब संघ के स्वयंसेवकों ने आगे बढ़कर राष्ट्रसेवा में योगदान दिया है। 1947 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध से लेकर 1965, 1971 और कारगिल वॉर तक, संघ के स्वयंसेवक हमेशा देश सेवा में जुटे रहे हैं।

1947 में पाकिस्तान का कश्मीर पर हमला और संघ की भूमिका

अक्टूबर 1947 से ही संघ के स्वयंसेवक बिना किसी सैन्य प्रशिक्षण के कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे हुए थे। यह काम न तत्कालीन नेहरू सरकार कर रही थी और न ही महाराजा हरिसिंह की रियासत सरकार।

22 अक्टूबर 1947 को जब पाकिस्तान प्रायोजित कबीलाइयों के लश्करों ने मुज्जफराबाद के रास्ते श्रीनगर की ओर बढ़ना शुरू किया, तब संघ के स्वयंसेवक हरीश भनोट ने इस हमले की सटीक जानकारी बलराज मधोक तक पहुँचाई। बलराज मधोक ने तत्काल महाराजा हरिसिंह को स्थिति से अवगत कराया। उस समय मुस्लिम सैनिकों की बगावत के कारण महाराजा के पास कबीलाइयों का सामना करने के लिए पर्याप्त सेना नहीं बची थी।

भारतीय सेना के पहुँचने में देरी को देखते हुए महाराजा हरिसिंह ने संघ से सहायता माँगी। एक संकेत पर 200 से अधिक स्वयंसेवक तुरंत कश्मीर पहुँचे। इन्हें बादामीबाग छावनी ले जाया गया, जहाँ उस समय उपयोग में आने वाली .303 राइफलों को चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। बताया जाता है कि ये युवा स्वयंसेवक रियासत की सेना के साथ मोर्चे पर तब तक डटे रहे जब तक भारतीय सेना कश्मीर नहीं पहुँच गई।

भारतीय सेना द्वारा मोर्चा संभालने के बाद भी संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता में लगातार लगे रहे और इस दौरान कई स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी।

कश्मीर का संपर्क भारत से बनाए रखने के लिए श्रीनगर एयरस्ट्रिप पर हर हाल में कब्जा जरूरी था। दिल्ली के निर्देश पर बर्फ हटाने के लिए मजदूरों को लगाने की कोशिश हुई लेकिन भय और अनिश्चितता के कारण कोई तैयार नहीं हुआ। हालात की गंभीरता देखते हुए सेना ने RSS से मदद माँगी। 150 स्वयंसेवकों की माँग पर संघ ने मात्र आधे घंटे में 500 स्वयंसेवक भेज दिए। कड़ाके की ठंड में रात डेढ़ बजे काम शुरू हुआ और कुछ ही घंटों में पूरा रनवे साफ कर दिया गया जिससे एयरस्ट्रिप चालू रह सकी।

सरदार पटेल ने RSS की तारीफ करते हुए गुरुजी को लिखा था, “भारत के लोगों ने अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की वास्तविक प्रकृति और उसकी गतिविधियों को समझ लिया है। विशेष रूप से कश्मीर से जुड़े अभियानों तथा पंजाब और बंगाल में संघ द्वारा किए गए कार्यों ने यह साबित किया है कि RSS एक सुव्यवस्थित और अनुशासित संगठन है, जो देश की सेवा में बड़ी भूमिका निभाने में सक्षम है।”

1965 के युद्ध में संघ के सेवा कार्य

पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध के बीच प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया गया और इस सम्मेलन में RSS के सरसंघचालक गुरुजी को भी निमंत्रण दिया गया। गुरुजी ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए सरकार को हर प्रकार से पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया। यह आश्वासन केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा बल्कि युद्ध के पूरे कालखंड में जमीन पर उसका असर देखने को मिला।

युद्ध के 22 दिनों तक दिल्ली में संघ के स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण काम संभाले। राजधानी में यातायात नियंत्रण जैसे आवश्यक नागरी कार्यों में स्वयंसेवक सक्रिय रूप से जुटे रहे। इसका सीधा लाभ यह हुआ कि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को इन कार्यों से मुक्त कर सेना और युद्ध-संबंधी कामों में लगाया जा सका। उस समय दिल्ली की सड़कों पर यातायात व्यवस्था बनाए रखना, भीड़ नियंत्रण और आपात स्थितियों में त्वरित सहयोग जैसे कार्य स्वयंसेवकों द्वारा अनुशासन के साथ किए गए।

युद्ध के दौरान घायल सैनिकों की सहायता के लिए रक्त की आवश्यकता एक बड़ी चुनौती थी। इस समय सबसे पहले आगे आकर रक्तदान करने वालों में संघ के स्वयंसेवक शामिल रहे। स्वयंसेवकों ने आवश्यक स्थानों पर रक्तदान किया। केवल राजधानी ही नहीं बल्कि युद्ध से सीधे प्रभावित क्षेत्रों में भी स्वयंसेवकों की भूमिका सामने आई। कश्मीर में हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का कठिन कार्य भी संघ के स्वयंसेवकों ने किया।

1971: जब फील्ड मार्शल करियप्पा ने की संघ की तारीफ

1971 तक पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान के दमन ने एक भीषण मानवीय संकट को जन्म दिया। हालात इतने खराब हो गए कि लाखों लोग जान बचाकर भारत की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। इस संकट की घड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने राहत और सेवा कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। RSS के स्वयंसेवकों ने पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में शरणार्थी शिविर बनाए। इन शिविरों में विस्थापित परिवारों को भोजन, रहने की व्यवस्था और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई। इन सेवाओं से लाखों शरणार्थियों को राहत मिली।

1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भी RSS स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका सामने आई। स्वयंसेवकों ने देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी सेवाएँ देने की पेशकश की। बताया जाता है कि 1971 में सबसे पहले रक्तदान करने वालों में RSS के स्वयंसेवक शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने सेना की सहायता के लिए खाइयाँ खोदने जैसे कार्यों में भी सहयोग किया। इन प्रयासों की सराहना करते हुए तत्कालीन फील्ड मार्शल करियप्पा ने RSS को लेकर कहा, “RSS मेरा हृदय का कार्य है, देश को आपकी सेवाओं की आवश्यकता है।”

देश पर जब-जब संकट आया, तब-तब संघ के स्वयंसेवक बिना किसी बुलावे सबसे पहले मैदान में दिखाई दिए। बाढ़ हो या भूकंप, चक्रवात हो या महामारी संघ के स्वयंसेवकों ने इसे कभी ‘सरकारी जिम्मेदारी’ कहकर टालने का प्रयास नहीं किया। उनके लिए यह सवाल कभी नहीं रहा कि कौन बुला रहा है बल्कि यह रहा कि देश को हमारी जरूरत है।

आपदाओं के समय, जब व्यवस्थाएँ चरमराने लगती हैं और संसाधन सीमित हो जाते हैं, तब संघ के स्वयंसेवक राहत शिविर लगाते हैं, भोजन पहुँचाते हैं, घायल लोगों को अस्पताल तक पहुँचाते हैं, शवों के अंतिम संस्कार से लेकर अनाथ हुए बच्चों की देखभाल तक का दायित्व निभाते हैं। कोविड महामारी इसका ताजा उदाहरण है, जब स्वयंसेवकों ने ऑक्सीजन, दवाइयों, भोजन और रक्तदान के माध्यम से लाखों लोगों की सहायता की।

देश की जरूरत के वक्त संघ की यह निरंतर उपस्थिति यह बताती है कि राष्ट्रसेवा कोई अवसरवादी चीज नहीं बल्कि एक संस्कार है। एक ऐसा संस्कार, जो शाखा से समाज तक और समाज से राष्ट्र तक की यात्रा करता है।

‘कोर्ट ने केजरीवाल को सभी गुनाहों से किया बरी…’ AAP नेताओं की ‘ईमानदारी’ के शिगूफे का जानिए सच

सोशल मीडिया पर एक बार फिर पुराना खेल शुरू हो गया है। अधूरी खबर, आधा सच और पूरा प्रोपेगैंडा। गुजरात में आम आदमी पार्टी के कुछ नेता और समर्थक पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को लेकर नया नैरेटिव बनाने में लग गए है। इनका कहना है कि दिल्ली की एक कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को बरी कर दिया है।

यह दावा ऐसे बेचा जा रहा है जैसे केजरीवाल को दिल्ली शराब पॉलिसी स्कैम और मनी लॉन्ड्रिंग केस में कोर्ट से क्लीन चिट मिल गई हो, जैसे सब कुछ खत्म हो गया हो और अब BJP ‘झूठे आरोप’ लगाकर केजरीवाल को बदनाम कर रही हो।

कुछ ‘मीडिया’ पेज और हैंडल्स भी इस झूठ को आगे बढ़ाने में एक्टिव दिख रहे हैं, जिनमें ‘निर्भय न्यूज़’ जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इन लोगों का काम खबर देना नहीं, बल्कि ‘पार्टी-स्पेसिफिक’ के लिए माहौल बनाना है। हेडलाइन्स इस तरह से बनाई जाती हैं कि आम आदमी उन्हें पढ़कर मान ले कि ‘केजरीवाल बरी हो गए हैं।’

लेकिन सच तो यह है कि केजरीवाल को शराब स्कैम या मनी लॉन्ड्रिंग केस में कोर्ट ने ‘निर्दोष’ नहीं बताया है। जिस फैसले को गलत तरीके से ‘दोषी नहीं’ बताया जा रहा है, वह एक अलग और टेक्निकल मामला है। दरअसल यह ED के भेजे समन से जुडा है, न कि शराब घोटाला से। इस पूरे मामले को समझना जरूरी है, क्योंकि जनता को गुमराह करने की जानबूझकर कोशिश की जा रही है।

AAP का झूठा दावा

आम आदमी पार्टी गुजरात के ऑफिशियल X हैंडल से किए गए पोस्ट में दावा किया गया है, “आज दिल्ली की कोर्ट ने ED के दर्ज झूठे मामलों में अरविंद केजरीवाल को बरी कर दिया है।” पोस्ट की भाषा और टोन ऐसी है जैसे कोर्ट ने केजरीवाल को किसी बड़े स्कैम से बरी कर दिया हो।

पार्टी के नेताओं और समर्थकों ने भी यही प्रोपेगैंडा शुरू कर दिया है। आम आदमी पार्टी गुजरात के जनरल सेक्रेटरी मनोज सोरठिया ने भी ऐसा ही दावा किया है कि केजरीवाल ‘सभी जुर्मों’ से बरी हो गए हैं। उन्होंने एक वीडियो में तो यह भी दावा किया है कि ‘अगर केजरीवाल ईमानदार नहीं हैं, तो दुनिया में कोई भी ईमानदार नहीं है।’ उन्होंने ‘सत्यमेव जयते’ के साथ बकवास की है और BJP पर इल्जाम लगाना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा है कि BJP ने भ्रष्टाचार, शराब, फाइनेंशियल गड़बड़ियों वगैरह के कई आरोप लगाए, लेकिन कोर्ट ने ‘केजरीवाल को सभी जुर्मों से बरी कर दिया।’

इसी तरह, गुजरात AAP की गौरी देसाई और AAP प्रेसिडेंट यसुदन गढ़वी ने भी वीडियो बनाकर केजरीवाल को ‘बेगुनाह’ बताया है और उन्हें ‘कट्टर ईमानदार’ का टैग दे दिया है। गौरी ने तो यहाँ तक ​​कहा, “ED के आरोप झूठे साबित हुए हैं।” इसके अलावा, ‘सच को परेशान किया जा सकता है, हराया नहीं जा सकता’।

अब सवाल यह है कि क्या कोर्ट ने सच में केजरीवाल को ‘सभी जुर्मों’ से बरी कर दिया है? जवाब है — नहीं। ‘जिम्मेदार और समर्पित’ मीडिया भी बड़ी ही चालाकी से सॉफ्ट ब्रेनवॉश करने से नहीं चूक रहा। इनमें सबसे बड़ा नाम ‘निर्भय न्यूज़’ का है। ‘निर्भय न्यूज़’ ने जो हेडलाइन चलाई, उसमें सीधे कहा गया था कि ‘दिल्ली कोर्ट ने केजरीवाल को बरी कर दिया’ और उसी के आधार पर AAP नेता चैतर वसावा का बयान जोड़ा गया।

यह प्रोपेगैंडा फैलाने की पुरानी ट्रिक है। पहले कोई गलत नतीजा निकालो, फिर किसी नेता का रिएक्शन दिखाकर उसे ‘न्यूज’ बना दो। ऐसी हेडलाइंस जिससे दर्शक समझें कि केजरीवाल ‘बच गए’, ‘बेगुनाह और बेकसूर’, ‘क्लीन चिट मिल गई’। यह झूठ फैलाने का एक तरीका है।

दरअसल ED ने केजरीवाल को कुछ समन भेजे थे और आरोप यह था कि केजरीवाल ने उन समन को नजरअंदाज किया। इसी मुद्दे पर कोर्ट ने कजरीवाल को राहत दी।

यह राहत किसी घोटाले से बरी करने का नहीं है। यह राहत एक प्रोसिजरल/टेक्निकल पहलू पर आधारित है, यानी समन के प्रोसेस, सर्विस, वैलिडिटी और उससे जुड़े लीगल मामलों पर। आसान भाषा में कहें तो यह घोटाले में बरी होना नहीं है, बल्कि ‘समन प्रक्रिया’ से जुड़े मामले में राहत है।

यह ऐसा है जैसे कोई आदमी मेन केस में आरोपी हो, लेकिन उसे एक अलग केस में राहत मिल जाए और उसके सपोर्टर यह कहकर जश्न मनाने लगें कि वह ‘सभी चार्ज से बरी’ है। यह कोई जश्न नहीं है, बल्कि जनता को उल्टा चश्मा पहनाने की एक चाल है।

तो क्या शराब पॉलिसी/मनी लॉन्ड्रिंग केस खत्म हो गया है? बिल्कुल नहीं

आम आदमी पार्टी के नेता-कार्यकर्ता यह बात छिपा रहे हैं कि दिल्ली शराब स्कैम और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े केस अलग-अलग हैं और उनका लीगल प्रोसेस चल रहा है। जिस तरह से AAP सपोर्टर ‘निर्दोष’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे लोगों को लगता है कि कोर्ट ने केजरीवाल को शराब पॉलिसी केस में भी क्लीन चिट दे दी है। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ है।

मुख्य बात यह है कि केजरीवाल को शराब केस में कोई राहत नहीं मिली है, मनी लॉन्ड्रिंग केस अभी भी चल रहा है, दूसरे सीरियस केस भी चल रहे हैं और उन्हें जो राहत मिली है, वह सिर्फ उसी केस में है जिसमें ED ने उन्हें समन दिया है और अब वह उससे परेशान भी नहीं हैं, क्योंकि केजरीवाल ने समन भी नहीं माने हैं और तिहाड़ जेल में भी रहे हैं और बेल पर बाहर भी आए हैं। इसलिए अब समन जैसी छोटी-मोटी बातों की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।

असलियत यह है कि केजरीवाल पर अभी भी शराब पॉलिसी स्कैम, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मामलों में सुनवाई चल रही है और कोर्ट ने उनमें कोई आखिरी फैसला नहीं सुनाया है। यह पहली बार नहीं है जब AAP ने किसी कानूनी घटना को ‘सच की जीत’ और ‘क्लीन चिट’ के तौर पर पेश किया है। पार्टी पॉलिटिक्स का एक लगातार पैटर्न रहा है-

  1. जाँच एजेंसी पर हमला करना
  2. हर एक्शन को ‘पॉलिटिकल बदला’ दिखाना
  3. टेक्निकल राहत के जरिए ‘बेगुनाही साबित करना’
  4. सपोर्टर्स द्वारा सोशल मीडिया पर नैरेटिव को आगे बढ़ाना
  5. मीडिया पेजों से हेडलाइन चलाना।

इससे जनता को नुकसान होता है, क्योंकि आम नागरिक के पास हर खबर की कानूनी परतें खोलने के लिए पर्याप्त समय नहीं होता है। वह सिर्फ हेडलाइन पढ़ता है और मान लेता है कि ‘कोर्ट ने बरी कर दिया।’ यही इस प्रोपेगैंडा का लक्ष्य है, सिर्फ नैरेटिव गढ़ना।

(यह लेख गुजराती में लिखी गई है। इसे मूल रूप में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जो भी बने खतरा उसे निपटा देते हैं शी जिनपिंग, अब जनरल झांग पर गिराई गाज: जानें- कैसे सत्ता बनाए रखने के लिए करीबियों का भी दमन कर रहा कम्युनिस्ट तानाशाह

चीन की राजनीति और सेना के भीतर एक बार फिर बड़ा भूचाल आया है। इस बार वजह हैं पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के शीर्ष जनरल और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बेहद करीबी माने जाने वाले झांग यूश्या। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बेहद करीबी माने जाने वाले और चीनी सेना के शीर्ष नेतृत्व में शामिल जनरल झांग यूश्या के खिलाफ जाँच शुरू होने से सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

चीन के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि झांग यूश्या पर ‘अनुशासन और कानून के गंभीर उल्लंघन’ के आरोपों में जाँच चल रही है। इसी के साथ एक और वरिष्ठ अधिकारी जनरल लियू झेनली भी जाँच के दायरे में हैं। इस कदम को कई दशकों में चीनी सेना के भीतर सबसे बड़ी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है कार्रवाई का आधिकारिक कारण?

रक्षा मंत्रालय ने आरोपों का खुलासा भले नहीं किया है, लेकिन चीन में ‘अनुशासन और कानून के उल्लंघन’ जैसे शब्द आमतौर पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग या पार्टी लाइन से भटकने की ओर इशारा करते हैं। ऐसे मामलों में अक्सर पद से हटाना और कड़ी सजा देखने को मिलती है।

यह कार्रवाई ऐसे समय पर हुई है जब बीते वर्ष अक्टूबर में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पहले ही 9 शीर्ष जनरलों को निलंबित कर चुकी है। जानकारों का मानना है कि यह केवल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान नहीं, बल्कि सेना पर केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ मजबूत करने का प्रयास भी है।

कौन हैं झांग यूश्या और क्यों माने जाते थे बेहद ताकतवर?

75 वर्षीय झांग यूश्या चीन की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्था सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के उपाध्यक्ष थे। यह वही संस्था है, जिसके अध्यक्ष खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग हैं। झांग न सिर्फ CMC के शीर्ष अधिकारी थे, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो के सदस्य भी रहे हैं, जहाँ देश के सबसे अहम फैसले लिए जाते हैं।

उन्होंने 1968 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जॉइन की थी और वे उन गिने-चुने वरिष्ठ अधिकारियों में थे जिनके पास वास्तविक युद्ध का अनुभव था। वह उन कुछ सैन्य अधिकारियों में शामिल थे जो सीधे शी जिनपिंग के साथ मिलकर सेना की कमान सँभालते थे।

उम्र सीमा पार करने के बावजूद उन्हें पद पर बनाए रखा गया, जिसे लंबे समय तक शी जिनपिंग के भरोसे का संकेत माना जाता रहा। उन्हें लंबे समय तक चीनी सेना का अनुभवी और प्रभावशाली चेहरा माना गया। लेकिन अब वही जनरल सत्ता की जाँच एजेंसियों के निशाने पर हैं।

क्या शी जिनपिंग को हटाने की हो रही थी कोशिश?

झांग यूश्या और सैन्य रणनीति प्रमुख ल्यू झेनली के खिलाफ अचानक शुरू हुई जाँच ने कई अटकलों को जन्म दे दिया है। चीन मामलों की विशेषज्ञ और मानवाधिकार कार्यकर्ता जेनिफर जेंग का दावा है कि यह सिर्फ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष का हिस्सा है।

उनके अनुसार, पार्टी के भीतर एक गुट शी जिनपिंग की ताकत कम करना चाहता था। इस गुट में पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ, पूर्व प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और झांग यूश्या जैसे दिग्गज शामिल बताए जा रहे हैं। इन नेताओं का मकसद कम्युनिस्ट पार्टी को बनाए रखते हुए चीन को देंग शियाओपिंग के दौर जैसी सामूहिक नेतृत्व व्यवस्था में लौटाना था।

जेंग का यह भी कहना है कि हाल ही में शी जिनपिंग की बीमारी और अस्पताल में भर्ती होने की खबरें दरअसल एक रणनीतिक चाल थीं, जिससे विरोधियों को भ्रम में रखा जा सके।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक अहम बैठक के दौरान झांग यूश्या अपेक्षाकृत कम सुरक्षा के साथ पहुँचे थे। वहीं पहले से मौजूद बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें घेर लिया और हिरासत में ले लिया गया। कुछ दावों में कहा जा रहा है कि झांग वास्तव में शी जिनपिंग को हटाने की योजना बना रहे थे, लेकिन इसकी जानकारी पहले ही लीक हो गई।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद शी जिनपिंग ने तेजी से कार्रवाई कर यह संकेत दे दिया कि सत्ता पर उनकी पकड़ अब भी मजबूत है। इससे पहले एक अन्य वाइस चेयरमैन हे वेइडोंग को हटाने की जानकारी महीनों बाद सामने आई थी, लेकिन झांग यूश्या के मामले में घोषणा तुरंत की गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर यह भ्रम भी टूट रहा है कि सिर्फ चेहरों के बदलने से व्यवस्था बदल सकती है। या तो पूरा सिस्टम बदलेगा, या फिर चीन में डर और सख्ती का यही दौर आगे भी चलता रहेगा।

क्या रहा पहले चुनौती देने वालों का हश्र?

शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद से चीन में व्यापक सफाई अभियान चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक 2012 से अब तक करीब 2 लाख अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है। सेना में इससे पहले भी कई प्रभावशाली जनरलों को पद से हटाया गया है।

पूर्व CMC उपाध्यक्ष गुओ बॉक्सियोंग और शू काईहौ जैसे नाम इसके उदाहरण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि झांग यूश्या के खिलाफ कार्रवाई भी इसी संदेश का हिस्सा है कि सेना में वफादारी सिर्फ शीर्ष नेतृत्व के प्रति ही चलेगी।

झांग यूश्या पर जाँच ने यह साफ कर दिया है कि चीन में सत्ता के केंद्र में किसी भी तरह की असहमति के लिए अब बहुत कम जगह बची है। यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम है या फिर सत्ता को चुनौती देने वालों के खिलाफ सख्त संदेश इसका पूरा जवाब आने वाले समय में मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि चीनी सेना और राजनीति में यह घटना एक टर्निंग पॉइंट बन चुकी है।

2 अरब लोगों का साझा बाजार, लाखों नई नौकरियाँ और चीन-US के दबदबे को चुनौती: जानें भारत-यूरोप की ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कितनी अहम?

दुनिया की राजनीति और पैसे के मामले में 26 और 27 जनवरी 2026 की तारीखें बहुत बड़ी होने वाली हैं। भारत और यूरोप के देशों के बीच एक बहुत बड़ा समझौता होने जा रहा है, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (यानी सभी समझौतों की जननी) कहा जा रहा है। इसका इंतजार पिछले 20 सालों से था। इस खास डील को पूरा करने के लिए यूरोप के सबसे बड़े नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा दिल्ली पहुँच चुके हैं, जहाँ भारत सरकार ने उनका शानदार स्वागत किया है।

यह मौका इसलिए भी खास है क्योंकि भारत के इतिहास में पहली बार यूरोप के नेता हमारे गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर मुख्य मेहमान होंगे और यूरोप की सेना की एक टुकड़ी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर परेड भी करेगी। इस पूरे समझौते का मुख्य मकसद ‘फ्री ट्रेड‘ यानी व्यापार को आसान बनाना है।

इससे 2 अरब लोगों के लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार खुल जाएगा। साथ ही, यह भारत और यूरोप दोनों को व्यापार के लिए चीन और अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय एक-दूसरे का मजबूत साथी बनाएगा।

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’: 2 अरब लोगों का बाजार और 25% वैश्विक GDP

यूरोप की बड़ी नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जिसका मतलब है कि यह अब तक का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौता है। इसके पीछे की बड़ी वजह यह है कि जब भारत और यूरोप के 27 देश एक साथ आएँगे, तो यह पूरी दुनिया का सबसे बड़ा और ताकतवर व्यापारिक बाजार बन जाएगा। यह बाजार इतना विशाल होगा कि पूरी दुनिया में होने वाली कुल कमाई का लगभग चौथा हिस्सा अकेले इसी डील से जुड़ा होगा।

इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा भारत के छोटे और बड़े व्यापारियों को होगा। अभी जब भारत से कपड़े, जूते, गहने या आईटी (IT) सर्विस यूरोप भेजी जाती है, तो वहाँ उन पर भारी टैक्स लगता है। लेकिन इस डील के बाद हमारे सामान बिना किसी अतिरिक्त टैक्स के यूरोप के बाजारों में बिक सकेंगे, जिससे भारतीय कंपनियों को काफी मुनाफा होगा।

वहीं दूसरी ओर, यूरोप की शानदार कारें (जैसे मर्सिडीज और फॉक्सवैगन) और वहाँ की खास वाइन पर जो भारी टैक्स भारत में लगता है, वह कम हो जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में भारतीयों के लिए ये विदेशी ब्रांड्स पहले के मुकाबले काफी सस्ते हो सकते हैं।

रक्षा और तकनीक: ‘SAFE’ कार्यक्रम में भारत की एंट्री

यह समझौता सिर्फ सामान के लेनदेन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत और यूरोप अब दोस्ती का एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं जिसे ‘सुरक्षा और रक्षा साझेदारी’ कहा जा रहा है। यह कदम भारत को अपनी सेना और हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में बहुत मदद करेगा। इस समझौते के बाद, भारत की डिफेंस कंपनियाँ पहली बार यूरोप के उस खास खजाने (SAFE प्रोग्राम) का हिस्सा बन पाएँगी, जिसमें करीब 150 अरब यूरो रखे गए हैं।

आज तक किसी भी गैर-यूरोपीय देश को इतने बड़े फंड का फायदा उठाने का मौका नहीं मिला है, जो भारत के लिए गर्व की बात है। इसके साथ ही, भारत और यूरोप अब आपस में खुफिया जानकारियाँ भी साझा करेंगे। चाहे समुद्र की सुरक्षा हो, इंटरनेट पर होने वाले साइबर हमले हों या फिर आतंकवाद से लड़ना- दोनों पक्ष मिलकर काम करेंगे।

यूरोप ने हाल ही में हुए आतंकी हमलों के बाद खुलकर भारत का साथ दिया है और कहा है कि भारत को अपनी रक्षा के लिए मुँहतोड़ जवाब देने का पूरा हक है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है। एक और अहम बात यह है कि अब यूरोप की बड़ी कंपनियाँ चीन को छोड़कर भारत को अपना नया ठिकाना बनाना चाहती हैं।

वे अपनी फैक्ट्रियाँ भारत में लगाना चाहती हैं, जिससे न केवल हमारे यहाँ चिप (सेमीकंडक्टर) और क्लीन एनर्जी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में काम बढ़ेगा, बल्कि भारत पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनकर उभरेगा।

नौकरियों की बारिश: युवाओं और स्किल्ड प्रोफेशनल के लिए सुनहरा मौका

इस बड़े समझौते का सबसे शानदार असर हमारे देश में नौकरियों पर पड़ने वाला है। जानकारों का कहना है कि इसके आने से लाखों लोगों को काम मिलेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि भारतीय इंजीनियरों, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के लिए अब यूरोप जाकर काम करना बहुत आसान हो जाएगा। इसके लिए दोनों पक्ष एक खास नियम (मोबिलिटी फ्रेमवर्क) बना रहे हैं, जिससे वीजा मिलने में आने वाली दिक्कतें दूर होंगी और हमारे टैलेंट को विदेश में बेहतर मौके मिलेंगे।

साथ ही, यूरोप की बड़ी कार कंपनियाँ अब अपनी फैक्ट्रियाँ और पार्ट्स बनाने वाली यूनिट्स भारत में ही लगाएँगी। इससे हजारों इंजीनियरों और टेक्नीशियन्स के लिए भर्ती के द्वार खुलेंगे। इसके अलावा, यूरोप अब अपनी दवाओं की सप्लाई के लिए भारत पर भरोसा कर रहा है। इससे हमारे देश की दवा कंपनियों (फार्मा सेक्टर) में रिसर्च और दवा बनाने के काम में भारी बढ़ोतरी होगी और हज़ारों नई नौकरियाँ आएँगी।

यही नहीं, भविष्य की ऊर्जा यानी सोलर, हवा और हाइड्रोजन से बिजली बनाने के क्षेत्र में भी भारत और यूरोप मिलकर काम करेंगे। इस वजह से क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों के लिए भारत में ही नौकरियों की भरमार हो जाएगी। कुल मिलाकर, यह डील भारतीय युवाओं के करियर को एक नई ऊँचाई पर ले जाने वाली साबित होगी।

नया वर्ल्ड ऑर्डर और भारत का दबदबा

यह ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह बदलती हुई दुनिया का एक बड़ा इशारा है। आज जब अमेरिका अपनी व्यापारिक नीतियों में कड़े बदलाव कर रहा है और चीन पर भरोसा कम हो रहा है, तब यूरोप ने भारत को अपना सबसे भरोसेमंद और लोकतांत्रिक साथी चुना है। यह समझौता भारत को दुनिया की एक ऐसी आर्थिक शक्ति बना देगा, जो अमेरिका और चीन के दबाव से अलग अपनी एक नई पहचान रखेगी।

बड़े जानकारों का कहना है कि आज यूरोप की आबादी बूढ़ी हो रही है, इसलिए उन्हें काम करने के लिए भारत के युवाओं और यहाँ के बड़े बाजार की सख्त जरूरत है। दूसरी तरफ, भारत को आगे बढ़ने के लिए यूरोप की आधुनिक टेक्नोलॉजी और वहाँ से आने वाले बड़े निवेश (पैसे) की जरूरत है। यानी इस दोस्ती में दोनों का ही बड़ा फायदा है। हालाँकि, भारत को एक बात का ध्यान रखना होगा कि इस समझौते का फायदा उठाकर चीन जैसा कोई तीसरा देश अपना सस्ता माल हमारे बाजार में न खपा दे। 27 जनवरी को जब इस पर पक्की मुहर लग जाएगी, तो यह आज के भारत की अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत कहलाएगी।

बांग्लादेशी जमात-ए-इस्लामी से दोस्ती कर रहा अमेरिका, लीक ऑडियो क्लिप से खुली पोल: पढ़ें- कैसे नरसंहार करने वाले अपराधियों से नजदीकी बढ़ा रहा US

बांग्लादेश में संघीय चुनावों से पहले यह खुलासा हुआ है कि अमेरिकी राजनयिक कट्टर इस्लामी राजनीतिक पार्टी बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी से सक्रिय रूप से संपर्क कर रहे हैं।

यह खुलासा वाशिंगटन पोस्ट ने गुरुवार (22 जनवरी 2026) को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट (आर्काइव) में किया। अमेरिकी अखबार ने एक लीक ऑडियो क्लिप भी साझा की जिसमें पिछले साल 1 दिसंबर को ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास में एक अमेरिकी राजनयिक और कुछ बांग्लादेशी महिला पत्रकारों के बीच बंद कमरे की मीडिया बातचीत सुनी जा सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका जमात-ए-इस्लामी से इसलिए नजदीकियाँ बढ़ा रहा है क्योंकि उसे उम्मीद है कि आने वाले बांग्लादेशी संघीय चुनाव में यह पार्टी जीतेगी। ऑडियो रिकॉर्डिंग में अज्ञात अमेरिकी राजनयिक यह मानते सुनाई दे रहे हैं कि बांग्लादेश ‘इस्लामी दिशा में बदल गया है’ और अमेरिका के हित में है कि वह इस कट्टर इस्लामी पार्टी से दोस्ती करे।

लीक ऑडियो क्लिप में अमेरिकी राजयनिक ने कहा, “हम चाहते हैं कि वे हमारे दोस्त बनें”। ये क्लिप अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। राजनयिक ने जमात-ए-इस्लामी के बांग्लादेशी समाज के लिए खतरे को भी कम करके आँका। उसने कहा, “मुझे बस यह विश्वास नहीं है कि जमात शरिया लागू कर सकती है।”

ऑडियो रिकॉर्डिंग में अज्ञात अमेरिकी राजनयिक यह भी मानते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ मुकदमा निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं था। फिर भी उन्होंने बांग्लादेश की कंगारू अदालत से उनकी सजा की तारीफ की और इसे ‘राजनीतिक प्रतिभा’ और ‘प्रभावशाली’ बताया।

अमेरिकी अंदाज में कहें तो अंतरराष्ट्रीय मामलों के जज, जूरी और जल्लाद बनकर अमेरिकी राजनयिक ने बंद कमरे की बैठक में हसीना को ‘दोषी’ घोषित कर दिया।

जब वाशिंगटन पोस्ट ने ढाका में अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शी से जवाब माँगा तो उन्होंने कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका किसी एक राजनीतिक पार्टी का पक्ष नहीं लेता और बांग्लादेशी लोगों द्वारा चुनी गई किसी भी सरकार के साथ काम करने की योजना बनाता है।”

लेकिन यह सच नहीं है। नवंबर 2023 में ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि कैसे अमेरिकी सरकार, उसकी एजेंसियाँ और उसमें घुसी मीडिया बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाने के लिए ‘रिजीम चेंज ऑपरेशन’ चला रही थीं।

आवामी लीग नेता की छवि को तोड़-मरोड़कर उन्हें ‘तानाशाह नेता’ दिखाने की कोशिश की गई। अमेरिकी सरकार ने ‘लोकतंत्र बचाने’ और ‘स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव’ कराने के बहाने 2024 के बांग्लादेश चुनाव प्रक्रिया में दखल दिया।

सारे प्रयासों के बावजूद शेख हसीना मजबूत जनादेश के साथ सत्ता में लौटीं। लेकिन अमेरिकी डीप स्टेट ने जल्द ही अपना गंदा एजेंडा शुरू कर दिया।

6 महीने बाद हसीना को सत्ता से हटा दिया गया, एक सोची-समझी रिजीम चेंज ऑपरेशन में। इस्लामी ताकतों को शांत करने और अमेरिका के लिए एसेट बनकर काम करने का काम किसी और को नहीं, बल्कि मुहम्मद यूनुस को सौंपा गया।

ऑपरेशन सर्चलाइट, 1971 बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और जमात-ए-इस्लामी की भूमिका

दिसंबर 1970 में हुए आम चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान की प्रांतीय विधानसभा में शेख मुजीबुर रहमान की आवामी लीग को भारी बहुमत (167 सीटें) मिला था।

पश्चिमी पाकिस्तान की लगातार दखलंदाजी से रहमान ने ज्यादा क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग शुरू कर दी थी।

यह भारत विभाजन के सिर्फ 13 साल बाद की बात थी, जब मुसलमानों ने अपना अलग देश माँगा था।

मजहब के नाम पर एक होने के बावजूद पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही थी।

1970 चुनावों में पश्चिम पाकिस्तान में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के जुल्फिकार अली भुट्टो रहमान की माँगों के खिलाफ थे। उन्होंने धमकी दी थी कि अगर पीपीपी को सरकार में शामिल नहीं किया गया तो वे पूर्वी पाकिस्तान की प्रांतीय विधानसभा का बहिष्कार करेंगे और उसे भंग करने की माँग करेंगे।

पूर्वी पाकिस्तान को सत्ता और स्वायत्तता न मिलने से नाराज शेख मुजीबुर रहमान ने 7 मार्च 1971 को सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा कर दी। भुट्टो को गृहयुद्ध का डर लगा और राष्ट्रपति याह्या खान ने मार्शल लॉ लगा दिया तथा रहमान और अन्य नेताओं को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।

राजनीतिक और नागरिक अशांति को काबू करने के लिए पाकिस्तानी फौज ने 26 मार्च 1971 को ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया। रहमान पहले से ही पश्चिम पाकिस्तान की दादागिरी से निराश होकर स्वतंत्रता की माँग कर चुके थे।

पाकिस्तानी सैनिकों ने राजारबाग और पीलखाना इलाके में बंगाली आबादी पर हमला किया। उन्होंने मुजीबुर रहमान को जेल में डाल दिया और इकबाल हॉल में विश्वविद्यालय पर धावा बोला, जिसमें 9 शिक्षक और 200 छात्र मारे गए।

इसी तरह पुराने ढाका, तेजगाँव, इंदिरा रोड, मीरपुर, कालाबागान और अन्य जगहों पर नागरिकों पर बर्बर हमले जारी रहे।

उसी रात चटगाँव में भी कई लोग सेना की गोलियों से मारे गए। दैनिक इत्तेफाक, दैनिक संगबाद जैसे राष्ट्रीय अखबार बंद कर दिए गए, उनके दफ्तर जला दिए गए और कई पत्रकार मारे गए। सामूहिक कब्रें खोदी गईं और जल्दी-जल्दी बुलडोजर से ढक दी गईं।

ढाका में करीब 700 लोग जिंदा जला दिए गए। झुग्गी-झोपड़ी वालों के घरों में आग लगाई गई, भागते लोगों पर गोलियाँ चलाई गईं, एक काली मंदिर को तोड़ दिया गया और केंद्रीय शहीद मीनार को भी नष्ट कर दिया गया।

मान्यता है कि ऑपरेशन सर्चलाइट में पाकिस्तानी सेना ने 10,000 से 35,000 बंगालियों को मारा, जबकि आने वाले महीनों में मौतों की संख्या 3 लाख से ऊपर पहुँच गई।

भुट्टो ने मशहूर रूप से कहा था, “शुक्र है कि पाकिस्तान बच गया।”

बंगाली आबादी के खिलाफ नरसंहार और तेज हो गया। आने वाले महीनों में करीब 4 लाख बंगाली महिलाओं का बलात्कार किया गया, जिनमें ज्यादातर हिंदू थीं।

पाकिस्तानी सेना के ये सारे अत्याचार और मानवता के खिलाफ अपराध जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों की मदद से संभव हुए, जिसने ‘अल बद्र’, ‘अल शम्स’ और ‘रजाकार’ नाम के तीन सशस्त्र दस्ते चलाए थे।

स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पड़ोसी भारत को आगे आना पड़ा ताकि नरसंहार रुक सके। 14 दिनों में पाकिस्तानी फौजों के कमांडर ए के नियाजी ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर दस्तखत किए और इस तरह 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश नाम का नया देश बना।

साल 2010 में गठित अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (बांग्लादेश) ने जमात-ए-इस्लामी से जुड़े 10 चरमपंथियों को 1971 के नरसंहार में ‘सहयोगी‘ पाया।

इनमें शामिल थे-

अब्दुल कादर मुल्लाह (दिसंबर 2013 में फांसी)
गुलाम आजम
मुहम्मद कमरुज्जमान (अप्रैल 2015 में फांसी)
देलवार होसैन सईदी
अली अहसान मोहम्मद मुजाहिद (नवंबर 2015 में फांसी)
अबुल कलाम आजाद
मोतिउर रहमान निजामी (मई 2016 में फांसी)
मीर कासिम अली (सितंबर 2016 में फांसी)
अबुल कलाम मुहम्मद यूसुफ
चौधरी मुईन-उद्दीन

गुलाम आजम और अबुल कलाम मुहम्मद यूसुफ 2014 में मर गए, जबकि देलवार होसैन सईदी 2023 में प्राकृतिक कारणों से मरे। अबुल कलाम आजाद अब तक फरार हैं। चौधरी मुईन-उद्दीन अब ब्रिटिश नागरिक है और गिरफ्तार नहीं हुआ।

जमात-ए-इस्लामी से जुड़े 5 चरमपंथियों को दिसंबर 2013 से सितंबर 2016 के बीच फांसी दी गई।

1971 नरसंहार के बाद जमात-ए-इस्लामी द्वारा हिंदुओं पर टारगेटेड हिंसा

6 दिसंबर 1992 को 5000 मुस्लिम पुरुषों की भीड़, बाँस और लोहे की छड़ें लेकर ढाका नेशनल स्टेडियम में भारत-बांग्लादेश क्रिकेट मैच में घुसने की कोशिश की।

United Press International की 1992 की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

पुलिस ने आँसू गैस और रबर बुलेट चलाकर उन्हें रोका। यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, 1000 मुस्लिमों की भीड़ ढाका के थाटारी बाजार इलाके के हिंदू शिव मंदिर में घुसी और उसे जमीन से मिटा दिया।

इस्लामी कट्टरपंथियों ने नारिंदा इलाके के एक हिंदू मंदिर पर भी हमला किया और एक 88 साल के हिंदू पुजारी पर बम से गंभीर हमला किया। मुस्लिम भीड़ ने ढाकेश्वरी मंदिर में घुसने की भी कोशिश की।

उन्होंने हिंदुओं की दुकानों को लूटा और अल्पसंख्यक समुदाय की गाड़ियों को डंडों और लोहे की छड़ों से तोड़ दिया।

ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) के अनुसार, यह दंगा कट्टर इस्लामी संगठन जमात-ए-इस्लामी ने कराया था, जो उस समय सत्ता में रही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की गठबंधन सहयोगी थी।

यह दंगे अपने आप नहीं हुए, बल्कि अच्छी तरह प्लान किए गए थे। करीब 2400 हिंदू महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुए, 3500 मंदिर और धार्मिक स्थल नष्ट कर दिए गए।

हिंदू समुदाय के 28000 घर और 2500 व्यावसायिक इमारतें जला दी गईं। इस हिंसा में करीब 700 हिंदू मारे गए। ये आँकड़े कम थे, जैसा कि उस समय कई बड़े नेताओं ने माना था।

बीबीसी की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

साल 2001 में जमात-ए-इस्लामी ने BNP के साथ मिलकर चुनाव जीता तो हिंदू समुदाय पर अकल्पनीय अत्याचार हुए। कई बांग्लादेशी हिंदुओं को सोची-समझी हिंसा के बाद देश छोड़ना पड़ा।

बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया, “हिंदू नेताओं ने कहा कि चुनाव नतीजे आने के साथ ही उन पर हमले शुरू हो गए थे-हत्या, लूट और बलात्कार। उनका कहना था कि इस्लामी पार्टियाँ और BNP ने उन्हें निशाना बनाया क्योंकि उन्होंने उन चुनावों में विरोधी आवामी लीग का समर्थन किया था।”

2013 की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

फरवरी 2013 में जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ ने 50 से ज्यादा हिंदू मंदिरों पर हमला किया और अल्पसंख्यक समुदाय के 1500 से ज्यादा घरों-दुकानों को निशाना बनाया। गाइबांधा, चटगांव, रंगपुर, सिलहट, बोगरा आदि जिलों में आगजनी की।

एक साल बाद फरवरी 2014 में BNP सदस्यों और जमात-ए-इस्लामी के चरमपंथियों ने हिंदू समुदाय पर 160 हमले किए।

OHCHR की रिपोर्ट

इस साल 12 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने 104 पेज की रिपोर्ट जारी की जिसमें बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों का ब्योरा था।

रिपोर्ट का नाम है- ‘Human Rights Violations and Abuses related to the Protests of July and August 2024 in Bangladesh.’

इसमें पाया गया कि हिंदू समुदाय पर ज्यादातर हमले पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने का जश्न मनाने वाली ‘विजय जुलूसों’ के दौरान हुए।

OHCHR ने नोट किया कि हमलावर BNP और जमात-ए-इस्लामी के स्थानीय समर्थक थे। रिपोर्ट के पेज 62 पर लिखा है- “BNP और जमात-ए-इस्लामी विरोधी दलों के कुछ स्थानीय सदस्य और समर्थक बदले की कार्रवाइयों में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए जिम्मेदार हैं, जिनमें हिंदू समुदाय के सदस्यों के खिलाफ भी शामिल हैं।”

सितंबर 2024 में मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित बांग्लादेशी ब्लॉगर असद नूर ने खुलासा किया कि हिंदुओं को जबरन ‘जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश’ में शामिल कराया जा रहा है।

नूर ने बताया कि लालमोनिरहाट सदर उपजिला के खुनियागाछ यूनियन के कलमती वार्ड नंबर 2 में जमात-ए-इस्लामी के सदस्य गए। उन्होंने 27 गरीब हिंदुओं को निशाना बनाया और उन्हें पार्टी में शामिल होने पर मजबूर किया।

असद नूर के अनुसार, कट्टरपंथियों ने उन्हें मारने और देश से निकालने की धमकी दी। मजबूरी में गरीब हिंदुओं को उनकी बात माननी पड़ी। जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों ने उन्हें कुछ फॉर्म पर दस्तखत कराए और इस्लामी किताबें दीं ताकि उनका ब्रेनवॉश करके हिंदू धर्म छुड़वाया जाए।

हाफिज मोहम्मद शाह आलम, जमात-ए-इस्लामी (लालमोनिरहाट शाखा) के सहायक सचिव, हिंदुओं को जबरन शामिल करने के दौरान मौजूद थे।

सिर्फ अपना भला देखता है अमेरिका

दुनिया की सबसे पुरानी लोकतंत्र होने के नाते अमेरिका दूसरे देशों के सुचारु कामकाज में गहरी दिलचस्पी लेता है लेकिन अक्सर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को गिराकर अपने हितैषी रिजीम सत्ता में लाता है।

अगस्त 2024 में बांग्लादेश में रिजीम चेंज ऑपरेशन और उसके बाद कट्टर इस्लामियों को सत्ता देना ऐसे ही सत्ता दुरुपयोग का एक उदाहरण है।

अमेरिका खुद को ‘Land of Liberty’ कहता है, लेकिन वह खुशी-खुशी उन रिजीम और समूहों को सत्ता दे देता है जो महिलाओं, धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों की आजादी छीनते हैं, बशर्ते उसका गंदा मकसद पूरा हो जाए।

अमेरिका बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी से क्यों नजदीकियाँ बढ़ा रहा है, जिसका महिलाओं पर अत्याचार, नरसंहार और हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों पर जुल्म करने का साबित हुआ रिकॉर्ड है।

इस कट्टर इस्लामी संगठन का बांग्लादेश की सत्ता तक पहुँचना देश की सद्भाव और सामाजिक ताने-बाने के लिए झटका है। इसके अलावा क्षेत्रीय अस्थिरता, आतंकवाद और अनगिनत सुरक्षा चुनौतियों का खतरा भी है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

मंदिर पर ताला-TMC गुंडों की धमकियाँ, मुस्लिम छात्रों की बहुलता से स्कूल में पूजा की अनुमति नहीं: बंगाल में सरस्वती पूजा में दिक्कतें पैदा करने के 4 मामले

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) शासित पश्चिम बंगाल में वार्षिक हिंदू पर्व सरस्वती पूजा में कई जगहों पर बाधा डाली गई। शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के भीतर गुटबाजी के चलते उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी शहर में सरस्वती पूजा बाधित हो गई।

डीडी न्यूज बांग्ला की एक रिपोर्ट के अनुसार, बेलघड़िया सर्वजनिन श्री श्री दुर्गा चौक सोसाइटी मंदिर को TMC के एक गुट ने ताला लगा दिया। इस वजह से स्थानीय हिंदू महिलाएँ देवी सरस्वती की पूजा नहीं कर पा रही हैं। अब तक TMC पार्षद इस विवाद का कोई समाधान नहीं निकाल सके हैं।

वहीं स्थानीय पुलिस ने यह कहते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि जब तक TMC के दोनों गुट किसी साझा सहमति पर नहीं पहुँचते, तब तक ताला नहीं हटाया जाएगा। एक महिला ने कहा, “हम चाहते हैं कि यह मंदिर सभी के लिए एक साझा पूजा स्थल बना रहे। यहाँ सिर्फ एक ताला होना चाहिए, लेकिन उसकी दो चाबियाँ हों, एक उनके पास और एक हमारे पास।” एक अन्य महिला ने कहा, “यह किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। यह मंदिर सबका है।”

ममता बनर्जी के अल्मा मेटर में सरस्वती पूजा आयोजित करने पर TMC नेता ने छात्राओं को दी धमकी

दक्षिण कोलकाता स्थित सरकारी सहायता प्राप्त जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज की एक छात्रा ने आरोप लगाया है कि एक TMC नेता ने सरस्वती पूजा आयोजित करने को लेकर छात्राओं को धमकी दी। पीड़िता के अनुसार, उक्त TMC नेता की पहचान दाऊद आलम मोल्ला के रूप में हुई है।

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में छात्रा कहती है, “दाऊद आलम मोल्ला बाहर खड़ा है। उसने मुझे धमकी दी है कि वह मेरी LLM को f*** कर देगा।” संयोग से जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी का अल्मा मेटर है।

इससे पहले, जनवरी 2025 में ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि पश्चिम बंगाल राज्य तृणमूल छात्र परिषद के तत्कालीन महासचिव मोहम्मद शब्बीर अली ने सरस्वती पूजा करने पर छात्राओं को बलात्कार और हत्या की धमकी दी थी।

TMC गुटों की आपसी लड़ाई से रुका सरस्वती पूजा समारोह

शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को कूचबिहार जिले के दिनहाटा कॉलेज में सरस्वती पूजा मंडप को छोड़ दिया गया, जब सत्तारूढ़ TMC के दो गुटों के बीच झड़प हो गई। ABP आनंदा की रिपोर्ट के अनुसार, बाद में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को बुलाया गया। मामले की जानकारी मिलते ही दिनहाटा थाना प्रभारी और SDPO कॉलेज परिसर पहुँचे।

पूजा में शामिल होने आए हिंदू श्रद्धालुओं को अपनी जान-माल की सुरक्षा के लिए वहाँ से भागना पड़ा। घटनास्थल से सामने आए दृश्य बताते हैं कि कॉलेज परिसर को TMC के गुंडों ने रणक्षेत्र में बदल दिया।

50% से अधिक छात्र मुस्लिम होने के कारण स्कूल परिसर में हिंदू छात्रों को सरस्वती पूजा की अनुमति नहीं

उत्तर 24 परगना जिले के बारासात शहर से सामने आए एक अन्य मामले में हिंदू छात्रों को स्कूल परिसर के भीतर सरस्वती पूजा आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह अनुमति इसलिए नहीं दी गई क्योंकि स्कूल में 50% से अधिक छात्र मुस्लिम थे।

सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में पुलिसकर्मी छात्रों को देवी सरस्वती की पूजा करने से रोकते नजर आए। बाद में हिंदू छात्रों को मजबूरन स्कूल परिसर के बाहर, फुटपाथ पर पूजा आयोजित करनी पड़ी।

प्रदीप चटर्जी नामक एक व्यक्ति को यह कहते सुना गया, “उन्होंने कहा कि यहाँ पूजा नहीं हो सकती क्योंकि इस स्कूल में हिंदू अल्पसंख्यक हैं… पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की हालत में कोई फर्क नहीं है।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने देवी सरस्वती को ‘दरवाजे से बाहर’ कर दिया, जिससे छात्रों को सड़क किनारे देवी को पुष्प अर्पित करने पड़े।

इस घटना की बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कड़ी निंदा की। उन्होंने ट्वीट कर पूछा, “क्या पश्चिम बंगाल अब बांग्लादेश बन गया है?” उन्होंने आगे कहा, “यह घटना हमें एक बात सिखाती है, अगर हिंदू अल्पसंख्यक बन गए, तो उनके साथ कैसा व्यवहार होगा?”

उपरोक्त चारों घटनाएँ स्थानीय बंगाली मीडिया में रिपोर्ट की गई हैं। पश्चिम बंगाल में अक्सर ऐसा देखा गया है कि हिंदू अधिकारों से जुड़ी खबरों को मुख्यधारा का मीडिया नजरअंदाज कर देता है। ऐसे में यह आश्चर्यजनक नहीं होगा अगर सरस्वती पूजा में बाधा के मामलों की संख्या दर्जनों तक पहुँच जाए।

50+ लड़कियों के अश्लील वीडियो, हिंदुओं युवतियों का धर्मांतरण और आर्थिक-शारीरिक शोषण का जाल: पढ़ें- मिर्जापुर में AI के इस्तेमाल से चल रहे ‘जिम जिहाद’ की पूरी कारस्तानी

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में सामने आया ‘जिम जिहाद’ का मामला किसी एक जिम या एक आरोपित तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक ऐसा संगठित नेटवर्क है, जो वर्षों से फिटनेस और जिम की आड़ में चुपचाप काम कर रहा था। 2 हिंदू युवतियों की शिकायत ने जिस जिम जिहाद की परतें खोल दी हैं, उसने यह साफ कर दिया कि जिम जैसी सामान्य जगहों को भी इस्लामी कट्टरपंथियों ने योजनाबद्ध तरीके से धर्मांतरण, ब्लैकमेलिंग और यौन शोषण के अड्डों में बदल दिया है।

कैसे खुला जिम जिहाद का नेटवर्क?

इस मामले का खुलासा मंगलवार (20 जनवरी 2026) को हुआ जब मिर्जापुर देहात कोतवाली में 2 युवतियों की अलग-अलग तहरीरें दर्ज हुईं। शुरुआत में मामला आम शोषण जैसा दिखा लेकिन जैसे ही पुलिस ने आरोपितों के मोबाइल फोन खँगाले, पूरी तस्वीर सामने आ गई। जाँच में 50 से अधिक लड़कियों के अश्लील वीडियो और चैट मिले। इसके बाद 25 से 30 महिलाओं ने बिना अपनी पहचान उजागर किए पुलिस से संपर्क किया और धर्मांतरण तथा ब्लैकमेलिंग से जुड़ी जानकारी दी।

हिंदू लड़कियों ने पुलिस को बताया कि नारघाट महुवरिया इलाके में संचालित कम से कम 5 जिमों में मालिक और ट्रेनर वर्कआउट के बहाने पहले उनसे दोस्ती करते थे और फिर उन्हें धीरे-धीरे अपने जाल में फँसाया जाता था।

पीड़िताओं के अनुसार, ट्रेनर पहले भरोसा जीतते, नजदीकियाँ बढ़ाते और फिर AI का इस्तेमाल कर अश्लील फोटो और वीडियो तैयार करते थे। इन्हीं, फोटो-वीडियो के जरिए लड़कियों को ब्लैकमेल किया जाता था, उनसे पैसे वसूले जाते थे और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाता था। विरोध करने पर वीडियो वायरल करने और जान से मारने की धमकी दी जाती थी।

बी-फिट जिम जाने वाली एक पीड़िता ने तहरीर में बताया कि वहाँ उसकी मुलाकात शेख अली नाम के ट्रेनर से हुई। ट्रेनिंग के दौरान उसने पहले दोस्ती बढ़ाई और फिर प्यार का नाटक कर भरोसा जीता। इसके बाद उसके साथ अश्लील हरकतें की गईं और आपत्तिजनक फोटो-वीडियो बना लिए गए जिनके जरिए लगातार ब्लैकमेल किया गया और पैसों की माँग की जाती रही।

पीड़िता ने यह भी बताया कि आरोपी ने उसके नाम पर लोन भी कराया। आर्थिक शोषण के साथ-साथ उसका धर्मांतरण भी कराया गया। उससे बुर्के में फोटो खिंचवाई गईं, घर पर पाँचों वक्त नमाज पढ़ने को कहा गया और दरगाह ले जाकर कलमा पढ़वाकर धर्मांतरण कराया गया। जब उसने इसका विरोध किया तो आरोपी गाली-गलौज पर उतर आया और जान से मारने के साथ-साथ वीडियो वायरल करने की धमकी देने लगा

शिकायत के बाद पुलिस ने जाँच के लिए 4 टीमों का गठन कर दिया। जाँच के बाद 21 जनवरी को पुलिस ने बी-फिट जिम के ट्रेनर मोहम्मद शेख अली और फैजल खान को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपितों के मोबाइल की जाँच में बड़े खुलासे हुए। इसमें KGN-1 जिम के मालिक जहीर और KGN-3 जिम के मालिक शादाब का नाम सामने आया, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। जाँच में यह भी पता चला कि KGN-2 और आयरन फायर जिम के तार भी इसी मामले से जुड़े हुए हैं।

एक परिवार, पाँच जिम और पूरा जिहादी नेटवर्क

जाँच में यह तथ्य सामने आया कि 5 में से 4 जिम एक ही परिवार के लोग चला रहे थे। KGN-1 जहीर के पास था, KGN-2.0 उसका भाई अशफाक उर्फ लकी खान चलाता था। आयरन फायर जिम फरीद अहमद के नाम पर था जबकि KGN-3.0 उसका जीजा शादाब संचालित करता था। जहीर का बड़ा भाई इमरान पहले जिम संचालन में शामिल रहा है और उसके पुराने मामलों की हिस्ट्रीशीट भी खंगाली जा रही है।

ड्यूटी के बाद जिहाद करता था कॉन्स्टेबल इरशाद

इस मामले में और भी गंभीर मोड़ तब आया जब भदोही जीआरपी में तैनात हेड कॉन्स्टेबल इरशाद खाँ की भूमिका भी इस जिहादी नेटवर्क में सामने आई। पुलिस के अनुसार, आयरन फायर जिम का वास्तविक संचालन उसकी निगरानी में होता था। कागजों पर मालिक फरीद अहमद था लेकिन इरशाद वर्षों से इस नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। वह ड्यूटी खत्म करने के बाद जिम पहुंचता था और पूरे जिहाद के इस नेटवर्क पर नजर रखता था।

अमीर घरों की महिलाओं को बनाते थे निशाना, 6 गिरफ्तार

इस मामले में अब तक मोहम्मद शेख अली, फैजल खान, जहीर, शादाब, फरीद अहमद और जीआरपी हेड कॉन्स्टेबल इरशाद खाँ को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, इमरान और अशफाक उर्फ लकी फरार हैं। दोनों के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया है।

पुलिस के मुताबिक, यह गैंग बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था। इनके निशाने पर खास तौर पर अमीर और प्रभावशाली परिवारों की महिलाएँ होती थीं। गैंग का एक सदस्य पहले महिला से नजदीकियाँ बढ़ाने और उसे अपने जाल में फँसाने की कोशिश करता था। अगर वह इसमें कामयाब नहीं होता, तो गैंग का दूसरा सदस्य आगे आता था और अलग तरीके से संपर्क साधता था।

पुलिस जाँच में यह भी सामने आया है कि जिन महिलाओं पर उन्हें शक होता था या जिन्हें आसानी से फँसाया जा सकता था तो उन्हें बहाने से दूसरे जिम में भेज दिया जाता था ताकि वहाँ गैंग के बाकी सदस्य उन्हें फँसा सकें। इस तरह गैंग अलग-अलग लोगों और स्थानों का इस्तेमाल कर महिलाओं को निशाना बनाता था। पुलिस ने बताया है कि आरोपित कई महिलाओं को फ्री जिम ट्रेनिंग का भी लालच देते थे। ट्रेनिंग के दौरान तस्वीरें ले ली जातीं और नंबर एक्सचेंज के बहाने ट्रेनिंग टिप्स और फिर निजी बातचीत शुरू की जाती। इन महिलाओं को बुर्का पहनाकर घुमाया जाता और इस्लाम अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।

जिम की फंडिंग की भी हो रही जाँच

ASP सिटी नितेश सिंह ने बताया है कि जिम की फंडिंग की भी जाँच चल रही है। पुलिस के मुताबिक, जिमों के सेटअप में लाखों रुपये लगाए गए थे। साथ ही, वहाँ काम करने वाले ट्रेनरों को केवल 10 से 15 हजार रुपए महीने का वेतन मिलता था, इसके बाद भी ट्रेनर रईसी में रहते है। महँगे मोबाइल फोन, ब्रांडेड कपड़े और जूते इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जिमों की फंडिंग किसी बड़े नेटवर्क से जुड़ी हो सकती है।

पुलिस के मुताबिक, अब तक जाँच में 50 से अधिक लड़कियों के साथ ब्लैकमेलिंग के सबूत मिले हैं। बताया जा रहा है कि इस जिम की फंडिंग करने वालों में कई प्रतिष्ठित व्यवसायी और जनप्रतिनिधियों के नाम सामने आ रहे हैं।

जिम सील, जाँच जारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए DM पवन कुमार गंगवार ने धारा 163 के तहत आदेश जारी कर पाँचों जिमों के संचालन पर 27 फरवरी 2026 तक पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। सभी जिम पूरी तरह सील कर दिए गए हैं ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे और किसी भी तरह की अवैध गतिविधि दोबारा न हो सके। पुलिस कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और संपर्कों की जाँच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह नेटवर्क और किन इलाकों तक फैला हुआ है।

‘बुर्का पहनो किस्मत बदलेगी’: 5 मुस्लिम सहेलियों ने हिंदू छात्रा को बीच सड़क पहनाया बुर्का, धर्मांतरण की साजिश; पढ़ें- मुरादाबाद में दर्ज FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद स्थित बिलारी से एक चौंकाने वाली खबर आई है, जहाँ 12वीं में पढ़ने वाली एक हिंदू छात्रा को उसकी ही 5 मुस्लिम सहेलियों ने बीच सड़क पर घेरकर जबरन बुर्का पहना दिया। घटना 20 दिसंबर की है, जिसका CCTV फुटेज अब वायरल हो रहा है।

पीड़ित छात्रा के भाई देव चौधरी की शिकायत पर पुलिस ने 22 जनवरी 2026 को FIR दर्ज कर ली है। FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। आरोप है कि ये मुस्लिम लड़कियाँ छात्रा पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बना रही थीं और उसे लालच दिया कि बुर्का पहनने से उसकी ‘किस्मत बदल जाएगी‘।

बीच सड़क पर बुर्का और ‘खूबसूरती’ का झाँसा

बिलारी के शाहकुंज कॉलोनी में रहने वाली छात्रा जब ट्यूशन पढ़कर लौट रही थी, तभी उसकी सहेलियों ने उसे गली में रोक लिया। CCTV में साफ दिख रहा है कि मुस्लिम लड़कियाँ पहले उससे बातें करती हैं, फिर अचानक एक सहेली अपने बैग से बुर्का निकालती है। छात्रा मना करती रही, लेकिन लड़कियों ने उसे यह कहकर बुर्का पहना दिया कि ‘इसमें तुम बहुत खूबसूरत लगोगी।’ इस दौरान लड़कियाँ इधर-उधर ताकती रहीं कि कोई उन्हें देख न ले।

‘खाने में कुछ मिलाया और हिंदू धर्म से नफरत भरी’

पीड़ित के भाई का आरोप है कि उसकी बहन का लंबे समय से ब्रेनवॉश किया जा रहा था। भाई ने तहरीर में बताया कि एक बार ये लड़कियाँ उसकी बहन को रेस्टोरेंट ले गईं और खाने में कुछ नशीला पदार्थ मिला दिया।

इसके बाद से छात्रा का सिर भारी रहने लगा और उसने घर वालों की बात मानना बंद कर दिया। आरोप है कि ये पाँचों मुस्लिम लड़कियाँ छात्रा को बार-बार इस्लाम कबूल करने के लिए उकसाती थीं और उसके मन में हिंदू धर्म के प्रति नफरत पैदा करने की कोशिश कर रही थीं।

हिंदू छात्रा के भाई ने आशंका जताई है कि इस पूरी घटना के पीछे कोई गहरा खेल है। उसने पुलिस को बताया कि कोई इस्लामिक संगठन इन मुस्लिम छात्राओं को मोहरा बनाकर हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण की मुहिम चला रहा है।

पीड़िता के भाई का कहना है कि जब उसे शक हुआ तो उसने एक साधु को भी दिखाया, जिसने बताया कि लड़की पर ‘कुछ करा’ दिया गया है। फिलहाल पुलिस थावला गाँव और आसपास की रहने वाली इन 5 आरोपित छात्राओं से पूछताछ की तैयारी कर रही है।

FIR की कॉपी में क्या है?

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, बिलारी थाने में दर्ज शिकायत में 5 मुस्लिम लड़कियों को नामजद किया गया है। FIR में लिखा है कि मुस्लिम लड़कियों ने छात्रा को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया और इस पूरे मामले में एक राजनीतिक या सोची-समझी साजिश की बू आ रही है।

FIR की कॉपी में पीड़िता के भाई की शिकायत

हिंदू संगठनों में उबाल, पुलिस बोली- जाँच जारी है

इस घटना के बाद इलाके के हिंदू संगठनों में भारी गुस्सा है और उन्होंने आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। एसपी ग्रामीण कुंवर आकाश ने बताया कि भाई की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। CCTV और अन्य सबूतों को जुटाया जा रहा है, जो भी तथ्य सामने आएँगे उसके आधार पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

गुजरात हासिल करने जा रहा अंतरिक्ष विनिर्माण में एक बड़ी उपलब्धि, साणंद में बनेगा देश का पहला निजी उपग्रह: जानें ये ‘आत्मनिर्भर भारत’ को कैसे देगा गति?

भारतीय अंतरिक्ष अन्वेषण का इतिहास हमेशा से गुजरात से जुड़ा रहा है। अहमदाबाद की धरती से डॉ विक्रम साराभाई का जो सपना था, वह आज साणंद की खोराज में साकार हो रहा है। अब तक उपग्रह निर्माण का कार्य पूरी तरह से सरकारी संगठन इसरो की जिम्मेदारी थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों के तहत अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोल दिया गया है।

इस क्रांति का केंद्र वर्तमान में गुजरात का साणंद है। साणंद में देश के पहले एकीकृत निजी उपग्रह निर्माण संयंत्र की आधारशिला रखी गई है। अजीस्ता स्पेस ने भारत की महत्वाकांक्षी ‘इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड फैक्ट्री’ की आधारशिला रखी है।

यह अत्याधुनिक कारखाना साणंद के खोराज औद्योगिक क्षेत्र में बनाया जाएगा। इस कारखाने की आधारशिला रखकर इसका उद्घाटन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने किया। इस संयंत्र से कई चीजें जुड़ी हैं, जैसे केंद्र सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘मेक इन इंडिया’ और गुजरात सरकार का 2047 तक विकसित गुजरात का लक्ष्य। आज हम इस पूरे संयंत्र और इससे गुजरात और भारत को भविष्य में मिलने वाले लाभों के बारे में चर्चा करेंगे।

भूमि पूजन की तस्वीरें (फोटो साभार: गुजराती जागरण)

यह परियोजना क्या है?

इस परियोजना का मुख्य नाम इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड फैक्ट्री है, जिसे कंपनी के आंतरिक संदर्भ में ‘पामनारो’ संयंत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत में निजी क्षेत्र की पहली एकीकृत उपग्रह निर्माण इकाई है, जहाँ उपग्रह का संपूर्ण उत्पादन यानी डिजाइन, इंजीनियरिंग, घटक निर्माण, संयोजन, एकीकरण, परीक्षण और प्रमाणीकरण सभी कार्य एक ही स्थान पर किए जाएंगे।

यह संयंत्र उच्च-रिजॉल्यूशन इमेजिंग, रिमोट सेंसिंग और मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरों जैसे उन्नत ऑप्टिकल पेलोड पर ध्यान केंद्रित करेगा, जो कृषि, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन और रक्षा जैसे नागरिक क्षेत्रों के लिए उपयोगी हैं। यह संयंत्र अहमदाबाद के साणंद स्थित खोराज औद्योगिक एस्टेट में स्थापित किया जाएगा, जहाँ प्लॉट संख्या K-19 से K-24/1 तक के क्षेत्र में कारखाने का निर्माण किया जाएगा।

इस संयंत्र की आधारशिला गुजरात के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने 22 जनवरी 2026 को रखी थी। इस अवसर पर संयंत्र के विकास, अवसंरचना और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए गुजरात सरकार के साथ 500 करोड़ रुपए से अधिक के समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौता ज्ञापनों के तहत, भारत के निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए गुजरात सरकार द्वारा भूमि, प्रोत्साहन और सहायता प्रदान की जाएगी।

अजीस्ता विवरण

अजीस्ता स्पेस एक भारत-जर्मन संयुक्त उद्यम है, जिसमें अजीस्ता इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड (भारत, हैदराबाद स्थित) और बर्लिन स्पेस टेक्नोलॉजीज जीएमबीएच (जर्मनी) शामिल हैं। कंपनी के पास पहले से ही अहमदाबाद के साणंद जीआईडीसी, सरखेज-साणंद रोड स्थित प्लॉट नंबर 16 पर एशिया का पहला निजी उपग्रह कारखाना है, जो 30,000 वर्ग फुट के क्लीन रूम, एआईटी (असेंबली, इंटीग्रेशन और टेस्टिंग) लैब और परीक्षण सुविधाओं से सुसज्जित है।

मौजूदा कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 50 उपग्रहों की है, जिसे बढ़ाकर 250 तक किया जा सकता है। पावर सिस्टम, संचार और नियंत्रण इकाइयों जैसे 80% से अधिक उप-प्रणालियों का निर्माण कारखाने के भीतर ही किया जाता है। इससे निर्माण समय में 250 गुना की कमी आती है और लागत में 40 गुना की बचत होती है

अजीस्ता की फैक्ट्री साणंद में स्थित है। (फोटो साभार: अजीस्ता वेबसाइट)

इस नए संयंत्र का उद्देश्य

यह नया संयंत्र केवल पुर्जों या पेलोड के निर्माण के लिए ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी के लिए बनाया गया है। इससे मेगा-कॉन्स्टेलेशन (हजारों उपग्रहों के नेटवर्क, जैसे स्टारलिंक) के लिए त्वरित और सस्ती आपूर्ति संभव हो सकेगी। इस संयंत्र का मुख्य उद्देश्य निजी क्षेत्र द्वारा भारत में पूरी तरह से स्वदेशी उपग्रहों और उन्नत ऑप्टिकल पेलोड का उत्पादन करना है।

यह एक संपूर्ण एकीकृत सुविधा होगी, जहाँ डिजाइन से लेकर अंतिम उत्पादन, परीक्षण और प्रमाणीकरण तक सब कुछ एक ही छत के नीचे किया जाएगा। इस संयंत्र में अत्याधुनिक सुविधाएं होंगी, जैसे उन्नत क्लीन रूम, अंशांकन प्रयोगशालाएं और अनुसंधान एवं विकास केंद्र, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और भारतीय उपग्रह वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।

अजीस्ता की मुख्य उपलब्धि

कंपनी की सबसे बड़ी उपलब्धि एबीए फर्स्ट रनर (एएफआर) उपग्रह है। यह उपग्रह अजीस्ता बीएसटी एयरोस्पेस का पहला उपग्रह है। यह भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र द्वारा निर्मित पहला उच्च-प्रदर्शन वाला रिमोट सेंसिंग उपग्रह है, जिसका वजन 80 किलोग्राम है और इसे विस्तृत क्षेत्र में मध्यम-रिजॉल्यूशन वाली ऑप्टिकल इमेजिंग के लिए डिजाइन किया गया है।

यह उल्लेखनीय है कि उपग्रह का वजन केवल 80 किलोग्राम है, यानी यह एक बड़े सूटकेस जितना हल्का है। इसका आकार लगभग 60 सेमी x 60 सेमी x 40 सेमी है। इसमें एक विशेष कैमरा लगा है, जो पृथ्वी की तस्वीरें लेता है। यह कैमरा लगभग 550 किलोमीटर ऊपर से तस्वीरें लेता है, जिनमें कार जैसी वस्तुएँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। इसे ‘4.6 मीटर रिजॉल्यूशन’ कहा जाता है यानी 4.6 मीटर से छोटी वस्तुएँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

एबीए फर्स्ट रनर (एएफआर) उपग्रह (फोटो साभार: अजीस्टा वेबसाइट)

यह कैमरा एक बार में 60 किलोमीटर चौड़ाई तक के भूभाग की तस्वीरें ले सकता है, जिसे ‘वाइड-स्वैथ’ कहा जाता है । यह रंगीन तस्वीरें (लाल, हरे और नीले रंग में) और विशेष प्रकार की तस्वीरें भी ले सकता है, जैसे कि पौधों के स्वास्थ्य का पता लगाने के लिए इन्फ्रारेड तस्वीरें। यह उपग्रह सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करता है यानी, यह हर दिन एक ही समय पर एक ही स्थान के ऊपर से गुजरता है, इसलिए तस्वीरें हमेशा एक ही प्रकार के प्रकाश में ली जाती हैं।

इस उपग्रह का उपयोग कृषि में फसलों की स्थिति की निगरानी करने, पानी की आवश्यकता है या नहीं, जंगलों, नदियों, पर्यावरण प्रदूषण, नए निर्माण, सड़कों, बाढ़ की निगरानी करने, भूकंप के समय सहायता की आवश्यकता वाले स्थानों का पता लगाने आदि जैसे कार्यों के लिए किया जा सकता है ।

इस उपग्रह को 13 जून 2023 को अमेरिका से स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया था। यह एक साझा मिशन था, जिसका अर्थ है कि कई छोटे उपग्रह एक साथ भेजे गए थे। यह अब दो साल से अधिक समय से अंतरिक्ष में कार्यरत है।

इसने हजारों तस्वीरें ली हैं, बड़ी मात्रा में डेटा भेजा है और पृथ्वी के 10% से अधिक हिस्से की तस्वीरें खींची हैं। यह अभी भी अच्छी तरह से काम कर रहा है और अगले तीन वर्षों तक कार्य करने की योजना है।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को गति प्रदान करना

गुजरात के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने इस संयंत्र की आधारशिला रखते हुए कहा , “अज़ीस्ता स्पेस की यह सुविधा आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि उपग्रह का संपूर्ण डिज़ाइन, विकास और परीक्षण स्वदेशी तकनीक का उपयोग करते हुए एक ही मंच के अंतर्गत किया जाएगा।”

उन्होंने आगे कहा, “यह परियोजना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक तैयारियों को मजबूत करेगी।” इसका अर्थ यह है कि इस संयंत्र द्वारा निर्मित उपग्रह रक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता का निर्माण करेंगे।

साणंद में अजीस्ता बीएसटी द्वारा स्थापित उपग्रह निर्माण इकाई केवल ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों के लिए एक परियोजना नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव है। अब तक, भारत सुरक्षा और सीमा निगरानी के लिए अपने अत्याधुनिक उपग्रहों के लिए अक्सर विदेशी प्रौद्योगिकी या घटकों पर निर्भर रहता था।

लेकिन अब स्थिति बदलेगी। इसके अलावा, जब कोई उपग्रह भारत में बनता है, तो उसका डिजाइन और उसके द्वारा भेजा गया डेटा पूरी तरह से भारतीय नियंत्रण में रहता है। सुरक्षा की दृष्टि से यह ‘आत्मनिर्भरता’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, भारत अपनी आवश्यकता के अनुसार तेजी से छोटे उपग्रहों का निर्माण और प्रक्षेपण कर सकेगा, जो पहले संभव नहीं था।

वैश्विक विनिर्माण केंद्र: दुनिया भर की कई कंपनियाँ अब चीन के विकल्प तलाश रही हैं। साणंद स्थित यह संयंत्र अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत को चीन के एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है। अजीस्ता का संयंत्र प्रति वर्ष 36 उपग्रहों का निर्माण कर सकता है।

इसका अर्थ है कि भारत अब अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का ‘खुदरा विक्रेता’ से ‘थोक विक्रेता’ बन रहा है। ऐसे सफल निजी उद्यमों को देखते हुए, अन्य विदेशी एयरोस्पेस कंपनियां भी भारत में निवेश करने और यहाँ कारखाने स्थापित करने के लिए प्रेरित होंगी।

लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र का विकास: उपग्रह बनाना किसी एक कंपनी का काम नहीं है, इसके लिए हजारों छोटे-छोटे पुर्जों की आवश्यकता होती है। साणंद में संयंत्र की स्थापना से आसपास के सैकड़ों लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को सेंसर, बोल्ट, पैनल और वायरिंग हार्नेस बनाने के ऑर्डर मिलेंगे। गुजरात पहले से ही इंजीनियरिंग और विनिर्माण के क्षेत्र में अग्रणी है। अब यहाँ के उद्योगों को अंतरिक्ष-स्तरीय पुर्जे बनाने का कौशल प्राप्त होगा, जो ‘मेक इन इंडिया’ की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी: एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी फिलहाल केवल 2% या 8.4 अरब डॉलर है। भारत सरकार 2033 तक इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 8% से अधिक या 44 अरब डॉलर करना चाहती है । यह संयंत्र इसमें महत्वपूर्ण योगदान देगा। इसके अलावा, इसरो अब गगनयान और आदित्य एल1 जैसे बड़े मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा, जबकि साणंद जैसी निजी इकाइयाँ वाणिज्यिक उपग्रहों के निर्माण का काम संभालेंगी। यह विभाजन ‘आत्मनिर्भर भारत’ को और बढ़ावा देगा।

प्रतिभा पलायन रोकना: ‘आत्मनिर्भर भारत’ का अर्थ ‘आत्मनिर्भर युवा’ भी है। अब तक भारत के सर्वश्रेष्ठ एयरोस्पेस इंजीनियर अवसरों की तलाश में नासा या स्पेसएक्स जैसी कंपनियों के लिए अमेरिका जाते थे। अब जब भारत की धरती पर, और वह भी गुजरात जैसे राज्य में, विश्व स्तरीय कारखाने मौजूद हैं, तो प्रतिभाशाली युवा भारत में ही रहेंगे और देश के लिए प्रौद्योगिकी का विकास करेंगे।

आयात घटेगा और रोजगार बढ़ेगा: इस संयंत्र में विद्युत प्रणाली, संचार और नियंत्रण इकाइयों जैसे 80% से अधिक उप-प्रणालियाँ भारत में निर्मित होंगी। इससे आयात घटेगा, लागत कम होगी और निर्माण प्रक्रिया तेज होगी। संयंत्र बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार है, जिससे भारत हजारों उपग्रहों के विशाल समूह जैसी परियोजनाओं में अग्रणी भूमिका निभा सकेगा।

यह परियोजना गुजरात को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और उच्च-तकनीकी विनिर्माण में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी बनाएगी और इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल इंजीनियरिंग और रिमोट सेंसिंग जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करेगी।

गुजरात: अनुसंधान से लेकर अंतरिक्ष विनिर्माण के वैश्विक केंद्र तक

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात का अंतरिक्ष से संबंध भारत की स्वतंत्रता के साथ ही शुरू हुआ। 1947 में, डॉ विक्रम साराभाई ने अहमदाबाद में पीआरएल की स्थापना की। इसे ‘भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का उद्गम स्थल’ कहा जाता है। यहीं से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रारंभिक वैज्ञानिक नींव रखी गई थी। फिर भारतीय वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के फलस्वरूप, 1969 में इसरो की स्थापना हुई, जिसमें डॉ साराभाई का योगदान प्रमुख था।

इसके अलावा, अहमदाबाद में स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) को इसरो का हृदय माना जाता है। एसएसी रिमोट सेंसिंग, संचार और नेविगेशन पेलोड (उपग्रहों के मुख्य उपकरण) बनाने में विशेषज्ञता रखता है। चंद्रयान-3 मिशन में उपयोग किए गए 11 महत्वपूर्ण उपकरण, जैसे लैंडर कैमरा, अल्टीमीटर और रडार आदि, अहमदाबाद स्थित एसएसी केंद्र में ही तैयार किए गए थे । लैंडिंग साइट के चयन की 80% प्रक्रिया भी यहीं पूरी हुई थी।

अनुसंधान से आगे बढ़ते हुए, गुजरात अब ‘उपग्रह निर्माण’ के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। अजीस्ता बीटीएस एयरोस्पेस एशिया का पहला निजी कारखाना है जो ‘उपग्रहों का बड़े पैमाने पर उत्पादन’ करने में सक्षम है। इस संयंत्र की क्षमता प्रति सप्ताह 2 उपग्रह या प्रति वर्ष लगभग 100 सूक्ष्म उपग्रहों के निर्माण की है।

सरकार की योजना साणंद को सिर्फ एक कारखाने तक सीमित रखने की नहीं है, बल्कि इसे एक ऐसा केंद्र बनाने की है जहाँ उपग्रह डिजाइन से लेकर परीक्षण तक सब कुछ एक ही स्थान पर किया जा सके। अज़ीस्ता के अलावा, साणंद में अन्य सहायक उद्योगों की स्थापना की प्रक्रिया भी चल रही है।

साणंद का यह क्षेत्र न केवल गुजरात बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए ‘उपग्रह निर्माण की राजधानी’ बनने जा रहा है। सरकार की नीतियों और निजी क्षेत्र के उत्साह को देखते हुए ऐसा लगता है कि अगला दशक ‘गुजरात में निर्मित’ उपग्रहों का दशक होगा।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रार्थना आमीन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।