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‘महिलाओं से गैंगरेप, आरी से काटा, 400000+ निर्वासित’: अमेरिकी संस्था ICHRRF ने माना कश्मीर में हुआ था हिन्दुओं का नरसंहार

अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संगठन इंटरनेशनल कमीशन फॉर ह्यूमन राइट्स एंड रिलिजियस फ्रीडम (ICHRRF) ने जम्मू और कश्मीर में कश्मीरी हिंदू नरसंहार को आधिकारिक रूप से मान्यता दी है। इस मुद्दे पर सुनवाई के बाद ICHRRF ने कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को मान्यता देने की घोषणा की।

एक प्रेस रिलीज के अनुसार, 27 मार्च, 2022 को, ICHRRF ने कश्मीरी हिंदू नरसंहार (1989-1991) के विषय पर एक विशेष जन-सुनवाई बुलाई थी। इस दौरान कई पीड़ितों और जातीय और सांस्कृतिक सफाई से बचे लोगों ने इस बारे में बात की और सबूत पेश किया।

इसे सुनकर ICHRRF को गहरा धक्का लगा। अपने देश में नरसंहार, जातीय सफाया और निर्वासन के शिकार कई कश्मीरी हिंदुओं ने बहादुरी से अपने साथ हुई बर्बरता की कहानी बताई। उन्होंने बताया कि किस तरह से उन्हें कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादियों के हाथों क्रूरता का सामना करना पड़ा, अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़ा, पुनर्वास के लिए किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। अपने कष्टप्रद अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने इसे यहूदी प्रलय के समान बताया।

प्रेस रिलीज में कहा गया है, “हजारों घर और मंदिर नष्ट कर दिए गए। 400,000 से अधिक कश्मीरी हिंदू पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा बंदूक की नोक पर निर्वासित करने के लिए मजबूर किया गया, उनके घरों और उनके द्वारा जानी जाने वाली हर चीज से बेदखल कर दिया गया। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, आरी से दो टुकड़ों में काट दिया गया और सबसे क्रूर तरीके से मार डाला गया। अब, यह संस्कृति 32 वर्षों के दौरान आत्म-समर्थन के बाद विलुप्त होने के कगार पर है। जिन लोगों ने अपनी मातृभूमि में रहना चुना, उन्होंने अपने पड़ोसियों की भलाई में विश्वास करते हुए ऐसा किया। पीड़ितों और बचे लोगों ने आशा, शांति, अहिंसा और सुरक्षा की उम्मीद जताई। उन्हें कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादियों द्वारा बलात्कार, प्रताड़ना और हत्या का सामना करना पड़ा। क्षत-विक्षत लाशों को सांस्कृतिक तरीके से अंतिम संस्कार के परंपराओं से वंचित कर दिया गया और बाकी लोगों के मन में भय पैदा करने का काम किया।”

उल्लेखनीय है कि जब राजनेताओं, पड़ोसियों, दोस्तों, छात्रों और स्थानीय पुलिस ने आँखें मूँद लीं और कान बंद कर लिए, तो ICHRRF ने इसे बेहद दर्दनाक बताया। ग्रुप ने पाया कि इतनी हिंसक त्रासदी से गुजरने के बावजूद, कश्मीरी हिंदुओं में हिंसक प्रतिशोध या मुस्लिम विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। 

रिलीज में आगे कहा गया, “हजारों वर्षों तक स्वदेशी धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में शांतिपूर्वक रहने के बाद, इन कश्मीरी हिंदुओं से मदद की गुहार विश्व स्तर पर बहरे कानों पर पड़ी। हालाँकि यह एक हद तक अपेक्षित था कि प्रत्येक राष्ट्र और मीडिया आउटलेट यह चुनाव करता है कि वे वैश्विक घटनाओं से संबंधित क्या और कितनी रिपोर्ट करेंगे, किस पहलू को उजागर करेंगे। यह बेहद दर्दनाक था जब राजनेताओं, पड़ोसियों, दोस्तों, सहपाठियों और स्थानीय पुलिस ने आँखें मूंद लीं और कान बंद कर बहरे बन गए। बार-बार नजरअंदाज किए जाने, खारिज किए जाने और अमान्य होने का अनुभव करते हुए, दुनिया चुप रही क्योंकि पीड़ितों को मानवता के खिलाफ बर्बर अपराध करने वालों की निंदा करने के बजाय दोषी ठहराया गया था। इन सबके बावजूद वे न तो हिंसक बदला लेना चाहते हैं और न ही मुस्लिम विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाना चाहते हैं। इसके बजाए, वे सम्मानपूर्वक सत्य, न्याय और मानवता की बेहतरी के लिए एकजुटता का अनुरोध करते हैं। वे शांतिपूर्वक आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक तरीके से हैंडल कर रहे हैं ताकि उन आघातों को ठीक किया जा सके और भविष्य में होने वाले अत्याचारों को रोकने की वकालत की जा सके।”

इस सुनवाई में भारत सरकार और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर की सरकार से 1989-1991 में नरसंहार के रूप में कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ अत्याचारों की पहचान करने और उन्हें मान्यता देने का आग्रह किया गया।

बयान में कहा गया, “आयोग अन्य मानवाधिकार संगठनों, अंतर्राष्ट्रीय निकायों और सरकारों को इसमें शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता है और आधिकारिक तौर पर इन अत्याचारों को नरसंहार के कार्य के रूप में स्वीकार करता है। बयान में कहा गया है कि दुनिया को इन कहानियों को सुनना चाहिए, उनकी पिछली चुप्पी के प्रभाव पर गंभीरता से आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और राजनीतिक औचित्य से निष्क्रियता को उचित मान्यता देनी चाहिए।”

मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अंतर्राष्ट्रीय आयोग

मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अंतर्राष्ट्रीय आयोग (ICHRRF) संयुक्त राज्य में स्थापित एक गैर-लाभकारी संगठन है जो निरंतर निगरानी, शिक्षा, नीति अनुसंधान और सहयोग के माध्यम से मानव अधिकारों, धार्मिक और दार्शनिक स्वतंत्रता और एक बहुकेंद्रित विश्वदृष्टि को बढ़ावा देता है। उनकी वेबसाइट के अनुसार, वे शैक्षिक, वैज्ञानिक, कानूनी और मानवाधिकारों की वकालत के साथ-साथ दान के उद्देश्यों पर केंद्रित हैं। वे दुनिया भर में कम प्रतिनिधित्व वाले लोगों के मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के कार्यकर्ता बनने का प्रयास करते हैं।

कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार

कश्मीरी हिंदू नरसंहार 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ, जब लाखों हिंदुओं, विशेष रूप से पंडितों को प्रताड़ित किया गया और अपनी जमीन और संपत्ति को त्यागने के लिए मजबूर किया गया। बताया जाता है कि घाटी के कुल 140,000 कश्मीरी पंडित निवासियों में से लगभग 100,000 फरवरी और मार्च 1990 के बीच भाग गए। 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी मस्जिदों ने कश्मीरी पंडितों को काफिर बताते हुए उन्हें चेतावनी जारी की। उन्हें तीन विकल्प दिए गए थे: कश्मीर छोड़ दो, इस्लाम में परिवर्तित हो जाओ, या हत्या कर दी जाएगी।

2.5 लाख टन कृष्णशिला से बना यदाद्रि का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर: हजारों साल पुरानी गुफाओं में स्वयंभू भगवान, 125 Kg सोने का गोपुरम

तेलंगाना में 2000 करोड़ रुपए की लागत से बने यदाद्रि के लक्ष्मी नरसिंह मंदिर का उद्घाटन किया गया। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने ये प्रक्रिया पूरी की। भक्तों के लिए इसे खोल दिया गया था। मंदिर यहाँ पहले से ही था, लेकिन अब इसकी रूपरेखा बदल गई है। पिछले 100 वर्षों में कृष्णशिला (Black Granite Stone) से तैयार होने वाला ये पहला मंदिर है। इसे शास्त्रों के हिसाब से निर्मित किया गया है। अब तक 1000 करोड़ रुपए लग चुके हैं, आगे कई और काम होने हैं।

इसे पुनर्निर्मित करने में 5 साल का लंबा समय लगा है। पहले जहाँ ये एक पहाड़ी पर स्थित छोटा सा मंदिर हुआ करता था, वहीं अब इसकी वस्तु-कला को देखने दूर-दूर से लोग आएँगे। ये मंदिर हैदराबाद से 60 किलोमीटर दूर स्थित यदाद्रि भुवनगिरि जिले में स्थित है। 11 अक्टूबर, 2016 को इसके पुनर्निर्माण का कामकाज शुरू हुआ था। ‘महाकुम्भ संप्रोक्षण’ के मौके पर इसका उद्घाटन हुआ है। देवता को बालायाम से लेकर प्रमुख गर्भगृह में स्थापित किया गया।

इसे आंध्रा प्रदेश के तिरुमला स्थित श्री वेंकटेश मंदिर की तरह विकसित किए जाने का लक्ष्य है, जो विश्व का सबसे समृद्ध मंदिर है। तिरुमला की 7 पहाड़ियों के मुकाबले यहाँ 9 पहाड़ियाँ हैं। बाकी की 8 पहाड़ियों को भी एक तीर्थस्थल के रूप में विकसित किया गया है। इसके लिए ‘यदाद्रि टेम्पल डेवलपमेंट अथॉरिटी (YTDA)’ का गठन भी किया गया। इसे बनाने के लिए सीमेंट, ईंट या कंक्रीट का इस्तेमाल नहीं किया गया है। सिर्फ चूने मोर्टार को उपयोग में लाया गया।

आंध्र प्रदेश के प्रकाशम और गुंटूर जिले से 2.5 लाख टन कृष्णशिला मँगाया गया। रोज लगभग 1500 लोग इस काम में लगे रहे, जिनमें से 800 मूर्तिकार थे। आनंद साईं को इसका मुख्य शिल्पकार नियुक्त किया गया, जिन्होंने इसे बनाने से पहले दक्षिण भारत के कई मंदिरों का दौरा किया। 7 गोपुरम तिरुचिपल्ली के श्रीरंगम मंदिर से प्रेरित है। मुख्य गोपुरम, जिसे ‘विमान’ नाम दिया गया है, उस पर सोने की परत चढ़ाई गई। ये तिरुमला मंदिर से प्रेरित है।

ये काम अभी चल ही रहा है, जिसके लिए 125 किलो सोने का खर्च लगाया जा रहा है। इनमें से 30 किलो सोना कारोबारियों और नेताओं द्वारा दान के माध्यम से आया है। 13,000 टन पत्थरों का इस्तेमाल कर के 7 मंजिला राजगोपुरम बनाया गया। कोरोना के कारण काम पर असर पड़ा, वरना ये पहले ही तैयार हो चुका होता। आने वाले समय पर प्रतिदिन 40,000 श्रद्धालु यहाँ आ सकते हैं। हजारों वर्ष पुरानी स्थित यहाँ की गुफाओं में नृसिंह की तीन मूर्तियाँ हैं – ज्वाला, गंधभिरंदा और योगानंदा

680 कश्मीरी पंडितों की हत्या, 200 केस, 1 को भी सजा नहीं: इधर आतंकी यासीन मलिक का ‘एजेंडा’ बढ़ाती रही कॉन्ग्रेस

कश्मीर में हिंदू नरसंहार और पलायन की अंतहीन कहानियों का एक सच ये भी है कि 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार होने के बावजूद पंडितों ने समय-समय पर वापस अपने घर लौटने की कोशिश की। लेकिन उस समय भी, इस्लामी आतंकियों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया। घाटी में पुलिस इतनी लाचार बनी बैठी थी कि कट्टरपंथियों के विरुद्ध सालों तक नरसंहार का कोई केस नहीं दर्ज हुआ और जो 200 केस हुए भी उसकी चार्जशीट कभी बनने नहीं दी गई और जब 1998 में 23 कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर हालात देखने पहुँचा तो उन्हें भी गांदरबल में रातों रात मार दिया गया। फारूख अब्दुल्ला ने मीडिया में बयान दिया था कि यहाँ कश्मीरी हिंदुओं की वापसी संभव नहीं है।

680 कश्मीरी पंडितों की हत्या

दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट में कश्मीर संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने अपना बयान दिया है। उन्होंने आज तक गुनहगारों को सजा न मिलने को राजनीतिक असफलता बताया। उन्होंने कहा कि 680 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई लेकिन कहीं कोई कार्रवाई नहीं हुई। 200 से ज्यादा जो एफआईआर हुई उसमें कोई चार्जशीट दाखिल नहीं हुई। बिट्टा कराटे सबूतों के अभाव में बरी हो गया जबकि उसने खुद बताया था कि वह 20-30 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर चुका हैं।

मनमोहन सरकार ने दिया कश्मीरी पंडितों को घाव

बता दें कि घाटी से निकाले जाने के बाद एक ओर कश्मीरी पंडित जहाँ सालों साल अपनी वापसी की उम्मीद लगाए बैठे थे। वहीं 2006 में कुछ ऐसा हुआ जिसने कश्मीरी पंडितों के घाव पर मरहम लगाने की जगह नमक लगाने का काम किया। दरअसल, तब सत्ता में मनमोहन सरकार थी। जब प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के सबसे कुख्यात आरोपित यासीन मलिक को अपने साथ मिलाया और उस 18 सदस्यीय पैनल का हिस्सा बनाया ताकि आतंकवादियों से बात हो। इस बातचीत में यासीन की वह माँग तक सुनी गई जिसमें उसने कहा था कि कश्मीर से जुड़े फैसले लेने के लिए राजनीतिक ताकतों के साथ आतंकियों की भी सुनी जानी चाहिए।

सोचिए! क्या बीती होगी उन लाखों कश्मीरी पंडितों पर जिन्हें इन्हीं आतंकियों के कारण अपना घर, अपना काम, अपनी जमीन सब छोड़ना पड़ा था। मनमोहन सिंह के साथ यासीन की मुलाकात की आज भी चर्चा होती है। उन तस्वीरों को शेयर किया जाता है जिसमें दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुरा रहे हैं और हाथ मिला रहे हैं और द कश्मीर फाइल्स आने के बाद तो ये वाकया अन्य घटनाओं की तरह प्रासंगित हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट पहुँचे कश्मीरी पंडित

इन तस्वीरों के अलावा द कश्मीर फाइल्स के आने के साथ जिन चीजों पर चर्चा शुरू हुई है वो कश्मीरी पंडितों को इंसाफ दिलाने की माँग है। हाल में जम्मू कश्मीर के डीजीपी ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि घटना से जुड़ी विशेष जानकारियाँ मिलने पर वह निश्चित रूप से मामले की जाँच करेंगे। इसके अलावा कश्मीरी पंडित भी इस फिल्म के आने के बाद सुप्रीम कोर्ट न्याय की गुहार लेकर पहुँचे हैं। उन्होंने आवाज उठाई कि सिख नरसंहार की जाँच भी 33 साल बाद हुई थी तो कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर भी जाँच कराई जा सकती है।

छत्तीसगढ़ में दो पादरी गिरफ्तार, ‘चंगाई सभा’ के नाम पर करा रहे थे आदिवासियों का ईसाई धर्मांतरण, पकड़ाने पर कहा – ‘आराधना कर रहे थे’

छत्तीसगढ़ की जशपुर पुलिस ने धर्मान्तरण के आरोप में 2 पादरी गिरफ्तार किए गए हैं। इन आरोपितों पर हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवाने का आरोप लगा है। इस मामले की शिकायत विश्व हिन्दू परिषद ने की थी। घटना रविवार (27 मार्च) की बताई जा रही है।

जशपुर के डिप्टी SP मनीष कुंवर के मुताबिक, “कुछ लोग आ कर ये सूचना दिए थे कि उनके गाँव में कुछ हिन्दू पक्ष को बरगलाया जा रहा है। इसी के साथ एक लिखित शिकायत भी दी गई थी। इसमें दोनों पॉस्टरों के खिलाफ ग्रामीणों के लिए चंगाई सभा करने का आरोप लगाया गया था। मौके पर हिन्दू संगठनों के जाने की भी सूचना दी गई थी। सूचना पर जा कर हमने इन्हे गिरफ्तार कर के न्यायालय में पेश किया है। दोनों पर धारा 295 – A, 34 IPC के साथ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 4 के तहत केस दर्ज हुआ है।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक गिरफ्तार पहले पादरी का नाम क्रिस्टोफर तिर्की है। वह बगिया ग्राम पँचायत के भालुटोला इलाके में स्थानीय निवासी दूसरे पादरी ज्योति प्रकाश टोप्पो के घर एक प्रार्थना सभा करवाने गया था। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साईं भी इसी गाँव के रहने वाले हैं। विश्व हिन्दू परिषद कार्यकर्ताओं के मुताबिक इस सभा में कँवर जनजाति के 25 परिवारों के लगभग 68 लोग मौजूद थे। प्रार्थना सभा को धर्मान्तरण का प्रयास बताते हुए VHP कार्यकर्ताओं ने पुलिस में शिकायत की। पुलिस ने दोनों आरोपितों को कोर्ट में पेश करते हुए न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।

इस घटना के एक वीडियो में स्थानीय लोगों को पादरियों से नोकझोंक करते देखा जा सकता है। एक व्यक्ति ने पादरियों से कहा, “आप अपने धर्म स्थल में जाईये पूजा करिए, लेकिन हिन्दुओं को बुला कर ये काम मत करिए।”

वही इसी वीडियो में आरोपित पादरी क्रिस्टोफर तिर्की ने धर्मांतरण के आरोपों से इंकार करते हुए कहा, “हम तो चर्च में दुआ-प्रार्थना बहुत लंबे समय से कर रहे हैं। हमारी सभा में ईसाई धर्म के लोगों के अलावा कँवर समुदाय के लोग भी थे।” वहीं दूसरे पादरी ज्योति प्रकाश टोप्पो ने कहा, “धर्म तो आराधना कर रहे थे। कंवर समुदाय के लोग जो आस्था रखते थे वो भी थे। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गाँव के लोग भी मौजूद थे।”

एंबुलेंस केस में मुख्तार अंसारी सहित 13 पर गैंगस्टर: रास्ते में खराब हो गई लखनऊ ले जा रही वैन, नेटिजन्स बोले- आज ही…

मुख्तार अंसारी से जुड़े चर्चित एंबुलेंस मामले में उत्तर प्रदेश की बाराबंकी पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने इस मामले में मुख्तार अंसारी सहित 13 आरोपितों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट लगाया है। बाराबंकी के सीओ आतिश कुमार ने इसकी जानकारी दी।

एंबुलेंस केस के सभी आरोपित पहले ही जेल भेजे जा चुके हैं। गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद के यूसुफपुर के मूल निवासी और मऊ के पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी पर यह मुकदमा नगर कोतवाल सुरेश पांडेय ने दर्ज कराया है।

आरोपितों में मऊ जिले के श्याम संजीवनी अस्पताल एंड रिसर्च सेंटर की संचालिका डॉ. अलका राय, डा. शेषनाथ राय, अहिरौली के राजनाथ यादव, सरवां के आनंद यादव, गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद के सुरेंद्र शर्मा, सैदपुर के मोहम्मद शाहिद, फिरोज कुरैशी, अफरोज उर्फ चुन्नू, जफर उर्फ चंदा, सलीम, सदियापुर के मोहम्मद सुहैब मुजाहिद और लखनऊ के मोहम्मद जाफरी उर्फ शाहिद का नाम शामिल हैं।

गौरतलब है कि 31 मार्च 2021 को बाराबंकी की एंबुलेंस उस वक्त चर्चा में आई थी, जब पंजाब के रोपड़ जेल से मोहाली कोर्ट जाने में इसका प्रयोग मुख्तार अंसारी द्वारा किया गया था। इस एंबुलेंस पर बाराबंकी जिले का नंबर था। इसके बाद बाराबंकी परिवहन विभाग में हड़कंप मच गया था। छानबीन शुरू हुई तो पता चला कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे वर्ष 2013 में एंबुलेंस बाराबंकी आरटीओ कार्यालय से पंजीकृत कराई गई थी। बाराबंकी संभागीय परिवहन विभाग ने जब इसकी पड़ताल शुरू की तो पता चला कि जिस पते पर एंबुलेंस का रजिस्ट्रेशन कराया गया था, वहाँ पर कोई मकान नहीं था। कागजात खंगाले गए तो ये डॉ. अलका राय की फर्जी वोटर आईडी से पंजीकृत पाई गई।

मुख्तार अंसारी को लखनऊ ले जा रही वैन रास्ते में हुई खराब

इधर मुख्तार अंसारी को लखनऊ (Lucknow) ले जा रही वैन बांदा (Banda) में खराब हो गई। सोमवार (28 मार्च 2022) को अंसारी को न्यायिक प्रक्रिया के चलते जेल प्रशासन और जिला पुलिस द्वारा बांदा जेल से लखनऊ सड़क रास्ते ले जाया जा रहा था। इसी दौरान वैन खराब हो गई। न्यूज एजेंसी ANI द्वार जारी फोटो में आप देख सकते हैं कि दो लोग वाहन को धक्का दे रहे हैं।

सोशल मीडिया पर मीम्स की बौछार

इस खबर के सामने आते ही सोशल मीडिया पर मीम्स की बौछार हो गई। लोग तरह-तरह के मीम्स शेयर कर मजे ले रहे हैं।

दलेर मेहंदी ने Metaverse में खरीदी जमीन, नाम दिया- बल्ले बल्ले लैंड: जानिए आप कैसे इस दुनिया में बना सकते हैं प्रॉपर्टी

बॉलीवुड और पंजाबी सिंगर दलेर मेहंदी (Daler Mehndi) मेटावर्स वर्चुअल वर्ल्ड में रियल एस्टेट प्रॉपर्टी खरीदने को लेकर चर्चा में हैं। वे मेटावर्स में प्रॉपर्टी खरीदने वाले पहले भारतीय हैं। दलेर ने मेटावर्स में जो जमीन खरीदी है, उसका नाम ‘बल्ले बल्ले लैंड’ रखा है। हालाँकि, उन्होंने यह जमीन कितने में खरीदी है, इसका खुलासा नहीं किया है। गणतंत्र दिवस 2022 पर पहली बार मेटावर्स (Metaverse) लाइव कॉन्सर्ट में परफॉर्म करने के बाद सिंगर दलेर मेहंदी इस प्रॉपर्टी डील के बाद अमेरिकी रैपर ट्रैविस स्कॉट, जस्टिन बीबर, मार्शमैलो और एरियाना ग्रांडे जैसे दिग्गज गायकों के क्लब में शामिल हो गए हैं।

क्या है मेटावर्स

मेटावर्स एक वर्चुअल दुनिया है, जहाँ आप वर्चुअली एंट्री करते हैं। इस दौरान आपको ऐसा लगता है कि आप फिजिकली उस जगह पर मौजूद हैं। आसान शब्दों में कहें तो Metaverse एक आभासी दुनिया है, जहाँ आपकी एक अलग पहचान होती है। इस वर्चुअल दुनिया में आप घूमने-फिरने के अलावा अपने दोस्तों के साथ मिल सकते हैं और पार्टी भी कर सकते हैं। Metaverse में एक साथ कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इसमें ऑगमेंटेड रियलिटी, वर्चुअल रियलिटी, मशीन लर्निंग, ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक शामिल हैं।

भारत में भी हो रहा लोकप्रिय

भारत में मेटावर्स काफी लोकप्रिय हो रहा है। इस साल फरवरी में तमिलनाडु के एक कपल दिनेश एसपी और जनगानंदिनी रामास्वामी ने शिवलिंगपुरम गाँव में पहली बार Metaverse यानी वर्चुअल दुनिया के जरिए शादी की थी। इस कपल की शादी में हजारों लोग शामिल हुए थे। इसमें दुल्हन के दिवंगत पिता का भी वर्चुअल अवतार मौजूद था। 

Metaverse में आम लोग भी कर सकते हैं एंट्री

इस वर्चुअल दुनिया में क्या कोई आम आदमी भी एंट्री कर सकता है? इसका जवाब है- हाँ। इसके लिए आपको सबसे पहले वेबसाइट https://decentraland.org/ पर जाकर अपना एक अवतार क्रिएट करना होगा। इस अवतार को आप कोई भी नाम और वेशभूषा दे सकते हैं। इसके बाद Metaverse की दुनिया में आपको इसी अवतार के नाम से जाना जाएगा। इस वर्चुअल दुनिया में आप जमीन और फ्लैट्स भी खरीद सकते हैं, क्योंकि यहाँ कई रियल स्टेट्स कंपनियाँ जमीन तैयारी कर रही हैं। इसके अलावा आप यहाँ किसी इवेंट या पार्टी में भी एंट्री कर सकते हैं।

बता दें कि Metaverse में जाने के लिए आप Decentraland के अलावा The Sandbox और फेसबुक का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। Facebook से पहले साल 2017 में Decentraland नामक स्टार्टअप ने इस कॉन्सेप्ट की शु​रुआत की थी, जिसके बाद आज कई कंपनियाँ Metaverse तकनीक बाजार में उतार चुकी हैं।

मेरठ में तीन तलाक का विरोध करने पर शौहर ने मारा चाकू, झारखंड में अमीन अंसारी ने बीवी को घर से निकाला

उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक व्यक्ति ने तीन तलाक का विरोध किए जाने पर अपनी बीवी को चाकू से गोद दिया। वहीं एक अन्य घटना में झारखंड के रामगढ़ में अमीन अंसारी ने तीन तलाक देकर बीवी को घर से निकाल दिया। इस सदमे में पीड़िता के अब्बा की मौत हो गई।

पहली घटना मेरठ के ब्रह्मपुरी थानाक्षेत्र की है। आसमां का 13 साल पहले आबिद के साथ निकाह हुआ था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आबिद को शराब की लत है। वह लगातार आसमां के घर वालों से 10 लाख रुपए की माँग कर रहा था। लड़की पक्ष के लोगों ने उसे कुछ दिए भी थे। शनिवार (26 मार्च 2022) को मियाँ-बीवी में कहासुनी के बाद शौहर आबिद ने आसमां को तीन तलाक दे दिया। जब आसमां ने इसका विरोध किया तब उसे आबिद ने चाकू मार दिया। घायल महिला का इलाज अस्पताल में चल रहा है। फिलहाल आसमां की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।

दूसरी घटना झारखंड के रामगढ़ जिले की है। 27 साल की गुलजाहाँ परवीन का आरोप है कि उसे 8 वर्षों से शौहर अमीन अंसारी दहेज के लिए प्रताड़ित कर रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग को भेजी शिकायत में गुलजाहाँ ने कहा है, “मेरे शौहर ने मुझे मई 2014 में आग लगा दी थी। मैं जैसे-तैसे बच पाई। तब मेरे शौहर को पुलिस ने जेल भेजा था। बाद में मुझे सब ठीक हो जाने की बात कह कर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाया गया, जिसे मैंने बच्चों का भविष्य देख कर मान लिया। अगस्त 2021 में मुझे तीन तलाक देकर बेटी सहित घर से निकाल दिया। पुलिस मामले को दबाने की कोशिश कर रही है।”

वहीं गुलजाहाँ की अम्मी शकीला ने बताया है, “मेरे शौहर दिल के मरीज थे। बेटी की तकलीफ को वो बर्दाश्त नहीं कर पाए और इसी सदमे में उनकी जान चली गई। मेरा एक बेटा है जो मेहनत मजदूरी कर घर चला रहा है। हमें न्याय चाहिए।” रामगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता दीपक सिसोदिया के मुताबिक राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा रेखा शर्मा ने घटना का संज्ञान लिया है। ऑपइंडिया के पास पीड़िता द्वारा महिला आयोग को भेजी गई शिकायत मौजूद है।

‘काश मोटू (साजिद खान) को सिखा दिया होता सबक’: विल स्मिथ के ‘मुक्का’ के बाद लिबरलों ने माना- ‘कॉमेडियन’ की कुटाई जरूरी

ऑस्कर अवॉर्ड्स 2022 को होस्ट कर रहे कॉमेडियन क्रिस रॉक को अभिनेता विल स्मिथ ने मंच पर चढ़ कर एक थप्पड़ मार दिया और फिर गाली देते हुए कहा कि मेरी पत्नी का नाम अपनी गंदी जुबान से मत लो। इस घटना के बाद जहाँ क्रिस रॉक को सहानुभूति मिल रही है, कुछ ये भी कह रहे हैं कि मजाक की एक सीमा होनी चाहिए। दोनों ही अश्वेत समुदाय से आते हैं। हालाँकि, सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह के मीन्स बनाए जा रहे हैं।

‘ब्योमकेश’ नाम के ट्विटर यूजर ने लिखा, “आशुतोष गोवारिकर साहब ने काश इस मोटू (निर्देशक साजिद खान) को ऐसा ही सबक सिखा दिया होता अवॉर्ड शो में.. ये भी स्टेज में आने के बाद कॉमेडी के नाम पर कुछ भी बकवास करता रहता है।” 94वीं एकेडमी अवॉर्ड में हुए विवाद से लोगों को इन दोनों की याद क्यों आ रही, बताते हैं। आशुतोष गोवारिकर ‘लगान (2001)’, ‘स्वदेश (2004)’, ‘जोधा अकबर (2008)’ और ‘मोहनजो दाड़ो (2016)’ जैसी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं।

वहीं साजिद खान ने ‘हे बेबी (2007)’ और ‘हाउसफुल’ सीरीज (2010, 2012) के अलावा ‘हिम्मतवाला (2013)’ और ‘हमशकल्स (2014)’ जैसी सुपर फ्लॉप फ़िल्में बना चुके हैं। लोग इन दोनों फिल्म निर्देशकों को क्यों याद कर रहे हैं, ये जानने के लिए हमें 13 साल पीछे जाना होगा। 2009 में एक अवॉर्ड शो के दौरान बतौर होस्ट साजिद खान ने तब डेब्यू कर रहे अभिनेता हरमन बावेजा के अभिनय का मजाक बनाया था। तभी की ये बात है।

उस समय आशुतोष गोवारिकर हरमन बावेजा के साथ ‘व्हाट्स योर राशि’ नामक फिल्म पर काम कर रहे थे। जब वो ‘जोधा अकबर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवॉर्ड लेने मंच पर आए तो उन्होंने साजिद खान को तगड़ा जवाब दिया था। उन्होंने साजिद खान को ‘Shut Up’ कह कर चुप कराया था। उन्होंने कहा था कि फिल्म इंडस्ट्री का जिस तरह से मजाक बनाया गया, इससे अवॉर्ड शो की गरिमा कम हुई है। फिर उन्होंने साजिद खान को उनकी बात में हस्तक्षेप करने से मना भी किया था। यहाँ देखें वो वीडियो:

उन्होंने कहा था, “मुझे ये पसंद नहीं आया कि आप एक अवॉर्ड विजेता को कैसे चुप रहने को कह सकते हैं। इसे लेकर मैं हैरान और दुःखी हूँ। एक अभिनेता अपनी प्रतिभा को निखारने के लिए काफी मेहनत करता है। ऐसे मंच पर उसका मजाक नहीं बनाया जा सकता।” उनके मंच से जाने के बाद साजिद खान ने कहा था कि ये एक लोकतांत्रिक देश है और सबको अपनी बात कहने का हक़ है। फिर उन्होंने ‘साजिद खान ने अवॉर्ड्स नहीं बनाया, अवॉर्ड्स ने साजिद खान को बनाया है’ जैसा डायलॉग भी मारा था।

वहीं उधर ‘रेडियो मिर्ची’ की RJ सायमा ने भी इस खबर को शेयर करते हुए दावा किया कि कभी-कभी ये बताने के लिए मुक्का मारना ज़रूरी होता है कि तुम्हारा जोक अच्छा नहीं था। हालाँकि, इस दौरान लोगों ने उन्हें हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक बनाने वाले मुनव्वर फारूकी की याद दिला दी, जिसके जेल जाने के बाद लिबरल गिरोह ने उसका समर्थन किया था। फिर क्या था, RJ सायमा फटाफट अपने ट्वीट को डिलीट कर के निकल लीं।

बंगाल विधानसभा में बीरभूम में जिंदा जलाए गए लोगों की बात उठाने पर बवाल: दावा- स्पीकर ने कहा, BJP विधायकों को मारो

पश्चिम बंगाल विधानसभा में सोमवार (28 मार्च 2022) को जोरदार हंगामा हुआ। बीजेपी नेताओं का दावा है कि बीरभूम में लोगों को जिंदा जलाने की घटना पर सदन में चर्चा की माँग करने पर उनके साथ सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस के विधायकों ने मारपीट की। बीजेपी विधायक मनोज तिग्गा के कपड़े तक फाड़ डाले गए। इस बीच विधानसभा स्पीकर ने पाँच बीजेपी विधायकों शुभेंदु अधिकारी, मनोज तिग्गा, नरहरि महतो, शंकर घोष, दीपक बर्मन को सस्पेंड कर दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पश्चिम बंगाल विधानसभा में बीरभूम हिंसा पर चर्चा की माँग को लेकर टीएमसी (TMC) विधायक आगबबूला हो गए और बीजेपी विधायकों के साथ हाथापाई शुरू कर दी। टीएमसी विधायकों ने बीजेपी विधायक मनोज तिग्गा के साथ मारपीट की और उनके कपड़े फाड़ दिए। इस घटना को लेकर टीएमसी विधायक असित मजूमदार का कहना है कि इस दौरान उन्हें भी चोटें आईं। इसी बीच, बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने अपने ट्विटर अकाउंट पर इस घटना का एक वीडियो साझा किया है। वीडियो में विधायकों के एक समूह को एक-दूसरे को धक्का देते और चिल्लाते हुए देखा जा सकता है।

अमित मालवीय ने वीडियो के साथ लिखा, “पश्चिम बंगाल विधानसभा में भगदड़। बंगाल के राज्यपाल के बाद, टीएमसी विधायकों ने अब मुख्य सचेतक मनोज तिग्गा सहित भाजपा विधायकों पर हमला किया, क्योंकि वे सदन के पटल पर रामपुरहाट हत्याकांड पर चर्चा की माँग कर रहे थे। आखिर, क्या छुपाना चाहती हैं ममता बनर्जी?”

सोमवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही बीजेपी विधायकों ने टीएमसी सरकार राज्य में हिंसा और कानून व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने जैसे ही बोलना शुरू किया, टीएमसी नेताओं ने हंगामा शुरू कर दिया। इस दौरान दोनों पक्षों में जमकर बहस और नारेबाजी हुई। इसके बाद विधायक सीटों से उठकर वेल पर आ गए और हंगामा करने लगे। देखते ही देखते यह हंगामा मारपीट में बदल गया।

बंगाल विधानसभा में हंगामे पर BJP नेता लॉकेट चटर्जी ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, “पश्चिम बंगाल में स्पीकर खुद बोल रहे हैं कि BJP के विधायकों को मारो। पश्चिम बंगाल में न गणतंत्र है और न ही कानून-व्यवस्था। यहाँ हिटलर का शासन चल रहा है। ममता बनर्जी हमसे डरती हैं इसलिए वह हमारे विधायकों को पिटवा रही हैं।”

भाजपा नेता बीएल संतोष ने कहा है, “पश्चिम बंगाल की राजनीति आज एक और निचले स्तर पर पहुँच गई है। वास्तव में ममता बनर्जी के मई में कार्यभार सँभालने के बाद से यहाँ की स्थिति बेहद खराब हुई है। आज, बीजेपी बंगाल के मुख्य सचेतक मनोज तिग्गा और अन्य नेताओं पर टीएमसी द्वारा विधानसभा के अंदर हमला किया गया।”

बता दें कि पश्चिम बंगाल के बीरभूम स्थित रमपुरहाट में 8 लोगों को उनके घर में बंद कर ज़िंदा जला दिया गया था। सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता भादू शेख की बमबारी में हत्या के बाद आक्रामक भीड़ ने इस घटना को अंजाम दिया था।

8 राज्यों/UT में हिंदू अल्पसंख्यक, फिर भी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने माइनॉरिटी दर्जे से कर दिया था इनकार: क्या अब बदलेंगे हालात

भारत के कुछ राज्यों में हिंदुओं को माइनॉरिटी श्रेणी में रखे जाने की माँग पर आखिरकार केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करते हुए कहा है कि ये प्रदेश भाषा व संख्या के आधार पर हिंदुओं को अल्पसंख्यक होने का तमगा दे सकते हैं। उन्हें इसकी स्वतंत्रता है।

केंद्र सरकार ने अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय की उस याचिका पर दिया जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, मणिपुर, और पंजाब में हिंदुओं के अल्पसंख्यक होने के तथ्य पर गौर करवाया था और ये भी बताया था कि कैसे माइनॉरिटी होने के बाद भी उन्हें दरकिनार किया जाता है।

राज्य, जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हैं

केवल ऑँकड़ों की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार, मिजोरम में हिंदू 2.75% हैं, वहीं नागालैंड में 8.75% , मेघालय में 11.53 %, अरुणाचल प्रदेश में 29%, मणिपुर में 31.39% हैं। इसी तरह पंजाब में हिंदुओं की संख्या 38.40%, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में हिंदू 28.44% और लक्षद्वीप में 2.5% हैं। इन राज्यों में हिंदुओं की संख्या कम होने की वजह से इनका उल्लेख विशेष तौर पर याचिका में किया गया है। लेकिन देश में कुछ ऐसे राज्य भी हैं जहाँ की जनसांख्यिकी में तेजी से बदलाव हो रहा है और संभव है कि वहाँ कुछ सालों में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएँ।

अन्य राज्यों में मुस्लिम आबादी की बढ़ोतरी

उदाहरण के लिए बंगाल को लीजिए। कुछ दिन पहले ही ऑर्गेनाइजर मैग्जीन के पत्रकार प्रणय कुमार ने बंगाल के कुछ राज्य जैसे जलपायगुड़ी, सिलीगुड़ी, इस्लामपुर, मालदा टाउन, मुर्शिदाबाद आदि जगहों पर विजिट किया था। जहाँ उन्होंने जनसांख्यिकी में तेजी से हो रहे बदलाव को नोटिस किया। उन्होंने पाया कि रोहिंग्या घुसपैठियों की तादाद पिछले सालों में बहुत बढ़ी है जिससे मुस्लिमों की संख्या में बढ़ोतरी हुई और हिंदुओं को अपनी जगह छोड़ जाना पड़ा। इससे पहले उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता को बढ़ाया था। 

नेपाल से सटे क्षेत्रों में हो रहे बदलावों को असामान्य बताते हुए गृह मंत्रालय तक रिपोर्ट गई थी। रिपोर्ट में कुमाऊँ के तीन क्षेत्र- ऊधमसिंह नगर, चम्पावत व पिथौरगढ़ को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया था। जबकि पिथौरगढ़ के दो कस्बे धारचूला व जौलजीवी को अतिसंवेदनशील श्रेणी में रखा गया था। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी कई इलाकों में हो रहे बदलावों पर चिंता जताई गई थी जहाँ अचानक मजहबी संस्थानों के खुलने में इजाफा देखा गया था।

साल 2020 में SC ने खारिज कर दी थी याचिका 

बता दें कि पहली बार नहीं है जब कई राज्यों में हिंदुओं के अल्पसंख्यक होने की माँग पर गौर करवाया गया हो। इससे पहले साल 2020 के फरवरी माह में हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने की याचिका दाखिल हुई थी जिसे कोर्ट द्वारा खारिज किया गया था और कहा गया था कि याचिकाकर्ता उन राज्यों के हाई कोर्ट में जाएँ जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हैं। उस समय भी अश्विनी उपाध्याय ने इस बात याचिका डाली थी। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय आँकड़ों के अनुसार, देश की बहुसंख्यक आबादी कई राज्यों में अल्पसंख्यक है। ऐसे में उन्हें वो सुविधा नहीं मिल पाती जो राज्य अल्पसंख्यकों को देते हैं।