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‘हर-हर मोदी’ से गूँजा भारत का सबसे स्वच्छ शहर, गणेश मंदिर से शुरू होकर 1.5 km चला प्रधानमंत्री का रोडशो: रानी अहिल्याबाई होल्कर को दी श्रद्धांजलि

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार के क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदौर में रोड शो किया। इस रोड शो में जनता हर तरफ उमड़ पड़ी। हर तरफ से मोदी-मोदी की आवाज आ रही थी। हर तरफ भगवा लहरा रहा था। पीएम मोदी के इस रोड शो के दौरान मानों इंदौर ने भगवा चादर ओढ़ ली हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये रोड शो करीब डेढ़ किमी लंबा रहा, जो बड़े गणेश मंदिर से राजबाड़ा तक चला।

प्रधानमंत्री मोदी ने साझा की रोड शो की तस्वीरें

दरअसल, मध्य प्रदेश में बुधवार (15 नवंबर 2023) को चुनाव प्रचार का आखिरी दिन है। उससे एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इंदौर में रोड शो किया। ये रोड शो काफी लंबा रहा और इंदौर की बड़ी आबादी इस रोड शो में शामिल हुई दिखी। आखिर लोग इस रोड शो में शामिल क्यों न हो, लंबे समय से भाजपा के गढ़ रहे इंदौर में खुद प्रधानमंत्री का रोड शो करना ये दिखाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल में इंदौर के लिए खास जगह है। प्रधानमंत्री ने रानी अहिल्याबाई होल्कर को श्रद्धांजलि दी।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस रैली की तस्वीरें अपने एक्स हैंडल पर साझा की हैं। पीएम मोदी ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा, “इंदौर की ये झलकियाँ शहर के प्रति भाजपा के मजबूत लगाव को उजागर करती हैं। चुनावों में भाजपा के लिए वोट कॉन्ग्रेस की वोटबैंक राजनीति के विपरीत, निरंतर प्रगति के लिए वोट है।”

इससे पहले, उन्होंने शाजापुर में रैली को संबोधित किया था। उन्होंने शाजापुर में कहा, “मध्य प्रदेश इस बार के चुनाव एक नया रिकॉर्ड बनाने जा रहा है। मैं बीते दिनों एमपी के अलग अलग हिस्सों में लोगों से मिला हूँ, आशीर्वाद प्राप्त किए हैं। जो भरोसा, जो विश्वास भाजपा पर दिख रहा है, वो अद्भुत है।” पीएम मोदी ने कहा कि इस चुनाव की खास बात यह है कि भाजपा की जीत की जिम्मेदारी मेरी माताओं-बहनों-बेटियों और नौजवानों ने संभाल ली है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में एक ही चरण में 17 नवंबर को मतदान होगा। इस चुनाव में भाजपा प्रचंड जीत के साथ सत्ता में वापसी करना चाहेगी। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ा है, वहीं शिवराज सिंह चौहान ने भी मुख्यमंत्री रहते हुए पूरी ताकत से पार्टी को लीड किया है।

अरविंद केजरीवाल को चुनाव आयोग का नोटिस, कहा- जवाब दो क्यों न की जाए कार्रवाई: PM मोदी का अपमान कर फँसे दिल्ली के मुख्यमंत्री

चुनाव आयोग ने भाजपा की शिकायत पर अरविंद केजरीवाल के खिलाफ नोटिस जारी किया है। चुनाव आयोग ने अरविंद केजरीवाल को 16 नवंबर तक जवाब देने को कहा है, जिसमें उन पर आरोप है कि उन्होंने और उनकी पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अनर्गल आरोप लगाते हुए कंटेंट पोस्ट किया है। इस बारे में उनकी शिकायत चुनाव आयोग से की गई थी।

चुनाव आयोग ने कहा कि PM नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर किए गए पोस्ट पहली नजर में आदर्श आचार संहिता के साथ-साथ कानून का उल्लंघन करने वाले हैं। ऐसे में उनके खिलाफ क्यों न उचित कार्रवाई की जाए?

एएनआई ने एक्स पर इसकी सूचना दी है। उसमें बताया गया है कि चुनाव आयोग ने अरविंद केजरीवाल को नोटिस जारी किया है। जिसमें भाजपा ने इलेक्शन कमीशन से शिकायत की थी कि AAP ने पीएम मोदी को अपमानजनक तरीके से नीचा दिखाया है। इस मामले में चुनाव आयोग ने अरविंद केजरीवाल को जवाब देने के लिए 16 नवंबर तक का समय दिया है।

बता दें कि पिछले बुधवार को आम आदमी पार्टी ने अपने एक्स हैंडल पर अडाणी और पीएम मोदी से जुड़ा एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें बताया गया था कि प्रधानमंत्री मोदी देश की जनता के लिए नहीं, बल्कि अडाणी के लिए काम करते हैं। इस बारे में 10 नवंबर को भाजपा ने चुनाव आयोग से संपर्क किया था और अपनी बात रखी थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने ये कदम उठाया है।

इस मामले में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी और पार्टी नेता ओम पाठक समेत बीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से संपर्क किया था और आम आदमी पार्टी के साथ ही अरविंद केजरीवाल की शिकायत की थी।

‘अपनी नहीं तो तुम्हारी बीवी को बना देता मुख्यमंत्री?’: BJP में शामिल हुए 21000 यदुवंशी तो नित्यानंद राय पर भड़के लालू यादव, बोले – भाजपा में कंसों का जुटान

चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव भारत के सबसे बड़े परिवारवादी और घोटालेबाज राजनेताओं में गिने जाते हैं। 9वीं और 11वीं तक पढ़े लड़कों को बिहार का उप-मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री बनाने वाले लालू प्रसाद यादव ने कभी अपनी अनपढ़ पत्नी को बिहार का मुख्यमंत्री भी बनाया था। अब लालू प्रसाद यादव ये कहकर अपने परिवारवाद का बचाव कर रहे हैं कि वो अपनी पत्नी को नहीं, तो क्या नित्यानंद राय की पत्नी को मुख्यमंत्री बनाते।

क्या नित्यानंद राय की बीवी को मुख्यमंत्री बनाना?

लालू यादव ने केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय को गाय-भैंस कटवाने का कारोबारी भी बता दिया। लालू यादव ने दावा किया कि नित्यानंद राय आरजेडी में शामिल होने के लिए उनके पास आए थे। उन्होंने कहा कि वे काफी अप्रोच भी किए थे। बीजेपी ने उन्हें यादवों का मुख्यमंत्री बनाने की बात की थी। लालू यादव ने कहा कि वो लोग आरोप लगाते हैं कि लालू यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। अगर लालू यादव राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री नहीं बनाते तो क्या तुम्हारी बीवी को मुख्यमंत्री बनाते?

राबड़ी नहीं होती, तो आज की हमारी सरकार भी नहीं होती

लालू यादव ने कहा कि राबड़ी देवी नहीं होती तो आज RJD की हमारी सरकार नहीं होती। बिहार में नीतीश-तेजस्वी की सरकार नहीं बनी होती। उन्होंने कहा कि भाजपा में यादव के नाम पर कंस जुटे हुए हैं। उन्होंने कहा कि यादवों को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन बिहार में 75 प्रतिशत का आरक्षण RJD ने दिलाया है। उन्होंने कहा कि पहले कमजोर लोगों को वोट ही नहीं करने दिया जाता था, लेकिन अब सबकी भागीदारी बढ़ रही है।

21 हजार यदुवंशियों ने भाजपा ज्वॉइन किया

बिहार में भाजपा यदुवंशी सम्मेलन करा रही है। गोवर्धन पूजा के मौके पर 21 हजार यदुवंशी भाजपा से जुड़े। नित्यानंद राय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘विकास की गंगा’ हर समाज, हर वर्ग, हर घर, हर गाँव और हर शहर तक पहुँची है। इसका हर समाज पर प्रभाव पड़ा है। भाजपा मिलकर काम करती है।” उन्होंने कहा कि हमारे प्रतिद्वंद्वी आरजेडी के लोग हिंदू देवी-देवताओं को गाली देते हैं। इससे लोगों को दुख होता है। 15 साल तक लालू यादव ने न तो काम किया, न ही यादव समाज का विकास किया। इसीलिए यदुवंशी भाजपा के साथ आ रहे हैं।

बता दें कि चारा घोटाले में फँसने के बाद लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हुए मुख्यमंत्री बना दिया था और रिमोट कंट्रोल के जरिए बिहार पर शासन चलाया था।

नेहरू ने चीन को बेच दिया था भारत का परमाणु बम बनाने का पदार्थ: अमेरिकी विदेश विभाग के कागजों से बड़ा खुलासा

17 जुलाई 1953, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के बंदरगाह पर सरगर्मियाँ तेज थीं। पोलैंड के एक जहाज पर धड़ाधड़ कुछ सामान चढ़ाया जा रहा था। यह जहाज पहले श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो जाने वाला था, कोलम्बो से होकर यह चीन के टाकू बार पहुँचता। लेकिन इस जहाज पर कुछ ऐसा रख दिया गया कि एक एक सप्ताह के भीतर ही इस जहाज को समंदर में रोकने के लिए अमेरिका के राजनयिक दिल्ली की गलियों के चक्कर काटने लगे।

दरअसल, इस जहाज में 2,248 पाउंड थोरियम नाइट्रेट मुंबई में लोड किया गया था। यह वही थोरियम है जिसका उपयोग परमाणु बम बनाने में होता है। थोरियम नाइट्रेट को भारत की सरकारी कम्पनी इंडियन रेयर अर्थ मैटेरियल लिमिटेड (IREL) ने चीन को ₹40,500 में बेचा था। यह कम्पनी भारत में खनन का काम करती थी। तब तक भारत चीन युद्ध नहीं हुआ था और भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू चीन को अच्छा दोस्त मानते हुए परमाणु बम बनाने का सामान बेचने की अनुमति दे रहे थे।

जब यह जहाज भारत से निकल कर कोलम्बो के रास्ते में था तब 21 जुलाई, 1953 को अमेरिका को इसका पता चला। और दिल्ली से लेकर वाशिंगटन तक अमेरिकी राजनयिकों में भगदड़ मच गई।

भारत के चीन को थोरियम बेचने पर अमेरिकियों को 21 जुलाई 1953 को जानकारी हुई।
भारत के चीन को थोरियम बेचने पर अमेरिकियों को 21 जुलाई 1953 को जानकारी हुई।

अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन फोस्टर डलेस ने तुरंत 24 जुलाई, 1953 को भारत में अपने राजदूत जॉर्ज एलन को पत्र लिखा। फोस्टर ने कहा कि भारत की नेहरू सरकार ने यह परमाणु पदार्थ बेचने की अनुमति दी है तो स्थिति बहुत गंभीर है। उन्होंने अपने राजदूत एलन से कहा कि तुरंत भारत सरकार को इसके लिए राजी करो कि यह जहाज कोलम्बो से आगे ना जाने पाए।

अमेरिकी विदेश मंत्री फ़ॉस्टर अपने राजदूत एलन को आदेश देते हुए कि भारत को थोरियम ना बेचने के लिए राजी किया जाए
अमेरिकी विदेश मंत्री फ़ॉस्टर अपने राजदूत एलन को आदेश देते हुए कि भारत को थोरियम ना बेचने के लिए राजी किया जाए

पत्र मिलने के तुरंत बाद अमेरिकी राजदूत एलन ने भारतीय विदेश सचिव आर के नेहरू के पास इस संबंध में जानकारी भिजवाई। इस बीच अमेरिकी राजदूत एलन भारत के वित्त मंत्री चिंतामन देशमुख से भी मिल आए थे। आर के नेहरू का कहना था कि प्रधानमंत्री नेहरु ही अब इस जहाज को कोलम्बो में रोक सकते हैं।

अमेरिका ने इस जहाज को रोकने की अपील के साथ ही नेहरू सरकार को एक धमकी भी हल्के शब्दों में दे डाली। अमेरिका ने कहा कि यदि भारत यह जहाज नहीं रोकता और कम्युनिस्ट तानाशाही वाले चीन को परमाणु पदार्थ की आपूर्ति करता है तो वह भारत को दी जाने वाली मदद रोक सकता है।

तब की स्थितियों को देखते हुए भारत के लिए अमेरिका की यह मदद काफी जरूरी थी क्योंकि देश को आजाद हुए मात्र 6 वर्ष हुए थे और उसे विकास के लिए सहायता चाहिए थी। तब के समय में गेंहू तक विदेशों से आता था।

जब कहने से कुछ नहीं बन सका तो राजदूत एलन खुद 28 जुलाई 1953 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से शाम 6 बजे मिले। उन्होंने इस पूरी मुलाकात की जानकारी अपने देश के विदेश विभाग को एक टेलीग्राम के माध्यम से भेजी।

एलन प्रधानमंत्री नेहरू से अपनी मुलाक़ात का ब्योरा देते हुए
एलन प्रधानमंत्री नेहरू से अपनी मुलाक़ात का ब्योरा देते हुए

एलन ने बताया कि मैं शाम को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मिला था और मैंने उनसे इस विषय की गंभीरता पर बात भी की। जवाहर लाल नेहरु ने इस पर जवाब दिया कि अगर भारत सरकार चाहे तो भी वह इस जहाज को नहीं रोक सकती।

नेहरू ने कहा कि यह थोरियम नाइट्रेट एक विदेशी जहाज पर लदा हुआ है जो कि एक विदेश के बंदरगाह में है। नेहरू ने यह कह कर भी अपनी असमर्थता जता दी कि अगर भारत सरकार ऐसा एक्शन लेती है तो उसके चीन से रिश्ते खराब हो जाएँगे। नेहरु ने इसे असंभव काम बताते हुए एलन को मना कर दिया।

एलन ने अपने देश में बताया कि आखिरी बार पूछने पर नेहरू ने कहा कि इस सम्बन्ध में कुछ नहीं हो सकता है। आगे ऐसी घटना ना हो इसके लिए अमेरिका को भारत के साथ ऐसे पदार्थों की खरीद बिक्री के लिए समझौता करना पड़ेगा।

दरअसल, नेहरू उस दौरान चीन के साथ अच्छे संबंधों पर जोर देते थे। चीन में कम्युनिस्ट तानाशाही स्थापित हो चुकी थी और वह लगातार तिब्बत समेत अक्साई चिन के इलाकों पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। हालाँकि, नेहरू इन सब बातों को नजरअंदाज कर रहे थे और देश में ‘हिंदी-चीनी-भाई-भाई’ के नारे लगवा रहे थे।

बता दें कि भारत के चीन को थोरियम बेचने से अमेरिका इतना क्रुद्ध हुआ कि उसने भारत को ‘बैटल एक्ट’ की याद दिला दी। दरअसल, बैटल एक्ट के तहत अमेरिका किसी भी ऐसे देश को दी जाने वाली सहायता बंद कर सकता था जो कि इसमें प्रतिबंधित हो। थोरियम नाइट्रेट को इसी सूची में शामिल किया गया था।

अमेरिका के विदेश मंत्री ने भारत में अपने राजदूत से कहा कि नेहरू की सरकार ने चीन को थोरियम बेच कर हमें मुश्किल में डाल दिया है। बैटल एक्ट के कारण हम उन पर एक्शन लेने को मजबूर हैं और इसलिए अमेरिका द्वारा भारत को दी जाने वाली मदद रोकनी पड़ सकती है।

भारत के चीन को थोरियम बेचने से जुड़ी समस्या को बताते अमेरिकी विदेश मंत्री
भारत के चीन को थोरियम बेचने से जुड़ी समस्या को बताते अमेरिकी विदेश मंत्री

14 अगस्त को राजदूत एलन ने वापस अपने विदेश मंत्री को लिखा कि हमें भारत को स्पष्टतया यह बता देना चाहिए कि यदि वह हम से मदद लेते हैं तो कुछ शर्तें हमारी माननी पड़ेगी। उन्होंने इससे पहले के एक खत में भारत का सारा थोरियम नाइट्रेट अमेरिका के खरीदने का भी प्रस्ताव रखा।

कई महीनों तक चले इस ड्रामे में यह थोरियम नाइट्रेट चीन पहुँच गया। नेहरू ने चीन से अच्छे संबंधों की दुहाई देते हुए इस जहाज को रोकने से मना कर दिया। इसी चीन ने नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हुए 1953 में तिब्बत पर भी कब्जा कर लिया और 1962 में भारत का भी इलाका हथिया लिया।

नेहरू ने इस पर संसद में कहा अक्साई चिन में तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता।

महादेव बेटिंग एप घोटाला, शराब घोटाला, ट्रांसफर घोटाला, गोबर घोटाला, ग्राम सभा सदस्य घोटाला, चावल घोटाला, खदान घोटाला… छत्तीसगढ़ में कॉन्ग्रेस का हिसाब-किताब

छत्तीसगढ़ में दो चरणों में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है, पहला चरण समाप्त हो चुका है, दूसरे चरण के लिए 17 नवंबर को वोट डाले जाएँगे। दूसरे चरण में 70 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होगी। राज्य में सत्ताधारी कॉन्ग्रेस सरकार पर घोटालों पर घोटालों को अंजाम देने के आरोप हैं, ऐसे में जनता कॉन्ग्रेस से खफा नजर आ रही है। भूपेश बघेल सरकार पर शराब घोटाला, ट्रांसफर घोटाला, गोबर घोटाला, ग्राम सभा सदस्य बनाने के नाम पर घोटाला, चावल घोटाला, खदान से जुड़े माल ढुलाई के काम में घोटाला के साथ ही महादेव बेटिंग ऐप जैसे घोटालों की लंबी फेहरिस्त है।

भूपेश बघेल को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंंत्री बनाया गया था, तो ऐसी रिपोर्ट्स थी कि उन्हें 2.5 साल के लिए मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है, अगले ढाई साल टीएस सिंहदेव मुख्यमंत्री होंगे। हालाँकि ऐसा नहीं हुआ। भूपेश बघेल तमाम गतिरोधों के बावजूद पूरे 5 साल मुख्यमंत्री बने रहे। टीएस सिंहदेव को आखिरी कुछ महीनों के लिए उपमुख्यमंत्री बनाकर चुप करा दिया गया। ऐसा टीएस सिंहदेव ने क्यों होने दिया, ये तो वही लोग जानें, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं की मानें तो भूपेश बघेल ने खुद को मुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत की।

उन पर भारतीय जनता पार्टी आरोप लगाती है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ को कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए तिजोरी के तौर पर इस्तेमाल कराया। जिन चीजों का वादा करके वो सत्ता में आए थे, किया उसके ठीक विपरीत काम और घोटालों पर घोटालों को अंजाम दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए फंडिंग की और खुद को सत्ता में बनाए रखा। हम इस लेख में भूपेश बघेल सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की लंबी सूची प्रकाशित कर रहे हैं, जिसके बाद सारी बातें दूध और पानी की तरह स्पष्ट हो जाएंगी।

महादेव सट्टेबाजी घोटाला: भारतीय जनता पार्टी आरोप लगा रही है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सीधे तौर पर इस घोटाले में शामिल हैं। इस कथित घोटाले के मास्टरमाइंड और एप के मालिक ने अपना एक वीडियो जारी कर कहा कि उसने भूपेश बघेल को 508 करोड़ रुपए नकद पहुँचाए हैं। ये पैसे चुनाव में इस्तेमाल किए गए हैं। उसने बताया कि एक-एक पैसों का हिसाब उसके पास है। बता दें कि महादेव सट्टेबाजी एप मामला 15000 करोड़ का अभी तो ज्ञात है, जाँच जारी है। इतने पैसों की ती मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है, जिसपर ईडी ने केस दर्ज किया है। अभी ये कितना बड़ा घोटाला है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। इस मामले में भूपेश बघेल के करीबी लोग जेल में बंद हैं।

इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाकायदा चुनावी सभा में भूपेश बघेल से सवाल पूछा है कि वो बताएँ कि इन पैसों को उन्होंने कहाँ इस्तेमाल किया। पीएम मोदी ने पूछा, “मैं कॉन्ग्रेस से कुछ सवाल पूछना चाहता हूँ। महादेव सट्टेबाजी ऐप घोटाला 508 करोड़ रुपए का है और जाँच एजेंसियों ने इस मामले में बड़ी मात्रा में नकदी बरामद की है। छत्तीसगढ़ के सीएम का एक करीबी सहयोगी भी जेल में है। कॉन्ग्रेस को खुलासा करना चाहिए इसमें सीएम को कितना पैसा मिला? दिल्ली दरबार कितना पैसा पहुँचा?”

छत्तीसगढ़ पीसीएस घोटाला : इस घोटाले से जुड़ी हैरान करने वाली जानकारियाँ सामने आई है। छत्तीसगढ़ पब्लिक सर्विस कमीशन में नेताओं और अधिकारियों को बच्चों को सीधे एंट्री मिली, और उन्हें बड़े-बड़े पद भी दिए गए। प्रधानमंत्री ने भी इस घोटाले पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि कॉन्ग्रेस के गणितबाजों से सवाल PSC घोटाले को लेकर छत्तीसगढ़ के युवाओं का भी है… जिन हजारों युवाओं ने दिन-रात पढ़ाई करके, परीक्षा पास की थी, उनको किस फॉर्मूले से बाहर निकाला गया? कॉन्ग्रेस नेताओं के बच्चों को गणित के किस फॉर्मूले से भर्ती किया गया?

शराब घोटाला : भूपेश बघेल ने वादा किया था कि कॉन्ग्रेस सत्ता में आएगी तो छत्तीसगढ़ में शराबबंदी करेगी। उल्टा भूपेश बघेल और उनके बेटे पर आरोप है कि उन्होंने कमीशनखोरी करके 2161 करोड़ रुपए का घोटाला किया जबकि अभी इसकी पूरी डिटेल भी सामने नहीं आई है। जो पकड़ा गया और जिसकी रिकवरी हुई है, यह उसकी जानकारी है। सच्चाई यह है कि छत्तीसगढ़ में हजारों करोड़ रुपए का शराब घोटाला हुआ है। इस मामले में ईडी चार्जशीट भी दाखिल कर चुकी है और बताया है कि एजाज ढेबर के भाई अनवर ढेबर के आपराधिक सिंडिकेट के जरिए आबकारी विभाग में बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ।

चावल घोटाला : छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार पर सरकारी राशन के बँटवारे में भी घोटाले का आरोप लगा है। पीडीएस व्यवस्था के तहत प्रति व्यक्ति 5 किलो धान देने की व्यवस्था की गई थी, लेकिन कैग रिपोर्ट में आया है कि इसमें 600 करोड़ रुपए की गड़बड़ी की गई है। वहीं, मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो भूपेश बघेल सरकार ने लगभग 5000 करोड़ रुपये का चावल घोटाला किया है। मई माह में भाजपा ने भूपेश बघेल पर 5000 करोड़ के चावल घोटाले का आरोप लगाते हुए इस्तीफा भी माँगा था। इस मामले में भूपेश बघेल और उनसे जुड़े लोगों ने चुप्पी साधे रखी है।

खदान ढुलाई घोटाला: भूपेश बघेल सरकार ने खदानों से निकलने वाले माल पर भी घोटाला किया है। माल ढुलाई से जुड़ा 2000 करोड़ से अधिक के घोटाले का आरोप उस पर है। बताया जा रहा है कि 25 रुपए प्रति टन की वसूली की गई है। पिछले साल ईडी ने इस मामले में जाँच शुरू की थी और कई लोग इस मामले में भी गिरफ्तार हुए हैं। ईडी ने एक बयान में कहा कि यह मामला एक बड़े घोटाले से संबंधित है, जिसमें छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ नौकरशाहों, व्यापारियों, राजनेताओं और बिचौलियों से जुड़ा एक समूह ढुलाई किये जाने वाले प्रति टन कोयले पर अवैध रूप से 25 रुपये का कर वसूल रहा है। अनुमान है कि इससे प्रतिदिन लगभग 2-3 करोड़ रुपये अर्जित किए जाते हैं।

गोबर और गोईंठा घोटाला : छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने घोटाला करने मे गोईंठा और गोबर को भी नहीं छोड़ा। 1300 करोड़ रुपये का गोईंठा एवं गोबर घोटाला किया। इस मामले में भाजपा ने भी काफी हमला बोला है, खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मामले को उठा चुके हैं। गोबर धन के नाम पर इतना बड़ा घोटाला छत्तीसगढ़ में अंजाम दे दिया गया।

छत्तीसगढ़ में चना सरकारी राशन के वितरण में घोटाला, केंद्र सरकार के पैसों का सही से उपयोग न करने के आरोप, भाई भतीजावाद के आरोप तो लगते ही रहे हैं, साथ ही आदिवासी इलाकों के साथ सौतेला व्यवहार करने के भी आरोप लगे हैं। भूपेश बघेल पर आरोप हैं कि वो छत्तीसगढ़ से मिले घोटालों के पैसों को कॉन्ग्रेस की टॉप लीडरशिप तक पहुँचाते हैं और अन्य राज्यों के चुनावी अभियान में भी खर्च करने में मदद करते हैं। यही वजह है कि वो पूरे 5 साल तक अपनी सत्ता बचाने में सफल रहे हैं।

मिया खलीफा के लिए एक जैसी है सेना और पॉर्न इंडस्ट्री, शरीर बेचने को आर्मी में सेवा देने से बेहतर बताया: सैनिकों की तुलना OnlyFans से कर फँसी

अपने अजीबोगरीब और हैरान कर देने वाले सोशल मीडिया बयानों से हमेशा सुर्खियों में रहने वाली पूर्व पॉर्न स्टार मिया खलीफा फिर चर्चा में है। उन्होंने अब सेना और पॉर्न इंडस्ट्री को एक जैसा बताने वाला अपना बीते साल का एक पुराना वीडियो अपने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर शनिवार (11 नवंबर, 2023) को अमेरिका के वेटर्नस डे (Veterans Day) पर रिपोस्ट किया है।

वेटरन्स डे पर साझा किए गए इस वीडियो में, मिया खलीफा के विवादास्पद बयान के साथ एक परेशान दिख रहे आर्मी ऑफिसर की क्लिप भी थी। इससे से एक विरोधाभास पैदा हो गया। उनके इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर बहस को बढ़ावा दिया। इराक युद्ध और अमेरिकी विरोधी भावनाओं पर कॉमेडियन मार्सेला अर्गुएलो के विचारों ने खलीफा के रिपोस्ट की इस वीडियो क्लिप को उकसा दिया है। इससे सोशल मीडिया पर रिएक्शन की बाढ़ आ गई है।

हाल ही में मिया ने फिलिस्तीनियों का समर्थन करते हुए इज़रायल को बुरा-भला कहा था। इसे लेकर ‘Playboy’ मैगजीन ने मिया खलीफा को बाहर का रास्ता दिखाया तो रेडियो होस्ट, रेड लाइट हॉलैंड भी उसे काम से निकाल चुके हैं। अब उनके इस रिपोस्ट को लेकर भी खासा विवाद छिड़ गया है। सोशल मीडिया यूजर इस वीडियो पर बँट गए हैं। कई लोग खलीफा के अपने विचारों को जाहिर करने का समर्थन करते दिखते हैं।

खलीफा के वीडियो को पर एक शख्स ने जवाब दिया, “ये उस महिला का कहना है जो हमारी दी गई आजादी को भुनाते हुए पैसे के लिए अपने खुद के जिस्म को उघाड़ती है। आपने (मिया) कभी भी अपने सिवाय किसी और के लिए कुछ भी बलिदान नहीं किया है। दुखद है कि आप एक इंसान के तौर बहानेबाजी करती हैं।”

अब आलम ये है कि ये बहस सार्वजनिक हस्तियों के साथ खलीफा की बातचीत तक चली गई है। रेडियो होस्ट और रेसलिंग एक्सपर्ट पीटर रोसेनबर्ग के साथ एक निजी बातचीत को खलीफा ने खुद के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक किया था। रोसेनबर्ग ने इस मामले में खलीफा के नजरिए को बेतुका और हास्यास्पद बताया था।

इस दौरान कुछ लोग ऐसे भी है जो आर्मी सर्विस और ‘ओनली फैन्स’ के बीच तुलना के खलीफा को कोस रहे हैं। दरअसल लेट नाइट टॉक शो ज़िवे में जुलाई 2022 में अपने शरीर को ‘ओनली फैन्स’ पर बेचने से जुड़े शो की होस्ट ज़िवे फुमुदोह के एक सवाल पर मिया ने ऐसा जवाब दिया था कि वो विवादों में घिर गई थीं।

दरअसल ओनलीफैन्स लंदन, यूनाइटेड किंगडम की इंटरनेट सामग्री मेंबरशिप सर्विस है। इसका इस्तेमाल खासकर पॉर्नोग्राफी के लिए सेक्स वर्कर करते हैं। हालाँकि, ये यह फिजिकल फिटनेस एक्सपर्ट्स और म्यूजिशियन के काम को भी होस्ट करता है।

तब मिया खलीफा ने ये तक कह डाला था कि इंटरनेट पर अपना शरीर बेचना सैनिक होने की मुकाबले बेहतर है। इस बयान हो हल्ला मचने पर मिया ने कहा था, “मेरे बयान पर एतराज जताने वाले सभी लोगों के लिए कि सेना में रहना में ‘ओनली फैन्स’ रहने से भी बदतर है क्योंकि आप अपना शरीर सरकार को बेच रहे हैं – हम दोनों इस देश की सेवा कर रहे हैं! आपको क्या लगता है कि उन्होंने उस वक्त हौसला बढ़ाने के लिए क्या भेजा था? अधिक सैनिक, या स्कर्ट में मर्लिन मुनरो?”

उन्होंने तर्क दिया था कि कोई भी काम अगर आप करते हैं तो वह शरीर को बेचना ही होता है। तब भी मिया के सेना में आप सरकार को अपना शरीर बेच रहे होते हैं वाले बयान पर लोगों के मिले जुले रिएक्शन थे।

हालाँकि इस सारे मामले में खलीफा ने फिलिस्तीन का समर्थन करने और अपने कारोबारी फैसलों को लेकर बचाव का रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि यहूदियों को लेकर अपने कारोबारी रिश्तों को पहले ही न परखने पर उन्हें खेद हैं। खलीफा के अतीत के बयानों के फिर से सामने आने से ऐसी बातचीत फिर से शुरू हो गई है जो एडल्ट मनोरंजन के दायरे से परे पहुँच गई है। ये बहस अब राजनीतिक तौर से प्रेरित दुनिया में निजी अभिव्यक्ति की जटिलताओं पर बहस करने तक चली गई है।

‘काहे नाराज़ हैं सर?’: पत्रकारों को देखते झुक कर प्रणाम करने और आरती उतारने लगे CM नीतीश कुमार, ‘पानी जाता है’ वाले बयान के बाद मीडिया से बनाई दूरी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार चर्चा में हैं। कभी सदन के भीतर महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी के मामले में, तो कभी जीतन राम माँझी पर गलतबयानी के मामले में। राजनीतिक मामलों में तो वो हमेशा सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं, लेकिन कुछ दिनों से गैर-राजनीतिक कामों के चलते चर्चा बटोर रहे हैं। इस बार नीतीश कुमार का ऐसा वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो पत्रकारों से हाथ जोड़ते और उन्हें प्रतीकात्मक आरती करते दिख रहे हैं।

मीडिया को अवॉइड कर रहे हैं नीतीश कुमार?

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव एक कार्यक्रम में पहुँचे थे। यहाँ से जब वो बाहर निकल रहे थे, तो पत्रकारों ने उन्हें आवाज लगाई। नीतीश कुमार ने सभी को किनारे कर दिया और पत्रकारों के आगे हाथ जोड़ लिया। इसके बाद वो प्रतीकात्मक तौर पर पत्रकारों की आरती भी उतारने लगे। उन्होंने अपने मुँह से एक शब्द भी नहीं कहा। इसके बाद न तो वो रुके और न ही नीतीश कुमार के डिप्टी तेजस्वी यादव ही रुके। पत्रकारों ने कुछ देर इंतजार किया, फिर वो भी आगे बढ़ गए।

वरिष्ठ पत्रकार राजन सिंह ने इसे नीतीश कुमार की नौटंकी करार दिया है। उन्होंने एक्स हैंडल पर लिखा, “बिहार के सीएम #नीतीशकुमार की नौटंकी! जब पत्रकार ने पूछा : काहे नाराज हैं सर? तो सुशासन बाबू ने नीचे झुक कर हाथ जोड़ना शुरू कर दिया… ऐसे प्रणाम कौन करता है भाई…? @yadavtejashwi ने भी मीडिया की अनदेखी की…”

इन्हीं नीतीश कुमार ने पत्रकारों को आजादी देने की कही थी बात

बता दें कि इंडी गठबंधन के ऐलान के दौरान नीतीश कुमार ने खूब दम भरा था और कहा था कि आप लोगों (मीडिया वालों) को भी इंडी गठबंधन के राज में सवाल पूछने की आजादी मिलेगी। वो बहुत दूर के भविष्य की बात कर रहे थे शायद, क्योंकि विधानसभा की गैलरी हो या कोई और जगह, वो मीडिया वालों को डिक्टेट ही करते दिखते हैं। वहीं, इंडी गठबंधन ने जब कुछ पत्रकारों का बहिष्कार किया था, तब भी नीतीश कुमार ने कहा था कि वो पत्रकारों का समर्थन करते हैं। उनका बहिष्कार करना गलत बात है। हालाँकि उनकी अब की हरकतें कुछ और ही कह रही हैं।

आजादी की जगह डिक्टेट करते दिखे हैं नीतीश कुमार

कुछ दिन पहले ही वो विधानसभा में अपने पूर्व साथी जीतन राम माँझी को जब बेइज्जत कर रहे थे, तब भी उन्होंने मीडिया को डिक्टेट करने की कोशिश की थी और कहा था कि आप लोग (मीडिया वाले) इसे फालतू ही जगह देते हैं। इसे कुछ नहीं आता। नीतीश कुमार ने पत्रकारों की तरफ इशारा करके कहा कि वो मांझी को भाव ना दिया करें। नीतीश कुमार बोले, “आप बिना मतलब के इसको (मांझी) को रोज पब्लिश करते हो। कोई सेंस है इसमें?”

इसके अलावा भी कई बार विधानसभा से लेकर अन्य जगहों पर मीडिया को राय देते दिखे हैं। वहीं, माँझी ने कुछ समय पहले आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार को धीमा जहर दिया जा रहा है, इसीलिए वो ऊल-जलूल हरकतें कर रहे हैं।

‘राजस्थान में बुरी तरह हार रही कॉन्ग्रेस’: अशोक गहलोत के बेटे ने ही लाल डायरी में की भविष्यवाणी, कहा- ‘पापा सरकार रिपीट नहीं कर पाएँगे लिखकर देता हूँ’

राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 में कॉन्ग्रेस को बुरी हार मिल रही है। ये भविष्यवाणी कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत ने 2020 में ही कर दी थी। उनकी भविष्यवाणी का खुलासा हुआ है लाल डायरी के उन चार नए पन्नों से, जिसे मीडिया के सामने रखा है गहलोत के बर्खास्त मंत्री राजेंद्र गुढ़ा ने। दावा किया जाता है कि यह लाल डायरी राजस्थान पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ के घर से कुछ महीनों पहले बर्खास्त किए गए मंत्री राजेंद्र गुढ़ा लेकर आए थे।

राजेंद्र गुढ़ा ने अशोक गहलोत के उदयपुरवाटी दौरे से ठीक पहले इस डायरी के चार पन्ने जारी किए हैं, इसके एक पन्ने में कथित रूप से राजेंद्र राठौड़ वैभव गहलोत के एक फोन का जिक्र कर रहे हैं। इसमें वैभव गहलोत ने कहा- “पापा सरकार रिपीट नहीं कर पाएँगे ये लिखकर दे देता हूँ।”

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पन्ने पर लिखा है, ”वैभव गहलोत का फोन आया कि पापा इसलिए वापिस सरकार नहीं बना पाते हैं… हर बार… इस बार भी… मैं इसलिए लिख के दे सकता हूँ। सरकार बुरी तरह हारेगी। इसका कारण वे स्वंय हैं। अधिकारियों से ऐसे घिर जाते हैं। उन्हें राजनैतिक व्यक्ति बहुत बुरा लगने लग जाता है। वैभव जी के कहने पर सवाईमाधोपुर में एक स्वीपर का भी ट्रांसफर नहीं किया। जिला के अधिकारियों में मेरा बहुत गलत मैसेज गया है। दानिश के सीएम साहब के भारी खिलाफ होते हुए भी उसके कहने पर मेरी बेईज्जती की। तब मैंने वैभव जी द्वारा भेजे ह्वाट्सऐप मैसेज सीएम साब के ओएसडी शशिकांत को भेजकर कहा कि सीएम साहब को कहना वैभव जी बहुत नाराज हैं।”

लाल डायरी का पन्ना, जिसमें वैभव कॉन्ग्रेस के हार की वजह बता रहे हैं। फोटो साभार : भास्कर

राजेंद्र गुढ़ा को मंत्रिमंडल से कर दिया गया था बर्खास्त

बता दें कि राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने राजस्थान विधानसभा में इस डायरी को लहराया था। उन्होंने राजस्थान सरकार को आईना दिखाते हुए कहा था कि राजस्थान सरकार पहले राजस्थान की समस्याओं पर बात करे, बाद में किसी और जगह की। इसके बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। राजेंद्र गुढ़ा ने कहा था कि वो लाल डायरी को विधानसभा स्पीकर की टेबल पर रखना चाहते थे, लेकिन कॉन्ग्रेसी विधायकों ने उसका आधा हिस्सा उनसे छीन लिया। राजेंद्र गुढ़ा ने दावा किया था कि इस लाल डायरी में विधायकों की खरीद-फरोख्त के साथ-साथ क्रिकेट के चुनाव में किसे कितने रुपए दिए और क्या काले कारनामे हुए गए इन सबका हिसाब है।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया था इस डायरी का जिक्र

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 27 जुलाई 2023 को इस लाल डायरी का जिक्र अपनी एक सभा में किया था। उन्होंने कहा था, “कॉन्ग्रेस ने राजस्थान में सरकार चलाने के नाम पर सिर्फ लूट की दुकान चलाई है और झूठ का बाजार चलाया है। झूठ की दुकान का सबसे ताजा प्रोजेक्ट है, राजस्थान की ‘लाल डायरी’। कहते हैं इस ‘लाल डायरी’ में कॉन्ग्रेस सरकार के काले कारनामे दर्ज हैं। लोग कह रहे हैं कि ‘लाल डायरी’ के पन्ने खुले तो अच्छे-अच्छे निपट जाएँगे। कॉन्ग्रेस के बड़े से बड़े नेताओं की इस ‘लाल डायरी’ का नाम सुनते ही बोलती बंद हो रही है। ये लोग भले ही मुँह पर ताला लगा लें, लेकिन ये ‘लाल डायरी’ इस चुनाव में कॉन्ग्रेस का डिब्बा गोल करने जा रही है।”

कर्नाटक में भर्ती एग्जाम में ‘हिजाब’ पर बैन, मंगलसूत्र-बिछ‍िया की इजाजत: भड़के INDI गठबंधन के उमर अब्दुल्ला, कहा- ‘मुस्लिमों को बनाया जा रहा निशाना, कॉन्ग्रेस से उम्मीद नहीं

कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण (KEA) ने भर्ती परीक्षाओं में सिर ढकने (हिजाब) पर बैन लगा दिया है। हालाँकि, एग्जाम हाल में अन्य तरह के जेवरों को छोड़कर मंगलसूत्र-बिछ‍िया पहनने की इजाजत दी गई है। केईए ने फोन ब्लूटूथ, इयरफ़ोन जैसे किसी भी तरह के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट को लाने पर भी रोक लगा दी है।

जहाँ परीक्षा ड्रेस कोड में लड़कियों को ऊँची एड़ी के जूते, जींस और टी-शर्ट पहनने पर बैन लगाया गया है। वहीं पुरुषों को आधी आस्तीन वाली शर्ट पहनने की मंजूरी दी गई है, लेकिन वो शर्ट उनके पैंट में अंदर टक की गई नहीं होनी चाहिए।

हालाँकि, कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण के ड्रेस कोड में प्रतिबंधित कपड़ों की सूची में हिजाब का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है। लेकिन भर्ती परीक्षाओं के दौरान सिर ढकने के खिलाफ नियम इस पर रोक लगाएँगे। वहीं भर्ती परीक्षा में हिजाब बैन को लेकर उमर अब्दुल्ला का भी बयान आया है।

सिर ढकने पर कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण के प्रतिबंध पर एनसी उपाध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला कहते हैं, “यह निराशा की बात है। सरकार क्या पहनने और क्या नहीं पहनने में हस्तक्षेप क्यों करेगी? मुस्लिमों को निशाना बनाकर विशेष तौर पर जारी किए गए। जब पहले कर्नाटक में ऐसा होता था, तो हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उस समय भाजपा सरकार थी। यह निराशाजनक है कि कॉन्ग्रेस शासन में ऐसे आदेश जारी किए जा रहे हैं… मैं अपील करूँगा वरिष्ठ नेताओं मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी से कि कर्नाटक में जो जारी आदेश जारी हुआ है इस पर दोबारा सोच लें और इसे वापस लेने का काम करें।” 

बता दें कि कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण ने राज्य में कई बोर्डों और निगमों की आगामी भर्ती परीक्षाओं को लेकर ये फैसला लिया है। क्योंकि प्रदेश भर में कई बोर्ड और निगमों में भर्ती के लिए परीक्षा 18 और 19 नवंबर को होनी हैं।

कहा जा रहा है कि कुछ छात्रों के ब्लूटूथ डिवाइस के इस्तेमाल की शिकायतों के बाद राज्य सरकार ने इस बार बैन लगाने का फैसला लिया है। दरअसल, अक्टूबर 2023 में केईए की आयोजित परीक्षाओं में कलबुरगी और यादगीर परीक्षा केंद्रों में उम्मीदवारों के कथित तौर पर ब्लूटूथ डिवाइस का इस्तेमाल करने की घटना सामने आई थी। इस घटना को लेकर राज्य सरकार ने 11 नवंबर, 2023 को राज्य सीआईडी को इसकी जाँच का आदेश दिया था।

गौरतलब है कि कर्नाटक में हिजाब पर विवाद जनवरी 2022 में भड़का था। तब उडुपी के सरकारी पीयू कॉलेज ने कथित तौर पर हिजाब पहनने वाली छह लड़कियों को प्रवेश से रोक दिया। इसे लेकर इन लड़कियों ने कॉलेज के बाहर विरोध प्रदर्शन किया।

इसके बाद उडुपी के कई कॉलेजों के लड़के भगवा स्कार्फ पहनकर क्लास में जाने लगे थे। धीरे-धीरे ये विरोध राज्य के अन्य हिस्सों में भी फैल गया और इसने विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों का रूप ले लिया। इस मामले के कोर्ट में पहुँचने पर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के अंतर्गत आने वाली कक्षाओं में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के कर्नाटक सरकार के फैसले को बरकरार रखा था।

तब बीजेपी की सीएम बसवराज सोमप्पा बोम्मई की सरकार ने इस आदेश को 10वीं और 12वीं कक्षा जैसी अन्य बोर्ड परीक्षाओं के साथ-साथ केईए की आयोजित होने वाली सामान्य प्रवेश परीक्षा तक भी बढ़ा दिया था।

नेहरू नहीं मौलाना आज़ाद तय करते थे भारत की मिडिल-ईस्ट पॉलिसी: मुस्लिमों को खुश करने के लिए नेहरू ने जिस इजरायल को किया परेशान, 1962 में उसी ने दिए हथियार

हमास के आतंकियों ने 7 अक्टूबर, 2023 को इजरायल पर हमला बोल दिया। इजरायल में जल, थल और नभ के माध्यम से घुसे इन आतंकियों ने डेढ़ हजार लोगों का कत्लेआम किया। यहूदी राष्ट्र पर 5000 मिसाइलों से वार किया गया। एक महिला की हत्या के बाद उसकी नग्न लाश का ‘अल्लाहु अकबर’ नारे के साथ हथियारबंद इस्लामी आतंकियों द्वारा परेड कराए जाने का वीडियो भी सामने आया। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या निरीह पशु – इस्लामी आतंकियों ने सबको अपनी गोलियों का शिकार बनाया।

भारत ने इस्लामी आतंकियों की निंदा की। उधर इजरायल ने इस नरसंहार के बाद हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी पर हमला कर वहाँ अपना नियंत्रण स्थापित किया। लेकिन, इसी बीच दुनिया भर का वामपंथी और इस्लामी गिरोह उग्र हो उठा और उसने इजरायल की निंदा करनी शुरू कर दी। अपने लोगों की रक्षा कर रहे एक छोटे से देश को गाली देते हुए फिलिस्तीनी बच्चों की चिंता जताई जाने लगी। ये अलग बात है कि हमास ने खुद फिलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं को खुद को बचाने के लिए ढाल बनाया।

इजरायल हमेशा से भारत के साथ रहा है, चाहे हथियारों के माध्यम से युद्ध के दौरान हमारी मदद करनी हो या फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साथ देना हो – इजरायल ने कभी भारत का साथ नहीं छोड़ा। इसके उलट हमें जानने की ज़रूरत है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का इजरायल के प्रति रुख क्या था। जवाहरलाल नेहरू की प्राथमिकता थी – अरब देशों को खुश करना। ये अलग बात है कि अरब ने जहाँ भी बात इस्लाम की आई वहाँ भारत के खिलाफ जाने से भी गुरेज नहीं किया।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की कुलपति, राज्यसभा की उप-सभापति और राज्यपाल रहीं नज़मा हेपतुल्ला ने अपनी पुस्तक ‘Indo-West Asian Relations: The Nehru Era‘ में लिखा है कि अपने गठन के साथ ही पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीन और फ्रांस के खिलाफ मोरक्को और ट्यूनीशिया का साथ देना शुरू कर दिया था (दोनों देश कभी फ्रेंच नियंत्रण में हुआ करते थे)। और हाँ, इन मामलों में उसे भारत का साथ भी मिलता था। पाकिस्तान ने अपने गठन के साथ ही ‘उम्माह’ का नेता बनने के लिए प्रयास शुरू कर दिया था।

इजरायल का पूरा प्रयास था कि भारत एक देश के रूप में उसे मान्यता दे और इसके लिए उसने महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू को मनाने की पूरी कोशिश की। उस समय तक अमेरिका, UK और सोवियत रूस तक ने इजरायल को मान्यता दे दी थी, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने नहीं दी। जवाहरलाल नेहरू का कहना था कि इजरायल के संबंध में भारत को न सिर्फ आदर्शवादी विमर्शों को ध्यान में रखना चाहिए, बल्कि वास्तविक परिस्थियों से उपजी चेतावनियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

खुद जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि भारत की नीति इतिहास में सामान्यतः अरब के प्रति झुकाव वाली रही है और साथ ही उन्होंने ये भी सफाई दी थी कि हम यहूदियों के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने माना था कि उनके समय में भी यही नीति चली आ रही है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि भारत ने इजरायल को मान्यता नहीं दी है। साथ ही वो UN के अंतिम निर्णय के बाद इस पर पुनर्विचार की बातें भी करते थे। याद दिलाते चलें कि 4 मई, 1949 को UN ने उसे मान्यता देने संबंधी याचिका स्वीकार की थी।

इसके एक सप्ताह बाद ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इजरायल को मान्यता देने संबंधी याचिका को पारित कर दिया। आप जानते हैं उस समय वोटिंग के दौरान नेहरू सरकार का रुख क्या था? तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आदेश दिया कि भारत इजरायल को मान्यता दिए जाने के खिलाफ वोट करे, क्योंकि हमारी नीति अरब के साथ सहयोग वाली रही है। उन्होंने कहा था कि वैसे इजरायल को मान्यता नहीं दी जा सकती जो बातचीत के माध्यम से नहीं, बल्कि हथियारों के बल से स्थापित हुआ है।

जवाहरलाल नेहरू इसके बाद भी इजरायल को मान्यता दिए जाने का विरोध करते रहे। 17 सितंबर, 1950 को आखिरकार नेहरू सरकार ने इजरायल को मान्यता दी। इसका कारण था कि बगल में पाकिस्तान खुद को इस्लाम का रहनुमा बना कर पेश कर रहा था और अरब देशों की उससे घनिष्ठता थी। लेकिन, इजरायल को मजबूरी में मान्यता दिए जाने के बाद भी नेहरू का जोर अरब और इस्लाम को खुश करने में लगा रहा। उन्होंने अरब को सफाई दी कि भारत फिलिस्तीनी शरणाथियों की माँगों का समर्थन करता रहेगा।

साथ ही उन्होंने अरब को भरोसा दिलाया कि जेरुसलम और सीमान्त क्षेत्रों में इजरायल के नियंत्रण को भारत मान्यता नहीं देता है। आज की तरह ही भारत की आज़ादी के बाद भी यहाँ के मुस्लिम इजरायल के विरोधी हुआ करते थे। यहाँ की सोशलिस्ट पार्टियाँ इजरायल के लेबर मूवमेंट के कारण यहूदी राष्ट्र का समर्थन करती थीं। वहीं जनसंघ भी इजरायल के साथ संबंध सुधारने के पक्ष में थे। लेकिन, नेहरू सरकार प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी और बिगड़ी आर्थिक स्थितियों का हवाला देते हुए कूटनीतिक संबंध स्थापित करने में देरी करती रही।

इजरायली भी नेहरू सरकार के इस रुख से निराश थे। इजरायल के प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने कहा था कि वो समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इजरायल को लेकर नेहरू की नीति आखिर कैसे गाँधी की वैश्विक मित्रता के सिद्धांत के अनुरूप है। उन्होंने कहा था कि 8 साल पहले आश्वासन दिए जाने के बावजूद नेहरू ने कूटनीतिक संबंध स्थापित करने की ओर कोई कदम नहीं बढ़ाया। उन्होंने नेहरू को अपनी बात पर कायम न रहने वाला व्यक्ति करार दिया था।

कई बार इजरायल का प्रतिनिधिमंडल भारत आया, लेकिन राजनयिक संबंध बनाने की अनुमति नेहरू ने नहीं दी। उनका खुद कहना था कि चीजों को बैलेंस करने के लिए ये नीति अपनाई गई है। उन्होंने कहा था कि इजरायल के साथ राजनयिक संबंध बनाना ठीक नहीं होगा। अब बात करते हैं कि इस नीति पर मौलाना अबुल कलम आज़ाद का क्या प्रभाव था। मौलाना उस समय भारत के शिक्षा मंत्री हुआ करते थे और एक मुस्लिम होने के कारण बताने की ज़रूरत नहीं है कि वो किसके साथ थे।

कनाडा के राजनीतिक वैज्ञानिक माइकल ब्रेचर, जो भारत को लेकर कई पुस्तकें लिख चुके हैं, उन्होंने इस बारे में बात की है। मैक्गिल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे माइकल ब्रेचर ने लिखा है कि मौलाना आज़ाद नेहरू के करीबी मित्र थे और उन्होंने बलपूर्वक इजरायल नीति में हस्तक्षेप किया था। वो मानते हैं कि 1958 में अपने निधन तक वो भारत की मिडिल-ईस्ट पॉलिसी पर प्रभाव रखते रहे। माइकल ब्रेचर लिखते हैं कि मौलाना आज़ाद एक मुस्लिम होने के कारण स्वाभाविक रूप से प्रो-अरब थे।

उन्हें डर था कि अगर भारत इजरायल के साथ जाता है तो अरब का क्या रुख होगा। उस समय कश्मीर मुद्दे पर अरब के समर्थन के लिए पाकिस्तान के साथ भारत प्रतिद्वंद्विता के शिखर पर था। उन्होंने लिखा है कि नेहरू और आज़ाद को इसका भी भय था कि भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी ‘असुरक्षित’ मुस्लिमों पर इजरायल के प्रति सकारात्मक रवैया रखने का क्या असर पड़ेगा। डर था कि भारत में सांप्रदायिक घृणा बढ़ेगी और पाकिस्तान इसका फायदा उठा कर हिंसा को अंजाम देगा।

नेहरू-आज़ाद को डर था कि विभाजन और दंगों के बाद भारतीय मुस्लिमों की वफादारी कहीं बदल न जाए। इजरायल के विदेश मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल रहे वालटर एटन ने इस संबंध में एक कड़वी सच्चाई लिखी है। उन्होंने लिखा था, “भारत की विदेश नीति में जितना नेहरू का प्रभाव है, दुनिया के किसी भी देश में किसी एक व्यक्ति का नहीं है। उनका प्रभाव इतना अधिक है कि भारत की विदेश नीति को लोग नेहरू की व्यक्तिगत नीति मानते हैं। उन्होंने इतनी ताकत से इसमें अपने विचार और अपना व्यक्तित्व भर दिया है कि भारत की विदेश नीति को नेहरू की प्राइवेट मोनोपोली (निजी एकाधिकार) मानी जा सकती है।”

उनका मानना था कि इसमें सरकार वल्लभभाई पटेल तक की नहीं चलती थी, जो उस समय भारत के विदेश मंत्री हुआ करते थे। जवाहरलाल नेहरू इजरायल को सकारात्मक जवाब दे चुके थे और भारत में नई सरकार के गठन के साथ ही उसे मान्यता देने का भरोसा दे चुके थे, लेकिन इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ तो इसमें मौलाना आज़ाद का प्रभाव भी माना जा सकता है। 1948 में बिहार में कुछ प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं ने फिलिस्तीन के लिए चंदा इकट्ठा करना भी शुरू कर दिया था।

उस समय जेद्दाह अरब की युद्ध गतिविधियों का केंद्र था और ये रुपए वहीं भेजे जाने थे। इतना ही नहीं, हैदराबाद का निजाम भी रुपए इकट्ठे कर रहा था। उसने 1.40 करोड़ पाउंड अरब वालों को भेजा था, ताकि फिलिस्तीन वाले इन पैसों से इजरायल से लड़ने के लिए हथियार खरीद सकें। नेहरू की बातों से ऐसा लगता है कि इजरायल को समर्थन न देने के पीछे अरब को खुश करने का कम और भारतीय मुस्लिमों के बीच विद्रोह का डर ज़्यादा था।

वहीं आज का समय देखिए। भारत की जनता खुल कर इजरायल के साथ है, हमास आतंकियों द्वारा की गई हिंसा की खुल कर यहाँ निंदा हो रही है। ऐसा नहीं है कि भारतीय मुस्लिमों ने अपना रुख बदल लिया है, बल्कि हिन्दू पुनरुत्थान के दौर में लोगों ने अपने मित्र और दुश्मन को पहचानने की क्षमता विकसित कर ली है। सोचिए, इजरायल का खुल कर साथ दिया गया होता शुरू से तो हथियारों से लेकर विज्ञान तक के क्षेत्र में भारत का कितना अधिक विकास होता।

एक और बात जानने लायक है, जब भारत पर 1962 में चीन ने हमला किया तो इसी इजरायल ने भारत की मदद की। भारत के निवेदन पर इजरायल ने हथियारों की सप्लाई की। इजरायल के प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने स्पष्ट लिखा कि इस युद्ध में इजरायल भारत के साथ है। उस समय नेहरू ही भारत के प्रधानमंत्री थे। बाद में 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ तब भी इजरायल के भारत की मदद की। ऐसे देश को नेहरू मान्यता देने और राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए बार-बार परेशान करते रहे थे।