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1 की मौत, 3 घायल: बिहार जाने वाली ट्रेन में चढ़ने के दौरान सूरत रेलवे स्टेशन पर हादसा, RPF जवानों ने बचाई कई की जान

देशभर में लोग दिवाली और छठ पर्व के लिए घर जा रहे हैं। ऐसे में बस अड्डे और रेलवे स्टेशन पर लोगों की भारी भीड़ जमा है। इसी कड़ी में गुजरात के सूरत रेलवे स्टेशन पर शनिवार (11 नवंबर, 2023) को भगदड़ की घटना सामने आई है। इस हादसे में बिहार के एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। वहीं कई लोगों के घायल होने के साथ ही चार-पाँच लोग बेहोश बताए जा रहे हैं, जिनको हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। जिन्हें होश आ गया है।

पश्चिम रेवले के प्रवक्ता सुमित ठाकुर के अनुसार सूरत स्टेशन पर भीड़ को लेकर जरूरी उपाय किए गए हैं। फिर भी भीड़ ट्रेन में चढ़ने के लिए बेकाबू हो जा रही है। वहीं घटना को लेकर पुलिस अधीक्षक (पश्चिम रेलवे) सरोजनी कुमारी ने बताया कि यात्री सुबह सूरत रेलवे स्टेशन से ताप्ती गंगा एक्सप्रेस ट्रेन में चढ़ने के लिए दौड़ पड़े, जिससे अफरा-तफरी का माहौल हो गया और हादसे में एक की मौत हो गई जबकि तीन  लोग घायल हो गए।

क्या है पूरी घटना 

दरअसल, सूरत रेलवे स्टेशन पर दीवाली और छठ के मौके पर घर पहुँचने के लिए पिछले दो दिनों से भारी भीड़ सामने आ रही थी। ऐसे में शनिवार की सुबह जैसे ही छपरा जा रही ताप्ती गंगा एक्सप्रेस ट्रेन स्टेशन पर पहुँची तो यात्रियों में भगदड़ मच गई। भगदड़ में बिहार के एक एक व्यक्ति की मौत सहित कई यात्रियों के गिरने से चोट लगाने की खबर सामने आई है।

शुरूआती जाँच में भगदड़ में जान गँवाने वाले यात्री की पहचान वीरेंद्र कुमार के तौर पर हुई है। वह बिहार के छपरा के रहने वाले थे और सूरत में नौकरी करते थे। रेलवे पुलिस के अनुसार भगदड़ में बेहोश हुए वीरेंद्र कुमार को इलाज के लिए नजदीक के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया था। जहाँ पर उनकी मौत हो गई।

इस हादसे के बारे में प्रत्यक्षदर्शी विनय कुमार ने बताया कि मृतक वीरेंद्र कुमार डायमंड के कारीगर थे। वे अपने भाई के साथ ताप्ती गंगा एक्सप्रेस से बिहार के भागलपुर जाने के लिए पहुँचे थे। जब ट्रेन आई तो उसमें चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की और भगदड़ हुई। इसी दौरान वीरेंद्र नीचे गिर गए। और यह हादसा हो गया। 

बेहोश हुए यात्रियों को आरपीएफ के अधिकारियों ने दिया सीपीआर

सूरत रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ और भगदड़ में बेहोश हुए 5 यात्रियों को आरपीएफ के अधिकारियों ने सीपीआर देकर बचाया। हालाँकि, इस तरह की भीड़ शनिवार को पहली बार नहीं देखी गई बल्कि सूरत रेलवे स्टेशन पर एक दिन पहले भी यात्री ट्रेन में खिड़कियों के जरिए घुसे थे। तब भी अफरा-तफरी की स्थिति बन गई थी। 

रेल राज्य मंत्री ने लिया घायलों का हालचाल 

हादसे के बाद सूरत की सांसद और राज्य रेल मंत्री दर्शना जरदोश घायलों से मिलने अस्पताल पहुँची। वहाँ उन्होंने घायलों से मिलकर उनका हालचाल जाना।

‘दिवाली पर एक-दूसरे को उपहार मत दें, इससे बहुत कचरा पैदा होता है’: लोगों को पसंद नहीं आया फ्लॉप हीरोइन का ‘ज्ञान’, पूछा – ईद-क्रिसमस पर कहाँ सोई रहती हो?

जैसे ही हिन्दू पर्व-त्योहार आते हैं, वैसे ही बॉलीवुड और क्रिकेट की हस्तियाँ ज्ञान देने लगती हैं। ताज़ा मामला दीया मिर्जा का है। दीया मिर्जा ने दीवाली पर वीडियो जारी कर के कुछ ऐसा ज्ञान दिया है, जो लोगों को पसंद नहीं आ रहा है। दीया मिर्जा इस वीडियो में कह रही हैं कि इस दिवाली पर मुझे गिफ्ट्स न दें, मुझे कुछ मत दें। उन्होंने कहा कि उन्हें महसूस होता है कि दिवाली पर लोग एक-दूसरे को कई ऐसी चीजें देते हैं जिनकी कोई ज़रूरत ही नहीं होती।

वीडियो में दीया मिर्जा आगे कहती हैं, “कुछ ज़्यादा ही पैकेजिंग हो जाती है और काफी कचरा पैदा हो जाता है। इस दिवाली मुझे कुछ मत दीजिए। आप बस मुझे अपना समय दीजिए। अपने घर में कचरों को अलग-अलग कर के मेरा समर्थन कीजिए। आप इस दिवाली पर मुझे सबसे अच्छा गिफ्ट ये दे सकते हैं कि आप उन संगठनों का समर्थन करें तो पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिए काम कर रहे हैं।” दीया मिर्जा ईद-बकरीद या क्रिसमस पर इस तरह के ज्ञान देती नहीं दिखती हैं।

‘वोकफ्लिक्स’ नाम के ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) हैंडल ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘वोकिज्म’ के झंडाबरदारों और इस्लामवादियों ने दिवाली को बदनाम करने का एक नया रास्ता खोज लिया है – ज़्यादा तोहफे देने से कचरा पैदा होता है। उक्त ट्विटर हैंडल ने ये भी लिखा कि दीया मिर्जा जैसे बॉलीवुड सेलेब्रिटी पर्यावरणविद होने के नाम पर घोटाला हैं। ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ नामक हैंडल ने भी दीया मिर्जा को एक फ्लॉप अभिनेत्री करार देते हुए कहा कि वो दिवाली पर ही अपना ‘वोक’ ज्ञान देती हैं।

बता दें कि दीया मिर्जा ने 33 फ़िल्में की हैं, जिनमें उनकी मात्र 2 फ़िल्में ही हिट हुई हैं और वो दोनों ही राजकुमार हिरानी की फ़िल्में थीं जिनमें दीया मिर्जा का कोई योगदान नहीं था। यही कारण है कि उन्हें फ्लॉप अभिनेत्री कहा जाता है। ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ ने पूछा कि दीया मिर्जा क्रूरता मुक्त ईद या फिर पटाखा मुक्त क्रिसमस की बात क्यों नहीं करतीं? साथ ही याद दिलाया कि बॉलीवुड के लोग जो महँगे मेकअप और शूटिंग के लिए बनाए गए जिस सेट का इस्तेमाल करे हैं, उससे भी काफी कचरा पैदा होता है।

नमाज़ पढ़ी, क्रैम्प्स आया और गिर पड़े… मोहम्मद रिज़वान के ड्रामे के साथ ही वर्ल्ड कप से बाहर हुआ पाकिस्तान, पिटाई के मामले हैरिस रउफ ने बनाया ‘महान’ रिकॉर्ड

पाकिस्तान की क्रिकेट टीम इंग्लैंड से हार के साथ ही ICC वनडे वर्ल्ड कप 2023 से बाहर हो गई है। हालाँकि, हार-जीत का फैसला होने से पहले ही ये सुनिश्चित हो गया था कि पाकिस्तान सेमीफाइनल में नहीं जाएगी, क्योंकि इंग्लैंड के स्कोर को उसे मात्र 6.2 ओवर में चेज करना था जो असंभव था। इंग्लैंड ने 93 रनों से पाकिस्तान को हरा दिया। पाकिस्तान का सिर्फ एक बल्लेबाज आगा सलमान ही अर्धशतक जड़ पाए। इंग्लैंड के 337 के जवाब में टीम मात्र 244 पर ढह गई।

इंग्लैंड की तरफ से बेन स्टोक्स ने सर्वाधिक 84 रन जड़े, वहीं हैरी ब्रूक ने 17 गेंदों पर 30 रनों की तेज़-तर्रार पारी खेली। हैरिस रउफ पाकिस्तान की तरफ से सर्वाधिक 3 विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। वहीं स्कोर का चेज करने उतरी पाकिस्तानी टीम 43.3 ओवर में ऑलआउट हो गई, जिसमें डेविड विली के 3 विकेट का योगदान रहा। ये उनका अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच था, जिसमें वो ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ रहे। इंग्लैंड का कोई भी गेंदबाज बिना विकेट के नहीं गया। कप्तान बाबर आज़म ने 45 गेंदों पर 38 रन बनाए, लेकिन वो इस शुरुआत को आगे नहीं ले जा सके।

प्रेजेंटेशन के दौरान बाबर आज़म का दर्द छलक गया और उन्होंने कहा कि अगर दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ उनकी टीम ने मैच जीत लिया होता तो आज दृश्य दूसरा होता। उन्होंने बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण में गलतियों की बात स्वीकारी। उन्होंने बीच के ओवरों में स्पिनरों द्वारा विकेट न लिए जाने पर उन्हें खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा कि हमें मिल-बैठ कर गलतियों को सुधारने के लिए विचार-विमर्श करना होगा। रनों के मामले में ये वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की चौथी सबसे बड़ी हार है।

2019 से लेकर अब तक वनडे मैचों में इंग्लैंड ने 10 में से 8 मैच पाकिस्तान को हराया है, जबकि एक का रिजल्ट नहीं निकला और एक ही मैच पाकिस्तान जीत पाया। इसके साथ ही इंग्लैंड चैंपियंस ट्रॉफी 2025 में भी क्वालीफाई कर गया है। इसके साथ ही अब साफ़ हो गया है कि बुधवार (15 नवंबर, 2023) को भारत और न्यूजीलैंड भिड़ेंगे और दोनों में जो जीतेगा वो फाइनल में पहुँचेगा। वहीं ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में से कोई एक फाइनल में पहुँचेगा।

पाकिस्तान अब अगले 1 वर्ष तक कोई वनडे नहीं खेलेगा, क्योंकि उसका अगला ODI मैच सीधा नवंबर 2024 में है। वहीं ताज़ा मैच की बात करें तो इसमें विकेटकीपर बल्लेबाज मोहम्मद रिज़वान के आउट होने का खूब मजाक बना। वो क्लीन बोल्ड होने के बाद जमीन पर गिर पड़े। बताया गया कि उन्हें ‘क्रैम्प्स’ आ गया है। हालाँकि, लोगों ने सोशल मीडिया में कहा कि वो ड्रामा कर रहे हैं। मोहम्मद रिज़वान ने इस मैच में भी ड्रिंक्स ब्रेक के दौरान नमाज़ पढ़ी। वहीं हैरिस रउफ किसी भी वर्ल्ड कप में सबसे ज़्यादा रन और छक्के खाने वाले गेंदबाज बन गए हैं।

पुष्पक विमान से उतरे प्रभु श्रीराम, रथ खींचते CM योगी: दीपावली पर गिनीज बुक में दर्ज हुआ अयोध्या का नया रिकॉर्ड, हेलीकॉप्टर से हुई पुष्प वर्षा

दीपावली की पूर्व संध्या पर अयोध्या में शनिवार (11 नवंबर, 2023) को अयोध्या में एकदम कुछ वैसा ही नज़र देखने को मिला, जब श्रीराम और माँ सीता 14 वर्षों के वनवास से लौट कर अपनी राजधानी को आए होंगे। जो अयोध्या केंद्र में कॉन्ग्रेस और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के शासनकाल में सूनी-सूनी रही रही, वहाँ अब दीवाली से एक दिन पहले ऐसा माहौल है जो बताता है कि सरकार बदलने से क्या हो सकता है। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में मौजूद हैं और कार्यक्रम की निगरानी कर रहे हैं।

अयोध्या में आयोजित ‘भव्य-दिव्य दीपोत्सव-2023’ में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल भी मौजूद थीं। रामकथा पार्क में राम दरबार भी लगाया गया। इस दौरान हेलीकॉप्टर से भगवान श्रीराम और माँ सीता बने हुए कलाकार उतरे, जिनका सीएम योगी ने स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने प्रभु श्री राम के प्रतीक स्वरूप का तिलक लगाकर अभिषेक किया। इसके बाद उन्होंने पुण्यसलिला माँ सरयू जी की पावन आरती की। राम जी की पैड़ी पर भी सीएम योगी ने पूजा-अर्चना की।

इसके बाद वो ‘ग्रीन एन्ड डिजिटल फायरवर्क्स’ शो में पहुँचे, जहाँ रंग-बिरंगे प्रकाश से जगमग अयोध्या को जगमग देखा गया। 22.23 लाख दीपक के साथ अयोध्या में भव्य दीपोत्सव मनाया गया। अयोध्या का ये नया रिकॉर्ड गिनीज बुक में भी दर्ज हो गया है। मिट्टी के दीयों से जगमगाते हुए सरयू घाट को देख के श्रद्धालु आह्लादित थे। अयोध्या के 51 घाटों पर ये दीये जलाए गए। सरयू घाट पर स्क्रीन लगा कर भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास के चित्र दर्शाए गए।

दीयों को सजाने के लिए कई वॉलंटियर्स लगाए गए थे। सीएम योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद 2017 में 87,000 दीये जलाए गए थे और अब ये आँकड़ा कई गुना बढ़ चुका है। ‘पुष्पक विमान’ से उतरे राम-लक्ष्मण का भारत और शत्रुघ्न ने गले लगा कर स्वागत किया, इसके बाद वो गुरु वशिष्ठ के साथ रथ में सवार होकर राम दरबार के लिए निकल गए। रथ पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई। रथ को राज्यपाल, CM और उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठ खींच रहे थे।

पीरियड्स की छुट्टियाँ या दोयम दर्जे का होने का एहसास… क्या महिलाएँ दुनिया की अजूबा जीव हैं?

असम की गुवाहाटी यूनिवर्सिटी ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए महावारी के दौरान छात्राओं को छुट्टियाँ देने का फैसला लिया है। इस पीरियड लीव के साथ ही महीने के इन दिनों में छात्राओं को हाजिरी यानी अटेंडेंस में भी राहत दी जाएगी। यूनिवर्सिटी के सभी संबद्ध कॉलेजों में ये महावारी लीव पॉलिसी लागू होगी।

इस पॉलिसी में सेमेस्टर एग्जाम में बैठने के लिए जरूरी कम से कम न्यूनतम क्लास अटेंडेंस में भी छात्राओं को दो फीसदी की छूट देकर इसे 73 फीसदी कर दिया गया। शिक्षा मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के जारी निर्देशों के नजरिए से देखा जाए तो महावारी के दौरान महिलाओं की सेहत की अहमियत को देखते हुए लिया गया ये फैसला नजीर पेश करता है।

गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के इस फैसले को काबिले तारीफ कहा जा सकता है। हालाँकि, ये फैसला ये दिखाता हुआ भी लगता है कि महिलाएँ जैसे दुनिया में एक अजूबा जीव हो, जिसे हरदम एक सहारे की जरूरत हो, फिर चाहे वो प्रकृति के बनाए उसके जिस्म को लेकर ही क्यों न हो।

इन दिनों घोर नारीवाद के नाम पर पीरियड लीव ही नहीं, बल्कि थ्रेडिंग, अपरलिप्स, अंडर आर्म्स, फेसिअल, ऑर्गेज्म यानी चरम सुख पर खुलेआम बात होने लगी है। ये अच्छा भी है, क्योंकि अब एक बेटी को अपने पिता से, एक बहन को अपने भाई से पीरियड के लिए पैड मँगाते हुए हिचक नहीं होती है। ये नजरिया एक बच्ची, एक लड़की, एक महिला के हक में बेहद सुखद बदलाव महसूस कराता है।

मसला वहाँ पैदा होता है, जब हम इन बातों को लेकर मुद्दा बनाते हैं और खुद को एक इंसान से कुछ अलग साबित करने की होड़ में लग जाते हैं। नारीवाद की दौड़ में आगे निकलने के लिए हम कुदरत की दी गई जिस्मानी प्रक्रियाओं को लेकर भी शोर मचाते हैं।

कुदरत ने औरत के जिस्म को माँ बनने के लिए ही तैयार किया है। महावारी उसी का हिस्सा है। ये कुदरत की एक सामान्य प्रक्रिया है। एक औरत होने के नाते मैं भी इससे दो-चार होती हूँ। हालाँकि, ये जरूरी नहीं की हर किसी लड़की या महिला को इस दौरान दर्द या तकलीफ से दो-चार होना ही पड़ता है।

मेरे केस में पीरियड शुरू होने से लेकर अभी तक ऐसा शारीरिक दर्द या परेशानी मुझे नहीं झेलना पड़ी है, लेकिन मैं ये नहीं कहती कि हर किसी के महावारी के दिन इतने ही सुकून भरे बीतते हों। मुझे मेंस्ट्रुअल लीव यानी पीरियड्स के दौरान छुट्टी की जरूरत नहीं महसूस होती और शायद मेरे जैसा अनुभव कुछ दूसरी महिलाओं का भी रहा हो।

वहीं, कुछ अन्य लड़कियों एवं महिलाओं को पीरियड्स के दौरान अच्छी-खासी मानसिक एवं शारीरिक परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। किसी को पेट में असहनीय दर्द होता है तो किसी को बदन दर्द। किसी को उल्टी, तेज बुखार, मूड स्विंग, चिड़चिड़ेपन और कमजोरी से भी दो-चार होना पड़ता है। लाजिमी है कि महावारी के दौरान इस तरह की परेशानियाँ झेलने वाली महिलाओं के काम पर भी इसका असर पड़ता है।

इसके बावजूद अगर सभी लड़कियों और महिलाओं को महावारी के नाम पर हर जगह छुट्टियाँ और आराम देने की बात की जाए और ये महसूस कराया जाए कि पुरुषों के मुकाबले वो काम के मामले में इन दिनों ढीली रहती हैं तो मेरे ख्याल से ये एक आजाद, खुद पर निर्भर रहने वाली हर महिला के लिए उलाहना जैसा ही होगा। ये सबको एक ही लाठी से हाँकने जैसा भी होगा।

वैसे ही महिलाओं के मामले में लाख प्रोग्रेसिव रहने के बाद भी वर्क प्लेस में उन्हें अहमियत देने में एम्पलॉयर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। ये केवल अपने मुल्क की ही बात नहीं, बल्कि महिलाओं के मामले में दुनिया के सबसे उदार देश कहे जाने वाले आइसलैंड का भी यही हाल है। हाल ही में वहाँ की पीएम प्रधानमंत्री कैतरीना कोस्तोत्रई तक को लैंगिक समानता की माँग को लेकर हड़ताल पर बैठना पड़ा था।

कुछ जगहों पर जॉब ज्वॉइन करने से पहले ही देखा जाता है कि महिला मैरिड है या अनमैरिड। कुछ कंपनियाँ अपवाद हो सकती हैं, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि कई कंपनियाँ महिलाओं को काम देने से कतराती है। कहीं उनकी सुरक्षा का मुद्दा हावी हो जाता है तो कहीं उनकी महावारी और प्रेगनेंसी होने के बाद मेटेरनिटी और चाइल्ड केयर लीव का।

ऐसे में महिलाएँ यंग ऐज में जब वो वर्कप्लेस पर बेहतरीन काम कर सकती हैं तो उसे पीरियड्स लीव से जोड़कर उनके लिए जाने-अनजाने खाई तो नहीं खोद रहे हैं? सरकारी विभागों को छोड़ दिया जाए तो प्राइवेट कंपनियों में वैसे ही महिलाओं को 30 की उम्र के बाद रखने से गुरेज किया जाता है। अगर उस पर पीरियड्स लीव का टैग भी लग जाए तो क्या काम मिलना आसान रह जाएगा?

दूसरी तरफ पीरियड लीव का ये कॉन्सेप्ट वर्कप्लेस में महिलाओं और पुरुषों के बीच एक खाई पैदा कर सकता है। मैं ये नहीं कहती कि सभी पुरुष महिलाओं को नहीं समझते, लेकिन इंसान होने के नाते उनके दिल में वर्कप्लेस और यूनिवर्सिटीज में इस तरह की पीरियड लीव मिलने पर महिलाओं के खिलाफ हिकारत और नफरत की भावना होने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।

वैसे ही हम लोग दुनिया की आधी आबादी कहलाते हैं। कभी हमें पूरी में गिना ही नहीं जाता। अगर हम पूरी आबादी में शामिल होने का दम भरना चाहती हैं और चाहती हैं कि हमें भी पुरुषों के बराबर समझा जाए तो पीरियड लीव जैसे कॉन्सेप्ट से दूरी बनाने के बारे में सोचना चाहिए। जैसे हम बीमार होने पर छुट्टी लेते हैं, वैसे ही जिसे जरूरत है वो खुलेआम बुखार की जगह पीरियड्स लिखकर भी इस सामान्य तरीके से ही छुट्टी ले सकती हैं।

मेरी नजर में ये मुश्किल भी नहीं है, क्योंकि इस दौर में कम से कम हम यहाँ तक तो पहुँच ही गए हैं कि रेप, पीरियड्स, ऑर्गेज्म, सेक्सुअल हेरेसमेंट पर हम खुलकर बात कर सकते हैं। उसके लिए हमें किसी खास पीरियड लीव की जरूरत शायद नहीं होनी चाहिए।

अगर स्टडी पर भी गौर करें तो हर किसी महिला को पीरियड्स में होने वाली तकलीफ का स्तर एक नहीं होता। रिसर्च ये साबित करती है। लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में प्रजनन स्वास्थ्य के प्रोफेसर जॉन गिलेबॉड के मुताबिक, पीरियड्स के दौरान कई औरतों को हार्ट अटैक जैसी तकलीफ होती है। इससे साफ है कि सभी महिलाओं में ऐसा नहीं होता।

इसी तरह डिस्मेनोरिया पर साल 2012 की रिसर्च बताती है कि कम से कम 20 फीसदी महिलाओं को पीरियड्स के दौरान होने वाली तकलीफ से चलना भी मुश्किल हो जाता है। इसका मतलब लगभग 80 फीसदी महिलाओं के लिए ये सामान्य शारीरिक प्रक्रिया की तरह ही रहता है।

एक स्टडी के मुताबिक, पीरियड्स दर्द की वजह से काम करने में औसतन 33 फीसदी की गिरावट आती है। काम करने की क्षमता में इस तरह की गिरावट तो बुखार वगैरह से भी आ सकती है। मेरा मानना है कि ये दौर पीरियड्स और इस तरह की परेशानियों से उबरने का दौर है।

हमें उठ खड़ा होना चाहिए हर एक उस महिला के समर्थन में, जिसका इन सबसे कोई वास्ता ही न हो। जो तालीम हासिल करने के लिए समाज से दो-दो हाथ करने को तैयार हो। जो बलात्कार के बाद भी सिर उठा के बलात्कारी को ललकार सके। अपना सिर ऊँचा कर सरेआम चल सके। जो खुद के लिए बसों और अन्य पब्लिक ट्रांसपोर्ट में किसी भी पुरुष सहयात्री को अपनी सीट खुद देने को तैयार हो।

हमें उठ खड़ा होना चाहिए उन महिलाओं के लिए जो यौन शोषण करने वालों के गाल पर भरी महफ़िल में तमाचा जड़ सके। जो छेड़खानी करने वालों का सरेआम पिटाई करके बुरा हाल करने का जिगरा रखती हो। जो महज बच्चा पैदा करने की मशीन बनकर न रहे। जो खुलेआम कह सकती हो मेरे लिए शादी जरूरी नहीं। जिंदगी जीने के लिए मुझे किसी मर्द के कंधे की जरूरत नहीं।

जो अपनी गर्भ में पल रहे कन्या भ्रूण हत्या का इरादे रखने वाले हर एक शख्स से जंग जीतकर सिंगल मदर होकर भी अपनी बच्ची को पाल सके। जो उसके जिस्म पर पड़ने वाली हर वहशी निगाह को फोड़ने से गुरेज न करे। सड़कों पर बेख़ौफ़ चले सके। खुलेआम कह सके -हाँ मैं एक लड़की हूँ, हाँ मैं एक महिला हूँ, मुझे अपने वजूद पर कोई पछतावा नहीं।

पहले हम खुद जैसे हैं वैसे ही खुद को स्वीकार करने की कोशिश तो करें। वैसा जज्बा तो अपने अंदर पैदा करें। इतना ही करके हम दुनिया में अपने वजूद को साबित करने की आधी जंग तो इससे ही जीत जाएँगी। फिर शायद हमें महावारी के दौरान गुवाहाटी यूनिवर्सिटी जैसे खास प्रिविलेज की जरूरत न हो। सुप्रीम कोर्ट में पेड पीरियड लीव माँग को लेकर याचिकाएँ डालने की जरूरत न पड़े।

बिहार की तरह 2 दिन की पीरियड्स लीव न लेनी पड़े, केरल, कोचीन में छात्राओं को हर महीने पीरियड लीव की जरूरत महसूस ही न हो। देश की 12 प्राइवेट कंपनियों से औरतों को पीरियड लीव का अहसान न लेने पड़े। हो सकता है हर कोई मुझसे इस मुद्दे पर इत्तेफाक न रखता हो, लेकिन एक औरत होने के नाते मेरा मानना है कि महिलाओं की मानसिक, शारीरिक सेहत की बेहतरी के लिए महावारी की छुट्टी नहीं बल्कि उन्हें एक सामान्य इंसान के तौर पर लेने की जरूरत अधिक है।

जिन अफगान शरणार्थियों को मुल्क से निकाल रही Pak सरकार, उनके साथ लूटपाट में जुटे पाकिस्तानी: ‘उम्माह’ के पैरोकारों ने 13 बच्चों वाले हबीबुल्ला के बारे में भी नहीं सोचा

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ होता अत्याचार तो हमेशा से मीडिया में सामने आता रहा लेकिन अब वहाँ अफगानिस्तान शरणार्थियों की हालत भी बहुत खराब है। पाकिस्तानी सरकार ने एक तरफ उनसे यह कह दिया है कि जिन शरणार्थियों के पास दस्तावेज नहीं है वो मुल्क से निकलें। तो वहीं, दूसरी ओर वो पाकिस्तानी हैं जो मुल्क छोड़कर जाने वाले शरणार्थियों को तरह-तरह से लूटने में लगे हैं।

पाकिस्तानी मीडिया साइट डॉन ने इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बताया गया है कि सरकार ने 1.7 मिलियन गैर दस्तावेज वाले शरणार्थियों से पाकिस्तान छोड़ने को कहा है और साथ में ये भी कहा है कि वो अपने साथ केवल 50 हजार रुपए ही लेकर जा सकते हैं।

सरकार की ऐसी शर्त के कारण एक तो अफगान शरणार्थी पहले ही सोच में हैं कि उनका गुजारा इतने कम पैसों में कहीं अंजान जगह कैसे होगा और कब तक होग। दूसरा वो ये देखकर भी हैरान हैं कि जिन पाकिस्तानियों के साथ वो इतने समय तक रहे वही लोग उनकी लाचारी का कितना फायदा उठाने में लगे हैं।

शरणार्थियों की मजबूरियों का फायदा उठाने में जुटे पाकिस्तानी

मोहम्मद आसिफ नाम का शख्स जो पाकिस्तान की मच्छर कॉलोनी में रहा उसे अपनी दुकान मात्र 0.3 मिलियन (88,590 पाकिस्तानी रुपए के अनुसार) में बेचनी पड़ी। जब उससे पूछा गया कि वो अच्छे सौदे के लिए क्यों नहीं रुका इसपर उसने जवाब दिया कि उसे डर है कि पाकिस्तान की पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी।

आसिफ ने यह भी जानकारी दी कि अल-आसिफ स्कॉयर, जहाँ अफगान के शरणार्थी ज्यादा रहते थे, उनका कारोबार और दुकानें ज्यादा थीं वहाँ भी अब सब बंद है और स्थानीय लोग (पाकिस्तानी) व उनके विश्वासपात्र फ्रंटमैन आकर उनसे बर्बरता से पैसा वसूलते हैं। आसिफ ने अपनी तरह एक अपने चाचा की भी कहानी सुनाई जिन्होंने 5.2 मिलियन में खरीदे घर 1.4 मिलियन में बेचना पड़ा।

ऐसे ही एक हबीब उल्ला का दर्द भी रिपोर्ट में बताया गया है जिसकी उम्र 40 साल है और वो पेशावर में सब्जी की दुकान करता था। कई सालों से वो उसकी बीवी और उसके 13 बच्चे यहीं इसी दुकान के भरोसे पले। लेकिन अब हालातों की वजह से हबीब उल्लाह को भी अपनी दुकान कम दाम में बेचनी पड़ी। कुछ लोगों ने उनसे कर्जा लिया था वो पैसा भी उन्हें वापस नहीं मिल रहा जिसकी वजह से उन्हें 3 लाख रुपए (पाकिस्तानी रुपए) से ज्यादा नुकसान हो गया। उनकी बस यही तमन्ना है कि अगर सरकार उन्हें यहाँ से निकाल ही रही है तो कम से कम उन्हें उनकी मेहनत का पैसा ले जाने दिया जाए।

सरकार ने कहा था कि गैर दस्तावेज वाले अफगानी चूँकि कोई व्यापार या बैक के माध्यम से वित्तीय लेन-देन नहीं कर सकते इसलिए वो एक विश्वासपात्र पाकिस्तानी को चुनें और उसके नाम से अपना काम और वित्तीय लेन-देन करें… अब अफगान के शरणार्थी ये भी शिकायत कर रहे हैं कि यही फ्रंटमैन उनकी मजबूरियों का फायदा उठाने से पीछे नहीं हट रहे और उनकी बचत को लूटने में लगे हैं। इसके अलावा ऐसी वीडियोज भी आ रही हैं जिनमें दिखाया जा रहा है कि कैसे पाकिस्तानी फौज शरणार्थियों को डराने-मारने में लगी है।

मुल्क की सरकार ने पिछले 40 साल से पाकिस्तान में रह रहे अफगानी शरणार्थी को लेकर ऐसा निर्णय क्यों लिया ये बात खुद पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों की समझ से भी बाहर है। लेकिन चलिए हम अंदाजा लगा भी लें कि शायद कर्ज के तले दबा पाकिस्तान अपने ऊपर से कुछ बोझ हल्का करने और राशन बचाने के लिए ऐसी हरकत कर रहा हो। मगर, सवाल है कि ये सामान्य पाकिस्तानियों को क्या हुआ है…। ये क्यों उन अफगानिस्तानी मुस्लिमों को लूटने में जुटे हैं जिन्हें सोशल मीडिया पर आते ही वो उम्माह का हिस्सा बताते रहे। और, जब बात हकीकत में साथ देने की आई तो एकदम रंग बदल लिया।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने किया पाकिस्तान का विरोध

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान की ऐसी हरकत का विरोध भी जताया है। दक्षिण एशिया में अभियान के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल के उप क्षेत्रीय निदेशक लिविया सैकार्डी ने तो कहा है कि पाकिस्तान इस समय अफगान शरणार्थियों को राजनीति के मोहरों जैसे इस्तेमाल कर रहा है और उन्हें उस अफगानिस्तान में दोबारा भेज रहा है जिसमें आज तालिबानी राज है।

संस्था ने तो ये भी दावा किया है कि ये पाकिस्तानी इस समय सिर्फ उन्हें निशाना नहीं बना रहे जिनके पास ‘प्रूफ ऑफ रजिस्ट्रेशन’ नहीं है, बल्कि ये उन्हें उन वैध शरणार्थियों को भी परेशान कर रहे हैं जिनपर POR है। संस्था ने एक 17 साल के लड़के के गायब होने की घटना का जिक्र किया है जो जन्मा पाकिस्तान में था और उसके पास सभी जरूरी दस्तावेज भी थे लेकिन उसे फिर भी कराची से उठाकर डिटेंशन सेंटर में रख दिया गया और घरवालों को उस लड़के से मिलने तक नहीं दिया गया।

एमनेस्टी ने चेता दिया है कि अगर अभी पाकिस्तानी सरकार ने ये निर्वासन को नहीं रोका तो हजारों अफगानियों खासकर महिलाओं-लड़कियों की सुरक्षा शिक्षा, जीवन सब दाव पर लग जाएगा। लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि पाकिस्तानी सरकार के कान में जूँ भी रेंगी है।

31 अक्टूबर को उन्होंने अंतिम तारीख दी थी और उसके बाद से उन्होंने शरणार्थियों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया है। ये शरणार्थियों अगर कुछ बोल पा रहे हैं तो सिर्फ इतना- “जब हमने इतने सालों में किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया तो अब हम कैसे पहुँचाएँगे?”… सोच रहे हैं तो ये कि बिन पर्याप्त पैसों के उनका कहीं और गुजारा कैसे होगा।

गाजा के लिए रोया था रोना, अब उम्माह का ख्याल नहीं

अजीबोगरीब बात ये है कि यही पाकिस्तान पिछले दिनों गाजा के लिए रोना रो रहा था, मानवाधिकार की बात कर रहा था लेकिन अब अपने कारनामों पर चुप है। है न हैरानी की बात कि ये हल्ला सिर्फ तभी होता है जब एक तरफ मुस्लिम और दूसरी तरफ कोई और समुदाय हो? क्या जो अफगानी शरणार्थियों से हो रहा है उस पर उम्माह को एक एकजुट होकर नहीं बोलना चाहिए। आज पाकिस्तान उन्हें उसी जमीं पर भेज रहा है जहाँ से वो सालों पहले भागकर आए थे। तालिबान के प्रवक्ता तक को पाकिस्तान की इस हरकत से नाराजगी है लेकिन उन्हें खुद को इस हरकत पर कोई शर्म नहीं।

वैसे ये पहली दफा नहीं है कि इस्लामी देश पाकिस्तान ने मुसलमानों पर अत्याचार देखकर करके आँख मूँदी हो। चीन के कर्जे तले दबा ये मुल्क उइगर मुस्लिमों पर हमेशा से चुप रहा है। उनकी मदद करना तो दूर ये मुल्क सहारा माँगने वाले उइगरों को दोबारा चीन को सौंप देता था। इसके अलावा अपने देश के अल्पसंख्यकों पर हमेशा से इसने क्रूरता की है। खबरों से पता चलता है कि कैसे वहाँ हिंदू, सिख, ईसाई समुदाय के लोगों पर धर्मांतरण की तलवार लटकाई जाती है और लोग अपने बच्चियों को लेकर भारत भागते हैं कि उन्हें पाकिस्तान के कट्टरपंथियों से बचाया जा सके।

‘जुए में पत्नी को हार गया पति, धनतेरस पर महाभारत’: जिस घटना का जिक्र कर हिन्दू त्योहार को किया जा रहा बदनाम, उसे अंजाम देने वाला निकला सुहैल अहमद

किस तरह हिन्दू पर्व-त्योहारों को बदनाम करने के लिए साजिश रची जाती है, उसकी एक ताज़ा बानगी सामने आई है। मीडिया ने खबर चलाई कि उत्तर प्रदेश के अमरोहा में धनतेरस के मौके पर एक व्यक्ति ने जुए में न सिर्फ अपनी को दाँव पर लगा दिया, बल्कि हार भी गया। इसके बाद आनन-फानन में उसका भाई मौके से वहाँ पहुँचा और रुपए देकर अपनी बहन को छुड़ाया। फिर इसके बाद हिन्दुओं को तंज कसा जाने लगा और धनतेरस त्योहार पर गंदी टिप्पणियाँ की जाने लगीं।

सबसे पहले तो मीडिया ने ही इसे भ्रामक तरीके से चलाया। जैसा कि होता आया है, मीडिया ने इस मामले में आरोपितों का नाम छिपा। ‘Zee News’ ने ‘अमरोहा में एक और महाभारत’ शीर्षक के साथ इसे प्रकाशित कर के एक हिन्दू धर्मग्रंथ को भी बदनाम किया। वहीं ‘न्यूज़ 24’ ने साड़ी और गहने पहनी हुई महिला की प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई। जबकि सच्चाई ये है कि ये मामला किसी हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लिम परिवार का है, आरोपित सभी मुस्लिम हैं।

इस्लामी कट्टरपंथी अली सोहराब ने इस खबर को शेयर करते हुए ‘संस्कृति’ लिख कर हिन्दुओं पर तंज कसा। वहीं दीपा सम्राट नामक हैंडल ने ‘संस्कारी समाज’ लिख कर हिन्दुओं पर निशाना साधा। मुस्ताक अहमद ने इसी बहाने अपने मजहब का गुणगान करते हुए लिखा कि इस्लाम में जुआ-शराब हराम है। उसने एक तरह से हिन्दुओं को जुआरी-शराबी बता दिया। वहीं साजिद अली ने हिंदुओं को गाली देते हुए पूरे सनातन धर्म को निशाना बनाया।

आइए, अब आपको सच्चाई बताते हैं। असल में जुए में अपनी बीवी को हारने वाला कोई धनतेरस मनाने वाला हिन्दू नहीं बल्कि सुहैल अहमद है। डिडौली थाना क्षेत्र के जलालाबाद की रहने वाली महिला ने अपने शौहर और उसके परिवार पर अन्य गंभीर आरोप भी लगाए हैं। पीड़िता ने पुलिस को बताया है कि उसके शौहर ने उसे ही गिरवी रख दिया। 3 वर्ष पूर्व दोनों का निकाह हुआ था। महिला ने बताया है कि निकाह के बाद से ही शौहर सुहैल अहमद, सास सलमा, ससुर रईस अहमद, देवर फूजैल, दूसरा देवर सुहैब, ननद कहकशा, महका और दरकशा – ये सब मिल कर उसे प्रताड़ित करते थे।

पीड़िता की 2 बेटियाँ भी हैं। उसने बताया है कि उसका शौहर सुहैल अहमद जुआरी है, यानी जुए का आदी है। वो जुआ पहले भी खेलता था, धनतेरस को इसमें लाना उचित नहीं है। आए दिन 15 लाख रुपए की माँग करता था। 6 महीने पहले शौहर ने उसे धक्के मार कर घर से बाहर भी निकाल दिया था। बीवी को हारने के बाद सुहैल अहमद उसे एक अनजान शहर में छोड़ कर आ गया था और जिनसे अपनी बीवी को हारा था उसे ये कह कर लौट आया था कि पैसे चुका कर बीवी को ले जाएगा। महिला के देवर ने भी उसके साथ छेड़खानी की है।

‘मेरे पास खेती के लिए खाद-बीज खरीदने के भी पैसे नहीं’: बैंकों का चक्कर लगाकर थके किसान ने कर ली आत्महत्या, सुसाइड नोट में केरल सरकार को ठहराया जिम्मेदार

केरल में एक किसान ने शुक्रवार (10 नवंबर 2023) को मौत को गले लगा लिया। अल्लापुझा में वामपंथी सरकार की सिस्टम का शिकार होकर लगभग 55 साल के किसान केजी प्रसाद ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। दरअसल, खेती करने के लिए पैसे नहीं होने और बैंकों द्वारा लोन देने से मना करने के बाद प्रसाद परेशान हो गए थे।

पैसे नहीं होने के कारण केजी प्रसाद पिछले चार साल से धान की खेती नहीं कर पाए थे। उनके पास आखिरी उम्मीद बैंक थे। उन्होंने बैंकों से लोन लेने की कोशिश की, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा किसानों के लिए कई योजनाएँ चलाने के बाद भी बैंकों ने उनकी उम्मीद तोड़ दी। मरने से पहले प्रसाद ने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है।

गौरतलब है कि अलाप्पुझा के कुट्टनाड क्षेत्र में किसानों के आत्महत्या करने का ये पहला मामला नहीं है। ऐसे कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। वहीं, केरल की पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार गरीबों-किसानों की मददगार होने का दावा करती है। हालाँकि, इस तरह की घटनाओं को देखकर सच्चाई इससे अलग नजर आती है।

मौत को गले लगाने से पहले प्रसाद ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, “कोई भी बैंक मुझे खेती के लिए लोन नहीं दे रहा है। अब मेरे पास जीने का कोई साधन नहीं है।” उन्होंने राज्य सरकार और कुछ बैंकों पर ‘उन्हें गंभीर वित्तीय संकट में धकेलने का आरोप लगाया है। उन्होंने लिखा है कि इस वजह से उन्हें अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

सामने आए एक फोन रिकॉर्डिंग में अवसाद में शराब का सहारा लेते नजर आते हैं। मौत को गले लगाने से पहले प्रसाद ने अपने दोस्त से कहा था, “मैं अपने जीवन में असफल हो गया हूँ। मैंने 20 साल पहले शराब पीना छोड़ दिया था, लेकिन अब मुझे अपनी दयनीय हालात की वजह से यह आदत शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।”

अपने सुसाइड नोट उन्होंने लिखा है कि साल 2011 में उन्होंने एक बड़े बैंक से कर्ज लिया था। अपनी खराब आर्थिक हालात के चलते वो बैंक का पूरा पैसा नहीं लौटा पाए। हालाँकि, इस दौरान बैंक को उन्होंने 20,000 रुपए लौटाए थे। इसके बाद उन्होंने 2020 में बैंक की जारी की गई ‘एकमुश्त भुगतान योजना’ के तहत लोन खत्म कर दिया था।

प्रसाद ने आरोप लगाया कि वो थाकाज़ी में चार एकड़ भूमि में धान की खेती जारी रखने के लिए वे दर-दर भटक रहे थे, लेकिन ‘कम सिबिल स्कोर’ की वजह से कोई भी बैंक उन्हें लोन देने के लिए तैयार नहीं था। दरअसल, CIBIL स्कोर एक उधारकर्ता के क्रेडिट इतिहास होता। इसके स्कोर को आधार बनाकर कर्जदाता ऋण देते हैं।

मृतक किसान ने सुसाइड नोट में आगे लिखा है कि राज्य सरकार बैंक से लिए गए ‘पीआरएस लोन’ और उसके ब्याज का भुगतान करने में नाकाम रही। यही वजह है कि उनका सिबिल स्कोर और भी कम हो गया। सरकार द्वारा धान खरीद के बाद दी गई पैडी रिसिप्ट शीट (पीआरएस) के आधार पर किसानों को पीआरएस लोन दिया जाता है। इस सीज़न में खरीदे गए धान के लिए बैंक ने 5 लाख रुपए दिए थे।

इस पीआरएस लोन को धान बेचने वाले किसान के नाम से सरकार बैंकों को लौटा देती है, लेकिन 2022-23 के धान खरीद सीजन के लिए सरकार ने बैंकों को पीआरएस राशि का भुगतान नहीं किया। पीआरएस लोन और ब्याज को तुरंत चुकाना राज्य सरकार का कर्तव्य है, क्योंकि इसके बदले सरकार ने किसान से धान ले लिया होता है।

केरल की वामपंथी सरकार को न तो किसानों की आत्महत्या से मतलब है और न ही जनता की परेशानियों से वो तो बस केरल मॉडल की बात कर उछलते रहते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रसाद भाजपा कार्यकर्ता थे और उन्होंने भारतीय किसान संघ के जिला अध्यक्ष के तौर पर भी काम किया था।

महिलाओं के साथ हमास आतंकियों की हैवानियत देख मुस्कान सिद्दीकी ने छोड़ा इस्लाम, की घर-वापसी: हिन्दू लड़के से शादी कर बनीं ‘मुस्कान मौर्या’

उत्तर प्रदेश के सीतापुर में मुस्कान सिद्दीकी नामक महिला ने न सिर्फ हिन्दू धर्म में घर-वापसी की, बल्कि हिन्दू लड़के से शादी भी रचाई। मुस्कान सिद्दीकी इसके साथ ही अब ‘मुस्कान मौर्या’ बन गई हैं। उन्होंने बताया है कि हमास आतंकियों द्वारा इजरायल की महिलाओं के साथ की गई क्रूरता को देखने के बाद उन्होंने घर-वापसी करने का निर्णय लिया है। उन्होंने शिशुपाल मौर्या के साथ शादी रचाई। ‘राष्ट्रीय हिन्दू शेर सेना’ के अध्यक्ष विकास हिन्दू ने इस विवाह की प्रक्रिया को अपनी निगरानी में संपन्न कराया।

23 वर्षीय मुस्कान सिद्दीकी के अब्बा का नाम इल्फात है। वो शाहजहाँपुर स्थित कटरा की रहने वाली हैं। वहीं शिशुपाल मौर्या के पिता का नाम विष्णुदयाल है और उनका परिवार सीतापुर के महोली थाना क्षेत्र अंतर्गत महोली चढ़िया गाँव में रहता है। उत्तराखंड के हरिद्वार में एक फैक्ट्री में काम करने के दौरान दोनों एक-दूसरे के करीब आए थे। लड़की ने एफिडेविट दायर कर स्वतः शादी की बात कही है और कहा है कि उसे किसी ने भी बहलाया-फुसलाया नहीं है।

मुस्कान ने कहा है कि हमास आतंकियों द्वारा गाजा पट्टी में इजरायली महिलाओं के साथ जो हैवानियत की गई, उससे त्रस्त होकर उन्होंने हिन्दू धर्म में घर-वापसी का निर्णय लिया। शुक्रवार (10 नवंबर, 2023) को दोनों ने वैवाहिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किया। मुस्कान ने शिशुपाल को अपना पति स्वीकार करते हुए शेष जीवन उसके साथ रहने का संकल्प लिया। साथ ही शिशुपाल ने उसके भरण-पोषण का संकल्प लिया। दोनों ने कहा कि उनके बच्चे शिशुपाल की संपत्ति के अधिकारी बनेंगे।

मुस्कान सिद्दीकी बनीं मुस्कान मौर्या

रामकोट थाना क्षेत्र स्थित काली मंदिर में इन दोनों के विवाह की प्रक्रिया आर्य समाज द्वारा संपन्न कराई गई। इसका एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें महिला कहती हुई दिख रही हैं कि हमास द्वारा इजरायली महिलाओं के साथ की गई क्रूरता के कारण वो हिन्दू बन रहीं। उन्होंने कहा कि इस्लाम मजहब में काफी अश्लीलता होती है, इसीलिए उन्होंने इसे छोड़ने का निर्णय लिया। ‘राष्ट्रीय हिन्दू शेर सेना’ अब तक ऐसी कई मुस्लिम लड़कियों की मदद कर चुका है।

मुगलों को हराने वाले असम के लाचित बोरफुकान पर आधारित फिल्म को मिला पुरस्कार: इंडो-फ्रेंच फिल्म फेस्टिवल में ‘लाचित द वॉरियर’ बेस्ट एनिमेटेड लघु फिल्म

असम के महाराजा चक्रध्वज सिंह के सेनापति लाचित बोरफुकन पर आधारित एनीमेटेड फिल्म ‘लाचित द वॉरियर’ को सर्वश्रेष्ठ एनिमेटेड लघु फिल्म का पुरस्कार दिया गया है। यह पुरस्कार पांडिचेरी में इंडो-फ्रेंच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में मिला। इसमें मुगल सेना को हराने वाले अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित के जीवन चरित को दिखाया गया है।

बता दें कि इंडो-फ्रेंच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल दुनिया भर के फिल्म निर्माताओं के लिए भारत सरकार और फ्रांस सरकार का एक संयुक्त फिल्म महोत्सव है। इस इस फिल्म फेस्टिवल का आयोजन भारत के पांडिचेरी में आयोजित किया जा रहा है। इस फिल्म फेस्टिवल में दुनिया भर से फिल्में शामिल होती हैं।

इस लघु फिल्म को पार्थसारथी महंत ने लिखा और निर्देशित किया है, जबकि मीना महंत और इंद्राणी बरुआ ने इसे प्रोड्यूस किया है। इस फिल्म को नैरेट किया है डॉक्टर अमरज्योति चौधरी ने, जबकि संगीत दिया है रूपम तालुकदार ने। क्रिएटिव डायरेक्टर के रूप में अनुपम महंत, स्टोरीबोर्डिंग और चित्रण का प्रबंधन हृषिकेश बोरा और वीएफएक्स रतुल दत्ता की देखरेख में हुआ है।

‘लाचित द वॉरियर’ को दिल्ली, कोलकाता, जयपुर और मुंबई नॉर्थ-ईस्ट फिल्म फेस्टिवल सहित आठ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाया और सम्मानित किया गया है। इस फिल्म को गोवा में आगामी भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भारतीय पैनोरमा के लिए भी चुना गया है।

कौन है लाचित बोरफुकन

24 नवंबर 1622 को पैदा हुए लाचित बरपुखान को उनके युद्ध लड़ने की अद्भुत क्षमता के लिए ‘पूर्वोत्तर का शिवाजी’ भी कहा जाता है। उन्होंने 1671 में हुए सराईघाट के युद्ध (Battle of Saraighat) में मुगलों की विशाल सेना को अपनी रणनीति और जलीय युद्ध लड़ने की क्षमता की वजह से घुटनों पर ला दिया।

मुगल जब पराजित हुए थे तब लाचित पूरी तरह से स्वस्थ भी नहीं थे, पर राष्ट्रभक्ति का जज्बा ऐसा था कि बीमार होते हुए भी मातृभूमि की रक्षा के प्रण से नहीं डिगे। मुस्लिम आक्रांताओं से लड़े और अपनी सेना को विजय दिलाई। 50,000 से भी अधिक संख्या में आई मुगल फौज को घेरने के लिए बरपुखान ने जलयुद्ध की रणनीति अपनाई।

ब्रह्मपुत्र नदी और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र को अपनी मजबूती बना कर मुगलों को नाकों चने चबवा दिए। उन्हें पता था कि जमीन पर मुगलिया फौज चाहे कितनी भी मजबूत हो, लेकिन पानी में वे घुटने टेकने को मजबूर होंगे। इस युद्ध में जीत के एक साल बाद वीर योद्धा बरपुखान का निधन हो गया।

लाचित बरपुखान का पराक्रम ऐसा था कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (National Defence Academy) के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को उन्हीं के नाम पर स्वर्ण पदक (The Lachit Borphukan Gold Medal) प्रदान किया जाता है। असम सरकार ने भी 2000 में लाचित बरपुखान अवॉर्ड की शुरुआत की थी।