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पहले लाठी-पत्थरों से मारा, फिर शरीर में लगा दी आग: ‘अल्लाहु अकबर’ चिल्लाती भीड़ ने की ईसाई छात्रा की निर्मम हत्या, वायरल Video में कट्टरपंथी नाचते दिखे

अफ्रीकी देश नाइजीरिया से इस्लामिक हिंसा का नया मामला प्रकाश में आया है, जहाँ सोकोटो के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में कॉलेज में ईशनिंदा के आरोप में इस्लामिक भीड़ ने डेबोरा सैमुअल नाम की एक ईसाई छात्रा को पीट-पीट कर मार डाला। रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाट्सएप ग्रुप पर डेबोरा के कुछ मित्रों ने कमेंट किए थे, जिसे इस्लामिक कट्टरपंथियों ने ईशनिंदा मान लिया और इस वारदात को अंजाम दिया।

पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। इसमें देखा जा सकता है कि इस्लामिक भीड़ ने अल्लाहु अकबर जैसे मजहबी नारे लगाते हुए डेबोरा की मॉब लिचिंग की और उसे जला दिया। आरोपितों को वीडियो में माचिस की तीली दिखाते हुए खुशी मनाते हुए देखा जा सकता है।

मृतक डेबोरा सैमुअल सोकोटो राज्य के शेहू शगरी कॉलेज ऑफ एजुकेशन की छात्रा थीं। दावा है कि एक व्हाट्सएप ग्रुप को डेबोरा अपने दोस्तों के संग मिलकर चला रही थीं। उसी ग्रुप में इस्लामिक पोस्ट शेयर हुए थे, जिस पर डेबोरा ने भी कमेंट किया था, जिसे इस्लामियों ने ‘ईशनिंदा’ मान लिया। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, डेबोरा ने केवल एक कॉलेज व्हाट्सएप ग्रुप में रिलीजियस कंटेंट पोस्ट करने पर आपत्ति जाहिर की थी।

इसके बाद कट्टरपंथियों की भीड़ ने डेबोरा पर हमला कर दिया, उसकी हत्या कर दी गई। कॉलेज के अधिकारी और पुलिस उसे असहाय होकर देखते रहे। कहा जा रहा है कि हमलावरों की संख्या इतनी अधिक हो गई थी कि डेबोरा को बचा पाना मुश्किल हो गया था। कॉलेज के पुरुष मुस्लिम छात्रों की भीड़ ने उसे बेरहमी से पीटा, दबोरा को पत्थर मारकर मार डाला और फिर उसे जला दिया।

इस वारदात की चश्मदीद एक कॉलेज छात्रा ने द गार्जियन को बताया, “छात्रों द्वारा पत्थरबाजी करने औऱ लाठी डंडों से हमला करने के बाद पुलिस ने महिला को मरने दिया। उसे मारने के बाद उसे आग लगा दी गई।” कॉलेज प्रशासन ने संस्थान को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया है। वहीं कथित तौर पर पुलिस ने 2 आरोपितों को गिरफ्तार भी किया है, बाकी के फरार चल रहे हैं।

सोकोटो में लागू है शरिया कानून

नाइजीरिया दो भागों में बंटा है-उत्तरी और दक्षिणी। इसमें से उत्तरी हिस्से में मुस्लिम अधिक हैं तो दक्षिणी हिस्से में ईसाई समुदाय निवास करता है। यहाँ इस्लामिक शरिया कानून चलता है। इसलिए नाइजीरिया के अन्य राज्यों की तरह ही सोकोटा को न्याय मिलेगा, ये सोचना भी गलत है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस्लाम में ईशनिंदा की सजा सिर्फ मौत है।

इसी तरह से साल 2016 में कानो में 74 साल की ईसाई महिला को मुस्लिम भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था। उस पर भी ईशनिंदा का ही आरोप था। ब्रिजेट अब्गाहिम अपनी दुकान में थीं, तभी मुस्लिम भीड़ ने उनकी हत्या कर दी। वोन्यूज़ की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 में बाउची राज्य के दाराज़ो जिले में भी इसी तरह का आरोप लगाते हुए भीड़ ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। इसी तरह से 2007 में नाइजीरिया में माध्यमिक विद्यालय के छात्रों ने कुरान के कथित अपमान का आऱोप लगाकर एक शिक्षक की हत्या कर दी थी।

मुलायम सिंह यादव ने रुकवाई थी ज्ञानवापी परिसर में बने श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजा, पहले 365 दिन होता था अभिषेक: BJP नेता का दावा

उत्तर प्रदेश के वाराणसी (Varanasi, Uttar Pradesh) में स्थित विवादित ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Masjid) को लेकर एक सनसनीखेज तथ्य सामने आया है। भाजपा नेता प्रेम शुक्ला (BJP Leader Prem Shukla) ने दावा किया है कि प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) ने माता श्रृंगार गौरी (Mata Shringar Gauri) में हिंदुओं को पूजा करने से रोका था।

बता दें कि ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे और वीडियोग्राफी को लेकर चल रहा विवाद भी माता श्रृंगार गौरी के पूजा-पाठ से ही संबंधित है। याचिकाकर्ता राखी सिंह (Rakhi Singh) सहित पाँच हिन्दू महिलाओं ने अदालत से अनुमति माँगी है कि उन्हें पुराने मंदिर परिसर में प्रतिमाएँ रख कर पूजा की अनुमति दी जाए।

ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में स्थित माता श्रृंगार गौरी को लेकर एक टीवी डिबेट में प्रेम शुक्ला ने दावा किया, “साल 1996 में महाशिवरात्री के दिन मैंने खुद श्रृंगार गौरी मंदिर में अभिषेक किया था। उस दौरान वहाँ साल के 365 दिन अभिषेक होता था।” शुक्ला ने कहा कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने Worship Act 1991 का उल्लंघन करते हुए उन्होंने मंदिर में नियमित पूजा-पाठ को रोक दी।

मुलायम सिंह यादव पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाते हुए शुक्ला ने कहा कि उनकी सरकार ने माता श्रृंगार गौरी में सिर्फ मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण साल 2004 में पूजा रोक दी। उन्होंने कहा कि साल 1992 में बाबरी ढाँचे को गिराए जाने के दौरान भी इस मंदिर में पूजा को नहीं रोका गया।

उन्होंने आगे कहा, “आप मुझे विश्व की किसी एक मस्जिद का नाम बता दीजिए भारत के अलावा, जहाँ पर बूत (मूर्ति) हो, शंख हो, चक्र हो, जहाँ पर मंदिर हो। आपका मजहब इस्लाम बार-बार कहता है कि किसी अन्य धर्म के विवादित स्थल पर मस्जिद नहीं कायम की जा सकती। यहाँ तो मंदिर को तोड़ा गया, यह इतिहास है।”

बता दें कि ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वे और वीडियोग्राफी के दौरान मुस्लिम पक्ष द्वारा हंगामा करने के बाद वाराणसी की सिविल कोर्ट ने पूरी मस्जिद के क्षेत्र का वीडियोग्राफी और सर्वे कराने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि अगर इसमें कोई बाधा पहुँचाता है तो जिलाधिकारी उसके खिलाफ FIR दर्ज कराएँ।

औरंगजेब ‘महान’… टोपी बुनकर-कुरान लिखकर खाता था रोटी, मंदिर भी बनवाता था: इस्लामी स्कॉलर ने ऑन कैमरे दिया इतिहास का ज्ञान, BJP प्रवक्ता की छूटी हँसी

12 मई 2022 (गुरुवार) को समाचार चैनल ‘आज तक’ के शो ‘हल्ला बोल’ में वाराणसी ज्ञानवापी मुद्दे पर एक बहस हुई। इस बहस में मुस्लिम पक्ष की तरफ से बोलते हुए इस्लामिक स्कॉलर हाजिक खान ने औरंगजेब को महान बताते हुए उसकी शान में कसीदे गढ़े। जवाब में भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने उनकी चुटकी ली।

पत्रकार अंजना ओम कश्यप ने सवाल किया, “मुगल आक्रांताओं की पहरेदारी क्यों की जा रही है ?” इस पर हाजिक खान ने कहा, “किसी के कहने से इस मुल्क पर 53 साल हुकूमत करने वाला आक्रांता नहीं हो जाता। इतना शासन कोई भाजपा नेता भी नहीं कर सकता। मैं इतिहास का छात्र हूँ इसलिए ये जानकारी रखता हूँ। औरंगजेब ने इतिहास में कोई भी बिल्डिंग भारत में नहीं बनाई। उसके बाप, दादा और परदादा सभी बादशाह थे लेकिन उसने टोपी बुन के और कुरान लिख कर रोटी खाई है।”

हाजिक खान ने आगे कहा, “बाबरी शहीद होने के बाद आपके आज तक चैनल पर ही रिपोर्ट दिखाई गई थी कि औरंगजेब ने 18 -19 मंदिर छोड़े और 20-22 बनवाए। साथ ही उसने इस देश के हिन्दुओं को 126 जमीनें दी थीं। मोदी और योगी जिस मठ में बैठे हुए हैं वो नवाब वाजिद अली शाह की दी गई है। हम कोर्ट का आदेश मानने को तैयार हैं। हमने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। ये (भाजपा वाले) संविधान की अवहेलना कर रहे हैं। ये संसद में पारित प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट को भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं।”

इन आरोपों के जवाब में भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा, “आज इनका मुगल प्यार जग गया है। औरंगज़ेब ने तो अपने पिता को ही जेल भेज दिया था। आप (हाजिक खान) बच कर रहिएगा कि कहीं आपके साथ ऐसा न हो जाए। आपकी नियति काली है। आज ये हम पर प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट न मानने का आरोप लगा रहे हैं। हमने इस एक्ट को गैर संवैधानिक मानते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। लेकिन जिस CAA को संसद ने ही पास किया था उसे आपने नहीं माना। क्या वो पाकिस्तान से आया था या तुर्की से ? आज इनके जैसा एक वर्ग मंदिर-मस्जिद से हट कर शिक्षा की दुहाई देता है लेकिन उसी वर्ग को रोहिंग्या और पर्दा चाहिए। इन्हे बाकी सब कुछ वो चाहिए हो संविधान में नहीं है। क्योंकि जीत हिन्दू पक्ष की हुई है इसलिए ये झटके में हैं।”

राहुल भट के बाद आतंकियों ने पुलिसकर्मी को घर में घुसकर मारी गोली: कश्मीरी पंडित बोले- सुरक्षा दो, वरना नौकरियों से देंगे इस्तीफा

जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) के पुलवामा में आतंकियों ने 15 घंटे के भीतर दूसरी घटना को अंजाम दिया है। गुरुवार (12 मई 2022) दोपहर को कश्मीरी पंडित और राजस्व विभाग के कर्मचारी राहुल भट की हत्या करने के बाद शुक्रवार (13 मई 2022) सुबह दहशतगर्दों ने एक पुलिसकर्मी के घर में घुसकर उन्हें गोली मार दी। स्थानीय पुलिस अधिकारी ने बताया कि रियाज अहमद ठोकर अपने घर गुदूरा में मौजूद थे। इस बीच कुछ आतंकियों ने उन पर फायरिंग कर दी। इसमें वह गंभीर रूप से जख्मी हो गए हैं। उन्हें तुरंत अस्पताल भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी हालत गंभीर बनी हुई है।

वहीं, चदूरा तहसील कार्यालय के कर्मचारी राहुल भट की आतंकवादियों द्वारा हत्या किए जाने के खिलाफ कश्मीरी पंडितों ने शेखपोरा और बडगाम में विरोध प्रदर्शन किया। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, कश्मीरी पंडित अमित कहते हैं, “एलजी प्रशासन हमें सुरक्षा मुहैया कराए, नहीं तो हम अपने-अपने पदों से सामूहिक इस्तीफे दे देंगे।”

आतंकवादियों की तलाश में सुरक्षाबलों ने अभियान शुरू कर दिया है। इससे पहले बडगाम में गुरुवार को दफ्तर में घुसकर आतंकियों ने कश्मीरी पंडित राहुल भट की हत्या कर दी थी। कश्मीर जोन पुलिस ने ट्वीट किया था, “तहसीलदार कार्यालय चदूरा, बडगाम में आतंकवादियों ने अल्पसंख्यक समुदाय के एक कर्मचारी राहुल भट पर गोलियाँ चलाईं। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।” हालाँकि, अस्पताल में भर्ती कराने के थोड़ी देर बाद ही उन्होंने दम तोड़ दिया था। इससे पहले जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में शनिवार (7 मई 2022) को आतंकवादियों ने एक पुलिसकर्मी गुलाम हसन को गोली मारकर घायल कर दिया था। इसके तुरंत बाद घायल कांस्टेबल को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में हसनपोरा के बिजबेहरा में 29 जनवरी 2022 को संदिग्ध आतंकवादियों (Terrorist Attack) ने प्रदेश पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल अली मोहम्मद गनी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। वह कुलगाम थाने में तैनात थे। आतंकियों द्वारा हमला किए जाने के बाद गनी को अस्पताल ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई थी।

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे का सर्वे: मुस्लिम पक्ष के पाले में फैसला न देने वाले जज को अपने परिवार की चिंता, बोले- डर का माहौल बनाया जा रहा है

वाराणसी में ज्ञानवापी केस की सुनवाई करने वाले जज ने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को ले कर चिंता जताई है। जज के मुताबिक कुछ लोगों द्वारा एक साधारण मुकदमे को असाधारण तरीके से पेश किया जा रहा है। जज का नाम रवि कुमार दिवाकर है। रवि दिवाकर सीनियर डिवीजन के सिविल जज हैं। ओवैसी और कुछ अन्य लोगों ने ज्ञानवापी पर उनके फैसले को गलत बताया था।

अपने और परिवार की सुरक्षा की चिंता को जज ने अपने फैसले में लिखा है। उनके मुताबिक, “इस से पहले शायद ही कभी किसी वकील ने कमीशन की कार्रवाई करने वाले कमिश्नर पर सवाल खड़े किए रहे हों। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। इस केस से डर का ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि मुझे मेरे परिवार की और मेरे परिवार को मेरी सुरक्षा की चिंता बन गई है। मेरी माँ को लगा कि मैं कमीशन के साथ मौके पर जा रहा हूँ। उन्होंने मेरी सुरक्षा का हवाला देते हुए वहाँ जाने से मना किया। विपक्षी द्वारा ऐसा कोई भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है जो एडवोकेट कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा को हटाकर किसी और से जाँच करवाने के लिए पर्याप्त हो।”

जज ने पिछली बार सर्वे कार्रवाई पूरी न होने के पीछे जिला प्रशासन द्वारा रूचि न लेना एक बड़ी वजह बताई है। उन्होंने जिला प्रशासन के कुछ अधिकारियों को अहंकारी और घमंडी तक कहा है जो न्यायालय के आदेश का पालन करवाना ठीक नहीं समझते। जज के मुताबिक यहाँ तक कि वो अधिकारी हाईकोर्ट तक के आदेशों की भी अनदेखी करते रहते हैं।

गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष ज्ञानवापी के सर्वे का लगातार विरोध कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गुरुवार (12 मई 2022) को सिविल जज रवि कुमार दिवाकर ने ज्ञानवापी के सर्वे का आदेश जारी किया है। इस दौरान उन्होंने गर्भगृह तक सर्वे का आदेश दिया है चाहे उसके लिए ताले को खुलवाना पड़ें या उसे तोडना पड़े। इस बार 2 कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किए गए हैं। दूसरे कमिश्नर का नाम विशाल सिंह है। कमीशन को सर्वे की रिपोर्ट अदालत में 17 मई 2022 तक दाखिल करना है।

महाराष्ट्र में ‘शिवाजी मूर्ति’ पर बवाल: दो गुटों में जम कर पत्थरबाजी, गाड़ियों में लगाई गई आग, पुलिसकर्मी समेत कई घायल

महाराष्ट्र के जालना जिले के चंदई गाँव में दो गुटों में पथराव का मामला सामने आया है। जालना एसपी हर्ष पोद्दार ने बताया कि गाँव में बने नए गेट के नाम को लेकर गुरुवार (12 मई 2022) को दो गुटों में विवाद हो गया था। पुलिस ने 20 से 25 लोगों को गिरफ्तार भी किया है, दोनों गुटों की ओर से पथराव में कई गाड़ियों को नुकसान पहुँचा है। हालाँकि, अभी स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है। बताया जा रहा है कि पथराव के दौरान 5 पुलिसकर्मी भी घायल हो गए थे।

जानकारी के मुताबिक, जालना जिले के भोकरदान तहसील के चंदई में छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति गाँव में दाखिल होने वाले गेट पर लगाई गई थी। जबकि उस गेट का नाम गोपीनाथ मुंडे किया जाना था। गेट के नाम को लेकर दो समुदायों के बीच विवाद खड़ा हो गया। देखते ही देखते यह विवाद इतना बढ़ गया कि दो गुटों एक दूसरे पर पथराव करने लगे। इसके बाद गाड़ियों में तोड़फोड़ और आगजनी शुरू हो गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुँची पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हवाई फायर किया और आँसू गैस के गोले भी छोड़े। इस दौरान पुलिस ने करीब 20 से 25 लोगों को गिरफ्तार भी किया है। बता दें कि चंदई में दो गुटों के आपस में भिड़ने की वजह से गाँव में तनाव का माहौल है। इलाके में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। वहीं आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।

बता दें कि अप्रैल माह के बाद से विभिन्न राज्यों से दो गुटों में झड़पों की खबर सामने आ चुकी है। इससे पहले महाराष्ट्र के ही अमरावती जिले के अचलपुर शहर में झंडा हटाने को लेकर दो समुदायों में झड़प हुई थी, जिसके बाद वहाँ कर्फ्यू लगाया गया था। उस समय भी दोनों गुटों ने एक दूसरे पर पथराव किया था और पुलिस को सबको तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े थे।

खातूनें नहीं खा सकतीं मर्दों के साथ खुले में खाना, रेस्टोरेंट में शौहर के साथ बैठने पर भी प्रतिबंध: तालिबान का नया फरमान

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद से वहाँ के हालात बिगड़ते ही जा रहे हैं। 9 महीने बाद भी वहाँ लोगों को गरीबी और भुखमरी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इसी बीच तालिबान के नए-नए फरमान भी जारी हो रहे हैं। अपने नए फरमान में तालिबान ने अफगान शहर में पुरुषों और महिलाओं के एक साथ बाहर खाने और पार्क में जाने से रोक लगा दी है।

एक अधिकारी ने गुरुवार (12 मई 2022) को बताया, “तालिबान के अधिकारियों ने पश्चिमी अफगान शहर हेरात में पुरुषों और महिलाओं के एक साथ बाहर खाने और पार्क में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है।” इससे पहले अफगानिस्तान के तीसरे सबसे बड़े शहर हेरात में तालिबान ने महिलाओं को ड्राइविंग लाइसेंस नहीं जारी करने के आदेश दिए थे। इसके साथ ही अफगानिस्तान में सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं इस तरह का बुर्का पहनने का फरमान जारी किया गया था, जिसमें उनकी आँखे भी ना दिखती हों।

तालिबान के सत्ता में वापिस आने से पहले अफगानिस्तान में पुरुषों और महिलाओं को रेस्टोरेंट में एक साथ खाना खाते देखना आम बात थी। खासकर हेरात शहर में। हेरात में अपनी परंपराओं को बढ़ावा देने और लोगों को अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक करने वाले मंत्रालय में तालिबान के एक अधिकारी रियाज़ुल्लाह सीरत ने कहा, “अधिकारियों ने निर्देश दिया है कि पुरुषों और महिलाओं के रेस्टोरेंट में एक साथ जाने पर प्रतिबंध लगाया जाए।”

अधिकारी ने एएफपी न्यूज एजेंसी को बताया कि मालिकों को चेतावनी गई है कि ये नियम सभी पर लागू होंगे फिर चाहे वह शौहर और बीवी ही क्यों ना हों। एक अफगान महिला ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया कि मैनेजर ने उसे और उसके शौहर को बुधवार (11 मई 2022) को हेरात रेस्टोरेंट में अलग बैठने को कहा था। एक रेस्टोरेंट के मैनेजर सफीउल्लाह ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि उन्हें मंत्रालय का आदेश मिला है कि वह महिलाओं और पुरुषों को एक साथ ना बैठने दें।

सफीउल्लाह ने आगे कहा, “हमें ना चाहते हुए भी इस आदेश का पालन करना होगा, लेकिन इससे हमारे बिजनेस प्रभावित हो रहा है।” उन्होंने कहा कि अगर यह प्रतिबंध जारी रहता है तो उन्हें रेस्टोरेंट से कई कर्मचारियों को निकालने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

तालिबान ने अगस्त 2021 में सत्ता पर एक बार फिर काबिज होने के बाद पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग करने पर प्रतिबंध लगाए हैं। महिलाओं को शिक्षा से वंचित करने के बाद तालिबान ने इस साल मार्च में अफगानिस्तान के पुरुषों के लिए नया फरमान जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि जो सरकारी कर्मचारी दाढ़ी नहीं रखेगा, उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा।

गौरतलब है कि तालिबान अफगानिस्तान में अपने 1996 से 2001 के शासन में मानवाधिकारों के हनन के लिए जाना जाता है, लेकिन दूसरी पर सत्ता में आने के बाद उसने वादा किया था कि इस बार वह सख्त रूख नहीं अपनाएगा। हालांकि इसके बाद रूढ़ीवादी सोच वाले तालिबान द्वारा ऐसे फरमान जारी किए जा रहे हैं, जिससे अफगान के नागरिक बद से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

अंडे बेचने वाले ‘नशेड़ी’ ने मजार के साथ बीच सड़क पर बनाया घर, कुर्ता-टोपी पहन बना खादिम: शिकायत के बाद देहरादून पुलिस ने उठवाया बोरिया बिस्तर

उत्तराखंड के देहरादून में पॉश इलाके में बनी एक मजार पर कुछ लोगों द्वारा बहस किए जाने का वीडियो वायरल हो रहा है। यहाँ पर हिन्दू संगठन से जुड़े कुछ लोग मजार को अवैध बता रहे हैं। जबकि खादिम पीर बाबा नाम से उस मजार को सम्बोधित करते हुए लोगों से उलझता दिखाई दे रहा है। मौके पर पुलिस बल भी खड़ा दिखाई दे रहा।

विरोध कर रहे लोगों का आरोप है कि इस जगह पर बिजली आदि भी बिना किसी मीटर या आधिकारिक अनुमति के लगाई जा चुकी थी। कुछ देर की बहस के बाद वो खुद ही मजार के आस-पास जमा किया गया अतिक्रमण हटाना शुरू कर देता है। पांचजन्य की रिपोर्ट के मुताबिक यह मजार देहरादून के रिस्पना पुल के पास गली में कैलाश अस्पताल के आगे बनी है। इस पर रहने वाला आरोपित लगभग 9 माह पहले उस गली में अंडे बेचने आया था। जिस जगह वो अंडे का ठेला लगाता था उसी जगह धीरे-धीरे उसने अतिक्रमण शुरू कर दिया।

मज़ार के अंदर खादिम के ठिकाने पर उबले अंडे मिलने का दावा किया गया। आरोपित मूल रूप से संभल जिले के मोहल्ला नवाबफेर, सरायतरीन का रहने वाला है। इस मजार का नाम उसने ‘पीर बाबा की दरगाह’ दिया था। पड़ोसियों के मुताबिक आरोपित अक्सर नशे में रहता था। अंडे बेचने वाले उस व्यक्ति ने धीरे-धीरे अपना हुलिया बदल लिया और वो टोपी और लंबा कुर्ता पहन कर मज़ार के खादिम के तौर पर खुद को दिखाने लगा। इस दौरान वो अपने परिवार को भी वहाँ ले आया।

ऑपइंडिया ने इस मामले में देहरादून के नेहरू नगर थाने के SHO से बात की। उन्होंने बताया, “मजार नहीं हटी है बल्कि मजार पर रहने वाला खादिम हटा है। वो अपने परिवार को वहाँ शिफ्ट कर चुका था। इसी के साथ उसके द्वारा नशा अदि करने की शिकायतें मिल रहीं थी। मजार पुरानी है और वो अपनी ही जगह पर मौजूद है।”

मदद के नाम पर लोगों का पैसा खाने वाली इस्लामिस्ट पत्रकार राणा अय्यूब ने अब गौ तस्करों को लेकर फैलाई फेक न्यूज

वाशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट और कथित पत्रकार राणा अय्यूब ऑपइंडिया द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के स्क्रीनशॉट का इस्तेमाल कर गुरुवार (12 मई 2022) को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुई गौ तस्करी की घटना पर एक अलग ही राग अलापना शुरू कर दिया। ऐसा करने के लिए भी उन्होंने पहले फेक न्यूज फैलाई।

गुरुवार (12 मई) को ऑपइंडिया ने इस बात को रिपोर्ट किया कि किस तरह से गौ तस्करी कर ले जा रहे जीशान, सद्दाम और कासिम को मुठभेड़ के बाद गाजियाबाद पुलिस ने पकड़ लिया। हमने ये रिपोर्ट किया था कि ये तीनों आरोपित स्कॉर्पियो में गाय चोरी कर भाग रहे थे। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने पीछा किया तो उनकी गाड़ी एक पेड़ से टकरा गई। जब इनसे सरेंडर के लिए कहा गया तो इन्होंने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी। इसमें एक कॉन्स्टेबल बुरी तरह से घायल हो गया। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में तीनों गौ तस्कर घायल हो गए और गाय को उनके चंगुल से बचा लिया गया।

ऑपइंडिया ने माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर अपने आधिकारिक हैंडल पर इसी खबर को शेयर किया था, जिसका शीर्षक था “गाजियाबाद: मवेशी तस्कर जीशान, सद्दाम और कासिम को पुलिस मुठभेड़ में लगी गोली, चोरी की गई गाय को बचाया गया”

आदतन फेक न्यूज पेडलर राणा अय्यूब ऑपइंडिया के ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “जब एक दक्षिणपंथी, प्रोपेगेंडा वेबसाइट भारत की बदसूरत सच्चाई का खुलासा करती है”।

जैसा कि देखा जा सकता है कि ऑपइंडिया ने अपनी हेडलाइन में ‘शॉट’ शब्द का उल्लेख किया है न कि ‘शॉट डेड’। रिपोर्ट में भी हमने पहले पैराग्राफ में ही स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि तीनों गौ तस्कर आरोपितों और पुलिस के बीच हुई ‘मुठभेड़’ में ‘घायल’ हो गए थे।

ऑपइंडिया द्वारा पब्लिश की गई रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

लेकिन ऑपइंडिया को बदनाम करने की जल्दबाजी में वामपंथी पत्रकार ने आर्टिकल को खोले बिना ही हेडलाइन में दिए गए ‘शॉट’ शब्द को ‘शॉट डेड’ समझ लिया।

बस फिर क्या था, लेफ्ट-लिबरल विचारधारा वाले कई अन्य ट्विटर यूजर इस्लामिस्टों को पीड़ित बताने के लिए कूद पड़े। राणा अय्यूब के ट्वीट के जवाब में ट्विटर यूजर @TheJadedQueen ने भारतीय मुस्लिमों के लिए खेद व्यक्त किया। इसके साथ उसने @hrw@amnesty@BorisJohnson@UNHCRUK को टैग करते हुए लिखा कि गायों के लिए हमेशा मुस्लिम पुरुषों को ही मारा जाता है।

फोटो साभार: ट्विटर

इसी तरह से @LivedShahid नाम के यूजर ने भी राणा अय्यूब के ट्वीट पर रिएक्ट करते हुए कहा कि मोदी शासन में पशुओं को बचाने के नाम पर मुस्लिमों को प्रताड़ित किया जा रहा है।

फोटो साभार: ट्विटर

एक अन्य ट्विटर यूजर @Introvertguy111 ने लिखा कि अधिकारी हत्यारों और बलात्कारियों के प्रति अधिक संवेदनशील थे। उसने यही मान लिया था कि तस्करों को पुलिस ने मार गिराया है।

फोटो साभार: ट्विटर

आश्चर्य की बात ये है कि ऑपइंडिया को कोसने से पहले किसी ने भी एक बार इस रिपोर्ट को खोलकर पढ़ने की जहमत नहीं हुई। सभी ने राणा अय्यूब के फेक न्यूज को सच मान उसके पीछे चल पड़े। हालाँकि, रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि तस्करों ने एक गाय चुराई थी और पहले पुलिस पर गोली चलाई थी, ड्यूटी पर तैनात एक कॉन्स्टेबल को भी घायल कर दिया।

राणा अयूब पर डोनेशन फ्रॉड का आरोप

गौरतलब है कि राणा अय्यूब वही ‘पत्रकार’ हैं, जो कोरोना में मदद के नाम पर केटो के जरिए क्राउड फंडिंग से धन की उगाही करने और उसे व्यक्तिगत लाभ के लिए खर्च करने के मामले में जाँच के दायरे में हैं। फरवरी 2022 में प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट का उल्लंघन करने के मामले में अय्यूब की 1.77 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क किया था।

आप राणा द्वारा एकत्र किए गए कोविड फंड के दुरुपयोग के आरोपों के बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं। अय्यूब एक आदतन फेक न्यूज पेडलर हैं।

’18 साल का वैवाहिक जीवन, 14 बच्चे, 15वें प्रसव के दौरान 37 की उम्र में मुमताज की मौत’: जानिए कब और कैसे बना ताजमहल

देश में ताजमहल (Taj Mahal) के बंद दरवाजों को खोलने को लेकर जारी सियासत और उस पर कोर्ट के फैसले के बीच ताजमहल को लेकर इतिहास क्या कहता है। इस अजूबे को दुनिया प्रेम की निशानी मानती है, लेकिन इसके क्या तथ्य हैं? इसे किसने बनवाया है, इस पर नजर डालते हैं।

शुरुआत मुगल आक्रान्ता शाहजहाँ की बीवी मुमताज उर्फ अर्जुमन बानो बेगम से होती है। 19 साल की उम्र में अर्जुमन बानो बेगम (मुमताज महल) का निकाह 21 साल के शाहजहाँ से 1612 में हुआ था। ये शाहजहाँ का दूसरा निकाह था। मुमताज और शाहजहाँ का वैवाहिक जीवन 18 साल का रहा। इन 18 सालों में शाहजहाँ से मुमताज को 14 बच्चे हुए और 15वें बच्चे के प्रसव के दौरान 1630 में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में मुमताज की मौत हो गई। उस दौरान वो 37 साल की थी।

उसकी मौत के दो साल पहले ही शाहजहाँ को मुगल साम्राज्य की गद्दी मिली थी। बीवी की मौत के बाद करीब सप्ताह भर के लिए तो उसने पूरी सल्तनत के काम को रुकवा दिया। इतिहासकार EVV हैवेल कहते हैं कि मुमताज महल की मौत के बाद शाहजहाँ ने जबरदस्ती दो सालों तक शोक मनाया। इस दौरान किसी भी तरह के संगीत, त्योहार औऱ यहाँ तक कि गहने पहनने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।

बुरहानपुर में ही दफ्न की गई मुमताज

मौत के बाद मुमताज को बुरहानपुर में ही दफ्न कर दिया गया था। माना जाता है कि करीब छह महीने बाद, उसकी कब्र को आगरा लाया गया था। इसको लेकर भी दो तथ्य हैं- पहला ये राजपूत राजा मान सिंह के बेटे राजा जय सिंह की पुस्तैनी जमीन पर उसे तुरंत दफ़न कर वहाँ एक बगीचा बना दिया गया था। दूसरा मुमताज को आगरा लाने के बाद उसे 9 सालों तक एक मस्जिद में दफ़न किया गया। उल्लेखनीय है कि इन दो सालों तक शाहजहाँ न तो किसी से मिला औऱ न ही दरबार में आय़ा। सवाल ये उठता है कि फिर किसने मुमताज के गल चुके शरीर के ढाँचे को कब्र खोदकर उसे आगरा लाने का फरमान सुनाया, ये तथ्य इतिहास में दफन हो गया है। जबकि सत्य तो ये है कि शाहजहाँ के बिना उसे कोई हाथ नहीं लगा सकता था।

अब अगर इस बात को माना जाय कि सच में मुमताज की कब्र को आगरा लाया गया था, तो पहले 9 सालों तक मस्जिद में दफ़न किया गया और 1641 के आसपास ताजमहल के बगीचे में दफनाया गया होगा। मतलब ये कि 10 सालों तक शाहजहाँ, मुमताज की हड्डियों अथवा कंकाल को लेकर ही यहाँ से वहाँ घूमता रहा होगा। मुमताज की कब्र है कहाँ इसको लेकर पुख्ता जानकारी खुद पुरातत्व विभाग के पास ही नहीं है। वो भी कही-सुनी बातों पर यकीन करता है।

किसकी है ताजमहल वाली जमीन

आगरा का ताजमहल जिस जमीन पर शान से खड़ा है, वो वास्तविकता में जयपुर के राजा मान सिंह की है। इस तथ्य को भारतीय इतिहासकार जादूनाथ सरकार समेत यूरोपियन इतिहासकार जॉन मार्शल और EVV हैवेल भी स्वीकार करते हैं। इस पर इस्लामिक इतिहासकार भी सहमत नजर आते हैं।

हाँ, इसे बनवाने में आए कुल खर्च पर इतिहासकारों में एकमत नहीं है। कुछ स्थानों पर इसका खर्चा 50 लाख तो कहीं 185 लाख रुपए तक बताया गया है। दीवान-ए-अफरीदी में खर्चा 9 करोड़ 17 लाख बताया है जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स में 1853 में प्रकाशित एक लेख के अनुसार 1,750,000 पौंड था।

शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान फ्रांसीसी यात्री जीन बापिस्ट टावरनियर भारत के दौरे पर आया था। अपनी इस यात्रा पर एक किताब भी उसने लिखी थी। जिसका अनुवाद 1889 में प्रकाशित हुआ था। किताब के मुताबिक, वो 1640-41 में पहली बार आगरा आया था। दरअसल, उसका भारत आना-जाना लगा रहता था। जब पेरिस से चलकर अपनी पाँचवी भारत यात्रा पर आया तो वह 1667 में सूरत में था। यह उसकी आखिरी भारत यात्रा थी। उसने अपने संस्मरण के पृष्ठ 110 पर लिखा है, “I witnessed the commencement and accomplishment of this great work (Taj Mahal).” इस आधार पर टावरनियर के अनुसार ताज महल का निर्माण 1640-41 के दौरान शुरू हुआ होगा। जबकि मुमताज की मौत एक दशक पहले 1630 में ही हो चुकी थी।

1667 में जब टावरनियर सूरत में था, एक साल पहले 1666 में शाहजहाँ भी मर चुका था। अपनी मृत्यु से आठ साल पहले तक वह अपने बेटे औरंगजेब की कैद में भी रहा था। ऐसे में 1658 के आसपास से ही परिवार में गद्दी को लेकर आपसी लड़ाई छिड़ चुकी थी। टावरनियर यह भी लिखता है, “ताजमहल को बनाने में 22 साल लगे थे।” अब 1641 से 22 साल 1663 में जाकर पूरे होते है। इस दौरान शाहजहाँ तो आगरा के किले में नजरबन्द था।

ताजमहल का निर्माण कब हुआ इस पर एक और कहानी पढ़ने की मिलती है। एक स्पेनिश धार्मिक यात्री सेबस्टियन मैनरिक 1641 में आगरा में था। उसे किसी ने बताया कि ताजमहल के मुख्य वास्तुकला को इटली के गेरोनिमो वेरोनियो ने तैयार की है। हालाँकि, वह कभी वेरोनियो से नहीं मिला था क्योंकि शाहजहाँ ने उसे 1640 में एक पुर्तगाली के हाथों मरवा दिया था। लाहौर में उसकी कब्र आज भी है। साल 1899 में हेनरी जॉर्ज ने अपनी किताब ‘A Handbook for Visitors to Agra and Its Neighbourhood’ के पेज नंबर 23-24 पर लिखा है, “ताजमहल के पूरा बनने से पहले ही वेरोनियो मर गया था… इस प्रकार 17 सालों तक चले निर्माण के बाद यह इमारत 1648 में जाकर बनी।”

हालाँकि, इस तथ्य को अधिकतर इस्लामिक इतिहासकार मानने से इनकार करते हैं। उनका दावा है कि ताजमहल का ढाँचा शाहजहाँ के करीबी मुस्लिम उस्ताद अहमद लाहौरी ने बनाया था। बावजूद इसके दस्तावेजों के अध्ययन से ये संदेह पैदा होता है कि वास्तव में ताजमहल कब बना, किसने बनाया और कब इसका निर्माण पूरा हुआ?

कहा जाता है कि ताजमहल को 20,000 मजदूरों ने मिलकर बनाया था। पहली बार ये तथ्य ब्रिटिश काल में लाहौर से प्रकाशित एक पुस्तक ‘गाइड टू द ताज एट आगरा’ के पृष्ठ 14 में मिलता है। हेनरी जॉर्ज ने इन मजदूरों की दुर्दशा के बारे में अपनी किताब में लिखा है। किताब के पेज नंबर 27 पर लिखा है, “20,000 मजदूरों ने काम किया लेकिन उन्हें बहुत कम पैसे मिलते थे। उन्हें भत्ते के तौर पर मक्के के दाने दिए जाते थे, जिसकी लालची अधिकारियों द्वारा कटौती होती रहती थी। ये मजदूर बुरी तरह से तनाव में थे और इसी कारण इनकी मौत की संख्या भी काफी बढ़ गई थी। एक कवि ने लिखा है कि इस संकट की घड़ी में भगवान ही हमारा रखवाला है। अच्छा होता कि हम भी मुमताज के साथ ही मर गए होते।”