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मंकीपॉक्स वायरस को लेकर अलर्ट, एयरपोर्ट्स पर बढ़ाई गई सतर्कता: जानिए कैसे फैलता है, क्या हैं लक्षण और कितना घातक

दुनिया के कई देशों में फैल रहे मंकीपॉक्‍स वायरस ने भारत सरकार की भी चिंता बढ़ा दी है। कोरोना के बाद भारत सरकार अब इस नए वायरस के संक्रमण को लेकर किसी भी तरह का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं है और इसे ही देखते हुए केंद्र ने नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) को अलर्ट जारी किया है। 

केंद्र सरकार ने NCDC और ICMR को मंकीपॉक्‍स की स्थिति पर करीब से नजर रखने के लिए कहा है। सरकार ने मंकीपॉक्‍स के लक्षणों वाले ट्रैवलर्स के सैंपल तुरंत पुणे की नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) में जाँच के लिए भेजने को भी कहा है।

मनसुख मांडविया ने दिया निर्देश

भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) को स्थिति पर कड़ी नजर रखने का निर्देश दिया है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस संबंध में हवाई अड्डों और बंदरगाहों के स्वास्थ्य अधिकारियों को भी सतर्क रहने का निर्देश दिया है। 

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि हवाई अड्डों को निर्देश दिया गया है कि मंकीपॉक्स प्रभावित देशों की यात्रा कर लौटे किसी भी बीमार यात्री को तुरंत आइसोलेट कर, नमूने जाँच के लिए पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी की बीएसएल-4 सुविधा वाली प्रयोगशाला को भेजे जाएँ। बता दें कि भारत में अभी तक मंकीपॉक्स से संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है।

जानिए क्या है मंकीपॉक्स वायरस?

मंकीपॉक्स एक दुर्लभ, आमतौर पर हल्के संक्रमण वाला वायरस है। मंकीपॉक्स जानवरों से मनुष्यों में फैलने वाला वायरस है, जिसमें स्मॉल पॉक्स जैसे लक्षण होते हैं। हालाँकि यह इलाज की दृष्टि से कम गंभीर है। मंकीपॉक्स वायरस एक डबल-स्ट्रैंडेड डीएनए वायरस है जो पॉक्स विरिडे परिवार के ऑर्थोपॉक्स वायरस जीनस से संबंधित है। यह आमतौर पर अफ्रीका के कुछ हिस्सों में संक्रमित जंगली जानवरों में पाया गया था। साल 1958 में पहली बार एक बंदर को अनुसंधान के लिए रखा गया था जहाँ पहली बार इस वायरस की खोज हुई थी।

वहीं इंसानों में पहली बार इस वायरस की पुष्टि साल 1970 में हुई थी। यूके की एनएचएस वेबसाइट के अनुसार, यह रोग चेचक के वंश का है, जो अक्सर चेहरे पर शुरू होने वाले दाने का कारण बनता है।

ऐसे होता है मंकीपॉक्स वायरस का संक्रमण

मंकीपॉक्स वायरस किसी संक्रमित जानवर के काटने से, या उसके खून, शरीर के तरल पदार्थ या फर को छूने से हो सकता है। ऐसा माना जाता है कि यह चूहों, खरगोशों और गिलहरियों जैसे जानवरों के काटने से फैलता है। अगर आप ऐसे किसी जानवर का अधपका मांस खाते हैं जो मंकीपॉक्स से संक्रमित हो तो भी इस बीमारी के संक्रमण के चांसेस ज्यादा रहते हैं। इंसानों में यह वायरस बहुत ही तेजी से फैलता है। एक तरह से कह सकते हैं कि ये भी छुआछूत की तरह ही है। अगर आप संक्रमित व्यक्ति के कपड़े या बिस्तर का इस्तेमाल करते हैं तो आपको मंकीपॉक्स हो सकता है। छींकने और खाँसने से भी यह वायरस फैल सकता है।

मंकीपॉक्स के लक्षण क्या हैं?

यदि आप मंकीपॉक्स से संक्रमित हो जाते हैं, तो आमतौर पर पहले लक्षणों के सामने आने में 5 से 21 दिनों के बीच का समय लगता है। इनमें बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, पीठ दर्द, कंपकंपी और थकावट शामिल हैं। इन लक्षणों का अनुभव करने के एक से पाँच दिन बाद आमतौर पर चेहरे पर दाने दिखाई देते हैं। दाने कभी-कभी चिकनपॉक्स के साथ भ्रमित होते हैं, क्योंकि यह उभरे हुए धब्बों के रूप में शुरू होता है जो तरल पदार्थ से भरे छोटे पपड़ी में बदल जाते हैं। लक्षण आमतौर पर दो से चार सप्ताह के भीतर साफ हो जाते हैं और पपड़ी गिर जाती है।

क्या मंकीपॉक्स से जान जा सकती है, क्या है इलाज?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, मध्य अफ्रीका में अध्ययन, जहाँ लोगों के पास गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल तक कम पहुँच है। इससे ये पता चलता है कि यह रोग 10 संक्रमित लोगों में से एक के लिए जानलेवा हो सकता है। हालाँकि, ज्यादातर मरीज कुछ ही हफ्तों में ठीक हो जाते हैं। मंकीपॉक्स के लिए मौजूदा समय में कोई विशेष इलाज नहीं है। मरीजों को एक विशेषज्ञ अस्पताल में रहने की आवश्यकता होगी ताकि संक्रमण न फैले और सामान्य लक्षणों का इलाज किया जा सके।

‘पत्नी ने तो डिलीवर कर दिया, ये कब करेंगे?’: शिमरन हेटमायर पर टिप्पणी, जानिए क्यों हो रही गावस्कर की आलोचना

पूर्व भारतीय क्रिकेटर सुनील गावस्कर एक बार फिर से विवादों में हैं। इस बार वो आईपीएल में कैरीबियाई खिलाड़ी शिमरन हेटमायर की पत्नी पर कमेंट को लेकर आलोचना झेल रहे हैं। सोशल मीडिया पर लगातार उन्हें ट्रोल किया जा रहा है और उन्हें कमेंटेटर के तौर पर हटाने की माँग की जा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला कुछ यूँ है कि राजस्थान रॉयल्स के खिलाड़ी शिमरन हेटमायर की पत्नी गर्भवती थीं और उनका प्रसव होने वाला था। इसी को ध्यान में रखते हुए वो वापस अपने देश लौट गए थे। बच्चे के पैदा होने के बाद वो फिर से वापस लौट आए हैं। इसी क्रम में शुक्रवार (20 मई, 2022) को चेन्नई सुपरकिंग्स के साथ खेले गए मैच को राजस्थान रॉयल्स ने 5 विकेट से जीत लिया था। उस दौरान शिमरन हेटमायर छठे नंबर पर बैटिंग करने और और महज 6 रनों के निजी स्कोर पर आउट हो गए।

गावस्कर का बयान

गौरतलब है कि शुक्रवार को जैसे ही हेटमायर बैटिंग करने उतरे तो कमेंट्री कर रहे सुनील गावस्कर ने सिरमन हेटमायर की पत्नी को लेकर मजाकिया कमेंट किया। उन्होंने कहा, “शिमरन हेटमायर की वाइफ (निर्वाणी) ने तो डिलिवर कर दिया, क्या वह राजस्थान रॉयल्स के लिए डिलिवर करेंगे?

इससे पहले भी विवादों में भी रहें हैं सुनील गावस्कर

इससे पहले पूर्व खिलाड़ी सुनील गावस्कर क्रिकेटर विराट कोहली की पत्नी अनुष्का शर्मा पर कमेंट करने को लेकर विवादों में रहे हैं। दो साल पहले आईपीएल के दौरान विराट कोहली अपनी पत्नी अनुष्का के साथ क्रिकेट खेलते देखे गए थे। इसी को लेकर सुनील गावस्कर ने कमेंट किया था। हालाँकि, इससे नाराज अनुष्का शर्मा ने कहा था, “मिस्टर गावस्कर, आपने इतने साल तक लोगों की निजी जिंदगी का सम्मान किया और क्या आपको नहीं लगता कि यह बात आपको हमारे-मेरे बारे में भी कायम रखनी चाहिए थी।”

राहुल भट की हत्या के 10 दिन बाद भी जारी कश्मीरी पंडितों का विरोध प्रदर्शन, मुंडवाए बाल: झेलम नदी पर पूजा, लाल चौक तक रैली

प्रधानमंत्री पुनर्वास योजना के तहत कश्मीर में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन जारी है। मारे गए सरकारी कर्मचारी राहुल भट की दसवीं के मौके पर आज (21 मई 2022) कश्मीरी पंडित कर्मचारियो ने झेलम नदी पर उनकी आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा की और उसके बाद विरोध मार्च करते हुए लाल चौक तक गए, जहाँ घंटा घर के सामने धरना प्रदर्शन भी किया।

कर्मचारी कश्मीर घाटी से देश के किसी भी प्रान्त में ट्रांसफर की अपनी माँग पर अड़े हुए हैं। इसी कड़ी में जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में कश्मीरी पंडितों ने विरोध में अपने सिर मुँडवा लिए। इसके अलावा प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की।

सिर मुंडवाने के बाद कश्मीरी पंडित संजय कौल ने कहा, “हमने राहुल पंडित के लिए स्वेच्छा से मुंडन किया, क्योंकि वह बहुत कम उम्र में मारे गए। उनकी 5 साल की बेटी है। हम सरकार से कहना चाहते हैं कि वह जागे, क्योंकि यह नरसंहार है। एक अन्य कश्मीरी पंडित रंजन जोतशी ने कहा कि दुख की इस घड़ी में वे राहुल के परिवार के साथ हैं। हम सरकार से कश्मीरी पंडितों के ठोस और स्थायी पुनर्वास की माँग कर रहे हैं और तब तक हम जम्मू ट्रांसफर चाहते हैं।”

जम्मू-अखनूर हाईवे पर वाहनों की आवाजाही अवरूद्ध कर कश्मीरी हिंदुओं ने पाकिस्तान के खिलाफ भी नारे लगाए और कहा कि जिन लोगों ने राहुल की हत्या की है, को जेलों में डाला जाए। वहीं कश्मीर घाटी में तैनात कश्मीरी हिंदू कर्मियों को जम्मू में तैनात किया जाए। प्रदर्शन की वजह से करीब एक घंटे तक जम्मू-अखनूर रोड ब्लॉक रहा जिससे वाहनों की आवाजी बुरी तरह से प्रभावित हुई। जगह जगह जाम लग गए।

बाद में गुस्साए कश्मीरी हिंदू मुट्ठी पुल पर आ गए और यहाँ पर भी सड़क मार्ग को जाम कर दिया। इन लोगों ने आतंकियों के खिलाफ खुलकर नारेबाजी की। प्रशासन से यह माँग की कि घाटी को पूरी तरह से आतंक विहीन किया जाए। कश्मीरी हिंदू लोगों ने कहा कि घाटी में कश्मीरी हिंदू लोगों को नहीं बसने देने की साजिश पाकिस्तान और अलगाववादी रच रहे हैं। लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे, कोई हमारे हक नहीं छीन सकता।

राहुल भट की आतंकियों ने गोली मारकर कर दी थी हत्या

बता दें कि राहुल भट को आतंकियों ने 12 मई को बडगाम जिले के चदूरा कस्बे में मार गिराया था। राहुल भट को 2010-11 में जम्मू-कश्मीर में प्रवासियों के लिए विशेष रोजगार पैकेज के तहत क्लर्क की नौकरी मिली थी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि भट की पत्नी ने कई बार उनके तबादले की अपील करते हुए अधिकारियों से मुलाकात भी की थी लेकिन इस बाबत कोई कदम नहीं उठाए गए। वहीं राहुल भटट् हत्याकांड के बाद से कई कर्मचारी दफ्तर नहीं गए हैं। उनका कहना है कि वे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

इस फिल्म के लिए सुपरस्टार रजनीकांत ने चार्ज किए ₹150 करोड़: तीनों खानों को पीछे छोड़ा, फिर बने भारत के सबसे महँगे एक्टर

दक्षिण भारत में बनने वाली फिल्में लगातार बॉलीवुड की फिल्मों का कमाई के मामले में रिकॉर्ड ध्वस्त कर रही हैं। इसके अलावा वहाँ के एक्टर काफी महंगे भी हैं। इसी क्रम में सुपरस्टार रजनीकांत (Rajinikanth) ने अपनी आने वाली फिल्म के लिए 150 करोड़ रुपए की भारी-भरकम डील कर के सबको सकते में डाल दिया है। उनसे पहले इस मामले में उन्होंने एक्टर अक्षय कुमार को भी पीछे छोड़ दिया है।

देश के सबसे फेमस फिल्म स्टार्स में शुमार रजनीकांत की देश-विदेश में काफी बड़ी फैन फॉलोइंग है। अपनी पिछली फिल्म अन्नाथे के लिए तमिल एक्टर ने 100 करोड़ रुपए की भारी-भरकम फीस चार्ज की थी। उनकी ये फिल्म सुपर हिट रही थी। तमिलनाडु बॉक्स ऑफिस पर ‘अन्नाथे’ ब्लॉबस्टर रही। दुनिया भर में फिल्म ने 239 करोड़ रुपए कमा लिए। इसी के बाद अब रजनीकांत ने भी 100 करोड़ से सीधे 50 करोड़ रुपए की जंप लगाकर अपनी फीस 150 करोड़ रुपए कर दिया है।

‘तेलुगू 360’ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रजनीकांत ‘बीस्ट’ फेम नेल्सन दिलीप कुमार की अगली फिल्म में नजर आएँगे। इसके लिए दोनों के बीच करार हो चुका है। इसी साल अगस्त से शुरू होने वाली शूटिंग को देखते हुए फिल्म की टीम प्री प्रोडक्शन पर काम कर रही है। इस फिल्म का प्रोडक्शन ‘सन पिक्चर्स’ करेगा, जबकि फिल्म में संगीत का काम अनिरुद्ध रविचंद्र करेंगे। हालाँकि, इतनी महंगी फिल्म का नाम क्या रखा जाएगा, अभी तक इसकी जानकारी निकल कर सामने नहीं आई है। फ़िलहाल इसे अस्थायी रूप से ‘Thalaivar 169’ कहा जा रहा है।

गौरतलब है कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के सबसे बड़े स्टार्स में से एक थलापति विजय ने हाल ही में रिलीज हुई अपनी फिल्म बीस्ट के लिए 70 करोड़ रुपए की मोटी फीस ली थी। बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान ने भी अपनी आगामी फिल्म पठान के लिए कथित तौर पर 100 करोड़ रुपए की फीस ले रहे हैं। जबकि, एक्टर सलमान खान एक फिल्म के लिए 125 करोड़ रुपए की मोटी रकम चार्ज करते हैं। जबकि कथित तौर पर रजनीकांत को उनकी अगली फिल्म के लिए 150 करोड़ रुपए दिए जा रहे हैं। इसी के साथ वो भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के सबसे महंगे फिल्म स्टार बन गए हैं।

फिलहाल, रजनीकांत के बाद अक्षय कुमार ने राम सेतु के लिए 135 करोड़ रुपए की डील साइन की है, जो कि संभवत: दूसरे सबसे महंगे एक्टर हैं। हाल ही में साउथ फिल्म स्टार महेश बाबू ने अपनी फिल्म ‘सरकार वारी पाटा’ के लिए 70 करोड़ रुपए चार्ज किए हैं। खबरें तो ऐसी हैं कि बाहुबली स्टार प्रभास ने संदीप रेड्डी वांगा की फिल्म स्पिरिट के लिए 150 करोड़ रुपए चार्ज किया है।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में रिलीज हुईं दक्षिण भारतीय फिल्मों ने कमाई का नया रिकॉर्ड कायम किया है। इनमें आरआरआर, पुष्पा: द राइज और केजीएफ: चैप्टर 2 जैसी फिल्में प्रमुख हैं। 2010 में रिलीज हुई ‘एंथिरन (रोबोट)’ के लिए 45 करोड़ रुपए चार्ज कर के रजनीकांत तब भी भारत के सबसे महँगे स्टार बन गए थे।

‘अब वो सिर्फ ऑर्डर देते हैं’: दूसरे देशों में भारत के दबदबे से राहुल गाँधी को दिक्कत, विदेश मंत्री ने एक बार में ही समझा दिया अंतर

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अज्ञात यूरोपीय नौकरशाहों के हवाले से भारतीय विदेश सेवा को लेकर राहुल गाँधी की टिप्पणी के संबंध में शनिवार (21 मई, 2022) को उन पर तीखा हमला किया।

बता दें कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था, “यूरोप में नौकरशाहों ने बताया कि भारतीय विदेश सेवा बिल्कुल बदल गई है। वो अहंकारी हो गए हैं और किसी की सुनते नहीं है। अब वो सिर्फ लोगों ऑर्डर देते हैं, कोई बातचीत नहीं होती है, वो ऐसा नहीं कर सकते।”

राहुल के इस बयान पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पलटवार करते हुए कहा है, “हाँ, अब चीजें बदल गई हैं। भारतीय विदेश सेवा बदल गई है और वो सरकार के ऑर्डर को फॉलो करते हैं। वे दूसरों के तर्कों का विरोध करते हैं। इसे अहंकारी नहीं बल्कि इसे आत्मविश्वास और राष्ट्रहित की रक्षा कहा जाता है।”

ब्रिटेन दौरे पर गए राहुल ने थिंकटैंक ब्रिज इंडिया द्वारा शुक्रवार (20 मई, 2022) को आयोजित ‘आइडियाज फॉर इंडिया’ सम्मेलन में एक संवाद सत्र के दौरान यह टिप्पणी की थी। राहुल गाँधी ने केंद्र में बीजेपी सरकार पर कई मोर्चों पर हमला बोला और आरोप लगाया कि भारत में खराब स्थिति है। संस्थानों पर हमला किया जा रहा है और उन पर आरएसएस और बीजेपी का कब्जा है।

यूक्रेन जैसी ही स्थिति लद्दाख में

राहुल गाँधी ने दावा किया कि रूस जो यूक्रेन में कर रहा है कुछ वैसी ही स्थिति चीन ने लद्दाख में पैदा की है, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार इस बारे में बात तक नहीं करना चाहती। राहुल गाँधी ने कहा, “रूसी यूक्रेन से कहते हैं कि हम आपकी क्षेत्रीय अखंडता को नहीं स्वीकारते हैं, हम यह मानने से इनकार करते हैं कि दो जिले तुम्हारे हैं। हम उन दो जिलों में हमले करने जा रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि तुम उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) से गठजोड़ तोड़ दो। पुतिन यही कर रहे हैं। पुतिन कह रहे हैं कि मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ कि तुम अमेरिका के साथ गठजोड़ करो। मैं तुम पर हमला करूँगा।” 

राहुल गाँधी ने दावा किया कि पूरे भारत में भाजपा ने केरोसिन छिड़क रखा है और आग लगाने के लिए एक छोटी सी चिंगारी ही काफी है। इस सम्मेलन में बोलते हुए राहुल गाँधी ने शुक्रवार को कहा कि भाजपा हमारी आवाज़ को दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस फिर से भारत को हासिल करने के लिए लड़ रही है और उनके नेता लोगों की आवाज़ सुन रहे हैं, जबकि भाजपा देश का निर्माण करने वाले संस्थानों पर हमले कर रही है। 

पेट्रोल 9.5 रुपए सस्ता, डीजल के दाम भी 7 रुपए घट गए: मोदी सरकार ने आम जनता को दी बड़ी राहत, प्रति गैस सिलिंडर सब्सिडी ₹200

भारत सरकार ने आम लोगों को बड़ी राहत देते हुए पेट्रोल और डीजल पर एक्सिस ड्यूटी कम करने का फैसला लिया है, जिससे फ्यूल के दाम घट गए। ताज़ा घोषणा के बाद पेट्रोल के दाम देश भर में 9.5 रुपए और डीजल के दाम 7 रुपए प्रति लिटर कम हो गए हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 8 रुपए प्रति लिटर और डीजल पर 6 रुपए प्रति लिटर घटाया है। इससे सरकारी खजाने पर एक वर्ष में 1 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खुद इसकी घोषणा की। साथ ही उन्होंने सभी राज्य सरकारों से आग्रह किया है कि वो पेट्रोल-डीजल पर जनता को राहत दें, खासकर उन राज्यों से जहाँ की सरकारों ने नवंबर 2021 में जनता को राहत नहीं दी थी। उस समय केंद्र के ऐसे ही फैसले के बाद सभी भाजपा शासित राज्यों ने आम लोगों के लिए अलग से दाम कम किए थे। साथ ही इस साल गैस सिलिंडर पर 200 रुपए की सब्सिडी का फैसला लिया गया है।

हर गैस सिलिंडर पर 200 रुपए की सब्सिडी मिलेगी। साल में एक कनेक्शन पर 12 सिलिंडर पर इसका फायदा उठाया जा सकता है। ये फायदा ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के 9 करोड़ लाभार्थियों को मिलेगा। इससे सरकारी खजाने पर प्रति वर्ष 6100 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। लोहे और स्टील पर कस्टम ड्यूटी कम कर के इससे बनी चीजों के दाम कम करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। साथ ही सीमेंट के दाम कम करने के प्रयास भी सरकार कर रही है।

अरब को जीतने वाले बप्पा रावल से लेकर औरंगजेब को हराने वाले राज सिंह तक: ओमेंद्र रत्नू की पुस्तक में हजार वर्षों का इतिहास, महाराणाओं की गाथा

पिछले कई वर्षों से हमारे सामने ये सत्य उजागर हो रहा है कि कैसे वामपंथी इतिहासकारों ने हमारे इतिहास को बदल कर ऐसा बना दिया, जिसे पढ़ कर खुद की ही मातृभूमि और धर्म को हम घृणा भरी नज़र से देखने लगे। हाल के दिनों में कई बुद्धिजीवियों ने इसे ठीक करने का बीड़ा उठाया और उन्हीं में से एक डॉक्टर ओमेंद्र रत्नू भी हैं, जिन्होंने ‘महाराणा: सहस्र वर्षों का धर्मयुद्ध (Maharanas: A Thousand Year War For Dharma)’ नामक पुस्तक लिख कर देश-धर्म के प्रति सराहनीय कार्य किया है।

पुस्तक के बारे में बताने से पहले जानकारी दे दें कि ये हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। ‘प्रभात’ संस्थान ने इसका प्रकाशन किया है। 398 पन्नों वाली इस इस पुस्तक के कवर पर ही आपको भगवान शिव दिखाई देंगे। साथ ही भाला लिए घोड़े पे बैठे युद्ध के लिए कूच करते ‘महाराणा’ की तस्वीर है। गढ़ के ऊपर लहराता भगवा ध्वज भी आपको दिखेगा। ये पुस्तक 299 रुपए में उपलब्ध है और आप इसे ऑनलाइन खरीद सकते हैं।

अब पुस्तक के कंटेंट्स की बात कर लेते हैं। इसकी शुरुआत बप्पा रावल के जीवन से होती है, जिन्हें ‘अरब का विजेता’ बताया गया है। प्रतिहार राजाओं नागभट्ट और पुलकेशी ने कैसे बप्पा रावल के साथ मिल कर शुरुआती इस्लामी आक्रमणों को नेस्तनाबूत किया, ये बताया गया है। इसके बाद रावल खुमान का इतिहास है, जिन्होंने कई बार अरबों को बाहर खदेड़ा। रावल रतन सिंह का इतिहास है, जिनकी पत्नी महारानी पद्मिनी थीं।

गोरा और बादल के शौर्य के साथ-साथ हजारों स्त्रियों का जौहर – भारत में हुई इस अभूतपूर्व घटना का जिक्र सिहरन पैदा करने वाला है। तुगलकों को नेस्तनाबूत कर के चित्तौरगढ़ की गरिमा को वापस लौटाने वाले महाराणा हम्मीर सिंह और हिन्दुओं की रक्षा करने वाले महाराणा लक्ष्य सिंह के बारे में भी आपको पढ़ने को मिलेगा। पुस्तक के भाग एक का अंत राणा कुम्भा और राणा सांगा की शौर्य गाथा के साथ होती है। ये इतने बड़े वीर योद्धा थे, लेकिन इनके बारे में देश तो छोड़िए, राजस्थान के पाठ्य पुस्तकों में भी शायद ही कुछ मिले।

पुस्तक के दूसरे भाग में महाराणा प्रताप की वीर गाथा है। हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में तो हमें खूब बताया जाता है और दावा किया जाता है कि महाराणा प्रताप की इसमें हार हुई थी, लेकिन लेखक ने हल्दीघाटी युद्ध के सही पक्ष को पेश करते हुए उस ‘देवायर’ के युद्ध की भी बात की है, जिसकी चर्चा कम की जाती है। फ़ारसी और तुर्की साहित्यों के बल पर कैसे मुगलों और इस्लामी शासकों को महान और शक्तिशाली बताने का षड्यंत्र रचा गया, ये भी आपको इस पुस्तक में जानने-समझने के लिए मिलेगा।

एक तरह से देखा जाए तो भारतीय इतिहास के सही पक्ष को पेश कर के ओमेंद्र रत्नू उसी क्रम को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसकी शुरुआत सीताराम गोयल ने की थी। पूरे भारत में मंदिरों को ध्वस्त कर बनाए गए मस्जिदों को एक दस्तावेज के रूप में पेश करने का काम उन्होंने ही किया था, जिन्हें ‘Maharana: A Thousand Year War For Dharma’ के लेखक ‘महर्षि’ कहते हैं। ये किताब सिर्फ राजपूत ही नहीं, बल्कि राजस्थान के भील योद्धाओं का इतिहास भी बताती है। ये किताब हिन्दुओं के लिए है, भारतीयों के लिए है – किसी खास जाति के लिए नहीं।

अब समय आ गया है जब हमें इस तरह की पुस्तकों का समर्थन करना चाहिए। इतिहास की पथ्य पुस्तकों में भले अब भी कचरा पढ़ाया जा रहा हो, लेकिन छात्रों को, खासकर युवाओं को ऐसी पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। वामपंथियों की पोल खोल रहे अनंत विजय हो, सावरकर पर दशकों चले प्रोपेगंडा के कचरे को साफ़ कर रहे विक्रम संपत हों या फिर महाराणाओं की गाथा को आम लोगों तक पहुँचाने का मैराथन कार्य कर रहे ओमेंद्र रत्नू, हमें ऐसे लेखकों और इनकी पुस्तकों को न सिर्फ पढ़ना चाहिए बल्कि इनका प्रचार-प्रसार भी करना चाहिए।

पुस्तक की शुरुआत में ही ओमेंद्र रत्नू ने बता दिया है कि कैसे भारत का इतिहास उसी हिसाब से ढाला गया, जहाँ ‘गोरे साहबों’ द्वारा ‘कॉन्ग्रेस के ब्राउन साहबों’ को स्थानांतरित की गई सत्ता के अंतर्गत मुल्ले, मार्क्सिस्ट और मिशनरियों के विस्तारवादी एजेंडे को बल देने वाला इतिहास ही लिखा गया। इस लेफ्टिस्ट-जिहादी कॉम्बिनेशन से सवाल तक नहीं किए गए। किस तरह पश्चिम बंगाल में 80 के दशक के अंत में बजाप्ते सर्कुलर जारी कर के मुस्लिम शासकों की आलोचना से बचने का आदेश दिया गया और उनके द्वारा तोड़े गए मंदिरों का जिक्र न करने को कहा गया, ये भी उन्होंने बताया है।

यहाँ ओमेंद्र रत्नू ने सिर्फ राजाओं का जीवन चित्रण नहीं किया है, बल्कि उस वक्त के माहौल को उकेरते हुए पूरी भारतीय पृष्ठभूमि में चीजों को रखने की कोशिश की है। जब वो मोहम्मद बिन कासिम के हमले के बारे में बताते हैं, तो ये भी जानकारी देते हैं कि इस इस्लामी हमले से पहले भारत में ‘सेक्स स्लेवरी (यौन दासता)’ के बारे में किसी ने सुना तक नहीं था। महिलाओं के साथ घृणित अत्याचारों का क्रम इस्लामी शासन से ही शुरू हुआ।

जब वो महारानी पद्मिनी का इतिहास लिखते हैं, तो ये भी बताते हैं कि कैसे अल्लाउदीन खिलजी के आदेश पर चित्तौर में 30,000 निर्दोष नागरिकों का खून बहाया गया। जब वो महाराणा लक्ष्य सिंह की बात करते हैं तो चूंडा सिसोदिया के त्याग की कहानी भी बताते हैं जो महाभारत में भीष्म पितामह के जैसी ही है। महाराणा प्रताप और अमर सिंह के बारे में बताते समय ओमेंद्र रत्नू भामाशाह की जीवनपर्यंत मातृभूमि की सेवा सेवा और उनके बाद उनके बेटे ने कैसे जिम्मेदरी संभाली, ये भी बताते हैं।

कुछ प्रसंग ऐसे ही, जिनसे अपने-आप आपकी आँखों में आँसू आ जाएँगे। महाराणा प्रताप का निधन उनमें से ही एक है, जिसका विवरण देते समय लेखक ने बताया है कि जब योगेश्वर श्रीकृष्ण प्रकृति के नियमों से बँधे थे तो हम तो भला मनुष्य हैं। ‘राणा रासो’ के हवाले से महराणा प्रताप के इस पृथ्वी पर अंतिम दिन का प्रसंग लेखक ने उकेरा है। इसी तरह जौहर वाले विवरण भी रुला देने वाले हैं। हमारी उन वीर माँओं के जौहर वाले स्थलों को देखने के लिए आप इस पुस्तक को पढ़ने के बाद तरस उठेंगे।

सबसे बड़ी बात तो ये कि हिन्दुओं का कत्लेआम मचाने वालों को किस तरह इतिहास में नायक बनाया गया, ये आपको देखने को मिलेगा। चाहे तैमूर लंग द्वारा 1 लाख हिन्दुओं को एक दिन में ही मौत के घाट उतार दिए जाने का जिक्र हो या फिर अकबर के आदेश पर साढ़े 9 घंटों तक लगातार चला कत्लेआम, ये पढ़ कर आप सिहर उठेंगे कि कैसे अल्लाह वाला नारा लगाते हुए महिलाओं-शिशुओं तक को नहीं बख्शा गया। टोडरमल और भगवन दास जैसों ने मुगलों की वफादारी में ये सब देखते रहना उचित समझा।

खिलजी और दिलावर ने भोजशाला को रौंदा, लेकिन नहीं मिटा सके निशान: जानिए धार का वाग्देवी मंदिर कैसे बना कमाल मौलाना मस्जिद

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court) ने राज्य के धार जिले में स्थित भोजशाला (Bhojshala) स्मारक परिसर में मुस्लिमों द्वारा नमाज अदा करने पर रोक लगाने की माँग वाली याचिका को 11 मई को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भी समन जारी किया।

यह याचिका ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की तरफ से दायर की गई थी। इसमें ASI के महानिदेशक द्वारा 7 अप्रैल 2003 को जारी एक आदेश को चुनौती दी गई। एएसआई ने अपने आदेश में भोजशाला परिसर में नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी।

मुस्लिम इसे 11वीं शताब्दी में बना ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ बताते हैं। हिंदू संगठन ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि यह स्मारक एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत है, जो सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए पूजनीय है। इसके लिए प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए हैं।

हिंदू संगठन ने माँग की कि भोजशाला परिसर में देवी सरस्वती (वाग्देवी) की मूर्ति स्थापित की जाए। इसके साथ ही परिसर की वीडियोग्राफी और उसकी जाँच की माँग की। इसी के साथ केंद्र सरकार से भोजशाला में बनी कलाकृतियों और मूर्तियों की रेडियो कार्बन डेटिंग करवाने का आग्रह किया गया है।

क्या है भोजशाला?

‘भोजशाला’ ज्ञान और बुद्धि की देवी माता सरस्वती को समर्पित एक अनूठा और ऐतिहासिक मंदिर है। इसकी स्थापना राजा भोज ने की थी। राजा भोज (1000-1055 ई.) परमार राजवंश के सबसे बड़े शासक थे। वे शिक्षा एवं साहित्य के अनन्य उपासक भी थे। उन्होंने ही धार में इस महाविद्यालय की स्थापना की थी, जिसे बाद में भोजशाला के रूप में जाना जाने लगा। यहाँ दूर-दूर से छात्र पढ़ाई करने के लिए आते थे।

देवी सरस्वती का यह मंदिर मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है, जो उस समय राजा भोज की राजधानी थी। संगीत, संस्कृत, खगोल विज्ञान, योग, आयुर्वेद और दर्शनशास्त्र सीखने के लिए यहाँ काफी छात्र आया करते थे। भोजशाला एक विशाल शैक्षिक प्रतिष्ठान था।

भोजशाला सरस्वती मंदिर: इस्लाम नहीं कबूला तो 1200 छात्र-शिक्षकों की हत्या
भोजशाला परिसर के कॉरिडोर के स्तंभ

मुस्लिम जिसे ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ कहते हैं, उसे मुस्लिम आक्रांताओं ने तोड़कर बनवाया है। अभी भी इसमें भोजशाला के अवशेष स्पष्ट दिखते हैं। मस्जिद में उपयोग किए गए नक्काशीदार खंभे वही हैं, जो भोजशाला में उपयोग किए गए थे।

मस्जिद की दीवारों से चिपके उत्कीर्ण पत्थर के स्लैब में अभी भी मूल्यवान नक्काशी किए हुए हैं। इसमें प्राकृत भाषा में भगवान विष्णु के कूर्मावतार के बारे में दो श्लोक लिखे हुए हैं। एक अन्य अभिलेख में संस्कृति व्याकरण के बारे में जानकारी दी गई है।

इसके अलावा, कुछ अभिलेख राजा भोज के उत्तराधिकारी उदयादित्य और नरवर्मन की प्रशंसा की गई है। शास्त्रीय संस्कृत में एक नाटकीय रचना है। यह अर्जुनवर्मा देव (1299-10 से 1215-18 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान अंकित किया गया था। यह नाटक प्रसिद्ध जैन विद्वान आषाधार के शिष्य और राजकीय शिक्षक मदन द्वारा रचा गया था। नाटक को कर्पुरमंजरी कहा जाता है और यह धार में वसंत उत्सव के लिए था।

Bharatkalyan97: Lat ki and Kamal Maula Masjids are of unusual architecture;  evidences of earlier Siva, Sarasvati temples at the location
भोजशाला परिसर के अंदर यज्ञ कुंड

मंदिर, महलों, मंदिरों, महाविद्यालयों, नाट्यशालाओं और उद्यानों के नगर- धारानगरी के 84 चौराहों का आकर्षण का केंद्र माना जाता था। देवी सरस्वती की प्रतिमा वर्तमान में लंदन के संग्रहालय में है। प्रसिद्ध कवि मदन ने अपनी कविताओं में भी माता सरस्वती मंदिर का उल्लेख किया है।

इस्लामी आक्रमण और भोजशाला परिसर का विनाश

साल 1305, 1401 और 1514 ई. में मुस्लिम आक्रांताओं ने भोजशाला के इस मंदिर और शिक्षा केंद्र को बार-बार तबाह किया। 1305 ई. में क्रूर और बर्बर मुस्लिम अत्याचारी अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार भोजशाला को नष्ट किया। हालाँकि, इस्लामी आक्रमण की प्रक्रिया 36 साल पहले 1269 ई. में ही शुरू हो गई थी, जब कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा।

कमाल मौलाना ने कई हिंदुओं को इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए छल-कपट का सहारा लिया। उसने 36 सालों तक मालवा क्षेत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इकट्ठा की और उसे अलाउद्दीन खिलजी को दे दी। युद्ध में मालवा के राजा महाकाल देव के वीरगति प्राप्त करने के बाद खिलजी ने कहर शुरू हो गया।

खिलजी ने भोजशला के छात्रों और शिक्षकों को बंदी बना लिया और इस्लाम में धर्मांतरित होने से इनकार करने पर 1200 हिंदू छात्रों और शिक्षकों की हत्या कर दी। उसने मंदिर परिसर को भी ध्वस्त कर दिया। मौजूदा मस्जिद उसी कमाल मौलाना के नाम पर है।

कमाल मौलाना मकबरा

खिलजी के बाद एक अन्य मुस्लिम आक्रमणकारी दिलावर खान ने 1401 ई. में यहाँ के विजय मंदिर (सूर्य मार्तंड मंदिर) को ध्वस्त कर दिया और सरस्वती मंदिर भोजशाला के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया। मुस्लिम आज उसी विजय मंदिर में नमाज अदा करते हैं।

फिर 1514 ई. में महमूद शाह ने भोजशाला को घेर लिया और इसे एक दरगाह में बदलने का प्रयास किया। उन्होंने सरस्वती मंदिर के बाहर के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और ‘कमाल मौलाना मकबरा’ की स्थापना की। इसी आधार पर भोजशाला को दरगाह होने का दावा किया जा रहा है।

1552 ई. में मेदनी राय नाम के एक क्षत्रिय राजा ने हिंदू सैनिकों को इकट्ठा महमूद खिलजी को मार भगाया। इस लड़ाई में मेदनी राय ने हजारों मुस्लिम सैनिकों को मारे और 900 मुस्लिम सैनिकों को गिरफ्तार कर धार किले में बंद कर दिया।

25 मार्च 1552 को धार किले में काम करने वाले सैयद मसूद अब्दाल समरकंदी ने विश्वासघात करते हुए उन सैनिकों को रिहा कर दिया। बाद में राजा मेदनी राय ने समरकंदी को विश्वासघात के लिए मृत्युदंड दिया। उसी सैयद मसूद अब्दाल समरकंदी को धार किले में ‘बंदीछोड़ दाता’ कहा जाता है।

अंग्रेजों का प्रवेश

1703 ई. में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया, जिससे मुस्लिम शासन समाप्त हो गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1826 ई. में मालवा पर अधिकार कर लिया। उन्होंने भी भोजशाला पर आक्रमण किया, कई स्मारकों और मंदिरों को नष्ट कर दिया। लॉर्ड कर्जन ने भोजशाला से देवी की मूर्ति को लेकर 1902 में इंग्लैंड में भेज दिया। यह मूर्ति वर्तमान में लंदन के एक संग्रहालय में है।

भोजशाला की सरस्वती की मूर्ति, जो अभी लंदन में है

मुस्लिम शासन के बाद पहली बार मुस्लिमों ने 1930 में ब्रिटिश शासन के दौरान भोजशाला में प्रवेश करके नमाज अदा करने का प्रयास किया था। हालाँकि, इस प्रयास को आर्य समाज और हिंदू महासभा के हिंदू कार्यकर्ताओं ने विफल कर दिया।

साल 1952 में केंद्र सरकार ने भोजशाला को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंप दिया। उसी वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा के प्रचारकों ने हिंदुओं को भोजशाला के बारे में जानकारी देना शुरू किया। इसी समय के आसपास हिंदुओं ने श्री महाराजा भोज स्मृति वसंतोत्सव समिति की स्थापना की।

उसके बाद 1961 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद्, कलाकार, लेखक और इतिहासकार पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन का दौरा किया और बताया कि लंदन में रखी वाग्देवी की मूर्ति असल में भोजशाला में राजा भोज द्वारा स्थापित की गई थी।

हिंदुओं को पूजा की अनुमति नहीं थी

12 मार्च 1997 से पहले हिंदुओं को दर्शन करने की अनुमति थी, लेकिन वे पूजा नहीं कर सकते थे। इसकी अनुमति नहीं थी। साल 1997 में मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने एक आदेश जारी मुस्लिमों को हर शुक्रवार को भोजशाला में नमाज अदा करने की दे दी और हिंदुओं को भोजशाला में प्रवेश पर रोक लगा दिया।

हिंदुओं को केवल वसंत पंचमी के दौरान भोजशाला में प्रवेश करने और पूजा करने की अनुमति थी। भोजशाला को अप्रैल 2003 में हिंदुओं के लिए खोल दिया गया था। हिंदू भक्तों मंदिर में हर दिन आ सकते थे, लेकिन सिर्फ मंगलवार को पूजा कर सकते थे, वो सिर्फ फूल से।

ज्ञानवापी ढाँचे में वीडियोग्राफिक सर्वे के बाद सामने आए तथ्यों के बाद भोजशाला का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। हालिया याचिका में भोजशाला पूर्णत: हिंदुओं के अधिकार में देने की माँग की गई है। इसमें आगे कहा गया कि मंदिर तोड़े जाने के बाद अब तक उसी रूप में बने रहना श्रद्धालुओं की आस्थाओं पर आघात है। ऐसा होने से हिंदू समाज अपने पूजा स्थल से आध्यात्मिक शक्ति नहीं हासिल कर पा रहा है।

याचिका में कहा गया है कि भोजशाला का वर्तमान स्वरूप हर दिन श्रद्धालुओं को चिढ़ाने के समान है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 के साथ 13 (1) धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए हैं। आक्रमणकरियों के समय से चली आ रही गलती को अब सुधारा जाना चाहिए।

ज्ञानवापी पर AIMPLB की टीम गठित करने वाला उमर खालिद का अब्बा, चौकन्नी जाँच एजेंसियाँ रख रही नजर: आतंकी संगठनों से संबंधों पर पूछताछ

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ज्ञानवपी विवादित ढाँचे में एक शिवलिंग का मिलना एक बड़ा मुद्दा बन गया है। अदालत की निगरानी में किए गए सर्वेक्षण का जहाँ हिन्दू जश्न मना रहे हैं, वहीं इस्लामवादी जानबूझकर इसे नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि केंद्रीय खुफिया एजेंसियाँ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और उसके कार्यकारी सदस्य सैयद कासिम रसूल इलियास की गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही हैं, जिन्होंने संस्था की तरफ से ज्ञानवापी विवादित ढाँचा मामले के विवरण की समीक्षा के लिए एक कानूनी समिति का गठन किया था।

AIMPLB बोर्ड ने 18 मई को मामले में ज्ञानवापी मस्जिद, इंतेजामिया मस्जिद कमिटी और उसके वकीलों के रखरखाव निकाय को कानूनी सहायता प्रदान करने का निर्णय लिया। इसके साथ ही पूजा स्थलों पर विवाद पैदा करने वाले लोगों के इरादे से जनता को अवगत कराने के लिए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने का भी निर्णय लिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसियाँ ​​जमीन की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और बोर्ड एवं उसके सदस्यों की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं। अधिकारियों ने कहा कि ज्ञानवापी मामले में सैयद कासिम रसूल इलियास की बढ़ती दिलचस्पी चिंता का विषय है। इलियास बाबरी विवादित ढाँचा एक्शन कमिटी से भी जुड़े थे और अपनी ओर से बयान जारी कर रहे थे।

इस बीच इस्लामिक आतंकवादी संगठन SIMI और वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) से संबंधों को लेकर जाँच एजेंसियों ने इलियास से पूछताछ की। बता दें कि इलियास जेएनयू कार्यकर्ता और दिल्ली हिंदू विरोधी सीएए दंगों के आरोपित उमर खालिद के पिता हैं।

ज्ञानवापी मामले में एआईएमपीएलबी के कार्यकारी सदस्य इलियास पूजा स्थल अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर अपना तर्क देते रहे हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने 21 मई को कहा कि जब से पूजा स्थल अधिनियम 1991 में अस्तित्व में आया है, तब से किसी भी पूजा स्थल को लेकर विवाद की कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा, “यह सर्वसम्मति से तय किया गया था और यहाँ तक ​​​​कि भाजपा के समर्थन से संसद में पारित किया गया था कि बाबरी मस्जिद के बाद ऐसे मामलों को नहीं छुआ जाएगा। यह बेहद निराशाजनक है कि निचली अदालत ने सर्वेक्षण की अनुमति दी।”

उन्होंने अदालत के आदेशों का अपमान किया और उस पर एक विशेष पक्ष का साथ देने का आरोप लगाया। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार पर बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी और महामारी के कारण सामने आए स्वास्थ्य मुद्दों जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “यह खेदजनक है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस पर खामोश हैं। इसके अलावा खुद को धर्मनिरपेक्ष दल बताने वाले राजनीतिक दल भी चुप्पी साधे हुए हैं।”

सैयद कासिम रसूल इलियास और बेटे उमर खालिद 

गौरतलब है कि सैयद कासिम रसूल इलियास प्रतिबंधित इस्लामिक आतंकवादी संगठन सिमी के पूर्व सदस्य हैं। उन्होंने इसे 1985 में उमर खालिद के जन्म से काफी पहले छोड़ दिया था। वर्ष 2019 में, उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले की मुस्लिम बहुल सीट जंगीपुर निर्वाचन क्षेत्र से वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) के टिकट पर पश्चिम बंगाल से लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। सिमी के पूर्व सदस्य अब जमात-ए-इस्लामी हिंद और एआईएमपीएलबी की केंद्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।

दूसरी ओर इलियास का बेटा खालिद 2019 में दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों का प्रमुख चेहरा बन गया था। उसने दिल्ली पुलिस के सामने स्वीकार किया कि वह मुस्लिम समूहों को संगठित करने, उन्हें भड़काने और बड़े पैमाने पर हिंसा की तैयारी करने में शामिल था। 

उसने नए कानून को ‘मुस्लिमों के खिलाफ’ बताते हुए कानून के खिलाफ मस्लिमों को लामबंद किया था और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की भारत यात्रा के बीच ‘चक्का जाम’ में महिलाओं और बच्चों को शामिल करने की भी योजना बनाई थी। उसने कथित तौर पर AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और एक अन्य आरोपित खालिद सैफी से PFI में अपने संपर्कों के माध्यम से दंगों के दौरान रसद समर्थन का आश्वासन देने के लिए मुलाकात की थी।

रिपोर्टट्स के मुताबिक एजेंसियाँ ​​उन माओवादियों के बीच सांठगांठ पर नजर रख रही हैं और चेतावनी दे रही हैं, जिनके प्रमुख संगठन खालिद के साथ गठबंधन है और कट्टरपंथी इस्लामवादियों का कथित रूप से प्रतिनिधित्व जमात-ए-इस्लामी हिंद, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया और प्रतिबंधित संगठन सिमी द्वारा किया जाता है।

TMC ने जिसे लड़ाया विधानसभा चुनाव, वो निकली बांग्लादेशी नागरिक: कलकत्ता HC ने चुनाव आयोग से कहा – कार्रवाई कीजिए

पश्चिम बंगाल (West Bengal) की ममता बनर्जी सरकार पर लंबे समय से ये आरोप लगते रहे हैं कि वो राज्य में बांग्लादेशियों को सपोर्ट कर रही है। अब ताजा मामले में खुलासा हुआ है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता आलो रानी सरकार (Alo Rani Sarkar) एक बांग्लादेशी नागरिक हैं। ये वही आलो रानी हैं, जिन्होंने पश्चिम बंगाल के बनगाँव दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ा था।

इस मामले का खुलासा तब हुआ जब उस क्षेत्र से भाजपा नेता स्वप्न मजूमदार की जीत को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस मामले में सुनवाई जस्टिस विवेक चौधरी ने की। कोर्ट ने कहा है कि पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए नामांकन करते वक्त, चुनाव वाली तारीख और इसके रिजल्ट के दिन तक वो एक बांग्लादेशी नागरिक थीं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा, “याचिकाकर्ता के डॉक्यूमेंट से यह पता चलता है कि याचिकाकर्ता को 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ने का कोई अधिकार नहीं था।”

कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा, “चूँकि वह भारत की नागरिक नहीं हैं, इसलिए वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के साथ संविधान के अनुच्छेद 173 के अनुसार वो किसी भी राज्य में चुने जाने के योग्य नहीं हैं।”

बांग्लादेश की वोटरलिस्ट में नाम था, फिर भी चुनाव लड़ीं आलो रानी

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि टीएमसी नेता आलो रानी सरकार की शादी 1980 के दशक में बांग्लादेश के नागरिक हरेंद्र नाथ सरकार से हुई थी, जिसके बाद वो कुछ वक्त के लिए बांग्लादेश गई थीं। हालाँकि, जब पति से नहीं बनी तो वो फिर से भारत चली आईं। अपने हलफनामे में आलो रानी सरकार ने 5 नवंबर 2020 को वोटर लिस्ट और बांग्लादेश के राष्ट्रीय पहचान पत्र (एनआईसी) से अपना नाम कैंसिल कराने के लिए अप्लाई किया था। 29 जून 2021 को वरिष्ठ जिला चुनाव अधिकारी (बरिसाल) ने बांग्लादेश की वोटर लिस्ट से उनका नाम हटाने की सिफारिश की थी।

उल्लेखनीय है कि आलो रानी सरकार ने 31 मार्च 2021 को बनगाँव दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से अपना नामांकन दाखिल किया था। इसके लिए मतदान 22 अप्रैल 2021 को हुआ था और 2 मई को इसके रिजल्ट आए। चुनाव के दौरान टीएमसी की नेता बांग्लादेशी नागरिक थीं। भारत में दोहरी नागरिकता वाले लोग चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

भारत में जन्म पर आलो रानी का झूठ

आलो रानी ने दावा किया था कि बांग्लादेश में उनके पति के पैतृक स्थान के वोटर लिस्ट में गलत तरीके से उनका नाम शामिल हो गया था। जबकि, यह पता चला है कि टूीएमसी नेता ने अपनी इच्छा से ही अधिकारियों को एसएससी प्रमाण पत्र जमा करके अपना नाम वोटर लिस्ट में शामिल कराया था। उन्होंने ये भी दावा किया कि उनका जन्म 22 मार्च, 1969 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के बैद्यबती में हुआ था। इसके साथ ही उन्होंने 1955 के नागरिकता अधिनियम के तहत जन्म से भारतीय नागरिक होने का दावा किया था।

भले ही टीएमसी की नेता पश्चिम बंगाल की पैदाइश होने का दावा कर रही हों, लेकिन बावजूद इसके वो बैद्यबती में उनका जन्म होने का एक भी सबूत नहीं दे पाई हैं। एक जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, आलो रानी ने दावा किया था कि वो समर हलदर की बेटी हैं और उनके पूर्वज बांग्लादेश के पिरोजपुर जिले के नेचराबाद उपजिला के रहने वाले थे। उन्होंने दावा किया था कि उनके भाई और माँ अभी भी नेचराबाद में रहते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में वो अपने चाचा के साथ रहती हैं।

कोर्ट ने कहा, “ये कहने की कोई जरूरत नहीं है कि याचिकाकर्ता ने खुद के जन्म से ही इस देश का नागरिक होने का दावा किया है। लेकिन, जिस जाँच रिपोर्ट पर वह सीपीसी के आदेश VII नियम 11(डी) के तहत आवेदन के खिलाफ अपनी लिखित आपत्ति जताती हैं, उसी से ये पता चलता है कि उनके माता-पिता बांग्लादेश में रहते थे और वो बचपन में अपने चाचा के साथ भारत आई थी। अत: उनका जन्म बांग्लादेश में हुआ था।”

इसके अलावा कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी को टीएमसी नेता की जन्म की तारीखों में भी काफी गड़बड़ियाँ देखने को मिली हैं। ये विसंगतियाँ बांग्लादेशी और भारतीय दोनों ही दस्तावेजों में मिली। टीएमसी नेता के आधार और पैन कार्ड पर उनकी जन्मतिथि 22 मार्च 1969 है, जबकि यह बांग्लादेशी अधिकारियों द्वारा जारी राष्ट्रीय पहचान पत्र (एनआईसी) पर 15 जनवरी 1967 है।

टीएमसी नेता की भारतीयता अस्पष्ट

कोर्ट ने एफिडेविट और जाँच रिपोर्ट को नोट किया। हालाँकि, कोर्ट का कहना है कि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि उनका नाम बांग्लादेश की वोटर लिस्ट से हटाया गया है या नहीं। न तो ये स्पष्ट है कि वो भारतीय नागरिक कैसे बनीं। कोर्ट ने ये भी कहा, “याचिकाकर्ता ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 या 4 के तहत नागरिकता का दावा नहीं किया है। न ही उसने 1955 के नागरिकता अधिनियम की धारा 5 के तहत पंजीकरण द्वारा नागरिकता हासिल नहीं की है।”

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “याचिकाकर्ता भी नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 के दायरे में नहीं आती हैं। इसलिए, भले ही याचिकाकर्ता के पास मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और पासपोर्ट हो, लेकिन ये दस्तावेज इस देश की नागरिकता को साबित नहीं करते हैं।”

कोर्ट के फैसले के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों का पालन करते हुए कभी भी इस देश की नागरिकता हासिल नहीं की। इसके विपरीत सबसे अधिक सर्वमान्य स्थिति ये है कि याचिकाकर्ता पश्चिम बंगाल राज्य विधानसभा के आम चुनाव की घोषणा की तारीख को एक बांग्लादेशी नागरिक थी।