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8000 साल पुराना मंदिर, विकसित शहर: सऊदी अरब में खुदाई के दौरान मिले मूर्तिपूजा के प्रमाण, विशेषज्ञ भी हैरान

सऊदी अरब में एक 8000 साल पुराने मंदिर और पुरातात्विक स्थल की खोज हुई है। राजधानी रियाद के दक्षिण-पश्चिम इलाके में स्थित तटीय शहर की खुदाई में इस ऐतिहासिक हिन्दू मंदिर के अवशेष और कई शिलालेख पाए गए हैं। सऊदी अरब की पुरातत्वविदों की टीम ने नई तकनीक वाली मशीनों के साथ इस मंदिर का पता अल-फॉ की साइट पर लगाया है। यहाँ पहले हुए शोध की रिपोर्ट के मुताबिक इस क्षेत्र में हजारों साल पहले से मंदिर और मूर्ति पूजा का कल्चर रहा है। वहीं इस शोध में मिले पुरातात्विक अवशेषों को एडवांस स्टडी के लिए भेजा गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस स्थल के सर्वेक्षण में हाई क्वालिटी की एरियल फोटोग्राफी, कंट्रोल प्वाइंट के साथ ड्रोन फुटेज, रिमोट सेंसिंग, लेजर सेंसिंग और कई अन्य सर्वे तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। वहीं इस प्राचीन मंदिर का नाम रॉक-कट मंदिर बताया जा रहा है जो माउंट तुवाईक के किनारे पर स्थित है, जिसे अब अल-फॉ के नाम से जाना जाता है। अबतक की जाँच के मुताबिक अल-फॉ के लोग बड़े धार्मिक थे। वहीं खुदाई में एक ऐसा शिलालेख भी मिला जिससे अल-फॉ के एक देवता कहल के होने की पुष्टि होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, बताया जा रहा है पूरे स्थल पर 2,807 कब्र भी मिली हैं जो अलग-अलग समय की हैं, ऐसा अब तक के नतीजों में उभरा है। इन्हें छह ग्रुपों में बाँटा गया है। मंदिर और कब्रों के अलावा यह बात भी सामने आई है कि यहाँ एक सुनियोजित शहर बसा हुआ था। जिनके कोने पर चार टावर हैं। वहीं इस पुरातात्विक अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि एक समय में दुनिया की सबसे शुष्क भूमि और कठोर रेगिस्तानी वातावरण वाले इस क्षेत्र में नहरों, पानी के कुंड और सैंकड़ों गड्डों सहित एक उन्नत और जटिल सिंचाई प्रणाली भी थी।

सऊदी अरब की इस साइट पर 8000 साल पहले भव्य मंदिर था

ईस्ट कोस्ट डेली की रिपोर्ट के मुताबिक अल-फॉ का ये इलाका पुरातात्विक विभाग के लोगों के लिए बीते 40 सालों से हॉट स्पॉट बना हुआ है। सर्वे साइट पर सबसे अहम खोज इस मंदिर की है जिसके ध्वस्त परिसर से एक यज्ञ की वेदी के कुछ हिस्सों के अवशेष भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि यहाँ उस समय ऐसे लोग रहते थे जिनके जीवन में पूजा-पाठ और यज्ञ जैसे अनुष्ठान होते रहे होंगे।

फाँसी के फंदे से लटकी मिली NTR की बेटी, पुलिस बता रही आत्महत्या: परिवार सहित पहुँचे पूर्व CM चंद्रबाबू नायडू

तेलुगू देशम पार्टी (TDP) के संस्थापक और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामा राव (NTR) की सबसे छोटी बेटी उमा माहेश्वरी (Uma Maheshwari) ने हैदराबाद के जुबली हिल्स स्थित अपने आवास पर सोमवार (1 अगस्त, 2022) को कथित तौर पर आत्महत्या कर ली।

जानकारी मिलने पर मौके पर पहुँची पुलिस को उमा अपने घर में फाँसी के फंदे पर लटकी हुई मिलीं। पुलिस ने बताया कि वह 57 वर्ष की थीं। उनके शव को स्थानीय अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामला दर्ज कर आगे की जाँच शुरू कर दी है।

एक अन्य पुलिस अधिकारी ने बताया कि उमा माहेश्वरी की बेटी, दामाद और घर के अन्य लोगों ने जवाब न मिलने पर अंदर से बंद बेडरूम का दरवाजा तोड़ा, जिसके बाद उन्होंने उन्हें फाँसी के फंदे पर लटका पाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उमा पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का सामना कर रही थीं और उनका इलाज चल रहा था। बताया जा रहा है कि सोमवार को वह अपने घर में फाँसी के फंदे पर लटकी हुई मिलीं। पुलिस ने प्रारंभिक जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि आशंका है कि उन्होंने डिप्रेशन के चलते आत्महत्या की है। हालाँकि, अभी इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहा जा सकता। सीआरपीसी की धारा 174 (आत्महत्या) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

वहीं, जुबली हिल्स के सीआई राजशेखर रेड्डी ने बताया कि यह आत्महत्या का मामला है और जाँच के बाद ही कारण का पता चलेगा। उमा तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के संस्थापक एनटीआर के 12 बच्चों में सबसे छोटी थीं, साथ ही चार बहनों में भी सबसे छोटी थीं। माहेश्वरी के निधन का समाचार सुनने के बाद चंद्रबाबू नायडू अपने परिवार के साथ उनके घर पहुँचे।

बता दें कि उमा माहेश्वरी के पार्थिव शरीर को दर्शन के लिए घर पर रखा गया है। इस मौके पर एनटीआर के परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और कई हस्तियाँ मौजूद हैं। विदेश में मौजूद अभिनेता जूनियर एनटीआर को भी उमा माहेश्वरी के निधन की जानकारी दी गई है।

जेल से बाहर आते ही PR इंटरव्यू, ट्वीट भी करने लगा जुबैर; लेकिन नहीं माँगी उस आग की माफी जिसमें जले उमेश, कन्हैया और प्रवीण

फैक्ट-चेक के नाम पर प्रोपेगंडा फैलाने वाला मोहम्मद जुबैर जमानत पर बाहर आ चुका है और वापस अपने पुराने काम की तरफ भी लौट गया है – इस्लामी एजेंडे के लिए झूठे एवं भ्रामक नैरेटिव गढ़ना। जगह-जगह इंटरव्यू देकर उसने फिर से हिन्दू विरोधी प्रोपेगंडा शुरू कर दिया है। जिस व्यक्ति के कारण देश में आग लगी, वो अब खुला घूम रहा है। वहीं नूपुर शर्मा और उनका परिवार अब भी छिप कर रहने को मजबूर है, कई FIR का सामना करना पड़ रहा है सो अलग।

वहीं मोहम्मद जुबैर का इंटरव्यू लेकर, उसके बयान प्रकाशित कर के और उसके तथाकथित ‘संघर्षों’ पर ओपिनियन लिख कर उसका महिमामंडन कर के द वायर, द हिन्दू, न्यूज़लॉन्ड्री और द न्यूज़ मिनट जैसे संस्थान जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। उसे ‘मुस्लिमों के खिलाफ भारत में बढ़ी हिंसा’ पर आवाज़ उठाने वाले ‘मसीहा’ से लेकर ‘नरसंहार को बढ़ावा देने वाले हेट स्पीच’ विरोधी ‘पत्रकार’ तक साबित करने के लिए वामपंथी मीडिया में होड़ लगी है।

याद कीजिए, वो मोहम्मद जुबैर ही था जो Times Now’ चैनल पर आए नाविका कुमार की उस डिबेट का एडिट किया हुआ वीडियो इस्लामी संगठनों तक लेकर गया था, जिसमें नूपुर शर्मा ने इस्लामी साहित्य में लिखी किसी बात का उल्लेख किया। उससे पहले इस्लामी कट्टरपंथी तस्लीम रहमानी क्या कह रहा था, किस तरह शिवलिंग और हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक बना रहा था – इस पर किसी का ध्यान नहीं गया। इसे एक साजिश के तहत छिपा लिया गया।

तभी ये वीडियो क़तर के मौलानाओं के पास पहुँचा और वहाँ इसके खिलाफ सोशल मीडिया ट्रेंड्स चले, जिसके दबाव में वहाँ की सरकार ने भारतीय राजदूत को तलब कर लिया। फिर भाजपा ने नूपुर शर्मा को निलंबित कर दिया। 7 इस्लामी मुल्कों में भारतीय राजदूतों को समन किया गया, जहाँ उन्हें सफाई देनी पड़ी। उन्हें ‘सिर तन से जुदा’ की धमकियाँ मिलने लगीं। जगह-जगह इस्लामी भीड़ ने उनके खिलाफ सड़क पर उतर कर हिंसा की।

उलटा नूपुर शर्मा पर ही कई FIR कई राज्यों में कर दिए गए। 7 राज्यों में उन पर 9 FIR दर्ज हो गए। जब वो राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं, तो वहाँ उन्हें जजों ने देश में हो रही सारी घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। सोचिए, एक अकेले व्यक्ति ने एक वीडियो में काट-छाँट कर के उसे इस तरह से पेश किया कि एक महिला और उसके परिवार को छिप कर रहना पड़ रहा है। मोहम्मद जुबैर इंटरव्यू पर इंटरव्यू दे रहा, लेकिन नूपुर शर्मा एक ट्वीट तक करने की सोच तक नहीं सकतीं।

सबसे बड़ी बात कि नूपुर शर्मा का समर्थन करने वालों का जो कत्लेआम शुरू हुआ, एक नरसंहार इस्लामी कट्टरवाद ने शुरू किया, उसकी जड़ मोहम्मद जुबैर ही है। राजस्थान के उदयपुर में टेलर कन्हैया लाल तेली का गला रेत दिया गया। महाराष्ट्र के अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे की हत्या कर दी गई। कर्नाटक के बेल्लारे में प्रवीण नेट्टारू की हत्या कर दी गई। क्या मोहम्मद जुबैर द्वारा फैलाई गई आग इसके लिए जिम्मेदार नहीं?

कन्हैया लाल के मुस्लिम पड़ोसियों ने ही उनकी रेकी की, उमेश कोल्हे के करीबी दोस्त ने ही उनकी हत्या की साजिश रची जिसकी वो कई बार मदद कर चुके थे और प्रवीण नेट्टारू के हत्यारे का पिता उनकी दुकान में कर्मचारी हुआ करता था। मध्य प्रदेश के भोपाल में निशंक राठौर की हत्या हुई, जिसके बाद पिता को ‘सिर तन से जुदा’ वाला मैसेज आया। भले पुलिस अलग-अलग एंगल की बात कह रही हो, परिजनों को इस पर भरोसा नहीं।

इन सबके लिए जो जिम्मेदार है, उसे अदालत से जमानत भी मिल जाती है (उस पर जज लोग कोई कड़ी टिप्पणी नहीं करते), वो जेल से वापस आकर अपनी मुस्कुराती हुई तस्वीर अपलोड कर के रहत इंदौरी के शेर ‘जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे’ कैप्शन डाल कर 1.15 लाख लाइक्स बटोर लेता है, पीएम मोदी के पुराने ट्वीट्स पर उनका मजाक बना रहा है और और निशंक राठौड़ की हत्या पर पुलिस के एंगल का वीडियो शेयर करते हुए पीड़ित परिजनों के बयान पर आधार पर खबर चलाने वालों को झूठा बता रहा।

सिर्फ ये 3 हत्याएँ ही नहीं, नूपुर शर्मा के खिलाफ फैलाए गए दुष्प्रचार के कारण हिंसा की कई घटनाएँ हुई हैं। इन सबके अलावा 4 ऐसी घटनाएँ हुई, जहाँ हत्या के प्रयास हुए। मध्य प्रदेश के रेवा में मुकेश तिवारी को पीटा गया। इसी राज्य के अगर में ‘बजरंग दल’ के कार्यकर्ता पर हमला हुआ। राजस्थान के उदयपुर और झुंझनू में कारोबारियों को धमकियाँ मिलीं। बिहार के सीतामढ़ी में युवक को चाकू घोंप दिया गया। गुजरात के कारोबारी से लेकर दिल्ली के एक वकील तक, हत्या की धमकियाँ मिलीं।

सोचिए, जिस नूपुर शर्मा के नाम पर आतंकियों ने इतना कुछ किया उन्हें अभी कैसी महसूस हो रहा होगा। उनके परिवार को कैसा महसूस हो रहा होगा। वहीं जिस तस्लीम रहमानी के भड़काने पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी थी, वो फिर से डिबेट्स में वापस आ गया है और न्यूज़ चैनल उसका स्वागत कर रहे हैं। मोहम्मद ज़ुबैर वामपंथी मीडिया का हीरो बना हुआ है, तस्लीम रहमानी वापस आ गया डिबेट्स में, लेकिन नूपुर शर्मा और उनके परिवार को छिप रह रहना उनकी मजबूरी है।

यही सेक्युलरिम वाला माहौल है जहाँ एडिटेड वीडियो के सहारे देश को बदनाम करने वाला, एक महिला को दर-दर भटकने और प्रताड़ना सहने के लिए मजबूर करने वाला, कई हत्याओं का जिम्मेदार व्यक्ति हीरो की तरह पेश किया जाता है। जबकि वो महिला और उसका परिवार अपना चेहरा तक नहीं दिखा सकता। इस ‘सिर तन से जुदा’ के माहौल में आग में घी डालने के लिए मोहम्मद जुबैर वापस आ गया है, उसके हर एक ट्वीट से अब हिन्दू विरोधी एजेंडा चलना भी चालू हो गया है।

मोहम्मद जुबैर से उसके ‘संघर्ष’, उसके जीवन, बचपन और पढ़ाई से लेकर उसके परिवार तक के बारे में पूछ कर महिमामंडन किया जा रहा है। जिहादी हिंसा को व्हाइटवॉश करने के लिए फिर से उसे कमर कस ली है। मोहम्मद जुबैर को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है और वो गर्व से कह रहा है कि ‘मेरे पैगंबर’ पर सत्ताधारी पार्टी से कोई टिप्पणी करेगा तो इस पर आवाज़ उठाना ज़रूरी है। यानी, वो फिर से इसके नाम पर हिंसा भड़काने से नहीं हिचकिचाएगा।

स्मृति ईरानी या उनकी बेटी की गोवा में कोई रेस्टॉरेंट या बार नहीं, न ही कभी जारी हुआ लाइसेंस: दिल्ली HC ने कहा – कभी कोई आवेदन भी नहीं किया

दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने सोमवार (1 अगस्त 2022) को गोवा में स्थित सिली सोल्स कैफे एंड बार नामक रेस्टोरेंट के संबंध में कहा कि केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और उनकी बेटी को कभी भी कोई लाइसेंस जारी नहीं किया गया। जस्टिस मिनी पुष्कर्ण ने स्मृति ईरानी द्वारा दायर दीवानी मानहानि के मुकदमे में कॉन्ग्रेस नेताओं जयराम रमेश, पवन खेड़ा और डिसूजा को समन जारी करते हुए यह टिप्पणी की। ईरानी ने मानहानि के रूप में दो करोड़ रुपए की माँग की है।

कोर्ट ने पिछले हफ्ते कॉन्ग्रेस नेताओं को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनके द्वारा लगाए गए कथित आरोपों को सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने का आदेश दिया था। जस्टिस मिनी पुष्कर्ण ने कॉन्ग्रेस के तीन नेताओं को ईरानी एवं उनकी बेटी के खिलाफ लगे आरोपों के संबंध में सोशल मीडिया पर किए गए ट्वीट, रीट्वीट, पोस्ट, वीडियो और फोटो हटाने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि अगर ये नेता 24 घंटे के भीतर उनके आदेश का पालन करने में विफल रहते हैं, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब को सामग्री को हटाना होगा।

कोर्ट ने आज अपने फैसले में कहा कि जो दस्तावेज कोर्ट में पेश किए गए, उनके आधार पर यह स्पष्ट है कि स्मृति ईरानी और उनकी बेटी के नाम पर किसी बार का कोई लाइसेंस नहीं है और ना ही वो रेस्टोरेंट और बार की मालिक हैं। इसके अलावा उनकी बेटी ने कभी भी किसी लाइसेंस के लिए आवेदन भी नहीं किया है।

अदालत ने आगे कहा कि गोवा सरकार ने कोई भी कारण बताओ नोटिस स्मृति ईरानी की बेटी जोइश ईरानी के नाम पर जारी नहीं किया है। इन सभी तथ्यों की भी पुष्टि की गई है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अगर कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट को उन प्लेटफॉर्म पर रहने दिया गया तो उससे स्मृति ईरानी और उनके परिवार की छवि को काफी नुकसान पहुँचेगा।

क्या है मामला?

कॉन्ग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया था कि जोइश ईरानी गोवा में अवैध बार चला रही है। कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता और महासचिव जयराम रमेश ने मीडिया अध्यक्ष पवन खेड़ा और गुजरात की अखिल भारतीय महिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नेट्टा डिसूजा के साथ मिलकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि लाइसेंस सिर्फ रेस्टोरेंट रेस्तरां चलाने के लिए मिला था, लेकिन ईरानी की बेटी ने अपने राजनीतिक दबदबे का इस्तेमाल किया।

कॉन्ग्रेस द्वारा जोइश पर लगाए जाने वाले इल्जाम एक RTI पर आधारित थे। ये आरटीआई गोवा के ‘आयर्स रॉड्रिक्स’ नाम के कार्यकर्ता ने डाली थी। रॉड्रिक्स वही हैं जिन पर 2017 में एक महिला ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे। आयर्स ने ही अपनी आरटीआई के नाम पर गोवा के सिली सोल्स कैफे एंड बार पर झूठ फैलाना शुरू किया। उसने दावा किया कि रेस्टोरेंट को फर्जी ढंग से लाइसेंस मिला जो कि ईरानी परिवार द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का सबूत है। उसने ये भी बताया कि एक्साइज विभाग रेस्टोरेंट को नोटिस भेज चुका है। उसके दावे के मुताबिक रेस्टोरेंट में फर्जी कागज देकर शराब का लाइसेंस लिया गया।

24 जुलाई को लिखे नोट में उसने कहा कि रेस्टोरेंट को शराब का लाइसेंस एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर मिला जो अब इस दुनिया में भी नहीं है। इसके बाद उसने कहा कि गोवा में स्मृति ईरानी और अन्य केंद्र के नेताओं द्वारा खरीदी गई ‘बेनामी’ संपत्ति की जाँच होनी चाहिए, ताकि सच सामने आए।

लोगों के विरोध के बाद बदला गया फिल्म ‘सत्यनारायण की कथा’ का नाम, नए पोस्टर में दिखा नया नाम, साजिद नाडियावाला हैं निर्माता

कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी की आने वाली फिल्म को लेकर मेकर्स डरे हुए हैं, क्योंकि फिल्म के नाम को लेकर हिन्दू समुदाय ने अपत्ति जताई थी। नाम पर बवाल को देखते हुए मेकर्स ने पहले ही फिल्म का नाम ‘सत्यनारायण की कथा’ से बदलकर ‘सत्यप्रेम की कथा’ कर दिया है। इस बात की जानकारी फिल्म के हीरो कार्तिक आर्यन ने खुद सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए शेयर दी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रविवार (31 जुलाई, 2022) को फिल्म की अभिनेत्री कियारा आडवाणी का जन्मदिन था। इस मौके पर कार्तिक आर्यन ने अपनी एक्ट्रेस को जन्मदिन की शुभकामना देते हुए एक बर्थडे पोस्ट शेयर किया। इसके साथ ही फिल्म का फर्स्ट लुक भी जारी कर दिया गया, जिसके कैप्शन में उन्होंने फिल्म के नए नाम की घोषणा की। फिल्म में कार्तिक के किरदार का नाम सत्यप्रेम तो कियारा का नाम कथा है।

वहीं यदि फिल्म के फर्स्ट लुक की बात करें तो मोशन पोस्टर में कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी एक दूसरे को गले लगाते हुए नजर आ रहे हैं। वहीं बैकग्राउंड में मीठी सी धुन सुनाई दे रही है। पोस्ट को शेयर करते हुए कैप्शन में कार्तिक ने लिखा, “हैप्पी बर्थडे कथा । तुम्हारा सत्यप्रेम। सत्यप्रेम की कथा।”

जबकि कार्तिक की पोस्ट पर कियारा आडवाणी ने कमेंट करते हुए लिखा, “सेट पर मिलते हैं सत्तू।” वहीं, फिल्म के डायरेक्टर समीर विद्वांस ने कमेंट किया, “मेरे सत्यप्रेम और कथा।”

बता दें कि जब पहली बार फिल्म के नाम को लेकर प्रतिक्रिया आई तो तभी निर्देशक समीर विद्वांस ने एक बयान जारी कर कहा था कि उन्होंने फिल्म का शीर्षक बदलने का फैसला किया है। उन्होंने नाम बदलने का बचाव करते हुए कहा कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने से बचने के लिए ऐसा किया गया है।

उन्होंने बयान में कहा था, “फिल्म का शीर्षक कुछ ऐसा है जो रचनात्मक प्रक्रिया के माध्यम से व्यवस्थित रूप से उभर कर आता है। हमने लोगों की भावनाओं को आहत करने से बचने के लिए अपनी हाल ही में घोषित फिल्म सत्यनारायण की कथा के शीर्षक को बदलने का निर्णय लिया है, भले ही वह पूरी तरह से अनजाने में ही क्यों न हुआ हो। फिल्म के निर्माता और रचनात्मक टीम भी इस निर्णय के पूर्ण समर्थन में हैं।”

गौरतलब है कि कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी की फिल्म ‘सत्यप्रेम की कथा’ को नमः पिक्चर्स के साथ साजिद नाडियाडवाला प्रोड्यूस करेंगे। कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी दूसरी बार स्क्रीन स्पेस शेयर करने जा रहे हैं। इससे पहले दोनों की फिल्म ‘भूल भुलैया 2’ इस साल मई में रिलीज हुई थी और करीब 185 करोड़ रुपये का बिजनेस किया था।

अस्पताल में शॉर्ट सर्किट से बड़ा हादसा, 10 लोगों की झुलस कर मौत: जो गए मरीजों को निकालने, वो भी नहीं आ सके बाहर

मध्य प्रदेश के जबलपुर में दमोहनाका स्थित न्यू लाइफ मेडिसिटी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल में सोमवार (1 अगस्त, 2022) दोपहर करीब पौने तीन बजे शॉर्ट सर्किट से आग लग गई, जिसमें 10 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में अस्‍पताल स्‍टाफ के तीन लोग भी शामिल हैं। अचानक भड़की आग में दर्जन भर से अधिक मरीज झुलस गए हैं। आग इतनी विकराल थी कि झुलसे लोगों की पहचान तक नहीं हो पा रही।

सीएम शि‍वराज सिंह चौहान ने मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए और गंभीर रूप से घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता प्रदान करने की घोषणा की है।

आग की वजह से हॉस्पिटल में अफरा-तफरी का माहौल हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, आग ग्राउंट फ्लोर पर शॉट सर्किट की वजह से लगी। जबलपुर के जिला कलेक्टर अल्लैया राजा के हवाले से ‘इंडिया टुडे’ ने बताया कि अब तक 10 लोगों के मौत की पुष्टि हुई है।

बताया जा रहा है कि दूसरे फ्लोर पर सबसे अधिक लोगों की मौत हुई है। घायलों को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट किया गया है। आग लगने के बाद मरीजों को बचाने के दौरान कुछ लोग अंदर गए, जो बाहर नहीं निकल सके। लपटें इतनी तेज थी कि कमरे में फँसे लोगों को बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो गया। कुछ लोगों को खिड़की और दरवाजे तोड़कर बाहर निकाला गया। इसको लेकर अभी तक अस्पताल प्रबंधन की तरफ से कोई सामने नहीं आया है।

बता दें कि आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है। शार्ट सर्किट से लगी आग सीढ़ियों के पास रखे जनरेटर में भड़की, जिसके बाद आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। लोग बचने के लिए इधर-उधर भागने लगे। निकलने के लिए एक ही गेट था। कुछ लोग सीढ़ियों में फँस गए। आग भड़कती गई और सीढ़ियों तक पहुँच गई, जिससे कुछ ही देर में तीन मंजिला बिल्डिंग जलकर पूरी तरह खाक हो गई।

जिले का DM कौन हो/न हो … मुस्लिम भीड़ कर रही तय: केरल में IAS श्रीराम वेंकटरमण की पोस्टिंग के खिलाफ हजारों मुस्लिम सड़क पर

केरल में एक आईएएस ऑफिसर की नियुक्ति के विरोध में हजारों मुस्लिमों ने मार्च निकालते हुए नियुक्ति रद्द करने की माँग की। यह प्रदर्शन सुन्नी समूह से जुड़े कई मुस्लिम संगठनों ने आयोजित किया था। दरअसल, ये लोग केएम बशीर नाम के पत्रकार की मौत के आरोपित श्रीराम वेंकटरमण की अलाप्पुझा जिला कलेक्टर के रूप में नियुक्ति के खिलाफ शनिवार, 30 जुलाई, 2022 को तिरुवनंतपुरम में राज्य सचिवालय और सभी जिला कलेक्ट्रेट के सामने विरोध मार्च निकाला।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रदर्शन में सुन्नी युवजन संघम और सुन्नी स्टूडेंट्स फेडरेशन ने केरल मुस्लिम जमात द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में भाग लिया। उन्होंने माँग की है कि श्रीराम की नियुक्ति रद्द की जाए।

वहीं यह भी कहा जा रहा है कि मुस्लिम समूह ब्राह्मण आईएएस के नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं। वीडियो में मुस्लिमों की एक बड़ी भीड़ को नारे लगते और प्रदर्शन करते देखा जा सकता है।

इस मामले में जहाँ माकपा के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की सरकार के फैसले के मुस्लिम संगठन खिलाफ हैं। वहीं मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने आईएएस ऑफिसर की नियुक्ति का बचाव किया है। आईएएस ऑफिसर श्रीराम वेंकटरमन की अलाप्पुझा जिला कलेक्टर के रूप में नियुक्ति को सही ठहराते हुए बचाव किया।

वहीं महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल सहित कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी श्रीराम वेंकटरमन को अलाप्पुझा जिला कलेक्टर नियुक्त करने के केरल सरकार के फैसले की निंदा की है। अलाप्पुझा की जिला कॉन्ग्रेस कमिटी ने भी सोमवार 25 जुलाई को जिला कलेक्ट्रेट में विरोध प्रदर्शन किया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने कहा कि कलेक्टर को लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गंभीर आरोपों का सामना कर रहे वेंकटरमण जैसे व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने कहा, “सरकार को एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति करनी चाहिए थी जो अलाप्पुझा में गरीबों की समस्याओं को समझ सके।” उन्होंने कहा कि एक दुर्घटना में एक निर्दोष व्यक्ति की मौत के आरोपित व्यक्ति को यह पद दिया गया है।

केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (KUWJ) ने भी सोमवार को राज्य सरकार से इस फैसले को वापस लेने की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। बता दें कि सरकार द्वारा अलाप्पुझा में उनके स्थानांतरण का आदेश देने से पहले वेंकटरमन केरल चिकित्सा सेवा निगम के प्रबंध निदेशक के रूप में कार्यरत थे।

गौरतलब है कि 3 अगस्त, 2019 को तिरुवनंतपुरम में पत्रकार के एम बशीर की मौत के मामले में वेंकटरमण पहला आरोपित हैं। घटना के समय बशीर तिरुवनंतपुरम में सिराज दैनिक का कर्मचारी था।

नाचो-गाओ, देह दिखाओ… सब मजहब को कबूल; लेकिन मंदिर जाना-फरमानी नाज का ‘हर-हर शंभू’ गाना गैर मजहबी: एक इस्लाम के दो पैमाने क्यों

सावन के महीने में शिव शंभू का गाना गाकर यूट्यूब से लेकर हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फिर से छा जाने वाली फरमानी नाज को कट्टरपंथियों की नफरत झेलनी पड़ रही है। गंदी-गंदी गालियों के अलावा उन्हें इस्लाम का ज्ञान दिया जा रहा है। मजहबी उलेमा उन्हें ये बता रहे हैं कि कैसे उनका ‘हर हर शंभू’ गाना इस्लाम के खिलाफ है।

हैरानी इस बात की है कि फरमानी नाज देवी-देवताओं के भजन आदि इससे पहले भी गाती थीं मगर तब किसी को कोई आपत्ति नहीं थी, या कह सकते हैं कि उस समय उनके श्रोता केवल हिंदू होते थे, जिन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं थी कि उनके भगवान के भजन सुनाने वाला किस जाति/मजहब का है। मगर, इस बार फरमानी ने गाना सावन के महीने में गाया और वीडियो वायरल होने के कारण कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गईं। 

ध्यान दें अगर तो सावन की शुरुआत से माहौल बिगाड़ने का प्रयास कट्टरपंथी करते रहे। कभी शिवलिंग पर अभद्र टिप्पणी हुई तो शिवभक्ति में डूबे काँवड़ियों पर माँस, थूक आदि फेंके गए। ऐसे समय में जब एक पूरा धड़ा ऐसी गिरी हरकतों पर चुप बैठ उनका समर्थन कर रहा था उस समय फरमानी का गाना आया और हिंदुओं ने जमकर इसकी तारीफ की।

बय यही चीजें कट्टरपंथियों को बर्दाश्त नहीं हो पाई और उन्होंने फरमानी को गाली देना शुरू कर दिया। देवबंद के मौलाना मुफ्ती असद काजिमी ने तो यहाँ तक कहा, “गाना और नाचना इस्लाम में किसी भी रूप में जायज नहीं है। यह सब इस्लाम में वर्जित है। मुस्लिमों को ऐसी चीजों से बचना चाहिए। महिला ने जो गाया वो किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। उसे इससे बचना चाहिए।”

कट्टरपंथियों की हिपोक्रेसी

अब दिलचस्प बात ये है कि जिस इस्लाम मजहब में नाचना-गाना प्रतिबंधित बताया जा रहा है, उसी मजहब के हीरो-हिरोइन बॉलीवुड में भरे पड़े हैं। एक समय तो ऐसा भी था कि जब पूरे बॉलीवुड को ‘तीन खान’ के नाम पर जाना जाता था और ‘जीनत अमान’ जैसी मुस्लिम हिरोइनों को बोल्डनेस का पर्याय कहा जाता था।

ये नाचना-गाना-शरीर दिखाना हीरो-हिरोइनों के लिए कोई नया नहीं हैं और न ही ये सब मजहबी उलेमाओं के लिए देखना नया है। पर, ये जानते हैं कि अगर इन्होंने उर्फी जावेद जैसी अभिनेत्रियों पर उंगली उठाई तो इन्हें करारा जवाब मिलेगा। ये जानते हैं नोरा फतेही के स्टेप्स पर कमेंट किया तो इन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। 

इनका कट्टरपंथ का जहर सिर्फ फरमानी जैसी महिलाओं के लिए उगला जाता है जिन्होंने मजहब को बेड़ी बनाए बिना फर्श से अर्श तक का सफर खुद से तय किया हो। या फिर सारा अली खान जैसी मुस्लिम एक्ट्रेस पर जिन्होंने मुस्लिम होने के बावजूद हिंदू धर्म में अपनी आस्था को बरकरार रखा और मंदिर जाती रहीं। 

ये जानते हैं कि अगर सारा के मंदिर जाने पर इन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी तो आधे से ज्यादा समुदाय के लोग उन्हें समर्थन देंगे। ये जानते हैं कि अगर इन्होंने फरमानी के ‘हर-हर शंभू’ गाने पर आपत्ति जताई तो आधी आबादी कहेगी कि यही सही बात तो है।

फरमारी के साथ तब क्यों नहीं थे मजहबी उलेमा?

आज जो लोग फरमानी को मजहब का ज्ञान देकर समझा रहे हैं कि इस्लाम में क्या प्रतिबंधित है क्या और क्या नहीं। क्या उन लोगों को इस बात का इल्म है कि फरमानी ने अपनी बीते कल में क्या-क्या झेला है।

क्या वे जानते हैं कि कैसे उनके शौहर ने उन्हें इसलिए छोड़ा क्योंकि उनकी कोख से जन्मा बेटा बीमार था, उसके गले में छेद था और फरमानी ने सिर्फ पाउडर वाला दूध माँगा था, जिसके बदले में उन्हें कहा गया कि वह अपने घर से लड़के के ईलाज का खर्च और दूध का पैसा लाएँ।

फरमानी ने अपने जीवन में तमाम कठिनाइयाँ झेलने के बाद इस मुकाम को हासिल किया। उन्होंने गाने को तब अपना करियर बनाया जब उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। उस समय उनके दिमाग में अगर मजहबी बातें होतीं तो क्या वो गाने गा पातीं और अपने बच्चे को सही परवरिश दे पातीं? फरमानी मजबूरी में गाना शुरू किया जो धीरे-धीरे उनका पैशन बना। आज उन्हें उसी पैशन के बदले पैसा मिलता है। अगर इसी पैशन और प्रोफेशन के रास्ते पर उन्होंने शिव-शंभू गा दिया तो ये इस्लाम के खिलाफ कैसे हो गया?

आप यूट्यूब पर फरमानी की वीडियोज में देखेंगे तो पाएँगे कि गाने के कारण उनके जीवन में कितना बदलाव आया। उनके पहनावे से लेकर रहने की जगह तक बदल गई। क्या ये सारी चीजें मजहबी ज्ञान देने वाले उन्हें दे सकते थे। क्या इन लोगों का फर्ज तब नहीं था जब फरमानी अपने बच्चे के भविष्य की चिंता में परेशान थीं, उनके शौहर ने उन्हें और बीमार बेटे को अकेले छोड़ दिया था।

आज जब उनके जीवन में सब सही है। वह मजहबी कट्टरपंथ के रास्ते पर चले बिना एक नामी हस्ती हैं तो यही उलेमा उन्हें ज्ञान दे रहे हैं। क्या ज्ञान केवल तभी निकलता है जब कोई सारा जैसी मुस्लिम हीरोइन मंदिर चली जाए या नुसरत जैसी अभिनेत्री हिंदू त्योहार की शुभकामना दे दे या फिर कोई फरमानी भगवान का भजन गा ले? ये ज्ञान तब क्यों नहीं बाहर आता जब सलमान पूरी फिल्म में शर्ट उतार देते हैं? शाहरुख किसिंग सीन दे देते हैं। 

आपको याद नहीं होगा, लेकिन म्यूजिक इंडस्ट्री में तमाम मुस्लिम नाम भरे हैं जो समय-समय पर ऐसे गीत गाते आए हैं। इंडियन आयडल जैसा मंच तो वो जगह हैं जहाँ जानकर देवी-देवताओं के गाने दिए जाते हैं और उनकी तारीफ भी होती है। दानिश द्वारा गाया ‘माँ शेरावालिए’ अब भी सबके जहन में रहता है। पर बावजूद इन तमाम उदाहरणों के कट्टरपंथियों के निशाने पर फरमानी और फरमानी जैसी महिलाएँ हैं ताकि मजहब का नाम लेकर औरत पर उनका दबदबा हमेशा कायम रहे और सही-गलत की परिभाषा उनके कहे अनुसार तय हो।

श्रीकृष्ण के परपोते का बनाया केशवदेव मंदिर, जिसे खंडहर में तब्दील कर औरंगजेब ने पढ़ी नमाज: अकबर ने तोड़ने के लिए भेजा, मानसिंह ने करा दिया भव्य निर्माण

अयोध्या और मथुरा को भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि ये भारत की आत्मा में रचे-बसे दो अवतारों के जन्मस्थान हैं। अयोध्या मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जन्मस्थली है तो मथुरा योगेश्वर कृष्ण की जन्मभूमि है। ये दोनों ही स्थान कालांतर में मुस्लिम आक्रमणकारियों के निशाना बने।

मथुरा का केशवदेव मंदिर अति प्राचीन मंदिर है, लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना। कहा जाता है कि जिस जगह पर कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से भगवान विष्णु के परमावतार श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, कालांतर में वहीं केशवदेव मंदिर का निर्माण हुआ था।

हालाँकि, आज इस स्थान पर शाही ईदगाह मस्जिद स्थित है, जो केशवदेव मंदिर को तोड़कर बनाया गया है। मुगल आक्रांता औरंगजेब के विध्वंस के बाद मंदिर के गर्भगृह पर बने इस मस्जिद को लेकर न्यायालय में मुकदमे चल रहे हैं। हालाँकि, इस आलेख का विषय मंदिर और उसके इतिहास से जुड़ा है और आज हम उसी की बात करेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ने कराया था केशवदेव मंदिर का निर्माण

केशवदेव मंदिर का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है, जो पाँच हजार साल पुराना है। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि इस मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण भगवान कृष्ण के प्रपौत्र व्रजनाभ ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व में कराया था। वज्रनाम के पिता का नाम अनिरुद्ध था। अनिरुद्ध भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के बेटे थे।

महाभारत के युद्ध में हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र और महारानी गांधारी का वंश खत्म हो गया। गांधारी ने वियोग में श्रीकृष्ण को शाप दिया था कि जिस तरह से उनके कारण कौरव वंश का नाश हुआ, उसी तरह से उनके भी कुल यदुवंश का नाश हो जाएगा।

कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध की समाप्ति के 36 वर्ष के प्रारंभ में श्रीकृष्ण और जाम्बवंती के पुत्र जाम्ब के कारण द्वारिका में यदुवंशी क्षत्रियों के बीच मूसल युद्ध प्रारंभ हुआ। इसमें यदुवंशी क्षत्रियों का नाश हो गया। उसके बाद बलराम ने समुद्र में समाधि ले ली और श्रीकृष्ण एक वृक्ष के नीचे लेट गए, जहाँ एक भील ने हिरण समझकर उन्हें तीर मार दिया। इसके बाद वे अपने लोक चले गए।

लेकिन, इस युद्ध में श्रीकृष्ण के प्रपौत्र व्रज और व्रजनाभ बच गए। श्रीकृष्ण के पृथ्वी छोड़ने के बाद द्वारिका समुद्र में डूब गया। दोनों भाई बचे हुए यदुवंशी क्षत्रियों के साथ हस्तिनापुर चले आए। यहाँ आकर उन्होंने हस्तिनापुर के राजा और अभिमन्यु (अर्जुन और उत्तरा के पुत्र थे अभिमन्यु) के पुत्र महाराजा परीक्षित के सहयोग से व्रजक्षेत्र का निर्माण किया। उनके ही नाम पर इसे व्रजमंडल कहा जाता है।

यहाँ दोनों भाइयों ने कई मंदिरों, तालाबों एवं अन्य लोकोपयोगी संरचनाओं का निर्माण कराया। व्रजनाभ ने जिन मंदिरों का निर्माण कराया था, उनमें भगवान श्रीकृष्ण का केशवदेव मंदिर भी शामिल था।

कालांतर में होता रहा पुनर्निर्माण

कालांतर में इस मंदिर का जीर्णोद्धार विभिन्न राजाओं द्वारा किया जाता रहा। इतिहासकारों के अनुसार, ईसा पूर्व 85-57 में श्रीकृष्ण मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था। महाक्षत्रप सौदास के काल में ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेखों से पता चलता है कि वसु नामक व्यक्ति ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।

कहा जाता है कि समय बीतने के साथ ही मंदिर पुराना पड़ने लगा और इसकी हालत जर्जर हो गई। उसके बाद 5वीं शताब्दी में इस मंदिर का दूसरी बार जीर्णोद्धार हुआ। गुप्त वंश के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने इसका जीर्णोद्धार कराया था। इस बात का जिक्र सम्राट के दरबार में आए चीनी यात्री फाह्यान ने किया है। फाह्यान 399 ईस्वी से 414 ईस्वी तक भारत भ्रमण पर था।

मुस्लिम आक्रांताओं का सिलसिला शुरू: पहला आक्रमण महमूद गजनवी का

सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के जीर्णोद्धार के बाद मथुरा का केशवदेव मंदिर लगभग 500 वर्षों तक अडिग खड़ा रहा, लेकिन हालात पहले की तरह नहीं रह गए थे। अब भारत पर इस्लाम के मजहबी आक्रमणकारियों की नजर पड़ गई थी। ग्रंथों में इन्हें ‘म्लेच्छ’ कहा गया है।

केशवदेव मंदिर पर पहला हमला अफगानिस्तान का शासक महमूद गजनवी ने सन 1017-1018 में किया था। वह मंदिरों के वैभव और यहाँ की अतुल संपदा को देखकर हतप्रभ था। मुस्लिम आक्रमण के बाद रेगिस्तान में परिवर्तित हो चुके अफगानिस्तान और उसके आसपास के निर्माणों में ऐसी भव्यता कहाँ थी।

महमूद के हमले के समय उसका दरबारी इतिहासकार अल उत्बी भी उसके साथ था। उत्बी ने अपनी किताब ‘तारीख-ए-यामिनी’ में लिखा है, “हैरान महमूद ने मंदिर की भव्यता देखकर कहा कि अगर कोई इसकी जैसी इमारत बनाना चाहे तो उसे 100 करोड़ दीनार खर्च करने पड़ेंगे। माहिर कारीगरों को भी इसे बनाने में कम-से-कम 200 साल लगेंगे।”

मंदिर की भव्यता देख चिढ़े महमूद ने केशवदेव मंदिर को तुड़वा दिया। इतना ही नहीं, उसने मथुरा शहर के सारे मंदिरों को तुड़वा दिया और इनमें स्थापित सोने-चाँदी की मूर्तियों को लूट लिया और पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया।

अल उत्बी ने लिखा है कि केशवदेव मंदिर में सोने की पाँच मूर्तियाँ थीं। इन मूर्तियों की आँखों में माणिक्य जड़े थे। मंदिर में इतना सोना मिला था कि उसे ले जाना संभव नहीं था। इसलिए उसने काफी सोना गला दिया था। कहा जाता है कि सोने को ले जाने के लिए महमूद गजनवी ने कई ऊँटों का इस्तेमाल किया था। 

सन 1860-90 तक मथुरा के अंग्रेज कलेक्टर रहे एफएस ग्रौसे ने ‘मथुरा-वृंदावन: द मिस्टिकल लैंड ऑफ लॉर्ड कृष्णा’ नामक पुस्तक में लिखा है कि महमूद गजनवी ने श्रीकृष्ण मंदिर के साथ-साथ शहर के सैकड़ों मंदिरों को तुड़वा दिया था। मंदिरों को लूटने के साथ ही उसने शहर में भी जमकर उत्पाद मचाया था।

मंदिर पुनर्निर्माण और दूसरा हमला सिकंदर लोदी का

महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद मथुरा तहस-नहस होकर गया था, लेकिन सनातन धर्मांवलंबियों की जिजीविषा और उनकी आस्था ने उन्हें दोबारा उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। गजनवी के आक्रमण के बाद साल सन 1150 में जज्ज नाम के एक जागीरदार ने यहाँ एक भव्य विष्णु मंदिर बनवाया।

इस बात का उल्लेख श्रीकृष्ण जन्मभूमि स्थान से मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है। माना जाता है कि जज्ज कन्नौज के गढ़वाल राजवंश के अधीन एक जागीरदार थे। वहीं, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वे मथुरा के राजा विजयपाल देव से संबंधित हैं।

समय के साथ दिल्ली के तख्त पर मुस्लिमों का अधिकार हो गया। गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश और सैय्यद वंश गद्दी पर बैठा। सैय्यद को हराकर बहलोल लोदी गद्दी पर बैठा और लोदी वंश की नींव डाली। बहलोल लोदी की मौत के बाद उसका बेटा निजाम खान सिकंदर लोदी के नाम से सन 1489 में दिल्ली की तख्त पर बैठा और सन 1517 तक शासन किया।

सिकंदर लोदी कट्टर सोच का शासक था। जब मथुरा के केशवदेव मंदिर की प्रसिद्धि उस तक पहुँची तो उसने मंदिर पर हमला कर इसे नष्ट कर दिया। इतना ही नहीं, उसने हिंदुओं पर फिर से जजिया कर लगा दिया।

अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्रौस ने जहाँगीर के शासनकाल के इतिहासकार अब्दुल्ला की किताब ‘तारिख-ए-दाउदी’ के हवाले से लिखा है कि सिकंदर लोदी ने हिंदुओं के नदी में स्नान करने और उसके किनारे मुंडन कराने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

अकबर ने तोड़ने के लिए सेना भेजी, मानसिंह ने मंदिर बनवा दिया

समय के साथ दिल्ली के तख्त से लोदी वंश का अंत हो गया। सन 1526 ईस्वी में बाबर दिल्ली की गद्दी पर बैठा और मुगल वंश को स्थापित किया। इसी मुगल वंश में आगे चलकर अकबर हुआ, जिसे भारत का इतिहास ‘अकबर महान’ बताता है। अकबर मुगल वंश के संस्थापक बाबर का पौत्र और हुमायूँ का बेटा था।

अकबर ने दिल्ली की गद्दी पर सन 1556 ईस्वी से 1605 ईस्वी तक शासन किया। अकबर के दरबार में नौ रत्न थे, जिनमें तानसेन, राजा बीरबल, राजा मानसिंह, राजा भारमल, अब्दुर्रहीम आदि प्रमुख थे। इस वजह से अकबर को धर्मनिरपेक्ष बताने की कोशिश की जाती है, लेकिन स्वभाव में वह ऐसा नहीं था।

अकबर ना सिर्फ मेवाड़ में जौहर और शाका के लिए जिम्मेदार था, बल्कि उसने मथुरा के केशवदेव मंदिर के चबूतरे को भी तोड़ने का प्रयास किया था। सिकंदर लोदी के विध्वंस के बाद मथुरा मंदिर विहीन हो गया था और मुस्लिम शासन में कोई मंदिर निर्माण का साहस नहीं कर पा रहा था।

जिस जगह मंदिर का गर्भगृह था, उसके बगल में ही चौबे नाम के एक व्यक्ति ने चबूतरा बनवा दिया। बीतते समय के साथ हिंदू उस चबूतरे को पूजने लगे और उसका परिक्रमा करने लगे। यह बात शहर के काजी (इस्लामी धर्मगुरु और जज) शेख अब्दुल नबी को नागवार गुजरी। उसने हिंदुओं को ऐसा करने से रोका, लेकिन हिंदू नहीं माने। मथुरा राजा मानसिंह की जागीर थी, इसलिए वहाँ उनके हिंदू सैनिक तैनात थे। इस बात ने भी हिंदुओं को आत्मबल दिया।

जिस बंगाल को बाबर, हुमायूँ और अकबर नहीं जीत सके, उसे जीतकर राजा मानसिंह लौटे तो अकबर ने उनका खूब स्वागत किया और बंगाल (आज का बिहार, बंगाल और ओडिशा) को की जागीर दे दी। राजा मानसिंह ने मथुरा भी माँग लिया और अकबर ने दे भी दिया। बंगाल की देखभाल राजा मानसिंह बिहार के रोहतासगढ़ किले से करते थे और यही रहते थे। उस दौरान इस इलाके (बिहार, बंगाल, उड़ीसा) का नाम भी बदलकर वीर मानसिंह भूमि कर दिया गया था। इस तरह हिंदुओं पर उनका प्रबल प्रभाव था।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा वाराणसी में हनुमान मंदिर बनवाने के बाद अकबर ने उसे तोड़ने का आदेश दिया था, लेकिन राजा मानसिंह के हस्तक्षेप के बाद अकबर ऐसा नहीं कर सका। यह बात भी मथुरा के हिंदुओं को पता थी। मानसिंह के व्यक्तित्व के बारे में काजी और कोतवाल भी अवगत थे और हिंदू भी। इस कारण भी वहाँ के हिंदू काजी की बात को अनसुना कर दे रहे थे

अपनी अवहेलना से चिढ़कर शहर काजी अपनी शिकायत लेकर सीधे अकबर के दरबार में पहुँच गया और उसने हिंदुओं के पूजा-पाठ की शिकायत की। हालाँकि, काजी की बात सुनकर भी अकबर राजा मानसिंह से सीधे दुश्मनी मोल लेना नहीं चाहता था। हल्दीघाटी युद्ध में राजा मानसिंह ने महाराणा प्रताप को जाने देकर जिस प्रकार सहायता दिया था, उससे अकबर वाकिफ था।

उस दौरान भी अकबर अपने प्रबल शत्रु का पीछा नहीं करने के कारण राजा मानसिंह को कुछ नहीं कह पाया था। अकबर नाराज हुआ था और मानसिंह से बातचीत करना बंद कर दिया। इसके साथ ही उसने मानसिंह को संदेश भेजवाया था कि दरबार में आने की आवश्यकता नहीं है। सो मानसिंह भी मुगल दरबार नहीं जाते थे।

इस तरह अकबर दुविधा में पड़कर अकबर ने काजी शेख अब्दुल नबी को बोला की काजी होने के कारण जो आप फैसला लेना चाहें लें। इसके बाद काजी अपने साथ दो हजार मुगल सैनिक, जिनमें सारे मुस्लिम थे, लेकर मथुरा गया और चबूतरे को तोड़ने का आदेश दिया। इस खबर को सुनते ही मथुरा के आसपास के हिंदू क्रोधित हो उठे।

मुगल सैनिकों को मथुरा भेजने की बात जब राजा मानसिंह को पता चली तो उन्होंने अपने कच्छवाहा क्षत्रिय सैनिकों के सेनापति से मुगल सैनिकों को वापस भेजने के लिए कहा। कच्छवाहा सेनापति ने मुगल सेना की टुकड़ी के सरदार से कहा, “अगर यहाँ के एक भी हिंदू को हाथ लगाया गया तो मुगल सैनिकों को कब्रों में दफना दिया जाएगा।” इसके बाद मजबूर होकर मुगल सेनापति वापस दिल्ली लौट गया।

आगे चलकर चौबे ने उस स्थान चबूतरे पर भगवान का विग्रह रखकर प्राण-प्रतिष्ठा करा दिए और विधिवत पूजा होने लगी। अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्रौसे ने अपनी किताब में लिखा है कि सन 1590 ईस्वी में राजा मानसिंह ने मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के मूल स्थान पर भव्य मंदिर बनवा दिया। इस दौरान अकबर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया।

ओरछा के राजा वीर सिंह ने मंदिर को और भव्य बनवाया

समय बीतने के साथ अकबर के बेटे और मुगल बादशाह जहाँगीर का शासनकाल आया और 1618 ईस्वी में ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इस मंदिर को और भव्य बनवाया। राजा वीर सिंह उस दौरान मंदिर पर 33 लाख रुपए खर्च किए। कहा जाता है कि यह मंदिर इतना ऊँचा था कि उसकी रोशनी दिल्ली और आगरा से दिखाई देती थी। इस मंदिर के शीर्ष पर सोने की छतरी लगी थी।

सन 1650 में मथुरा आने वाले फ्रांसीसी यात्री टैवर्नियर और मुगल दरबार में आए इटली के यात्री निकोलाओ मानुची ने इस मंदिर का जिक्र अपने-अपने संस्मरणों में किया है। टैवर्नियर ने लिखा है कि बनारस के बाद भारत का सबसे प्रसिद्ध मंदिर मथुरा में है। वहीं, मानुची ने लिखा कि मंदिर के शीर्ष पर लगी सोने की छतरी को आगरा से भी देखा जा सकता था।

क्रूर औरंगजेब का हमला और मंदिर का तीसरी बार विध्वंस

मुगल शासन की बागडोर अब जहाँगीर के पौत्र और शाहजहाँ के बेटे औरंगजेब के हाथों में आ गई थी। औरंगजेब सबसे क्रूर, कट्टर और जेहादी विचारधारा का शासक था। उसे हिंदुओं और मंदिरों से विशेष तौर पर घृणा थी। हर मुगल शासक के शासनकाल की तरह औरंगजेब के शासन में भी मंदिरों को तोड़ने की अनुमति थी, लेकिन बनाने की नहीं।

कहा जाता है कि एक बार औरंगजेब आगरा से दिल्ली लौट रहा था। उसने आसमान में रौशनी देखी तो उसने अपने सिपहसलारों से इसके बारे में पूछा। उसके लोगों ने बताया कि यह केशवदेव मंदिर की रौशनी है। इसके बाद उसने मथुरा के इस मंदिर को तोड़ने का निश्चय किया।

साकी मुस्तद खान ने अपनी किताब ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ में लिखा है कि औरंगजेब ने सन 1669 में मथुरा पर हमले और कृष्ण मंदिर को नष्ट करने के लिए सेना भेजी थी। अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्रौसे ने अपनी किताब में लिखा है कि औरंगजेब मंदिर की भव्यता से चिढ़ गया था। उसने मंदिर को गिराकर कर उसके खंडहर पर मस्जिद बनवाई थी।

भारतीय स्थापत्य कला और इतिहास में रुचि रखने वाले स्कॉटिश इतिहासकार जेम्स फर्गुसन ने अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ इंडियन एंड ईस्टर्न आर्किटेक्टर’ में लिखा है कि मंदिर की चार मंजिला इमारत की ऊपरी दो मंजिलों को काटकर गिरा दिया गया था। इस पर औरंगजेब ने मेहराब बनवाया था, ताकि मथुरा की यात्रा के दौरान वहाँ नमाज पढ़ सके। सन 1670 में औरंगजेब मथुरा गया और मंदिर के खंडहर पर बने ईदगाह मस्जिद में नमाज भी पढ़ी।

वर्तमान में शाही ईदगाह मस्जिद श्रीकृष्ण जन्मभूमि के गर्भगृह पर स्थित है। मस्जिद के दक्षिण में स्थित वर्तमान केशवदेव मंदिर को रामकृष्ण डालमिया ने बनवाया था। इसका उद्घाटन सितंबर 1958 में हुआ था। ब्रिटिश शासनकाल में एक नीलामी के दौरान बनारस के राजा पटनीमल ने मस्जिद की पीछे वाली जगह को खरीदा था। सन 1943 में उस जमीन को राजा के उत्तराधिकारियों से उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला ने खरीद लिया।

मंदिर से केशवदेव के मूल विग्रह को हटा दिया गया

औरंगजेब के हमले की जानकारी जैसे ही मथुरा के स्थानीय हिंदुओं और पुजारियों को लगी, उन्होंने भगवान केशवदेव के मूल विग्रह को हटा दिया और उसे छुपाते रहे। इस बात का पता जब औरंगजेब को चला तो उसने घोषणा कि जो भी उस मूर्ति को स्थापित करने के लिए भूमि और पुजारियों को आश्रय देगा, उस राज्य का विध्वंस कर दिया जाएगा।

औरंगजेब की क्रूरता से सब वाकिफ थे। कोई भी राजा नहीं चाहता था कि एक प्रतिमा के लिए उसके राज्य पर मुगलों का आक्रमण हो और उनकी जनता के साथ लूटपाट, बलात्कार और हत्या हो। इसलिए किसी राजा ने शरण नहीं दी। लेकिन, पृथ्वी वीरों से खाली नहीं रही कभी।

उस दौरान एक राजा ने सबसे क्रूर मुगल शासक औरंगजेब को चुनौती दी और ना सिर्फ भगवान का विग्रह लेकर घुम रहे पुजारियों को आश्रय दिया, बल्कि प्रतिमा को स्थापित करवाते हुए भव्य मंदिर भी बनवाया। हम अपने अगले लेख में इस कहानी का विस्तार से चर्चा करेंगे।

लाल सिंह चड्ढा के बॉयकॉट पर करीना कपूर ने दिखाई अकड़, कहा- मैं इसे गंभीरता से नहीं लेती, फिल्म अच्छी हो तो चलेगी ही: आमिर खान लगा रहे गुहार

आमिर खान और करीना कपूर अपनी आगामी फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ के प्रमोशन में जुटे हुए हैं, जबकि सोशल मीडिया में लोग इसके बहिष्कार के लिए अभियान चला रहे हैं। वो 2 साल बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं, वहीं एक दशक बाद आमिर खान के साथ उनकी कोई फिल्म आ रही है। दोनों की पिछली फिल्म ‘तलाश’ नवंबर 2012 में रिलीज हुई थी। बीच में वो गर्भावस्था पर अपनी किताब और हिंदी दर्शकों पर अपने बेरुखी भरे बयान के कारण सुर्ख़ियों में रही थीं।

अब उन्होंने बॉलीवुड के बॉयकॉट को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। जब करीना कपूर से पूछा गया कि क्या बॉलीवुड में ‘Ageism’ है और एक उम्र के बाद अभिनेत्रियों को फ़िल्में नहीं मिलतीं, तो उन्होंने कहा कि ये सब सिर्फ सोशल मीडिया में है, वास्तविक जीवन में नहीं। उन्होंने कहा कि अगर आप प्रतिभावान हैं तो आपको काम मिलता रहेगा। करीना कपूर खान ने कहा कि आज लोग अलग-अलग उम्र में अपने हिसाब से किरदार अदा कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वो गर्भावस्था के दौरान भी काम करती रहीं और जिन्हें इससे समस्या है, उन्हें न लें। उन्होंने बताया कि साढ़े 5 महीने की गर्भवती होने के बावजूद उन्होंने आमिर खान के साथ दृश्य फिल्माए। उन्होंने आलिया भट्ट का भी उदाहरण दिया, जो गर्भवती होने के बावजूद फिल्मों की शूटिंग कर रही हैं। उन्होंने बॉयकॉट की अपील को ‘कैंसल कल्चर’ बताते हुए कहा कि आज लोगों की विभिन्न प्लेटफॉर्म्स तक पहुँच है, इसीलिए वो हर चीज पर राय दे रहे हैं। पहले करीना कपूर ने कहा था कि लोग फिल्म न देखें, उनसे किसी ने जबरदस्ती थोड़े की है।

‘इंडिया टुडे’ से करीना कपूर खान ने कहा, “हर कोई आजकल अपने विचार रखना चाहता है। आजकल अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स हैं और हर कोई के पास कोई न कोई राय है। इसीलिए, अगर आज आपको रहना है तो कुछ चीजों को नजरअंदाज करना सीखना होगा। नहीं तो आपका जीवन जीना कठिन हो जाएगा। इसीलिए, मैं इन चीजों को गंभीरता से नहीं लेती। मुझे जो पसंद आता है, मैं पोस्ट करती हूँ। मुझे पता है कि फिल्म रिलीज होगी तो इसके बारे में सबकी कुछ न कुछ राय होगी। बस यही बात है।”

करीना कपूर खान ने कहा कि अगर फिल्म अच्छी होगी तो इसे अच्छी प्रतिक्रिया मिलेगी और ये सभी उम्मीदों के पार चली जाएगी। उन्होंने कहा कि फिल्म अच्छी हो तो इन चीजों का उस पर असर नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ आमिर खान लोगों से अपील कर रहे हैं कि वो ‘लाल सिंह चड्ढा’ का बॉयकॉट न करें और इसे थिएटर में जाकर देखें। आमिर खान ने कहा कि कुछ लोगों को लगता है कि उन्हें देश से प्यार नहीं, लेकिन वो गलत हैं। एक अन्य इंटरव्यू में करीना कपूर खान ने कहा कि वो विवादों पर सफाई देना ज़रूरी नहीं समझतीं।