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कन्हैयालाल हत्याकांड: जिसके घर मिली तलवार, उस बबला (फरहाद) को कोर्ट से बेल, वकील ने कहा – ‘धारदार नहीं थी, बेचने के लिए रखा था… गलत मकसद से नहीं’

NIA स्पेशल कोर्ट ने उदयपुर के कन्हैयालाल हत्याकांड में आरोपित फरहाद मोहम्मद को जमानत दे दी है। कोर्ट के मुताबिक हत्या की साजिश में बबला उर्फ़ फरहाद के शामिल होने का कोई आरोप नहीं है। 24 अगस्त 2023 को फरहाद की जमानत अर्जी पर बहस हुई थी। इस पर शुक्रवार (1 सितम्बर) को फैसला आया। आरोप था कि फरहाद के पारिवारिक मकान से तलवार बरामद की गई थी। आरोपित बबला उर्फ़ फरहाद तलवार पर मीनकारी का काम करता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फरहाद की जमानत की सुनवाई न्यायाधीश रविंद्र कुमार की अदालत में हुई। कन्हैयालाल हत्याकांड में NIA ने फरहाद को आर्म्स एक्ट 4/25 का आरोपित बनाया था। आरोपित की तरफ से बहस एडवोकेट अखिल चौधरी ने की।

वकील चौधरी के मुताबिक घटना के समय फरहाद का FIR में नाम नहीं था। दलील दी गई कि जो तलवार फरहाद के पास से बरामद होने के दावा NIA ने किया है, वो आरोपित के पारिवारिक मकान से मिली थी। इस तलवार पर मीनकारी का काम करके बबला ने उसे बेचने के लिए रखा था न कि किसी गलत मकसद से।

बचाव पक्ष की दलील में यह भी कहा गया कि बरामद तलवार धारदार नहीं बल्कि भोंटी (भोथरी) थी। NIA ने आरोपित फरहाद की जमानत का हालाँकि विरोध किया था। NIA के वकील टीपी शर्मा ने कोर्ट से फरहाद को आदतन अपराधी बताया और उस पर पहले से ही 3 केस दर्ज होने की जानकारी भी दी।

सरकारी वकील के मुताबिक फरहाद ने नूपुर शर्मा के खिलाफ हुए एक प्रदर्शन के दौरान सिर तन से जुदा के नारे भी लगाए थे। बचाव पक्ष के वकील ने हालाँकि पहले दर्ज केसों में फरहाद के बरी होने और नारे वाले प्रदर्शन को फरहाद नहीं बल्कि किसी और का आयोजन बताया।

फरहाद तलवारों पर मीनकारी का काम करता है। वो जुलाई 2022 से जेल काट रहा है। इन दलीलों को सुन कर अदालत ने कहा कि फरहाद पर केवल आर्म्स एक्ट का आरोप है। कोर्ट ने यह भी कहा कि तलवार धारदार थी या भोंटी, इसका निर्णय जमानत के लेवल पर नहीं हो सकता।

NIA स्पेशल कोर्ट ने फरहाद के वकील की दलीलों को जमानत योग्य बताया। बचाव पक्ष के मुताबिक जाँच एजेंसी ऐसे सबूत नहीं पेश कर पाई, जो कन्हैयालाल की हत्या की साजिश में फरहाद की मिलीभगत साबित करती हो। NIA द्वारा कोर्ट में पेश चार्जशीट में भी फरहाद पर UAPA की धारा नहीं लगाई गई थी।

गौरतलब है कि 28 जून 2022 को कन्हैयालाल की मोहम्मद रियाज अत्तारी और गौस मोहम्मद ने निर्मम तरीके से गला काटकर हत्या कर दी थी। कत्ल की वजह कन्हैयालाल के बेटे द्वारा सोशल मीडिया पर नूपुर शर्मा का सपोर्ट करना बताया गया था।

कोई देश जो नहीं कर पाया, वो करेगा आदित्य एल-1: लगातार भेजेगा सूर्य संबंधित डेटा, ISS के पूर्व कमांडर ने बताया ऐतिहासिक

सूर्य का अध्ययन करने के लिए भारत पहली अपना स्पेस मिशन आज शनिवार 2 सितंबर 2023 को लॉन्च कर रहा है। इसे श्रीहरिकोट्टा से 11:50 में लॉन्च किया जाएगा। दुनिया का कोई भी मिशन अभी तक सूर्य और उससे संबंधित डेटा अभी तक लगातार नहीं भेज पाया है, लेकिन आदित्य एल-1 ऐसा पहली बार करेगा। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के पूर्व कमांडर क्रिस हेडफील्ड ने भारतीय तकनीक कौशल की सराहना की।

भारतीय एस्ट्रोफिजिक्स संस्थान (IIA) के प्रोफेसर जगदेव सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत की और इसके बारे में जानकारी दी। प्रोफेसर जगदेव सिंह के शुरुआती प्रयास ही थे, जिसके परिणामस्वरूप विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) पेलोड का विकास हुआ। इस पेलोड को आदित्य एल-1 अंतरिक्ष यान पर ले जाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि प्रारंभिक योजना के तहत आदित्य एल-1 को 800 किलोमीटर की पृथ्वी की निचली कक्षा में लॉन्च करने की थी, लेकिन 2012 में इसरो के साथ चर्चा के बाद इसे बदल दिया गया। निर्णय लिया गया कि मिशन को L-11 (लैग्रेंज प्वाइंट-1) के चारों ओर की हेलो कक्षा में इसे प्रक्षेपित किया जाएगा। यह एल-1 बिंदु से पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर है।

प्रोफेसर सिंह ने कहा, “16 फरवरी 1980 को भारत में पूर्ण सूर्य ग्रहण हुआ था और उस समय संस्थापक-निदेशक एमके वेनु बप्पू ने मुझे सूर्य के बाहरी वातावरण का अध्ययन करने के लिए प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया था। मैंने 1980 और 2010 के बीच 10 ऐसे अभियान चलाए… मुझे एहसास हुआ कि ग्रहण के दौरान आपको अवलोकन के लिए केवल 5-7 मिनट मिलते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “ये अवलोकन दीर्घकालिक अध्ययन करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मैंने निरंतर अवधि के लिए सूर्य के पहलुओं का अध्ययन करने में मदद करने के मिशन के लिए इसरो और अन्य एजेंसियों में कई लोगों से बात की। साल 2009 के आसपास ऐसे संभावित मिशन के बारे में बातचीत शुरू हुई और बाद में 2012 में एक ठोस योजना विकसित की गई।”

आदित्य मिशन की कार्य-प्रणाली को लेकर प्रोफेसर सिंह ने कहा, “अंतरिक्ष यान को वहाँ पहुँचने में 127 दिन लगेंगे। उम्मीद है कि अगले साल फरवरी या मार्च तक डेटा आना शुरू हो जाएगा। आम तौर पर एक उपग्रह को पाँच साल तक रहने की योजना बनाई जाती है, जो कि किसी न्यूनतम मिशन जीवन है। हालाँकि, आदित्य एल-1 हमें 10-15 साल तक डेटा प्रदान करना जारी रख सकता है।”

उन्होंने कहा, “चूँकि उपग्रह को एल-1 पर रखा जाएगा, जो एक स्थिर बिंदु है, वहाँ हमें बहुत अधिक दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसलिए हम इसके अधिक जीवन होने की उम्मीद कर रहे हैं। यह पहली बार है, जब हम दृश्यमान उत्सर्जन रेखा पर डेटा प्राप्त करेंगे… सौर कोरोना में कैसे परिवर्तन हो रहे हैं और ये छोटे परिवर्तन प्लाज्मा के गर्म होने और क्रोमोस्फीयर से कोरोना तक ऊर्जा के हस्तांतरण में कैसे भूमिका निभाते हैं, आदि। अब तक कोई भी लगातार डेटा हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाया है, लेकिन हम ऐसा करने में सक्षम होंगे।”

प्रोफेसर सिंह ने कहा कि उनकी टीमों ने प्रयोगशाला में उपकरण का कई बार परीक्षण किया है। परीक्षणों से पता चला है कि व पूरी तरह काम कर रहे हैं। उपकरणों को हर चरण में शेकर्स, वाइब्रेटर और तापमान में उतार-चढ़ाव के माध्यम से वे स्थिर और अच्छी तरह से कैलिब्रेट किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि अगर सब कुछ ठीक रहा है तो इसके बाद के मिशन पर विचार होगा।

भारत के तकनीकी कौशल की सराहना करते हुए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के पूर्व कमांडर क्रिस हेलफील्ड ने कहा, “चंद्रमा पर उतरने और सूर्य पर यान भेजने या कम से कम सूर्य की निगरानी करने और भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में उड़ान भरने के लिए तैयार करने का यह उदाहरण वास्तव में भारत में हर किसी के लिए उदाहरण प्रदान करता है। वहीं, दुनिया भर के लोगों को भारतीय तकनीकी कौशल कहाँ पहुँचा है, ये उसका भी उदाहरण है।”

उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे पिछले कई वर्षों से देख रहे हैं। वह भारतीय अंतरिक्ष और अनुसंधान संगठन से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं… इसलिए इस समय इसे आगे बढ़ाना, भारत के नेतृत्व की ओर से यह वास्तव में एक स्मार्ट कदम है। इसे विकसित किया जा रहा है, लेकिन इसके निजीकरण की प्रक्रिया भी चल रही है ताकि व्यवसायों और इसलिए भारतीय लोगों को फायदा हो सके।”

विपक्षी एकता में लगातार बढ़ रही दरार: अडानी पर भिड़े ममता और राहुल गाँधी, जातीय जनगणना पर नहीं बन पाई सहमति

विपक्षी एकता में अभी से दरार पड़ती दिख रही है। मुंबई में 1 सितंबर 2023 को खत्म हुई I.N.D.A. की बैठक के दौरान उद्योगपति गौतम अडानी को लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के बीच तकरार हो गई। बताया जा रहा है कि इसकी वजह से ममता गठबंधन की ओर से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हुईं।

राहुल गाँधी-ममता बनर्जी में ठनी?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राहुल गाँधी ने बैठक के दौरान गौतम अडानी का मुद्दा उठाया। उन्होंने अडानी का नाम लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोलने की कोशिश की, लेकिन इससे ममता बनर्जी खफा हो गईं। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी ने अडानी का मुद्दा उठाने से पहले किसी भी साथी दल को भरोसे में नहीं लिया।

ममता बनर्जी ने कहा कि साथी दलों से चर्चा किए बिना और उनकी सहमति के बगैर ही कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने गौतम अडानी का मुद्दा उठा दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कॉन्ग्रेस और वामदलों के गठबंधन के मुद्दे पर भी अपना मतभेद जारी किया।

जातिगत जनगणना पर नहीं बनी सहमति?

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, बैठक में जातिगत जनगणता पर राजनीतिक प्रस्ताव भी पास किया जाना था, लेकिन इसको लेकर सभी पार्टियों में सहमति नहीं बन पाई। इस मुद्दे पर बिहार और उत्तर प्रदेश की प्रमुख पार्टियों- जनता दल (यूनाइटेड), समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल साथ आए, लेकिन ममता बनर्जी व कुछ अन्य राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया।

31 अगस्त को कपिल सिब्बल को लेकर हो गया था विवाद

बता दें कि 31 अगस्त 2023 को मुंबई में शुरू हुई इस बैठक में सपा के राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल अचानक पहुँच गए थे। इससे कॉन्ग्रेस नाराज हो गई थी। कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने कपिल सिब्बल की मौजूदगी का विरोध किया था।

एकवोकेट कपिल सिब्बल के मंच पर पहुँचने से केसी वेणुगोपाल ने उद्धव ठाकरे से शिकायत की थी, जिसके बाद राहुल गाँधी ने हस्तक्षेप किया। तब जाकर कपिल सिब्बल को मंच पर फोटोशूट के समय जगह मिल पाई थी, वो भी एकदम किनारे

भारत में युवाओं की भर्ती कर रहे हैं अलकायदा और तहरीक-ए-तालिबान: NIA ने चार राज्यों में की छापेमारी, कई संदिग्ध वस्तुएँ बरामद

भारत में आतंक की फैक्ट्री तैयार करने के लिए आतंकी संगठन पूरी जी-जान से जुटे हुए हैं। हालाँकि, NIA उनके मंसूबों पर लगातार पानी फेर रहा है। NIA ने अपने समूह में भारतीय युवाओं की भर्तियाँ करने की कोशिश कर रहे अल-कायदा (AQIS) और तहरीक-ए-तालिबान (TeT) के मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है।

इसके स्लीपर सेल को पकड़ने के लिए राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने 1 सितंबर 2023 यानी शुक्रवार को चार राज्यों में 6 ठिकानों पर छापेमारी की है। इस दौरान NIA ने कई भड़काऊ और आपत्तिजनक सामान बरामद की हैं। कुछ डिवाइस भी मिले हैं, जिनकी जाँच की जा रही है।

चार राज्यों में 6 ठिकानों पर छापेमारी

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनआईए ने महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक में छापेमारी की। महाराष्ट्र में तीन स्थानों पर और अन्य राज्यों में एक-एक स्थानों पर छापेमारी की गई है। इस दौरान कई भड़काऊ डिजिटल डिवाइस बरामद किए गए हैं। एनआईए की जाँच में इस बात का पता चला है कि ये आर्थिक रुप से कमजोर युवाओं को निशाने पर लेते थे और अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं।

ये छापेमारी इन दोनों आतंकी संगठनों से जुड़े दो आरोपितों से पूछताछ के आधार पर की गई है। इन दोनों आतंकियों को अप्रैल 2023 में एनआईए ने गिरफ्तार किया था। तब से उसकी जाँच जारी है। ये दोनों आरोपित आंतकी गतिविधियों में शामिल थे। इसके अलावा, ये अफगानिस्तान में जमीन खरीदने के लिए विदेश में फंड ट्रांसफर करने में भी शामिल थे।

पहले भी एनआईए ने की थी बड़ी कार्रवाई

बता दें कि अप्रैल-मई माह में भी एनआईए ने आतंकी संगठनों और स्थानीय तस्करों के बीच के गठबंधन को तोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया था। एनआईए ने 17 मई को हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में 100 से ज्यादा स्थानों पर छापेमारी की थी। इसमें अकेले दिल्ली-एनसीआर में 32 स्थानों पर छापा मारा गया था, तो पंजाब के अलग-अलग इलाकों और चंडीगढ़ मिलाकर टीम ने 67 जगहों पर तलाशी अभियान चलाया गया था।

एनआईए को मिले इनपुट्स के अनुसार आतंकी-गैंगस्टर-ड्रग तस्कर नेटवर्क देश में अवैध हथियारों और गोला-बारूद की तस्करी का काम भी करते हैं। यह नेटवर्क सरहद पर पाकिस्तान से हथियार हासिल कर देश के अन्य राज्यों में पहुँचाने का भी काम करता है। हथियारों के अलावा इस नेटवर्क का इस्तेमाल नशे के सामान की आपूर्ति के लिए भी किया जाता है।

इसी तरह जुलाई मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने आतंकी संगठन ‘अल सुफ़ा’ से जुड़े लोगों के ठिकानों पर छापेमारी की थी। इस दौरान जयपुर को दहलाने की साजिश रचने वाले आतंकी इमरान खान की संपत्ति जब्त कर उस पर कुर्की नोटिस चस्पा किया था। 

अल सुफा ISIS से प्रेरित आतंकी संगठन है। साल 2012 में इस रतलाम से ही इसकी शुरुआत हुई थी। उस समय इसमें 40-50 आतंकी थे, लेकिन बाद में इस्लाम के नाम पर मुस्लिम युवाओं को बरगलाकर यह संख्या बढ़ाने की कोशिश की गई।

इस संगठन के लोगों ने साल 2014 में रतलाम के महू रोड बस स्टैंड पर बजरंग दल के नेता कपिल राठौड़ और उनकी होटल पर काम करने वाले पुखराज की हत्या कर दी थी। सितम्बर 2017 में इसी से जुड़े लोगों ने रतलाम में ही तरुण सांखला की गोली मार कर हत्या कर दी थी। 

मोदी सरकार में महिलाएँ रच रहीं इतिहास: जया सिन्हा के हाथ में रेलवे बोर्ड, गीतिका को पाकिस्तान में उच्चायोग की कमान, सोनाली को काजीरंगा की जिम्मेदारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए भारत की विकास कहानी में इस बात पर जोर दिया है कि भारत महिलाओं के विकास से ‘महिला-नेतृत्व वाले विकास’ की ओर बढ़ रहा है। इस नजरिए में विकास के वास्तुकार के तौर पर महिलाओं की कल्पना की गई। इसी कल्पना को साकार करते हुए देश में महिलाएँ ऐसे पदों पर आसीन हो रही है, जहाँ इससे पहले कभी किसी महिला की नियुक्ति नहीं हुई थी।

हाल ही में देश और विदेशों में उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्ति इसका सबूत है। ताजा उदाहरण रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष और सीईओ के तौर पर काम संभालने वाली जया वर्मा सिन्हा का है। वो रेलवे बोर्ड के इतिहास में ये पद संभालने वाली पहली महिला हैं।

इससे दो दिन पहले ही 29 अगस्त को गीतिका श्रीवास्तव को इस्लामाबाद उच्चायोग में भारत का नया प्रभारी नियुक्त किया वह यह पद संभालने वाली पहली महिला हैं। उनसे एक दिन पहले 27 अगस्त को ही काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पहली महिला क्षेत्र निदेशक के पद पर डॉ सोनाली घोष की तैनाती की गई है। उन्होंने आज 1 सितंबर शुक्रवार को कार्यभार संभाला।

ये भारतीय महिलाएँ अब ऐसी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के साथ समाज पर अपनी छाप छोड़ नई ऊँचाइयाँ हासिल करने जा रही हैं जहाँ कभी पुरुष ही उड़ान भरा करते थे। यहाँ हम इन्हीं महिलाओं की कहानी बयां करने जा रहे जो देश-दुनिया के लिए प्रेरणा बन कर उभरी हैं। शुरुआत शुक्रवार (1 सितम्बर, 2023) को रेल भवन में रेलवे बोर्ड की नई अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के तौर पर कार्यभार संभालने वाली जया वर्मा सिन्हा से करते हैं।

रेलवे में बना नया रिकॉर्ड

गुरुवार यानी 31 अगस्त, 2023 को कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने जया वर्मा सिन्हा (Jaya Verma Sinha) को रेलवे बोर्ड की अध्यक्ष और सीईओ नियुक्त करने की मंजूरी दी। इस पद पर उनका कार्यकाल 31 अगस्त, 2024 तक होगा। वो एक अक्टूबर को रिटायर होने वाली थी। इस नियुक्ति को देखते हुए उन्हें सेवा विस्तार दिया जाएगा। इस पद पर नियुक्त होने से पहले वो रेलवे बोर्ड में यातायात परिवहन के अतिरिक्त सदस्य का पद संभाल रही थीं।   

बता दें कि रेलवे बोर्ड भारतीय रेलवे के लिए फैसला लेने वाली सर्वोच्च संस्था है। अपने नए रोल में उन्होंने अनिल कुमार लाहोटी की जगह ली है। इस रोल में वो माल ढुलाई और यात्री सेवाओं के पूरे परिवहन की देखरेख के लिए जिम्मेदार होंगी। इसके साथ ही भारतीय रेलवे के इस सर्वोच्च पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला होने का रिकॉर्ड उनके नाम हो गया।

दरअसल, भारतीय रेलवे बोर्ड की स्थापना 1905 में हुई थी। ये पहला मौका है जब 118 साल बाद कोई महिला इसके शीर्ष पद तक पहुँची हैं। लेकिन इस तरह से रिकॉर्ड कायम करना उनके जीवन में पहली बार नहीं है। इससे पहले भी वो दक्षिण पूर्व रेलवे की पहली प्रिसिंपल चीफ ऑपरेशन मैनेजर रह चुकी हैं।

ये रेलवे की वही तेजतर्रार अधिकारी हैं जिन्होंने इस साल जून में ओडिशा के बालासोर में हुई भयंकर ट्रेन दुर्घटना के बाद ट्रेनों की पेचीदा सिग्नल प्रणाली के बारें में मीडिया को जानकारी दी थी। इसके साथ प्रधानमंत्री कार्यालय को भी पावर प्रजेंटेशन के जरिए हादसे के बारें में उन्होंने ही बताया था। इस भीषण हादसे में तकरीबन हादसे में 300 लोगों की जान गई थी और लगभग 1000 लोग घायल हुए थे।

उन्होंने 1988 में भारतीय रेलवे यातायात सेवा (IRTS) में ऑफिसर के पद से रेलवे में कदम रखा था। अपनी इस सर्विस के दौरान उन्होंने दक्षिण पूर्व रेलवे, पूर्व रेलवे, उत्तर रेलवे सहित कई रेलवे जोन के लिए काम किया। वो पूर्व रेलवे जोन के सियालदह डिवीजन में डीआरएम के पद पर भी रहीं। तब से 35 साल के अपने करियर में वो रेलवे के अलग-अलग क्षेत्रों के प्रशासन और प्रबंधन का लंबा अनुभव रखती हैं।

इस दौरान उन्होंने संचालन, सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्यिक और विजिलेंस जैसे कई अहम पदों पर काम किया है। ढाका के भारतीय उच्चायोग में भी 4 साल तक उन्होंने रेलवे सलाहकार के तौर पर अपनी सेवाएँ दीं। यही नहीं उनका कोलकाता से ढाका तक चलने वाली मैत्री एक्सप्रेस के रोडमैप में बनाने में भी अहम रोल रहा था। रेलवे बोर्ड की नई अध्यक्ष और सीईओ फोटोग्राफी की शौकीन हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा रही हैं।

पाकिस्तान में पहली महिला राजनयिक

इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग में गीतिका श्रीवास्तव को प्रभारी डी’एफ़ेयर नियुक्त किया गया है। वो यह पद संभालने वाली पहली महिला राजनयिक हैं। वहीं उनके पाकिस्तानी समकक्ष साद वाराइच नई दिल्ली में इस्लामिक देश के नए प्रभारी होंगे। वो पाकिस्तान में भारत के वर्तमान मिशन चीफ सुरेश कुमार की जगह लेंगी उनके जल्द ही दिल्ली लौटने की उम्मीद है।

भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के 2005 बैच की अधिकारी श्रीवास्तव वर्तमान में मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स के इंडो-पैसिफिक विंग में संयुक्त सचिव के तौर पर तैनात हैं। वो जल्द ही इस्लामाबाद में अपना पद संभालेंगी।

इससे पहले, 2007-2009 की अवधि के दौरान, उन्होंने चीन में भारतीय दूतावास में दो साल तक अपनी सेवाएँ दीं। इस दौरान उन्होंने अपने विदेशी भाषा प्रशिक्षण के हिस्से के तौर पर मंडारिन सीखी। इसके बाद कोलकाता में क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय और विदेश मंत्रालय में हिंद महासागर क्षेत्र डिविजन में निदेशक के तौर पर काम किया।

पाकिस्तान ने अगस्त 2019 से जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति को खत्म करने वाले अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद द्विपक्षीय राजनयिक संबंधों को कम करने का फैसला किया था। इसके बाद इस्लामाबाद और नई दिल्ली में भारतीय और पाकिस्तानी मिशनों का नेतृत्व उच्चायुक्तों ने नहीं किया।

उच्चायुक्तों की गैरमौजूदगी में सर्वोच्च रैंकिंग वाला राजनयिक चार्ज डी’एफ़ेयर यानी सीडीए होता है जो संयुक्त सचिव-रैंक के समकक्ष अधिकारी होता है। गीतिका मौजूदा वक्त में इसी रैंक की अधिकारी हैं। ये अधिकारी राजदूत या उच्चायुक्त की गैरमौजूदगी में अस्थायी तौर पर किसी विदेशी देश में एक राजनयिक मिशन का चीफ होता है।

पाकिस्तान ने हाल ही में पूर्व पाकिस्तानी प्रभारी सलमान शरीफ को इस्लामाबाद वापस बुला लिया था। पाकिस्तान के आतंकी संगठनों पर हुए सिलसिलेवार आतंकी हमलों के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गए हैं।

काजीरंगा की पहली महिला क्षेत्र निदेशक

असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) को डॉ सोनाली घोष के तौर पर पहली महिला क्षेत्र निदेशक मिल गई है। उन्होंने क्षेत्र निदेशक जतिंद्र शर्मा की जगह शुक्रवार को अपना कार्य प्रभार संभाल लिया है। वो इससे पहले मुख्य वन संरक्षक पद पर अपनी सेवाएँ दे रही थीं। उनकी नियुक्ति का ऐलान 25 अगस्त को असम सरकार ने किया था।

राज्य के पर्यावरण और वन विभाग के आयुक्त और सचिव एमडी फारूक आलम ने बताया कि जतिद्र शर्मा 31 अगस्त को रिटायर हो रहे हैं। वन अधिकारियों ने कहा कि घोष 118 साल पुराने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व के प्रमुख के तौर पर में कार्यभार संभालने वाली पहली महिला बनेंगी।

यहाँ यह भी दिलचस्प बात है कि काजीरंगा का नाम कार्बी नाम की महिला के नाम पर रखा गया है। ये प्राचीन काल में यहाँ शासन करती थीं। आज महिला क्षेत्र निदेशक घोष के आने से ये इतिहास के दोहराव जैसा लग रहा है। घोष 2000-2003 आईएफएस बैच की बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली अधिकारी हैं। केएनपी को 1985 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। ये केएनपी अपने एक सींग वाले गैंडों के लिए दुनिया में मशहूर है।

दुनिया के कई देशों में लागू में है ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’, जानिए भारत में इसे लागू करने के रास्ते में क्या हैं मुश्किलें

भारत सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की संभावनाओं पर विचार करने के लिए एक कमेटी की घोषणा की गई है। यह कमेटी सुझाव देगी कि क्या देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव कराए जा सकते हैं। इस बीच, केंद्र सरकार 18-22 सितंबर तक संसद का विशेष सत्र बुलाया है। इन दोनों चीजों के साथ शुरू होने के बाद कयास लगने शुरू हो गए हैं।

ये पहली बार नहीं है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की बात हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे को कई बार उठा चुके हैं। चुनाव आयोग कई बार इस मुद्दे को उठा चुका है। केंद्र सरकार भी चुनाव आयोग, नीति आयोग और लॉ कमीशन से इस बारे में सवाल पूछ चुकी है। कई समितियाँ भी इसके पक्ष में अपने सुझाव सरकार को सौंप चुकी हैं। ऐसे में ये मुद्दा अचानक से सामने आ है, ऐसा भी नहीं है।

अब चूँकि सरकार ने इसकी संभावनाओं की जाँच के लिए पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में पैनल बनाया है तो ये जानना जरूरी हो जाता है कि क्या ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ संभव है भी? अगर संभव है तो क्या 2024 में ही इसे अमल में लाया जाएगा? क्या इसके लिए देश की सभी एजेंसियाँ तैयार हैं? इस खास लेख में हम इन्हीं सवालों के जवाब आपको दे रहे हैं।

क्या देश में एक साथ सभी चुनाव कराना संभव है?

केंद्र सरकार ने साल 2015 में चुनाव आयोग, नीति आयोग और विधि आयोग से इस बारे में जानकारी माँगी थी कि क्या ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ संभव है? इसके बाद तीनों एजेंसियों ने अपने जवाब सरकार को सौंप दिए थे। इस विषय पर सभी एजेंसियों ने कहा था कि ये बिल्कुल संभव है।

चुनाव आयोग ने कहा था कि इसके लिए संविधान में कुछ परिवर्तन करना होगा। जनप्रतिनिधित्व कानून में कुछ परिवर्तन करने होंगे। अतिरिक्त ईवीएम, वीवीपैट खरीदने या बनवाने के लिए अतिरिक्त धनराशि देनी होगी और एक साथ चुनाव कराने के लिए जो मैन पॉवर चाहिए, जो फोर्स चाहिए उसे बढ़ाना होगा।

लोकसभा चुनाव और 2023 में 5 राज्यों में चुनाव प्रस्तावित, एक साथ कैसे जुड़ेंगे?

पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इंडिया टीवी से बातचीत में बताया कि इस बारे में चुनाव आयोग और नीति आयोग ने कई सुझाव दिए हैं। ये एक राजनीतिक मुद्दा है। चुनाव आयोग और नीति आयोग विकल्प दे सकती है। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को साथ बैठकर चुनना होगा कि किस सुझाव को माना जाएगा।

इसमें एक सुझाव था कि जिन राज्यों की विधानसभा का कार्यकाल 2.5 साल से ज्यादा हो गया है, उन्हें भंग कर दिया जाए। जिनका समय 2.5 साल से कम है, उन्हें आगे बढ़ाया जाए और अगले चुनाव के साथ जोड़ा जाए। भविष्य को लेकर कुछ समस्याएँ भी हैं।

अगर किसी राज्य की विधानसभा या लोकसभा भंग हो जाती है, यानि मध्यावधि चुनाव की नौबत आई तो उसके लिए भी सुझाव दिए गए हैं। जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के संबंधित प्रावधानों में संशोधन के बार इस बार बात साफ हो जाएगी। हालाँकि इस बारे में सार्वजनिक तौर पर जानकारी कम ही मौजूद है।

इसे लागू करने के लिए कानून में बदलाव की जरूरत पड़ेगी, जिसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि सभी राजनीतिक पार्टियों में इसके लिए सहमति बने। सहमति के बगैर चुनाव आयोग पुराने ढर्रे पर ही चलने को मजबूर रहेगा। इसके लिए राज्यों की भी सहमति लेनी पड़ेगी, जिसके लिए कम से कम 50 प्रतिशत राज्यों की सहमति जरूरी है।

साल 2024 में एक साथ चुनाव कराने में सबसे बड़ी समस्या ?

साल 2018 के आँकड़ों के मुताबिक, चुनाव आयोग के पास लगभग 25 लाख ईवीएम-वीवीपैट हैं। फिलहाल इससे भी काम चल जाता है, क्योंकि अभी पूरे देश में एक साथ चुनाव नहीं होते हैं। अगर पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की बारी आएगी तो हर मतदान केंद्र पर दो-दो ईवीएम और 2-2 वीवीपैट एक साथ लगाने होंगे।

ईवीएम-वीपीपैट तुरंत ऑर्डर देने पर बनाए नहीं जा सकते। उसके लिए एक-दो साल का समय लगेगा। अभी जितने भी ईवीएम-वीवीपैट हैं, उससे दोगुने यानि 50 लाख ईवीएम-वीवीपैट की जरूरत होगी। इस सीमा तक पहुँचने में एक से दो साल लग जाएँगे। वहीं, उनकी ट्रेनिंग से लेकर हैंडलिंग तक बड़ी संख्या में मैनपॉवर की जरूरत होगी, जिसकी व्यवस्था करनी पड़ेगी।

विधि आयोग की क्या है राय?

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर विधि आयोग ने साल 2018 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। आयोग ने रिपोर्ट में कहा था कि देश में बार-बार चुनाव कराए जाने से धन और संसाधनों की जरूरत से अधिक बर्बादी होती है। संविधान के मौजूदा ढाँचे के भीतर एक साथ चुनाव करना संभव नहीं है, इसलिए कुछ जरूरी संवैधानिक संशोधन के सुझाव दिए गए हैं।

विधि आयोग ने कहा कि लोकसभा और विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कराए जाने से जनता का पैसा बचेगा, प्रशासनिक भार कम होगा और साथ में सरकारी नीतियाँ बेहतर तरीके से लागू होंगी। एक साथ चुनाव कराए जाने से स्टेट मशीनरी पूरे साल चुनाव की तैयारियों में जुटे रहने के बजाए, विकास के कार्यों में जुट सकेंगी।

देश के शुरुआती चार चुनाव हुए थे साथ

देश में आजादी के बाद लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। देश में पहली बार जब 1951-52 में चुनाव हुए तो पूरे देश में एक साथ चुनाव हुए थे। ये सिलसिला 1957, 1962 और 1967 के आम चुनाव तक चला। साल 1968 और 1969 में समय से पहले कई राज्यों में विधानसभाएँ भंग हो गईं। वहीं, साल 1970 में लोकसभा भी भंग हो गई।

इसके साथ ही ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ का ये सिलसिला टूट गया। इसके बाद साल 1999 में विधि आयोग ने एक साथ चुनाव की सिफारिश की थी। साल 2015 में संसदीय समिति ने भी इसके लिए सुझाव दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने विधि आयोग, चुनाव आयोग और नीति आयोग से इस संबंध में राय माँगी थी।

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के फायदे और नुकसान (पक्ष और विपक्ष)

वन नेशन, वन इलेक्शन के पक्ष में जाने वाली बातें

पैसे और समय की बचत: एक साथ चुनाव कराने से बहुत सारे पैसे बचेंगे क्योंकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए अलग-अलग चुनाव होने वाले चुनाव समाप्त हो जाएँगे। यह समय भी बचाएगा, क्योंकि सरकार को पाँच साल के भीतर कई चुनावी चक्र से होकर नहीं गुजरना पड़ेगा। ऐसे में सरकार को शासन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अधिक समय देगा।

सही उम्मीदवार, पार्टी का चुनाव: एक साथ चुनाव मतदाताओं के लिए उम्मीदवारों को चुनना आसान बनाएगा, क्योंकि वे एक ही समय में राष्ट्रीय और राज्य सरकारों के लिए मतदान करेंगे। इससे मतदाताओं को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किसे वोट देना है।

संघीय प्रणाली होगी मजबूत: एक साथ चुनाव संघीय प्रणाली को मजबूत करेगा, क्योंकि यह राज्यों को राष्ट्रीय राजनीति में अधिक कहने का अधिकार देगा। यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि सभी राज्यों के हितों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व हो।

वन नेशन, वन इलेक्शन के खिलाफ जा सकने वाली बातें:

एक साथ चुनाव कठिन काम: एक साथ चुनाव कराना मुश्किल होगा, क्योंकि इसके लिए संविधान में संशोधन और केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच समन्वय की आवश्यकता होगी। यह एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया होगी।

मतदान प्रतिशत में गिरावट : एक साथ चुनाव मतदान में गिरावट का कारण बन सकता है, क्योंकि लोग अपने स्थानीय प्रतिनिधियों के लिए मतदान नहीं कर रहे होंगे तो वे कम प्रेरित हो सकते हैं। यह एक वैध चिंता है और इसे एक साथ चुनाव लागू किए जाने पर सावधानी से संबोधित करने की आवश्यकता होगी।

राष्ट्रीय दलों को हो सकता है फायदा : राष्ट्रीय दलों के पास क्षेत्रीय दलों की तुलना में अधिक संसाधन, नाम और पहचान है। यह उन्हें एक साथ चुनावों में फायदा दे सकता है, क्योंकि वे अधिक प्रभावी ढंग से प्रचार कर सकते हैं।

दुनिया के कई देशों में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ सिस्टम

भारत में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ को लेकर चर्चा तेज हो गई है तो बताते चलें कि यह व्यवस्था दुनिया के कई देशों में पहले से लागू है। स्वीडन में संसदीय चुनाव के साथ ही काउंटी और म्यूनिसिपल इलेक्शन होते हैं। साउथ अफ्रीका, होंडुरस, स्पेन, स्लोवेनिया, अल्बानिया, पोलैंड में भी यही व्यवस्था है।

ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स, लोकल इलेक्शन और मेयर इलेक्शन एक साथ होते हैं, तो इंडोनेशिया में राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव। इनके अलावा जर्मनी, फिलिपींस, ब्राजील, बोलीविया, कोलंबिया, कोस्टा रिका, ग्वाटेमाला, गुआना, और बेल्जियम जैसे देशों में भी ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ सिस्टम काम करता है।

आखिरकार, एक साथ चुनाव कराने या न कराने का निर्णय एक राजनीतिक निर्णय है। सरकार को पक्ष और विपक्ष को सावधानी से तौलने की आवश्यकता होगी, इससे पहले कि वह कोई निर्णय ले। इस विषय पर सभी राजनातिक पार्टियों का साथ आना भी जरूरी है। हालाँकि आगामी लोकसभा चुनाव यानि 2024 से ही इसे लागू कर दिया जाए, फिलहाल ऐसा होता संभव नहीं दिख रहा है।

लिव इन रिलेशन में था अदनान, रेप केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट से बेल: जज ने कहा – ऐसे रिश्ते विवाह को नष्ट करने का व्यवस्थित डिजाइन  

लिव इन रिलेशनशिप के एक मामले में फैसला सुनाते हुए इलाहबाद हाई कोर्ट ने टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि भारत जैसे देश में मध्यम वर्ग की नैतिकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिश्तों की आलोचना की और कहा, “लिव इन विवाह की संस्था को नष्ट करने के लिए एक व्यवस्थित डिजाइन है, जो समाज को अस्थिर करता है और हमारे देश की प्रगति में बाधा डालता है।”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, हालिया घटनाक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने मंगलवार (29 अगस्त , 2023) को अपनी लिव-इन पार्टनर से बलात्कार के आरोपित अदनान को जमानत दे दी। इस मामले में अदालत का फैसला भारतीय समाज में लिव-इन रिलेशनशिप की जटिलताओं और विवाह के महत्व पर प्रकाश डालता है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में अदनान पर धारा 376 (बलात्कार), 316, 506 आईपीसी (भारतीय दंड संहिता), और POCSO अधिनियम की धारा 3/4 (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम) के तहत आरोप लगे। इस मामले में एक साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने और गर्भवती होने के बाद पीड़िता ने अदनान पर रेप का आरोप लगाया था।

बलात्कार के आरोपित को जमानत देते हुए, इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने अपने आदेश में कहा कि “विवाह संस्था किसी व्यक्ति को जो सुरक्षा, सामाजिक स्वीकृति, प्रगति और स्थिरता प्रदान करती है, वह कभी भी लिव-इन रिलेशनशिप द्वारा प्रदान नहीं की जाती है।”

समाज को अस्थिर करने की योजना

कोर्ट के आदेश में जस्टिस सिद्धार्थ ने कहा, “ऊपरी तौर पर, लिव-इन का रिश्ता बहुत आकर्षक लगता है और युवाओं को लुभाता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है और मध्यमवर्गीय सामाजिक नैतिकता/मानदंड उनके चेहरे पर नजर आने लगते हैं, ऐसे जोड़े को धीरे-धीरे एहसास होता है कि उनके रिश्ते को कोई सामाजिक स्वीकृति नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा, “लिव-इन रिलेशनशिप को इस देश में विवाह की संस्था के फेल होने के बाद ही सामान्य माना जाएगा, जैसा कि कई तथाकथित विकसित देशों में होता है जहाँ विवाह की संस्था की रक्षा करना उनके लिए एक बड़ी समस्या बन गई है। हम भविष्य में अपने लिए बड़ी समस्या खड़ी करने की ओर अग्रसर हैं। इस देश में विवाह की संस्था को नष्ट करने और समाज को अस्थिर करने और हमारे देश की प्रगति में बाधा डालने की योजनाबद्ध योजना बनाई गई है।”

टीवी धारावाहिक विवाह संस्था को पहुँचा रहे नुकसान

जज सिद्धार्थ ने यह भी कहा, “आजकल की फिल्में और टीवी धारावाहिक विवाह की संस्था को खत्म करने में योगदान दे रहे हैं। शादीशुदा रिश्ते में पार्टनर से बेवफाई और उन्मुक्त लिव-इन रिलेशनशिप को प्रगतिशील समाज की निशानी के तौर पर दिखाया जा रहा है। युवा ऐसे दर्शन की ओर आकर्षित हो जाते हैं लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणामों से अनजान होते हैं।”

लिव इन के बाद महिला का विवाह के लिए पुरुष साथी ढूँढना मुश्किल

अपने आदेश में उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ लिव-इन रिलेशनशिप से बाहर आने वाले पुरुषों के लिए शादी या किसी अन्य लिव-इन रिलेशनशिप के लिए महिला साथी ढूँढना मुश्किल नहीं है, वहीं महिलाओं को शादी के लिए पुरुष साथी ढूँढना बहुत मुश्किल है।”

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “…सामाजिक मध्यवर्गीय मानदंड, महिला साथी के धर्म की परवाह किए बिना, उसकी सामाजिक स्थिति को फिर से हासिल करने के उसके प्रयासों के खिलाफ हैं।”

वहीं लिव-इन रिलेशनशिप से बाहर आने वाली महिलाओं के बारे में बात करते हुए कोर्ट ने कहा, “अपवादों को छोड़कर, कोई भी परिवार ऐसी महिला को स्वेच्छा से अपने परिवार के सदस्य के रूप में स्वीकार नहीं करता है। अदालतों में ऐसे मामलों की कोई कमी नहीं है,  जहाँ पूर्व लिव-इन-रिलेशनशिप की महिला साथी सामाजिक बुरे व्यवहार से तंग आकर आत्महत्या कर लेती है।”

गौरतलब है कि लिव इन मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा रेप के आरोपित को जमानत देते हुए की टीवी धारावाहिक , फिल्मों सहित सामाजिक ताने-बाने पर की गई टिप्पणी कई नजीर पेश करती है। 

जहाँ मुस्लिमों ने किया काफिरों का कत्लेआम, करोड़ों खर्च कर उसी नाम का कॉन्ग्रेस CM ने किया उद्घाटन: मैसूर का अल-बद्र चौराहा

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 30 अगस्त 2023 को मैसूर में अल-बद्र सर्कल का उद्घाटन किया। मैसूर के राजीव नगर स्थित अल-बद्र मस्जिद के बिल्कुल पास वाले चौराहे का हाल ही में पुनर्निर्माण किया गया है और इसे अल-बद्र नाम दिया गया है। इसे दुबई के आइकॉनिक लैंडमार्क से प्रेरणा लेकर बनाया गया है।

कर्नाटक की कुछ मीडिया भले ही इसे मैसूर शहर का एक नया आकर्षण बता रही है, लेकिन अल-बद्र शब्द का इस्लामी अर्थ समझने के साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि इसके जरिए हिंदुओं की भावनाओं को भड़काने की कोशिश की गई है।

मैसूर चामराजेंद्र वाडियार सर्कल, कृष्णराज वाडियार सर्कल और जयचामराजा वाडियार सर्कल सहित कई चौक-चौराहों को लेकर प्रसिद्ध है। इन आकर्षक चौराहों का निर्माण वाडियार महाराजाओं द्वारा करवाया गया था। इसके अलावा हाल ही में सरस्वतीपुरम, कुवेम्पुनगर, विवेकानंदनगर, रामकृष्णनगर और शारदादेवीनगर जैसे इलाकों में कई चौराहों का पुनर्निर्माण कराया गया है।

2.47 करोड़ रुपए की लागत से अल-बद्र सर्कल में बनी एक बड़ी केतली ही इसका मुख्य आकर्षण है। यह केतली 8.25 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इसके चारों ओर फव्वारा बनाया गया है। बेंगलुरु स्थित टीमवर्क आर्किटेक्ट्स के आर्किटेक हसीब-उर-रहमान ने यह डिजाइन तैयार की है। अल-बद्र सर्कल के आसपास से गुजरने वाले लोगों को (हिंदुओं को भी) अच्छा दिखाई देता है, लेकिन अधिकांश हिंदू इसके पीछे की सच्चाई नहीं जानते हैं।

क्या है अल-बद्र

अल-बद्र का सीधा मतलब ‘बद्र’ है। बद्र, सऊदी अरब के अल-हिजाज में अल मदीना प्रांत में स्थित एक शहर है। यह इस्लामी पाक शहर मदीना से करीब 130 किलोमीटर दूर स्थित है। इस शहर को ‘बद्र की लड़ाई’ के लिए जाना जाता है। बद्र की लड़ाई मक्का के कुरैश कबीले और मुस्लिमों के बीच हुई थी। कुरैश कबीले कई देवताओं को मानते थे। ऐसे में मुस्लिमों ने उनके खिलाफ जंग छेड़ दी थी। इस लड़ाई में इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद ने मुस्लिमों का नेतृत्व किया था।

बद्र की लड़ाई 13 मार्च साल 624 (इस्लामी कैलेंडर में 17 रमजान) में हुई थी। इस लड़ाई में कुरैश कबीले के 313 लोगों का एक ग्रुप पैगंबर मुहम्मद के नेतृत्व वाली एक बड़ी मुस्लिम सेना के खिलाफ खड़ा था। बद्र की लड़ाई इस्लामी पैगंबर मुहम्मद के साथियों और अनुयायियों द्वारा लड़ी गई पहली लड़ाई है। इस लड़ाई में काफिरों की हत्या की गई थी। इसलिए मुस्लिम इस लड़ाई पर गर्व करते हैं और इस बारे में बढ़-चढ़कर बातें करते हैं।

चूँकि, इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है। इसलिए यह स्पष्ट है कि मैसूर के बद्र चौराहे में कोई प्रतिमा नहीं लगाई गई है, बल्कि अरबी मध्यकालीन शैली की 13 मीटर ऊँची केतली लगाई गई है। इस केतली और अल-बद्र चौक को लेकर यह कहना गलत नहीं होगा कि सिद्धारमैया ने मोमिनों द्वारा काफिरों को मारने की घटना को ही याद दिलाने वाले स्थान का उद्घाटन किया है।

मेरा शाकिब ऐसा नहीं है… अब फंदे पर लटकी मिली पिंकी: जिम में मुलाकात, फिर लिव-इन रिलेशन, परिजन बोले- अब्बा ने सुसाइड के लिए किया मजबूर

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में गुरुवार (31 अगस्त 2023) को पिंकी गुप्ता नाम की एक लड़की की फाँसी पर लटकती लाश मिली है। मृतका पिंकी के परिजनों का कहना है कि वह शाकिब नाम के लड़के के साथ लगभग 4 वर्षों से लिव-इन रिलेशन में रहती थी। मृतका और आरोपित की पहचान एक जिम में हुई थी। पिंकी के परिवार वालों ने शाकिब पर अपनी बेटी की हत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई है। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

मामला गाजियाबद के कौशाम्बी थाने का है। यहाँ वैशाली इलाके में रहने वाले राजू गुप्ता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है कि उनकी 23 वर्षीया बहन पिंकी वैशाली सेक्टर 3 में रहती थी। पिंकी लगभग 4 वर्षों से गाजीपुर निवासी शाकिब से लिव-इन रिलेशन में रह रही थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि शाकिब उनकी बहन को आए दिन न सिर्फ प्रताड़ना देता था, बल्कि आत्महत्या के लिए भी उकसाता था।

कुछ दिन पहले ही पिंकी ने अपने घर वालों को बताया था कि शाकिब और उसके अब्बा मुस्तफा खान उशे आत्महत्या के लिए मजबूर कर रहे हैं। मुस्तफा पर आरोप है कि उसने पिंकी पर अपने बेटे को छोड़ने का दबाव बनाया था। राजू गुप्ता का कहा कि उनकी बहन ने 31 अगस्त की रात लगभग 10:30 बजे पँखे से लटककर आत्महत्या कर ली है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

पुलिस ने राजू गुप्ता की तहरीर पर शाकिब और मुस्तफा खान के खिलाफ इंडियन पीनल कोड- IPC की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत FIR दर्ज कर ली है। इस मामले पर जानकारी देते हुए ACP इंदिरापुरम ने बताया कि पुलिस को घटना की सूचना 31 अगस्त को रात 11 से 11:30 के बीच मिली।

उन्होंने कहा कि सूचना पर पहुँची पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। कमरे की तलाशी के तौर पुलिस को मृतका की एक डायरी मिली है। पिंकी साल 2021 से इस डायरी को मेंटेन कर रही थी। डायरी में कई पन्ने लिखे हुए हैं, जिसे पुलिस पढ़ कर जाँच कर रही है। वहीं, मुख्य आरोपित शाकिब को गिरफ्तार कर लिया गया है।

ऑपइंडिया ने शिकायतकर्ता राजू गुप्ता से इस मामले में बात की। राजू गुप्ता ने बताया कि उनकी बहन कौशाम्बी के शॉप्रिक्स मॉल स्थित जिस रेड रॉक्स जिम में नौकरी करती थी, वहाँ शाकिब एक्सरसाइज करने आता था। यही पर दोनों की जान-पहचान हुई थी, जो बाद में लिव इन रिलेशनशिप तक पहुँच गई।

शाकिब का मूल काम दिल्ली के गाजीपुर में डेयरी का है। दर्ज FIR पर राजू गुप्ता ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अगर चोटें आईं तो वो उस हिसाब से शाकिब कर कार्रवाई करवाएँगे। दूसरा आरोपित शाकिब का अब्बा मुस्तफा खान फिलहाल अभी नहीं पकड़ा गया है।

संसद के विशेष सत्र में क्या करेगी मोदी सरकार, कई बिलों को लेकर कयास: जानिए कब-कब और क्यों बुलाए गए विशेष सत्र

मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर सभी को चौंका दिया है। 18-22 सितंबर तक आयोजित होने वाले इस सत्र को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि मोदी सरकार, ‘एक देश, एक चुनाव’, ‘सामान नागरिक संहिता’, ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ या फिर ‘महिला आरक्षण’ संबंधी बिल पेश कर सकती है। कयास यह भी है कि विशेष सत्र नए संसद भवन में हो सकता है।

संसद के विशेष सत्र को लेकर जानकारी देते हुए संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने एक्स पर लिखा, “संसद का विशेष सत्र (17वीं लोकसभा का 13वाँ सत्र और राज्यसभा का 261वाँ सत्र) 18 से 22 सितंबर तक बुलाया गया है। इसमें 5 बैठकें होंगी। अमृत काल के दौरान संसद में सार्थक चर्चा और बहस की उम्मीद है।” जोशी ने विशेष सत्र में 5 बैठक होने की जानकारी तो दी, लेकिन यह नहीं बताया कि इस सत्र को लेकर सरकार की क्या योजना है।

संसद सत्र

संसद का कोई भी सत्र बुलाने का अधिकार सरकार के पास होता है। संविधान के अनुच्छेद-85 में इसका प्रावधान किया गया है। सत्र बुलाने जाने पर संसदीय मामलों की समिति इससे जुड़े फैसले लेती है। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक सहमति दी जाती है।

अनुच्छेद-85 के अनुसार, सदन के दो सत्रों के बीच 6 महीने से अधिक का समय नहीं होना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि एक साल में दो बार सदन का सत्र जरूर लगना चाहिए। भारत में आमतौर पर तीन बार संसद सत्र होता है। बजट सत्र, मानसून सत्र, शीतकालीन सत्र। हालाँकि, यदि कभी सरकार ऐसा नहीं कर पाती है तो राष्ट्रपति के पास स्वविवेक से संसद सत्र बुलाने का अधिकार है।

विशेष सत्र

जब सरकार को लगता है कि किसी मुद्दे पर विशेष सत्र बुलाने की आवश्यकता है, तब सरकार इसको लेकर राष्ट्रपति या स्पीकर को सलाह देती है। इसके बाद राष्ट्रपति या सदन के स्पीकर विशेष सत्र बुला सकते हैं। हालाँकि, इसके लिए सदन के कम-से-कम 10% सदस्यों यानि सांसदों को राष्ट्रपति या स्पीकर को सूचना देनी होती है।

कब-कब बुलाया गया विशेष सत्र

26-27 नवंबर 2015: डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए लोकसभा और राज्यसभा में दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाया गया था। इस सत्र का विषय संविधान के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता पर चर्चा करना था।

जुलाई 2008: जब मनमोहन सरकार से वामपंथी पार्टियों ने समर्थन वापस लिया था, तब लोकसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था।

26 अगस्त से 1 सितंबर 1997: भारत की आजादी के 50 साल पूरे होने के मौके पर इस विशेष सत्र का आयोजन किया गया था। 6 दिन चले इस सत्र का एजेंडा देश की उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित करना तथा विकास के राह में आगे बढ़ने को लेकर चर्चा करना था।

नवंबर 1962: भारत-चीन युद्ध के बीच पूर्व प्रधानमंत्री नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार पर दबाव बनाया था। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को संसद का विशेष सत्र बुलाना पड़ा था। इस सत्र का एजेंडा भारत-चीन युद्ध की स्थिति पर चर्चा करना था।

आधी रात को विशेष सत्र

14-15 अगस्त 1947: देश की आजादी की पूर्व संध्या पर भारतीय संसद का पहला सत्र आयोजित किया गया था।

14-15 अगस्त 1972: यह सत्र भारत की स्वतंत्रता के 25 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाने के लिए आयोजित किया गया था।

9 अगस्त 1992: ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 50वीं वर्षगाँठ  के अवसर पर संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था।

14-15 अगस्त 1997: देश की आजादी के 50वर्ष पूरे होने का जश्न मनाने के लिए सरकार ने सदन का विशेष सत्र बुलाया गया था।

30 जून 2017: देश में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानि जीएसटी लागू होने पर मोदी सरकार ने आधी रात को संसद का सत्र बुलाया था।

गौरतलब है कि कई बार ऐसा भी हुआ है, जब लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अलग-अलग विशेष सत्र आयोजित किए गए हैं। भारतीय संसद की पहली बैठक की 60वीं वर्षगाँठ मनाने के लिए 13 मई 2012 को लोकसभा ने संसद का विशेष सत्र बुलाया था। इसके अलावा, साल 1977 और 1991 में लोकसभा भंग होने के चलते राज्यसभा में विशेष सत्र आयोजित किए गए थे। 2

इसी तरह, 8 फरवरी और 1 मार्च 1977 का विशेष सत्र तमिलनाडु और नागालैंड में राष्ट्रपति शासन को आगे बढ़ाने के लिए बुलाया गया था। वहीं, 3-4 जून 1991 को हरियाणा में राष्ट्रपति शासन को मंजूरी देने के लिए राज्यसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था।