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गुजरात पुलिस ने दंगाई अब्दुल रशिद शेख को पकड़ा: वडोदरा में रामनवमी की शोभायात्रा पर किया था पथराव, पुलिस से रायफल छिनने की कोशिश भी की थी

गुजरात के वडोदरा में रामनवमी के अवसर पर निकाली गई शोभायात्रा पर मस्जिद के सामने पत्थरबाजी की गई थी। इसके बाद इलाके में तनाव फैल गया था। जब हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस बल ने कार्रवाई शुरू को पुलिस जवानों की रायफलें छिनने की भी कोशिश की गई थी। इस मामले में वडोदरा पुलिस ने अब्दुल शेख रशीद नाम के शख्स को गिरफ्तार किया है।

हिंसा में शामिल आरोपितों की पहचान CCTV के फुटेज के आधार पर की गई है। इसके बाद पुलिस ने छापेमारी करके आरोपियों की धरपकड़ शुरू की है। इस सिलसिले में गुजरात पुलिस ने अब्दुल रशीद शेख को मंगलवार (11 अप्रैल 2023) को गिरफ्तार कर लिया।

बता दें कि शोभायात्रा पर मस्जिदों एवं अन्य जगहों से पथराव के बाद जब पुलिस ने कार्रवाई शुरू की थी मुस्लिम महिलाओं ने पुलिस का रास्ता रोक लिया था। इतना ही उन्होंने पुलिस के साथ बदतमीजी भी की और उन्हें गालियाँ भी दीं। इन घटनाओं को लेकर कई वीडियो सामने आए थे।

सामने आए वीडियो में दिख रहा था कि शोभा यात्रा पर पथराव सिर्फ मस्जिद के आसपास की छतों से ही नहीं, बल्कि मस्जिद से भी की गई। वीडियो में नमाजी टोपी पहना एक शख्स मस्जिद से शोभायात्रा में शामिल लोगों पर पत्थर फेंकता है और फिर भाग जाता है।

शोभा यात्रा पर पथराव करने वाले अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस जब मुस्लिम इलाके में गई तो मुस्लिम महिलाओं ने उन्हें घेर लिया। कट्टरपंथी मुस्लिम महिलाएँ पुलिस के सामने ना सिर्फ चीख-चिल्ला रही थीं, बल्कि ‘पत्थर मारो सालों को’ कहकर गाली भी दे रही थीं।

बता दें कि 30 मार्च 2023 को देश भर में हर्ष और उल्लास के साथ रामनवमी मनाया गया, लेकिन कुछ राजनीतिक वजह से और कुछ कट्टरपंथियों की मजहहबी वजह से कई राज्यों में शोभा यात्रा पर हमले किए गए। बंगाल में सीएम ममता बनर्जी द्वारा जूलुस को मुस्लिम इलाके में ले जाने की धमकी के बाद वहाँ बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी। कट्टरपंथियों ने उनके बयान को सहयोग माना। वडोदरा में यही हालत रही।

प्रियंका गाँधी का ‘अहिंसा से मिली आज़ादी’ वाला झूठ: ये वायनाड के जनजातीय समाज का भी अपमान, आंबेडकर ने भी कहा था – अहिंसा से सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के मध्य में स्थित गणेश चंद्र एवेन्यू के पास एक INOX का एक सिनेमा हॉल है। इसके पास ही आपको 4 लोगों की प्रतिमाएँ दिखेंगी, साथ ही एक अजीब सी बंदूक की तस्वीर। बहुतों को इसके बारे में नहीं पता। इसका सम्बन्ध 26 अगस्त, 1914 से है जब कोलकाता के बीबीडी बाग़ में कुछ क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश गन स्टोर ‘रोड्डा एन्ड कंपनी’ से भारी मात्रा में हथियार लूटे थे। इनमें से कई क्रांतिकारियों में बाँटे गए, तो कई अंग्रेजों ने जब्त कर लिए।

हथियारों को ठिकाने लगाने में ‘गीताप्रेस’ के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार ने भी क्रांतिकारियों की मदद की थी। अंग्रेजों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, “डकैती/हत्या/हत्या के प्रयास के 54 मामलों में रोड्डा से लूटे गए पिस्तौलों का इस्तेमाल किया गया।” रास बिहारी बोस से लेकर बाघा जतिन तक, कइयों ने इन बंदूकों का इस्तेमाल किया। ये चारों मूर्तियाँ बिपिन बिहारी गांगुली, अनुकूल मुखर्जी, गिरीन्द्र नाथ बनर्जी और हरिदास दत्ता की हैं, जिन्होंने इस लूटकांड को अंजाम दिया था।

अब चलते हैं वायनाड, केरल की वो सुंदर जगह जहाँ से राहुल गाँधी ने 2019 में लोकसभा चुनाव जीता था। समय 102 साल और पीछे, सन् 1812 में। ये वो साल था, जब केरल की कुरुचियार जनजातीय समूह ने अंग्रेजों के खिलाफ बड़ा विद्रोह किया था। ये इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलता। इसके अलावा एक और जनजातीय समुदाय है यहीं का – कुरुमा। उसने भी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के खिलाफ युद्ध छेड़ा था। थालाक्कल चंदू और रमन नाम्बि इस संघर्ष के नायक थे।

‘कोलपयट्टु’ नामक मर्शक आर्ट की लड़ाई में दक्ष नाम्बि के नेतृत्व में जनजातीय समाज के लोगों ने अंग्रेजों से जम कर लोहा लिया था। तीर-धनुष और भाले चलाने का प्रशिक्षण उन्होंने अपने समाज के लोगों को दिया। तब चिन्गेरी, पोक्कम, मुद्रामूला, गणपतवट्टोम और मुट्टी जैसी जगहों पर अंग्रेजों से जनजातीय समाज की लड़ाई हुई। उनकी मौत के बाद अंग्रेजों ने उनके सिर को काट कर उनके छोटे से बेटे के सामने प्रदर्शनी लगा दी थी, ताकि लोगों में भौ फैले। उत्तरी वायनाड और कूर्ग की सीमा पर उनकी मृत्यु हुई थी।

अब चलते हैं कर्नाटक के शिवमोगा में। यहाँ एक जगह है ईस्सूर, जहाँ अंग्रेजों की फ़ौज ने जम कर तबाही मचाई थी। चूँकि क्रांतिकारी आसपास के जंगलों में छिपे हुए थे, महिलाओं को अंग्रेजों ने शिकार बनाया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और उनके घरों को आग के हवाले कर दिया गया। 20 निर्दोषों को मार डाला गया। नाबालिगों को गिरफ्तार किया गया। ये घटना आज़ादी के आंदोलन के अंतिम चरण की है, 1942-43 की।

अंग्रेजों ने लोगों ने घरों से बाहरी मात्रा में लूट को अंजाम दिया था। रुपए और आभूषण लूट लिए गए थे। जमींदारों के घरों में भी छापेमारी कर के उन्हें प्रताड़ित किया गया था। दर्जनों को बेंगलुरु के सेन्ट्रल जेल में भेज दिया गया था। इन सबका कारण था – गाँव ने 1942 में खुद को आज़ाद घोषित कर दिया था। यहाँ के स्वतंत्रता सेनानियों को उचित सम्मान नहीं मिला। पूरे कर्नाटक को ईस्सूर से प्रेरणा मिली। एक कहावत चलने लगी कि पूरा कर्नाटक दे देंगे लेकिन ये जगह नहीं।

पश्चिम बंगाल, केरल और कर्नाटक की इन 3 घटनाओं का जिक्र करने के पीछे एक कारण है। पहली घटना बताती है कि क्रांतिकारियों को हथियारों की सख्त ज़रूरत थी, इसीलिए इस तरह की कई लूट की घटनाओं को अंजाम दिया गया। हथियार क्यों, अंग्रेजों से लड़ने के लिए। दूसरी घटना बताती है कि सुदूर जंगलों के आदिवासी भी बरछे-धनुष लेकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए हुए थे। तीसरी घटना बताती है कि क्रांतिकारियों से अंग्रेजों को इतनी दिक्कतें थीं कि उनके महिलाओं-बच्चों तक को वो नहीं छोड़ते थे।

हमें इन तीनों घटनाओं को इसीलिए याद करानी पड़ रही है, क्योंकि कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने वायनाड में एक भाषण देते हुए कहा है कि भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन अहिंसा पर आधारित था। राहुल गाँधी भी कई बार इस झूठ को दोहरा चुके हैं। क्या ये उन क्रांतिकारियों का अपमान नहीं है, जिन्हें अंग्रेजों ने फाँसी पर लटका दिया? क्या ये उनके परिवारों का अपमान नहीं, जिन्होंने देश के लिए उनके योगदान का परिणाम उन्हें खो कर चुकाया?

पूछने को तो पहला सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि अगर अहिंसा से आज़ादी मिली तो भगत सिंह, राजदुरु और सुखदेव ने किस चीज के लिए हँसी-ख़ुशी फाँसी के फंदे पर झूलना पसंद किया? सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी से लेकर जापान तक की यात्रा कर के एक संगठित सेना किसलिए बनाई? मंगल पांडेय ने विद्रोह का कौन सा बिगुल फूँका था? झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने बेटे को पीठ पर लाद कर युद्ध क्यों लड़ा था? इतनी कम उम्र में खुदीराम बोस ने क्यों बलिदान दिया?

आज़ादी उनलोगों ने नहीं दिलाई, जो कहते थे कि अहिंसा ही हमारा हथियार होना चाहिए लेकिन भारतीयों को विश्व युद्ध में अंग्रेजों के लिए लड़ने को भेज देते थे। ये कैसी अहिंसा? आज़ादी उनलोगों ने भी नहीं दिलाई, जो 12 दिन जेल में रह जाते थे तो उनका खानदान दिन-रात एक कर के उन्हें निकालता था। आज़ादी उस पार्टी ने भी नहीं दिलाई, जिसने देश को खंडित कर दिया। आज़ादी उनलोगों ने भी नहीं दिलाई, जो क्रांतिकारियों का केस तक लड़ने से इनकार कर देते थे।

इस झूठ को कॉन्ग्रेस पोषित वामपंथी इतिहासकारों ने इतनी बार पढ़ाया और दोहराया है कि लोगों के मन में बैठने लगा कि अहिंसा से ही आज़ादी मिली। कुछ इसी तरह का झूठ अंग्रेजों के समय भी फैलाया गया था, उनके द्वारा ही। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को ‘सिपाही विद्रोह’ बताया गया। वो तो भला हो वीर विनायक दामोदर सावरकर का, जिन्होंने लंदन में गहरा रिसर्च कर के पुस्तक लिखा और अंग्रेजों के इस प्रोपेगंडा का पर्दाफाश कर दिया।

कुल मिला कर बात ये है कि न तो आज़ादी अहिंसा से मिली और न ही कॉन्ग्रेस पार्टी ने दिलाई। खुद बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने लिखा है कि अहिंसा से सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। अहिंसा के धर्म को भी पालन करना उन्होंने अंसभव बताया है, क्योंकि कई ऐसे जीव हैं जो आँखों से दिखते भी नहीं। उन्होंने पूछा था कि कोई आपके घर में घुस कर आपकी पत्नी या बेटी का बलात्कार करे, तो क्या आप अहिंसा के धर्म का पालन करेंगे।

डॉ आंबेडकर की शब्दों में, “धर्मग्रंथ भी बुरे की हत्या को स्वीकृति देते हैं। सीमित दायरों में आधुनिक कानून भी इसे मंजूरी देता है। यदि आत्मरक्षा के लिए हिंसा के अलावा कोई चारा ही नहीं है, तो हिंसा का प्रयोग करना ही पड़ेगा।” उन्होंने अहिंसा की व्यापक परिभाषा को समझने पर जोर देते हुए कहा था कि महात्मा गाँधी जिसे अहिंसा कहते हैं, वो भी पूरी तरह अहिंसा नहीं है, क्योंकि किसी को दुःख पहुँचे तो वो भी हिंसा ही है।

रवि बिश्नोई सहित LSG के खिलाड़ियों ने अयोध्या में भगवान राम का किया दर्शन, बन रहे राम मंदिर में भी घूमे: IPL 2023 में No.1 पर है टीम

IPL 2023 में लखनऊ सुपर जायंट्स (Lucknow Super Giants- LSG) की टीम चार में से तीन मैच जीतकर टॉप पर है। सोमवार (10 अप्रैल 2023) को टीम ने एक रोमांचक मुकाबले में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) को मात दी। इस जीत से टीम के खिलाड़ियों का मनोबल अपने शिखर पर है। इसी बीच LSG की टीम के खिलाड़ी अयोध्या पहुँचकर भगवान राम के दर्शन किए।

लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाड़ी रवि बिश्वोई, सहायक कोच विजय दहिया सहित टीम के अन्य सदस्यों की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इस तस्वीर में खिलाड़ी सुरक्षाकर्मियों के साथ नजर आ रहे हैं। इनके हाथों में हेलमेट भी है।

दरअसल, अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर के निर्माण का काम जारी है। इसलिए जब ये खिलाड़ी वहाँ पहुँचे तो सुरक्षा कारणों से इन्हें हेलमेट पहनकर अंदर जाने की इजाजत मिली होगी। इस तस्वीर को रवि दहिया ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर डाला था। इसके बाद यह तस्वीर वायरल हो गई।

केएल राहुल की अगुवाई वाली यह फ्रेंचाइजी पिछले सीजन से काफी परिपक्वता दिखाई है। आखिरी गेंद पर रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर पर LSG की जीत ने एक बार फिर अपनी साख साबित कर दी। लखनऊ स्थित फ्रेंचाइजी इस बार अपने पहले खिताब की तलाश में है।

LSG टीम में कैप्टन केएल राहुल के अलावा क्विंटन डी कॉक, मनन वोहरा, निकोलस पूरन, आयुष बडोनी, कृष्णप्पा गौतम, दीपक हुड्डा, काइल मेयर्स, क्रुणाल पांड्या, करण शर्मा, मार्कस स्टोइनिस, रोमारियो शेफर्ड, डेनियल सैम्स, प्रेरक मांकड़, स्वप्निल सिंह, युधवीर चरक, आवेश खान, मोहसिन खान, रवि बिश्नोई, मार्क वुड, मयंक यादव, जयदेव उनादकट, यश ठाकुर, अमित मिश्रा, नवीन-उल-हक शामिल हैं।

टीम के कुछ सदस्यों की भगवान राम के दर्शन की तस्वीर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर तरह-तरह के कमेंट कर रहे हैं। SarcasticCowboy नाम के हैंडल ने लिखा, “अगले मैच में बिश्नोई की हैट्रिक पक्की है।” वहीं, राघव नाम के यूजर ने लिखा है कि इसीलिए LSG टॉप पर रहै।

संकल्प दुबे नाम के यूजर ने लिखा, “अगर वे आईपीएल 2023 जीत जाते हैं तो आश्चर्य नहीं होगा। वे पहले से ही आगे चल रहे हैं। कप्तान के बिना भी धार्मिक मूल्यों वाली एक टीम। सच में रामचंद्र के भरोसे।”

ज्ञापन देने गए हिन्दू कार्यकर्ता, लेकिन झारखंड पुलिस ने वकील सहित कर लिया गिरफ्तार: एक तो 2 दिन पहले ही माँ का श्राद्ध कर लौटा था, कोर्ट में कामकाज बंद

झारखंड के जमशेदपुर में हुई सामप्रदायिक हिंसा मामले में SSP से मिलने गए 1 वकील सहित हिन्दू संगठन से जुड़े 7 युवकों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया है। इन पर हत्या के प्रयास सहित अवैध हथियार रखने और विस्फोटक अधिनियम की धाराएँ लगा दी गईं हैं। जेल भेजे गए आरोपितों ने खुद को बेगुनाह बताते हुए पुलिस के रैवैये को गलत बताया है। इन सभी को सोमवार (10 अप्रैल, 2023) को हिरासत में लिया गया था।

जमशेदपुर पुलिस के इस कदम के खिलाफ जिला अदालत के वकीलों ने भी नाराजगी जताई है। अधिवक्ताओं द्वारा कोर्ट में प्रदर्शन कर के आक्रोश जताया गया और आंदोलन की चेतावनी दी गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार को अधिवक्ता चंदन चतुर्वेदी के नेतृत्व में हिन्दू संगठनों का एक समूह जमशेदपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिलने उनके ऑफिस गया था। वकील के अलावा 7 अन्यत लोगों में अनिरुद्ध गिरी, चंदन दास, भोला लोहार, भीम यादव, कन्हैया पांडेय, शंकर राव और राजेश चौबे शामिल हैं। ये सभी SSP प्रभात कुमार को शास्त्रीनगर में रविवार की रात दो गुटों में हुई झड़प के मामले में माँग पत्र सौंपना चाहते थे। आरोप है कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के ऑफिस से ही इन सभी को हिरासत में ले लिया गया।

सभी 8 लोगों पर 24 घंटे के बाद हत्या का प्रयास, आर्म्स एक्ट, विस्फोटक एक्ट की धारा लगा कर FIR दर्ज कर ली गई। इसमें वकील के अलावा अन्य सदस्य ‘विश्व हिंदू परिषद’ और गोरक्षा आंदोलन से जुड़े हुए थे। बाद में मंगलवार (11 अप्रैल 2023) को इन सभी को जेल भेज दिया गया। गिरफ्तार लोगो में अनिरुद्ध गिरी के बारे में बताया जा रहा है कि वो 2 दिन पहले अपनी माँ का श्राद्ध कर्म कर के लौटे थे। भाजपा विधायक सरयू राय ने पुलिस के इस रवैये पर हैरानी जताई है। उन्होंने कहा कि SSP से मिलने गए वकील को भी जेल भेज दिया गया।

जेल जाने के दौरान वकील ने और अन्य आरोपितों ने खुद को बेगुनाह बताया। उन सभी ने SSP ऑफिस में लगे CCTV की जाँच की माँग की है। उनका कहना है कि SSP के ऑफिस के गेट पर उन्हें मिलाने के बहाने हिरासत में ले लिया गया। हिरासत से पहले सभी आरोपितों का फोन ले लेने का आरोप लगाया गया है। वकील ने इस हरकत को एमरजेंसी जैसा बताया। वकील के मुतबिक एक रात पहले कदमा से विश्व हिन्दू परिषद के कुछ कार्यकर्ताओं को उठाया गया था जिसकी वजह पूछ्ने वो लोग ऑफिस गए थे। वहीँ एक हिंदूवादी कार्यकर्ता के अनुसार, उन्हें एसएसपी ऑफिस से ही बुलाया गया था। सभी आरोपितों ने अपने साथ दुर्व्यवहार की शिकायत की है।

पुलिस की इस कार्रवाई पर जमशेदपुर कोर्ट के वकीलों ने नाराजगी जताई है। वकीलों ने कोर्ट में कामकाज बंद रखा और ‘पुलिस प्रशासन होश में आओ’ के नारे लगाए। वकील चंदन चौबे को हथकड़ी लगा कर जेल भेजे जाने से अधिवक्ताओं ने नाराजगी जताई।

वकीलों के मुताबिक महज ज्ञापन देने गए उनके साथी वकील को हिरासत में लिया गया और झूठे मामले में 24 घंटे बाद जेल भेजा गया। नाराजगी जताते हुए वकीलों ने कहा कि अगर वकील को हथकड़ी लगाने वाले पुलिस वालों पर कार्रवाई नहीं की गई तो अदालत में न्यायिक कार्य बंद रखा जाएगा।

हिंदुओं पर झूठे मुकदमे, दंगा भड़काने में CM ममता बनर्जी का हाथ: रामनवमी हिंसा पर फैक्ट फाइंडिंग कमिटी की रिपोर्ट, खुलासा – डर से शिकायत तक करने नहीं गए हिन्दू पीड़ित

पश्चिम बंगाल के हावड़ा और हुगली में रामनवमी के अवसर पर हुई हिंसा के लिए मानवाधिकार आयोग की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने ममता सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश नरसिम्हा रेड्डी के नेतृत्व में छह सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगे पूर्व नियोजित थे जिन्हें सुनियोजित तरीके से भड़काया गया था। अपने रिपोर्ट में आयोग ने राज्य पुलिस की तटस्थता को लेकर भी सवाल खड़े किए थे।

फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के अलावा कलकत्ता हाई कोर्ट भी हिंसा को पूर्व नियोजित करार दे चुकी है। कलकत्ता हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम ने कहा कि यदि छतों से पत्थर फेंके गए। तो जाहिर है पत्थरों को 10-15 मिनट में छत पर नहीं ले जाया जा सकता था। कलकत्ता उच्च न्यायालय और फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट ने बंगाल हिंसा पर पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। साथ ही हिंसा के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने वाले ममता बनर्जी और पूरे इको सिस्टम का भी भंडाफोड़ कर दिया।

ऑपइंडिया के पास मानवाधिकार आयोग की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की पूरी रिपोर्ट उपलब्ध है। कमेटी द्वारा दिए गए विवरण और माँगो को हम संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार-

1.बंगाल में हुई हिंसा का मुख्य कारण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा रामनवमी से पहले दिया गया घोर भड़काऊ भाषण था। रिपोर्ट के अनुसार सीएम ममता केंद्र सरकार के खिलाफ एक दिन के धरने पर बैठी थीं। इस दौरान उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि मुस्लिम इलाकों से गुजरने वाले जुलूस पर कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद शांतिपूर्वक शोभा यात्रा पर भीड़ हमला कर देती है। राज्य की पुलिस दंगाइयों को नियंत्रित करने में न सिर्फ विफल रही बल्कि मौके से गायब रही।

2.ममता बनर्जी हिंसा के बाद राम भक्तों को दोषी ठहराने के लिए आरोप लगा रही हैं कि अंतिम समय में शोभा यात्रा का मार्ग बदल दिया गया। जबकि कमेटी की रिपोर्ट में इस दावे को खारिज किया गया है। पीड़ितों और शोभा यात्रा में शामिल लोगों के अनुसार किसी मार्ग को अंतिम समय में नहीं बदला गया। राज्य पुलिस को इस मार्ग के बारे में पहले ही सूचित कर दिया गया था। पुलिस द्वारा इसकी स्वीकृति भी दी गई थी।

3.रिपोर्ट से पता चलता है कि हिंदुओं ने शोभा यात्रा पर संभावित खतरे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा माँगी थी। शोभा यात्रा आयोजकों के अनुसार पिछले साल भी उनकी यात्रा को निशाना बनाया गया था इसलिए पुलिस से अतिरिक्त सुरक्षा माँगी गई जिसे देने में राज्य की पुलिस विफल रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार की विफलता के कारण ही शोभा यात्रा निकालने वालों पर भारी पथराव किया गया। पथराव के कई वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं।

  1. रिपोर्ट में पुलिस पर जानबूझकर पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार शोभा यात्रा को पर्याप्त सुरक्षा न दिया जाना और दंगाईयों के खिलाफ कार्रवाई न करना इसी तरफ इशारा करता है।
  2. रिपोर्ट में कहा गया है कि रामनवमी के बाद भी सीए ममता बनर्जी बिना किसी जाँच के हिंसा के लिए हिदुओं को दोष देती रहीं। ममता बनर्जी ने कहा कि रमजान के महीने में मुस्लिम गलत हरकत नहीं कर सकते। उनके एक तरफा बयान दंगाईयों का हौसला बढ़ा रहे थे और रामनवमी के कई दिनों बाद तक बंगाल के कई इलाके हिंसा की आग में जलते रहे।
  3. रिपोर्ट में हिंसा के लिए ममता बनर्जी के एक और बयान को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस वीडियो में ममता बनर्जी अल्पसंख्यकों को कानून हाथ में लेकर दंगाईयों ( बंगाल के सीएम के अनुसार हिंदुओं) को सबक सिखाने की बात कर रही हैं। अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए ममता लगातार ऐसे बयान दे रही हैं। जिससे समाज के बड़े वर्ग में असंतोष फैले और असमाजिक तत्वों का मनोबल बढ़े।
  4. कमेटी के अनुसार ममता बनर्जी न सिर्फ जाँच को प्रभावित कर रही थीं बल्कि अपने नफरती भाषणों से धार्मिक आधार पर भीड़ को उकसा रही थीं। रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के कई वीडियो वायरल हैं जो धार्मिक आधार पर हिंसा और हत्या को प्रोत्साहित करने वाले हैं।
  5. रिपोर्ट में ममता बनर्जी के उस भाषण की बात प्रमुखता से की गई है जिसमें वे अल्लाह’ का जिक्र करते हुए शोभा यात्रा निकालने वालों के खिलाफ मुस्लिमों को भड़का रही हैं। सीएम ममता उन्हें जुलूस निकालने वालों को दंगाबाज (दंगाई) कहते हुए खत्म करने की बात कह रही हैं।
  6. रिपोर्ट में कहा गया है कि CISF सुरक्षा होने के बावजूद विधायक बिमन घोष भी हिंसा में घायल हो गए थे इससे राज्य पुलिस की मंशा जाहिर होती है। इस आधार पर पुलिस पर सांप्रदायिक तत्वों के समर्थन का आरोप लगाया गया है।
  7. रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार और राज्य पुलिस के पक्षपात पूर्ण रवैया के कारण पीड़ित पक्ष पुलिस की मदद के लिए आगे नहीं आया। डर के मारे कई मामलों की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं कराई गई। रिपोर्ट के अनुसार पुलिस पीड़ितों की मदद करने की जगह उन्हें झूठे केस में फँसाने की धमकी देती है। बंगाल के लोग राज्य मशीनरी के गुंडों को भय में रहने को मजबूर हैं।
  8. रिपोर्ट में कही गई अहम बातों में से एक यह भी है कि पश्चिम बंगाल पुलिस झूठी गिरफ्तारियाँ कर रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस अपनी नाकामियाँ छिपाने के लिए धारा 144, सीआरपीसी और विचाराधिन मामलों की आड़ ले रहा है।
  9. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस के आला ऑफिसर भी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि चंदननगर पुलिस आयुक्त (Commissioner of Police) अमित पी जवालगी और हावड़ा पुलिस आयुक्त प्रवीण कुमार त्रिपाठी दंगा नियंत्रण में अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा सके। जिन क्षेत्रों में हिंसा की सूचना मिली थी वहाँ पुलिस द्वारा बहुत देरी से कार्रवाई की गई। कमेटी के लोगों को दंगा प्रभावित इलाके का दौरा न करने देना भी दर्शाता है कि पुलिस के वरिष्ठ ऑफिसर राज्य सरकार को खुश करने के लिए काम कर रहे हैं।
  10. दावा है कि जब कमेटी को लोगों को चंदननगर पुलिस आयुक्त अमित जवालगी और हावड़ा पुलिस आयुक्त प्रवीण त्रिपाठी ने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने की इजाजत नहीं दी। पुलिस की तरफ से उन्हें उन स्थानों पर न जाने के लिए लेटर जारी कर दिया गया। इसे बाद कमेटी की तरफ से खतों का जवाब दिया गया। जब पुलिस की तरफ से पत्राचार नहीं हुआ तो लोग प्रभावित इलाकों का दौरा करने पहुँचे। पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद टीम के मेंबर एक अस्पताल पहुँचे जहाँ एक हिंदू युवक गंभीर रूप से घायल था। अस्पताल में बताया गया कि गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी पुलिस ने उस युवक की शिकायत दर्ज नहीं की थी।
  11. ऑपइंडिया को प्राप्त कमेटी की रिपोर्ट में विस्तार से उस घटना की जानकारी दी गई है कि कैसे 8 और 9 अप्रैल को बंगाल पुलिस ने टीम के मेंबरों को प्रभावित इलाकों में जाने से रोक दिया था। कमेटी द्वारा बंगाल पुलिस को यह प्रस्ताव दिया गया था कि पुलिस की टीम चाहे तो उनके साथ दंगा प्रभावित इलाकों में चल सकती है। इस अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया गया। जिससे पुलिस की भूमिका संदेहास्पद हो जाती है।

रिपोर्ट के अनुसार, चूँकि समिति को हिंसा वाले इलाकों में जाने नहीं दिया गया इसलिए पीड़ितों को खुली पेशकश की गई कि वे अपनी सुविधानुसार समिति के मेंबरों से मिल सकते हैं। इसके बाद सांप्रदायिक दंगों के 24 पीड़ितों ने एक निजी और सौहार्दपूर्ण बातचीत में समिति से मिलने की इच्छा जाहिर की। पीड़ितों में से कुछ लोग ऐसे थे जो हावड़ा के शिवपुर शोभा यात्रा में शांतिपूर्ण रूप से शामिल हो रहे थे और कुछ लोग वो थे जो यात्रा में शामिल लोगों को पानी और फल उपल्बध कराने जैसी सेवा दे रहे थे। पीड़ितों ने बताया कि उनके पास हथियार होने का प्रश्न ही नहीं था। यात्रा हर साल निकाली जाती है। रास्ते भी वही होते हैं। विगत कुछ सालों से यात्रा को निशाना बनाया जाने लगा है। रामनवमी वाले दिन भी अचानक छतों से पत्थरों की बौछार होने लगी।

बताया गया कि हमला करने के लिए छतों पर पहले से ठिकाने बनाए गए थे। एक तरफ से पत्थर चलाने और दूसरी तरफ छिपने की जगह बनाई गई थी। पुलिस इन हमलों को रोकने में नाकाम रही। बच्चे-बुढ़े सब चोटिल हो गए। इसके बाद हिंदुओं की संपत्तियों को भी नुकसान पहुँचाया जाने लगा।

  1. रिपोर्ट से सामने आई चौंकाने वाली बातों में से एक यह भी था कि पुलिस ने दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की उल्टे पीड़ित पक्ष पर ही लाठी चार्ज किया। पीड़ितों ने समिति को जानकारी दी कि पुलिस के इलाके से निकलते ही मुस्लिम तबके के लोग हिंसा शुरू कर देते थे। मुस्लिम भीड़ नुकसान पहुँचाने के मकसद से हिंदू इलाकों में दाखिल हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित पक्ष अपने दावों को सही साबित करने के लिए घटना के वीडियो भी जारी करेगा। पीड़ितों के अनुसार दंगा भड़कने के बाद पुलिस ने फोन कॉल स्वीकार करने बंद कर दिए। थाना से सटे इलाकों में भी दंगाई हिंसा कर रहे थे।

16.कमेटी के मेंबरों से बात करने वाले पीड़ितों को झूठे मामलों में फँसाए जाने का डर सता रहा था। लगभग सभी पीड़ितों ने अनुरोध किया कि उनकी पहचान गोपनीय रखी जाए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई स्थानों पर पुलिस ने दंगाईयों को हिंसा फैलाने के लिए खुला मैदान दे दिया।

अंत में समिति कुछ अहम निष्कर्ष पर पहुँचती है जो इस प्रकार हैं-

दंगाइयों और उनके समर्थकों को राज्य सरकार का समर्थन प्राप्त था। राज्य सरकार के समर्थन के बिना इतना व्यापक नुकसान असंभव है। सबूत हिंसा में पुलिस की सक्रिय भूमिका की ओर इशारा करते हैं। पुलिस को शोभा यात्रा के रूट की जानकारी थी। कुछ इलाके ऐसे थे जहाँ पिछले साल भी हिंसा हुई थी। अनुरोध के बावजूद पुलिस ने उन्होंने सुरक्षा नहीं दी। राज्य पुलिस की कार्रवाई राजनीतिक लाभ से प्रेरित लग रही हैं।

कमेटी की तरफ से की गई माँग

1.दंगा करने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई की जाए।
2.दंगों की निष्पक्ष जाँच के लिए जाँच की जिम्मेदारी एनआईए को सौंपी जाए।
3.खौफ में रह रहे पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान की जाए।
4.निर्दोष पीड़ितों के खिलाफ दर्ज किए गए झूठे मामलों को वापस लिया जाए।
5.चूँकि लोगों का पुलिस पर भरोसा कम हो चुका है अतः प्रभावित क्षेत्रों में विश्वास बहाली तक केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए।

बता दें कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मोत्सव रामनवमी के अवसर पर पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में हिंसक झड़पें हुई थीं। इस हिंसा में दर्जनों लोग घायल हुए थे। वहीं, कुछ लोगों के मारे जाने की भी खबर सामने आई थी। इसी तरह हुगली जिले के रिसड़ा में हिंसा की शुरुआत 2 अप्रैल की शाम भाजपा रामनवमी शोभायात्रा में हुए पथराव के साथ हुई थी। इसके बाद सड़कों पर खड़ी गाड़ियाँ भी आग के हवाले कर दी गईं थीं। इस हिंसा में महिलाएँ और बच्चे घायल हुए थे।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में नुपूर जे शर्मा ने लिखी है। विस्तार से इसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

80 जख्म के साथ बाबर से लड़े, घायल अवस्था में भी मुगलों को ललकारने की योजना बना रहे थे: तोपों और विस्फोटक के सामने यूँ चमकी थी मेवाड़ी तलवार

एक ऐसा शख़्स, जिसने इस्लामी आक्रांताओं को भारत की धरती पर प्रवेश करने से रोकने के लिए सारे प्रयास किए, लेकिन तकनीक के सामने असफल रहा। मेवाड़ की जब भी बात आती है तो हमें महाराणा प्रताप याद आते हैं, लेकिन आज हम उस शूरवीर की बात करने जा रहे हैं जो जज़्बा, वीरता, हठधर्मिता और देशभक्ति के मामले में प्रताप से भी दो क़दम आगे था। महाराणा सांगा का जन्म सन् 1482 में 12 अप्रैल के दिन ही हुआ था।

महाराणा सांगा की मृत्यु के साथ ही दिल्ली में मुग़ल सत्ता स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त हो गया और देश तब तक इस्लामी आक्रांताओं का ग़ुलाम रहा, जब तक उन्हें 18वीं शताब्दी के बाद सिखों, मराठों और अंग्रेजों के वर्चस्व का सामना न करना पड़ा। लेकिन यह सब कुछ सिर्फ़ एक युद्ध के परिणाम से तय हो गया था। वह था- खानवा का युद्ध।

16वीं शताब्दी की शुरुआत में जब बाबर ने काबुल पर कब्ज़ा किया, तभी से उसके मन में एक ही शब्द घूम रहा था और वह था- हिंदुस्तान। अपने पूर्वज तैमूर की कहानियाँ सुन कर बड़ा हुआ बाबर को ज्ञात था कि कैसे तैमूर ने झटके में शहर के शहर तबाह किए थे और हजारों को मौत के घाट उतारा था। वह तैमूर द्वारा पंजाब में जीते गए कुछ क्षेत्रों को वापस हथियाना चाहता था। जब बाबर ने दिल्ली में लोदी को हरा कर उसके सारे धन-वैभव पर कब्ज़ा जमाया, तब आम धारणा यह थी कि वह भी तैमूर की तरह लूटपाट कर वापस चला जाएगा लेकिन अति-महत्वकांक्षी बाबर के इरादे नेक नहीं थे।

बाबर के दिल्ली में साम्राज्य स्थापित करने की ख़बर सुनते ही राणा सांगा के कान खड़े हो गए। राणा का मानना था कि बाबर का दिल्ली में बैठना लोदी से भी बड़े ख़तरे का संकेत था। बाबर के अनुसार, राणा के पास 2 लाख सैनिकों की एक मज़बूत सेना थी। राणा ने बाबर के ख़िलाफ़ कई राजाओं का गठबंधन बनाने की हरसंभव कोशिश की और उसमें वह बहुत हद तक सफल भी हुए। राजस्थान के राजपूत राज्य, जैसे- हरौती, जालौर, सिरोह, डूंगरपुर, धुंधर और अम्बर। तुर्क़-अफ़ग़ान के अवशेषों पर एक हिन्दू राज्य की स्थापना का स्वप्न लिए राणा ने बाबर के इरादों की भनक लगते ही उसे सबक सिखाने का मन बना लिया था।

दिल्ली में हिन्दू राज्य की स्थापना के लिए महाराणा सांगा ने अफ़ग़ान तक की भी मदद ली। उन्होंने विशाल सेना-सेनापतियों की एक ऐसी फ़ौज खड़ी की, जिसके ‘जय एकलिंग’ का नाद करते ही आसमान भी थर्रा कर काँप उठता था।

बाबर ने इस युद्ध को हिन्दू बनाम मुस्लिम बना दिया। जैसा कि आज के ज़िहादी आतंकी कहते आए हैं, उसने राणा के साथ युद्ध को इस्लाम की रक्षा से जोड़ कर अपनी सेना में जोश भर दिया। बाबर ने अपने सिपहसालारों से क़ुरानशरीफ़ पर हाथ रख कर राणा जैसी ताक़त को ख़त्म करने की शपथ दिलाई। खानवा में हुए युद्ध से एक शाम पहले बाबर ने एक ऐसा उत्तेजित भाषण दिया- जिसने भावी युद्ध को कथित काफ़िर बनाम इस्लाम के रक्षक से जोड़ दिया। बाबर ने इस्लाम की आन, बान और शान की हिफ़ाज़त के लिए अपनी सेना से एक सच्चे मुस्लिम की तरह लड़ने का वादा लिया। सच्चे मुस्लिम की परिभाषा में फ़िट बैठने के लिए उसने शराब के मर्तबान पटक डाले और शराब छोड़ने की क़सम खाई।

खानवा का युद्ध भारतीय इतिहास का एक ऐसा युद्ध है, जिसके दूरगामी परिणाम हुए। सांगा के बलिदान के बाद दिल्ली में मुग़ल सत्ता की स्थापना हुई लेकिन इस युद्ध में देश की माटी की रक्षा के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले राणा सांगा ने जिस वीरता और देशभक्ति का परिचय दिया- उसकी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं और मिले। युद्ध की शुरुआत में ही राणा सांगा ने बाबर की सेना पर ऐसा हमला किया, जिस से पूरी इस्लामिक फ़ौज में हड़कंप मच गया। राणा के ताबरतोड़ आक्रामक से बाबर की सैन्य संरचना बिखर सी गई।

लेकिन, राणा सांगा एक जगह चूक गए थे। बाबर ने जिस तरह पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराया था, उस से उन्होंने कोई सीख नहीं ली थी। भारतीय वीरों की उस सूची में राणा का भी नाम है, जिन्होंने अपनी वीरता के बावज़ूद दुश्मन के छल, कपट और पैंतरेबाज़ी का अंदाज़ा लगाना उचित नहीं समझा। युद्ध के पहले बाबर ने युद्धस्थल का पूरी तरह मुआयना किया था। किस तरफ से, कहाँ और किस ओर वार करना है- ये सब उसने पहले ही सुनिश्चित कर लिया था। खानवा और आगरा की दूरी 35 मील के क़रीब है।

राणा सांगा ने इन सब की जरूरत नहीं समझी। अपनी हाथी सेना और तलवारबाज़ों की क्षमता पर भरोसा करने वाले राणा को इस बात का अंदाज़ा न था कि बाबर की तोपों के सामने वीरता का प्रदर्शन कर बलिदान तो दिया जा सकता है, लेकिन तीर और भाले से मशीनों को शायद ही जीता जा सकता है। मालवा और गुजरात की संयुक्त सुल्तानी सेना को धुल चटाने वाले राणा सांगा बाबर की पैंतरेबाज़ी ने वाक़िफ़ न थे। उन्होंने संगठन, सेना और रणनीति- इन सब पर ध्यान दिया था, लेकिन दुश्मन की चाल को समझने की कोशिश न करना उन्हें भारी पड़ा।

बाबर ने खानवा में भी पानीपत वाला तरीका ही आज़माया। उसने ख़ुद को मध्य में रख बाकी दोनों तरफ से सेना का ऐसा चक्रव्यूह बनाया, जिस से एक बार में कई तरफ से आक्रमण किया जा सके। अगर राणा पानीपत के युद्ध से थोड़ी भी सीख ले लेते, तो शायद इस तकनीक की काट की योजना तैयार कर सकते थे। तन-बदन पर लगे अनगिनत घावों से जूझते राणा सांगा ने सीधा बाबर की तरफ प्रस्थान किया और दुश्मन के मुखिया का ही काम तमाम करने के लिए पूरी ताक़त से धावा बोला।

लेकिन बीच में ही राणा की सेना बिखर गई। बाबर द्वारा कई तरफ से हो रहे आक्रमण और तोपों द्वारा काफ़ी कम दूरी से किए जा रहे फायर ने राणा के योद्धाओं को तितर-बितर कर डाला। हालाँकि, राजपूत सेना की हार देख योद्धाओं ने राणा को युद्धस्थल छोड़ने की सलाह दी। हठी राणा ने साफ़ मना कर दिया। हालाँकि, किसी तरह राणा को वहाँ से निकाल लिया गया लेकिन उनके ज़ख्म ऐसे थे, कि वह फिर युद्ध में लौट नहीं सके। राणा के जाते ही उनकी सेना की हार हुई और बाबर ने इस्लामिक साम्राज्य को एक नया विस्तार दिया। साम्राज्यवाद का यह रथ बाद में क़रीब दो दशकों के लिए रुका, जिसका श्रेय शेरशाह सूरी और हेमचन्द्र विक्रमादित्य को जाता है।

लेकिन राणा हार मानने वालों में से नहीं थे। अपनी पराजय उन्हें स्वीकार न थी। इतिहासकार प्रदीप बरुआ लिखते हैं कि अगर बाबर ने तोपों की मदद नहीं ली होती और पानीपत वाली रणनीति न दोहराई होती, तो शायद दिल्ली में मेवाड़ का केसरिया ध्वज फहरा रहा होता। इस युद्ध के बाद राणा का गठबंधन बिखर गया।

लेकिन इस युद्ध में राणा सांगा ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, उसकी तुलना महाभारत काल के योद्धाओं से की जा सकती है। राणा के शरीर पर 80 ज़ख्म थे। पहले की कई युद्धों में लड़ते-लड़ते उनका एक हाथ जा चुका था। एक ही आँख से देख पाते थे, दूसरी युद्ध की बलि चढ़ गई थी। एक ही पाँव से ठीक से चल पाते थे, दूसरा अपाहिज हो चुका था। फिर भी उन्होंने बाबर से टक्कर लेने का निर्णय लिया और उसे नाकों चने चबाने को मज़बूर किया। यह जज़्बा प्रशंसनीय है।

आज (30 जनवरी) के दिन ही 1528 में उनका स्वर्गवास हो गया। ज़ख्मों से जूझ रहे राणा दिल्ली में बैठे बाबर को फिर से ललकारने की योजना तैयार कर रहे थे। लेकिन, उनके दरबारियों और अन्य राजाओं को ये पसंद नहीं था। उन्हें दिल्ली और आगरा कब्ज़ा कर बैठा बाबर अपराजेय नज़र आ रहा था। उनके निधन के बाद भी बाबर उन्हें अपना सबसे बड़ा ख़तरा मानता रहा, जब तक वह निश्चित नहीं हो गया कि राणा सचमुच नहीं रहे। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि बीमार राणा के दोबारा युद्ध की योजना से तंग आकर उनके ही लोगों ने उन्हें ज़हर दे दिया था।

जो भी ही, अगर हम अहिंसा के पुजारी गाँधीजी को याद करते हैं, तो 30 जनवरी को वीरों के वीर महाराणा सांगा को भी याद करना चाहिए। राणा ने जिस जज़्बे की नींव रखी, उस पर चल कर प्रताप, हेमू और बाजीराव जैसे कितने योद्धा अमर हो गए। राणा का अखंड हिन्दू साम्राज्य का स्वप्न भले ही उनके जीवन रहते सफल न हो पाया हो, लेकिन उनके व्यक्तित्व से पूरा राजस्थान प्रेरणा लेता है, उनकी वीरता भारत के कण-कण में समाहित है।

शराब पीते लोगों से भरे बार में चलने लगी रामायण; राम-रावण युद्ध संवाद की कर दी एडिटिंग… मैनेजर और मालिक सहित 3 पर FIR, 2 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक शॉपिंग मॉल में बने बार के अंदर रामायण के एडिटेड दृश्य चलाने पर विवाद खड़ा हो गया है। ये दृश्य भगवान राम और रावण बने कलाकारों के युद्ध के समय का था। हिन्दू संगठनों ने इस मामले में कड़ी आपत्ति जताई तो पुलिस ने बार के मालिक और मैनेजर सहित कुल 3 लोगों पर FIR दर्ज कर ली है। सोमवार (10 अप्रैल 2023) को 2 आरोपितों की गिरफ्तारी भी हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला नोएडा के सेक्टर 39 थाना क्षेत्र का है। यहाँ गार्डन गलेरिया नाम का एक मॉल है, जिसके अंदर बार बना हुआ है। इसका नाम ‘लॉर्डर्स ऑफ़ ड्रिंक्स बार’ है। बताया जा रहा है कि घटना के दिन यहाँ शराब पार्टी हुई थी। नशे में लोग हाथ में शराब का ग्लास लेकर नाच रहे थे।

इस दौरान बार की स्क्रीन पर रामायण सीरियल का दृश्य चलने लगा। उस दृश्य में राम और रावण बने कलाकार एक दूसरे से संवाद करते दिखाई दे रहे हैं। इस संवाद में असली आवाज को काट कर दूसरी आवाज की डबिंग कर दी गई थी। बार में ही मौजूद किसी ने इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

13-14 सेकेंड के इस वायरल हो रहे वीडियो में सामने कुछ लड़के और लड़कियों को भी हाथ में ग्लास लेकर नाचते देखा जा सकता है। इस मामले में हिन्दू संगठनों ने नाराजगी जताई। उन्होंने बार के मालिक मानक चौधरी और मैनेजर अभिषेक पर धार्मिक भावनाएँ आहत करने का आरोप लगाते हुए कड़ी कार्रवाई की माँग की।

आखिरकार पुलिस ने 3 आरोपितों के खिलाफ IPC की धारा 153 A और 295 A के तहत केस दर्ज कर लिया। तीसरे आरोपित के तौर पर DJ पर म्यूजिक बजा रहे व्यक्ति का नाम है। पुलिस की जाँच में बार के मैनेजमेंट ने गलती से रामायण की क्लिप चलने कहकर सफाई दी थी।

नोएडा पुलिस ने इस मामले में 2 आरोपितों की गिरफ्तारी के साथ जाँच जारी होने की जानकारी दी है। तीसरे आरोपित की भी गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं।

₹122 करोड़ में नीलाम हुई गाड़ी की नंबर प्लेट, खरीदने वाले का नाम रहेगा गुप्त: जानिए क्यों दुनिया में सबसे महँगी बिकी है P7

दुबई में एक खास नंबर प्लेट नीलाम हुई है। इसने दुनिया की सबसे महँगी नंबर प्लेट का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। VIP कार नंबर प्लेट P7 55 मिलियन दिरहम यानी करीब 122 करोड़ रुपए में खरीदी गई है। मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ग्लोबल इनिशिएटिव्स के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर इसकी जानकारी दी गई है। पोस्ट में बताया गया है, “दुनिया की सबसे महँगी नंबर प्लेट (P7) 55 मिलियन दिरहम में बेची गई।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जुमेराह के फोर सीजन्स होटल में नीलामी का कार्यक्रम रखा गया था। नंबर प्लेट के लिए सबसे ऊँची बोली लगाने वाले शख्स ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त रखी है। इस कार्यक्रम में कई अन्य वीआईपी नंबर प्लेट और फोन नंबर की भी नीलामी की गई। नीलामी के दौरान एक शख्स ने बताया कि सोलह साल पहले अबू धाबी में एक नंबर प्लेट 52.5 मिलियन दिरहम में बिकी थी। इस बार उसका रिकॉर्ड टूट गया है।

सोशल मीडिया पर इस नीलामी की तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रही हैं। नीलामी में जमा रकम को खास मकसद के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। बताया जा रहा है कि नीलामी से जमा की हुई इस रकम का इस्तेमाल रमजान के दौरान लोगों को खाना खिलाने के लिए किया जाएगा। इस रकम को 1 बिलियन मील एंडोमेंट अभियान (1 Billion Meals campaign) को सौंप दिया जाएगा। ये संस्था गरीबों और जरुरतमंद लोगों को भोजन उपलब्ध करवाती है। इसकी नींव दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद ने रखी थी।

बता दें कि इस नीलामी से 100 मिलियन दिरहम (27 मिलियन डॉलर) यानी 2 अरब से ज्यादा रुपए आए हैं। कार लाइसेंस प्लेट और प्रीमियम सेलफोन नंबर कुल 9.792 करोड़ दिरहम में नीलाम किए गए हैं।

‘केजरीवाल ने कहा, सुकेश चंद्रशेखर ने ₹15 करोड़ BRS ऑफिस पहुँचाए’: तेलंगाना CM की बेटी कविता के साथ कथित चैट का स्क्रीनशॉट वायरल

दिल्ली के मंडोली जेल में बंद 200 करोड़ रुपए की ठगी के आरोपित सुकेश चंद्रशेखर ने विधान पार्षद कविता के साथ ह्वाट्सएप पर बातचीत के कई स्क्रीनशॉट जारी किए हैं। हालाँकि, चैट की प्रामाणिकता को लेकर संदेह जारी किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि कविता के साथ बातचीत में तेलुगु के शब्द भी इस्तेमाल किए गए हैं, जबकि सुकेश तेलुगु नहीं जानता है।

सुकेश द्वारा MLC कविता के साथ बातचीत के कथित ह्वाट्सएप चैट के स्क्रीनशॉट में अकका शब्द भी दिखाई दे रहा है। अक्का शब्द तेलुगु का है और इसका अर्थ बड़ी बहन होता है। चैट में सुकेश ने कविता को कई बार ‘अक्का’ कहा है। बता दें कि कविता तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी और भारत राष्ट्र समिति (BRS) से MLC हैं।

एबीपी के पत्रकार आशीष ने चैट के स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए ट्विटर पर लिखा है, “सुकेश चंद्रशेखर ने आरोप लगाया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उन्हें हैदराबाद स्थित कार्यालय में 15 करोड़ रुपए देने का निर्देश दिया था।” हालाँकि, इसको लेकर अभी किसी पक्ष का बयान नहीं आया है।

इसके पहले 6 अप्रैल 2023 को सुकेश चंद्रशेखर ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल के कहने पर ही BRS दफ्तर में 15 करोड़ रुपए पहुँचाए गए थे। महाठग ने दावा किया था कि उसके पास वह चैट मौजूद है, जिसमें केजरीवाल द्वारा रुपए पहुँचाने और BRS नेता द्वारा उसे स्वीकारे जाने की बात कही जा रही है। सुकेश के अनुसार उसके पास मौजूद चैट के स्क्रीनशॉट से साफ है कि बीआरएस नेता ने अरुण पिल्लई (शराब कारोबारी) को 15 करोड़ रुपए देने को कहा और उसने वह बॉक्स काले रंग की रेंज रोवर गाड़ी में रखी जिसपर MLC का स्टिकर लगा हुआ था।

इस चैट से केजरीवाल और दक्षिण भारतीय ग्रुप के बीच के संबंधों पर मुहर लगती है। खत में सुकेश का दावा है कि चैट में 15 करोड़ रुपए को कोड वर्ड में 15 किलो घी कहा गया है। उसका दावा है कि केजरीवाल और बीआरएस के नेता लंबे समय से एक दूसरे के संपर्क में हैं। केजरीवाल और बीआरएस नेताओं के बीच कई बार पैसों का लेनदेन हो चुका है।

इतना ही नहीं सुकेश ने कहा है कि यदि उसकी बातों पर किसी को भरोसा नहीं है तो वो नार्को या पॉलीग्राफ टेस्ट या किसी भी तरह का परीक्षण कराने को तैयार है। उसने कहा, “मैं सिर्फ बातें ही नहीं कर रहा बल्कि हर बात के सबूत पेश करने वाला हूँ। सुकेश का दावा है कि उसके पास अरविंद केजरीवाल के साथ व्हाट्सएप और टेलीग्राम चैट के कुल 700 पेज सुरक्षित हैं। उसने कथित तौर पर साल 2020 में बीआरएस कार्यालय को 75 करोड़ रुपए देने की भी बात कही है।

हिंदू दोस्त की नाबालिग बेटी को घर बुलाया, पैर बाँधकर किया रेपः गुजरात पुलिस ने रफीक को किया गिरफ्तार, 9वीं की छात्रा है पीड़िता

गुजरात के राजकोट में एक नाबालिग हिंदू लड़की से रेप का मामला सामने आया है। आरोपित रफीक आरब पीड़िता के पिता का दोस्त है। उसने चाबी देने के बहाने हिंदू दोस्त की बेटी को घर बुलाया और फिर उसके साथ दरिंदगी की। राजकोट महिला थाना पुलिस ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज कर रफीक को गिरफ्तार कर लिया गया है। पीड़िता 9वीं कक्षा में पढ़ाई करती है।

पुलिस की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक रफीक पीड़िता के पिता का दोस्त है। रफीक पीड़िता के घर से कुछ ही दूरी पर रहता है। उनका एक-दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता है। रफीक ने अपने हिंदू दोस्त के घर फोन किया जिसे पीड़िता ने उठाया। रफीक ने किशोरी से कहा कि वह अपनी एक्टिवा की चाबी भूल आया है, वह उसके घर पहुँचा जाए। 16 साल की किशोरी जब चाबी लेकर रफीक के घर पहुँची उस वक्त वह अकेला था। इसका फायदा उठाकर उसने पीड़िता को कैद कर लिया।

जानकारी के मुताबिक उसने पीड़िता के पैर बाँध दिए और दुष्कर्म किया। इसके बाद उसने पीड़िता को धमकी दी कि यदि इसके बारे में किसी को बताया तो वह प्रचारित कर देगा कि उसका कोई बॉयफ्रेंड है। घर आने के बाद किशोरी के पेट में दर्द होने लगा। परिजन उसे अस्पताल ले गए, जहाँ पीड़िता ने परिजनों से सारी बात बता दी।

किशोरी के माता-पिता ने महिला थाने में शिकायत दर्ज कराई। केस दर्ज होने के बाद पुलिस ने रफीक को उसके कार्यालय से गिरफ्तार कर लिया। शुरुआत में रफीक ने आरोपों से साफ इनकार कर दिया। लेकिन पुलिस द्वारा सख्ती से पूछताछ करने के बाद उसने अपना जुर्म कबूल लिया। आरोपित के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और आईपीसी की धारा 376 के तहत मामला दर्ज किया गया है।