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पर्यटन के बाद अब यूपी में चमकेगा होटल व्यवसाय, जापान की कंपनी करेगी ₹7200 करोड़ का निवेश, ग्लोबल समिट में अब तक ₹33 लाख करोड़ का इन्वेस्टमेंट

उत्तर प्रदेश के विकास को नई उड़ान मिलने वाली है। उत्तर प्रदेश ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में राज्य को 33 लाख करोड़ रुपए का निवेश मिला है। होटल चलाने वाली जापान की मशहूर कंपनी ‘होटल मैनेजमेंट इंटरनेशनल कंपनी लिमिटेड’ ने यूपी में 7200 करोड़ रुपए के निवेश पर हस्ताक्षर किए हैं। कंपनी का लक्ष्य राज्य के 30 बड़े शहरों में होटल खोलने का है।

दरअसल, जापानी कंपनी होटल मैनेजमेंट इंटरनेशनल कंपनी लिमिटेड (HMI) जापान के 60 से अधिक शहरों में होटलों का संचालन करती है। इस कंपनी ने यूपी के पर्यटन स्थल और यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या को देखा है। ऐसे में कंपनी ने जापान की ही तरह पर उत्तर प्रदेश के बड़े शहरों में होटल खोलने का फैसला किया है। इसके लिए कंपनी यूपी में 7200 करोड़ रुपए का भारी-भरकम निवेश करेगी।

होटल खोलने के फैसले को लेकर कंपनी के डायरेक्टर टाकामोटो योकोयामा का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा द्वारा पर्यटन को लेकर किए गए प्रयासों से यहाँ होटल इंडस्ट्री के लिए अपार संभावनाएँ हैं। वाराणसी में श्रीकाशीविश्वनाथ धाम कॉरीडोर बनने के बाद से वहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक आ रहे हैं। यह कंपनी के लिए एक बेहतरीन अवसर है। उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नीतियाँ भी एचएमआई ग्रुप को प्रोत्साहन देने वाली हैं। ऐसे में एचएमआई ग्रुप वाराणसी, आगरा और अयोध्या सहित उत्तर प्रदेश के 30 प्रमुख शहरों में होटल बनाएगी।

कुल मिलाकर देखें तो उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं आतिथ्य केन्द्रों को क्रमशः 98193 करोड़ रुपए तथा 20722 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। वहीं, राज्य के 20 क्षेत्रों सहित पर्यटन क्षेत्र में कुल मिलाकर 397 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। इससे कुल मिलाकर 2.60 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार के प्रयासों से न केवल देश के अन्य राज्यों से बल्कि विदेशों पर्यटकों की संख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। साल 2022 में उत्तर प्रदेश में 24.87 करोड़ से अधिक पर्यटक आए। इसमें से 4 लाख से अधिक विदेशी पर्यटक थे।

आपको बता दें कि रामनगरी अयोध्या में जनवरी 2024 तक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा। इससे उत्तर प्रदेश के पर्यटन में ऐतिहासिक रूप से बढ़ोतरी होगी। पर्यटकों के आँकड़े को लेकर जारी एक बयान में कहा गया कि 2022 के पहले 6 महीनों में करीब 2 करोड़ पर्यटक अयोध्या गए थे। इस आँकड़े से अंदाजा लगाया जा सकता है कि रामलला के मंदिर बनने के बाद उत्तर प्रदेश में पर्यटकों के आँकड़े में तेजी से बढ़ोतरी होना तय है।

‘मिट्टी में मिला’ अतीक अहमद का गुर्गा अरबाज: माफिया-गुंडई पर UP पुलिस का एक्शन जारी, CM योगी ने विधानसभा में दो टूक कही थी बात

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुए उमेश पाल हत्याकांड में यूपी पुलिस की अरबाज़ नाम के आरोपित से मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में अरबाज़ गंभीर रूप से घायल हो गया जिसने अस्पताल ले जाने के दौरान दम तोड़ दिया। यह मुठभेड़ सोमवार (27 फरवरी 2023) को हुई। अरबाज़ पर आरोप था कि वो हमले के दौरान उस क्रेटा गाड़ी को चला रहा था, जिससे शूटर आए थे। 1 दिन पहले यह क्रेटा गाड़ी अतीक अहमद के घर से बरामद हुई थी।

भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने इस मुठभेड़ पर लिखा, “मिट्टी में मिलाने का अभियान शुरू। उमेश पाल का एक हत्यारा अरबाज़ पुलिस मुठभेड़ में ढेर, जय हो।” अपने ट्वीट में शलभमणि ने जो वीडियो शेयर किया है, उसमें पुलिस एक घायल व्यक्ति को सरकारी वाहन से उतार कर स्वरूप रानी अस्पताल ले जा रही है। घायल व्यक्ति अरबाज़ बताया जा रहा है, जिसे डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अरबाज़ अतीक के बेटे का ड्राइवर था। घटना की जाँच कर रही पुलिस टीम ने अरबाज़ के चेहरे को भी CCTV फुटेज में चिन्हित किया था। अरबाज़ ने न सिर्फ गाड़ी चलाई थी बल्कि उस पर उमेश पर हमले का भी आरोप है। मृतक अरबाज़ का अब्बा भी अतीक अहमद की गाड़ी चलाता था। अरबाज़ मूल रूप से प्रयागराज के पुरामुफ्ती इलाके के सल्लाहपुर का रहने वाला था। अरबाज़ की तलाश कर रही पुलिस को सोमवार सुबह उसकी लोकेशन प्रयागराज में ही धूमनगंज के पास नेहरू पार्क के पास मिली थी।

पुलिस ने इलाके की घेराबंदी की तो सूचना सही निकली। अरबाज़ पुलिस को देख कर भागने लगा। पुलिस ने उसे रुकने के लिए कहा पर वो गोलियाँ चलाने लगा। पुलिस ने भी आत्मरक्षा में गोलियाँ चलाईं। पुलिस की गोली अरबाज़ के सीने और पैर में लगी, जिससे वो बुरी तरह घायल हो गया। अरबाज़ को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

बता दें कि इस समय प्रयागराज में हुआ उमेश पाल हत्याकांड काफी गरमाया हुआ है। सीएम योगी खुद कह चुके हैं,”माफियाओं को मिट्टी में मिला दूँगा। प्रयागराज की घटना पर सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति के आधार पर काम कर रही है।” वहीं उप-मुख्यमंत्री ने भी मीडिया से बात करते हुए कहा कि इस कांड की जाँच की जा रही है। उन्होंने कहा कि जाँच के बाद अपराधियों को ऐसी सजा दी जाएगी कि आने वाली पीढ़ियाँ भी याद रखेंगी

9 दिन शादी को हुए थे, MLA को खदेड़-खदेड़ कर बरसाई गोलियाँ… खौफ से भाग खड़े हुए HC के 10 जज: सपा के संरक्षण में फला-फूला अतीक अहमद

उत्तर प्रदेश में एक ऐसा समय था, जब माफिया ही राज करते थे। उनके सहारे सपा और बसपा सत्ता में आते-जाते रहते थे। मुख़्तार अंसारी और आजम खान के अलावा वहाँ का एक और माफिया हैं अतीक अहमद, जिसका नाम हाल ही में उमेश पाल हत्याकांड में आया। उमेश पाल, विधायक राजू पाल हत्याकांड में मुख्य गवाह थे। उमेश पाल को प्रयागराज में दिन-दहाड़े मार डाला गया। इस हत्याकांड में अतीक अहमद का बेटा भी इस हत्याकांड में खुलेआम गोलियाँ बरसाता हुआ नज़र आया।

विधायक को मरवाया, गवाह का अपहरण करवाया, अब गवाह को ही मार डाला

इस दौरान अतीक अहमद के गुर्गों ने न सिर्फ उमेश पाल, बल्कि उनके सुरक्षाकर्मी यूपी पुलिस के संदीप निषाद को भी मार डाला। आजमगढ़ के संदीप निषाद गरीब परिवार से आते थे और उनकी उम्र मात्र 26 वर्ष थी। अतीक अहमद का आतंक ऐसा है कि उसे उत्तर प्रदेश से गुजरात के जेल में हस्तानांतरित करना पड़ा था। वो साबरमती जेल में बंद है। उमेश पाल की पत्नी जया का ये भी कहना है कि 2006 में भी अतीक अहमद के गुंडों ने उनके पति का अपहरण किया था।

तब उमेश पाल का अपहरण कर के जबरदस्ती उससे अतीक अहमद के पक्ष में गवाही दिलाई गई थी। इससे संबंधित सुनवाई अभी तक चल रही थी, जिस मामले में उमेश पाल हाल ही में प्रयागराज जिला अदालत में भी गए थे। वहाँ से घर लौटते ही उन पर ये हमला हो गया। याद हो कि 2005 में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या कर दी गई थी। उन्होंने 2004 के विधानसभा चुनाव में इलाहाबाद वेस्ट से अतीक अहमद के भाई अशरफ को हराया था।

उनकी हत्या के बाद उपचुनाव हुआ और अशरफ राजू पाल की पत्नी को हरा कर विधायक बन बैठा। हाल के कुछ वर्षों में अतीक अहमद का राजनीतिक वर्चस्व भी खात्मे के कगार और है, ऐसे में उसके परिवार ने अपना खौफ बनाए रखने के लिए इस घटना को अंजाम दिया। अतीक अहमद की अब तक लगभग 400 करोड़ रुपयों की अवैध संपत्ति जब्त की जा चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में श्रावस्ती से उसने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा।

2019 के मध्य में तब यूपी में अतीक अहमद का नाम नए सिरे से चर्चा में आया था, जब पता चला कि उसने देवरिया के जेल में ही एक कारोबारी की पिटाई की है। बरेली के व्यापारी मोहित जायसवाल ने तब बताया था कि उन्हें अतीक अहमद के गुर्गे टांग कर ले गए और पिटाई की। अतीक अहमद और उसके बेटे उमर अहमद के सामने उन्हें मारा-पीटा गया। अहमद ने मोहित के पाँच व्यापार जबरन अपने नाम करा लिए। इसकी क़ीमत 45 करोड़ रुपए आँकी गई थी।

इतना ही नहीं, मोहित के फॉर्च्यूनर कार को भी लूट लिया गया था। इस घटना से 2 वर्ष पहले भी अतीक ने मोहित से कई लाख रुपए जबरन वसूले थे। वो पिछले 4 महीनों से उनसे और रुपयों की माँग कर रहा था। उसने जेल में ही क़ानून को धता बताते हुए मोहित के दाहिने हाथ की दो उँगलियाँ तुड़वा डाली थीं। मोहित के अलावा एक अन्य व्यापारी ने भी उस पर प्रताड़ना का आरोप लगाया था। प्रयागराज के व्यापारी मोहम्मद ज़ाएद ख़ालिद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पुलिस प्रशासन को पत्र लिखकर बताया था कि उसे अतीक अहमद के दर्जन भर गुंडे जबरन टांग कर देवरिया जेल ले गए।

वहाँ अतीक अहमद ने उससे गाली-गलौज किया और विष्णुपुर में उसके किसी ज़मीन को अपने आदमी के नाम ट्रांसफर करने को कहा। जब ये सब किया जा रहा था तब जाएद की मदद के लिए जेल का कोई भी अधिकारी या पुलिसकर्मी नहीं आया। अतीक अहमद को गुजरात भेजे जाने का कारण ये भी था कि देवरिया के जेल में वो जिसे चाहे उसे टांग कर मँगा लेता था और वहाँ से रंगदारी का धंधा चला रहा था। सोचिए, फिर आम जनता पर उसके चरम अत्याचार के दिनों में क्या बीतती होगी!

5 बार विधायक और 1 बार सांसद रह चुका है अतीक अहमद, समाजवादी पार्टी ने दिया संरक्षण

अतीक अहमद पहली बार इलाहाबाद पश्चिम से 1989 में जीत कर विधानसभा पहुँचा। उसे 25,000 (33%) से अधिक वोट मिले थे। 1991 में इलाहाबाद पश्चिम से अतीक अहमद ने अपना दूसरा चुनाव लड़ा। 51% मत पाकर उसने भारी जीत दर्ज की। उसे इस चुनाव में 36,000 से अधिक वोट मिले थे। 1993 के विधानसभा चुनाव में उसे 56,000 मत मिले और उसे मिला मत प्रतिशत 49% रहा। 1996 में न सिर्फ़ उसे मिलने वाले मतों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ बल्कि मत प्रतिशत भी बढ़ गया। उसे कुल मतों का 53% यानी 73,000 के क़रीब वोट मिले।

2002 में उसे मिलने वाले मत और मत प्रतिशत में भारी कमी दर्ज की गई और ये उसके दूसरे चुनाव में मिले मतों के आसपास ही रहा लेकिन फिर भी वो जीत दर्ज करने में कामयाब रहा। इस तरह उसने इलाहबाद पश्चिम को पाँच बार जीता। पहले तीन चुनाव उसने निर्दलीय लड़ा। 1996 में मुलायम सिंह यादव के क़रीब आने के बाद उसने सपा के टिकट पर चुनाव जीता था। इसी तरह 2002 में उसने अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल का विश्वस्त बन कर इसके टिकट पर चुनाव जीता। वो अपना दल का अध्यक्ष भी रहा।

अब आते हैं राजू पाल हत्याकांड पर, जिसके गवाह उमेश पाल की हत्या के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार अतीक अहमद के काले साम्राज्य को तबाह करने के लिए तेज़ी से जुट गई है। गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने जाते समय उनकी दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई थी। 2014 में सपा उम्मीदवार के रूप में अतीक अहमद ने दावा किया था कि उसके ऊपर 188 मामले चल रहे हैं और उसने अपनी आधी ज़िंदगी जेल में व्यतीत की है, जिस पर उसे गर्व है।

राजू पाल खुद कभी अतीक अहमद के साथ ही काम किया करते थे। 25 जनवरी, 2005 को हुए इस हत्याकांड में उन्हें कई गोलियाँ मारी गई थीं। उनके समर्थकों ने इसके बाद उन्हें एक टेम्पो में लादा और अस्पताल लेकर जाने लगे। लेकिन, अपराधी इतने बेख़ौफ़ थे कि उन्होंने 5 किलोमीटर तक उस टेम्पो का पीछा किया और घेर कर गोलियाँ बरसाईं। वो हर हाल में राजू पाल को मारना चाहते थे। 9 दिन पहले ही उनकी शादी हुई थी।

यानी, पूजा पाल के हाथों से अभी मेहंदी का रंग भी नहीं उतरा था। लेकिन, अतीक अहमद का खौफ ऐसा कि उपचुनाव के प्रचार में उन्हें कर बार रोता हुआ देख कर भी लोगों ने उन्हें नहीं जिताया। फ़िलहाल वो सपा से ही विधायक हैं। अतीक अहमद पर तभी हत्या का आरोप लग गया था, जब वो सिर्फ़ 17 वर्षों का था। इसके बाद उसने अपराध की दुनिया में ऐसा नाम बनाया कि मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन भी उसके सामने फीके पड़ जाएँ!

2016 में कृषि विश्वविद्यालय (SHUATS) के कर्मचारियों की उसने बुरी तरह पिटाई की थी। इस घटना के बाद अखिलेश सरकार की खूब भद्द पिटी थी। कर्मचारियों को पीटते हुए उसका वीडियो भी वायरल हो गया था। जब उसने ज़मानत के लिए आवेदन दिया था तब एक-एक कर 10 जजों ने उसका केस सुनने से मना कर दिया था। 11वें जज ने आख़िर में उसका केस उठाया और उसे ज़मानत मिली। मात्र 17 की उम्र में पहली हत्या करने वाले अतीक अहमद के खिलाफ 120 मामले लंबित हैं।

योगी राज में बदल लिया चोला, गुर्गों ने शुरू कर दिया जमीन कब्जे का धंधा

अतीक अहमद के गुर्गों ने 2022 में ही फिर से सिर उठाना शुरू कर दिया था। इस बार उनलोगों ने जमीन की हेराफेरी का धंधा कर के कमाना शुरू कर दिया। अकेले 2022 में यूपी में ऐसे 450 मामले सामने आए थे, जिनमें से कई अतीक अहमद के गुर्गों से जुड़े थे। पीपलगांव निवासी सूरजपाल धूमनगंज के भीटी असदुल्लाहपुर में जब अपने प्लॉट पर गया तो अतीक अहमद के गुंडों ने उसे पीटा और 20 लाख रुपया रंगदारी के रूप में माँगा।

गयासुद्दीनपुर की एक विधवा ने आरोप लगाया कि उनके भी जमीन पर अतीक अहमद के गुर्गों ने कब्ज़ा कर लिया है। गाली-गलौज से लेकर मारपीट तक की गई। जुलाई 2021 में तो अतीक अहमद के गुर्गों ने 1.872 हेक्टेयर जमीन सरकारी जमीन ही कब्ज़ा ली और कोई कार्रवाई नहीं हुई। अतीक अहमद के गुर्गे इतने बेख़ौफ़ हैं कि उन्होंने करेली थाना क्षेत्र के एनुद्दीनपुर में कुर्क की गई जमीनों को ही बेच डाला, उस पर मकान तक बना दिए गए और कुर्की का नोटिस उखाड़ फेंका गया।

इसी तरह अतीक अहमद के एक बेटे अली पर मारपीट का मामला खुल्दाबाद थाने में दर्ज किया गया था। 21 दिसंबर, 2021 को उसने उस पर 5 करोड़ रुपए की रंगदारी माँगने और और मारपीट करने का मामला दर्ज किया गया। इसका वीडियो भी सामने आया था। तब पुलिस ने अतीक अहमद के बेटे के विरुद्ध 25,000 रुपए का इनाम भी घोषित किया गया था। अब फिर अतीक अहमद और उसके गुर्गों ने यूपी में दहशत फैलाई है।

‘राष्ट्रहित में शुरू हुई अग्निपथ योजना, हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे’: दिल्ली HC ने खारिज की 23 याचिकाएँ

दिल्ली हाई कोर्ट ने सेना में भर्ती के लिए लाई गई अग्निपथ योजना को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएँ खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा है कि अग्निपथ योजना सेना को बेहतर करने और देश में लाई गई योजना है। इसलिए सरकार के इस फैसले पर हस्ताक्षेप करने की कोई वजह नहीं दिखाई देती।

सोमवार (27 फरवरी 2023) को हुई सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की बेंच ने अग्निपथ के खिलाफ दाखिल की गई सभी 23 याचिकाएँ खारिज कर दीं। खारिज की गई इन याचिकाओं में से 5 में अग्निपथ योजना को चुनौती दी गई थी। वहीं 18 याचिकाओं में पिछली भर्ती योजना के अनुसार नियुक्ति करने की माँग की गई थी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने सभी 23 याचिकाओं को खारिज करते हुए अपने फैसले में कहा है, “इस अदालत को अग्निपथ योजना में हस्तक्षेप करने की कोई वजह नहीं मिली। सभी याचिकाएँ खारिज की जाती हैं। हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि यह योजना देश के हित में शुरू की गई थी।”

इससे पहले 15 दिसंबर 2022 को हुई सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र और याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने का बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। हालाँकि फैसला सुरक्षित रखते हुए कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि किसी को कोई आपत्ति है तो वह अपनी दलीलों को लिखित रूप में कोर्ट में दाखिल कर सकता है।

गौरतलब है कि अग्निपथ को देशभर की अलग-अलग अदालतों में चुनौती दी गई। इसके बाद 19 जुलाई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने योजना को चुनौती देने वाली अभी याचिकाओं को दिल्ली हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने का आदेश दिया था।

दरअसल केंद्र सरकार ने सशस्त्र सेना में युवाओं की भर्ती के लिए 14 जून 2022 को अग्निपथ योजना लॉन्च की थी। इस योजना के तहत साढ़े 17 से 21 वर्ष की आयु के युवा सेना में भर्ती होने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस योजना से सेना में भर्ती हुए सैनिकों को अग्निवीर कहा जाएगा। ये सभी चार साल के कार्यकाल के लिए सेना में भर्ती होंगे। हालाँकि 4 साल बाद, इनमें से 25 प्रतिशत सैनिकों को उनकी योग्यता के अनुसार सशस्त्र बलों में नियमित किया जाएगा।

बता दें कि इस योजना के लॉन्च होने के बाद कई राज्यों में इसका विरोध किया था। इस विरोध का कारण इसको लेकर फैलाई गई अफवाह थी। हालाँकि बाद में यह विरोध थम गया था। लेकिन विपक्षी दल अब तक इस योजना का विरोध करते आए हैं। चूँकि अब दिल्ली हाई कोर्ट ने इस योजना को देश हित में करार दिया है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि विपक्ष अब योजना का विरोध नहीं करेगा।

‘मैंने सुना वह आतंकवादियों के समूह में शामिल हो गया है’: नेहरू ने ही करवाई चंद्रशेखर आजाद की हत्या, भतीजे ने बताई असली कहानी, CID ऑफिस में भी एक सीक्रेट

महान स्वतंत्रता सेनानी महान चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) की आज पुण्यतिथि है। वह 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि वह चंद्रशेखर आजाद की हत्या में शामिल थे। क्रांतिकारी बलिदानी चंद्रशेखर आजाद के जन्मदिवस (23 जुलाई) के अवसर पर 2018 में उनके भतीजे सुजीत आजाद ने ‘दैनिक जागरण’ से बातचीत में कहा था, “नेहरू ने देश के साथ गद्दारी कर चंद्रशेखर आजाद की हत्या कराई। यह बात किसी से छिपी नहीं है। कॉन्ग्रेस ने हमेशा देश को बाँटने का काम किया है।”

इसी तरह राजस्थान के कोटा स्थित रामगंज मंडी से भाजपा विधायक मदन दिलावर ने 2021 में कहा था, “पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेजों के साथ मिलकर चंद्रशेखर आजाद की हत्या करवाई थी। मृत्यु से पहले चंद्रशेखर आजाद, पंडित नेहरू से मिलने गए थे। इसके बाद पंडित नेहरू को मालूम था कि वे अल्फ्रेड पार्क में बैठे हैं और नेहरू ने अंग्रेजों को इस बात की जानकारी दी।”

उन्होंने आगे यह भी आरोप लगाया था कि नेहरू द्वारा अंग्रेजों को सारी जानकारी दिए जाने के बाद अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश सिपाहियों ने आजाद को चारों तरफ से घेर लिया और फिर उन पर हमला कर दिया। बकौल मदन दिलावर, वीर चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों की गोली से मरने या फिर उनके कब्जे में जाने से जान देना ठीक समझा और भारत माँ के लिए खुद को ही गोली मार कर बलिदान हो गए।

वहीं, ‘दैनिक भास्कर’ में 6 साल पहले चंद्रशेखर आजाद के बलिदान को लेकर खुलासा किया गया था कि उन्हें इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के एक बड़े नेता ने अंग्रेजों की मुखबिरी करके मरवाया था। उनकी मौत से जुड़ी एक गोपनीय फाइल लखनऊ के CID ऑफिस में रखी है। फाइल में इलाहाबाद के तत्कालीन अंग्रेज पुलिस अफसर नॉट वावर का बयान है। नॉट वावर ने अपने बयान में कहा था – वह अपने घर पर खाना खा रहे थे, उसी समय भारत के 1 बड़े नेता का मैसेज आया। इसमें बताया गया कि आप जिसकी तलाश कर रहे हैं, वह इस समय अल्फ्रेड पार्क में मौजूद है और सुबह 3 बजे तक रहेगा। इसके बाद नॉट वावर बिना देरी किए पुलिस बल के साथ अल्फ्रेड पार्क पहुँच गया और पार्क को चारों तरफ से घेर लिया।

DailyO’ वेबसाइट पर 27 फरवरी, 2016 को ‘क्या नेहरू ने अंग्रेजों के साथ मिलकर चंद्रशेखर आजाद को धोखा दिया था’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया गया था। DailyO ने क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद के भतीजे सुजीत आजाद के हवाले से लिखा था कि जवाहरलाल नेहरू ने उनके (चंद्रशेखर) ठिकाने के बारे में अंग्रेजों को जानकारी दी थी। नेहरू की वजह से उनकी हत्या हुई। सुजीत आजाद ने यह भी दावा किया था कि भगत सिंह को छोड़ने के लिए नेहरू को HSRA फंड भी दिया गया था। नेहरू ने यह फंड ले लिया, लेकिन उसे बाँटा नहीं किया। भले ही आजाद का यह दावा सच हो, लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया में इसे कोई कवरेज नहीं मिली।

सुभाष बोस के रिश्तेदारों की जासूसी

देश की सबसे पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता लंबे समय से अंग्रेजों से लड़ने का दावा करते रहे हैं। ऐसे में चंद्रशेखर आजाद से जुड़ा यह हैरान कर देने वाला दावा उन पर कई सवाल खड़े कर रहा था। गाँधी को नियमित रूप से अंग्रेजों से गोपनीय जानकारी मिलती थी, जिन्होंने उनके साथ सुभाष चंद्र बोस की गतिविधियों से जुड़ी गुप्त फाइलों को भी साझा किया था। पटेल और नेहरू ने अंग्रेजों के साथ मिलकर 1946 में मुंबई के नौसैनिक विद्रोहियों को धोखा दिया था।

नेहरू पर सुभाष बोस के रिश्तेदारों की जासूसी के आरोप भी लगे थे। लेख के मुताबिक, 1947 में भारत के आजाद होने के बाद सत्ता संभालते ही नेहरू ने ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों के साथ कई खुफिया जानकारी साझा की थी। ऐसे में माँग उठती रही है कि सुजीत आजाद के आरोपों को अत्यंत गंभीरता से जाँच की जाए। क्या नेहरू ने सच में चंद्रशेखर आजाद को धोखा दिया था?

नेहरू की आत्मकथा

नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि गाँधी-इरविन वार्ता शुरू होने से पहले चंद्रशेखर आजाद 1931 की शुरुआत में इलाहाबाद में उनके आवास पर उनसे मिलने आए थे। उन्होंने लिखा, “मुझे उस समय के बारे में एक जिज्ञासु घटना याद है। एक अजनबी मुझसे मिलने मेरे घर आया और मुझे बताया गया कि वह चंद्रशेखर आजाद है। मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था, लेकिन मैंने उसके बारे में दस साल पहले सुना था, जब उसने कम उम्र में असहयोग आंदोलन शुरू किया था और 1921 में एनसीओ आंदोलन के दौरान जेल गया था।

नेहरू ने लिखा है, “बाद में, वह आतंकवादियों के समूह में शामिल हो गया था। हालाँकि, यह सब मैंने अस्पष्ट रूप से सुना था और मैंने इन अफवाहों में कोई दिलचस्पी नहीं ली थी। वह हमारे घर आया था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार और कॉन्ग्रेस के बीच कुछ उस वक्त बातचीत की संभावना थी। वह जानना चाहता था कि क्या उनके बीच होने वाले समझौते में उन लोगों को भी राहत मिलेगी। क्या उन्हें अभी भी आतंकी माना जाएगा और उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाएगा। क्या उन्हें शांतिपूर्ण व्यवसाय करने की अनुमति दिए जाने की संभावना है?”

पूर्व पीएम ने यह भी लिखा, “उसने मुझे बताया कि जहाँ तक उसका और उसके कई सहयोगियों का संबंध है, उन्हें अब इस बात पर भरोसा हो गया है कि आतंकवादी किसी का भला नहीं कर सकते हैं। हालाँकि, वह यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि भारत शांतिपूर्ण तरीके से पूरी तरह से आजाद हो पाएगा। उसने सोचा था कि भविष्य में कभी हिंसक संघर्ष हो सकता है, लेकिन यह आतंकवादी तरीके से नहीं होगा। जहाँ तक भारत की स्वतंत्रता का सवाल था, उन्होंने आतंकवाद को सिरे से खारिज कर दिया। लेकिन फिर उसने कहा कि जब उसे बसने का कोई मौका नहीं दिया जाएगा, तो वह इस स्थिति में क्या करेगा। उसे यह बात हर समय परेशान कर रही थी?

नेहरू ने आगे लिखा, “आजाद से सीखकर मुझे खुशी हुई और बाद में मुझे इस बात पर भरोसा हो गया कि अब आतंकवाद में उनके समूह का विश्वास नहीं रहा। बेशक, इसका मतलब यह नहीं था कि पुराने आतंकवादी या उनके नए सहयोगी अहिंसा का मार्ग अपनाने वाले थे, या ब्रिटिश शासन के प्रशंसक बन गए थे। लेकिन, वे आतंकवाद के मामले में पहले की तरह नहीं सोचते थे। उनमें से कई मुझे ऐसा लगता है, निश्चित रूप से फासीवादी मानसिकता वाले हैं।”

नेहरू के शब्दों में, “चंद्रशेखर आजाद को मैं केवल इतना सुझाव दे सकता था कि उसे अपने प्रभाव का उपयोग भविष्य में आतंकवादी घटना को रोकने के लिए करना चाहिए। दो-तीन हफ्ते बाद, जब गाँधी-इरविन की बातचीत चल रही थी, मैंने दिल्ली में सुना कि चंद्रशेखर आजाद को इलाहाबाद में पुलिस ने गोली मार दी। दिन के समय एक पार्क में उसकी पहचान हो गई थी और भारी पुलिस बल ने उसे घेर लिया। उसने एक पेड़ के पीछे छिपकर अपना बचाव करने की कोशिश की। वहाँ फायरिंग हो रही थी और खुद को गोली मारने से पहले उसने एक या दो पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया था।”

आजाद के खिलाफ नेहरू की दुश्मनी

आजाद के खिलाफ नेहरू की दुश्मनी उन पर लगाए गए आरोपों से प्रेरित हो सकती है। इस पर सत्यनारायण शर्मा ने लिखा है कि जब आजाद ने नेहरू से पूछा कि क्या गाँधी इरविन से उनके और साथियों (भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु) की मौत की सजा को रद्द करने के बारे में बात करेंगे, तो नेहरू ने जवाब दिया था कि वह उनके सवाल का जवाब देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उस समय गाँधी क्रांतिकारियों के हित में किसी भी प्रकार का कार्य करने को इच्छुक नहीं थे।

आजाद ने तब गुस्से में जवाब दिया था कि यह उन जैसे देशभक्तों के साथ घोर अन्याय है। उसके तीन साथियों को फाँसी दी जा रही है। उन्हें नेहरू और उनके जैसे लोगों से अस्वीकृति के अलावा कुछ नहीं मिला है। नेहरू और उनके जैसे अन्य लोगों को भी क्रांतिकारियों की तरह गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उनको रिहा कर दिया जाएगा, जबकि दूसरों को फाँसी पर लटका दिया जाएगा। नेहरू के पास उस प्रश्न का कोई जवाब नहीं था।

भारत माता से लेकर PM मोदी की फोटो हटाई, बंद हुआ रोज का राष्ट्रगान: दिल्ली के ICHR में ये कैसे बदलाव, अधिकारी बोले- हम कुछ नहीं जानते

राजधानी दिल्ली स्थित भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) में कर्मचारियों द्वारा सामूहिक राष्ट्रगान बंद किए जाने की खबर है। बताया जा रहा है कि कुछ लोगों द्वारा इस पर आपत्ति जताई गई थी। इसी बीच ICHR के मीटिंग हॉल में लगी भारत माता और पूर्व जनसंघ अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय की भी तस्वीरों को हटा दिया गया है। यह बदलाव शुक्रवार (24 फरवरी 2023) से हुआ है। यह कार्रवाई किस के कहने पर हुई है अभी तक इसका खुलासा नहीं हो पाया है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ICHR कार्यालय में पिछले 6 माह से लगातार रोज राष्ट्रगान गया जाता था। कुछ लोगों द्वारा इस पर आपत्ति दर्ज करवाई गई। दावा किया गया है कि सितम्बर 2022 से राष्ट्रगान की प्रतिदिन प्रथा शुरू की गई थी जिसे अब बंद कर दिया गया है। बताया गया कि यह आदेश मौखिक रूप से दिया गया है जिसे अब मौखिक तौर पर ही बंद करने के लिए कहा गया है। इसी के साथ ICHR कॉन्फ्रेंस हॉल और इसके सदस्य सचिव उमेश कदम के ऑफिस में भारत माता और पूर्व जनसंघ अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय की तस्वीरें भी लगीं थीं। जिन्हे फिलहाल के लिए हटा लिया गया है।

बताया यह भी जा रहा है कि हटाई गई तस्वीरों में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी चित्र शामिल हैं। इस पूरे मामले में आईसीएचआर के अध्यक्ष रघुवेंद्र तंवर तस्वीर हटाने और राष्ट्रगान बंद होने की पुष्टि कर रहे हैं। हालाँकि वो मामले पर खुल कर कुछ नहीं बोल रहे। वहीं ICHR सदस्य सचिव उमेश कदम के मुताबिक तस्वीरों को लगाने का कोई आदेश नहीं था। उन्होंने हटाए गए चित्रों को गिफ्ट में मिला बताया। उमेश ने राष्ट्रगान बंद होने की वजह को गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि पहले कर्मचारी अपनी मर्जी से ऐसा करते थे।

ICHR को एक गैंग साम्प्रदयिक संस्थान बताते हुए इसके चेयरमैन रघुवेन्द्र तंवर ने इसकी शुचिता बनाए रखने की अपील की। उनका कहना है कि 10 फरवरी के बाद वो ऑफिस नहीं गए। तंवर ने न तो तस्वीर को अपने आदेश से लगा बताया और न ही उसे अपने आदेश से हटाने की बात कही।

‘पूजा’ बीड़ी बना रहा दिलशाद, रैपर पर भगवान कृष्ण की फोटो: फतेहगढ़ में केस दर्ज, 10 दिन बाद भी गिरफ्तारी नहीं

उत्तर प्रदेश के फतेहगढ़ जिले में बीड़ी बनाने वाली एक फैक्ट्री पर हिन्दू भावनाओं को आहत करने के आरोप में FIR दर्ज हुई है। दिलशाद एन्ड कम्पनी ने पूजा नाम से बीड़ी का ब्रांड बना कर मार्किट में उतारा था। इस कम्पनी के मालिक का नाम मोहम्मद दिलशाद बताया जा रहा है। पूजा बीड़ी के रैपर पर बांसुरी बजाते हुए भगवान कृष्ण की फोटो सबसे ऊपर लगाई गई थी। इस मामले की शिकायत विश्व हिन्दू परिषद ने की है। यह FIR शुक्रवार (17 फरवरी 2023) को दर्ज हुई थी लेकिन 10 दिन बीत जाने के बाद भी आरोपित की गिरफ्तारी न होने पर हिन्दू संगठनों ने नाराजगी जताई है।

यह मामला फतेहगढ़ जिले के जहानगंज थानाक्षेत्र का है। बजरंग दल के जिला सह संयोजक अंकुल गुप्ता इस मामले में शिकायतकर्ता हैं। 17 फरवरी को दी गई अपनी शिकायत में अंकुल ने आरोप लगाया है कि दिलशाद एन्ड कम्पनी ने बीड़ी के रैपर पर हिन्दू देवता का चित्र हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए छपवाया है। शिकायतकर्ता के मुताबिक बीड़ी का प्रयोग कर लेने के बाद उसमें छपे भगवान की फोटो वाले रैपर को नाले और गंदी जगहों पर फेंक दिया जाता है जिस से हिन्दुओं की भावनाओं को चोट पहुँच रही है।

बजरंग दल के अंकुल ने इस मामले में बीड़ी कम्पनी के मैनेजर और डायरेक्टर पर केस दर्ज कर के कार्रवाई की माँग की थी। इस शिकायत पर पुलिस ने IPC की धारा 295- A के तहत FIR दर्ज कर ली। इस केस में पुलिस ने दिलशाद एन्ड कम्पनी को नामजद किया है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

आरोपितों की गिरफ्तारी न हो न होने पर नाराजगी

ऑपइंडिया ने इस मामले में शिकायतकर्ता बजरंग दल कार्यकर्ता अंकुल से बात की। अंकुल ने हमें बताया कि लगभग 12 दिन बीत जाने के बाद भी किसी आरोपित की गिरफ्तारी न होने से वो व्यथित हैं। अंकुल के मुताबिक वो बजरंग दल के अपने साथियों के साथ 21 फरवरी को दुबारा थाने गए थे और आरोपित की गिरफ्तारी के बारे में जानकारी ली तो बदले में उन्हें बीड़ी के रैपर जब्त करने का भरोसा दिया था।

शिकायतकर्ता ने हमें आगे बताया कि पुलिस ने उनसे कहा, “दिलशाद को समझा दिया गया है कि वो दुबारा ऐसा न करे।” पुलिस के रवैये को निराशाजनक बताते हुए अंकुल ने कहा कि अगर आरोपित पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई तो वो इस मामले को कोर्ट में ले जाएँगे।

गुजरात के जिस गाँव में मिशनरियाँ पसार रही थीं पाँव, वहाँ 20 ईसाई परिवारों की घर वापसी: 61 जनजातीय जोड़ों का सामूहिक विवाह भी

अग्निवीर की गुजरात टीम ने वलसाड जिले के धरमपुर तालुका के नड़गधरी गाँव में दिनाँक 25-26 फरवरी 2023 को सामूहिक विवाह का आयोजन किया। इस दौरान 61 जनजातीय जोड़े मंडप में बैठे और पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर परिणय सूत्र में बँधे। इस दौरान 20 क्रिश्चियन परिवारों ने घरवापसी भी की।

कार्यक्रम में मुख्य आयोजक व अग्निवीर अनुसूचित जनजाति के अध्यक्ष महेंद्र सिंह राजपुरोहित, अग्निवीर गुजरात टीम की अध्यक्ष नेहाबेन पटेल एवम सूरत, बिलीमोरा, वलसाड, वडोदरा, महाराष्ट्र की अग्निवीर की टीम के सदस्य तथा आसपास के गाँवों के 10,000 से अधिक लोग उपस्थित रहे।

यहाँ दो दिन, उत्सव जैसा माहौल रहा। सभी के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था थी। दिनाँक 25 की रात को मनोरंजन के साथ, धर्म जागृति, नशा मुक्ति, महिला उत्थान, शिक्षा संबंधित विषयों पर भी रंगारंग कार्यक्रम थे। यहाँ जनजातीय संस्कृति के गीत एवम नृत्य भी देखने मिले।

दूसरे दिन वर-वधु को अग्निवीर द्वारा वस्त्र, मोजड़ी-चप्पल, मंगलसूत्र इत्यादि अर्पण किए गए तथा कन्यादान भी किया गया। आशीर्वचन हेतु कपिल स्वामीजी सलवाव, राम स्वामीजी सलवाव एवम गुरु योगी रविनाथजी उपस्थित रहे। समस्त जनजातीयों ने ‘जय श्री राम’ के नारों से वातावरण को सनातनमय कर दिया।

महेंद्र सिंह ने बताया कि यह विस्तार क्रिश्चियन मिशनरीज का गढ़ कहा जाता है। यहाँ जनजातीय आर्थिक रूप से सक्षम नही हैं। इसी का लाभ उठाकर मिशनरीज के लोग उनका धर्मांतरण करते हैं।

यहाँ के जनजातीय समाज में ‘फुलहार’ की प्रथा है। जिसमें लड़का-लड़की छोटी आयु में एक दूसरे को पसंद कर के फूल की माला एक दूसरे को पहनाकर साथ रहने लगते हैं। वे विवाह करना चाहते हैं किंतु आर्थिक तंगी में वे संतान प्राप्ति के बाद भी विवाह नहीं कर पाते। इस दौरान यदि दोनों में से किसी की भी मृत्यु हो जाए तो इसके अंतिम संस्कार के पहले मृत शरीर को वर अथवा वधु की तरह सजाया जाता है जोकि अत्यंत ही हृदयद्रावक दृश्य है।

पिछले कुछ वर्षों से फुलहार प्रथा की आड़ में क्रिश्चियन मिशनरीज के लोग भोले-भाले जनजातीयों को शादी करवाने का लालच दे रहे हैं। उसी बहाने वे उन्हें चर्च में ले जाते हैं और फिर उनका धर्मांतरण करवाते हैं। नड़गधरी में एक बहुत बड़ा चर्च बना दिया गया है और मिशनरीज के लोग तेजी से जनजातीयों को कन्वर्ट कर रहे हैं।

यह देखते हुए अग्निवीर की टीम ने जनजातीय क्षेत्र में ऐसे जितने भी अविवाहित जोड़े हैं उनका विवाह करवाने का जिम्मा अपने कंधो पर लिया है।

महेंद्र सिंह ने आगे बताया कि नड़गधरी के 61 जोड़ों के बाद अब इस गाँव में एक भी अविवाहित जोड़ा नहीं है। आने वाले 3 माह में हम सम्पूर्ण विस्तार के दूसरे गाँवों के भी सभी ऐसे जोड़ों का विवाह करवा देंगे।

उन्होंने सनातनियों से अपेक्षा की है कि वे अग्निवीर की टीम को अधिक से अधिक सपोर्ट करें।

गुजरात में घरवापसी
 महेंद्र भाई एवम नेहाबेन के साथ लेखक

तीस्ता सीतलवाड़, प्रतीक सिन्हा का बाप, राना अय्यूब… दंगों के बाद ‘धंधा’ कर लाशों पर बनाया करियर: गोधरा में ज़िंदा जलाए गए थे 59 रामभक्त

साल 2002 में गुजरात के गोधरा में दंगाई इस्लामवादियों की भीड़ ने साबरमती एक्सप्रेस में आग लगा दी थी। इससे अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि से लौट रहे 59 कारसेवक जिंदा जल गए थे। इस घटना के बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। कारसेवकों को जिंदा जलाए जाने के बाद भी हिंदुओं को देश की अदालत पर यह विश्वास था कि एक न एक दिन रामलला के पक्ष में फैसला जरूर आएगा।

बहरहाल, 27 फरवरी, 2002 की सुबह करीब 8 बजे मुस्लिमों ने पूरी प्लानिंग के तहत साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाई थी। इसके कुछ घण्टों बाद जले हुए डिब्बों को अलग कर दिया गया था और ट्रेन एक बार फिर आगे की ओर बढ़ चुकी थी। हालाँकि, इसके बाद दंगाई मुस्लिमों की एक और भीड़ ट्रेन में आग लगाने आई थी। लेकिन वह इस योजना में सफल नहीं हो सके। इसके कुछ घण्टों बाद जैसे ही कारसेवकों के साथ हुए इस हादसे की खबर फैली राज्य में दंगा भड़क उठे।

गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए। हालात में काबू पाने के लिए सेना तक को बुलाना पड़ा था। ‘अहिंसा परमो धर्म:’ वाले राष्ट्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। लोगों को कानून में विश्वास होना चाहिए था। इस्लामवादियों द्वारा हिंदुओं को जिंदा जलाने के बाद भड़के दंगे निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण थे। इस दंगे में मारे गए लोग भारतीय थे। वे हिंदू और मुस्लिम दोनों थे।

हालाँकि, यह देश का दुर्भाग्य ही है कि सैकड़ों भारतीयों की मौत को लेकर आज तक न बाहरी बल्कि देश की रोटी खाने पर तथाकथित कार्यकर्ताओं ने इन मौतों को अपना ‘धंधा’ बना लिया। लोगों के लिए भारतीयों की लाशें और पीड़ितों के आँसू पैसा और प्रसिद्धि कमाने तथा सत्ता परिवर्तन करने के उपक्रम बन गए।

वैज्ञानिक से वकील और तथाकथित कार्यकर्ता से राजनेता बने मुकुल सिन्हा और उनकी पत्नी ने अपना पूरा राजनीतिक करियर गुजरात दंगों में मारे गए लोगों की लाशों पर बनाया है। वह मुकुल सिन्हा ही थे जिन्होंने ट्रेन में अचानक आग लगने की बात को पुरजोर समर्थन देते हुए इसी सिद्धान्त पर जाँच आगे बढ़ाने की वकालत की थी। यही नहीं, सिन्हा और उनके लोगों ने मुस्लिमों को बचाने के लिए भी कई प्रयास किए थे। हालाँकि, जाँच समिति ने ऐसी तमाम साजिशों को नकार दिया था।

मुकुल सिन्हा का बेटा प्रतीक सिन्हा अब मोहम्मद जुबैर के साथ इस्लामिक प्रचार वेबसाइट ‘ऑल्ट न्यूज’ चलाता है। इस वेबसाइट ने हाल ही में भाजपा नेता नूपुर शर्मा के खिलाफ ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए मामला उछाला था। ‘ऑल्ट न्यूज’ की करतूत के बाद ही इस्लामिक कट्टरपंथी नूपुर शर्मा के खून के प्यासे की तरह दिखाई दे रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि पिता मुकुल सिन्हा ने जो आग लगाई थी उसे बेटा प्रतीक सेना आगे बढ़ाने का काम कर रहा है।

लाशों पर महल बनाने वालों में तीस्ता सीतलवाड़ भी पीछे नहीं रहीं। सीतलवाड़ ने भी अपना पूरा करियर गुजरात दंगों पर बनाया है। दरअसल, तीस्ता सीतलवाड़ पर दंगा पीड़ितों के नाम पर इकट्ठा किए गए चंदे को गबन करने का आरोप लगा है। यही नहीं, उन पर मोदी सरकार को फँसाने के लिए लोगों को बरगलाने का भी आरोप है।

दरअसल, तीस्ता सीतलवाड़ ने 2002 के दंगा पीड़ितों के लिए कथित तौर पर धन एकत्र किया था। लेकिन ऐसा आरोप है कि उन्होंने इस धन का उपयोग ‘ऐश उड़ाने’ में किया। यही नहीं, उन पर गुजरात दंगों को लेकर फर्जी गवाहों का उपयोग कर तथा चश्मदीदों को बरगलाकर निर्दोषों को फँसाने का भी आरोप है।

इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि गुप्त षड्यंत्रों तथा अपने बदले के लिए तीस्ता सीतलवाड़ जाकिया अहसान जाफरी की भावनाओं का दुरुपयोग कर रहीं थीं। यही नहीं, सीतलवाड़ ने फर्जी गवाहों और झूठे दस्तावेजों का उपयोग कर इस पूरे मामले में जाँच एजेंसियों को गुमराह करने की कोशिश की।

गुजरात दंगों के मामले में तीस्ता ने संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCR) को भी दो पत्र लिखे थे। अदालत ने उनकी इस हरकत को ‘दुस्साहस’ करार दिया। साथ ही ऐसा दोबारा न करने की हिदायत देते हुए हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा था। अदालत ने माना था कि तीस्ता की इस हरकत ने न केवल एसआईटी जाँच पर सवालिया निशान की तरह थे। बल्कि देश की अदालतों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करने के लिए काफी था।

इसी तरह, हर्ष मंदर जैसे लोगों ने भी गुजरात दंगों में अपना करियर बनाया। हर्ष ने अपनी सिविल सेवा की नौकरी छोड़ दी थी। इसके बाद वह दंगा पीड़ितों के शिविरों में जा-जाकर ‘कार्यकर्ता’ बन गए। गुजरात दंगों को अपना करियर बनाने का मौका देखने वाला हर ‘कार्यकर्ता’ यह जानता था कि मोदी विरोध उसे आगे बढ़ने में मददगार साबित हो सकता है। हर्ष मंदर इनमें से एक है। वह लगातार एक्टिव रहे और साल 2020 में हुए दिल्ली दंगों में भी सक्रियता दिखाते हुए भीड़ को उकसाते हुए पाए गए। हर्ष मंदर के कुख्यात वामपंथी और भारत विरोधी अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस से करीबी संबंध रहे हैं।

दिल्ली में आयोजित हुई एक सभा में बोलते हुए, हर्ष मंदर को विदेशी फंडिंग के बल पर जुटाई गई भीड़ को उकसाते हुए देखा गया था। उन्होंने लोगों से शक्ति प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरने का आह्वान किया था। मंदर ने दावा किया था कि अब समय आ गया है कि लोग सड़कों पर उतरें क्योंकि सुप्रीम कोर्ट और संसद दोनों ने ही उन्हें असफल कर दिया है। यह कहना गलत नहीं है कि साल 2020 के दंगों की जड़ें 2002 के दंगों में भी थीं। साथ ही, इन दोनों दंगों की जड़ें साल 1992 में हुए बाबरी विध्वंस से जुड़ी हुईं थीं।

वाशिंगटन पोस्ट की कॉलमिस्ट राना अय्यूब ने पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। ईडी उनकी 1.7 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त कर चुकी है। अय्यूब ने ऐसे लोगों के तथाकथित स्टिंग ऑपरेशनों पर आधारित एक पूरी ‘किताब’ लिखी, जिन्होंने यह दावा किया था कि दंगों के दौरान उन्हें कानून-व्यवस्था की पूरी जानकारी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर और भारतीय ‘वामपंथी’ लॉबी ने उनकी इस ‘किताब’ को ‘खोजी पत्रकारिता’ बताते हुए जमकर तारीफ की है। हालाँकि, देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया क्योंकि न तो इसमें कुछ सच्चाई थी और न ही दावों में किसी प्रकार का दम।

राना अय्यूब का यह लेख इतना खराब था कि ‘तहलका’ पत्रिका में उनके अपने संपादकों ने भी उनके काम को घटिया करार दिया। वास्तव में यह पत्रकारिता की नैतिकता की अवहेलना करने वाले निम्न स्तर के स्टिंग ऑपरेशन के अलावा कुछ भी नहीं था। हालाँकि, अय्यूब ने यहाँ भी खुद को पीड़ित बताते हुए दावा किया कि मोदी इसे पब्लिश नहीं होना देना चाहते। जबकि सच्चाई यह है कि उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी। राना अय्यूब के स्टिंग ऑपरेशन के समय ‘तहलका’ की प्रधान संपादक रहीं शोमा चौधरी ने कहा था कि राना को उनके ‘खुलासे’ में खामियों के बारे में पता चला। उन्होंने जोर देकर कहा था कि ऐसा नहीं था कि किसी राजनीतिक दबाव के कारण उनके लेख प्रकाशित नहीं किए गए क्योंकि उसके बाद भी उन्होंने मोदी विरोधी लेख प्रकाशित किए थे।

गुजरात दंगों पर अपना करियर आगे बढ़ाने वाली राना अय्यूब आज भी लोगों को दंगों के लिए डराती रहतीं हैं। मुकुल सिन्हा, तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, राणा अय्यूब समेत ऐसे और भी बहुत से कार्यकर्ता, ‘पत्रकार’ और यहाँ तक कि मीडिया घराने भी हैं जो 2002 के दंगों को लेकर मोदी से नफरत फैलाने पर ही फलते-फूलते हैं।

हाल ही में, 2002 के दंगों पर आधारित बीबीसी के प्रोपेगैंडा डॉक्यूमेंट्री के मुद्दे को उछालकर कॉन्ग्रेस ने अपनी सुसुप्तावस्था में पड़ी राजनीति को जगाने की कोशिश की। हालाँकि जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि इससे काम चलने वाला नहीं है तो उन्होंने अडानी और ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के नाम पर हो-हल्ला करना शुरू कर दिया।

हालाँकि इतना सब करने के बाद भी जब इन विदूषकों ने देखा कि मोदी में विरोध उन्हें वह सफलता नहीं मिल पा रही है जिसका उन्होंने प्रयास किया था तो फंडिंग देने वाले जॉर्ज सोरोस ने खुद ही मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला किया। सोरोस के बयानों पर कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर तालियाँ पीटीं। ऐसा लगता है जैसे कि इन लोगों के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि नहीं बल्कि मोदी विरोध ही सर्वोपरि है। मोदी विरोध में ये लोग देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने में भी बाज नहीं आ रहे हैं। इन लोगों ने भारतीयों के शवों पर अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया है। दुःखद यह है कि इतना सब होने के बाद भी उन्हें कोई पछतावा नहीं है।

इटली नाव दुर्घटना में 59 की चली गई जान, मरने वाले भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान के प्रवासी: इस रास्ते पर अब तक 17000 की हो चुकी है मौत

इटली (Italy Boat Wreck) में ​रविवार (26 फरवरी, 2023) को प्रवासियों से भरी एक नाव पलटने से नवजात समेत 59 लोगों की मौत हो गई। यह हादसा इटली के तटीय क्षेत्र कालब्रिया तट के पास समुद्री तूफान में नाव के चट्टान से टकराने के कारण हुआ। इस नाव में भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लोग सवार थे। इस दुर्घटना में 80 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है। इनमें से ज्यादातर तैरकर किनारे आ गए थे। वहीं, कई लोगों के लापता होने की आशंका जताई जा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस नाव पर 150 से 200 लोग सवार थे। मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है। भूमध्य सागर के उस हिस्से में खराब मौसम के कारण बचावकर्मियों को लोगों को बचाने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। दरअसल, यह नाव तुर्की से रवाना हुई थी और भारत, पाकिस्तान अफगानिस्तान, ईरान व कई अन्य देशों से लोगों को ले जा रही थी। इस जहाज को सुबह कालब्रिया के पूर्वी तट पर समुंद्र के किनारे स्थित स्टैकाटो डि कट्रो के पास पहुँचना था। बताया जा रहा है कि पहले तीन शव स्थानीय समयानुसार रविवार सुबह करीब 4:40 बजे दक्षिणी इटली में स्टैकाटो डि कट्रो के पास समुंद्र तट पर मिले।

इटली की फायर बिग्रेड टीम ने सीएनएन को बताया कि नाव से करीब 80 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है। बचाए गए लोग ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हैं। इटली के प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने हादसे पर शो​क व्यक्त करते हुए मानव तस्करों को इसके लिए दोषी ठहराया। उन्होंने कहा, “खराब मौसम में लोगों की जान जोखिम में डालना सही नहीं था। 200 लोगों को एक साथ सिर्फ 20 मीटर लंबी नाव में बिठाना अपराध है। सुरक्षित यात्रा का झूठा वादा कर पैसों के लिए पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का जीवन खतरा में डालना अमानवीय है।”

आंतरिक मंत्री माटेओ पियानटेडोसी (Matteo Piantedosi) ने कहा कि इस तरह की खतरनाक यात्राओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाया जाना चाहिए। वहीं, पोप फ्रांसिस ने कहा कि इस तबाही में फँसे सभी लोगों के लिए वे प्रार्थना कर रहे हैं। इनके अलावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी इटली में प्रवासियों से भरी नाव के पलटने पर दुख जताया है। इसमें मरने वाले 59 लोगों में से 24 से अधिक पाकिस्तानी थे। शरीफ ने कहा कि इटली में नाव दुर्घटना में दो दर्जन से अधिक पाकिस्तानियों की मौत की खबर बेहद चिंताजनक और दुखद है।

बता दें कि भूमध्य सागर मार्ग को दुनिया के सबसे खतरनाक मार्गों में से एक माना जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 से अब तक इस रास्ते का इस्तेमाल करने वाले 17,000 लोग या तो जान गँवा चुके हैं या लापता हो गए हैं।