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जब-जब श्रद्धा के टुकड़े फेंकने जाता मोबाइल घर पर ही छोड़ जाता था आफताब, CCTV से बचने का भी बना रखा था प्लान: रिपोर्ट

श्रद्धा हत्याकांड (Shraddha Murder Case) मामले में दिल्ली पुलिस को सबूतों को जुटाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। श्रद्धा की हत्या करने वाला आफ़ताब अमीन पूनावाला (Aftab Amin Poonawalla) न सिर्फ सनकी है, बल्कि शातिर भी है। अदालत में भले उसने कह दिया कि उसने जो कुछ किया गुस्से में किया, लेकिन पुलिस जाँच में उसकी सुनियोजित साजिश का खुलासा हो रहा है।

इस मामले की जाँच कर रही दिल्ली की महरौली पुलिस (Delhi Police) का कहना है कि आफताब पूनावाला ने सावधानीपूर्वक योजना बनाई थी कि श्रद्धा वालकर की हत्या के बाद उसके शरीर के अंगों को कैसे ठिकाने लगाना है। इसके लिए उसने सावधानी अपनाई थी।

मिड डे की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस को यह भी पता चला है कि वह ट्रैक किए जाने और पकड़े जाने से बचने के लिए हर तिकड़म अपनाता था। जब भी वह श्रद्धा के अंगों को फेंकने के लिए घर से बाहर निकलता था तो वह अपना मोबाइल फोन घर पर ही छोड़ देता था। इस वजह से पुलिस को हत्याकांड के हर पहलुओं को एक साथ जोड़ने में परेशानी हो रही है।

पूनावाला के फ्लैट मार्किंग स्पॉट से शरीर के अंगों को ठिकाने लगाने के लिए जो नक्शा मिला है, वह एक और कारण है जिससे पुलिस को संदेह है कि उसने योजना बनाई थी। एक अधिकारी ने बताया कि उसने हत्या के बाद हर कदम पर योजना बनाई। उसने इलाके की रेकी की और अंगों के फेंकने के लिए फ्लैट से 2 किलोमीटर दूर जंगलों के अंदरूनी भाग को चुना।

पुलिस का कहना है कि आफताब ने न केवल ‘डेक्सटर’ जैसी क्राइम सीरीज से प्रेरणा ली, बल्कि सबूतों को नष्ट करने के तरीके का भी अध्ययन किया। उसकी सोच यह थी कि हत्या का पता चलने पर भी कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ ​​पुख्ता सबूत की कमी के कारण उस पर अपराध का आरोप ना लगा सकें।

दिल्ली पुलिस ने मंगलवार (22 नवंबर 2022) को आफताब पूनावाला को अदालत में पेश करते हुए इसी आधार पर उसकी हिरासत माँगी थी। दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया कि उसे घटनाओं के क्रम को स्थापित करने और सबूत खोजने के लिए और समय की जरूरत है।

पुलिस विभाग के सूत्रों ने कहा कि पुलिस के पास आफताब के पिछले छह महीनों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) हैं, लेकिन मई और जून के महीनों में मोबाइल की लोकेशन उसके छतरपुर हिल्स स्थित फ्लैट की है। इसी दौरान आफ़ताब ने श्रद्धा के शव के 35 टुकड़ों को ठिकाने लगाया था।

पूछताछ के दौरान आफताब ने पुलिस को बताया कि उसने श्रद्धा के शव के अधिकांश टुकड़े दिल्ली के महरौली के जंगलों और गुरुग्राम के जंगल में फेंके थे। हालाँकि, मोबाइल लोकेशन इन जगहों की नहीं है। इससे पता चलता है कि वह जानबूझकर शव के टुकड़े फेंकने के वक्त मोबाइल लेकर नहीं जाता था।

पुलिस के सामने दूसरी चुनौती सीसीटीवी फुटेज की है। हत्याकांड के छह महीने बीत चुके हैं और पुलिस को सबूत के तौर पर कोई डेटा नहीं मिल रहा है। बकौल पुलिस अधिकारी, उसके फ्लैट के ठीक सामने एक सीसीटीवी कैमरा है। हालाँकि, अब इसमें घटना के समय का कोई फुटेज उपलब्ध नहीं है।

शातिर आफताब ने शव को ठिकाने लगाने में महीनों का समय लिया और हत्या के बाद कुछ महीने बाद तक श्रद्धा का सोशल मीडिया प्रोफाइल ऐक्टिव रखा, ताकि किसी को संदेह ना हो। पुलिस ने यह भी कहा कि आफताब को पता था कि श्रद्धा अपने परिवार के संपर्क में नहीं है।

पुलिस के अनुसार, “श्रद्धा के कुछ दोस्तों ने ही सोशल मीडिया पर उससे संपर्क करने की कोशिश की थी, क्योंकि उसका नंबर बंद था। उस दौरान आफताब ने उनमें से कुछ को सोशल मीडिया पर जवाब दिया था। इसलिए किसी को भी संदेह नहीं था कि कुछ गलत हुआ है।”

इस बीच, दिल्ली पुलिस की एक टीम ने फोरेंसिक विशेषज्ञों की मदद से आगे की तलाशी लेने के लिए बुधवार (23 नवंबर 2022) को फिर से आफताब के फ्लैट की तलाशी ली। एक अन्य टीम पूनावाला द्वारा बताए गए स्थानों का निरीक्षण करने महरौली जंगल भी गई। पुलिस ने गोताखोरों को भी महरौली तालाब की तलाशी लेने के लिए भी बुलाया, ताकि पता लगाया जा सके कि श्रद्धा के शरीर के अंग उसमें फेंके गए हैं या नहीं।

दूसरी ओर, आफताब पूनावाला का पॉलीग्राफ टेस्ट बुधवार (23 नवंबर 2022) को नहीं हो सका। कहा जा रहा है कि वह चिकित्सकीय रूप से फिट नहीं था। उसे कथित तौर पर बुखार था। डॉक्टरों ने कहा कि वह पॉलीग्राफ टेस्ट कराने के लायक नहीं है। गुरुवार (24 नवंबर 2022) को उसका पॉलीग्राफ टेस्ट हो सकता है।

अस्पताल में दिग्गज एक्टर विक्रम गोखले, मौत की अफवाहों पर बोली बेटी- वे जिंदा हैं: कभी कंगना और भगवा का समर्थन करने पर बने थे निशाना

बॉलीवुड अभिनेता विक्रम गोखले के निधन की खबरों के बीच जहाँ फिल्म सितारे उन्हें सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देने में लग गए, वहीं इस बीच उनके परिवार का बयान आया है। परिवार का कहना है कि विक्रम अपनी बिगड़ी तबीयत के कारण अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन अभी उनका निधन नहीं हुआ है।

82 वर्षीय विक्रम गोखले खराब तबीयत के कारण दीनानाथ मंगेश्कर अस्पताल में भर्ती हुए थे। उनकी बेटी ने कहा, “उनकी हालात गंभीर है। उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है। मगर अभी उनका देहांत नहीं हुआ है। उनके लिए दुआ करते रहिए।” 

वहीं गोखले के परिवार के करीबी आनंद दवे ने कहा, “अभी उन्हें कुछ खास दवाइयाँ दी गई हैं। उन्हें पुणे उनके घर करीब 10 बजे लेकर जाया जाएगा। उनकी दोनों बेटियों ने अपील की है कि उनके पिता की तबीयत के बारे में कोई अफवाहें न उड़ाई जाएँ।”

बता दें कि एक्टर विक्रम गोखले ‘हम दिल दे चुके सनम, परवाना, भूल भुलैया’ जैसी तमाम बॉलीवुड फिल्मों में अपनी एक्टिंग से जान डाल चुके हैं। पिछले साल भी वो कंगना रनौत के एक बयान का समर्थन करने के कारण चर्चा में आए थे।

विक्रम गोखले ने किया था कंगना का समर्थन

कंगना ने एक कार्यक्रम के दौरान 1947 में मिली आजादी को ‘भीख’ बताया था। इस पर गोखले ने उनका समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि कंगना रनौत ने जो कहा वह उससे सहमत हैं। विक्रम गोखले महाराष्ट्र के पुणे में एक कार्यक्रम में शामिल होने पहुँचे थे। तभी उन्होंने यह भी कहा था कि भारत को कभी भी ‘हरा’ नहीं होना चाहिए और इसे ‘भगवा’ बनाए रखने के प्रयास किए जाने चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा था कि “कंगना रनौत ने जो कहा मैं उससे सहमत हूँ। हमें भीख में आजादी मिली। यह दिया गया था। बहुत से स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें फाँसी दी गई थी, बड़े-बड़े लोगों ने उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की। वे मूकदर्शक बने रहे।” गोखले ने बाद में इंडियन एक्सप्रेस से भी कहा, “कंगना रनौत ने जो कहा, उससे मैं भी सहमत हूँ कि हमें 2014 में असली आजादी मिली थी।”

उनके इस बयान के बाद उन्हें निशाना बनाया गया था। कई लोगों ने उन्हें भाजपा ज्वाइन करने की सलाह दी थी। इस पर गोखले ने कहा था कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंधभक्त नहीं हैं। उन्होंने कहा, “जब पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह चुनाव प्रचार पर जाते हैं, तो मैं उनकी बातों से सहमत नहीं होता। लेकिन हाँ, जब वे राष्ट्रहित में काम करते हैं, जैसे कि जिस तरह से उन्होंने चीन को बैकफुट पर पहुँचा दिया है, तो मैं उनका समर्थन करता हूँ।”

भारत की सख्ती से कतर की हेकड़ी गुम, कहा- जाकिर नाइक को FIFA वर्ल्ड कप में हमने नहीं बुलाया

इस बार फीफा वर्ल्ड कप (FIFA World Cup) फुटबॉल से ज्यादा अन्य कारणों से चर्चा में है। कतर (Qatar) में रविवार (20 नवंबर 2022) से शुरू इस आयोजन में शामिल होने के लिए कट्टरपंथी मजहबी और भारत का वांछित भगोड़ा जाकिर नाइक (Zakir Naik) को निमंत्रण दिया गया था। भारत द्वारा इस पर कड़ी आपत्ति जताने के बाद कतर ने अब सफाई दी है।

कतर ने राजनयिक माध्यमों से भारत को सूचित किया कि भगोड़े इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक को दोहा में आयोजित फीफा विश्व कप के दौरान भाग लेने के लिए आधिकारिक निमंत्रण नहीं दिया गया था। कतर का कहना है कि अन्य देशों ने जानबूझकर ये गलत जानकारी फैलाई, ताकि भारत-कतर के द्विपक्षीय संबंधों को खराब किया जा सके।

भारत ने फीफा वर्ल्ड कप के ओपनिंग सेरेमनी में जाकिर नाइक शामिल होने की सूचना मिलते ही तत्काल कतर के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया था। मोदी सरकार ने कतर को स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि जाकिर नाइक को VVIP बॉक्स से फुटबवॉल देखने के लिए आमंत्रित किया गया तो भारत को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की यात्रा को रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

हालाँकि, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ओपनिंग सेरेमनी में शामिल हुए थे और उसके अगले दिन ही भारत लौट आए थे। दरअसल, सबसे पहले अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित एक संस्था मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कतर ने दवाह से जुड़े इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक को फीफा की ओपनिंग सेरेमनी में बुलाया है। उल्लेखनीय है कि दवाह एक इस्लामिक प्रैक्टिस है, जहाँ गैर मुस्लिमों का धर्म परिवर्तन कराया जाता है और इस्लाम धर्म अपनाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है।

कतर भले ही जाकिर नाइक को आधिकारिक निमंत्रण देने से इनकार कर रहा हो, लेकिन स्टेडियम में प्रवेश करते उसकी तस्वीर वायरल हुई थी। इस तस्वीर को अंशुल सक्सेना नाम के एक ट्विटर यूजर ने शेयर किया था।

कतर के सरकारी खेल चैनल अलकास (Alkass) के प्रस्तोता फैसल अलहाजरी ने ट्विटर पर नाइक की कतर में उपस्थिति की जानकारी दी। फैसल अलहाजरी ने ट्विर पर जाकिर नाइक का फोटो डालते हुए लिखा, “इस्लामी मजहबी गुरु शेख जाकिर नाइक विश्व कप के दौरान कतर में हैं और पूरे विश्व कप के दौरान वे कई दीनी व्याख्यान देंगे।”

इससे पहले साल 2019 में कट्टरपंथी उपदेशक जाकिर नाइक का कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी द्वारा व्यक्तिगत रूप से दोहा में स्वागत किया गया था। उस समय दोनों की फोटो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी।

बता दें कि जाकिर नाइक अपने महजबी तकरीरों के जरिए समाज में ना सिर्फ नफरत फैलाता है, बल्कि मुस्लिम युवाओं को जिहाद और आतंकवाद के लिए भी प्रेरित करता है। हाल ही में कई गिरफ्तार आतंकियों ने बताया था कि वे जाकिर नाइक का वीडियो देखकर आतंकवाद की ओर बढ़े थे।

जाकिर नाइक पर भारत में उस पर मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद को बढ़ावा देने, धर्मांतरण से जुड़ाव, समाज में नफरत फैलाने, हेट स्पीच सहित कई गतिविधियों में लिप्त होने के कारण उस पर मामला दर्ज किया गया है। वह भारत का भगोड़ा और वांछित है। भारत सरकार उसे देश में लाने का लगातार प्रयास कर रही है।

साल 2016 के अंत में भारत ने नाइक के इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार की कार्रवाई की भनक लगते ही जाकिर नाइक भागकर मलेशिया चला गया। उसके बाद साल 2017 में जाकिर नाइक को भगोड़े घोषित कर दिया गया।

मलेशिया में भी जाकिर नाइक ने अपने भाषणों के जरिए हिंदुओं और चीनियों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की थी। इसके बाद मुस्लिम बहुल देश मलेशिया की पुलिस ने उससे पूछताछ भी की थी। बाद में वहाँ की सरकार ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देते हुए साल 2020 में देश में जाकिर नाइक के भाषण देने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

‘मेरे मामा मेरी मातृभूमि से बढ़कर नहीं हो सकते’: जिसने उत्तर-पूर्व की रक्षा के लिए मामा का भी किया वध, जिसके ‘त्रिभुज’ में औरंगजेब की फौज डूबी

भारतवर्ष का इतिहास लाचित बरपुखान/लाचित बोड़फुकन (Lachit Borphukan) जैसे वीर सपूतों के शौर्य और वीरता का महाख्यान है। इसके कोने-कोने से आने वाले इसके वीर सपूतों की अनेक गाथाएँ, अपनी मातृभूमि के प्रति इन वीरों की निष्ठा, त्याग और समर्पण की अनेक अकल्पनीय कहानी प्रस्तुत करती हैं। ऐसी ही एक अद्भूत और अकल्पनीय कहानी है लाचित बरपुखान की।

मुगल आक्रांताओं से उत्तर-पूर्व भारत की पवित्र भूमि की रक्षा करने वाले वीरयोद्धा लाचित बरपुखान का जीवन और व्यक्तित्व शौर्य, साहस, स्वाभिमान, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का पर्याय है। प्रसिद्ध इतिहासकार सूर्यकुमार भूयान ने उनकी मौलिक रणनीति और वीरता के कारण उन्हें उत्तर-पूर्व भारत का ‘शिवाजी’ माना है। वास्तव में, लाचित बरपुखान ने उत्तर-पूर्व भारत में वही स्वातंत्र्य-ज्वाला जलाई जो मुगल आक्रांताओं के विरुद्ध पश्चिम भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज ने, पंजाब में गुरू गोविंद सिंह ने और राजपूताना में महाराणा प्रताप ने जलाई थी। इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए पूर्व राज्यपाल श्री श्रीनिवास कुमार सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘मिशन असम’ में लिखा है, “महाराष्ट्र और असम हमारे विशाल और महान देश के दो विपरीत छोर पर हो सकते हैं। लेकिन वे एक सामान्य इतिहास, एक साझी विरासत और एक सामान्य भावना से एकजुट होते हैं। मध्ययुगीन काल में उन्होंने दो महान सैन्य नेताओं, महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी और असम में लाचित बरपुखान को जन्म दिया है।”

भारत में इस वीर योद्धा की स्मृति को नमन करते हुए प्रतिवर्ष 24 नवम्बर को ‘लाचित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। लाचित बरपुखान का जन्म 24 नवंबर 1622 ई को अहोम साम्राज्य के एक अधिकारी सेंग कालुक-मो-साई के घर में चराइदेऊ नामक स्थान पर हुआ था। उनकी माता कुंदी मराम थीं और उनका पूरा नाम ‘चाउ लाचित फुकनलुंग’ था। उन्होंने सैन्य कौशल के साथ-साथ मानविकी तथा शास्त्र का भी अध्ययन किया था। बचपन से ही अत्यंत बहादुर और समझदार लाचित जल्द ही अहोम साम्राज्य के सेनापति बन गए। ‘बरपुखान’ लाचित का नाम नहीं, बल्कि उनकी पदवी थी। उत्तर-पूर्व भारत के राजनीतिक इतिहास का अनुशीलन करने पर यह ज्ञात होता है कि अहोम सेना की संरचना बहुत ही व्यवस्थित थी। एक देका दस सैनिकों का, बोरा बीस सैनिकों का, सेंकिया सौ सैनिकों का, हजारिका एक हजार सैनिकों का और राजखोवा तीन हजार सैनिकों का जत्था होता था। इस प्रकार बरपुखान छः हजार सैनिकों का संचालन करता था। लाचित बरपुखान इन सभी के प्रमुख थे।

‘बरपुखान’ के रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व वे अहोम साम्राज्य के राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़साल के अधीक्षक थे। वे परमवीर और राजा के अत्यंत विश्वासपात्र थे। प्रारम्भ में उन्हें रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सिमलूगढ़ किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के अधीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। लाचित बरपुखान जैसे योद्धा के रहते मुगल आक्रांता भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र को अपने अधीन नहीं कर सके। लाचित ने शक्तिशाली मुगलों से न सिर्फ टक्कर ली, बल्कि उन्हें परास्त करके उनके अभिमान और अभियान को तहस-नहस करते हुए उत्तर-पूर्व विजय के उनके अरमान को सदा के लिए चकनाचूर कर दिया।

लाचित ने बीमार होते हुए भी भीषण युद्ध किया और अपनी असाधारण नेतृत्व क्षमता और अदम्य साहस से सराईघाट की प्रसिद्ध लड़ाई में लगभग 4000 मुगल सैनिकों को मार गिराया। 1671 ई में सराईघाट, ब्रह्मपुत्र नदी में अहोम सेना और मुगलों के बीच ऐतिहासिक लड़ाई हुई, जिसमें लाचित ने पानी में लड़ाई (नौसैनिक युद्ध) की सर्वथा नई तकनीक आजमाते हुए मुगलों को पराजित किया। उन्होंने अपने भौगोलिक-मानविकी ज्ञान और गुरिल्ला युद्ध की बारीक रणनीतियों का प्रयोग करते हुए सर्वप्रथम मुगल फौज की ताकत का सटीक आकलन किया और फिर ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर भीषण नौसैनिक युद्ध में उन्हें हरा दिया। लाचित ने अपनी मौलिक युद्धनीति के तहत रातोंरात अपनी सेना की सुरक्षा हेतु मिट्टी से दृढ़ तटबंधों का निर्माण कराया। उन्होंने मातृभूमि और देशवासियों के स्वाभिमान और हित को अपने सगे-संबंधियों से सदैव ऊपर रखा। अत: युद्धभूमि में अपने मामा की लापरवाही को अक्षम्य मानकर उनका वध कर दिया और कहा कि ‘मेरे मामा मेरी मातृभूमि से बढ़कर नहीं हो सकते’।

युद्ध के समय अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए कहा गया उनका यह बोधवाक्य–लाचित जियाइ थका माने गुवाहाटी एरा नाही (अर्थात् जब तक लाचित जीवित है, उससे गुवाहटी कोई नहीं छीन सकता), उनकी निर्भीकता, वीरता और कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय देता है। घायल और अत्यंत अस्वस्थ लाचित ने अपने सैनिकों में जोश भरने के लिए कहा था, “जब मेरे देश पर आक्रमणकारियों का खतरा बना हुआ है, जब मेरे सैनिक उनसे लड़ते हुए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा रहे हैं, तब मैं महज बीमार होने के कारण कैसे अपने शरीर को आराम देने की सोच सकता हूँ।” ऐसे आदर्श और प्रेरक सेनानायक की स्मृति को सम्मान देने के लिए राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को ‘लाचित बरपुखान स्वर्ण पदक’ से सम्मानित किया जाता है। लाचित बरपुखान की स्मृति को चिरस्थायित्व प्रदान करने के लिए उनके समाधि स्थल जोरहाट से 16 किमी दूर हुलुन्गपारा में ‘स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वार’ का भी निर्माण किया गया है।

दरअसल, लाचित बरपुखान का महत्व समझने के लिए अहोम साम्राज्य का सारांश व इतिहास जानना-समझना आवश्यक है। बारह सौ अठाईस में असम में ताई अहोम वंश का शासन स्थापित हुआ जो मयंमार से आए थे। इस राजवंश ने सदियों तक खिलजी, तुगलक, इलियास शाही, लोदी और बंगाल सुल्तानों के आक्रमण से सफलतापूर्वक अपनी रक्षा की। लेकिन 1648 में मुगलों के एक बड़े आक्रमण में हारकर उन्हें बड़ी आर्थिक हानि झेलनी पड़ी। फिर 1658 में औरंगजेब मुगल बादशाह बना और 1661 में उसने अपने दो प्रमुख सेनापतियों मीर जुमला और दिलेर खान को पहले बंगाल और फिर असम पर आक्रमण करने के लिए भेजा। अहोम साम्राज्य की शक्ति और शौर्य, जिसके बल पर इस साम्राज्य ने इतने लंबे समय तक सारे आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया था, वह क्षीण होने लगा था। मुगल सेनापतियों मीर जुमला और दिलेर खान द्वारा किए गए इस हमले में अहोम साम्राज्य पराजित हो गया। इस साम्राज्य के कई किले तो बिना कोई लड़ाई लड़े हाथ से निकल गए। अहोम के राजा जयध्वज सिंघा को इस युद्ध में पीछे हटना पड़ा और उन्होंने पूर्वोत्तर का बड़ा हिस्सा इस युद्ध में खो दिया। इतना ही नहीं, उनको मुगल साम्राज्य के साथ एक अपमानजनक संधि के लिए राजी होना पड़ा, जिसके तहत उन्हें न सिर्फ धन, भूमि, हाथी; बल्कि अपनी छः साल की बेटी को भी मुगल हरम में देना पड़ा।

अहोम साम्राज्य की पराजय और अपमान के कारण राजा जयध्वज सिंघा को बहुत बड़ा सदमा पहुँचा, जिसके कारण जल्दी ही उनकी मृत्यु हो गई। उनके बाद चक्रध्वज सिंघा को राजा बनाया गया। उनका बरपुखान बनने के बाद लाचित के सामने बहुत-सी चुनौतियाँ थीं। उनके सामने एक तरफ मुगलों की विशाल और संगठित फ़ौज थी, जिसका संचालन करने वाले साइस्ता खान और दिलेर खान जैसे अनुभवी सेनापति थे। दूसरी तरफ अहोम साम्राज्य की निराश और विभाजित सेना थी। अगले चार वर्षों तक लाचित बरपुखान ने अपना पूरा ध्यान अहोम सेना के नव-संगठन और अस्त्र-शास्त्रों को इकट्ठा करने में लगाया। इसके लिए उन्होंने नए सैनिकों की भर्ती की, जल सेना के लिए नौकाओं का निर्माण कराया, हथियारों की आपूर्ति, तोपों का निर्माण और किलों के लिए मजबूत रक्षा प्रबंधन इत्यादि का दायित्व अपने ऊपर लिया। उन्होंने यह सब इतनी चतुराई और समझदारी से किया कि इन सब तैयारियों की मुगलों को भनक तक नहीं लगने दी। लाचित बरपुखान की चतुराई के कारण कूटनीतिक तरीके से मुगलों के साथ में दोस्ती का दिखावा भी चलता रहा। ये लाचित की राजनीतिक सूझबूझ एवं दूरदर्शिता का उत्तम उदहारण था।

मुगल शासन द्वारा 1668 में गुवाहाटी के फौजदार रशीद खान को बदल कर फिरोज खान को नियुक्त किया गया। वह बेहद ऐय्याश किस्म का व्यक्ति था। उसने चक्रध्वज सिंघा को सीधे-सीधे असमिया लड़कियों को ऐय्याशी के लिए अपने पास भेजने का आदेश दिया। इससे लोगों में मुगलों के खिलाफ लड़ने के लिए जोश और आक्रोश भरने लगा। लाचित ने लोगों के इस जोश और आक्रोश का सही प्रयोग करते हुए उसी समय गुवाहाटी के किले को मुगलों से छीनने का निर्णय लिया। लाचित बरपुखान के पास एक शक्तिशाली और निपुण जल सेना के साथ समर्पित जासूसों का संजाल तो था, परन्तु घुड़सेना की भारी कमी थी। यही कारण है कि अहोम सेना द्वारा घेराबंदी करने के बाद भी महीनों तक गुवाहाटी के किले को स्वतंत्र नहीं कराया जा सका, जिसकी रक्षा इटाकुली का किला कर रहा था। अंत में लाचित बरपुखान ने दूसरी योजना बनाई, जिसके अनुसार दस-बारह सिपाहियों ने रात के अँधेरे का फायदा उठाते हुए चुपके से किले में प्रवेश कर लिया और मुगल सेना की तोपों में पानी डाल दिया। अगली सुबह ही लाचित ने इटाकुली किले पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

इस विजय के साथ ही एक बार फिर गुवाहाटी ने आजादी की साँस ली। लेकिन यह आजादी ज्यादा दिन तक कायम नहीं रह पाई। जब औरंगजेब को इसके बारे में पता चला तब वह गुस्से से तिलमिला उठा। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के बेटे रामसिंह को सत्तर हजार सैनिकों की बड़ी सेना के साथ अहोम से लड़ने के लिए असम भेजा। रोचक बात यह है कि राम सिंह के साथ सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर भी असम आए थे, किंतु उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए लाचित के विरुद्ध होने वाले इस युद्ध में भाग नहीं लिया। उधर लाचित ने बिना एक पल व्यर्थ किए किलों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए सभी आवश्यक तैयारियाँ प्रारंभ कर दीं।

अपनी भूल से अहोम सेना के प्राण संकट में डालने वाले अपने मामा को प्राणदंड देने की घटना ने लाचित बरपुखान को अपने ही सैनिकों की दृष्टि में बहुत ऊँचा उठा दिया। अब सबको यह विश्वास होने लगा कि मुगलों का सामना करना और उनका मुकाबला करना असंभव नहीं है। इस युद्ध में अहोम सेना जब तक छापामार या गुरिल्ला युद्ध कर रही थी, तब तक राम सिंह पर भारी पड़ रही थी। लेकिन फिर कुछ ही समय बाद रामसिंह ने युद्ध-नैतिकता का उल्लंघन करते हुए छल-कपट शुरू कर दिया। लाचित से रुष्ट कुछ टुकड़ी प्रमुखों को लालच देकर राम सिंह अपनी ओर करने में भी सफल हो गया। फिर उसने अहोम सेना को मैदानी युद्ध के लिए उकसाया। लाचित को पता था कि खुले युद्ध में मुगलों से जीत पाना असंभव है, क्योंकि उनके पास बेहतरीन घुड़सेना थी। लेकिन राजा चक्रध्वज सिंघा ने आवेश में आकर मैदानी युद्ध का आदेश दे दिया। इस प्रकार 1669 के अलाबोई के इस मैदानी युद्ध में अहोम सेना की भयानक हार हुई और लाचित के दस हजार से ज्यादा सैनिकों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी।

दुर्भाग्य से 1670 में राजा चक्रध्वज सिंघा का देहांत हो गया और उदयादित्य सिंघा नए राजा बने। 1671 के आरंभ में राम सिंह को अपने गुप्तचरों से पता चला कि अन्दुराबली के किनारे पर रक्षा इंतजामों को भेदा जा सकता है और गुवाहाटी को फिर से हथियाया जा सकता है। उसने इस अवसर का फायदा उठाने के उद्देश्य से मुगल नौसेना खड़ी कर दी। उसके पास चालीस जहाज थे जो सोलह तोपों और छोटी नौकाओं को ले जाने में समर्थ थे। दुर्भाग्यवश लाचित इस समय इतने अस्वस्थ हो गए कि उनका चलना-फिरना भी अत्यंत कठिन हो गया। 1671 के मार्च महीने में सराईघाट का युद्ध आरंभ हुआ। यह युद्ध उस यात्रा का चरमोत्कर्ष था जो यात्रा आठ वर्ष पहले मीर जुमला के आक्रमण से आरंभ हुई थी। भारतवर्ष के इतिहास में कदाचित् यह पहला महत्वपूर्ण युद्ध था जो पूर्णतया नदी में लड़ा गया। ब्रह्मपुत्र नदी का सराईघाट इस ऐतिहासिक युद्ध का साक्षी बना। इस युद्ध में ब्रह्मपुत्र नदी में एक प्रकार का त्रिभुज बन गया था, जिसमें एक ओर कामख्या मंदिर, दूसरी ओर अश्वक्लान्ता का विष्णु मंदिर और तीसरी ओर इटाकुली किले की दीवारें थीं। यह भीषण युद्ध जलस्थिति इसी त्रिभुजाकार सेना-संरचना में लड़ा गया।

इस निर्णायक युद्ध में अहोम सेना ने महान योद्धा लाचित बरपुखान के नेतृत्व में अपने वर्षों के युद्धाभ्यास से अर्जित रणकौशल का अद्भुत प्रदर्शन किया। इस युद्ध में अहोम सेना ने अनेक आधुनिक युक्तियों का उपयोग किया। यथा- पनगढ़ बनाने की युक्ति। युद्ध के दौरान ही बनाया गया नौका -पुल छोटे किले की तरह काम आया। अहोम की बच्छारिना (जो अपने आकार में मुगलों की नाव से छोटी थी) अत्यंत तीव्र और घातक सिद्ध हुई। इन सभी आधुनिक युक्तियों ने लाचित बरपुखान की अहोम सेना को मुगल सेना से अधिक सबल और प्रभावी बना दिया। दो दिशाओं से हुए प्रहार से मुगल सेना में हडकंप मच गया और सांयकाल तक उसके तीन अमीर और चार हजार सैनिक मारे गए। इसके बाद मुगल सेना पूरी तरह तबाह होकर मानस नदी के पार भाग खड़ी हुयी। दुर्भाग्यवश इस युद्ध में घायल लाचित बरपुखान ने कुछ दिन बाद ही प्राण त्याग दिए। वीर सपूत लाचित बरपुखान के नेतृत्व में अहोम सेना द्वारा अर्जित की गई सराईघाट की इस अभूतपूर्व विजय ने असम के आर्थिक विकास और सांस्कृतिक समृद्धि की आधारशिला रखी। आगे चलकर असम में अनेक भव्य मंदिरों आदि का निर्माण हुआ। यदि सरायघाट के युद्ध में मुगलों की विजय होती, तो वह असम के लिए सांस्कृतिक विनाश और पराधीनता लेकर आती। लेकिन लाचित बरपुखान जैसे भारत माँ के वीर सपूत के अदम्य साहस और असाधारण नेतृत्व क्षमता के कारण ही मुगल साम्राज्य के दुष्प्रभाव से अहोम साम्राज्य बच सका। मरणोपरांत भी लाचित असम के लोगों और अहोम सेना के ह्रदय में अग्नि की ज्वाला बनकर धधकते रहे और उनके प्राणों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। लाचित बरपुखान द्वारा संगठित सेना ने 1682 में मुगलों से एक और निर्णायक युद्ध लड़ा, जिसमें उसने अपने सेनापति लाचित को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इटाकुली किले से मुगलों को खदेड़ दिया। परिणामस्वरूप, मुग़ल फिर कभी असम की ओर नहीं आए।

मुगल आक्रांताओं को पराजित करके स्वराष्ट्र के स्वाभिमान और गौरव की रक्षा करने वाले लाचित बरपुखान जैसे प्रेरणास्पद पूर्वजों से प्रभावित होकर ही तिरोत सिंह, नंगबाह, पा तागम संगमा, वीरांगना रानी रुपलियानी, रानी गाइदिन्ल्यू, मनीराम दीवान, गोपीनाथ बारदोलोई, कुशल कुँवर, कनकलता बरुआ आदि स्वाधीनता सेनानियों ने आगे चलकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भी आजीवन संघर्ष किया। उत्तर-पूर्व भूमि की पवित्रता और स्वाधीनता की रक्षा में लाचित बरफूकन के शौर्य और बलिदान का अप्रतिम और आदि महत्व है। उनका जीवन-आदर्श और जीवन-मूल्य ही परवर्ती स्वाधीनता सेनानियों का पाथेय और प्रेरणा बने। यही कारण है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 24 नवम्बर 2015 को “लाचित दिवस” के अवसर पर उनकी वीरता को रेखांकित करते हुए कहा था, “लाचित भारत के गौरव हैं। सराईघाट के युद्ध में उनके द्वारा प्रदर्शित अभूतपूर्व साहस को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है।” इस वर्ष असम सरकार द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में उनकी जन्मजयंती को बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। आजादी की अमृत महोत्सव बेला में इतिहास के उपेक्षित नायकों की पुनर्प्रतिष्ठा सराहनीय पहल है।

(लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता, छात्र कल्याण हैं)

3 हिंदू लड़की, OYO रूम, नंगी फोटो: महावीर कॉलेज के लव जिहादी जीतू शेख का VHP ने पहले किया स्टिंग, फिर दौड़ा-दौड़ाकर पीटा

गुजरात के सूरत से लव जिहादी की पिटाई का मामला सामने आया है। घटना महावीर कॉलेज की है। बताया जा रहा है कि विश्व हिन्दू परिषद (VHP) के कार्यकर्ताओं ने हिंदू लड़कियों को फँसाने वाले जीतू शेख का पहले स्टिंग किया। उसके बाद कैंपस में ही उसकी पिटाई की गई। घटना बुधवार (23 नवम्बर 2022) की है। हालाँकि इस मामले में पुलिस से शिकायत नहीं किए जाने की बात सामने आ रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना महावीर कॉलेज की है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विहिप कार्यकर्ताओं को कॉलेज से लव जिहाद की शिकायत मिली थी। पता चला था कि मुस्लिम छात्र कुछ हिंदू लड़कियों को ब्लैकमेल कर रहे हैं। इसकी पुष्टि के लिए विहिप ने एक स्टिंग किया। इसमें मामला सही पाया गया।

VHP के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष दिनेश नावड़िया के मुताबिक उन्हें जानकारी मिली थी कि कई मुस्लिम लड़के सोशल मीडिया पर फर्जी ID बनाकर हिंदू लड़कियों से चैटिंग करते हैं। साथ ही कुछ मुस्लिम लड़कों के हिंदू लड़कियों से अफेयर की भी जानकारी मिली थी।

स्टिंग में जीतू शेख लड़कियों के OYO होटल की तस्वीरों के बारे में कैमरे पर बता रहा है। वह 3 हिंदू गर्लफ्रेंड होने का दावा करता है। उन लड़कियों के नाम भी बताता है। वह कहता है कि पहले उसकी हिंदू लड़कियों के साथ नॉर्मल दोस्ती थी। लेकिन अभी कुछ हुआ है। एक लड़की की 2 नंगी फोटो अपने पास होने का दावा करते हुए जीतू शेख ने लड़की को अपने साथ अक्सर OYO ले जाने की बात करता है।

बताया जा रहा है कि स्टिंग वीडियो को देखने के बाद VHP कार्यकर्ता कॉलेज में घुसे और उन्होंने 3 मुस्लिम छात्रों की पिटाई की। मारपीट का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हालाँकि विहिप नेता दिनेश नावड़िया के अनुसार अभी उन्हें समझाकर छोड़ा गया गया। बाद में और भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

कहा जा रहा है कि विवाद के दौरान कॉलेज प्रशासन ने छात्रों को बाहर जाकर झगड़ा करने के लिए कहा था। यह भी जा रहा है कि कॉलेज प्रशासन ने परिसर के अंदर लव जिहाद के आरोपों से इनकार किया है।

भारतीय सेना ने PoK वापस लेने की बात की तो ‘आहत’ हो गई ऋचा चड्ढा, ‘गलवान’ का जिक्र कर बलिदानी सैनिकों का उड़ाया मजाक

बॉलीवुड अपने स्तरहीन कंटेंट की वजह से लगातार गर्त में जा रहा है। दर्शक इनकी बेसिर पैर की फिल्मों को ख़ारिज कर रहे हैं। दूसरी ओर बॉलीवुड हस्तियाँ अपने खराब कॉमन सेंस और भारत विरोधी रुख की वजह से भी चर्चा में रहते हैं। इसका ताजा उदाहरण ऋचा चड्ढा (Richa Chadha) हैं। ऋचा चड्ढा ने बुधवार (23 नवंबर 2022) को ट्विटर पर भारतीय सेना का मजाक उड़ाया।

दरअसल भारतीय सेना के उत्तरी कमान के कमांडिंग-इन-चीफ उपेन्द्र द्विवेदी ने एक बयान में कहा था अगर सरकार आदेश जारी करती है तो वे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) को वापस लेने के लिए तैयार हैं। इस बयान को ‘बाबा बनारस’ नाम के ट्विटर हैंडल से शेयर किया गया था। इसी ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए ऋचा ने भारतीय सेना का मजाक उड़ाया और ताना मारते हुए कहा कि गलवान हाय (Galwan says hi) बोल रहा है।

उल्लेखनीय है कि जून 2020 में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों की चीनी फौजियों के साथ झड़प हुई थी, जिसमें 20 भारतीय सैनिक ने अपना बलिदान दिया था। घंटों चली झड़प में कई चीनी भी मारे गए थे। लेकिन चीन ने आधिकारिक तौर पर पर अपने मृत सैनिकों की सही संख्या का खुलासा कभी नहीं किया। गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच लद्दाख में एक तनावपूर्ण युद्धविराम हुआ था। हालाँकि दोनों देशों ने क्षेत्र में करीब 60,000 सैनिक और उन्नत हथियार तैनात कर दिए थे।

ऋचा चड्ढा को उस घटना का मजाक उड़ाते देखना बेहद हास्यास्पद है। उन्हें संभवतः यह भी मालूम नहीं होगा कि भारतीय सैनिकों ने बिना किसी हथियार के चीनी सेना से बहादुरी से लड़ाई लड़ी और उन्हें पीछे धकेलने में कामयाब हासिल की।

देखा जाए तो बॉलीवुड स्टार्स को कभी भी उनके सामान्य ज्ञान के लिए नहीं जाना जाता है, लेकिन ऋचा चड्ढा ने इस मामले में खुद को मूर्ख की तरह प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं यह गलवान में बलिदान देने वाले 20 सैनिकों के परिवारों के प्रति असंवेदनशीलता भी है।

जहाँ तक ​​पीओके पर भारतीय सेना की प्रतिक्रिया की बात है, तो यह भारतीय पत्रकारों के मूर्खतापूर्ण सवालों का एक मानक जवाब है। यह पूछे जाने पर कि क्या वे पीओके वापस ले सकते हैं, यह एकमात्र प्रतिक्रिया है जो सेना दे सकती है, इसका मतलब यह नहीं है कि वे कल पाकिस्तान पर आक्रमण कर रहे हैं। हम निश्चित रूप से नहीं चाहते कि सेना यह कहे कि वे पीओके वापस नहीं ले सकते।

50000 की मुगलिया फौज, पूर्वोत्तर के पानी से गई हार: यूँ ही नहीं NDA का सर्वश्रेष्ठ कैडेट पाता है ‘लाचित बरपुखान’ सम्मान

अहोम साम्राज्य (Ahom Dynasty)। लाचित बरपुखान/लाचित बोड़फुकन (Lachit Borphukan)। ये वे नाम हैं जिन्हें दफन कर इतिहास को मुगलिया पन्नों से रंग दिया गया। जबकि लाचित बरपुखान ने पूर्वोत्तर की जमीन पर मुगलों की बर्बर विस्तारवादी मंसूबों को ही दफन कर दिया। उनके पराक्रम में इतना बल था कि उससे टकराने के बाद मुगलों ने कभी पूर्वोत्तर पर काबिज होने का स्वप्न भी न देखा।

24 नवंबर 1622 को पैदा हुए लाचित बरपुखान को उनके युद्ध लड़ने की अद्भुत क्षमता के लिए ‘पूर्वोत्तर का शिवाजी’ भी कहा जाता है। उन्होंने 1671 में हुए सराईघाट के युद्ध (Battle of Saraighat) में मुगलों की विशाल सेना को अपनी रणनीति और जलीय युद्ध लड़ने की क्षमता की वजह से घुटनों पर ला दिया। मुगल जब पराजित हुए थे, तब लाचित पूरी तरह से स्वस्थ भी नहीं थे। पर राष्ट्रभक्ति का जज्बा ऐसा था कि बीमार होते हुए भी मातृभूमि की रक्षा के प्रण से नहीं डिगे। मुस्लिम आक्रांताओं से लड़े। अपनी सेना को विजय दिलाई।

1228 से 1826 के बीच लगभग 600 वर्षों तक अहोम ने असम के प्रमुख हिस्सों पर शासन किया था। इस साम्राज्य पर तुर्क, अफगान और मुगलों ने कई बार हमला किया। मुगलों का पहला हमला लाचित के जन्म से सात साल पहले 1615 में हुआ था।

1663 में मुगलों से अहोम पराजित हो गए। इसके बाद घिलाजरीघाट की संधि हुई। संधि के अनुसार अहोम राजा जयध्वज सिंह को अपनी बेटी और भतीजी को मुगल हरम में भेजना पड़ा। मुगलों को 82 हाथी, 3 लाख सोने-चाँदी के सिक्के, 675 बड़ी बंदूकें 1000 जहाज मिले। राज्य का एक बड़ा हिस्सा भी चला गया।

जयध्वज सिंह इसे सह नहीं सके और जल्द ही चल बसे। उनके उत्तराधिकारी चक्रध्वज सिंह ने इस अपमान का बदला लेने की कसम खाई। अहोम सम्मान को वापस पाने के लिए उन्होंने अगस्त 1667 में लाचित बरपुखान को सेनापति नियुक्त किया। बरपुखान को मानविकी और शास्त्रों के बारे में अच्छी जानकारी थी। वे सैन्य कौशल में पारंगत थे। सेनापति बनने से पहले अहोम साम्राज्य में कई अन्य अहम जिम्मेदारी भी निभा चुके थे।

4 नवंबर 1667 को बरपुखान के सैनिकों ने गुवाहाटी पर कब्जा कर लिया। मुगलों से युद्ध होने पर गुवाहाटी रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण जगह थी। इस हार के बाद मुगल शासक औरंगजेब ने गुवाहाटी को फिर से हासिल करने के लिए अंबर के राजा मिर्जा राजा जय सिंह के पुत्र राजा राम सिंह की कमान में एक बड़ी सेना भेजी। हालाँकि इस दौरान अहोमों औए मुगलों के बीच कई बार संघर्ष हुए और एक रणनीति के तहत लाचित ने मुगलों को पानी की तरफ धकेलने का प्रयास किया और अंततः 1671 में सराईघाट का युद्ध लड़ा गया।

50,000 से भी अधिक संख्या में आई मुगल फौज को घेरने के लिए बरपुखान ने जलयुद्ध की रणनीति अपनाई। ब्रह्मपुत्र नदी और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र को अपनी मजबूती बना कर मुगलों को नाकों चने चबवा दिए। उन्हें पता था कि जमीन पर मुगलिया फौज चाहे कितनी भी मजबूत हो, लेकिन पानी में वे घुटने टेकने को मजबूर होंगे। इस युद्ध में जीत के एक साल बाद वीर योद्धा बरपुखान का निधन हो गया।

लाचित बरपुखान का पराक्रम ऐसा था कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (National Defence Academy) के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को उन्हीं के नाम पर स्वर्ण पदक (The Lachit Borphukan Gold Medal) प्रदान किया जाता है। असम सरकार ने भी 2000 में लाचित बरपुखान अवॉर्ड की शुरुआत की थी।

यह अच्छी बात है कि इतिहास ने जिन योद्धाओं के साथ अन्याय किया, केंद्र की मोदी सरकार उनको उनका गौरव लौटाने के प्रयास में लगी है। इसी कड़ी में बरपुखान की 400वीं जयंती पर दिल्ली के विज्ञान भवन में 23 नवंबर 2022 से एक तीन दिवसीय आयोजन की शुरुआत की गई है।

’72 दिन में मिटा दिया सबूत’: सुशांत की मैनेजर की 14वें तले से गिर कर हुई थी मौत, CBI ने जाँच के बाद कहा – ये रेप-हत्या नहीं

संदेहास्पद स्थिति में मृत मिले बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत (Disha Saliyan Death) को लेकर केंद्रीय एजेंसी CBI ने एक महत्वपूर्ण खुलासा किया है। सारी आशंकाओं को दूर करते हुए CBI दिशा की मौत को एक दुर्घटना बताया है। इसके साथ ही एजेंसी ने यह भी कहा कि सुशांत सिंह की मौत और दिशा की मौत में कोई कनेक्शन नहीं है।

CBI ने दावा किया है कि दिशा की हत्या नहीं हुई थी। वह नशे की हालत में थी और संतुलन बिगड़ने के कारण 14वीं मंजिल से गिर गई थीं, जिससे उनकी मौत हो गई थी। उनकी हत्या के कोई सबूत नहीं मिले हैं। यह सिर्फ एक दुर्घटना था।

बता दें कि 8 जून 2020 की रात को एक बिल्डिंग की 14वीं मंजिल से गिरने के कारण दिशा की मौत हो गई थी। दिशा की मौत के ठीक छह दिन बाद यानी 14 जून को सुशांत सिंह राजपूत ने भी आत्महत्या कर ली थी। दिशा सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर रह चुकी थीं। इसके बाद लोगों ने इन दोनों की मौत को एक साजिश बताते हुए CBI जाँच की माँग की थी।

यहाँ तक महाराष्ट्र से भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री नारायण राणे और उनके बेटे नीतेश राणे ने भी दावा किया था कि दिशा सालियान और सुशांत सिंह की मौत में कनेक्शन है। दोनों ने दावा किया था कि दिशा की हत्या से पहले उनका रेप किया गया था। जब सुशांत सिंह राजपूत को इसकी जानकारी मिली और वे इसका खुलासा करने वाले थे, उससे पहले ही उनकी भी हत्या कर दी गई।

हालाँकि, CBI के हालिया खुलासे के बाद भी नारायण राणे ने अपनी बात पर टिके हुए हैं। उन्होंने बुधवार (23 नवंबर 2022) को ट्वीट कर कहा, “मैं दिशा मामले में CBI जाँच को दोष नहीं दे रहा। 72 दिन बाद इस मामला में CBI आई। 8 जून से MVA सरकार (उद्धव ठाकरे वाली सरकार) की मदद से ‘सफाई’ इतनी अच्छी तरह से की गई थी कि जब तक सीबीआई आई, तब तक कुछ भी बरामद नहीं किया जा सका। सब कवरअप के मास्टर!”

हालाँकि, CBI इस मामले में अपनी क्लोजर रिपोर्ट कब देगी, इसको लेकर अभी कोई जानकारी सामने नहीं है। बता दें कि दिशा की मौत की जाँच के लिए CBI ने अलग से कोई केस दर्ज नहीं किया था। इसकी जाँच सुशांत सिंह की मौत की जाँच के साथ ही की जा रही थी। शुरुआत में इस मामले की जाँच मुंबई पुलिस कर रही थी।

नाम नहीं छापने की शर्त पर सीबीआई के एक अधिकारी ने ईटी को बताया, “जाँच में हमें पता चला कि दिशा ने 8 जून की रात अपने जन्मदिन के अवसर पर घर में पार्टी रखी थी। शायद अल्कोहल ज्यादा पी लेने की वजह से दिशा ने अपना बैलेंस खो दिया। इस कारण वो फ्लैट से नीचे गिर पड़ीं।”

एक अन्य अधिकारी ने बताया, “नारायण राणे इस आरोप के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि दिशा के साथ रेप किया गया था और मदद के लिए उसने सुशांत सिंह राजपूत को फोन किया था, और इसमें किसी तरह की राजनीतिक साजिश थी। मामले की संवेदनशीलता और आरोपों की प्रकृति के कारण परिस्थितियों की जाँच करना आवश्यक था।”

बता दें कि 28 साल की दिशा सालियान एक सेलिब्रिटी मैनेजर थीं। उन्होंने कुछ समय के लिए सुशांत सिंह राजपूत के साथ भी काम किया था। कहा जाता है कि 8 जून 2020 की आधी रात को वह मुंबई के मलाड स्थित गैलेक्सी रीजेंट बिल्डिंग की 14वीं मंजिल से गिर गई थीं। इसमें उनकी मौत हो गई थी। जिस समय यह हादसा हुआ था, उस समय वह बंटी सजदेह की मैनेजमेंट कंपनी ‘कॉर्नर स्टोन’ के लिए काम कर रही थीं।

‘रमेश कुमार बेकार भाषण देता रहता है, #@& की औलाद है @%&’: कॉन्ग्रेस विधायक को गरियाते पकड़े गए पूर्व CM कुमारस्वामी, वीडियो सामने आने पर माँगी माफी

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल सेक्युलर (JDS) के नेता एचडी कुमारस्वामी (Karnataka Ex-CM HD Kumaraswami) द्वारा कॉन्ग्रेस नेता केआर रमेश कुमार (KR Ramesh Kumar) को गाली देने का वीडियो वायरल हो गया है। हालाँकि, उन्होंने माफी माँग ली है।

दरअसल, कुमारस्वामी कोलार के श्रीनिवासपुरा विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर थे। इस दौरान वो अपनी जबान पर लगाम नहीं रख पाए और गुस्से में श्रीनिवासपूरा से कॉन्ग्रेस विधायक और कर्नाटक विधानसभा के पूर्व स्पीकर केआर रमेश को गाली दे बैठे। उन्हें जैसे ही आभास हुआ कि पीछे माइक और सामने कैमरा लगा है तो वे एकदम से चुप हो गए। हालाँकि, उनका यह बयान कैमरे में कैद हो गया।

कुमारस्वामी के वीडियो को ट्विट करते हुए कर्नाटक कॉन्ग्रेस ने लिखा, “नफरत के आधार पर राजनीति नहीं करनी चाहिए, हम जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, व्यवहार हमारे व्यक्तित्व का दर्पण हैं। कुमारस्वामी जी, आपके इस तरह के शब्दों के प्रयोग से न तो आपका गौरव बढ़ेगा और न ही यह राजनीति की गरिमा को बचाएगा। बड़ों ने दिखाया है कि राजनीति आपसी सम्मान से की जा सकती है।”

कुमारस्वामी श्रीनिवासपुरा के एक स्कूल का दौरा कर लौट रहे थे। कार में बैठते वक्त उन्होंने रमेश कुमार को गाली दी और कहा, “ये रमेश कुमार बेकार भाषण देता रहता है, …की औलाद है… इसके स्कूल की हालत कैसी है? यहाँ पर भी बच्चे पढ़ रहे हैं।”

बाद में कुमारस्वामी को अहसास हुआ कि उनका बयान गलत था। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया ट्विटर पर खेद जताया। उन्होंने लिखा, “मैंने पूर्व स्पीकर श्री रमेश कुमार के बारे में जो शब्द इस्तेमाल किया, उससे मुझे भी दुख हुआ। उस शब्द का प्रयोग मेरा व्यक्तित्व नहीं है। मुझे इसका खेद है। अगर इस शब्द से रमेश कुमार या अन्य लोगों को ठेस पहुँची है तो मैं उसे वापस लेता हूँ।”

उन्होंने ट्वीट में आगे कहा, “कल श्रीनिवासपुरा विधानसभा क्षेत्र के बंगवाड़ी गाँव में एक जीर्ण-शीर्ण स्कूल को देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। पिछले 2-3 साल से पीपल के पेड़ के नीचे बच्चों की कक्षाएँ आयोजित हो रही हैं। यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आ गया।”

उन्होंने कहा कि किसी का अपमान करने के लिए उन्होंने ऐसा नहीं किया। बच्चों के आँसू देखकर वे गुस्सा हो गए और भावनाओं में आकर उनके मुँह से ये शब्द निकल गए।

‘ज़िंदा है सद्दाम हुसैन, अमेरिका ने पूरी दुनिया को धोखा दिया’: राहुल गाँधी को देख लोगों को ‘शक’, आरोप – पैसे देकर लाए जा रहे बॉलीवुड सितारे

भाजपा के नेता और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) के कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) पर दिए गए बयान से बवाल हो गया है। सीएम सरमा ने चुनाव के दौर से गुजर रहे गुजरात के अहमदाबाद में कहा कि राहुल गाँधी आजकल इराक के मारे गए तानाशाह सद्दाम हुसैन (Saddam Hussain) की तरह दिख रहे हैं।

असम के मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “अगर वे अपना लुक बदलना ही चाहते हैं तो वे सरदार वल्लभभाई पटेल या पंडित जवाहरलाल नेहरू को क्यों नहीं चुना? यहाँ तक कि गाँधी जी का लुक भी बेहतर रहता, लेकिन वे सद्दाम हुसैन की तरह क्यों दिखना चाहते हैं?ठ

राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर भी हिमंत बिस्वा सरमा ने सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि असम के मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस ने राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होने के लिए बॉलीवुड स्टार को भुगतान किया होगा। बता दें कि अभिनेत्री पूजा भट्ट, रिया सेन, अभिनेता अमोल पालेकर सहित बॉलीवुड के कई सितारे राहुल गाँधी के साथ शामिल हो चुके हैं।

सीएम सरमा ने कहा, “वह गुजरात में लापता हैं। वह एक गेस्ट फैकल्टी की तरह राज्य में आते हैं। हिमाचल प्रदेश में भी उन्होंने चुनाव प्रचार नहीं किया। वे केवल उन्हीं जगहों का दौरा कर रहे हैं, जहाँ चुनाव नहीं हैं। शायद उन्हें हार का डर सता रहा है।”

सीएम सरमा के बयान के बाद कॉन्ग्रेस उन पर हमलावर हो गई है। राजस्थान कॉन्ग्रेस के नेता प्रताप सिंह खचरियावास (Pratap Singh Khachariyawas) ने कहा, “ये वही व्यक्ति हैं, जो कभी राहुल गाँधी का गुणगान करते थे। आज ये राहुल गाँधी को सद्दाम हुसैन से तुलना वाला शर्मनाक बयान दे रहे हैं। सरमा जैसे लोग अपराधी हैं और वे दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहिए। भाजपा को राहुल गाँधी से सीखना चाहिए। भारत उनके DNA में है और वे राष्ट्रीय झंडा को अपना धर्म मानते हैं।”

असम कॉन्ग्रेस के प्रमुख भूपेन कुमार बोरा ने कहा, “सरमा सिर्फ हेडलाइन में आना चाहते हैं और इसके लिए वे राहुल गाँधी का नाम ले रहे हैं। सरमा कुछ भी कह सकते हैं। उनके ऐसे बयान पर हम ध्यान नहीं देते।”

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता भूपेश पटेल (Bhupesh Patel) ने कहा, “ED और आयकर की जाँच के माध्यम से असम के मुख्यमंत्री को लगातार धमकाया जा रहा है और फिर जब भी उन्हें निर्देश दिया जाता है तो वे बोलना शुरू कर देते हैं। इसका कोई मतलब नहीं है।”

सीएम सरमा के इस बयान को लेकर कॉन्ग्रेस के राजनीतिक गलियारों में ही नहीं, सोशल मीडिया में भी बहस छिड़ गई है। वही, कुछ यूजर ने भी राहुल गाँधी की लुक को लेकर टिप्पणी की है। राकेश कदम नाम के यूजर ने लिखा, “सद्दाम हुसैन की तरह नहीं, लेकिन राहुल गाँधी एक बेघर व्यक्ति की तरह दिखते हैं।”

बाबामुरुगन नाम के एक यूजर ने लिखा, “पप्पू के रूप में जिंदा सद्दाम हुसैन हैं। अमेरिका ने पूरी दुनिया को धोखा दिया है।”

हालाँकि, सीएम सरमा के बयान की आलोचना करने वाले लोगों की भी एक लंबी फेहरिस्त है। उनका कहना है कि सद्दाम हुसैन एक निर्भीक आदमी थे, जो अपने देश और अपने लोगों के लिए लड़ते रहे और अमेरिका की साजिश के शिकार हो गए। उनका तर्क है कि इराक का भारत के साथ अच्छे संबंध थे।