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‘कंगना को पद्मश्री देने पर राष्ट्रपति हैं शर्मिंदा, सम्मान वापस लेने के लिए PM मोदी से माँगी अनु​मति’ – फैक्ट चेक

देश की आजादी पर बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत (Kangana Ranaut) द्वारा दिए गए बयान के बाद से कट्टरपंथी और लिबरल गैंग उनसे पद्मश्री सम्मान वापस लेने की माँग कर रहे हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति के नाम से एक ट्वीट तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें एक्ट्रेस कंगना रनौत से पद्मश्री सम्मान (Padma Award) वापस लेने की बात लिखी गई है।

ट्वीट में राष्ट्रपति के हवाले से लिखा गया है, ”कंगना रनौत द्वारा की गई टिप्पणी देश की भावनाओं को आहत करने वाली है। मैं स्वयं उन्हें पद्म पुरस्कार दिए जाने के लिए शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूँ। मेरी सरकार नरेंद्र मोदी से विनती है कि मुझे पुरस्कार वापस लेने की अनुमति दी जाए।”

साभार:ट्विटर

क्या सच में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (President Ramnath Kovind) के अकाउंट से यह ट्वीट किया गया? आइए जानते हैं सच्चाई।

यह ट्वीट राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अकाउंट से मिलते-जुलते नाम से चलाए जा रहे फर्जी ट्विटर अकाउंट से किया गया था। इस ट्वीट के स्क्रीनशॉट को असली मानकर सोशल मीडिया पर काफी शेयर भी किया जा रहा है। आपको बता दें कि राष्ट्रपति का अकाउंट और यह ट्वीट दोनों ही फर्जी हैं, जिसमें कंगना से पद्मश्री सम्मान वापस लेने के लिए PM मोदी से अनुमति माँगी गई है। अब इस अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया है।

सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे ट्वीट का फैक्ट चेक किया गया तो पता चला कि य​ह राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट से नहीं किया गया है। जब दोनों यानी वायरल ट्वीट और राष्ट्रपति के ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट को चेक किया गया तो सामने आया कि वायरल हो रहा ट्वीट फेक अकाउंट से किया गया है।

फेक अकाउंट में ब्लू टिक नहीं लगा हुआ है, जबकि राष्ट्रपति के ऑफिशियल अकाउंट में उनके नाम के आगे वेरिफिकेशन ब्लू टिक लगा है। इसके अलावा अकाउंट नेम की स्पेलिंग गलत है। President of India की बजाए Prasident of India लिखा है। ट्विटर हैंडल @rashtrapatibhvn की बजाए @rashtrptibhvn है।

साभार: ट्वीटर

एडवोकेट श्रीकांत मिश्र ने गृह मंत्रालय, पीएमओ और दिल्ली पुलिस को टैग करते हुए ट्वीट किया, ”देश के महामहिम के आधिकारिक ट्विटर हैंडल के अतिरिक्त एक फेक ट्विटर हैंडल अफवाह फैला रहा है। असली ट्विटर हैंडल @rashtrapatibhvn जबकि फेक ट्विटर हैंडल @rashtrptibhvn है। कृपया करके प्रशासनिक कार्रवाई करें।”

बता दें कि राष्ट्रपति का पद देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है। राष्ट्रपति के नाम से ट्विटर अकाउंट बनाना और फेक खबरें फैलाना अपराध के दायरे में आता है। सरकार के नए आईटी नियमों के अनुसार, सोशल मीडिया कंपनियों को इनकी निगरानी करने की व्यवस्था करनी जरूरी है।

17 की मौत, 100+ अभी भी लापता: आंध्र प्रदेश में बाढ़ से तबाही, बचाव कार्यों में लगी वायुसेना, PM-CM दोनों एक्शन में

आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। चेयेरू छोटी नदी में अचानक पानी भर जाने से आस-पास के क्षेत्र जलमग्न हो गए हैं। यह बाढ़ शुक्रवार (19 अक्टूबर 2021) को आई है। इसके चलते अब तक 17 लोगों की मौत की खबर है। कई अन्य (100 लोग) लापता भी बताए जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हालात पर मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी को केंद्र सरकार की तरफ से हरसंभव मदद का आश्वासन दिया है। इसी के साथ उन्होंने सभी के सुरक्षित रहने की प्रार्थना भी की है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ का असर चित्तूर, कडप्पा, कुरनूल और अनंतपुर जिलों में अधिक देखा जा रहा है। बंगाल की खाड़ी में बने चक्रवात के चलते गुरुवार (18 नवम्बर 2021) की रात से ही भारी बारिश हो रही थी। आंध्र प्रदेश के तीन रायलसीमा जिलों और एक दक्षिण तटीय जिले में 20 सेंटीमीटर तक बारिश हुई। यही बाढ़ की वजह बताई जा रही है। आंध्र प्रदेश पुलिस, भारतीय वायु सेना, एसडीआरएफ और दमकल सेवा बचाव कार्यों में लगी हुई है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार कडप्पा जिले में इसी बाढ़ की चपेट में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर शिव मंदिर में पूजा कर रहे श्रद्धालु भी आ गए। इसके चलते कुछ लोग राजमपेट क्षेत्र में बाढ़ के पानी में बह गए। नन्दलुरु के पास भी तीन शव बरामद हुए हैं। बाढ़ में बहे अन्य की तलाश की जा रही है। पिछले कई वर्षों में कित्तूर और कडप्पा में आई ये सबसे भयानक बाढ़ बताई जा रही है।

भारतीय वायुसेना ने बचाव कार्यों की जानकारी दी है। वायुसेना के अनुसार विषम हालातों में बचाव कार्यों में MI-17 हेलीकाप्टरों को लगाया गया है। यह बचाव कार्य अनंतपुर जिले में चल रहा है। वीडियो में बाढ़ के पानी में फँसी JCB की छत पर बैठे लोगों को बचाते दिखाया गया है।

कडप्पा जिले में ही आंध्र प्रदेश परिवहन की 3 बसें बाढ़ में फँस गई। इसके चलते 12 लोगों की जान चली गई और 18 अन्य लापता हो गए। यात्री कंडक्टर के साथ बसों की छतों पर दिखाई दिए। आंध्र प्रदेश पुलिस ने इस घटना में बचाव कार्यों की जानकारी दी है।

भारी बारिश के चलते तिरुपति मंदिर में भी बाढ़ का पानी घुसने की खबर है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने बाढ़ प्रभावित जिलों के DM से वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बात की है। उन्होंने राहत एवं बचाव कार्य पूरी सक्रियता से करने के निर्देश दिए हैं। जानकारी के मुताबिक चेयुरु का जलाशय टूटने के चलते स्थिति और अधिक खराब हुई।

हिंदू धर्म बचाने पाकिस्तान से भाग कर आए दिल्ली, ईसाई संगठन कर रहा इनके साथ धर्मांतरण का खेल

पाकिस्तान में कट्टरपंथियों से त्रस्त आकर भारत में शरण लेने वाले हिंदू शर्णार्थी आज भी ठोकरें खाने को मजबूर हैं। दिल्ली के मजनू के टीले पर बने शर्णार्थी कैंप की तो हालत ऐसी है कि यदि ग्राउंड पर जाकर पता किया जाए तो मालूम होता है कि उन्हें खाने-पीने के भी लाले पड़े हुए हैं, गर्मी और या सर्दी उनके पास बिजली की सुविधा भी नहीं है। अब इन सब मूलभूत परेशानियों के अलावा एक जो विकट संकट उनके सामने आया है वो ईसाई मिशनरियों का है। ये संस्थाएँ खाने-पीने की चीजें देने आती हैं, बदले में चाहती हैं लोगों की सारी जानकारी। अगर इन्हें ये जानकारी नहीं मिलती है तो ये सारा सामान वापस ले जाती हैं।

मीडिया हाउस न्यूज इंडिया की रिपोर्ट में इस पूरे खेल का पर्दाफाश हुआ है। गौरव मिश्रा की रिपोर्ट में शरणार्थी कैंप के पास सालों से मंदिर की देखरेख करने वाली उर्मिला रानी के हवाले से कहा गया कि अब तक तीन हिंदू शरणार्थियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया गया है। वह बताती हैं कि यहाँ पर मिशनरी संस्थाओं का आना-जाना था। ऐसे में उन लोगों ने इस पर रोक लगाई लेकिन बाद में मिशनरियाँ अलग नाम से वहाँ सक्रिय हो गईं।

मंदिर के संतों का भी कहना यही है कि गरीब, मजबूर पाकिस्तानी हिंदुओं पर धर्म परिवर्तन का बहुत दबाव है। यदि वह इससे साफ मना करते हैं तो उनकी रोटी का इंतजाम मुश्किल हो जाएगा। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि कैंप में रहने वाले शरणार्थी जो अपना धर्म बचाने के लिए भारत आए, उन्हें यहाँ आकर रामलीला आयोजन करने से मना कर दिया जाता है। लेकिन मिशनरियाँ उन्हें क्रिसमस सेलीब्रेट करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

यहाँ रहने वाले हिंदू अब भी छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसते हैं। रिपोर्ट का दावा है कि पहले कोरोना महामारी में सरकार द्वारा नजरअंदाज किए जाने से इन हिंदू शरणार्थियों को प्रताड़ना से गुजरना पड़ा और अब उनके साथ साइलेंट कन्वर्जन का गंदा खेल खेला जा रहा है।

पाकिस्तान से आए हिंदुओं का कहना है कि जिस तरीके से जानकारी ली जाती है, डाटा कलेक्शन पर जोर दिया जाता है, वह साफ बताता है कि संस्थाओं की मंशा कुछ और है। स्थानीय, तमाम मुद्दों से परेशान होकर कहते हैं कि अपने हालातों पर और परेशानियों पर वह दिल्ली सरकार से गुहार लगा चुके हैं लेकिन हालात अब तक सुधरते नहीं दिख रहे। उन्हें आज भी बिजली, खाने-पीने की परेशानी बनी ही हुई है।

मुस्लिमों की सबसे ‘पाक’ जगह पर इस्लामी आतंकियों का हमला, कमांडो ने धर्म बदल बचाया था काबा: मीडिया पर लगी थी पाबंदी

विश्व के हर मुस्लिम का सपना होता है कि वो अपने पूरे जीवन में एक बार कम से कम मक्का-मदीना का दीदार करे। अपनी हज यात्रा के लिए वो आजीवन इंतजार करते हैं और जब वो क्षण आता है तो उसकी खुशी उनके लिए दुनिया की किसी भी चीज से ऊपर होती है। 20 नवंबर 1979 को भी ऐसे ही मुस्लिमों की भीड़ मक्का में अपने नए साल का इंतजार कर रही थी। उन सबकी हज यात्रा पूरी हुए हफ्ते हो गए थे, लेकिन उन्होंने सोचा कि इस्लाम के सन् 1400 में कदम रखना ही है तो मक्का में काबा के नजदीक रहते हुए रखा जाए। उन सैकड़ों लोगों को क्या मालूम था कि इस्लामी कट्टरपंथी कुछ देर में उसी पाक स्थल को चारों ओर बंदूकों से घेर लेगा और हज यात्रा की इच्छा उनके जीवन की आखिरी इच्छा बन जाएगी

मक्का की 1979 की तस्वीर (साभार: NPR)

जी हाँ, अंग्रेजी कैलेंडर की 20 नवंबर 1979 तारीख और इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से साल 1400 का पहला दिन इतिहास के पन्नों में वो काला दिन है, जिसने पूरे विश्व के मुसलमानों को हिलाकर रख दिया था। इस दिन उनकी मक्का स्थित बड़ी अल हरम मस्जिद पर सैंकड़ों हथियारबंद घुस आए थे और सैंकड़ों ही लोगों को अपने कब्जे में ले लिया था। समय फज्र की नमाज का था और घड़ी में 5 बजकर 15 मिनट हुए थे। इमाम शेख मोहम्मद अल सुबाइल ने नमाज अदा करवाई ही थी कि देखा मक्का में चारों ओर सफेद रंग का कपड़ा पहने हथियार बंद लोग बंदूकों के साथ उनकी ओर बढ़ रहे थे। उनमें से जुहेमान अल ओतायबी ने माइक को लेते हुए अपने सभी समर्थकों को अपनी जगह तैनात होने को कहा। देखते ही देखते मस्जिद चारों ओर हथियारबंदों से घिर गई।

बताया जाता है कि ये ओतायबी सऊदी सेना का हिस्सा रह चुका था और इस्लामी शिक्षा देने वाले समूह से जुड़ा था। इसने मस्जिद कब्जा करके ऐलान किया, “मेहदी/माहदी आ गए हैं। अब अन्याय और अत्याचार से भरी इस धरती पर निष्पक्षता के साथ न्याय होगा।” इसके बाद मक्का का पूरा मस्जिद अल्लाह-हू-अकबर के नारों से गूँज गया और छतों पर स्नाइपर लेकर हमलावर खड़े हो गए। इसी बीच ओतायबी ने अपने साले और चरमपंथी नेता मोहम्मद अब्दुल्ला कहतानी की ओर इशारा किया और उसे असली मेहदी बताया। ओतायबी ने दावा किया कि सऊदी का साम्राज्य इस्लाम के रास्ते से भटक गया है। वो भ्रष्ट हो गए हैं और पश्चिमी देशों के इशारे पर चलने लगे हैं। 

घटना के समय सऊदी बिन लादेन ग्रुप मस्जिद में कुछ मरम्मत का काम कर रही थी। इससे पहले कि हमलावर टेलिफोन के तार काट पाते उनके एक कर्मचारी ने बाहर इस बात की सूचना पहुँचा दी और हर जगह हड़कंप मच गया। थोड़ी देर में हमलावर बाहरी देशों के कई बंधकों को बाहर निकालने लगे लेकिन सउदी के लोगों को बिना कोई रियायत दिए सबको अंदर बंद किए रखा।

तस्वीर साभार: बीबीसी

यहाँ बता दें कि मक्का पर ऐसा संकट तब छाया था जब अरब के क्राउन प्रिंस फहद ट्यूनेशिया में थे, नेशनल गार्ड के मुखिया प्रिंस अब्दुल्ला मोरक्को गए थे। तब, किंग खालिद ने मस्जिद को छुड़ाने की जिम्मेदारी प्रिंस सुलतान को सौंपी, प्रिंस नाएफ भी उनके साथ गए। उधर, हमले के खबर सुनते ही आंतरिक मंत्रालय के कुछ सिपाहियों ने मस्जिद को छुड़ाने का प्रयास किया लेकिन तब बंदूकधारियों ने कई पुलिसवालों को मारना शुरू कर दिया।

इन सब घटनाओं के बीच ये बात सबको पता चल चुकी थी कि मक्का के सबसे बड़े अल हरम मस्जिद पर कब्जा करने की साजिश बहुत समय से की जा रही थी। दिन, तारीख, समय सब तय था। हमलावरों के पास पहले से हथियार थे और भारी संख्या में खाने-पीने का सामान भी था। ये सारा सामान ताबूत में बंद कर करके मस्जिद के अंदर पहुँचाया गया था। वहीं हमलावरों का जत्था ट्रक में भर भर कर अंदर आया था।

मामला क्योंकि मजहब से जुड़ा था और विश्व का हर मुसलमान इस पर नजर बनाए हुआ था इसलिए सऊदी सरकार ने इस हमले को लेकर किसी भी तरह के प्रसारण पर पाबंदी लगा दी थी। किसी को नहीं पता था कि आखिर क्या हो रहा है। हर मुस्लिम सिर्फ अपने पाक स्थल की सलामती की दुआ पढ़ रहा था। उधर, सऊदी सरकार के सामने कशमकश ये थी कि वो सबसे पाक मस्जिद जहाँ काबा स्थित है उस पर हमला नहीं कर सकते थे, लेकिन अपने लोगों को और जन्नत का दरवाजा कहे जाने वाले पवित्र काबा को बचाना भी जरूरी था। सरकार ने हार नहीं मानी, उन्होंने मजहबी उलेमाओं से बात की और सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हुए। पुलिस पर हुए अटैक के बाद देश की आर्मी और नेशनल गार्ड भी मोर्चे पर आगे आए और पाकिस्तान-फ्रांस की मदद भी माँगी गई।

मक्का पर कब्जे करने के बाद कई लोगों ने किया सरेंडर

सेना की कार्रवाई में कई हथियारबंद मारे गए, मस्जिदों की मीनारों पर हमले हुए और इसी बीच मस्जिद के अंदर एंट्री लेने के लिए वहाँ की बिजली भी काट दी गई। नतीजन सेना अगले ही दिन मस्जिद के अंदर थी। सेना और हथियारबंद हमलावरों की ओर से लगातार गोलियाँ चलीं जिसमें 500 के करीब लोग घायल हुए। इन घायलों में खुद को मेहदी बताने वाला कहतानी भी था, जो मरे हुए लोगों के हथियार बाकी लोगों तक पहुँचा रहा था।

आगे बढ़ने से पहले बता दें कि इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार मेहदी को धरती का रक्षक माना गया है। बताया जाता है कि हदीस में इसका जिक्र है कि जब जब धरती पर जुल्म ज्यादा बढ़ जाएगा तब कयामत के दिन से पहले मेहदी धरती पर आएँगे। मेहदी ना कभी घायल हो सकते हैं और ना ही मर सकते हैं। मगर, सेना कार्रवाई में जब कहतानी घायल हुआ तो सब हमलावर ये मान ही नहीं रहे थे कि उनका मेहदी घायल हो सकता है। हर कोई इस बात से इंकार करने लगा लेकिन वाकई कहतानी को मस्जिद के दूसरे माले पर गोली लगी थी।

साभार: विकिपीडिया

मक्का के सबसे बड़े मस्जिद पर आए इस संकट के समय में फ्रांस ने सऊदी की खूब मदद की।  Groupe d’Intervention de la Gendarmerie Nationale (GIGN)! नामक दस्ते ने मोर्चा संभाला और इसके तीन कमांडो ने अपने अपने धर्म का बलिदान करते हुए इस्लाम कबूला। इसके बाद उन्हें मक्का में घुसने की इजाजत मिली और फिर फिर गैस के गोले अन्दर फेंके गए, अन्दर के चैम्बर में से हमलावरों को खुली जगह में आना पड़ा। दीवारों में ड्रिल कर के अन्दर अब बम फेंक दिए गए। फिर जाकर आगे की कार्रवाई में मस्जिद आजाद करवाया जा सका। ये लड़ाई 14 दिन तक जारी रही। बाद में जिंदा बचे ओतायबी और कहतानी समेत सभी हथियारबंदों ने समर्पण कर दिया। लेकिन सऊदी की सरकार ने 63 लोगों को गिरफ्तार करके 9 जनवरी 1980 को सार्वजनिक रूप से मौत दे दी थी। इस हमले में कथिततौर पर लगभग 1000 लोग मारे गए थे लेकिन आधिकारिक आँकड़ा सिर्फ 300+ लोगों के मरने का मिलता है।

कृषि कानून वापस होते ही महबूबा को दिखी आस, अनुच्छेद 370 वापस करने की माँग, सरकार पर संविधान के अपमान का लगाया आरोप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुक्रवार (19 नवंबर 2021) को तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान करने के बाद पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती को लग रहा है कि केंद्र सरकार 370 को भी वापस लेगी। महबूबा ने कृषि कानूनों पर केंद्र सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए इशारों में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल करने की माँग की।

महबूबा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए इस फैसले की टाइमिंग पर सवाल भी उठाया। उन्होंने इसे चुनावी घोषणा करार देते हुए कहा कि चुनाव नजदीक देखकर बीजेपी ने यह फैसला लिया है। पीडीपी प्रमुख इसे चुनावी मजबूरी के तौर पर देखती हैं। महबूबा ने ट्वीट किया, “कृषि कानूनों को निरस्त करने का निर्णय और माफी एक स्वागत योग्य कदम है, भले ही यह चुनावी मजबूरियों और चुनावों में हार के डर से उपजा हो। विडंबना यह है कि जहाँ भाजपा को वोट के लिए शेष भारत में लोगों को खुश करने की जरूरत है, वहीं कश्मीरियों को दंडित और अपमानित करना उसके प्रमुख वोट बैंक को संतुष्ट करता है।”

एक अन्य ट्वीट में महबूबा मुफ्ती ने भाजपा पर संविधान के अपमान का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, “जम्मू-कश्मीर को खंडित और कमजोर कर भारतीय संविधान का अपमान केवल उनके मतदाताओं को खुश करने के लिए किया गया था। मुझे उम्मीद है कि वे यहाँ भी सही करेंगे और अगस्त 2019 से जम्मू-कश्मीर में किए गए अवैध परिवर्तनों को उलटेंगे।”

फिलहाल पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती नजरबंद चल रही हैं। उनपर घाटी में माहौल को खराब करने की कोशिश करने का आरोप है। जब से आतंकियों के खिलाफ सेना ने ऑपरेशन क्लीन शुरू किया है, तब से महबूबा केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रामक हो गई हैं। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया था।

‘गौमूत्र पियो, गोबर का ज्वाइंट फूंको’ : कृषि कानून निरस्त होने की घोषणा पर झूमे कट्टरपंथी-वामपंथी, इस्तेमाल की ‘आतंकी’ वाली भाषा

किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से लाए गए तीन कृषि कानूनों को जब से मोदी सरकार ने वापिस लेने का ऐलान है, तभी से मोदी समर्थकों को ‘गौमूत्र’ और ‘गोबर’ का नाम ले लेकर निशाना बनाया जा रहा है। ट्रोलर्स, भाजपा समर्थकों को अपशब्द बोलने का एक मौका भी नहीं छोड़ना चाहते।

एक गालीबाज ट्रोल तो लिखता है, “साफतौर पर पीएम मोगी ने कृषि कानून वापस लेने पर जनता को संबोधित करते हुए गोबर का फेशियल करवाया होगा।”

अन्य ट्रोल (@KungfuPasmanda) ने कहा कि पार्टी के ऐसे यूटर्न पर उनके समर्थकों को गोबर खाने का आदी होना चाहिए। इसने लिखा, “ऐसे अवसरों पर गोबर खाने की प्रथा भक्तों के काम आती है। विरोध करने वालों तक खबर पहुँचने से पहले ही आईटी सेल ने कृषि कानूनों को निरस्त करने का बचाव करना शुरू कर दिया है।”

पत्रकार अमीश देवगन को गाली देते हुए साबिर हुसैन नाम के एक इस्लामी ने लिखा, “आज सुबह सबसे पहले गाय का पेशाब पिया?”

एक ट्रोल ने लिखा, “आज, अकेले गौमूत्र पर्याप्त नहीं होगा। वे गोबर के ज्वाइंट को भी फूँकेंगे।”

इसी प्रकार @Subhashitani1 की आईडी से टाइम्स नाऊ जर्नलिस्ट राहुल शिवशंकर को गौमूत्र पीने को कहा गया। इस ट्रोल ने उन्हें लिखा, “हवन करो, गौमूत्र टैंक भरके पियो, अभिषेक करो…कुछ तो करो।” दिसचस्प यह है कि राहुल ने अपने ट्वीट में पूछा था कि जैसे कृषि कानून वापस हो गए। क्या अब अनुच्छेद 370 और CAA भी वापिस होगा?

खालिस्तानी प्रभाव बढ़ने पर जब किसी ने चिंता जाहिर की तो एक ट्रोल आया और उसने कहा, “मोदी की प्रसिद्धि हमारी सोच से भी ज्यादा तेजी से नाले में जा रही है। यही सच है। तुम्हारा गौमूत्र से भरा दिमाग इसे नहीं झेलेगा। छोड़ो।”

गौमूत्र का उपहास: आतंकी की भाषा

बता दें कि ‘गौमूत्र’ के नाम पर हिंदुओं से दिखाई गई घृणा कोई नई नहीं है। इस हिंदूफोबिक टिप्पणी का इस्तेमाल साल 2019 में जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमलावर ने भी किया था। उसने एक वीडियो रिलीज की थी और उसमें वह कहता सुना गया था कि वो गाय का पेशाब पीने वाले लोगों को अल्लाह के नाम पर मारना चाहता है। इस आतंकी की पहचान आदिल अहमद डार के तौर पर हुई थी। उसने पुलवामा में भारतीय सुरक्षाबल पर हमला करने से एक साल पहले ही जैश-ए-मोहम्मद को ज्वाइन किया था।

कृषि कानून वापस लेने की घोषणा

आज 19 नवंबर 2021 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया। पीएम मोदी ने उन लाखों किसानों को धन्यवाद दिया जिन्होंने कृषि कानूनों की सराहना की, जिन्हें उचित विचार-विमर्श और ईमानदार इरादों के साथ पेश किया गया था। आज पीएम ने कहा कि सरकार ने किसानों के लाभ के लिए पारित किए गए 3 कृषि कानूनों को निरस्त करने का फैसला किया है।

पीएम मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि इस महीने के अंत तक मोदी सरकार तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की प्रक्रिया को पूरा कर लेगी। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे किसानों और बिचौलियों से इस गुरु परब पर अपने घरों को लौटने और अपना धरना बंद करने की अपील की। उन्होंने आगे कहा कि सरकार किसानों के हित के लिए कानून बनाने के लिए एक कमेटी बनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने उचित विचार-विमर्श के बाद कानून पेश किया था लेकिन शायद यह सरकार की कमी थी कि वे सभी किसानों को यह नहीं समझा सके कि कानून वास्तव में उनके लाभ में थे। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों ने इन कानूनों पर भी विचार किया था लेकिन यह मोदी सरकार थी जिसने उन्हें लागू किया था।

‘अंग्रेजों की तरह लक्ष्मीबाई के पास संसाधन होते तो इतिहास कुछ और होता’: झाँसी में पीएम मोदी ने सेना को सौंपे स्वदेशी लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर, ड्रोन और UAV

भारत ने डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए कदम बढ़ा दिया है और इसका एक नजारा शुक्रवार (19 नवंबर 2021) को उस वक्त देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झाँसी में पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर बनाए गए घातक हथियारों और हेलीकॉप्टरों को भारतीय सेना को सौंपा। इस दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि बुंदेलखंड डिफेंस कॉरिडोर का सारथी बनेगा।

पीएम मोदी ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर और डीआरडीओ द्वारा डिजाइन किए गए एवं भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा बनाए गए इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट सेना को सौंपा। इसके अलावा, उन्होंने भारतीय स्टार्टअप्स द्वारा बनाए गए ड्रोन और यूएवी को भी सेना को सौंपा।

अपने संबोधन को पीएम मोदी ने बुंदेलखंडी में शुरू किया। उन्होंने कहा, “झाँसी की इस शौर्य भूमि पर ऐसा कोई नहीं होगा, जिसके शरीर में बिजली न कौंध जाए। ऐसा कौन होगा, जिसके कानों में ‘मैं मेरी झाँसी नहीं दूँगी’ की गर्जना नहीं गूँजती हो। आज शौर्य और वीरता की पराकाष्ठा झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की जन्मदिन ही है। आज इस धरती पर एक नया, सशक्त और सामर्थ्यशाली भारत आकार ले रहा है।”

पीएम मोदी ने आगे कहा, “मैं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की जन्मभूमि वाराणसी का प्रतिनिधित्व करता हूँ। मैं इस धरती से झाँसी के एक और सपूत मेजर ध्यानचंद को नमन करता हूँ, जिन्होंने भारत के खेल जगत को दुनिया भर में पहचान दी। कुछ समय पहले ही हमारी सरकार ने देश के खेल रत्न पुरस्कार को मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखने की घोषणा की थी। झाँसी से देश के रक्षा क्षेत्र में एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। यहाँ 400 करोड़ रुपए की लागत से भारत डायनामिक्स लिमिटेड के एक नए प्लांट का शिलान्यास हुआ है। इससे यूपी डिफेंस कॉरिडोर और झाँसी को नई पहचान मिलेगी।”

प्रधानमंत्री ने बताया, “अब से झाँसी में एंटी टैंक मिसाइलों के उपकरण बनेंगे। इससे देश की सीमाओं को और अधिक सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। भारत में निर्मित लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर्स, ड्रोन्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम भी सेना को समर्पित किए गए। ये ऐसा हेलीकॉप्टर है, जो करीब 16,500 फीट की ऊँचाई पर उड़ान भर सकता है।” उन्होंने कहा कि पहले 65-70 प्रतिशत हथियार बाहर से खरीदे जाते थे। अब 65 प्रतिशत हथियार भारत में बन रहे हैं। इसके साथ ही 70 देशों को हथियार निर्यात भी किए जा रहे हैं।

अपने बचपन को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि वह भी कभी एनसीसी के कैडेट थे। उन्होंने यह भी बताया कि आज नेशनल वॉर मेमोरियल पर डिजिटल कियोस्क को भी लॉन्च किया जा रहा है। इससे मोबाइल ऐप के जरिए सभी देशवासी हमारे रियल हीरो को डिजिटल रूप से श्रद्धांजलि दे सकेंगे और उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ सकेंगे।

प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत कभी भी कोई लड़ाई शौर्य और वीरता की कमी के कारण नहीं हारा। अगर रानी लक्ष्मीबाई के पास अंग्रेजों के समान संसाधन होते तो शायद देश की आजादी का इतिहास आज कुछ और ही होता। अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि देश को सरदार पटेल के सपनों का भारत बनाएँ। अब तक हमारी पहचान दुनिया भर में हथियार के खरीददार देश के रूप में थी, लेकिन अब हमारा एक ही मंत्र है ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर वर्ल्ड।” इस मौके पर यूपी सरकार द्वारा अटल एकता पार्क और 600 मेगावॉट की क्षमता वाला सोलर पॉवर पार्क भी झाँसी को समर्पित किया गया।

इंदिरा का कानून, चिदंबरम ने लाया था विधेयक: BSF का अधिकार क्षेत्र बढ़ने से कॉन्ग्रेस बेचैन क्यों? तस्करी-घुसपैठ को नेताओं का संरक्षण

पंजाब की देखा-देखी पश्चिम बंगाल विधानसभा ने भी प्रस्ताव पारित करके ‘केंद्र सरकार की सीमा सुरक्षा बल के क्षेत्राधिकार बढ़ाने संबंधी अधिसूचना’ को खारिज कर दिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उपरोक्त अधिसूचना को वापस लेने की माँग करते हुए ऐसा न करने की स्थिति में स्वयं उसे खारिज करने की धमकी दी थी। पिछले दिनों पंजाब विधानसभा ने भी एक प्रस्ताव पारित करके 11 अक्टूबर, 2021 को केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना को ख़ारिज कर दिया था।

इस अधिसूचना द्वारा सीमावर्ती राज्यों- पंजाब, राजस्थान, गुजरात, असम, पश्चिम बंगाल आदि में सीमा सुरक्षा बल के ‘क्षेत्राधिकार’ को एकसमान किया गया है। पंजाब और पश्चिम बंगाल सरकारों का यह विरोध अपना उल्लू सीधा करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौते और केंद्र-राज्य संबंधों को तनावपूर्ण बनाने की स्वार्थप्रेरित राजनीति का नायाब उदाहरण हैं। यह विडम्बनापूर्ण ही है कि इन दोनों सरकारों ने कानून-व्यवस्था को राज्य सूची का विषय बताकर केंद्र सरकार के इस निर्णय को संघीय ढाँचे पर चोट बताया है।

हालाँकि, स्मरणीय तथ्य यह है कि सन् 2011 में यूपीए की सरकार में गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने इस आशय का विधेयक संसद में प्रस्तावित किया था। क्या तब कॉन्ग्रेस पार्टी को यह सुध-बुध न थी कि यह विषय राज्य-सूची में है और केंद्र द्वारा ऐसा कोई कदम उठाना संघीय ढांचे को क्षतिग्रस्त करेगा! विचारणीय है कि सीमा सुरक्षा बल अधिनियम-1969 इंदिरा गाँधी सरकार ने लागू किया था। क्या तब संघीय ढाँचे को ठेस नहीं पहुँची थी? दरअसल, तात्कालिक लाभ के लिए किए जा रहे इस विरोध से मुख्य विपक्षी दल कॉन्ग्रेस का छद्म चरित्र उजागर होता है।

विपक्ष द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा और क़ानून-व्यवस्था को गड्डमड्ड करके यह गफ़लत पैदा की जा रही है। यह अकारण नहीं है कि केंद्र सरकार के इस निर्णय का मुखर विरोध कॉन्ग्रेस और तृणमूल कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल और उनकी सरकारें ही कर रही हैं। विधानसभा में इस प्रकार का प्रस्ताव पारित करना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, व्यवस्थाओं और संस्थाओं का दुरुपयोग है। यह अत्यंत दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य विधायिका और कार्यपालिका केंद्रीय विधायिका और कार्यपालिका से टकराव पर उतारू हैं।

यह अधिसूचना जारी करने से पहले गृहमंत्री अमित शाह ने संबंधित राज्य सरकारों से इस विषय पर चर्चा की थी। इसलिए पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी शुरू में खामोश थे। जब आम आदमी पार्टी और अकाली दल जैसे विपक्षी दलों ने उन पर ‘आधे से अधिक पंजाब को मोदी सरकार को देने’ और ‘पंजाब के हितों को गिरवी रखने’ जैसे आरोप लगाए, तब उन्होंने इस मुद्दे के ‘राजनीतिकरण’ से घबराकर सर्वदलीय बैठक और विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इस अधिसूचना को ख़ारिज करने की चाल चली।

पंजाब में इस मुद्दे के ‘राजनीतिकरण’ का एक कारण उसका आंतरिक सत्ता-संघर्ष भी है। ममता भला मोदी के विरोध का अवसर हाथ से कैसे जाने दे सकती हैं! कॉन्ग्रेसियों की देखादेखी वे भी सक्रिय हो गईं। इससे पहले भी वे एकाधिक अवसरों पर केंद्र सरकार से टकरा चुकी हैं। विधानसभा चुनाव में जीत के बाद TMC के कारिंदों ने विपक्षी दलों खासतौर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं पर जबर्दस्त कहर बरपाया। सरकार के इशारे पर पुलिस भी तमाशबीन बनी रही।

जब केंद्र ने बंगाल में राजनीतिक हिंसा की सीबीआई जाँच की पहल की तो राज्य सरकार ने सीबीआई जाँच की ‘सामान्य सहमति’ को खारिज कर दिया। उसकी देखादेखी राजस्थान, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, झारखंड, पंजाब आदि विपक्ष शासित राज्यों ने भी ऐसा ही किया। इसी तरह ममता सरकार ने पेगासस जासूसी प्रकरण की इकतरफा न्यायिक जाँच शुरू करा दी। गौरतलब है कि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और तेजतर्रार और ईमानदार पुलिस अधिकारी रहे सीमा सुरक्षा बल के पूर्व निदेशक प्रकाश सिंह ने इस अधिसूचना को ‘आवश्यक और अपरिहार्य कदम’ बताते हुए विपक्षी दलों द्वारा इसके विरोध को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा पर राजनीति’ कहा है।

विपक्ष द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा और क़ानून-व्यवस्था को गड्डमड्ड करके यह गफ़लत पैदा की जा रही है। यह अकारण नहीं है कि केंद्र सरकार के इस निर्णय का मुखर विरोध कॉन्ग्रेस और TMC जैसे विपक्षी दल और उनकी सरकारें ही कर रही हैं। पिछले लगभग दो दशक से भारत में नशाखोरी बढ़ती जा रही है। पंजाब के युवा सबसे बड़ी संख्या में इसकी गिरफ़्त में हैं। ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फिल्मों में इस समस्या की भयावहता दर्शायी गई है। पड़ोसी देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मादक पदार्थों की तस्करी इसकी बड़ी वजह है।

पंजाब तस्करी का सबसे सुगम रास्ता रहा है। हालाँकि, जम्मू-कश्मीर, गुजरात, राजस्थान आदि प्रदेश भी ‘’रिस्क जोन’ में हैं। संसद द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 और 35 ए को निष्प्रभावी किये जाने से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण विलय सम्पन्न हो गया है। भारत सरकार की इस निर्णायक पहल से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। अफगानिस्तान में मध्यकालीन मानसिकता वाले तालिबान के शासन शुरू होने से उसके हौसले बुलन्द हैं। पाकिस्तान और तालिबान का याराना जगजाहिर है।

पाकिस्तान ने मरणासन्न आतंकवाद को संजीवनी देने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब वह सुरक्षा बलों की जगह सामान्य (प्रवासी) नागरिकों की ‘लक्षित हत्या’ द्वारा दहशतगर्दी और अस्थिरता फैलाना चाहता है। इस लक्ष्य को अंजाम देने के लिए उसने मादक पदार्थों, हथियारों और नकली नोटों की तस्करी बढ़ा दी है। तस्करी के लिए वह 50 किमी तक की क्षमता वाले ड्रोनों का प्रयोग कर रहा है। ये ड्रोन अत्यंत विकसित और अधुनातन चीनी तकनीक से लैस हैं।

मादक पदार्थों, हथियारों और नकली नोटों की पाकिस्तान संचालित तस्करी को रोका जाना अत्यंत आवश्यक है। यह तस्करी देश की युवा पीढ़ी के भविष्य और राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। पश्चिम बंगाल और असम जैसे प्रदेशों में म्यांमार और बांग्लादेश से भारी तादात में घुसपैठ की घटनाएँ होती हैं। तस्करी और घुसपैठ को अनेक राजनेताओं और कई राज्य सरकारों का संरक्षण मिलता रहा है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू पूर्ववर्ती बादल सरकार पर तस्करी को प्रश्रय देने के आरोप लगाते रहे हैं।

मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने विधान सभा में उपरोक्त प्रस्तावों पर बोलते हुए पूर्व वित्त मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया को तस्करों का सरगना अकारण नहीं बताया। पंजाब की आम जनता की यही धारणा है। मजीठिया पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर के भाई और अकाली दल (बादल) अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के साले हैं। पुलिस राज्य सरकार के अधीन होती है।इसलिए सीमा पर होने वाली अवैध गतिविधियों को रोकने में उसे स्थानीय दबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ता है।

जाने-अनजाने उसके हाथ बँधे रहते हैं और आँखें मिंची रहती हैं। राजनीतिक संरक्षण में देशी-विदेशी लोग खुला खेल खेलते हैं। ऐसी स्थिति में सीमा सुरक्षा बल के क्षेत्राधिकार को बढ़ाया जाना अपरिहार्य था। केंद्र सरकार द्वारा जारी इस अधिसूचना ने सीमा सुरक्षा बल के क्षेत्राधिकार में एकरूपता भी स्थापित की है। पहले पंजाब, असम, पश्चिम बंगाल में अंतरराष्ट्रीय सीमा से 15 किमी तक, राजस्थान में 50 किमी तक, गुजरात में 80 किमी तक और जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में पूरे भू-भाग में सीमा सुरक्षा बल का अधिकार-क्षेत्र था। अब पंजाब, असम, पश्चिम बंगाल, गुजरात और राजस्थान में सीमा सुरक्षा बल के क्षेत्राधिकार को 50 किमी करते हुए एक समान किया गया है।

जबकि, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में उसे यथावत रखा गया है। सीमा सुरक्षा बल अधिनियम-1969 इंदिरा गाँधी सरकार ने लागू किया था। क्या तब संघीय ढाँचे को ठेस नहीं पहुँची थी? इस अधिनियम के अनुभाग 139 के तहत सीमा सुरक्षा बल अपने क्षेत्राधिकार में केवल तलाशी, जब्ती और गिरफ़्तारी कर सकते हैं। मुकदमा दर्ज करने और चलाने का अधिकार राज्य पुलिस को ही है। सीमा सुरक्षा बल के उपरोक्त क्षेत्राधिकार में भी कानून-व्यवस्था राज्य पुलिस के नियंत्रण में ही रहती है।

इसलिए पुलिस के अधिकार कम होने या उसके अधिकार-क्षेत्र के अतिक्रमण की आशंका और आरोप निराधार हैं। सुरक्षा बल राज्य पुलिस का सहयोग ही करेंगे। इससे सीमा पार से होने वाली अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगेगा। केंद्र सरकार की इस पहल से राज्य पुलिस पर काम का बोझ थोड़ा कम होगा और उसकी कार्य-क्षमता बढ़ेगी। कानून-व्यवस्था पर पूरा ध्यान केन्द्रित करते हुए उसे राज्य में अमन-चैन कायम करने में सहूलियत होगी। शांति कायम रहेगी।

विपक्षी दलों को राजनीतिक रोटी सेंकने और चुनावी मौसम में वोट बैंक साधने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पर समझौता करने और संविधान और संसद की अवमानना से बाज आना चाहिए। उन्हें लोगों का विश्वास जीतने और उनका वोट पाने के लिए सकारात्मक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। केंद्र को भी एहतियात बरतते हुए संबंधित राज्य सरकारों और हितधारकों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ना चाहिए ताकि अनावश्यक केंद्र-राज्य टकराव और भ्रम-दुष्प्रचार की राजनीति से बचा जा सके।

(प्रोफेसर रसाल सिंह लेखक जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता, छात्र कल्याण हैंI)

‘मैंने भाईचारे में कह दिया था…आखिरी फैसला कमेटी ही करेगी’ : गुरुद्वारे में ‘नमाज’ की पेशकश पर सिखों में ही दो फाड़

गुरुग्राम में नमाज को लेकर हो रहे बवाल पर कई तरह की बातें सामने आ रही हैं। जैसे पिछले दिनों खबर आई थी कि गुरुद्वारे में मुस्लिमों को नमाज पढ़ने का ऑफर दिया गया है लेकिन, बाद में पता चला कि जुमे की नमाज से ठीक एक दिन पहले गुरु पर्व (प्रकाश परब) का हवाला देकर इस पर रोक लगा दी गई। दूसरी ओर ये भी पता चला कि कुछ सिख समुदाय के लोग ही मुस्लिमों को गुरुद्वारे में जगह देने की बात का विरोध कर रहे थे।

अब तरह-तरह की बातों के बीच ऑपइंडिया ने सच्चाई जानने के लिए समिति अध्यक्ष शेरदिल सिंह सिद्धू से सीधी बात की। इस बातचीत मे पता चला कि मुस्लिमों को दिया गया ऑफर एक व्यक्ति विशेष यानी सिर्फ उनका था न कि पूरी गुरुद्वारा कमेटी का। अन्य कुछ सिख तो इस फैसले को भाईचारा खराब करने वाली बात भी कह रहे हैं।

ऑपइंडिया और शेरदिल सिंह की बातचीत

गुरुद्वारे में मुस्लिमों को नमाज पढ़ने का ऑफर देने वाले गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा, सदर बाजार के अध्यक्ष शेरदिल सिंह सिद्धू से जब ऑपइंडिया पत्रकार राहुल पांडे ने बात की तो उन्होंने बताया कि वो ऑफर भाईचारे में दिया गया था लेकिन गुरुद्वारे में नमाज होगी या नहीं, इसका फैसला कमेटी बैठा कर ही किया जाएगा। शेरदिल सिंह ने कहा, 

“मेरा बयान भाईचारे का बयान था। अगर वो अलगे शुक्रवार को जगह माँगते हैं तो उस पर कमेटी का फैसला अगले के अगले शुक्रवार को आएगा।  बाकी मुसलमान भाइयों को गुरुद्वारे में नमाज़ पढ़नी भी नहीं है। वो तो आज भी बोल कर गए हैं कि हमने तो सिखों के दिल में नमाज़ पढ़ी है।”

शेरदिल सिंह ने सवालों के जवाब देते हुए बताया कि गुरुद्वारे में इससे पहले नमाज नहीं पढ़ी गई है। जब उनसे ये पूछा गया कि उनके बयान का विरोध उनके ही समुदाय के लोग कर रहे हैं। तो वह बोले, “मैंने कहा भर है कि आ कर पढ़ लेना। लेकिन इस पर अंतिम निर्णय कमेटी और संगत ही बैठ कर लेगी।”

शेरदिल के इस जवाब पर उनसे पूछा गया कि अगर नमाज के लिए गुरुद्वारा माँग ही लिया गया तो क्या इस माँग पर विचार होगा? इस पर उन्होंने कहा कि वो बिलकुल विचार करेंगे। मीडिया तो कई बातों को बेवजह ही तोड़-मरोड़ कर पेश करती है।

कमेटी अध्यक्ष कहते हैं कि मुस्लिम गुरुद्वारे में नमाज नहीं पढ़ना चाहते हैं। अगर चाहते तो आज भी आ गए होते। इस जवाब को सुन जब शेरदिल से जब पूछा गया कि क्या अगर आज आ गए होते तो गुरुद्वारा इसके लिए तैयार था? तो उन्होंने बताया कि गुरुद्वारा कमेटी इसके लिए रेडी नहीं थी। 

उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक मुस्लिमों द्वारा गुरुद्वारा नमाज पढ़ने के लिए नहीं माँगा गया है। अगर ऐसा हुआ तो कमेटी में कई लोग हैं। सब मिलकर फैसला लेंगे और वहीं आखिर फैसला होगा।

शेरदिल सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में संदेश दिया कि गुरुद्वारा तो गुरु का घर है।  यहाँ मत्था टेकने  के लिए हिंदू भी आ सकते है और मुसलमान भी। अगर 8 – 10 मुसलमान हमारे गुरुद्वारे में आ कर मत्था टेक रहे हों और हमारे शबद कीर्तन सुन रहे हों तो उनको कोई कहे कि देखो वो नमाज़ पढ़ रहे हैं तो ये गलत है।”

गुरुद्वारे में नमाज पढ़ने की पेशकश का अन्य जगह विरोध

यहाँ बता दें कि इससे पहले गुरुद्वारा श्री गुरु गोविंद सिंह सभा मदनपुरी के अध्यक्ष जवाहर सिंह ने कहा था कि गुरुद्वारे में कोई  भी गुरबानी में भाग ले सकता है, मत्था टेक सकता है और लंगर में शामिल हो सकता है। इसके अलावा यहाँ दूसरा कोई कार्य ठीक नहीं है। यदि मुस्लिमों को नमाज पढ़नी है तो उसकी जगह मस्जिद है। यदि मुस्लिम समुदाय गुरुद्वारे में नमाज पढ़ेंगे तो इससे माहौल सुधरने की बजाय बिगड़ जाएगा।

सिख समुदाय से पहले मालूम हो कि हिंदू संगठन लगातार मुस्लिमों द्वारा खुले में नमाज पढ़ने का विरोध कर रहे थे। जब गुरुद्वारे से उन्हें जगह की पेशकश हुई तो भी उन्होंने ये सवाल किया कि आखिर मुस्लिम मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते। गुरुग्राम में सेक्टर 47, सेक्टर 12 और अन्य जगहों पर स्थानीय निवासियों द्वारा विरोध-प्रदर्शन कभी भी नमाज़ से इनकार करने या मुस्लिमों को नमाज़ पढ़ने से रोकने को लेकर नहीं था। विरोध-प्रदर्शन सार्वजनिक स्थानों जैसे पार्कों और सड़कों को नमाज के लिए ब्लॉक किए जाने और सुरक्षा, विशेषकर महिलाओं की चिंताओं को लेकर था।

इसके बावजूद सेक्टर 12 के अक्षय यादव जैसे सेकुलर लोगों ने आगे आकर मुस्लिमों को नमाज के लिए अपने गैरेज की जगह ऑफर की, जहाँ बताया जा रहा है कि आज नमाज भी पढ़ी भी गई। ऐसे ही एक अन्य वीडियो और सामने आई है। इसमें मोहम्मद आदिब और अल्ताफ अहमद गुड़गांव नागरिक एकता मंच के सदस्यों के साथ गुरुद्वारा कमेटी को गुरु पर्व की बधाई देते दिख रहे हैं। दोनों वीडियो कारवाँ-ए-मोहब्बत के ट्विटर हैंडल पर शेयर हुई हैं।

सेक्युलर मुखौटे वाला खालिस्तानी आंदोलन, जहाँ भीड़तंत्र के सामने बेबस रही पुलिस: ‘ठेकेदारों’ से निपटने और कम्युनिकेशन पर सोचे केंद्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक से शुक्रवार (19 नवंबर, 2021) को सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी की जयंती पर तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। उनके इस फैसले ने पक्ष और विपक्ष, दोनों को हैरानी में डाल दिया। पिछले एक वर्ष से दिल्ली की सीमाओं को घेर कर बैठे किसान प्रदर्शनकारियों और उनके नेताओं को अपने करियर पर ग्रहण लगता नजर आया, तो विपक्ष के कुछ नेताओं को ऐसा लगा कि अचानक से पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका राजनीतिक आधार घिसक सा गया है।

राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “आज मैं आपको, पूरे देश को, ये बताने आया हूँ कि हमने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में, हम इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे। हमारी सरकार, किसानों के कल्याण के लिए, खासकर छोटे किसानों के कल्याण के लिए, देश के कृषि जगत के हित में, देश के हित में, गाँव गरीब के उज्जवल भविष्य के लिए, पूरी सत्य निष्ठा से, किसानों के प्रति समर्पण भाव से, नेक नीयत से ये कानून लेकर आई थी।”

उन्होंने कहा कि इन सबके बावजूद ‘इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से शुद्ध, किसानों के हित की बात’, हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “कृषि अर्थशास्त्रियों ने, वैज्ञानिकों ने, प्रगतिशील किसानों ने भी उन्हें कृषि कानूनों के महत्व को समझाने का भरपूर प्रयास किया। बरसों से ये माँग देश के किसान, देश के कृषि विशेषज्ञ, देश के किसान संगठन लगातार कर रहे थे। पहले भी कई सरकारों ने इस पर मंथन किया था।”

लेकिन, इस दौरान इस पर भी मंथन ज़रूरी है कि जिस तरह ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर 26 जनवरी, 2021 को दिल्ली में 300 पुलिसकर्मियों को घायल किया गया, लखबीर सिंह के हाथ-पाँव काट कर शव को टाँग दिया गया, मुकेश नामक किसान को ज़िंदा जला दिया गया और पश्चिम बंगाल की एक महिला का बलात्कार हुआ – क्या ये सब उस ‘आंदोलन’ का हिस्सा नहीं था? राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, दर्शन पाल, गुरनाम सिंह चढूनी और हन्नान मोल्लाह क्या सच में ‘किसान नेता’ ही हैं?

खालिस्तानी ताकतों ने पहना सेक्युलर मुखौटा, ‘अलगाववाद’ का भय भी दिखा दिया

सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस आंदोलन को जिस तरह से कृषि के नाम पर सिख कट्टरवाद और खालिस्तानी अलगाववाद से जोड़ा गया, वो एक बहुत बड़ी साजिश थी। अचानक से लंदन में सिखों के अलग मुल्क के ली रेफरेंडम होने लगा, प्रतिबंधित संगठन SFJ का पन्नू वीडियोज जारी करने लगा, कनाडा के नेताओं ने इस आंदोलन का समर्थन शुरू कर दिया और ISI ने पंजाब में इस आंदोलन को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी – इस बात ने ख़ुफ़िया एजेंसियों तक के कान खड़े कर दिए थे।

ये देखने वाली बात रही कि खालिस्तान समर्थक आंदोलन होने के बावजूद ये ‘सेक्युलर’ बना रहा। सिखों के गुरुओं पर प्रदर्शनी लगाई गई, जिसमें उनके बलिदान को दिखाया जा रहा था। मजे की बात तो ये कि मुस्लिम आंदोलनकारी भी उसमें शामिल हो रहे थे, ताकि सभी मजहबों की एकता दिखाई जा सके। सिख गुरुओं के साथ अत्याचार करने वाले मुस्लिम ही थे। लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहरा दिया गया, तलवार से पुलिसकर्मियों पर हमले हुए – लेकिन आंदोलन सेक्युलर बना रहा।

एक ऐसा ‘सेक्युलर’ आंदोलन, जिसमें सिखों के साथ-साथ ‘जाट प्राइड’ को भी आगे किया गया। 26 जनवरी की घटना के बाद आंदोलन लगभग ख़त्म सा हो गया था, लेकिन किसी तरह राकेश टिकैत ने रो-धो कर वीडियो वायरल करवाया और उसे पुनर्जीवित कर दिया। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के बीच उनके जाति-समुदाय को लेकर मोदी सरकार के विरुद्ध घृणा फैलाई गई। इसे ‘सिख बनाम मोदी’ और ‘जाट बनाम मोदी’ कर दिया गया, लेकिन हाँ… ये ‘सेक्युलर’ बना रहा।

सरकार को लोगों तक पहुँचने में नाकामी मिली, क्या होना चाहिए था

आगे से कोई भी सुधारवादी कानून बनाए जाते हैं तो सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी अपने हर एक कार्यकर्ता को समझाए कि आखिर क्या होने जा रहा है और क्यों। इसके क्या फायदे हैं और इसके बिना क्या समस्याएँ आ रही हैं – इसे लोगों को समझाना दुष्कर कार्य नहीं है। बशर्ते, आपके संगठन के नेता इसमें लगाए जाएँ। पोस्टर-बैनर, बुकलेट और ऑनलाइन मैटेरियल्स पहले से छपवाए जाएँ। कार्यकर्ताओं को बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाए कि क्या होने जा रहा है।

इसके बाद दूसरा चरण आता है विरोध का। विरोध करने वाले निकलेंगे। GST-नोटबंदी के समय भी आए थे, CAA-NRC के लिए भी निकले थे और कृषि कानूनों पर हमने अभी देखा ही। जैसे ही विरोध शुरू हो, भाजपा को विरोध के हर के पॉइंट का जवाब देते हुए पुस्तिकाएँ और ऑनलाइन मैटेरियल्स छपवाने चाहिए और अपने कार्यकर्ताओं को लोगों को समझाने में लगाना चाहिए। ध्यान रहे, सब कुछ सरल-सपाट शब्दों में हो। भाजपा अपने नेताओं/प्रवक्ताओं को टीवी और अख़बारों के माध्यम से लगा कर जनता के मन में अपनी बात बिठा सकती है।

इस पर इसीलिए ध्यान देना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि भारत के सबसे लोकप्रिय नेता जिन्हें सुनने के लिए लाखों की भीड़ जुटती है और उनके सम्बोधन के लिए लोग टीवी खोल कर पहले से बैठे रहते हैं – उन्होंने इसे अपनी विफलता का कारण माना है। ‘किसानों को हम समझा नहीं पाए’ – उन्होंने स्पष्ट कहा है। समझाने के लिए मीडिया, इंटरनेट और जमीनी कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल करने के लिए पार्टी पहले से तैयार हो। सरकार के मंत्री, PIB-दूरदर्शन जैसी सरकारी मीडिया और रेडियो के जरिए गरीबों तक एक-एक बात पहले ही पहुँचाई जाए चाहिए थे। दिन में 10 बार ऐसा किया जाना चाहिए था।

ऐसे फैसलों से पहले भाजपा कम से कम उन क्षेत्रों के नेताओं/कार्यकर्ताओं की राय तो बृहद स्तर पर ले, जहाँ इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ना है। या फिर जहाँ इसका ज्यादा विरोध हो रहा हो। जब छोटे से छोटे कानून पर ये रणनीतियाँ अपनाई जाएँगी, तब विरोध करने वाले भी निकलने से पहले 10 बार सोचेंगे। विद्यालओं में शिक्षकों के माध्यम से छात्रों को समझाया जा सकता है, विश्वविद्यालयों में नाटिकाओं के जरिए ये कार्य ABVP वाले कर सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर देशहित के कार्य में RSS कार्यकर्ताओं की मदद भी ली जा सकती है।

हिंसक भीड़ से निपटने के लिए सुरक्षा व्यवस्था पहले से कड़ी की जाए

हरियाणा में भाजपा की सरकार है और दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत आती है। इसके बावजूद लाखों लोग पंजाब से हरियाणा को पार कर के दिल्ली सीमा पर आ जमते हैं। जिस उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है, वहाँ से लगी दिल्ली की सीमाओं पर भी डेरा डाल दिया जाता है। पुलिस बैरिकेडिंग लगाती रह जाती है। 300 पुलिसकर्मी घायल होते हैं, उनके परिवार वाले प्रदर्शन करते हैं – लेकिन सड़कों पर कीलें ठोकने और तलवार से बचने के लिए उनके प्रशिक्षण को भी किसान नेता अत्याचार बता कर पेश करने में कामयाब हो जाते हैं। कैसे?

केंद्र सरकार को इस पर मंथन करने की ज़रूरत है कि आखिर दिल्ली की सीमाओं और सार्वजनिक सड़कों पर चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के अस्थायी टेंट-तम्बुओं ने लाखों गाड़ियों का रास्ता बदल दिया और आसपास के गाँव वालों और रोजमर्रा के काम करने जाने वालों ने उनके विरोध में सामानांतर प्रदर्शन क्यों नहीं किया? ऐसा इसीलिए, क्योंकि उन्हें पता था कि जो दरियादिली पुलिस किसान आंदोलनकारियों के साथ दिखा रही है, वो उनके साथ बिलकुल नहीं दिखाएगी।

ये ढीठपन आखिर आया कहाँ से? कोरोना के सभी दिशानिर्देशों का पालन आम लोग करते रह गए, लेकिन किसान प्रदर्शनकारियों पर ऐसा लग रहा था कि देश का कोई कानून लागू ही नहीं होता है। लाल किला हिंसा के अनगिनत वीडियोज मौजूद थे, लेकिन दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई। कम से कम हिंसक भीड़ का नेतृत्व कर रहे लोगों पर तो कार्रवाई होती। सत्ता की हनक न सही, कानून का भय तो होना चाहिए न? या फिर इन आंदोलनकारियों का विरोध करने वालों को भी यही छूट दे दी जाती, ताकि वो भी सड़क पर उतर आएँ?

बात ये है कि भीड़तंत्र से निपटने के लिए पुलिस-प्रशासन मजबूत दिखे नहीं, मजबूत हो। एक कदम आगे बढ़ाने पर अगर कड़ी चेतावनी दी जाएगी और दूसरे कदम पर कार्रवाई होगी तो तीसरा कदम अधिकतर लोग नहीं बढ़ाएँगे और हिंसा की संभावना कम रहेगी। हिंसा करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी तो आगे इस तरह के उदाहरण नहीं सेट होगा। वरना अगर जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 वापस बहाल करने के लिए आंदोलन खड़ा हो जाए तो क्या देश की सुरक्षा पर आफत खड़ा कर के कोई भी सरकार को ब्लैकमेल कर लेगा?

ठेकदारों के प्रति सरकार का नरम रुख उन्हें और ढीठ बनाता गया

8 बार सांसद रहे वामपंथी नेता हन्नान मोल्लाह को मीडिया ऐसे दिखाता रहा, जैसे वो कोई गरीब आदमी हों। राकेश टिकैत के भाई का स्टिंग होने के बावजूद वो अपनी शर्तों पर सरकार को नचाते रहे। लखीमपुर खीरी की घटना में उनकी मदद की ज़रूरत पड़ गई। योगेंद्र यादव आंदोलन के सूत्रधार बने रहे, जबकि गलत सूचनाएँ फैलाने का उनका लंबा इतिहास रहा है। दर्शन पाल हों या गुरनाम सिंह चढूनी, सब पर कई आरोप लगे लेकिन सरकार ने कार्रवाई नहीं की।

केंद्र सरकार में कई ऐसे नेता हैं, जो कृषि की पृष्ठभूमि से आए हैं और जिनकी जमीन पर अच्छी पकड़ है। इसके बावजूद ये ‘ठेकेदार’ किसानों में गलत सूचनाएँ फैलाने में कामयाब रहे और हिंसा भड़का-भड़का कर भी बचते रहे और विपक्ष के सभी दलों का समर्थन पाते रहे, तो इसमें यही कहा जाएगा कि शुरुआत में ही उन्हें खुला छोड़ कर गलती हुई। आखिर कुछ ही ‘ठेकेदार’ हर विरोध प्रदर्शन के समय क्यों निकलते हैं? योगेंद्र यादव तो CAA विरोधी आन्दोलनों के दौरान भी आगे-आगे थे।

हाँ, किसी को जबरदस्ती जेल में डाल कर जनता की नजर में ‘शहीद’ बनने का मौका नहीं दिया जा सकता, ताकि वो बाद में बाहर निकल कर अपनी राजनीति और चमकाए और फिर उससे भी बड़ा नेता बन बैठे। लेकिन हाँ, सरकार को कोई ऐसा तरीका ईजाद करना पड़ेगा कि इन ‘ठेकेदारों’ को उनके कृत्यों के लिए दोषी ठहराया जा सके और हिंसा भड़काने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हो। वैसे भी राकेश टिकैत कह रहे हैं कि अब किसानों को MSP पर कानून चाहिए, वरना आंदोलन ख़त्म नहीं होगा।