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दिल्ली के सीलमपुर में काँवड़ यात्रा पर फेंका गया मांस का टुकड़ा, हिन्दुओं ने किया विरोध प्रदर्शन: वीडियो वायरल

दिल्ली के सीलमपुर में काँवर खंडित होने का मामला सामने आया है। जहाँ काँवर यात्रा पर मांस टुकड़ा फेंक दिया गया है। जिसके बाद काँवड़ियों ने करीब एक घंटे तक सड़क जाम कर आरोपितों पर कार्रवाई की माँग करते रहे। घटना आज मंगलवार (19 जुलाई, 2022) शाम करीब 4 बजे की है। घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। वहीं पुलिस ने समझा-बुझाकर मामला शांत कराया।

दरअसल, 13 जुलाई, 2022 को हरिद्वार से गंगा जल लेकर राजस्थान के अलवर स्थित स्थानीय शिव मंदिर निकले काँवड़ियों के दल को उस समय परेशानी का सामना करना पड़ा जब दिल्ली के सीलमपुर इलाके से गुजरते हुए पुल के नीचे काँवड़ पर किसी ने मांस का टुकड़ा फेंक दिया। लगभग 7 की पैदल यात्रा कर दिल्ली पहुँचे इन काँवड़ियो की बाकी राज्यों की तरह फूलों से स्वागत की बात कौन कहे बल्कि बिना खंडित हुए इनका काँवड़ निकल जाए यही चिंता की बात है। जबकि इन्हें अभी भी अगले 6 दिनों की पैदल यात्रा कर 25 जुलाई की शाम तक राजस्थान के अलवर पहुँचना है।

इस मामले में ऑपइंडिया ने उस काँवड़ यात्रा समूह के एक काँवड़िया से बात की। जिसने पूरे मामले में बात करते हुए बताया कि जैसे ही हम सीलमपुर इलाके से काँवड़ लेकर गुजर रहे थे तभी एक साथी काँवड़िए ने जब काँवड़ को एक कंधे से दूसरे कंधे पर बदला तो उसके काँवड़ के साज-सज्जा में अटका मांस का टुकड़ा सड़क पर गिर पड़ा। हालाँकि, किसने और कब फेंका यह वह दावे से नहीं कह सकते लेकिन मुस्लिम बहुल सीलमपुर से पहले सब ठीक था और लोग जगह-जगह स्वागत-सत्कार भी कर रहे थे। लेकिन दिल्ली में मामला कुछ और ही नजर आया।

बता दें कि 7 दिन की मेहनत के बाद दिल्ली पहुँचे काँवड़ के मांस के टुकड़े से खंडित होने के बाद काँवड़ियों ने वहीं सड़क जाम कर केजरीवाल प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी और योगी-मोदी के व्यवस्था की तारीफ करनी शुरू कर दी। करीब एक घंटे चले हंगामे के बाद, मौके पर पहुँची दिल्ली पुलिस ने उक्त काँवड़िया को हरिद्वार ले जाकर वापस जल भरवाने और सुरक्षित लाकर सीलमपुर में उसी स्थान पर छोड़ने के आश्वासन के बाद बाकी काँवड़िए राजस्थान को निकल गए। लेकिन सवाल तो है ही कि एक भी त्योहार बिना किसी उपद्रव के मुस्लिम बहुल इलाकों में शांति ने नहीं गुजर रहा है अब वो चाहे विसर्जन यात्रा हो, कोई शोभायात्रा या फिर काँवड़यात्रा।

गौरतलब है कि सावन का महीना लगने से पहले ही यानि 14 जुलाई से ही काँवड़ यात्रा को ध्यान में रखते हुए दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। यह यात्रा 12 अगस्त तक चलेगी। इतना ही नहीं पुलिस ने काँवड़ियों से तय रास्ते का इस्तेमाल करने की भी अपील की है। पुलिस ने वाहन चालकों और सड़क पर चलने वालों को भी यातायात नियमों का पालन करने को कहा है। फिर भी मांस फेंक देने की ऐसी घटनाएँ मुस्लिम बहुल इलाकों में पुलिस की तैयारियों को और चाक-चौबंद करने की माँग करती हैं।

नूँह DSP हत्याकांड: एनकाउंटर के बाद इकरार गिरफ्तार, पाँव में लगी गोली, बोले गृह मंत्री अनिल विज – एक भी दोषी को नहीं छोड़ेंगे

हरियाणा में पत्थर से भरे डंपर से कुचल कर DSP सुरेंद्र सिंह बिश्नोई की हत्या के मामले में पुलिस ने एनकाउंटर के बाद इकरार नामक आरोपित को गिरफ्तार किया है। इकरार के पाँव में गोली लगी है। ये घटना हरियाणा के नूँह की है, जो इस्लामी कट्टरवाद और रोहिंग्या बस्तियों के लिए पहले से कुख्यात रहा है। अब खनन माफिया ने एक पुलिस अधिकारी को मार डाला। साउथ रेंज रेवाड़ी के ADGP डॉ एम रवि किरण ने बताया कि DSP गुप्त सूचना मिलने के बाद औचक निरीक्षण के लिए गए थे।

उन्होंने बताया कि इसी कारण उनके पास बैकअप फोर्स नहीं रही होगी, या इसके लिए उन्हें समय नहीं मिला होगा। खुद DGP पीके अग्रवाल जाँच के लिए नूँह पहुँचे और आरोपितों पर कार्रवाई के लिए पुलिस अधिकारियों संग बैठक की। उन्होंने घटनास्थल पर पहुँच कर वारदात के बारे में भी जानकारी ली। नूँह के कुछ गाँवों में पुलिस ने दोपहर के बाद से ही घेराबंदी कर रखी है। पुलिस ने अपनी 8 टीमों को आरोपितों की धर-पकड़ में लगाया है।

इकरार के साथ मुठभेड़ में कई राउंड गोली चली, लेकिन अंततः पुलिस उसे धर-दबोचने में कामयाब हुई। पैर में गोली लगने के बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अन्य बदमाशों की गिरफ़्तारी के लिए पुलिसिया छापेमारी जारी है। मृतक DSP के परिवार को हरियाणा सरकार ने 1 करोड़ रुपए देने की घोषणा की है। परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी मिलेगी। तावडू के डीएसपी के चालक और सुरक्षाकर्मी इस घटना में किसी तरह बच गए।

अनिल विज ने कहा, “हरियाणा के DGP घटनास्थल पहुँच कर निगरानी रख रहे हैं। एनकाउंटर के बाद एक व्यक्ति गिरफ्तार किया गया है। तलाशी अभियान जारी है। बाकी तुरंत गिरफ्तार किए जाएँगे। हम इसे बहुत गंभीरता से ले रहे हैं, क्योंकि हमला हमारी पुलिस पर हुआ है और हम किसी को नहीं छोड़ेंगे। हमने व्यवस्था पहले से मजबूत की है। कल ही 400-425 असामाजिक तत्वों को दबोचा गया। हम समय-समय पर ऐसा अभियान चलाते हैं और मैं खुद इसकी निगरानी करता हूँ।”

याद दिला दें कि मुस्लिम बहुल नूँह कोरोना वैक्सीनेशन में भी फिसड्डी रहा था। यहाँ साक्षरता दर वैसे भी कम है और यहाँ के मुस्लिम कह रहे थे कि टीका लगवाने के बाद उनके बच्चे नहीं होंगे। इससे पहले यहाँ मुस्लिमों के अपराध की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।

नूपुर शर्मा की हत्या के लिए Pak से आया रिजवान अशरफ, साथ में 11 इंच का चाकू, नक्शे और मजहबी किताबें: अजमेर शरीफ जाने वाला था

नूपुर शर्मा की हत्या के लिए पाकिस्तान से आए रिजवान अशरफ को राजस्थान की अंतरराष्ट्रीय सीमा से गिरफ्तार किया गया है। BSF ने उसे घुसपैठ करते हुए रंगे हाथों पकड़ा। वो नूपुर शर्मा को जान से मार डालने की मंशा से आया था। उनके पास से कई संदिग्ध वस्तुएँ भी बरामद हुई हैं। IB और RAW जैसी ख़ुफ़िया एजेंसियों की टीमें भी उससे पूछताछ में लगी हुई हैं। मिलिट्री एजेंसी की टीम भी उससे पूछताछ कर रही है।

ये घटना शनिवार (16 जुलाई, 2022) की है, जब रात के 11 बजे श्रीगंगानगर से सटे हिंदुमलकोट बॉर्डर पर फेंसिंग के आसपास एक संदिग्ध व्यक्ति घूम रहा था। पेट्रोलिंग टीम को उस पर संदेह हुआ, जिसके बाद उससे पूछताछ की गई। उसने ठीक से सवालों के जवाब नहीं दिए। तलाशी लेने पर उसके पास से दो चाकू भी बरामद हुए। इसमें से एक चाकू 11 इंच का और काफी धारदार है। उसके पास से मजहबी किताबें, नक़्शे, कपड़े और खाने-पीने के सामान भी मिले हैं।

पूछताछ में रिजवान अशरफ ने बताया है कि वो उत्तरी पाकिस्तान स्थित मंडी बहाउद्दीन शहर का रहने वाला है। ये शहर पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि उसने नूपुर शर्मा की हत्या के लिए बॉर्डर क्रॉस किया था, आधिकारिक रूप से ऐसी कोई पुष्टि हो गई है कि वो इसीलिए ही आया था। पुलिस ने उसे स्थानीय अदालत में पेश किया, जिसके बाद उसे 8 दिन के लिए रिमांड पर भेज दिया गया है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ ने एक वरिष्ठ BSF अधिकारी के हवाले से बताया कि उसने पूछताछ में नूपुर शर्मा की हत्या के लिए बॉर्डर क्रॉस करने की बात कबूल की है। रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि इससे पहले वो अजमेर शरीफ स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाने वाला था। पैगंबर मुहम्मद पर नूपुर शर्मा के बयान से वो नाराज़ है। बता दें कि राजस्थान के उदयपुर में टेलर कन्हैया लाल और महाराष्ट्र के अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे की जिहादियों ने नूपुर शर्मा के समर्थन का आरोप लगा कर हत्या कर दी है।

CM एकनाथ शिंदे से मिले उद्धव गुट के 12 सांसद: महाराष्ट्र पर 20 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, ठाकरे ने संगठन में की 100 नई नियुक्तियाँ

महाराष्ट्र के सियासी संकट पर बुधवार (20 जुलाई 2022) को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगी। इस दौरान चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस कृष्ण मुरारी और हेमा कोहली की बेंच उद्धव ठाकरे की अगुआई वाले खेमे और एकनाथ शिंदे खेमे की याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इससे एक दिन पहले यानी आज महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) ने दिल्ली में शिवसेना के 12 सांसदों से मुलाकात की।

शिवसेना में विभाजन के बीच रिपब्लिक टीवी ने उन 12 लोकसभा सांसदों की सूची जारी की है, जो एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं। इसमें भावना गवली और श्रीकांत शिंदे शामिल हैं, जिन्होंने शिवसेना में बगावत की शुरुआत से ही उद्धव ठाकरे गुट से दूरी बना ली थी। अभी तक, 6 लोकसभा सांसद- विनायक राउत, अरविंद सावंत, गजानन किरीटकर, संजय जाधव, ओम राणे निंबालकर, और राजन विचारे ठाकरे खेमे में हैं, जबकि दादरा और नगर हवेली की सांसद कलाबेन डेलकर ने अभी तक इसको लेकर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है।

शिवसेना के 12 लोकसभा सांसदों की सूची

एकनाथ शिंदे खेमे में शामिल होने वाले शिवसेना के 12 लोकसभा सांसदों की सूची में सबसे पहले श्रीकांत शिंदे का नाम है। श्रीकांत शिंदे महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे के बेटे और 2014 से कल्याण लोकसभा सीट से सांसद हैं। धैर्यशील माने पहली बार हाटकानागले से सांसद चुने गए हैं। सदाशिव लोखंडे 2014 से शिरडी के सांसद और 3 बार विधायक रह चुके हैं। हेमंत गोडसे 2014 से नासिक के सांसद हैं। हेमंत पाटिल पहली बार हिंगोली से चुने गए सांसद और नांदेड़ दक्षिण के पूर्व विधायक हैं।

राजेंद्र गावित 2018 से पालघर के सांसद हैं। संजय मंडलिक पहली बार कोल्हापुर से सांसद बने हैं। श्रीरंग बार्ने 2014 से मावल के सांसद हैं। राहुल शेवाले 2014 से मुंबई साउथ सेंट्रल सांसद और पूर्व बीएमसी स्थायी समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं। प्रतापराव गणपतराव जाधव 2009 से बुलढाणा के सांसद हैं। कृपाल तुमाने 2014 से रामटेक के सांसद हैं। वहीं, भावना गवली 1999 से यवतमाल-वाशिम की सांसद हैं।

गौरतलब है कि लगातार बगावत के बीच पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार (18 जुलाई, 2022) को 100 नई नियुक्तियाँ की। उद्धव ने मुंबई, पालघर, यवतमाल, अमरावती समेत कई अन्य जिलों में 100 से ज्यादा पदाधिकारी नियुक्त किए हैं। शिवसेना के मुखपत्र सामना में इसकी घोषणा की गई है।

लुलु मॉल में मुस्लिमों ने ही पढ़ी थी नमाज, गलत नाम और दिशा बता कॉन्ग्रेसी-लिबरल कर रहे थे हिंदुओं को बदनाम: UP पुलिस का खुलासा

लखनऊ के लुलु मॉल में नमाज पढ़ने और उसका वीडियो बनाने वाले 9 नमाजियों में से 4 को सुशांत गोल्फ सिटी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जिसकी जानकारी मंगलवार (19 जुलाई, 2022) को लखनऊ के पुलिस कमिश्नर डीके ठाकुर ने दी। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासन को ऐसे तत्वों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस कमिश्नर ध्रुवकांत ठाकुर ने नमाज अदा करने वाले आरोपितों के बारें में जानकारी देते हुए बताया, “चारों गिरफ्तार किए गए अभियुक्त साथ में ही लुलु मॉल के अंदर नमाज अदा की थी। CCTV से आरोपितों की पहचान की गई थी। रेहान, लुकमान, नोमान लखनऊ के इंदिरानगर थाने के खुर्रमनगर के अबरार में रहते हैं। अतिफ खान लखीमपुर के मोहम्मदी का रहने वाला है। लुकमान और नोमान दोनों सगे भाई हैं। जो कि सीतापुर के लहरपुर थानाक्षेत्र के मंगोलपुर के रहने वाले हैं। ये बाइक से मॉल में नमाज पढ़ने के लिए पहुँचे थे।”

पुलिस कमिश्नर ध्रुव कांत ठाकुर ने आगे बताया कि गिरफ्तार किए गए चारों अभियुक्तों के खिलाफ धारा 153 A (1) 341, 505 295 A के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक जो जानकारी सामने आई है उसमें बताया जा रहा है कि चारो आरोपितों ने पुलिस के सामने कबूल किया कि 12 जुलाई, 2022 को लुलु माल परिसर में बिना अनुमति के नमाज पढ़ी थी और उसका वीडियो भी बनाया था और सोशल मीडिया पर वायरल किया था। बता दें कि इन चारों आरोपितों के साथ वीडियो में कुल 9 लोग नमाज पढ़ने गए थे। जिनका वीडियो वायरल हुआ था। पुलिस पाँच अन्य नमाजियों की तलाश कर रही है।

वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी लुलु मॉल के आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद घटनाक्रम पर बोलते हुए कहा, “शहर के एक नए मॉल को राजनीति का अड्डा बना लिया गया है। मॉल के नाम पर प्रदर्शन हो रहे हैं और बेमतलब की बयानबाजी चल रही है। कुछ लोग जनता के आवागमन को रोकने के लिए अनावश्यक रूप से टिप्पणी और प्रदर्शन कर रहे हैं। लखनऊ प्रशासन को इस पर मामले पर पूरी गंभीरता से लेकर ऐसे लोगों से सख्ती से निपटना चाहिए।”

गौरतलब है कि पिछले सप्ताह 12 जुलाई को, लुलु मॉल में नमाज पढ़ने का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसके बाद से शहर में नया खुला ये शॉपिंग मॉल विवादों आ गया। तब से वामपंथी-लिबरल गिरोह इसे रोज नया मोड़ देते हुए कई मनगढंत दावे कर रहा था। यहाँ तक कि नमाजियों को भी हिन्दू साबित करने की न सिर्फ कोशिश हुई बल्कि खूब प्रोपेगेंडा फैलाया गया।

हालाँकि, लुलु मॉल में नमाज की प्रतिक्रिया में कुछ हिंदूवादी संगठनों ने भी हनुमान चालीसा, सुंदरकांड, गायत्री मन्त्र पढ़ने की घोषणा की थी। जिसको देखते हुए मॉल के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। साथ ही किसी भी तरह के उपद्रव से निपटने के लिए CM योगी ने सख्त आदेश दिए थे। जिसके बाद लुलु मॉल की सुरक्षा में पीएसी तैनात कर दी गई थी और अराजकतत्वों पर ड्रोन से निगरानी की जा रही है।

इन सब विवादों के बीच अयोध्या में तपस्वी छावनी के महंत परमहंसाचार्य भी मंगलवार की दोपहर को लुलु मॉल पहुँचे। हालाँकि, उनकी भी पुलिस से थोड़ी कहा-सुनी भी हुई लेकिन प्रशासन ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी और पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर अपने साथ ले गई है।

वहीं इस मामले पर बोलते हुए महंत परमहंसाचार्य ने कहा, “मैं मॉल की शुद्धिकरण के लिए आया था। यहाँ नमाज पढ़ी गई, इसलिए मॉल अशुद्ध हो गया था। लुलु मॉल का नाम बदलकर भगवा भवन करना चाहिए। मुझे मॉल में जाने से रोका गया। मॉल में 80 फीसदी मुस्लिम कर्मचारी हैं।”

पहली बार सेना भर्ती में पूछी जा रही है जाति? झूठ फैलाने वालों में AAP नेता संजय सिंह भी, लोगों ने पूछा – कभी कोई भर्ती फॉर्म भरा भी है?

नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने आज (19 जुलाई 2022) एक बार फिर सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया है। उन्होंने मोदी सरकार को घेरने के लिए अपने ट्वीट में दावा किया कि मोदी सरकार दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को योग्य नहीं मान रही, इसलिए पहली बार सेना में भर्ती के लिए जाति प्रमाण पत्र माँगा जा रहा है।

संजय सिंह ने अभ्यार्थियों की सुविधा के लिए जारी होने वाले जरूरी डॉक्यूमेंट की लिस्ट का एक पेज शेयर कर उसे हाई लाइट किया। इसे ऐसे दिखाया गया कि अब सेना भर्ती के लिए जाति और धर्म के प्रमाण पत्र कितने ज्यादा जरूरी हैं। अपने ट्वीट में संजय सिंह लिखते हैं, 

“मोदी सरकार का घटिया चेहरा देश के सामने आ चुका है। क्या मोदी जी दलितों/पिछड़ों/आदिवासियों को सेना भर्ती के काबिल नहीं मानते? भारत के इतिहास में पहली बार ‘सेना भर्ती’ में जाति पूछी जा रही है। मोदी जी आपको अग्निवीर बनाना है या जातिवीर।”

संजय सिंह के इस ट्वीट को देखने के बाद पीबीआई फैक्ट चेक ने इस दावे को झूठा बताया है। फैक्ट चेक में लिखा है कि जैसा कि दावा हो रहा है कि भारत के इतिहास में पहली बार सेना भर्ती में जाति पूछी जा रही है… ये दावा बिलकुल गलत है। सेना भर्ती के लिए जाति प्रमाण पत्र दिखाने का प्रावधान पहले से ही है। इसमें विशेष रूप से अग्निपथ योजना के लिए कोई बदलाव नहीं किया गया है।

इस फैक्टचेक के अलावा सोशल मीडिया यूजर्स भी संजय सिंह को समझा रहे हैं कि ये जाति प्रमाण दिखाने का नियम आज से नहीं बल्कि काफी समय से है। एक यूजर उन्हें कहता है, “लगता है आपने कभी किसी भर्ती का कोई फॉर्म नहीं भरा। वरना इस तरह की बातें नहीं करते।

बता दें कि सेना में जाति, धर्म देखकर भर्ती करने का मुद्दा पहली बार नहीं उठा। साल 2013 में भी सुप्रीम कोर्ट में आर्मी ये साफ कर चुकी है कि वो जाति, धर्म और क्षेत्र देखकर लोगों की भर्ती नहीं करते हैं। लेकिन एक रेजिमेंट में एक क्षेत्र से आने वाले लोगों के समूह को प्रशासनिक सेवा और सुविधाएँ देने के लिए ऐसा किया जाता है। जाति-धर्म की चयन प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होती।

लखनऊ से पकड़े गए नुरुद्दीन जंगी के साथ बिहार पुलिस की सत्तू पार्टी: पटना कोर्ट में पेशी के लिए लाया गया था, PFI के ‘मिशन 2047’ से जुड़े हैं तार

बिहार पुलिस का एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें कुछ जवान नुरुद्दीन जंगी के साथ सत्तू पीते नजर आ रहे हैं। जंगी कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) का सक्रिय सदस्य है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जंगी को पेशी के लिए पटना कोर्ट लाया गया था। इस दौरान उसे पुलिसकर्मियों के साथ आराम से बात करते और सत्तू पीते देखा गया। वीडियो सोमवार (18 जुलाई 2022) का बताया जा रहा।

फुलवारी शरीफ से दो आतंकियों की गिरफ्तारी के बाद जिन 26 लोगों पर नामजद एफआईआर हुई थी, उनमें जंगी भी है। उसे लखनऊ से पकड़ा गया था। इन आतंकियों की गिरफ्तारी से 2047 तक भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की साजिशों का खुलासा हुआ था। पुलिस ने बताया था कि पीएफआई इसके लिए युवाओं को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग के नाम पर हथियार चलाने का प्रशिक्षण दे रहा था।

जंगी को 15 जुलाई को लखनऊ के मवैया मेट्रो स्टेशन से गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उसे बिहार लाया गया। वायरल वीडियो में जंगी पूरी तरह बेफिक्र दिख रहा। उसके हाथों में हथकड़ी नहीं थी। पत्रकार प्रकाश कुमार ने ट्वीट कर कहा है, “कहा जा रहा है कि पुलिसकर्मियों को सत्तू जंगी ने ही अपने पैसे से पिलाई थी।” पेशी के बाद सिविल कोर्ट ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।

दरभंगा के डीएसपी कृष्णानंद के मुताबिक, नुरुद्दीन बिहार के दरभंगा के उर्दू बाजार के शेर मोहम्मद गली का रहने वाला है, वह लंबे समय से पीएफआई से जुड़ा हुआ है। 11 जुलाई को पटना के फुलवारी शरीफ में दो संदिग्ध आतंकवादियों के पकड़े जाने और पटना पुलिस के द्वारा इस मामले में 26 लोगों पर नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज करने के बाद वह बिहार छोड़ फरार हो गया था।

गौरतलब है कि फुलवारी शरीफ के नया टोला से 11 जुलाई, 2022 को पटना पुलिस ने अतहर परवेज और जलालुद्दीन को और 14 जुलाई को अरमान मल्लिक को पकड़ा था। वे फुलवारी शरीफ में शारीरिक प्रशिक्षण की आड़ में आतंकी प्रशिक्षण देने और भारत को 2047 तक इस्लामिक राष्ट्र (गजवा-ए-हिन्द) बनाने की साजिश से जुड़े हैं। इसके बाद बिहार पुलिस की जाँच के दौरान इनके पूरे आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश हो गया।

फिल्म निर्देशक अविनाश दास को गुजरात पुलिस ने दबोचा: शेयर की थी तिरंगे के साथ महिला की अश्लील तस्वीर, अमित शाह को लेकर फैलाया झूठ

फिल्म निर्देशक अविनाश दास को गुजरात पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। उन्हें अहमदाबाद की DCB (डिटेक्शन ऑफ क्राइम ब्रांच) ने मंगलवार (19 जुलाई, 2022) की दोपहर को उनके मुंबई स्थित आवास से उठाया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक तस्वीर शेयर की थी और उन्हें झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल के साथ दिखाया था। बता दें कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पूजा सिंघल ED द्वारा गिरफ्तार की जा चुकी हैं।

इस सम्बन्ध में 13 मई, 2022 को अहमदाबाद के DCB पुलिस स्टेशन में अविनाश दास के विरुद्ध FIR दर्ज की गई थी। साथ ही उन पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का भी आरोप है। अपने फेसबुक हैंडल पर शेयर की गई एक तस्वीर में उन्होंने एक महिला को तिरंगा झंडा पहने हुए दिखाया था। अविनाश दास पर IPC की धारा-469 (जालसाजी) के साथ-साथ IT एक्ट की धारा–67 और ‘राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ के तहत भी बुक किया गया है।

46 वर्षीय अविनाश दास ‘अनारकली ऑफ आरा (2017)’ फिल्म बना चुके हैं, जिसमें स्वरा भास्कर और संजय मिश्रा मुख्य किरदारों में थे। पिछले साल उनके द्वारा निर्देशित ‘रात बाकी है’ रिलीज हुई थी, जिसमें अनूप सोनी और राहुल देव दिखे थे। साथ ही ‘MX Player’ पर ‘रनवे लुगाई’ नामक 10 एपिसोड वाली सीरीज का उन्होंने निर्देशन किया था। उन्होंने ‘द बैटल ऑफ बनारस’ नामक एक डॉक्यूमेंट्री बनाई और आमिर खान के टीवी चैट शो ‘सत्यमेव जयते’ से भी जुड़े रहे।

हाल ही में इसी मामले में जमानत के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँचे थे, लेकिन सफल नहीं हुए। पिछले एक सप्ताह से DCB की टीम उन्हें दबोचने के लिए मुंबई में थी। जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, तब वो आवास से दफ्तर के लिए निकले थे। उन्हें अहमदाबाद ले जाया जा रहा है। प्रोपेगंडा फैलाने में भी अविनाश दास का कोई सानी नहीं है। उन्होंने अमित शाह और पूजा सिंघल की जो तस्वीर शेयर की, वो 2017 की थी। उन पर जनता को गुमराह करने और मानहानि के आरोप हैं।

अविनाश दास की कारस्तानियाँ तिरंगे के साथ महिला की अश्लील तस्वीर शेयर करने और अमित शाह की पुरानी तस्वीर शेयर कर उन्हें बदनाम करने की कोशिश करने तक ही नहीं हैं। पत्रकार उत्पन्ना चक्रवर्ती द्वारा साझा किए गए चैट्स में अविनाश ने उन्हें लिखा था कि तुम कुछ ज्यादा ही सख्त हो और मुझे पसंद हो। उन्होंने उनके खाने-पीने और खर्चा उठाने तक की बातें की थीं। उत्पन्ना ने पूछा था कि परेशानी से घिरी नौकरी चाहने वाली एक लड़की से इस तरह बात करने के पीछे क्या मंशा है?

मदर-फादर, ब्रदर-सिस्टर… सारे शब्द बैन: ‘वोक कल्चर’ में डूबा मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी, छात्रों को रोबोट बनाने की तैयारी

ब्रिटेन की जानी-मानी मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी (Manchester University) के कुछ वोक लोगों ने भाषा को समावेशी बनाने के नाम पर गिने-चुने शब्दों को ‘अपमानजनक’ करार देते हुए उन पर प्रतिबंध लगाया है। इन अपमानजनक शब्दों की लिस्ट में उन्होंने भाई-बहन, मम्मी-पापा और पति-पत्नी को भी जोड़ा है।

वोक यूनिवर्सिटी का कहना है कि अगर अगर छात्र-छात्राओं को ये शब्द इस्तेमाल करने ही हैं तो वो भाई-बहन (ब्रदर-सिस्टर) की जगह सिबलिंग (SIBLING) बोलें। मम्मी-पापा की जगह ‘पेरेंट्स या गार्जियन (Parents or Guardian)’ बोलें। पति-पत्नी की जगह ‘पार्टनर (Partners)’ शब्द का प्रयोग किया जाए।

इसके अलावा यूनिवर्सिटी में Elderly शब्द भी बैन हो गया है और इसके पीछे वजह दी गई है कि ये सब बुजुर्ग लोगों के हित में किया गया है।

द सन की रिपोर्ट के अनुसार, स्टाफ और छात्रों के लिए यूनिवर्सिटी द्वारा निकाली गई ‘इन्क्लूसिव लैंगुएज गाइड’ में कहा गया है कि यूनिवर्सिटी अंतर और विभिन्नताओं का सम्मान करती है और ऐसे माहौल को बनाना चाहती है जहाँ हर कोई अपनी पूरी काबिलियत का इस्तेमाल करने में सक्षम हो।

शब्दों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर गाइड के बारे में कहा गया है कि, “हम जिस ढंग से लोगों के बारे में लिखते हैं वह समानता, विभिन्नता और समावेश को बढ़ावा देता है।”

बता दें कि यूनिवर्सिटी द्वारा लिए गए इस फैसले को सांसद निगल मिल्स ने हैरान करने वाला कहा और बोले कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी ख्यला किया जाना चाहिए। वहीं सोशल मीडिया पर लोगों ने इस तरह की खबर को पढ़कर कहना शुरू कर दिया है कि किसी को अपने बच्चों को इस यूनिवर्सिटी में नहीं भेजना चाहिए। ऐसी यूनिवर्सिटी सिर्फ बच्चों के करियर को बर्बाद करती हैं।

मालूम हो कि मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से पहले ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी ने ‘मैनिंग’ शब्द पर प्रतिबंध लगाया था और ‘नॉन-डिसेबल’ शब्द को able-bodied किया गया था। इसके अलावा मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी में ही पिछले साल मदर-फादर शब्द को हटाए जाने पर पहले भी बवाल हो चुका है।

लोगों ने सवाल किया था कि क्या ये सोचा जा सकता है कि बच्चे अपने माता-पिता को घर में पेरेंट बोल रहे हैं। इस नई गाइड पर आपत्ति इसलिए भी थी क्योंकि इसका अनुसरण करके कोई व्यक्ति किसी रोबोट की तरह लगता जिसे भावनाओं की कदर न होकर बस शब्द रटा दिए गए हैं। लोगों ने पूछा था कि जितना दर्द माँ को बच्चा पैदा करने में होता है क्या उतना ही दर्द पेरेंट होता है।

पुलिस को ‘सांप्रदायिक एंगल’ नकारने की इतनी जल्दी क्यों? पुराना पड़ा ये फॉर्मूला, ‘आपसी विवाद’ की आड़ में नहीं हो सकती जिहादी सोच वाली घटनाएँ?

भारत में हर राज्य की पुलिस को एक बीमारी है, खासकर गैर-भाजपा शासित राज्यों में ये ज्यादा देखने को मिलती है। जब भी कोई ऐसी घटना होती है तो उसमें सबसे पहले बयान दिया जाता है कि कोई कम्युनल एंगल नहीं है, इसके बाद जाँच होती है और आगे की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है। जब बाकी बातें जाँच के बाद पता चलती हैं तो संप्रदायिक एंगल को नकारने की ऐसी कौन सी हड़बड़ी होती है, ये कौन सा कीड़ा पुलिस को काटे रहता है?

आइए, एकाध उदाहरण देखते हैं। जैसे, आप खुद देखिए। राजस्थान में कन्हैया लाल की हत्या से पहले करौली से लेकर जोधपुर तक में दंगे हुए, लेकिन राजस्थान पुलिस कम्युनल एंगल को नकारने में ही लगी रही। जोधपुर में दो समूहों के बीच पत्थरबाजी और हिंसा होती है, लेकिन पुलिस कहती है कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है। इस तरह की हर एक घटना में कम्युनल एंगल को नकार देने से क्या एक स्थायी शांति आ जाती है या फिर जिहादी फिर से सक्रिय नहीं होते?

ताज़ा मामला देखिए। बिहार के सीतामढ़ी में अंकित झा नाम के एक युवक को बीच बाजार दौड़ा-दौड़ा कर कुछ लोगों ने चाकू मार दिया। आरोप है कि नूपुर शर्मा का वीडियो देखने के कारण उस पर हमला हुआ। बिहार पुलिस इससे इनकार करते हुए इसे आपसी विवाद बता रही है। यहाँ ये सवाल भी जायज हो जाता है कि क्या आपसी विवाद और सांप्रदायिक हिंसा एक साथ नहीं हो सकती? आपसी विवाद सांप्रदायिक सोच के कारण और नहीं भड़क सकती?

फिर पुलिस कैसे कह सकती है कि आपसी विवाद है तो सांप्रदायिक जंगल होगा ही नहीं। जिहादी तो आपसी विवाद की आड़ में भी हिंसा कर सकते हैं और जिहाद के तहत हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं। जब दंगे होते हैं तो वो भी तो आपसी विवाद को लेकर शुरू होता है। हिन्दू त्योहारों के जुलूस पर हमले, DJ पर आपत्ति जता कर पत्थरबाजी और छेड़खानी का विरोध करने पर हिंसा – इन सबकी शुरुआत आपसी विवाद से ही होती है लेकिन घटना सांप्रदायिक हो जाता है।

नूपुर शर्मा के समर्थन को लेकर अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे का गला रेते जाने की घटना को ही ले लीजिए। उनकी हत्या के बाद भी पुलिस मामले को रफा-दफा करने को लगी रही। लेकिन, महाराष्ट्र में सरकार बदलते ही सब दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। एक पूरे गिरोह का पर्दाफाश हुआ। कोल्हे के करीबियों ने ही उन्हें मरवा दिया, क्योंकि वो नूपुर शर्मा के समर्थन पर गुस्सा थे। पुलिस ‘सारे एंगल की जाँच करने’ की बात कहते हुए पहले टाल रही थी।

हो सकता है कि पुलिस को ऐसा लगता हो कि अगर किसी घटना के सम्बन्ध में पहले ही सांप्रदायिक कोण को नकार दिया जाए तो इससे विभिन्न समूहों में हिंसा की संभावना घटेगी और क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं होगी। पुलिस को लगता है कि कम्युनल एंगल वाली बात खोल देने पर शायद हिंसा और बढ़ जाए और उसकी चुनौतियाँ भी बढ़ जाएँ। शायद इसीलिए, शांति बनाए रखने के लिए वो कम्युनल एंगल को नकारने का फॉर्मूला अपनाती है, और कारण के रूप में अन्य चीजों को गिनाया जाता है।

ये अन्य फैक्टर्स भी कारण हो सकते हैं। ऐसा नहीं है कि कम्युनल एंगल आ गया तो बाकी सारे एंगल झूठे हो जाते हैं। लेकिन, जिहादी सोच के साथ की गई हत्या में प्रमुखतः जो मुख्य कारण होता है उसे उठाया जाना चाहिए। जहाँ हिन्दू पीड़ित होते हैं, वहाँ खासकर पुलिस का रवैया इसी तरह का होता है। उनके लिए तो मीडिया तक आवाज़ नहीं उठाती। क्या कम्युनल अपराध को कम्युनल अपराध कहना इतना खतरनाक है कि इस पर पुलिस आपको गिरफ्तार भी कर लेगी?

वहीं मुस्लिमों के मामले में क्या होता है? साधारण अपराध की घटनाओं को भी ‘कम्युनल एंगल’ देकर हिन्दुओं को अत्याचारी बताया जाता है। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में एक ट्रेन डकैती की घटना को मीडिया ने कम्युनल बताते हुए लिखा कि मुस्लिम परिवार को लूटा गया। दिल्ली के मंगोलपुरी में रिंकू शर्मा की हत्या के मामले में पुलिस ने जाँच में कम्युनल एंगल पाया तो मीडिया ही इसे नकारने लगी। जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाने और दाढ़ी नोचने के कई झूठे मामले पकड़ में आ ही चुके हैं। फिर हिन्दू-मुस्लिम के मामले में ये दोहरा रवैया क्यों?

आजकल के माहौल में जब हजारों की मुस्लिम भीड़ कई शहरों में बाहर निकल कर ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगाती हो, वहाँ किसी हिन्दू का सिर कलम किए जाने के बाद इसे सांप्रदायिक हत्याकांड ही कहा जाएगा, चाहे मुस्लिम अपराधी के साथ उसकी दोस्ती रही हो, दुश्मनी रही हो या कोई आपसी विवाद। जिहादियों में कई खुलेआम हत्याएँ कर के वीडियो बनाते हैं, जैसा कन्हैया लाल के मामले में हुआ। तो कई अन्य विवाद की आड़ में इस्लाम के लिए जिहाद करते हैं।

कहने को तो पश्चिम बंगाल में हिन्दू पर्व-त्योहारों पर उनके जुलूस पर होने वले हमलों से लेकर चुनाव नतीजों के बाद ‘राजनीतिक हिंसा’ की आड़ में हिन्दुओं पर अत्याचार की घटनाएँ भी आधिकारिक रूप से सांप्रदायिक नहीं है, लेकिन क्या कई मामलों में सांप्रदायिक सोच वाले कट्टर मुस्लिमों ने इसकी आड़ में हिन्दुओं के प्रति अपना गुस्सा नहीं निकाला? चूँकि उस समय वो हिन्दू नहीं ‘भाजपा कार्यकर्ता’ थे, इसीलिए ये सांप्रदायिक एंगल नहीं हुआ।

अक्टूबर 2021 में सीलमपुर में भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान इस्लामी जिहादियों ने एक 2 माह के बच्चे और उसके परिवार पर हमला बोल दिया। पुलिस ने मामले दर्ज करने से पहले ही कम्युनल एंगल को नकार दिया। इस घटना के बाद बिना पीड़ितों की बात सुने अपने हिसाब से FIR लिख दी गई, पीड़ितों ने ऐसे आरोप लगाए। उसी साल अक्टूबर में रघुबीर नगर में डब्लू सिंह को मार डाला गया। मृतक की माँ कहती रहीं कि बेटे ने इस्लामी धर्मांतरण न करने की कीमत चुकाई है और दिल्ली पुलिस कम्युनल एंगल नकारती रही।

अब समय आ गया है जब पुलिस को हड़बड़ी में किसी भी घटना में ‘आपसी विवाद’ या अन्य कारण साबित करने के लिए तुरंत कम्युनल एंगल को नकारने से बचना चाहिए। किसी जिहादी का अपने हिन्दू पड़ोसी से जमीन का विवाद हो और वो उस ‘काफिर’ को मार डाले, फिर आधिकारिक रूप से तो ये ‘संपत्ति विवाद में हत्या’ हो गई, लेकिन क्या इसके पीछे उसकी जिहादी सोच ढक दी जाएगी? कम्युनल एंगल के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

केरल में RSS कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ हों या पश्चिम बंगाल में BJP कार्यकर्ताओं को, राजनीतिक लड़ाई की इस आड़ में सांप्रदायिक रोटी भी सेंकी जा रही है। ‘लोन वुल्फ’ हमले हों या फिर ‘लव जिहाद’ के मामले, इन सबके पीछे एक ही जिहादी सोच काम करती है। पुलिस का ये फॉर्मूला अब पुराना हो चुका है और इससे जिहादियों का मनोबल बढ़ ही रहा है। जहाँ तक हिन्दुओं की बात है, वो घटना में आरोपितों के नाम देख कर ही मामला समझने लगे हैं।