छत्तीसगढ़ में माओवादी फिर से सिर उठाने लगे हैं। नारायणपुर जिले के भाजपा उपाध्यक्ष सागर साहू की माओवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। शुक्रवार (10 फरवरी 2023) को बाइक पर सवार होकर आए माओवादियों ने जबरन घर में घुसकर गोली मार दी। बीते 5 दिनों में यह भाजपा के दूसरे नेता की हत्या है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शुक्रवार (10 फरवरी 2023) की रात 8 बजे भाजपा जिला उपाध्यक्ष सागर साहू नारायणपुर जिले के छोटे डोंगर गाँव में स्थित अपने घर में टीवी देख रहे थे। इसी दौरान बाइक से दो माओवादी आए और उनके घर का दरवाजा खटखटाया। सागर साहू ने जैसे ही घर का दरवाजा खोला, माओवादी जबरदस्ती करते हुए उनके घर के अंदर घुस गए।
घर में घुसने के बाद माओवादियों ने उनके सिर में 2 गोली मार दी। गोली लगते ही भाजपा नेता गिर गए। घटना को अंजाम देकर माओवादी बाइक पर सवार होकर जंगल की ओर भाग निकले। आनन फानन में उन्हें को स्थानीय हॉस्पिटल में ले जाया गया, जहाँ से उन्हें नारायणपुर जिला चिकित्सालय रेफर किया गया। यहाँ इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
इस हत्याकांड के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस घटनास्थल पर पहुँची। पुलिस को सागर साहू के घर से गोली के 2 खोखे मिले हैं। गोली के खोखे को देखकर पुलिस ने भाजपा नेता सागर साहू की हत्या में AK-47 का इस्तेमाल होने की आशंका जताई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पहले माओवादियों ने सागर साहू को लौह अयस्क संयंत्र की स्थापना का समर्थन न करने की चेतावनी दी थी। इस हत्या को लेकर नारायणपुर के एएसपी हेमसागर सिदार ने कहा है कि मामले की जाँच चल रही है। शुरुआती जाँच में सामने आया है कि नक्सलियों की स्मॉल एक्शन टीम ने हत्या को अंजाम दिया है।
इस हत्या के बाद छत्तीसगढ़ राज्य की शासन व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि मृत भाजपा नेता सागर साहू के घर से महज 100 मीटर दूर एक पुलिस स्टेशन है। हालाँकि इसके बाद भी माओवादियों ने हत्या को अंजाम दे दिया और छत्तीसगढ़ पुलिस गहरी नींद में सोती रही।
बता दें कि इससे पहले माओवादियों ने रविवार (5 फरवरी 2023) को बीजापुर जिले में बीजेपी नेता नीलकंठ कक्केम की चाकू और कुल्हाड़ी मारकर हत्या कर दी थी। वह बीते 15 वर्षों से उसूर के भाजपा मंडल अध्यक्ष थे। नीलकंठ कक्केम साली की शादी की तैयारी करने के लिए अपने गाँव गए थे। इसी दौरान माओवादियों ने परिजनों के सामने उनकी हत्या कर दी थी।
तेलंगाना से डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में एक व्यक्ति कह रहा है कि अगर आज अम्बेडकर जीवित होते तो वो उन्हें मार देता। वीडियो में दिख रहे व्यक्ति का नाम हमारा प्रसाद बताया जा रहा है, जो राष्ट्रीय दलित सेना नाम के समूह का फाउंडर है। वीडियो जारी करने वाले व्यक्ति ने भीमराव अम्बेडकर पर हिन्दू धर्म विरोधी होने का भी आरोप लगाया है। पुलिस ने हमारा प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया है।
इस वीडियो को गुरुवार (9 फरवरी 2023) को बहुजन समाज पार्टी (BSP) के नेता आरएस प्रवीण कुमार ने शेयर किया। वायरल वीडियो में दलित नेता हमारा प्रसाद के हाथों में भीमराव अम्बेडकर की तस्वीर दिखाई दे रही है। वीडियो में आरोपित ने बेहद नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर अम्बेडकर जीवित होते तो वह नाथूराम गोडसे की तरह उन्हें गोली मार देता।
ఒక వైపు ఓట్ల కోసం రోజూ అంబేద్కర్ జపం చేస్తున్న @BRSparty ఈ హమారాప్రసాద్ లాంటి మూర్ఖులు ‘బాబాసాహెబ్ బతికుంటే కాల్చి చంపేవాడిని’ అని కోట్లాది మంది మనోభావాలు దెబ్బతీసినా మీరు ఎందుకు వీడిని IPC153A,PD Act కింద జైలులో పెట్టడం లేదు?రాష్ట్రం అగ్నిగుండం అయ్యే దాకా ఆగుతరా? pic.twitter.com/DfRZpEHi7O
दलित नेता के मुताबिक, अम्बेडकर ने अपनी किताब ‘रीड्स इन हिंदुइज्म’ में हिन्दू भावनाओं का अपमान किया है। उन्होंने जो किताब लिखी है, वो गलत है। बसपा नेता प्रवीण ने इस वीडियो पर कार्रवाई की माँग करते हुए मुख्यमंत्री KCR पर तंज भी कसा।
बसपा नेता ने लिखा कि वो सिर्फ वोट लेने के लिए अम्बेडकर के नाम का जाप करते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वीडियो जारी करने वाले हमारा प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया है। उन पर IPC की धारा 153- A और 505 (2) के तहत कार्रवाई हुई है।
जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख महमूद मदनी (Mahmood Madani) ने कहा है कि इस्लाम सभी धर्मों से पुराना है और यह भारत में बाहर से नहीं आया है। मदनी ने शुक्रवार (10 फरवरी 2023) को कहा कि भारत जितना नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) का है, उतना ही उनका भी है।
दरअसल, दिल्ली के रामलीला मैदान में जमीयत-उलेमा-ए-हिंद का आम सत्र आयोजित चल रहा है। इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए महमूद मदनी ने कहा, “भारत हमारा देश है। यह देश जितना नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत का है, उतना ही यह देश महमूद का भी है। न तो महमूद उनसे एक इंच आगे है और न ही वे महमूद से एक इंच आगे हैं।”
#WATCH | Delhi: India is our country. As much as this country belongs to Narendra Modi and Mohan Bhagwat, equally, this country belongs to Mahmood. Neither Mahmood is one inch ahead of them nor they are one inch ahead of Mahmood: Jamiat Ulema-e-Hind Chief Mahmood Madani (10.02) pic.twitter.com/mB2JBqpTHI
मदनी ने यह भी कहा है कि भारत खुदा के सबसे पहले पैगंबर अब्दुल बशर सईदाला आलम की जमीन है। भारत मुस्लिमों की पहली मातृभूमि है। इसलिए यह कहना कि इस्लाम बाहर से आया, पूरी तरह गलत और आधारहीन है। इस्लाम इसी देश का मजहब है। इस्लाम सभी धर्मों में सबसे पुराना महजब है। भारत हिंदी मुसलमानों के लिए सबसे अच्छा देश है।
साथ ही उन्होंने कहा है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा भड़काने वालों को सजा देने के लिए एक अलग कानून बनाया जाए। मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत और उकसावे के मामलों के अलावा इस्लामोफोबिया में वृद्धि हाल के दिनों में देश में खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है।
मदनी ने आगे है कि आज देश में नफरत का माहौल है। बेबुनियाद प्रोपेगेंडा फैलाने का काम तेजी से किया जा रहा है। ऐसे लोगों को सुप्रीम कोर्ट भी छोड़कर कर उनका हौसला अफजाई कर रहा है। जो देश के लिए खतरा हैं, उन्हें खुला छोड़ा जा रहा है।
मदनी ने कहा कि आज के हालात में अगर स्वामी विवेकानंद, मोहनदास करमचंद गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और चिश्ती के आदर्शों को मानने वाले नेता इसी तरह तमाशाबीन बने रहे तो पता नहीं देश की हालत क्या होगी।
मुस्लिमों की छवि बदलने के लिए किए जाएँ कार्यक्रम
जमीयत के इस सत्र में मुस्लिमों द्वारा बड़ी संख्या में इस्लाम छोड़ने और ‘एक्स मुस्लिम’ अभियान को लेकर भी चिंता जताई गई। इस बैठक में प्रस्ताव लाकर मुस्लिमों को गुमराह होने से बचाने के लिए प्रयास करने की बात कही गई।
इसमें यह भी कहा गया कि विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से मुस्लिमों की छवि एक मददगार और भरोसेमंद बनाकर प्रस्तुत की जाए ताकि फिल्मों, टीवी सीरियलों और किताबों से जो छवि बनाई गई है, उसको सुधारा जा सके। साथ ही महमूद मदनी ने इस्लामवादी युवाओं से हिंसा और जिहाद का रास्ता न अपनाने की भी बात कही।
अमेरिकी (America) क्षेत्र में जासूसी चीनी गुब्बारों के घुसपैठ के बाद अमेरिका और चीन (China) के रिश्तों में और खटास बढ़ गई है। अमेरिका का टेक्सास राज्य अब जो कानून बनाने जा रहा है, उससे निकट भविष्य में दोनों देशों के बीच संबंध सुधार की उम्मीद कम ही नजर आ रही है।
टेक्सास राज्य द्वारा प्रस्तावित कानून के मुताबिक, वहाँ रह रहे चीनी नागरिकों को किसी तरह की प्रॉपर्टी या जमीन खरीदने का अधिकार नहीं होगा। इसके बाद संभव है कि अमेरिका के दूसरे राज्य भी इस तरह का कानून बनाएँ। टेक्सास के इस कदम की चीन ने निंदा की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, टेक्सास राज्य की तरफ से लाए जा रहे नए कानून में रूसी, ईरानी, उत्तर कोरियाई और चीनी मूल के लोगों को टेक्सास राज्य में घर, जमीन, इमारत या दूसरे तरह की संपत्ति खरीदने पर रोक लगाई जाएगी। भले ही कानून में अन्य देशों से जुड़े लोगों का जिक्र है, लेकिन कहा जा रहा है कि मुख्य निशाना चीन है। कानून का मसौदा टेक्सास के रिपब्लिकन सीनेटर लोइस कोलखोर्स्ट (Republican state Sen. Lois Kolkhorst) ने 2022 में पेश किया था।
टेक्सास के रिपब्लिकन गवर्नर ग्रेग एबॉट (Republican Gov. Greg Abbott) ने कहा है कि वे सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी के साथ हैं। यदि सीनेट इस प्रस्ताव को पारित करता है तो वे इस पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald J. Trump) ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है।
विदेशियों द्वारा खेती के नाम पर जमीन और दूसरी तरह की संपत्ति हासिल करने से लोग नाराज है। खास तौर पर चीनी नागरिकों के वहाँ की जमीनों पर बढ़ता कब्जा अमेरिका के लिए बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। रिपोर्ट की मानें तो फ्लोरिडा, साउथ डकोटा और अराकान्स समेत 8 और राज्य इस तरह का कानून बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
उधर चीन के विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राज्य अमेरिका में लाए जा रहे इस नए कानून की निंदा की है। चीन ने अमेरिका के इस कदम को अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन करार दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर व्यापार और निवेश से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण कर रहा है।
माओ निंग ने अमेरिका के इस कदम को बाजार अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन करार दिया। उन्होंने कहा कि चीन ने अमेरिका में कई महत्वपूर्ण निवेश किए हैं, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से हर सवाल का जवाब देने के लिए डेवलप चैटबॉट चैटजीपीटी (ChatGPT) इन दिनों काफी लोकप्रिय हो रहा है। इस बीच गूगल (Google) के एक इंजीनियर ने गीता जीपीटी (Gita GPT) नाम से चैटबॉट लॉन्च किया है। दावा किया जा रहा है कि यह चैटबॉट गीता के आधार पर आपके प्रश्नों का उत्तर देगा।
गीता जीपीटी को बेंगलुरु के गूगल सॉफ्टवेयर इंजीनियर सुकुरु साई विनीत ने विकसित (Develop) किया है। यह जीपीटी-3 पर आधारित प्रोग्राम है। ट्विटर पर इसके बारे में विनीत ने पोस्ट शेयर की है। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि क्या होगा जब आप भगवद्गीता या भगवान श्रीकृष्ण से बात करें? भगवान श्रीकृष्ण का पवित्र गान अब आपके हाथों में। इक्कीसवीं सदी (21st Century) में आपका स्वागत है।
विनीत आपको अर्जुन बनकर भगवान कृष्ण से कठिन से कठिन प्रश्न पूछने का अवसर दे रहे हैं। यह एक चैट जीपीटी टूल है, जो भगवद्गीता के आधार पर प्रश्नों का जवाब देता है। दावा है कि अपने जीवन के समस्याओं का हल भी इस टूल के जरिए प्राप्त किया जा सकता है। यह टूल भगवद्गीता को जानने और समझने में भी आपकी मदद करेगा।
विनीत ने अपने ट्वीट के जरिए समझाया है कि सवालों के जवाब के साथ-साथ आप चाहें तो गीता परामर्श (consult the Gita) भी ले सकते हैं। उन्होंने ऐप पर पूछे गए सवाल का जवाब भी साझा किया है। इसमें उन्होंने गीता जीपीटी से जीवन का अर्थ, धर्म क्या है जैसे कई सवाल पूछे हैं। इसका जवाब गीता के अनुसार नीचे दिया गया है।
भगवद्गीता महाभारत की लड़ाई से पहले भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद पर आधारित ग्रन्थ है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सवालों का जवाब देते हुए ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्ति योग और राजयोग पर विस्तार से चर्चा की है। गीता में भगवान ने मनुष्यों को कर्म के लिए प्रेरित करते हुए, इसका महत्व समझाया है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj, Uttar Pradesh) में चल रहा माघ मेला अब समापन की ओर है। इस माघ मेले (Magh Mela) में सुविधा और सुरक्षा को लेकर अधिकतर संत और श्रद्धालु शासन और प्रशासन से संतुष्ट दिखे। ऑपइंडिया की टीम ने भी धर्मक्षेत्र कहे जाने वाले माघ मेले का दौरा किया।
काफी चीजों में जहाँ शासन-प्रशासन के कार्य सराहनीय पाए गए तो एकाध स्थान ऐसे भी रहे, जो लगा कि सरकार की नजर से छूट गए। इन्हीं स्थानों में सबसे प्रमुख है प्रयागराज में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े स्थान। हमने उन बिंदुओं की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने का फैसला किया है। प्रस्तुत है भाग ..
अधिकतर स्थान अंग्रेजों के नाम पर
गुरुवार (9 फरवरी 2023) को हम उस चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में थे, जहाँ 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लड़ते हुए आज़ाद ने वीरगति पाई थी। यहाँ ये बात गौर करने योग्य है कि चंद्रशेखर आजाद को घेरकर खुद को गोली मारने पर मजबूर करने वालों में अधिकतर सिपाही भारतीय थे।
ये भारतीय सिपाही ब्रिटिश अफसर नॉट बावर के अधीनस्थ लड़ रहे थे। उन्हीं में एक प्रमुख नाम इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह का है, जो उस समय कर्नलगंज थाने का SHO हुआ करता था। उस कर्नलगंज थाने का नाम आज भी ज्यों-का-त्यों ही है।
थाना कर्नलगंज, प्रयागराज (फाइल फोटो)
प्रयागराज न सिर्फ चंद्रशेखर आज़ाद, बल्कि उनके साथी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से विख्यात रामप्रसाद सिंह तोमर सहित कई अन्य वीरों की कर्मभूमि रहा है। हालाँकि, यहाँ घूमते हुए आपको कई स्थानों के नाम अभी भी अंग्रेजों के नाम पर मिल जाएँगे। इनमें स्टैनली रोड, कर्नलगंज, मम्फोर्डगंज, बेली रोड व अस्पताल और एलनगंज आदि प्रमुख हैं।
पार्क में घुसते ही दरगाह
चंद्रशेखर आज़ाद पार्क का मुख्य द्वार गेट नंबर 1 है। यहाँ से पार्क में घुसने वालों को 0 किलोमीटर का बोर्ड भी लगा दिखाई देता है। जैसे ही गेट नंबर 1 से कोई पार्क में प्रवेश करता है, वैसे ही उसे पार्क प्रशासन और DM प्रयागराज का बोर्ड लगा मिलता है।
इस बोर्ड में साफ तौर पर हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए लिखा गया गया है कि उस स्थान का प्रयोग सिर्फ पार्क के लिए होगा। हालाँकि, इसी बोर्ड से महज 50 मीटर की दूरी पर हमें एक मजार दिखी जहाँ कई लोग जियारत करते दिखाई दिए।
दरगाह का बाहरी हिस्सा
वसीम हैं दरगाह के खादिम
जैसे ही हम मज़ार के अंदर गए तो वहाँ हमें कुछ लोग एक कुएँ के पास घेरा लगाए बैठे मिले। दरगाह 2 हिस्सों में थी और दूसरे भाग में कुछ लोग एक कब्र को घेरे हुए थे। हमने वहाँ के खादिम से बात करनी चाही तो वसीम नाम के व्यक्ति से हमने मिलवाया गया।
वसीम ने हमें दरगाह को औरंगजेब के जमाने का बताया। वहाँ जियारत कर रहे लोगों के बारे में वसीम ने दावा किया कि दरगाह पर आने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। खादिम वसीम ने हमें बताया कि वो सरकार से चाहते हैं कि मज़ार को व्यापक रूप दिया जाए।
दरगाह के खादिम वसीम और उनके सहयोगी
सुन्नी वक्फ बोर्ड का लगा है पोस्टर
जब हमने खादिम वसीम को मजार के बारे में और बताने के लिए कहा तो उन्होंने हमें एक बोर्ड दिखाया, जिस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड लिखा हुआ था। हमने बोर्ड को पूरा पढ़ा तो उसमें अरबी भाषा में 786 के बाद वो जगह हजरत शंदल शाह और गुलाब शाह बाबा की दरगाह लिखी हुई थी।
दरगाह की जगह कम्पनी बाग़ यानी चंद्रशेखर आज़ाद पार्क के अंदर बताई गई। इस बोर्ड में दावा किया गया है कि गुलाब शाह और शंदल शाह 1857 की क्रान्ति में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। हालाँकि, हमने पार्क प्रशासन से इस दावे के संबंध में सबूत माँगे तो उनके पास यह मौजूद नहीं था।
वक्फ बोर्ड वाली दरगाह
उर्दू में है, पढ़ नहीं पाओगे
1857 की क्रांति में गुलाब शाह और शंदल शाह की शहादत के बारे में जब हमने मजार के खादिम वसीम से कुछ सबूत दिखाने के लिए कहा तो उन्होंने टाल दिया। खादिम वसीम बोले, “कागज उर्दू में है। पढ़ नहीं पाओगे।”
सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के इस पोस्टर के मुताबिक, यह जगह पहले रसूलपुर व समदाबाद नाम से जानी जाती थी। इसी बोर्ड में दरगाह के लिए सहयोग की अपील की गई है। खादिम के तौर पर बोर्ड में किसी जमील खाँ का नाम लिखा हुआ था। हालाँकि, खुद को खादिम बता रहे वसीम ने यह बोर्ड उखाड़ कर अंदर रखा हुआ था।
दरगाह से सट कर पार्क को पार्क ही रखने का हाईकोर्ट के हवाले से आदेश
मर्द टोपी पहने और औरतें न छुएँ मजार
इस मजार के गेट मुख्य पर शंदल शाह का नाम हजरत सैयद फ़िरोज़ अली बाबा रहमत उल्लाह अलैह के तौर पर भी दर्ज है। मजार के बाहर साफ तौर पर आदेश है कि मर्द अंदर घुसने से पहले सिर पर टोपी रखें और औरतें पल्लू।
इसमें औरतों को साफ़ तौर पर आदेश है कि वो मजार का पीछा करके न जाएँ और आगे से आएँ। औरतों को मजार छूने से भी साफ मना किया गया है। यहाँ जो चंदा देना चाहते हैं, उसके लिए एक गुल्लक रखा हुआ है।
दरगाह के निर्देश
बाहर फूल बेच रही महिला लम्बे समय से बीमार
हालाँकि, मजार के खादिम वसीम का कहना था कि वहाँ आने के बाद तमाम समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है, लेकिन मजार के बाहर लम्बे समय से फूल बेचने वाली महिला खुद को लम्बे समय से बीमार बता रही थी।
दरगाह के ही एक सदस्य से लम्बी बातचीत की रिकॉर्डिंग ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें वो तमाम दवा लेने और अस्पतालों के चक्कर लगाने की जानकारी दे रही है। हैरानी की बात ये रही कि दरगाह का नियमित सदस्य ही उस महिला को अच्छे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे रहा था।
दरगाह में माँगी जा रही दुआ
बात दें कि अक्टूबर 2021 में साल हाईकोर्ट के आदेश पर चंद्रशेखर पार्क के अंदर बने मस्जिद, मजार, 14 कब्र सहित दर्जन भर अवैध अतिक्रमणों को तोड़ा गया था। हाईकोर्ट ने साल 1975 के बाद बने अवैध निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया था।
इन अवैध निर्माणों को हटाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र सिंह बिसेन याचिका दाखिल की थी। उन्होंने याचिका में कहा था कि इतने महान स्वतंत्रता सेनानी से जुड़े इस पार्क पर अतिक्रमण होना मामूली घटना नहीं है। एक साजिश के तहत इस पर कब्जा किया जा रहा है।
बता दें कि कि चंद्रशेखर आजाद पार्क 133 एकड़ में फैला है। अवैध अतिक्रमण हटाने से पहले लगभग 25-30 साल पहले वहाँ मस्जिद, मजार और कब्र बना दिए गए थे। उस दौरान वहाँ लगभग 20 मजार व तीन मस्जिद बनाई जा चुकी थीं।
हालाँकि, यहाँ बने मजार पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपना दावा किया है। सितंबर 2022 में मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में एक याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि ये मजार 200 साल पुराना है। हालाँकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मजार अवैध है।
प्रयागराज में ही मौजूद चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े एक अन्य भूले-बिसरे स्थान की चर्चा हम अपनी अगली रिपोर्ट में करेंगे।
2047 में भारत को अंग्रेजों से आजादी मिले 100 साल पूरे हो जाएँगे। तब तक का रास्ता आसान होगा, ऐसा नहीं है। वो देश जिसे दो हिस्सों इस्लामिक पाकिस्तान और धर्मनिरपेक्ष भारत में बाँट दिया गया था, उसके बँटवारे के 100 साल पूरे होने से पहले एक नापाक मंसूबा सामने दिखाई दे रहा है। इस नापाक मंसूबे को पूरा करने के लिए कट्टर इस्लामी और वामपंथी भारत को एक बार फिर उन परिस्थितियों की ओर धकेल रहे हैं, जिसके कारण पहले उसका विभाजन हुआ था।
जुलाई 2022 में, ऑपइंडिया ने एक खास दस्तावेज़ की डिटेल निकाली थी, जो प्रतिबंधित कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने अपने सदस्यों को प्रसारित किया था। ‘विजन 2047’ नाम के दस्तावेज में गजवा-ए-हिंद के रोडमैप की डिटेल थी। इसमें उनकी योजना मुस्लिमों को कट्टरपंथी बनाना, ‘कायर हिंदुओं’ पर पूरी तरह से हावी होना, भारतीय संविधान को शरीयत कानून में बदल देना, हिंदुओं का नरसंहार करना और भारत को एक इस्लामिक राष्ट्र में बदल देना है।
महाराष्ट्र एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड (एटीएस) ने 2 फरवरी 2023 को 5 पीएफआई आतंकवादियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की, जिन्हें गैरकानूनी गतिविधियों और राष्ट्र के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन के खिलाफ देशव्यापी छापेमारी के दौरान गिरफ्तार किया गया था। महाराष्ट्र एटीएस की मुंबई इकाई ने जिन 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया उनके नाम हैं – मजहर खान, सादिक शेख, मोहम्मद इकबाल खान, मोमिन मिस्त्री और आसिफ हुसैन खान। पीएफआई के साथ इनका कनेक्शन था। यही नहीं, पीएफआई के खिलाफ कार्रवाई शुरू होने के बाद से इस्लामिक संगठन से जुड़े 100 से अधिक आतंकवादियों को कई एजेंसियों ने गिरफ्तार किया है।
महाराष्ट्र एटीएस द्वारा 5 आरोपितों के खिलाफ दायर चार्जशीट 600 से अधिक पन्नों की है। इसमें बताया गया है कि आरोपित 2047 तक भारत को एक इस्लामिक राष्ट्र में बदलने की दिशा में कैसे काम कर रहे थे। विजन 2047 दस्तावेज, जिसे जुलाई 2022 में ऑपइंडिया द्वारा विशेष रूप से विस्तार से बताया गया था, को भी इसमें संलग्न किया गया है। चार्जशीट में पीएफआई के नापाक मंसूबों और उनकी योजनाओं को पूरा करने के लिए उनके गुर्गों के काम करने के खूँखार तरीकों को भी बताया गया है।
चार्जशीट में उन 5 आरोपितों के बारे में निम्नलिखित खुलासे किए गए हैं, जो PFI से जुड़े आतंकी थे:
पीएफआई और आतंकवादी संगठन के साथ काम करने वाले कट्टर इस्लामी देश के खिलाफ साजिश रच रहे थे।
महाराष्ट्र के चेंबूर, धारावी, कुर्ला, ठाणे, नेरुल, पनवेल और मुंब्रा में पीएफआई सदस्यों द्वारा गुप्त बैठकें की गईं। इन बैठकों में, उन्होंने योजना बनाई कि देश के खिलाफ कैसे काम किया जाए, मुस्लिमों को कट्टरपंथी बनाने और 2047 तक भारत को एक इस्लामी राष्ट्र में बदलने के लिए साजिश भी रची गई।
पीएफआई ने मुस्लिमों को अपने साजिश का हिस्सा बनाने के लिए उन्हें विश्वास दिलाने की योजना बनाई थी कि देश इस्लाम के खिलाफ काम कर रहा है और उन्हें हिंदुओं के खिलाफ एकजुट होना है।
पीएफआई का मंसूबा इस्लामी शरिया के साथ भारत के संविधान को बदलने की दिशा में काम करना है।
वे भारत को इस्लामी राज्य बनाना चाहते हैं।
वे चाहते थे कि मुस्लिमों को केवल मुस्लिमों के रूप में ही जाना जाए न कि भारतीयों के रूप में।
पीएफआई ने मुस्लिमों के खतरे में होने और उन पर अत्याचार होने के दुष्प्रचार को आगे बढ़ाया।
पीएफआई पैसा जुटाना चाहता था और भारतीय लोकतंत्र को खत्म करने के लिए विदेशी संगठनों से मदद लेना चाहता था। यही नहीं, भारत को इस्लामी राष्ट्र में बदलने की अपनी योजना को पूरा करना चाहता था।
आरोपितों में से दो को कानून का ज्ञान था और वे उसी के अनुसार टीम का मार्गदर्शन कर रहे थे।
आरोपितों में से एक मुस्लिम युवकों को भर्ती करने के खिलाफ था।
साल 2047 पीएफआई द्वारा दी गई केवल एक समय सीमा नहीं है। बल्कि वामपंथी भी सामाजिक न्याय की आड़ में भारत में अशांति फैलाने के लिए इसी तरह के एजेंडे को चला रहे हैं।
8 फरवरी को लेखक और शिक्षाविद राजीव मल्होत्रा ने हार्वर्ड में होने वाले एक कार्यक्रम के बारे में ट्वीट किया, जहाँ भारत पर ‘जाति’ का ट्रायल होगा। उन्होंने ट्वीट किया कि कई भारतीय दानदाता इस कार्यक्रम को प्रायोजित कर रहे हैं।
Happening at Harvard. India on trial over caste. This conf is sponsored by many Indian donors. pic.twitter.com/FR3EBc3P8j
11 फरवरी 2023 को आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम का नाम हार्वर्ड 2023 में भारत सम्मेलन रखा गया है। हार्वर्ड वेबसाइट पर इसके बारे विवरण दिया गया है। हार्वर्ड में वार्षिक भारत सम्मेलन के दौरान होने वाली पैनल चर्चाओं में से एक का शीर्षक है, “2047 तक जाति को खत्म करने के लिए क्या करना होगा।”
हार्वर्ड इवेंट शेड्यूल का स्क्रीनशॉट
इस पैनल में शामिल वक्ताओं ने भारत की एकता को तोड़ने वाले लफ्ज़ों का इस्तेमाल किया और हिंदुओं के खिलाफ पीएफआई की तरह जहर उगला। सेंटर फॉर सोशल इक्विटी एंड इंक्लूजन (CSEI) और नेशनल यूथ इक्विटी फोरम (NYEF) के सह-संस्थापक और निदेशक सत्येंद्र कुमार का ट्विटर प्रोफाइल देखने के बाद आपको पता चल जाएगा कि उनकी सोच क्या है। दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगे भड़कने से कुछ दिन पहले उनका उद्देश्य काफिरों को सबक सिखाना था। कुमार ने 2020 में ट्वीट किया था, “ना तो हम CAA-NPR-NRC आने देंगे, ना ही मोदी को जिम्मेदारी से भागने देंगे!”
ना तो हम CAA-NPR-NRC आने देंगे, ना ही मोदी को ज़िम्मेदारी से भागने देंगे ! https://t.co/KHfzH448tG
उन्होंने कन्हैया कुमार के ट्वीट को भी रीट्वीट किया था, जिन्होंने पीएफआई के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए हिंदुओं के खिलाफ जहर उगला था।
ट्वीट को सत्येंद्र कुमार ने रीट्वीट किया
वार्ता के अन्य पैनलिस्ट, दलित लेखक चंद्रभान प्रसाद प्रचार-प्रसार के अनुभवी हैं। 2018 में, जब भीमा-कोरेगाँव घटना के बाद नक्सलियों द्वारा दंगा किया गया, तो चंद्रभान प्रसाद ने इसके लिए ऑरेंज ब्रिगेड को दोषी ठहराया था।
उन्होंने हाल ही में कॉन्ग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी को समर्थन भी दिया था।
अगले पैनलिस्ट थेनमोझी साउंडराजन (Thenmozhi Soundararajan) हैं, जो इक्वैलिटी लैब्स के कार्यकारी निदेशक हैं। इक्वैलिटी लैब्स संयुक्त राज्य अमेरिका में ब्राह्मणवाद विरोधी जाति सक्रियता समूह है। इसका प्रभाव इतना है कि ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी ने एक बार बड़े पैमाने पर विवाद खड़ा कर दिया था। डोर्सी ने 2018 में, जो प्लेकार्ड पकड़ा था, उसमें ‘Smash the Brahminical Patriarchy’ (ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की धज्जियाँ उड़ा दो) लिखा था। इसकी वजह से इस पहचान से जुड़े लोगों ने ट्विटर पर डोर्सी की आलोचना की थी और उन्हें हिंसा का समर्थक और एक पहचान विशेष का विरोधी बताया था। इक्वैलिटी लैब्स ने अमित जानी के खिलाफ भी कड़ा अभियान चलाया, जिन्होंने जो बिडेन अभियान में काम किया था, उन पर ‘हिंदू फासीवाद’ का समर्थन करने का आरोप लगाया गया।
इस कार्यक्रम में दलित लेखिका यशिका दत्त भी पैनलिस्ट हैं। हिंदुओं के खिलाफ अक्सर जहर उगलने वाली यशिका ने सीएए के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन का भी समर्थन किया था और मुस्लिम अपराधियों को बचाने का प्रयास किया था।
There is a clear thread emerging:
‘Demonize’ protestors by characterizing them as exclusively Muslim (instead of Hindus, Sikhs + Christians)✓
Target Muslim-dominated areas + Muslim appearing protestors with brutal violence ✓
यही नहीं हार्वर्ड सम्मेलन में हिंदुओं को गलत ठहराने, कट्टर इस्लामियों द्वारा उन पर किए जा रहे अत्याचारों को क्लीन चिट देने के अलावा मुस्लिम समुदाय को पीड़ितों के रूप में पेश किया जाएगा।
हार्वर्ड इवेंट शेड्यूल का स्क्रीनशॉट
हर्ष मंदर भी पैनल के सदस्य हैं। हर्ष मंदर सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के एक विदेशी वित्त पोषित एनजीओ, सोनिया गाँधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी थे, जिसने हिंदू विरोधी सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का मसौदा तैयार किया था। ध्यान दें कि मार्च 2020 में, ऑपइंडिया ने यह खबर प्रसारित की थी कि हर्ष मंदर ने कैसे मुस्लिमों को सड़कों पर आने के लिए उकसाया और हिंसा भड़काने का प्रयास किया था।
इससे यह प्रमाणित होता है कि वामपंथी जो भारत की संप्रभुता पर हमला करते रहे हैं, वे अब सम्मेलनों में हिंदू के खिलाफ अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। वे इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि 2047 तक भारत को कैसा होना चाहिए। उनका उद्देश्य 2047 तक भारत को एक इस्लामिक राष्ट्र में बदलना है। यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि कट्टर इस्लामी और वामपंथी भारत में अशांति पैदा करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं, ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर रहे हैं, जो 1947 में भारत के विभाजन और हिन्दुओं के नरसंहार का कारण थी।
दिल्ली (Delhi) में स्थानीय लोगों ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) के नाम पर घर-घर जाकर रुपए वसूलने वाले गिरोह को पकड़ा है। हैरान करने वाली बात यह है कि वसूली करने वाले कोई और नहीं, बल्कि कश्मीरी मुस्लिमों (Kashmiri Muslim) का ही गिरोह है।
ऑपइंडिया को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक, एक महिला समेत 5-6 लोगों का एक गिरोह कश्मीरी पंडितों के नाम पर लोगों से हजारों रुपए वसूल रहा था। इनमें से तीन लोगों को स्थानीय लोगों ने पकड़ लिया है। इसके बाद उन्हें कंझावाला पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस इन लोगों से पूछताछ कर रही है।
मामला समाने आने के बाद ऑपइंडिया ने स्थानीय लोगों से संपर्क किया। मामला नॉर्थ वेस्ट दिल्ली के कराला गाँव का है। लोगों ने बताया कि कुछ लोग विस्थापित कश्मीरी पंडितों के नाम पर लोगों से चंदा माँग रहे थे। स्थानीय लोगों को जब शक हुआ तो उन्होंने पैसे वसूल रहे 2 लोगों से आई कार्ड दिखाने के लिए कहा।
दोनों संदिग्ध पहचान पत्र दिखाने के नाम पर आनाकानी करने लगे। इससे लोगों का शक और गहरा गया। स्थानीय लोगों ने इन संदिग्धों को रोककर पूछताछ शुरू कर दी। लोगों को संदिग्धों के पास से नेशनल स्टूडेंट कैंप नाम से कई पन्नों की पर्ची मिली। इस पर देनदार के साथ वसूले गए चंदे की रकम लिखी हुई थी।
स्थानीय लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो का स्क्रीन शॉट
स्थानीय लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो का स्क्रीन शॉट
कुछ देर के बाद दोनों कश्मीरियों ने स्थानीय लोगों को अपना आधार कार्ड दिखलाया। आधार कार्ड के मुताबिक, पकड़े गए कश्मीरी में से एक का नाम शब्बीर अहमद खान है, जो कुलगाम के चट्टाबल का रहने वाला है। दूसरे की पहचान फाज़िल अहमद खान के तौर पर हुई है। फाज़िल अनंतनाग के नरसेंगपोरा का रहने वाला है।
इन लोगों के साथ कश्मीरी महिलाएँ भी पकड़ी गई है। मामले में दिल्ली के कंझावला थाने में शिकायत दी गई है। शिकायतकर्ता के अनुसार, 6 लोगों का एक गिरोह है, जो नेशनल स्टूडेंट कैंप के नाम पर लोगों से अवैध तौर पर रुपए वसूल रहे हैं।
स्थानीय लोगों ने उस पर्ची का भी वीडियो ऑपइंडिया को सौंपा है, जिसमें वसूले गए लोगों के नाम और रकम दर्ज है। पर्ची में दी गई जानकारी के अनुसार, स्थानीय लोगों ने 500 से लेकर 5 हजार रुपए तक की रकम दी चंदा के तौर पर दी है।
लोगों का कहना है कि पुलिस इस बात का पता लगाए कि रकम कहाँ खर्च करने के लिए वसूली जा रही है। लोगों को शक है कि कश्मीर से भगाए गए कश्मीरी पंडितों के नाम पर रुपए जमा करने के बाद इनका इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।
स्थानीय लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो का स्क्रीन शॉट
मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए ऑपइंडिया ने कंझावला थाने से कई बार संपर्क करने की कोशिश की। हालाँकि, थाने की तरफ से फिलहाल कोई जानकारी साझा नहीं की गई है। शिकायतकर्ता की मानें तो पुलिस ने शुरुआत में टाल-मटोल की कोशिश की, लेकिन स्थानीय लोगों के दबाव के कारण उन्होंने जाँच की बात कही है।
जानकारी मिली है कि कंझावला थाने में 3 कश्मीरी मुस्लिम युवक और 3 महिलाओं से पूछताछ की जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले भी कई संदिग्ध गाँव में आकर कश्मीरी पंडितों के नाम पर वसूली करते रहे हैं।
साल 2019 में हरियाणा के फरीदाबाद के एक स्थानीय पत्रकार ने फेसबुक लाइव पर नेशनल स्टूडेंट कैंप के नाम पर अवैध वसूली का जिक्र किया था। इस लाइव में पत्रकार ने संदिग्ध कश्मीरी मुस्लिमों द्वारा फरीदाबाद के अलग-अलग स्थानों से पैसा जुटाने की बात कही थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने गुरुवार (9 फरवरी 2023) को विपक्ष पर जमकर हमला बोला। राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा करते हुए पीएम मोदी ने कहा है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु और इंदिरा गाँधी ने 90 बार चुनी हुई सरकारों को गिराया। इंदिरा गाँधी ने तो 50 बार संविधान के आर्टिकल 356 का दुरुपयोग किया।
क्या है आर्टिकल 356?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस आर्टिकल 356 के दुरुपयोग की बात कही है, उसे आम भाषा में राष्ट्रपति शासन कहा जाता है। राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद वह राज्य सीधे केंद्र सरकार के शासन के अधीन आ जाता है। वहाँ राज्यपाल के निर्देश पर सारे कार्य होते हैं।
राष्ट्रपति शासन केंद्रीय मंत्री मण्डल की अनुशंसा पर लगाया जाता है। केंद्र सरकार की अनुशंसा के बाद राष्ट्रपति संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उपयोग करते हुए किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं। राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए कुछ नियमों का पालन करने के लिए कहा गया है।
1.) यदि राष्ट्रपति को लगता है कि किसी राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि राज्य सरकार संविधान के नियमों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती है।
2.) राज्यपाल द्वारा निर्धारित समय के भीतर यदि मुख्यमंत्री का चुनाव नहीं होता है, तब राज्यपाल की अनुशंसा पर राष्ट्रपति आर्टिकल 356 का उपयोग कर सकते हैं।
3.) जब सरकार अल्पमत में हो और राज्यपाल द्वारा दी गई समयावधि में मुख्यमंत्री बहुमत साबित न कर पाएँ।
4.) अविश्वास प्रस्ताव के बाद अल्पमत में सरकार।
5.) प्राकृतिक आपदा, युद्ध या महामारी या अन्य विषम परिस्थितियों के कारण चुनाव स्थगित होने की स्थिति में भी राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।
यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए हर हाल में राज्यपाल की अनुशंसा की आवश्यकता होती है। देश में अब तक जितनी बार भी राष्ट्रपति शासन लगाया गया है, उसमें से अधिकांश बार इन नियमों का उल्लंघन कर ही लगाया है। इसके लिए पंडित नेहरू और इंदिरा गाँधी का शासन हमेशा आलोचना के घेरे में रहा है।
कितने समय के लिए लगाया जा सकता है राष्ट्रपति शासन?
आर्टिकल 356 के तहत किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन 6 महीने के लिए लगाया जा सकता है। इसके बाद इस समय अवधि को अधिकतम 3 साल तक बढ़ाया जा सकता है। राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए राष्ट्रपति को संसद की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वह अपने विवेक से इसे हटा सकते हैं।
जिस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है, वहाँ की सारी व्यवस्था सीधे केंद्र सरकार के हाथों में होती है। राज्य की शासन व्यवस्था कहने को तो राष्ट्रपति के हाथों में होती है, लेकिन उसे चलाती केंद्र सरकार है। बता दें कि केंद्र की सरकार भी राष्ट्रपति के नाम पर ही चलती है।
कब-कब हुआ आर्टिकल 356 का इस्तेमाल…
आर्टिकल 356 का इस्तेमाल पहली बार 20 जून 1951 को पंजाब की गोपीचंद भार्गव सरकार को गिराने के साथ हुआ था। उस समय पंजाब में 302 दिनों तक राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। गोपीचंद भार्गव कॉन्ग्रेस से ही मुख्यमंत्री थे। सरकार के पास पूर्ण बहुमत था। राज्य में कोई विपरीत परिस्थिति भी नहीं थी, लेकिन इसके बाद भी राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।
इसके बाद साल 1954 में आंध्र प्रदेश की लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को भी आर्टिकल 356 के तहत उखाड़ फेंका गया था। उस समय आंध्र के मुख्यमंत्री तन्गुतुरी प्रकाशम थे। कॉन्ग्रेस की सरकार होने के बाद भी राष्ट्रपति शासन लगने का कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू का वामपंथियों से भय को माना जाता है। दरअसल, नेहरू को डर था कि आंध्र प्रदेश में कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आ सकती है।
पंडित नेहरू द्वारा सरकार गिराने की शुरू की गई प्रथा को इंदिरा गाँधी ने आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालाँकि, लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह की सरकार में भी राष्ट्रपति शासन लगा, लेकिन 356 के दुरुपयोग का सबसे बड़ा आरोप इंदिरा गाँधी पर लगता रहा है।
इंदिरा गाँधी ने कुल मिलाकर 51 बार राज्य सरकारों को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया था। आँकड़ों को देखें तो इंदिरा गाँधी का बतौर प्रधानमंत्री करीब 15 साल का कार्यकाल रहा। इस दौरान 1966 से 1977 के बीच 36 बार तथा 1980 से 1984 के बीच उन्होंने 15 बार अलग-अलग राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाए। साल 1980 में आपातकाल के बाद सरकार में वापसी होते ही इंदिरा गाँधी ने जनता पार्टी की लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई 9 सरकारें गिरा दी थीं।
इंदिरा गाँधी के साथ-साथ मोरारजी देसाई के कार्यकाल में 21 बार तो पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में 11 बार राष्ट्रपति शासन लगा गया था। जनता पार्टी के तीन साल के कार्यकाल में 6 महीने का चौधरी चरण सिंह का कार्यकाल भी शामिल है।
वहीं, राजीव गाँधी के कार्यकाल में 6 बार तो मनमोहन सिंह के समय 12 बार आर्टिकल 356 का उपयोग व दुरुपयोग किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कॉन्ग्रेस पर हमला करने की बड़ी वजह यह रही है कि देश में अब तक कुल 132 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है। इनमें से करीब 90 बार कॉन्ग्रेस की सत्ता के समय राष्ट्रपति शासन लागू करते हुए सरकारें गिराई गईं।
अंबेडकर ने बताया था ‘संविधान का मृतपत्र’
भारतीय संविधान समिति के अध्यक्ष भीमराव अंबेडकर ने आर्टिकल 356 को ‘संविधान का मृत पत्र’ कहा था। अंबेडकर ने कहा था कि उन्हें लगता है कि राजनीतिक फायदे के लिए इस आर्टिकल का दुरुपयोग किया जा सकता है।
अंबेडकर ने कहा था, “मुझे लगता है कि ऐसे आर्टिकल्स को कभी भी लागू नहीं किया जाएगा और वे एक मृत पत्र बने रहेंगे। यदि इन्हें लागू किया जाता है तो मुझे उम्मीद है कि राष्ट्रपति, राज्य सरकारों को निलंबित करने से पहले उचित सावधानी बरतेंगे। मैं आशा करता हूँ कि यदि किसी राज्य सरकार ने गलती की है तो पहले उसे चेतावनी दी जाएगी।”
भारतीय पशु कल्याण बोर्ड ने 14 फरवरी को काउ हग डे (Cow Hug Day) मनाने की अपील की थी। हालाँकि अब शुक्रवार (10 फरवरी 2023) को बोर्ड ने यह अपील वापस ले ली। इससे पहले बोर्ड ने सोमवार (6 फरवरी 2023) काउ हग डे मनाने की अपील की थी।
पशु कल्याण बोर्ड द्वारा जारी नए आदेश में कहा गया है, “सक्षम प्राधिकारी और मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के निर्देशानुसार 14 फरवरी 2023 को काउ हग डे मनाने के लिए भारत के पशु कल्याण बोर्ड की ओर से जारी की गई अपील वापस ली जाती है।”
योग दिवस की तरह ही भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के सहयोग से मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ‘काउ हग डे’ मनाने की पहल की थी। हालाँकि बोर्ड द्वारा इस फैसले को वापस लेने के पीछे के कारण का खुलासा अब तक नहीं हो सका। बता दें कि भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) भारत सरकार का एक संवैधानिक निकाय है, जिसे पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (पीसीए एक्ट) के अंतर्गत बनाया गया था।
इससे पहले बोर्ड की तरफ से की गई अपील में कहा गया था, “हम सब जानते हैं कि गाय भारतीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। गाय हमारे जीवन को बनाए रखने के अलावा पशुधन और जैव विविधता का प्रतिनिधित्व भी करती है। माँ के समान पोषक प्रकृति और दूध देने के कारण गायों को कामधेनु और गौमाता के नाम से जाना जाता है। अपील में आगे लिखा है कि पश्चिमीकरण के कारण हमने अपनी संस्कृति और वैदिक परंपराओं को भुला दिया है।”
अपील में यह भी कहा गया था, “गाय के उपकारों के बदले उसे गले लगाने से गायों के साथ हमारा भावनात्मक जुड़ाव होगा। इसलिए गाय से प्रेम रखने वाले लोगों को 14 फरवरी को COW HUG DAY मनाना चाहिए। इस दिन को मनाते हुए हमें मानव जीवन पर गाय के उपकारों और गाय की महत्ता को याद करना चाहिए। ताकि हमारा जीवन सकारात्मक और खुशहाल बना रहे।”