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कश्मीर में एक्शन में भारतीय सेना, लश्कर कमांडर उजैर खान समेत 2 आतंकी ढेर: 7 दिन चले एनकाउंटर के बाद भी जारी रहेगा सर्च ऑपरेशन

भारतीय सेना ने जवानों के बलिदान का बदला ले लिया है। दरअसल, सुरक्षा बलों ने लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर उजैर खान को मार गिराया है। उस पर 10 लाख रुपए का इनाम था। इसके अलावा सेना को एक अन्य आतंकी की भी लाश मिली है। उजैर खान के खात्मे के साथ ही अनंतनाग में बीते एक सप्ताह से चली आ रही मुठभेड़ भी खत्म हो गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कश्मीर के एडीजीपी विजय कुमार ने इस ऑपरेशन के बारे में बताया, “अभी सर्च ऑपरेशन जारी रहेगा। कई सारे इलाके बाकी हैं। लोगों से अपील है कि वे उन इलाकों में न जाएँ। वहाँ कई सारे ग्रेनेड होने की आशंका है। हमें 2 से 3 आतंकियों के छिपे होने की जानकारी थी। लश्कर-ए-तैयबा कमांडर उजैर खान मारा गया है। उसके पास से हथियार भी बरामद हुआ है। एक अन्य बॉडी मिली है। तीसरे आतंकी की लाश मिलने की भी संभावना है।”

उन्होंने आगे कहा है, “अभी भी पूरे इलाके की तलाशी की जानी बाकी है। बहुत सारे ग्रेनेड पड़े हो सकते हैं। उन्हें इकट्ठा कर नष्ट किया जाएगा। फ़िलहाल, लश्कर कमांडर उजैर खान के मारे जाने के साथ ही 7 दिन से चली आ रही, मुठभेड़ समाप्त हो गई है।”

बता दें कि सुरक्षाबलों ने आतंकियों के खात्मे के लिए 12 सितंबर को इस ऑपरेशन की शुरुआत की थी। इस ऑपरेशन के दूसरे दिन यानी 13 सितंबर को सेना के कर्नल मनप्रीत सिंह, मेजर आशीष धोंचक और जम्मू-कश्मीर पुलिस के डीएसपी हुमायूँ भट बलिदान हो गए थे।

इसके बाद सुरक्षा बलों के खौफ से आतंकी वहाँ से भाग कर गैरोल गाँव में छिप गए थे। इन आतंकियों में लश्कर कमांडर उजैर खान भी था। गौरतलब है कि सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच यह मुठभेड़ जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित पीर पंजाल की पहाड़ियों में कोकरनाग के गैरोल में चल रही थी। इसलिए इसे ‘ऑपरेशन गैरोल’ भी कहा जा रहा था।

खालिस्तानी गायक के कार्यक्रम से Boat ने खींचे हाथ, मुंबई में हटाए पोस्टर: बोले लोग- छत्रपति शिवाजी महाराज की धरती पर नहीं देंगे एंट्री

भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के कार्यकर्ताओं ने शनिवार (16 सितंबर, 2023) को मुंबई में कनाडा निवासी गायक और खालिस्तान समर्थक शुभनीत सिंह शुभ के पोस्टरों को हटा दिया है। ये पोस्टर शुभनीत सिंह के आने वाले कार्यक्रम के थे। भाजपा ने इस कार्यक्रम का विरोध करते हुए इसे रद्द करने की माँग उठाई है।

कार्यक्रम के बाकी प्रतिभागियों से BJYM ने साफ़ कहा है कि भारत में किसी भी खालिस्तान समर्थक के लिए कोई जगह नहीं है। वहीं इस शो की प्रायोजक इलेक्ट्रॉनिक कम्पनी बोट (BOAT) ने इस कार्यक्रम से खुद को अलग करने का निर्णय लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुंबई में BJYM कार्यकर्ताओं का नेतृत्व कर रहे तजिंदर सिंह तिवाना ने महाराष्ट्र को छत्रपति शिवाजी महराज की पवित्र भूमि बताया।

राज्य में खालिस्तानियों के लिए कोई जगह न होने की घोषणा करते हुए तिवाना ने कहा, “यदि कार्यक्रम को रद्द नहीं किया गया तो इसके आयोजकों को विरोध का सामना करना पड़ेगा। तजिंदर सिंह ने कनाडियन गायक शुभ को भारत की एकता और अखंडता का दुश्मन करार दिया। साथ ही उन्होंने इस कार्यक्रम का इंतजार कर रहे युवाओं से बहिष्कार में शामिल होने की अपील करते हुए कहा है कि वो अपनी ऊर्जा को देश के विकास में लगाएँ।”

BJYM नेता इस कायर्क्रम के विरोध में पुलिस को एक ज्ञापन भी सौंपा। इस ज्ञापन को उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर शेयर भी किया है। ज्ञापन में उन्होंने कनाडियन गायक शुभ पर भारत के आधे-अधूरे नक्शे को सोशल मीडिया पर शेयर करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ FIR दर्ज करने की भी माँग की है। तिवाना ने आरोप लगाया है कि सिंगर शुभ ने 23 मार्च 2023 को अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों को भारत से अलग दिखाया था।

बता दें कि शुभ का यह सोशल मीडिया पोस्ट तब का है जब पंजाब पुलिस ने खालिस्तानी आतंकी अमृतपाल सिंह को पकड़ने के लिए एक अभियान छेड़ रखा था। सिंगर शुभ के जिस कार्यक्रम का विरोध हो रहा है वो 23-25 सितंबर 2023 को मुंबई के कॉर्डेलिया क्रूज पर होना है। पुलिस को सौपें ज्ञापन में तिवाना ने इस कार्यक्रम को रद्द करने की माँग रखी है।

BOAT ने कार्यक्रम से खुद को किया अलग

खालिस्तान समर्थक कनाडियन गायक शुभनीत सिंह शुभ के भारत विरोधी बयानों के चलते प्रसिद्ध इलेक्ट्रॉनिक्स कम्पनी बोट (BOAT) ने अपने आप को शो से अलग कर लिया है। एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए बोट ने इसकी पुष्टि भी की है। बयान के मुताबिक अब बोट कम्पनी खालिस्तान समर्थक शुभ के कार्यक्रम को स्पॉन्सर नहीं करेगी।

इसी बयान में BOAT ने भविष्य में भारतीय कलाकारों को अपना हुनर दिखाने के लिए प्लेटफॉर्म देते रहने का आश्वासन दिया है।

नई संसद को देखने बॉलीवुड की हीरोइन भी पहुँचीं, ईशा गुप्ता बोली- जरूर लड़ूँगी चुनाव: कंगना रनौत ने महिला आरक्षण को बताया ‘अति उत्तम’

संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही मंगलवार (19 सितंबर, 2023) से संसद भवन की नई इमारत में शिफ्ट हो गई। पुराने संसद भवन को अब ‘संविधान भवन’ के नाम से जाना जाएगा। नए भवन में कार्यवाही के पहले दिन लोकसभा में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ भी पेश किया गया, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण दिए जाने का प्रावधान है। इस दौरान बॉलीवुड अभिनेत्रियाँ कंगना रनौत और ईशा गुप्ता भी संसद की कार्यवाही देखने के लिए मौजूद रहीं।

महिला आरक्षण विधेयक को उन्होंने एक अति उत्तम विचार करार दिया। उन्होंने कहा कि ये सब इसीलिए संभव हो पा रहा है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार महिलाओं के उत्थान को लेकर चिंतित है। 1 दिन पहले जब केंद्रीय कैबिनेट ने इस बिल को पास किया था, तब भी कंगना रनौत ने ट्वीट कर के कहा था कि हम सब लोग एक नए युग के साक्षी बन रहे हैं, हमारा समय आ गया है। कंगना रनौत ने कहा था कि ये बच्चियों का समय है, महिला भ्रूण हत्या का नहीं।

तमिल फिल्म ‘चंद्रमुखी 2’ की अभिनेत्री कंगना रनौत ने आगे कहा कि ये युवा महिलाओं का समय है, सुरक्षा के लिए पुरुषों पर निर्भर रहने का नहीं। रनौत ने आगे लिखा था कि ये अधेड़ उम्र की महिलाओं का समय है, क्योंकि आप अवांछित नहीं हैं और न ही आपके सम्मान में कोई कमी होगी। उन्होंने लिखा कि ये वृद्ध महिलाओं का समय है क्योंकि दुनिया को आपकी बुद्धिमत्ता और अनुभव की आवश्यकता है। कंगना रनौत ने ‘नई दुनिया’ और ‘हमारे सपनों का भारत’ में सबका स्वागत किया।

वहीं ‘जन्नत 2’ (2012) और ‘कमांडो 2’ (2017) जैसी फिल्मों के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री ईशा गुप्ता ने कहा कि ये एक बहुत अच्छी चीज है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है। उन्होंने कहा कि ये एक विकासशील विचार है। उन्होंने बताया कि कैसे महिला आरक्षण के लिए कई बार प्रयास किया गया लेकिन ये हो नहीं पाया, लेकिन अब हमारी सरकार ने साबित कर दिया। ईशा गुप्ता ने इस दौरान ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का भी जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि इस बिल के कानून बन जाने से महिलाओं को बराबरी का हक़ मिलेगा। कई बार एक महिला की तकलीफ दूसरी महिला ही समझ सकती है। बकौल ईशा गुप्ता, कुछ भी नया शुरू करने पर घर की लक्ष्मी को खुश करने की बात कही जाती है और पीएम मोदी ने यही किया है, ये बहुत बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि मोदी जी ने जो बोला वो कर के दिखाया, बाकी लोग सोचते ही रह जाते हैं, इससे भारत आगे बढ़ेगा। राजनीति में आने के सवाल पर ईशा गुप्ता ने कहा- ‘बेशक’। चुनाव लड़ने के सवाल पर कहा- ‘ज़रूर’।

घर में भी घिरे जस्टिन ट्रूडो, कनाडा के पत्रकार ने कहा- भारतीय राजनयिक को हटाना पागलपन: नेटिजन्स ने बताया- आतंकवादी प्रेमी

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर मढ़ा है। इसके बाद से भारत ही नहीं, बल्कि कनाडा में भी ट्रुडो को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया में कनाडा के लोग भारत के साथ संबंध खराब करने का जिम्मेदार अपने प्रधानमंत्री को बता रहे हैं।

कैनेडियन पत्रकार डेनियल बोर्डमैन जस्टिन ट्रुडो के बयान और भारतीय राजनयिक को देश से हटाने के उनके फैसले से हैरान हैं। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि हरदीप सिंह निज्जर की मौत में भारत का हाथ होने को लेकर एक आंतरिक रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट की जाँच चल रही है। लेकिन इस रिपोर्ट के आधार पर भारतीय राजनयिक को हटाना पागलपन जैसा है।

पत्रकार बोर्डमैन ने यह भी लिखा कि ट्रुडो और उनकी टीम का यह व्यवहार पूरी तरह से बकवास है। उन्हें नहीं लगता कि पीएम ट्रुडो के इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी प्रकार का लाभ मिलने वाला है। 

बता दें कि जस्टिन ट्रूडो के पैरोडी अकाउंट से भी पोस्ट शेयर किया गया है। इस पोस्ट में यूजर ने लिखा, “हमारी वोटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। इसलिए मुझे कनाडाई लोगों का ध्यान भटकाने के लिए एक नई समस्या पैदा करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि मेरी सरकार इस साल की शुरुआत में हुई एक सिख व्यक्ति की हत्या को लेकर भारत के साथ संबंधों के बारे में अचानक ही बड़ी-बड़ी बातें कर रही है। अगर लोग डरे हुए होंगे तो मुझे अधिक समर्थन मिल सकता है।”

पियरे नामक यूजर ने लिखा, “ट्रूडो प्रसिद्ध आतंकवादी प्रेमी है।”

‘ए किड फ्रॉम ब्रुकलिन’ नामक यूजर ने एक्स पर लिखा, “वह सिख वोटों लिए पूरी योजना बना रहे हैं। वे इस बात से चिंतित नहीं हैं कि मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और बदला लेने की बात की जा रही है।”

एक अन्य यूजर ने भारत के खिलाफ बयानबाजी को कनाडा के लिए नुकसानदेह होने का अंदेशा जताया। यूजर ने लिखा, “यह भारत-कनाडा संबंधों के लिए बहुत बड़ा खतरा होगा। भारत एक उभरती हुई शक्ति है और मुझे नहीं लगता कि सहयोगी देश इन आरोपों पर कनाडा का पक्ष लेंगे।”

कैनेडियन सोशल मीडिया यूजर ने जस्टिन ट्रूडो पर इस तरह की बयानबाजी और राजनयिक को हटाने का फैसला आंतरिक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए लेने का आरोप लगाया है। जेसन कुचिरका नामक यूजर ने लिखा, “मुझे लगता है कि यह सब ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है। मुझे हैरानी हो रही है।”

मैडी नामक यूजर ने लिखा कि ट्रुडो भारत के खिलाफ बयानबाजी कर कनाडा के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या है मामला

दरअसल, खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून, 2023 को दो अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने भारत को दोषी ठहराते हुए भारतीय राजनयिक को निष्कासित कर दिया था। भारत ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कनाडाई राजनयिक को 5 दिन के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया है। चूँकि ट्रुडो के झूठे आरोपों से दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो गए हैं। इसलिए कनाडा में ट्रुडो का विरोध हो रहा है।

जस्टिन ट्रूडो मतलब बिना घर-घाट का कुत्ता: खालिस्तानियों को साध रहे, मुस्लिमों से खा रहे गाली, महँगाई पर घर में लगी है आग, विदेशियों को दे रहे ज्ञान

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने जून में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर मढ़कर यह दर्शा दिया है कि वह स्थानीय स्तर पर अपनी विफलताओं को अब अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से ढँकने का प्रयास कर रहे हैं।

ट्रूडो ने कनाडा में अपने विरोध को कम करने का प्रयास इस बात से किया है कि उनके देश में आ रही समस्याएँ अन्य देशों के कारण हैं ना कि उनकी स्वयं की विफलताओं के कारण। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ट्रूडो वर्तमान में कनाडा में भारी विरोध का सामना कर रहे हैं।

बता दें कि कनाडा वर्तमान में महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत तमाम समस्याओं से जूझ रहा है जिसे सुलझाने में वह विफल हैं। हालाँकि, अपनी खत्म होती लोकप्रियता बचाने के लिए उन्होंने भारत से रिश्ते खराब करने का रास्ता चुना है ताकि उन्हें कनाडा के सिख वोट मिल सकें और साथ ही यह संदेश जाए कि वह कनाडा में अन्य किसी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे। इससे वह कनाडा की जनता के राष्ट्रवादी तबके का विश्वास जीतना चाहते हैं।

कनाडा के 63% नागरिकों को नहीं पसंद हैं ट्रूडो

हालाँकि, इन सब प्रयासों के बावजूद भी उनकी कनाडा में लोकप्रियता खत्म हो रही है। वह वर्ष 2015 से ही कनाडा के प्रधानमंत्री हैं और तबसे उनकी लोकप्रियता में तेज गिरावट आई है। दरअसल, जुलाई 2023 में किए गए एक सर्वे में यह सामने आया है 33% कनाडाई मानते हैं कि ट्रूडो बीते 55 वर्षों में कनाडा के सबसे बेकार प्रधानमंत्री हैं।

वहीं अप्रूवल रेटिंग्स के आधार पर यह भी स्पष्ट हुआ है कि वह अब कनाडाई नागरिकों को पसंद नहीं आ रहे हैं। ट्रूडो रैंकर के अनुसार, सितम्बर 2023 में उनकी डिसअप्रूवल रेटिंग 63% हो गई है। इसका अर्थ है कि वह 100 में से 63 कनाडाई नागरिकों को पसंद नहीं आ रहे।

महँगाई पर काबू पाने में विफल

उनकी लोकप्रियता घटने के कई कारण हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण महँगाई है। जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल के दौरान कनाडा में महँगाई लगातार बढ़ी है। कनाडा के सांख्यिकी विभाग के अनुसार, जुलाई 2018 में कनाडा में महँगाई दर (ऊर्जा कीमतों को छोड़ कर) 2.1% थी जो कि जुलाई 2022 में बढ़ कर 6.3% पहुँच गई।

कनाडा जैसे विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए यह महँगाई का काफी उच्च स्तर है। विकासशील देशों में जीडीपी को बढ़ाने के लिए सरकारें एक स्तर तक महँगाई को नियंत्रित नहीं करती लेकिन कनाडा विकसित है और यहाँ भाव अधिकांश समय स्थिर रहते हैं। ऐसे में यहाँ महँगाई का बढ़ना ट्रूडो की साख में बट्टा लगा रहा है।

कनाडा के सांख्यिकी विभाग की ही रिपोर्ट बताती है कि कनाडा की आबादी के 25% लोगों का कहना है कि वह मात्र $500 (41,635.50 रुपये) का भी कोई अधिक खर्चा नहीं झेल सकते। इसी सर्वे में यह भी बात सामने आई कि कनाडा की युवा जनसंख्या का आधा हिस्सा अपने महीने के खर्चे पूरे करने में समस्याओं का सामना कर रहा है।

ट्रूडो से मुस्लिम भी हैं गुस्सा

महँगाई के अतिरिक्त, ट्रूडो की वोक विचारधारा भी उनके लिए समस्याएँ खड़ी कर रही हैं। ट्रूडो लगातार अमेरिका की तरह ही कनाडा के स्कूलों में भी LGBT+ को प्रमोट कर रहे हैं। इसको लेकर स्कूलों में लाई गई उनकी नीतियाँ कनाडाई मुस्लिमों में उनकी छवि बिगाड़ रही हैं।

कनाडा में प्रदर्शन करते मुस्लिम अभिभावक (चित्र साभार: द गार्जियन)
कनाडा में प्रदर्शन करते मुस्लिम अभिभावक (चित्र साभार: द गार्जियन)

कनाडा के मुस्लिम अपनी मजहबी विचारधारा को ना बचाने के लिए ट्रूडो को मूर्ख करार दे रहे। मुस्लिम अभिभावक आरोप लगा रहे हैं कि ट्रूडो कनाडा के स्कूलों में बच्चों के ऊपर जबरन गे, लेस्बियन संबंधी पाठ्यक्रम थोप रहे हैं।

मुस्लिम अभिभावक इस बात की शिकायत ट्रूडो से कर चुके हैं लेकिन ट्रूडो ने इसे अमेरिकी दक्षिणपंथियों की साजिश बता दिया था। इस कारण से कनाडाई मुस्लिमों में ट्रूडो के प्रति और भी गुस्सा भरा हुआ है, वह स्कूलों के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं।

कनाडा में घरों की कमी को पूरा नहीं कर पाए हैं ट्रूडो

कनाडा में वह इस बात के लिए भी कड़ा विरोध झेल रहे हैं कि उन्होंने कनाडा में आवासीय समस्या को नहीं सुलझाया है। कनाडा में लम्बे समय से ही घरों की समस्या है। बाहर से आने वाले छात्र और अन्य परिवार भी कनाडा में घर नहीं ढूँढ पा रहे हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा को वर्ष 2030 तक 58 लाख नए घरों की आवश्यकता होगी लेकिन इस दिशा में कुछ ख़ास काम नहीं हो सका है। अनुमान के मुताबिक कनाडा में 2030 तक मात्र 23 लाख घर ही बन पाएँगे, अर्थात इस क्षेत्र में 35 लाख घरों की कमी होगी। अपनी इस विफलता को जस्टिन ट्रूडो ने स्वयं भी एक बातचीत के दौरान स्वीकार किया था।

गौरतलब है कि स्थानीय स्तर पर अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए अब ट्रूडो ने यह रास्ता अख्तियार किया है कि वह भारत की बुराई करके और खालिस्तानियों को संरक्षण देकर अपनी लोकप्रियता बढ़ा सकें। हालाँकि, इससे ट्रूडो को कितना फायदा मिलेगा यह स्पष्ट नहीं है लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह एक नौसिखिए के रूप में देखे जा रहे हैं।

महिलाओं को 33% आरक्षण वाला बिल लोकसभा में पेश, एक तिहाई सीटें SC/ST के लिए होंगी रिजर्व: जानिए 27 साल तक कैसे लटका रहा

पीएम मोदी की सरकार ने मंगलवार (19 सितंबर, 2023) को गणेश चतुर्थी पर नए संसद भवन में राजनीति में महिलाओं के लिए एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। महिला आरक्षण बिल के मसौदे को पीएम ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से पेश किया। इससे देश की संसद सहित राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण दिए जाने की तस्वीर और साफ हो गई। लोकसभा में सरकार ने महिला आरक्षण बिल पेश किया।

मौजूदा लोकसभा सीटों के नए सिरे से परिसीमन के बाद महिला आरक्षण लागू होगा। महिला आरक्षण विधेयक, 2023 के मसौदे के मुताबिक, ये विधेयक मौजूदा सीटों के परिसीमन के बाद प्रभावी होगा। इसकी एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार (18 सितंबर, 2023) को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में मोदी कैबिनेट ने महिला आरक्षण बिल (WRB) को मंजूरी दे दी थी। ये बिल बीते 27 साल से अधर में लटका हुआ था। ये फैसला पब्लिक में तो नहीं आया था, लेकिन केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने एक्स हैंडल (पहले ट्विटर) पर इसे लेकर पोस्ट डाली थी। बाद में उन्होंने ये पोस्ट डिलीट कर दी थी।

हालाँकि, अब ये बिल संसद में पेश कर दिया गया है। इस पर चर्चा चालू है। इशारा साफ है कि संसद की पुरानी इमारत में शुरू हुआ और नई इमारत में 5 दिन का ये खास सत्र महिलाओं के लिए खास होने जा रहा है। आखिर ये महिला आरक्षण बिल क्या है और ये अभी तक देश की संसद में क्यों नहीं पास हो पाया, यहाँ हम आपको इसके बारे में हर छोटी- बड़ी बात बताने जा रहे हैं।

क्यों है महिला आरक्षण बिल जरूरी?

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और जल शक्ति राज्य मंत्री प्रह्लाद पटेल ने सोमवार को ‘X’ (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया था, “केवल मोदी सरकार में ही महिला आरक्षण की माँग को पूरा करने का नैतिक साहस था जो कैबिनेट की मंजूरी से साबित हुआ। नरेंद्र मोदी जी को बधाई और मोदी सरकार को बधाई।” बाद में उन्होंने ये पोस्ट डिलीट कर दी थी। अब प्रधानमंत्री ने खुद संसद में इसकी घोषणा की, जिसके बाद इसे टेबल किया गया।

हालाँकि, ये पहली बार नहीं है कि महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया जा रहा है। इससे पहले भी इस बिल को देश की संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन राजनीतिक दलों में आम सहमति न बन पाने की वजह से ये हर बार टलता रहा। पीएम मोदी ने पुराने संसद भवन में अपने आखिरी भाषण में इस बात के संकेत भी दिए थे कि देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी में कमी है।

उन्होंने कहा था कि आज़ादी के बाद से अब तक दोनों सदनों में 7500 से अधिक जन प्रतिनिधियों ने काम किया है। इनमें महिला प्रतिनिधियों की संख्या करीब 600 रही है। इसी से समझा जा सकता है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है।

वर्तमान लोकसभा में, 539 सांसदों में 82 महिला सदस्य चुनी गईं, जो कुल संख्या का महज 15.21 फीसदी है। सरकार द्वारा दिसंबर 2022 में संसद के साथ साझा किए गए आँकड़ों के मुताबिक, राज्यसभा में भी 238 सांसदों में से 31 महिला सांसद हैं जो कुल सांसदों का 13.02 फीसदी है। वैश्विक औसत के हिसाब संसद में महिलाओं की भागीदारी में हम बेहद पीछे है। इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन की स्टडी के मुताबिक, वैश्विक औसत 26 फीसदी है।

आँकड़ों से पता चलता है कि कई राज्य विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व 15 फीसदी से कम है। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और पुद्दुचेरी सहित कई राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से कम है। मिजोरम और नगालैंड में विधानसभा में महिलाओं का प्रतिशत जीरो है।

दिसंबर 2022 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 10-12 प्रतिशत महिला विधायक थीं। सबसे अधिक महिला विधायकों के प्रतिनिधित्व वाले पाँच राज्यों में छत्तीसगढ़ में 14.44, पश्चिम बंगाल में 13.7 और झारखंड में 12.35, राजस्थान में 12 और यूपी में 11.66 फीसदी महिला विधायक हैं।

जहाँ जम्मू-कश्मीर 2.30, कर्नाटक में 3.14, पुड्डुचेरी में 3.33 फीसदी हैं। वहीं दिल्ली और उत्तराखंड की विधानसभा में उनकी भागीदारी महज 11.43 फीसदी ही है। पिछले कुछ हफ्तों में, बीजद और बीआरएस सहित कई दलों ने इस विधेयक को पुनर्जीवित करने की माँग की है। वहीं इसे लेकर कांग्रेस ने भी रविवार (17 सितंबर) को अपनी हैदराबाद कॉन्ग्रेस कार्य समिति की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया।

इस विधेयक को लेकर एक खास बात है कि जहाँ राजद, सपा, झामुमो जैसे दल इस महिला आरक्षण के अंदर भी एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण की माँग को लेकर इसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन बीजेपी के साथ कॉन्ग्रेस, बीजेडी, बीआरएस, वाईएसआरसीपी इस बिल के समर्थन में है।

इस बिल का विरोध करने वाले सपा के लोकसभा में 4 तो राजद का एक भी सांसद नहीं हैं, ऐसे में इस बिल के पास होने के पूरे आसार हैं। गौरतलब है कि इस विधेयक को अमलीजामा पहनाने की कवायद पाँच बार की गई, लेकिन हर बार वंचित महिलाओं की भागीदारी के सवाल पर दल बंट गए और ये कानून नहीं बन पाया।

क्या है इस बिल का इतिहास?

प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के 1975 के कार्यकाल के दौरान ‘टूवर्ड्स इक्वैलिटी’ नाम की एक रिपोर्ट आई थी। इसमें हर क्षेत्र में महिलाओं के हालात का ब्यौरा दिया गया था। इसके साथ ही आरक्षण की बात भी कही गई थी। हालाँकि, इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली कमेटी के अधिकांश सदस्य आरक्षण के खिलाफ थे।

महिलाएँ भी चाहती थीं कि वो अपने दम पर राजनीति में आएँ, लेकिन आने वाले वर्षों में महिलाओं ने महसूस किया कि राजनीति की उनकी राह आसान नहीं है। तभी से महिलाओं को संसद में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की जरूरत समझी गई। देश के दिवंगत पीएम राजीव गाँधी ने 1980 के दशक में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने के लिए बिल पास करने की कोशिश का तब कई राज्यों की विधानसभाओं ने विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे उनकी शक्तियों में कमी आएगी।

पहली बार 12 सितंबर, 1996 में महिला आरक्षण विधेयक को पीएम एचडी देवेगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार ने पेश किया था। उस वक्त कॉन्ग्रेस इस गठबंधन को बाहर से समर्थन दे रही थी। उस वक्त समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव ने इसका पुरजोर विरोध किया था।

तब यह विधेयक 81वें संविधान संशोधन विधेयक के तौर पर पेश किया गया था। इसमें संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण के प्रस्ताव के अंदर ही अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था।

इस बिल में प्रस्ताव है कि लोकसभा के हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटें रोटेट की जानी चाहिए। आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन से दी की जा सकती हैं। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण खत्म हो जाएगा। इसके बाद 1997 में इस विधेयक को पेश करने की फिर से कोशिश की गई थी। तब जनता दल (यूनाइटेड) के शरद यादव ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए आपत्तिजनक कॉमेंट किया था कि इस बिल से केवल ‘पर-कटी औरतों’ का ही फायदा पहुँचेगा। उन्होंने कहा था कि ‘परकटी शहरी महिलाएँ’ हमारी ग्रामीण महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगी।

इसके बाद 1998 में 12वीं लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में उस वक्त के कानून मंत्री एम थंबीदुरई ने इस विधेयक को पेश करने की कोशिश की, लेकिन इसमें फिर कामयाबी नहीं मिली।

तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री एम थंबीदुरई विधेयक पेश करने जा रहे थे तब राजद सदस्य सुरेंद्र प्रकाश यादव ने इसे मंत्री के हाथ से छीन लिया। सहकर्मी अजीत कुमार मेहता के साथ वह उन्हें नष्ट करने के कोशिश में और इसकी अधिक प्रतियाँ लेने के लिए अध्यक्ष की मेज पर जा पहुँचे थे।

वाजपेयी सरकार ने दोबारा 13वीं लोकसभा में 1999 में इस विधेयक को पेश करने की कोशिश की। उस दौरान भी राजनीतिक दल इसी माँग को लेकर बँट गए। इसके बाद उन्होंने 2002 और 2003-2004 में भी इस बिल को पास करने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए।

वाजपेयी सरकार इस बिल को कम से कम 6 बार संसद में लेकर आई, लेकिन हर बार कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों ने ही बिल को टाल दिया। याद रखें, वाजपेयी सरकार के पास इसे पारित करने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं था और वह आम सहमति के लिए विपक्ष पर निर्भर थी।

फिर हुआ बिल के लिए 108वाँ संविधान संशोधन

कॉन्ग्रेस की अगुवाई में साल 2004 में यूपीए सरकार के आने पर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। तब 2008 में इस बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के तौर पर राज्यसभा में पेश किया गया। साल 2008 में इस बिल को क़ानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था।

समिति के दो सदस्यों में वीरेंद्र भाटिया और शैलेंद्र कुमार समाजवादी पार्टी के थे। इनका कहना था कि वो इसके विरोध में नहीं है, लेकिन बिल के मसौदा उन्हें मंजूर नहीं है। इन्होंने सलाह दी थी कि प्रत्येक राजनीतिक दल अपने 20 फीसदी टिकट महिलाओं के लिए आरक्षित रखे और संसद में महिला आरक्षण 20 फ़ीसदी से ज्यादा न हो।

जब राज्यसभा में पास हुआ महिला आरक्षण बिल

यूपीए सरकार में 9 मार्च, 2010 को आखिरकार राज्यसभा ने महिला आरक्षण बिल को एक के मुकाबले 186 मतों के भारी बहुमत से पास किया गया था। जिस दिन यह बिल पास हुआ उस दिन मार्शल्स का इस्तेमाल करना पड़ा था। तब भी बीजेपी, वाम दलों और जेडीयू ने इसका समर्थन किया था। वहीं समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इसका पुरजोर विरोध किया था।

राज्यसभा अध्यक्ष ने हंगामा करने वाले समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के सात सांसदों को अध्यक्ष ने निलंबित कर दिया था। ये दोनों दल सरकार में यूपीए के साथी थे। सरकार पर गिरने का खतरा मंडराने की वजह से कॉन्ग्रेस ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया।

दरअसल संविधान के अनुच्छेद 107 (5) के तहत जो विधेयक लोकसभा में विचाराधीन रह जाते हैं, वो उसके भंग होते ही खत्म हो जाते हैं। इस वजह से 2014 में लोकसभा भंग होने के बाद यह महिला आरक्षण बिल अपने आप खत्म हो गया। हालाँकि, राज्यसभा स्थायी सदन होने ये बिल अभी अस्तित्व में है। इसलिए इसे लोकसभा में नए सिरे से पेश किया जाएगा।

साल 2014 में सत्ता में आई बीजेपी नीत मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में इसे पेश करने की बात की। पार्टी ने 2014 और 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण का वादा किया था। पीएम को 2017 में पत्र लिखकर कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गाँधी ने अपना समर्थन जताया था।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गाँधी ने भी 16 जुलाई, 2018 को पीएम को पत्र लिखकर पार्टी के समर्थन की बात दोहराई थी। 2019 में लोकसभा चुनावों के लेकर भी राहुल गाँधी ने तब कहा था कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह महिला आरक्षण विधेयक को प्राथमिकता के आधार पर पास करेंगे।

हालाँकि, इस बिल को लेकर कॉन्ग्रेस का गेम प्लान हमेशा महिला प्रतिनिधित्व के एजेंडे पर दिखावा करना है, जबकि व्यवहार में अपने गठबंधन सहयोगियों और वास्तव में अपने स्वयं के सांसदों के जरिए से वो इसे नाकाम करती रही है।

कॉन्ग्रेस, जिसके पास 2010 में अपेक्षित बहुमत था, केवल भाजपा के समर्थन की वजह से राज्यसभा के जरिए ये विधेयक पारित कर सकी, लेकिन एक बार फिर यहाँ वो इसका दिखावा साबित हुआ। सोनिया गाँधी ने ये स्वीकार किया था कि उनकी अपनी पार्टी ने इसका विरोध किया।

साल 2023 के पाँच दिन के खास सत्र कै दौरान ये बिल पेश हो गया है। अगर ये पास हो जाता है, तो फिर राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद ये कानून बन जाएगा।

क्या बम विस्फोट में हुई मौत हत्या है या गैर इरादतन मानव संहार? : सिविल जज की परीक्षा में पूछे गए सवालों में उलझी उत्तराखंड HC, ऐसे निकाला हल

उत्तराखंड हाईकोर्ट को राज्य न्यायिक सेवा सिविल जज के प्रारंभिक परीक्षा में पूछे गए सवाल पर डाली गई याचिका पर सुनवाई करते वक्त खासी मुश्किल का सामना करना पड़ा। दरअसल, परीक्षा में एक ऐसा सवाल था जिसके जवाब ने विवादास्पद रूप ले लिया था। इसी पर हाई कोर्ट सुनवाई कर रही थी।

न्यायिक सेवा की परीक्षा में पूछा गया था- ‘A’ ने एक मेडिकल स्टोर में बम रखा और बम विस्फोट होने से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए तीन मिनट का वक्त दिया। आर्थराइटिस से पीड़ित एक मरीज ‘B’ वहाँ से निकलने में सफल नहीं हो सका और मारा गया। क्या इसके लिए A के तहत मामला दर्ज किया जाएगा? ये सवाल पूछा गया था। इसके लिए चार विकल्प ए, बी, सी और डी दिए गए थे।

इसके लिए परीक्षा में शामिल हुए अधिकतर आवेदकों ने विकल्प ‘ए’ (आईपीसी की धारा 302 के तहत – हत्या) का चयन किया, लेकिन आयोग के मुताबिक, सही उत्तर ‘डी’ था (आईपीसी की धारा 304 ए – गैर इरादतन हत्या/ मानव संहार)।” ये परीक्षा उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (यूकेपीएससी) ने आयोजित की थी और इसके नतीजे इस साल मई में घोषित किए गए थे।

बता दें कि इस सवाल पर डाली गई याचिका की सुनवाई उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस राकेश थपलियाल की बेंच कर रही थी। बेंच ने इस मामले की सुनवाई 13 सितंबर को की थी, लेकिन इसे लेकर ब्योरा इसी हफ्ते साझा किया गया। इस मामले में आखिरकार कोर्ट ने आयोग को सवालों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

‘गैर इरादतन तो आईपीसी की धारा 302 नहीं’

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, यूकेपीएससी ने कोर्ट में तर्क दिया कि ”हत्या का इरादा न होने से ये मामला आईपीसी की धारा 302 से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह लापरवाही की वजह से मौत से जुड़ा मामला है।” इस मामले पर उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा, “हमारे लिए यह कहना काफी है कि सब्जेक्ट एक्सपर्ट ने मोहम्मद रफीक के मामले में 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया है। अदालत विषय के एक्सपर्ट की राय से इतर कोई भी राय देने से परहेज करती है।”

गौरतलब है कि मोहम्मद रफीक मामले में मध्य प्रदेश में एक पुलिस अधिकारी को एक तेज रफ्तार ट्रक ने कुचल दिया जब उसने इस पर चढ़ने की कोशिश की और ड्राइवर रफीक ने उसे धक्का देकर गिरा दिया। हालाँकि इस बीच इस याचिका ने कानूनी हलकों में इस बात पर बहस छेड़ दी कि क्या किसी आतंकवादी कृत्य को ‘हत्या’ के बजाय ‘लापरवाही की वजह से मौत’ के तौर पर देखा जा सकता है?

हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील, अवतार सिंह रावत से जब उनकी इस मामले में राय के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “यह स्पष्ट रूप से लापरवाही का मामला नहीं है क्योंकि कृत्य ही स्वयं इरादे को दर्शाता है और ‘ए’ अपने काम के नतीजों को जानता था।” उन्होंने कहा, “बिना किसी संदेह के, यह मामला आईपीसी की धारा 302 हत्या के दायरे में आता है।”

तीन अन्य सवालों पर भी थी आपत्ति

याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा में आए तीन अन्य सवालों पर भी आपत्ति जताई है। अदालत ने कहा, “दो सवालों में याचिकाकर्ता ने सही विकल्प चुना था, जबकि विषय के एक्सपर्ट गलत विकल्प पर अड़े थे।” दोनों पक्षों के दिए गए तथ्यों की समीक्षा करने के बाद, अदालत ने कहा, “हमारा विचार है कि एक्सपर्ट ने इसका इस्तेमाल बगैर ध्यान दिए किया है।” कोर्ट ने आयोग को दोनों सवालों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

तीसरे सवाल के संबंध में, हाई कोर्ट ने कहा, “इसे पूरी तरह से संवेदनहीन तरीके से तैयार किया गया था।” अदालत ने कहा कि हमें यह देखकर दुख होता है कि सवाल को तैयार करने में जल्दबाजी की गई है।

कोर्ट ने परीक्षा में उत्तरदाताओं को ध्यान में रखते हुए इस सवाल को हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर ही चयन की पूरी प्रक्रिया चार हफ्ते के अंदर खत्म की जानी चाहिए। इसके साथ ही एक नई मेरिट लिस्ट तैयार की जानी चाहिए जिसके आधार पर चयन प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।

जिस लड़ाकू विमान को नहीं पकड़ सकते रडार, उसका मलबा मिला: ऑटो पायलट मोड में उड़ते हुए गायब हो गया था अमेरिका का F-35

17 सितंबर 2023 को लापता हुए अमेरिकी फाइटर जेट F-35 का मलबा मिल गया है। रक्षा अधिकारियों ने जानकारी देते हुए कहा है कि इसका मलबा दक्षिण कैरोलिना के विलियम्सबर्ग काउंटी में मिला है। एफ-35 उड़ान के दौरान गायब हो गया था। इसके पायलट ने पैराशूट के जरिए कूदकर अपनी जान बचाई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अधिकारियों का कहना है कि लापता हुए फाइटर जेट F-35 की तलाश अब पूरी हो गई है। विमान क्रैश होने के बाद इसका मलबा मिला है। अधिकारियों का कहना है कि जहाँ पर मलबा मिला है, वहाँ जाँच टीम पहुँच गई है। हादसे के कारणों का पता लगाया जा रहा है। स्थानीय लोगों को फाइटर जेट से दूर रहने की सलाह दी गई है। एक रिकवरी टीम इसे सुरक्षित रखने के प्रयास में जुटी हुई है।

अमेरिकी सेना कॉर्प्स ने 18 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि एफ-35 की सभी उड़ानें अगले दो दिनों के लिए रोकी जा रही है। यह फैसला लगातार हो रहे हादसों को देखते हुए लिया गया है। हाल के दिनों में एफ-35 के साथ हुई यह तीसरी दुर्घटना है। बता दें कि फाइटर जेट के लापता होने के बाद अधिकारियों ने आम जनता से इसकी तलाश में मदद करने के लिए अपील की थी।

हादसे का शिकार हुए एफ-35 फाइटर जेट को एफ-35 लाइटिंग-II के नाम से भी जाना जाता है। फाइटर जेट के लापता होने की वजह इसकी सबसे बड़ी खासियत ही थी। दरअसल, यह फाइटर जेट स्टील्थ टेक्नोलॉजी यानी कि रडार की पकड़ में न आने वाली तकनीक से बनाया गया है। ऐसे में लापता होने के बाद रडार भी इसे नहीं ढूँढ़ पा रहा था।

एफ-35 फाइटर जेट की कीमत 150 मिलियन डॉलर यानी 12 अरब 48 करोड़ रुपए से अधिक है। साउथ कैरोलिना राज्य के तटीय इलाके में स्थित चार्लसन ज्वॉइंट बेस से उड़ान भरने के बाद एफ-35 जब आसमान में था, तभी कुछ खराबी आने पर पायलट उसे ऑटो पायलट मोड में डालकर खुद बाहर निकल गया था।

हिंदू युवती से 6 महीने तक रेप, फिर भ्रूण निकलवा कर दबा दिया: कुशवाहा बन सलमान ने फँसाया था, निकाह न करने पर परिवार को खत्म करने की धमकी

मध्य प्रदेश के कटनी जिले से ‘लव जिहाद’ का एक मामला सामने आया है। यहाँ सलमान नाम के एक युवक पर मजहब छिपा कर हिन्दू लड़की से 6 माह तक रेप का आरोप लगा है। बाद में आरोपित द्वारा पीड़िता का गर्भपात करवा दिया गया। लड़की को निकाह न करने पर जान से मार डालने की भी धमकी दी गई है। जानकारी होने पर सोमवार (18 सितंबर, 2023) को लड़की के परिजनों ने आरोपित के खिलाफ केस दर्ज करवाया। पुलिस ने सलमान को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना कटनी के स्लीमनाबाद थाना क्षेत्र की है। यहाँ के गाँव लखनवाड़ा की रहने वाली 20 वर्षीया पीड़िता में 6 माह पूर्व 10 मार्च, 2023 को कुछ काम से गाँव तेवरी गई थी। यही पर लड़की की मुलाकात सलमान से हुई थी। आरोपित ने खुद को ‘सलमान कुशवाहा’ बताया और पीड़िता से दोस्ती कर ली। थोड़े समय में दोनों ने आपस में नंबर साझा कर लिए। बाद में आरोपित और पीड़िता में मेलजोल बढ़ा। इस दौरान सलमान के कई बार पीड़िता से रेप किया। लगभग 5 महीने बाद लड़की गर्भवती हो गई।

इस बीच लड़की को कहीं से सलमान के मुस्लिम होने की जानकारी मिली। पीड़िता ने अपने परिजनों को पूरी बात बता दी। इस बीच सलमान लड़की पर गर्भपात का दबाव बनाने लगा। आरोप है कि सलमान ने एक दिन मौका पा कर पीड़िता का गर्भपात करवा दिया। भ्रूण को उसने एक सुनसान जगह पर दबा दिया। आखिरकार सोमवार को पीड़िता के परिजन शिकायत ले कर पुलिस स्टेशन पहुँचे। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया है कि सलमान ने पीड़िता पर अपने साथ निकाह करने का दबाव भी बनाया। मना करने पर उसे परिवार सहित कत्ल करने की धमकी भी दी।

सोमवार को ही पुलिस ने पीड़िता की तहरीर पर आरोपित 21 वर्षीय सलमान के खिलाफ IPC की धारा 376 सहित अन्य सुसंगत धाराओं में FIR दर्ज कर लिया। सलमान को गिरफ्तार भी कर लिया गया। पीड़िता को मेडिकल परीक्षण के लिए अस्पताल भेजा गया है। थाना प्रभारी अखिलेश दहिया के अनुसार, दफन किए गए भ्रूण को भी निकलवा कर चिकित्सीय परीक्षण करवाए जा रहे हैं।

नई संसद का ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के साथ श्रीगणेश, लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं में भी महिलाओं को आरक्षण: PM मोदी का बड़ा ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सांसदों के साथ पुराने संसद भवन, जिसे अब ‘संविधान भवन’ के नाम से जाना जाएगा, वहाँ से नई संसद भवन इमारत की तरफ मार्च किया। इसके बाद उन्होंने लोकसभा को संबोधित किया। उन्होंने इस दौरान कहा कि इस पावन दिवस पर हमारा ये शुभारंभ संकल्प से सिद्धि की ओर एक नए विश्वास के साथ यात्रा आरंभ करने का है। नए संसद भवन में सदन की पहली कार्यवाही शुरू हुई। इस दौरान पीएम मोदी ने ‘महिलाओं के नेतृत्व में विकास’ की सोच को आगे बढ़ते हुए एक प्रमुख संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत करने का ऐलान किया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हर देश की विकास यात्रा में ऐसे पत्थर के मील आते हैं, जब वो गर्व से कहता है कि आज के दिन हम सबने नया इतिहास रचा है। उन्होंने कहा कई नए सदन के प्रथम सत्र के प्रथम भाषण में वो बड़े विश्वास और गर्व से कह रहे हैं कि आज का ये पल, आज का ये दिवस इतिहास में नाम दर्ज कराने वाला है। उन्होंने कहा कि सिर्फ महिलाओं के विकास की बात पर्याप्त नहीं है, हमें मानव जाति की विकास यात्रा में नए पड़ाव को अगर प्राप्त करना है, राष्ट्र की विकास यात्रा में नई मंजिलों को अगर पाना है, तो ये आवश्यक है कि ‘Women Led Development’ को हम बल दें।

पीएम मोदी ने बताया कि कैसे महिला सशक्तिकरण की उनकी सरकार ने हर योजना ने महिला नेतृत्व करने की दिशा में बहुत सार्थक कदम उठाए हैं। पीएम मोदी ने कहा कि ईश्वर ने पवित्र कार्य के लिए उन्हें चुना है। उन्होंने कहा, “अनेक वर्षों से महिला आरक्षण पर बहुत चर्चाएँ और वाद-विवाद हुए हैं। 1996 में इससे जुड़ा बिल पहली बार पेश हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कई बार महिला आरक्षण बिल पेश किया गया, लेकिन उसे पास कराने के लिए आँकड़े नहीं जुटा पाए, जिस वजह से वो सपना अधूरा रह गया।”

उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में नारी शक्ति का विस्तार करने का है। प्रधानमंत्री ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को संसद में पेश किए जाने का ऐलान किया। उन्होंने इसके लिए देश की सभी माताओं-बहनों-बेटियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि इस बिल को कानून बनाने के लिए हम संकल्पबद्ध हैं। उन्होंने सभी सांसदों से आग्रह किया कि वो सर्वसम्मति से पारित किया जाए। उन्होंने कहा कि जब ये बिल कानून बनेगा तो सभी महिलाओं को इसका फायदा होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज आधुनिक भारत और हमारे लोकतंत्र के प्रतीक नए संसद भवन का शुभारंभ हुआ है और सुखद संयोग है कि आज गणेश चतुर्थी का शुभ दिन है। उन्होंने बताया कि कैसे भारत की अध्यक्षता में G20 का असाधारण आयोजन, विश्व में इच्छित प्रभाव के अर्थ में अद्वितीय उपलब्धियाँ हासिल करने वाला एक अवसर बना। पीएम मोदी ने कहा कि ये अवसर कई मायनों में अभूतपूर्व है। बकौल पीएम मोदी, आजादी के अमृतकाल का ये ऊषाकाल है और भारत अनेक सिद्धियों के साथ नए संकल्प लेकर, नए भवन में अपना भविष्य तय करने के लिए आगे बढ़ रहा है।

पीएम मोदी ने कहा, “अभी चुनाव दूर हैं, अभी हमारे पास समय बचा है। मैं मानता हूँ कि इस सदन में जो व्यवहार होगा, वो निर्धारित करेगा कि कौन इधर बैठने के लिए व्यवहार करता है और कौन उधर बैठने के लिए व्यवहार करता है। महिलाओं को अधिकार देने और उनकी शक्ति का उपयोग करने के इस पवित्र काम के लिए शायद ईश्वर ने मुझे चुना है। एक बार फिर हमारी सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है।” इसके बाद नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने इसका श्रेय लूटने की कोशिश की।