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केरल में BJP कार्यकर्ता की चाकू से गोदकर हत्या: कट्टर इस्लामिक संगठन PFI-SDPI पर संदेह, सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश

केरल के त्रिशूर जिले में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के एक कार्यकर्ता की चाकू से गोदकर हत्या करने का मामला प्रकाश में आया है। मृतक की पहचान 35 वर्षीय कोप्पारा बीजू के रूप में हुई है। चावक्कड़ पुलिस के मुताबिक, करीब दो महीने पहले ही बीजू मध्य-पूर्व से लौटा था और मनाथला नागायक्षी मंदिर के पास पालतू कबूतर बेचने का काम करता था।

रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार की सुबह बीजू की अस्थायी दुकान के पास सजीवन नाम के व्यक्ति का लोगों के एक गिरोह से झगड़ा हो गया था। आशंका जताई जा रही है कि इसी गिरोह ने बीजू को सजीवन समझकर चाकू मार दिया। पुलिस ने कहा कि जाँच के लिए वह एरिया की सीसीटीवी फुटेज निकालेगी। वहीं, चावक्कड़ में पुलिस की एक टुकड़ी कैंप कर रही है। भाजपा ने बीजू की मौत के विरोध में सोमवार को चावक्कड़ नगरपालिका और कडप्पुरम पंचायत में हड़ताल का आह्वान किया था।

ऑर्गनाइजर ने बताया है कि कट्टर इस्लामी संगठन पीएफआई और उसके राजनीतिक संगठन एसडीपीआई के कार्यकर्ताओं ने 31 अक्टूबर को त्रिशूर जिले के मणथला के चावक्कड़ में बीजू की हत्या की थी। जिस इलाके में इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया गया, वहाँ किसी भी तरह का राजनैतिक या धार्मिक तनाव नहीं था। ऐसे में इस घटना को इस्लामी ताकतों द्वारा साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

मृतक बीजू की मौत चाकू लगने से हुई थी और वह चावक्कड़ इलाके के बीजेपी बूथ अध्यक्ष का बेटा है। वह पहले खाड़ी देश में काम करता था और पाँच महीने पहले ही लौटा था। कुछ रिपोर्ट से ये भी पता चला है कि हमलावर CPIM छोड़कर हाल ही में SDPI में शामिल हुए थे।

इस बीच असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) पर मुकदमा चलाने की अपनी सरकार की बात दोहराई। मीडिया से बात करते हुए सीएम सरमा ने कहा, “हम PFI और CFI पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं। असम पुलिस ने हिंसक एंटी-सीएए विरोध से लेकर गोरुखुटी बेदखली हिंसा तक कई मामलों की जाँच की है और दोनों संगठनों के लिंक पाए हैं। हमने अपना डोजियर केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दिया है और उम्मीद है कि मंत्रालय जल्द ही कोई फैसला लेगा।”

PM मोदी की पहल पर कनाडा से आई माँ अन्नपूर्णा की मूर्ति, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में होगी स्थापित, 100 साल पहले हुई थी चोरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पहल पर अब करीब 100 साल के बाद एक बार फिर से भक्तों को माँ अन्नपूर्णा देवी के दर्शन संभव हो सकेंगे। करीब 100 साल पहले स्मगल करके कनाडा ले जाई गई देवी की मूर्ति को भारत वापस लाया गया है। जिसे अब मूर्ति के वास्तविक स्थान वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित किया जाएगा।

माँ अन्नपूर्णा देवी की मूर्ति बीते 15 अक्टूबर को देश वापस लाई गई थी। पिछले साल नवंबर में ही पीएम नरेंद्र मोदी ने अन्नपूर्णा देवी की मूर्ति को देश में वापस लाए जाने की घोषणा की थी। पीएम मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात के दौरान कहा था कि इसे चुरा लिया गया था और 1913 के आसपास देश से बाहर ले जाया गया। इस मामले में मंगलवार (2 अक्टूबर 2021) को केंद्रीय संस्कृति मंत्री जी किशन रेड्डी ने कनाडा के ओटावा से प्राप्त माँ अन्नपूर्णा की मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को मिली है और इसे वाराणसी ले जाया जाएगा।

वहीं CM योगी ने कहा, “100 साल पहले काशी से माँ अन्नपूर्णा की मूर्ति चोरी हुई थी। यहाँ से यह मूर्ति अलग-अलग हाथों में पहुँचते-पहुँचते कनाडा के विश्वविद्यालय में पहुँची थी। अब यह मूर्ति उत्तर प्रदेश को 11 नवंबर को दिल्ली में प्राप्त होगी।”

संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, 1976 से 55 मूर्तियों को भारत लौटाया गया था, उनमें से लगभग 75 प्रतिशत 2014-2021 के दौरान प्राप्त की गई थीं। इसमें से 2014 के बाद 42 मूर्तियों को वापस देश में लाया गया था। मंत्रालय ने कहा है कि माँ अन्नपूर्णा की मूर्ति को पहले 11 नवंबर को अलीगढ़ ले जाया जाएगा, फिर कन्नौज और 14 नवंबर को ये अयोध्या पहुँचेगी। इसके बाद 15 नवंबर को अपने अंतिम गंतव्य वाराणसी पहुँचेगी, जहाँ इसे अनुष्ठानों के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित किया जाएगा।

मंत्रालय ने कहा, “संस्कृति मंत्रालय उन प्राचीन वस्तुओं को वापस लाने के लिए विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर काम कर रहा है, जिनकी विरासत का महत्व है और जिनका स्थानीय महत्व है। जिन लोगों से उनकी पैतृक विरासत छीन ली गई है उन लोगों में विश्वास फिर से स्थापित किया जाएगा।”

मैकेंजी आर्ट गैलरी में रखी गई थी मूर्ति

देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति को 100 साल पहले जब स्मगल करके कनाडा ले जाया गया था तो उसके बाद से यह रेजिना विश्वविद्यालय की मैकेंजी आर्ट गैलरी में रखी गई थी।

भारतीय उच्चायोग की एक विज्ञप्ति के अनुसार, विश्वविद्यालय ने मूर्ति को वापस करने का फैसला किया है। यह पता चला है कि मूर्ति को ‘संदिग्ध परिस्थितियों में हासिल किया गया था और नैतिक अधिग्रहण के मौजूदा सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। प्रतिमा को विश्वविद्यालय के कुलपति ने पिछले साल एक वर्चुअल कार्यक्रम के दौरान ओटावा में भारत के उच्चायुक्त अजय बिसारिया को सौंपा था।

इसके बाद तत्कालीन अन्नपूर्णा मंदिर के महंत ब्रह्मलीन महाराज रामेश्वरपुरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इस प्रतिमा को मंदिर परिसर में भव्य समारोह के साथ प्राण प्रतिष्ठा की बात कही थी, लेकिन ऑपइंडिया के सूत्रों की मानें तो मंदिर और प्रशासन के बीच बात बनी नहीं और अब इस मूर्ति‍ की प्राण प्रतिष्ठ श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में बनाए जाने वाले मंदिरों में से कि‍सी एक मंदिर में होगी।

BCCI ने लिखा- अनुष्का शर्मा ने 88 गेंद पर बनाए 52 रन, यूजर्स पूछ रहे- ये कब हुआ, कैसे हुआ

क्रिकेट फैन्स के बीच इस समय बीसीसीआई का एक ट्वीट बहुत चर्चा में है। ये ट्वीट अनुष्का शर्मा को लेकर है। जिसमें बीसीसीआई ने दावा किया कि उन्होंने 88 गेंदों पर 52 रन बनाए। इस ट्वीट के बाद प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई और लोगों ने अनुष्का का नाम पढ़ते ही विराट का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया।

बीसीसीआई का ट्वीट था- “अनुष्का ने 88 गेंदों पर 52 रन बनाए (पाँच चौके और 1 छक्के के साथ)।” अपने ट्वीट के साथ बीसीसीआई ने अंडर 19 चैलेंजर ट्रॉफी का हैशटैग भी इस्तेमाल किया। लेकिन अनुष्का का नाम पढ़कर यूजर्स रुके नहीं और कमेंट करते रहे। लोगों को हैरानी थी आखिर ये कब हुआ और कैसे हुआ। 

सिड ने कहा, “जब पति आउट ऑफ फॉर्म हो गया तो बीवी को मैदान में उतरना पड़ा।”

एक यूजर ने कहा, “विराट की बीवी उससे ज्यादा शानदार पर्फार्मेंस दे सकती है।”

मधुसूदन कल्लूर नामक यूजर ने कहा, “कोहली और टीम की गली क्रिकेट परफॉरमेंस देखने के बाद अनुष्का शर्मा का प्रदर्शन देख अच्छा लगा।”

कई यूजर्स ने इस ट्वीट पर सवाल किया कि अनुष्का शर्मा ने खेलना कब शुरू किया। यूजर्स कहते हैं, “चलो ये अच्छा ही हुआ जब विराट कोहली की टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही, तो कोई तो कर रहा है।”

कुछ यूजर्स को तो लगा कि बीसीसीआई के अकॉउंट से अब विराट कोहली को ट्रोल किया जा रहा है।

सचिन झा कहते हैं, “मुझे लगा विराट कोहली बेकार खेला तो अनुष्का पेल रही है उसे।”

गोपाल पटेल कहते हैं, “उसका बंदा तो कुछ नहीं कर पा रहा है तो उसकी बंदी को ही कुछ करना पड़ेगा भाई।”स

अब यहाँ बता दें कि बीसीसीआई ने जिस अनुष्का को लेकर ट्वीट किया था वो अंडर 19 की प्लेयर हैं। इस बार अंडर 19 वनडे चैलेंजर ट्रॉफी में सभी खिलाड़ियों को 4 टीमों में बाँटा गया है। टीम- ए, टीम- बी, टीम, सी और टीम डी। ऐसे में अनुष्का शर्मा को बी टीम की जिम्मेदारी मिली है। उन्होंने कप्तानी पारी खेलते हुए पहले 52 रन बनाए और फिर 5 विकेट भी मिले। इसके साथ ही उन्होंने अपनी टीम को 92 रनों की बड़ी जीत दिलाई। 

‘किसान आंदोलन’ के नाम पर उपचुनाव, फिर भी जैसे-तैसे बची चौधराहट: हरियाणा का वो ऐलान जो राजनीतिक पंडित नहीं बताएँगे

देश की तीन लोकसभा और विभिन्न राज्यों की 29 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजे मंगलवार (2 नवंबर 2021) को आए। पश्चिम बंगाल की चारों विधानसभा सीटों पर टीएमसी और हिमाचल की सीटों पर कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन की चर्चा के बीच हरियाणा की उस ऐलनाबाद सीट के नतीजे की अनदेखी कर दी गई जहाँ उपचुनाव की नौबत ही कथित किसान आंदोलन की वजह से आई थी।

राजनीतिक पंडितों द्वारा इस सीट के नतीजे की अनदेखी की वजह शायद यह हो कि यहाँ हारने के बावजूद बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। यह बताता है कि कथित किसान आंदोलन का उस हरियाणा में भी प्रभाव नहीं दिख रहा जहाँ से कथित प्रदर्शनकारियों के हुड़दंग की खबरें आए दिन आती रहती है। यह सब तब हुआ है जब उपचुनाव में जीत हासिल करने वाले अभय चौटाला ने इस्तीफा केंद्र के कृषि कानूनों के विरोध में ही दिया था। खुद को किसानों का नेता बताने वाले राकेश टिकैत से लेकर गुरनाम सिंह चढ़ूनी जैसे इस उपचुनाव में खासे सक्रिय थे। बावजूद चौटाला न तो बड़े अंतर से जीत हासिल कर पाए और न बीजेपी को पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करने से कथित किसान नेता रोक पाए। इन सबके बीच कॉन्ग्रेस प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बची।

मंगलवार को आए नतीजों के अनुसार ऐलनाबाद में किसानों का समर्थन हासिल करने वाले इनेलो प्रत्याशी अभय सिंह चौटाला ने 65,992 वोट मिले। उन्होंने भाजपा-जजपा गठबंधन के गोबिंद कांडा को 6739 वोटों से हरा दिया। कांडा को 59,253 वोट मिले। कॉन्ग्रेस उम्मीदवार पवन बेनीवाल को 20,904 वोट मिले और उनकी जमानत भी नहीं बची।

ऐलनाबाद उपचुनाव के नतीजे, साभार: eci

गौर करने की बात यह है कि यह उपचुनाव किसान आंदोलन के इर्द-गिर्द ही केंद्रित था। कथित किसानों ने प्रचार के दौरान कई जगहों पर सत्ताधारी भाजपा-जजपा का विरोध किया था। मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार गठबंधन के नेताओं को कई गाँवों में घुसने से भी रोका गया था। बावजूद इसके उपचुनाव परिणाम की यदि 2019 के विधानसभा चुनाव के नतीजों से तुलना की जाए तो पता लगता है कि इस बार बीजेपी के उम्मीदवार को 14 हजार से ज्यादा वोट मिले हैं। ​2019 में यहाँ से पवन बेनीवाल बीजेपी कैंडिडेट थे और उन्हें 45,133 वोट मिले थे। उस समय भी अभय चौटाला ने 57 हजार से अधिक वोट हासिल कर जीत हासिल की थी। तब कॉन्ग्रेस उम्मीदवार को 35 हजार से अधिक वोट मिले थे। जा​हिर है कि उपचुनाव में कॉन्ग्रेस के वोटरों ने इनेलों के तरफ शिफ्ट किया है, लेकिन गाँवों में मिले बीजेपी को जबर्दस्त समर्थन की वजह से चौटाला की जीत का मार्जिन उपचुनाव में वोट बढ़ने के बावजूद गिर गया है। यह इनेलो के लिए इस लिहाज से भी शुभ संकेत नहीं है, क्योंकि ऐलनाबाद उसका गढ़ रहा है।

यही कारण है कि नतीजों के बाद इसे बीजेपी की नैतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है। राज्य के गृह मंत्री अनिल विज ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ये नतीजे साबित करते हैं कि लोगों ने कथित किसान आंदोलन को नकार दिया है। दूसरी ओर इनेलो के साथ ही यह नतीजे कॉन्ग्रेस की खत्म होती साख को भी दिखा रहे हैं। कॉन्ग्रेस के जो प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा पाए वह प्रदेश अध्यक्ष सैलजा की पसंद थे। उन पर पार्टी को इतना भरोसा था कि उपचुनाव से ऐन पहले उन्हें भाजपा से लाकर टिकट थमाया गया था। यह बीजेपी को चुनावों में पटखनी देने का आए दिन ऐलान करने वाले कथित किसान नेताओं की जमीनी पकड़ की हकीकत भी बताता है।

अब ये बेगम है तुम्हारी…इसे मारना मत: अब्दुल ने 55 साल के बुजुर्ग को बेची 9 साल की बेटी, जवाब मिला- पैसे दिए हैं जो मन होगा वो करूँगा

अफगानिस्तान में कई परिवारों की हालत इतनी बदतर है कि उन्हें दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए बेटियाँ बेचनी पड़ रही हैं। अब्दुल मलिक का परिवार भी उन्हीं लोगों में शामिल है जिन्होंने अपनी 9 साल की बेटी परवाना मलिक का सौदा एक 55 साल के कुर्बान नामक बुजुर्ग से कर दिया और जब सफेद दाढ़ी-बाल वाला कुर्बान उसे अपने साथ बुर्का पहनाकर ले जाने लगा तो अब्दुल बस यही कह पाया – ‘इसे मारना पीटना मत…ये तुम्हारी दुल्हन है।’

सीएनएन को परवाना ने बताया, “मेरे अब्बू ने मुझे इसलिए बेचा क्योंकि हमारे पास खाने को रोटी, चावल और आटा नहीं था। इसलिए उन्होंने मुझे बूढ़े आदमी को बेचा।” वहीं परवाना के अब्बू कहते हैं, “मुझे बहुत ज्यादा दुख है कि मैंने अपनी बेटी को बेचा। मुझे रातों में नींद तक नहीं आती।”

अब्दुल ने बताया कि उन्होंने कई जगह काम ढूँढा और रिश्तेदारों से उधारी ली। इतना ही नहीं, दोनों शौहर-बीवी ने कैंप के बाहर भीख भी माँगी लेकिन कुछ काम नहीं आया, अंत में जाकर बेटी बेचनी पड़ी क्योंकि बाकी लोग भूख से बेहाल थे।

अब्दुल अपनी मजबूरी बताते हुए कहते हैं, “हमारे पास और कोई रास्ता नहीं था। हमारा 8 लोगों का परिवार है। मुझे बाकी लोगों को जिंदा रखने के लिए उसे बेचना ही पड़ा।” बता दें कि परवाना का परिवार अफगान के डिस्प्लेसमेंट कैंप में बडघीस में पिछले 4 साल से रहता है। बहुत शिद्दत के बाद उनको केवल 2 पाउंड मिल पाते हैं। मगर परवाना को बेचने के बाद उन्हें 2 लाख अफगानी मिले। इससे उनका परिवार कुछ माह और गुजार सकेगा।

खबर बताती है कि परवाना ने शुरू-शुरू में तो कोशिश की कि वो अपने माता-पिता का दिमाग बदल दे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उसका टीचर बनने का सपना तब टूट गया जब उसका खरीददार कुर्बान उसके घर पहुँचा और पैसे देकर उसे बुर्का पहनाकर ले गया। अब्दुल बस कुर्बान से ये कह पाया,”ये तुम्हारी दुल्हन है। इसका ख्याल रखना। तुम इसके लिए जिम्मेदार हो। इसे प्लीज मारना मत।” 

परवाना ने दरवाजे पर पैर अड़ा कर खुद को छुड़वाने की नाकाम कोशिशें की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उसे कार में बैठाया गया और ले जाया गया। अब्दुल के पिता ने बताया कि जब उन्होंने कुर्बान के आगे दरख्वास्त की कि वो उनकी बच्ची को मारें न तो कुर्बान ने जवाब दिया, “मैंने इसके पैसे दिए हैं। मेरा जो मन है वो करूँगा। इससे तुम्हारा मतलब नहीं है।” बता दें कि सिर्फ अफगानिस्तान के हालातों के कारण सिर्फ परवाना ही नहीं बल्कि उसकी 12 साल की बहन भी कुछ माह पहले बेची गई थी। वहीं इनके अलावा 10 साल की लड़की का सौदा उसके परिवारवालों ने अपना कर्जा चुकाने के लिए किया था।  

‘आप बहुत ज्यादा पॉपुलर हैं, मेरी पार्टी ज्वाइन कीजिए’: एक ऑफर जिस पर ठहाके मार हँसे PM मोदी, देखिए Video

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (3 नवंबर 2021) को देश लौट आए। 5 दिनी यूरोप दौरे के दौरान उन्होंने जी-20 और जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लिया। ग्लास्गो से मंगलवार रात उन्होंने देश के लिए उड़ान भरी थी। इससे पहले उनका एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें इजरायली प्रधानमंत्री नेफ्ताली बेनेट उन्हें पाने देश में बेहद लोकप्रिय बता रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वैश्विक सम्मेलन COP26 में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री स्कॉटलैंड के ग्लासगो गए थी। मंगलवार को उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री बेनेट से मुलाकात की। जैसे ही दोनों नेता मिले इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा, “आप इजरायल में बहुत ज्यादा पॉपुलर हैं। आइए और मेरी पार्टी ज्वॉइन कीजिए।” इस पर पीएम मोदी ने उन्हें ‘धन्यवाद’ कहा और फिर इस ऑफर पर ठहाके मारकर हँसने लगे।

बेनेट ने पीएम मोदी से मुलाकात के दौरान कहा, “मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूँ। आप ही वो व्यक्ति हैं जिसने भारत और इजरायल के बीच संबंधों को फिर से शुरू किया। दो अनूठी सभ्यताओं भारतीय सभ्यता और यहूदी सभ्यता के बीच एक गहरा रिश्ता है और मुझे पता है कि यह आपके दिल से आता है।” बेनेट ने आगे कहा, “यह हितों के बारे में नहीं, बल्कि यह उस धारणा को लेकर है, जिसे आपने जगह दी है हम इसे महसूस करते हैं।”

दोनों नेताओं की मुलाकात के दौरान ने बेनेट को बताया कि भारत के लोग इजरायल के साथ दोस्ती को काफी महत्व देते हैं। उन्होंने दोनों देशों के बीच आपसी संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने की भी बात कही। गौरतलब है कि हाल ही विदेश मंत्री एस जयशंकर इजरायल के दौरे पर गए थे और उन्होंने इजरायली पीएम को भारत दौरे का न्योता दिया था। इसके बाद अब दोनों देशों के पीएम की मीटिंग हुई है। बेनेट इसी साल जून में इजरायल के प्रधानमंत्री बने। यह दोनों नेताओं की पहली मुलाकात है।

राजनीति में आने से पहले बिजनेसमैन रहे बेनेट ने उन पुराने दिनों को भी याद किया जब वे एक हाई-टेक कंपनी चलाते थे और बाद में उसका विलय एक भारतीय कंपनी में कर दिया था। इजरायल के प्रधानमंत्री ने पीएम मोदी से कहा, “ऑफिस में इजरायलियों और भारतीयों का एक समूह था, जिन्होंने साथ मिलकर कई सारे इनोवेशन किए। बहुत कुछ है जो हम आपसे सीख सकते हैं।”

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने इस मुलाकात को लेकर ट्वीट कर कहा है, “इजरायल के साथ मित्रता को और प्रगाढ़ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नफ्ताली बेनेट की ग्लासगो में सार्थक बैठक हुई। दोनों नेताओं ने नागरिकों के फायदे के लिए सहयोग के विभिन्न उपायों को मजबूत करने पर चर्चा की।’’ इसके साथ ही पीएम मोदी ने बेनेट को भारत आने का निमंत्रण भी दिया क्योंकि दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की स्थापना के 30 साल पूरे होने जा रहे हैं।

केरल में नॉन-हलाल रेस्तराँ खोलने वाली महिला गिरफ्तार, हत्या के प्रयास का आरोप: हाल में बेरहमी से हुई थी पिटाई

केरल में कट्टरपंथियों के विरोध के बावजूद एक नॉन हलाल रेस्तराँ खोलने वाली महिला उद्यमी को उनके पति सहित मंगलवार (2 नवंबर 2021) को गिरफ्तार कर लिया गया। कथिततौर पर पूरा विवाद दुकान में चाट को रखने को लेकर दो पक्षों में (महिला और अन्य दुकानों में) हुआ था। बाद में पुलिस आई और तुशारा अजीत नाम की रेस्टोरेंट मालकिन, उनके पति और दो अन्य लोगों को अपने साथ ले गई।

पुलिस ने बताया कि तुशारा पर एक अन्य केस भी दर्ज है। इसमें उनपर नफरत फैलाने का आरोप लगाया गया है। कोच्चि पुलिस की मानें तो ‘नो हलाल’ रेस्तराँ चलाने वाले दंपति समेत 4 लोगों को फर्जी आरोप लगाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। केस को आईपीसी की धारा 153 (ए) के तहत रजिस्टर किया गया है।

द न्यूज मिनट की रिपोर्ट के अनुसार, इन्फोपार्क सर्कल इन्सपेक्टर संतोष ने बताया कि केस को 24 अक्टूबर को दर्ज किया गया था। अब इस मामले में तुशारा, अजीत, सुनील और विनूप उर्फ अप्पू गिरफ्तार हो गए हैं। सभी घटना के बाद से फरार थे। इन्हें हत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

बता दें कि केरल के एर्नाकुलम के बाद अभी हाल में तुशारा एक अन्य नॉन-हलाल रेस्तराँ कोच्चि के कक्कानड में खोलना चाहती थी लेकिन उनके मुताबिक उन्हें जिहादियो ने प्रताड़ित किया क्योंकि उनका रेस्तराँ गैर हलाल खाना और पोर्क परोसता है। तुषारा का कहना था कि पुलिस उनके ख़िलाफ़ है और आरोपितों की मदद करने में लगी है। वहीं पुलिस ने ऐसे आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इस मारपीट में कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है।

तुषारा ने 6 माह पहले अपने रेस्तराँ की दूसरी ब्रांच खोली थी। लेकिन वहाँ कई लोग उनका विरोध करने लगे। इसके बाद चाट स्टैंड लगाने के कारण दूसरे दुकान वालों से उनका विवाद हुआ। ये सवाल उठा कि क्या तुशारा दुकान के बाहर चाट स्टैंड लगा सकती हैं या नहीं। एक नकुल नाम के दुकान वाले ने इस मसले पर सवाल खड़ा किया था। लेकिन तुषारा ने उन्हें झापड़ मार दिया और ये विवाद झड़प में बदल गया। इसके बाद बिनॉय नामक दुकान वाला भी आया और दोनों ने आरोप लगाया कि उन्हें तुषारा ने अपने पति के साथ और अन्य लोगों की मदद से उन्हें प्रताड़ित किया है। बताया जा रहा है कि झड़प के बाद नकुल और बिनॉय के पैरों में चोट आई और दोनों अस्पताल में भर्ती हुए। इसके बाद तुशारा और उनके पति समेत 4 पर धारा 326 के तहत केस दर्ज किया गया। वहीं तुशारा की ओर से भी आरोप लगाया गया कि नकुल और बिनॉय ने उनके साथ बदसलूकी की थी।

मालूम हो कि कुछ दिन पहले तुशारा की बेटी ने अपनी माँ को एम्बुलेंस में अस्पताल ले जाने का एक वीडियो भी साझा किया था। ये वीडियो घटना के बाद का है। उन्होंने भी कहा था कि उन्हें बदमाशों ने बुरी तरह पीटा है। हालाँकि बाद में बताया गया कि वो झूठ बोल रही हैं। लेकिन वीडियो में दिख रहा था कि तुषारा अस्पताल में हैं। उन्होंने बताया था कि रेस्तराँ की दूसरी ब्रांच खोलने के लिए इस्लामवादियों से धमकियाँ मिल रही थीं। ठीक उसी तरह जैसे उन्हें पहली बार ब्रांच खोलने पर मिल रही थी। इस्लामवादी नॉन-हलाल बोर्ड लगाने के खिलाफ धमकी दे रहे थे। तुशारा ने अपने फेसबुक लाइव में यह भी कहा था कि उनकी रेस्तराँ में नॉन-हलाल खाना परोसने और उसके बाहर इसका पोस्टर लगाने की वजह से उन्हें बेरहमी से पीटा गया।

गर्ल्स स्कूल का प्रिंसिपल जावेद अहमद शाह, आतंकियों का मददगार-पढ़ाता जिहाद का पाठ: J&K प्रशासन ने नौकरी से निकाला

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने दो कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। इनके नाम हैं- फिरोज अहमद लोन और जावेद अहमद शाह। लोन जेल उपाधीक्षक के पद पर था। वहीं शाह अनंतनाग जिले के बीजबेहाड़ा गवर्नमेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में प्रिंसिपल था। सरकारी सेवा की आड़ में दोनों आतंकियों की मदद और जिहाद का प्रसार करने में लगे थे। इसकी वजह से इन्हें संविधान के अनुच्छेद 311 (2)(सी) के तहत सेवा मुक्त किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार जावेद अहमद शाह की शिक्षा विभाग में नियुक्ति बतौर लेक्चरर 1989 में हुई थी। प्रमोशन पाने के बाद वह बीजबेहाड़ा के स्कूल का प्रिंसिपल बन गया। वह आतंकियों के ओवरग्राउंड वर्कर के तौर पर काम कर रहा था। जमाते इस्लामी और हुर्रियत का कट्टर समर्थक है। 2016 में आतंकी बुरहान वानी को मार गिराए जाने के बाद घाटी में हुए हिंसक प्रदर्शनों में उसकी अहम भूमिका थी। अपने स्कूल ​सहित अन्य संस्थानों में हुर्रियत के हड़ताली कैलेंडर को लागू कराने में भी उसकी अहम भूमिका थी। वह स्कूल की छात्राओं को भी जिहादी पाठ पढ़ाता था। उनके शारीरिक शिक्षा पर रोक लगा रखी थी, क्योंकि इसे वह इस्लाम के खिलाफ मानता था। स्कूल में अपने संबोधन के दौरान वह अक्सर आतंकियों को सही ठहराता और छात्राओं को कट्टरपंथी विचारधारा अपनाने के लिए उकसाता था।

उसके साथ सेवा से बर्खास्त किया गया फिरोज अहमद लोन 2007-08 में सरकारी सेवा में बहाल हुआ था। 2012 में जेल विभाग में बतौर उपाधीक्षक तैनाती के दौरान उसने अपने पद का इस्तेमाल कर आतंकियों की मदद की। जेल में बंद आतंकियों की ओवरग्राउंड वर्करों के साथ बैठक का प्रबंध करता था। रिपोर्ट में बताया गया है कि वह हिजबुल मुजाहिदीन का सक्रिय सदस्य था और कई युवकों को आतंकी ट्रेनिंग के लिए गुलाम कश्मीर भेजने में भी मदद की। वह हिज्बुल मुजाहिद्दीन के कमांडर रियाज नायकू के लिए काम करता था। नायकू मई 2020 में मार गिराया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार लोन की सरकारी सेवा में बहाली तब हुई थी जब उमर अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। इसी तरह शाह सेवा में तब आया जब उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला सीएम थे। गौरतलब है कि इस साल अब तक 29 सरकारी कर्मचारी आतंकी कनेक्शन की वजह से जम्मू-कश्मीर में सेवा से बर्खास्त किए जा चुके हैं। इनमें अलगाववादी नेता रहे सैयद अली शाह गिलानी का पोते अनीस-उल-इस्लाम भी शामिल है। उसके साथ-साथ डोडा के एक शिक्षक को भी सरकारी नौकरी से निकाल बाहर किया गया था।

उत्तर-पूर्व की सभी सीटों पर हारी कॉन्ग्रेस, तेलंगाना में टक्कर में ही नहीं: उधर चमके CM हिमंता, इधर BJP को मिला बड़ा चेहरा

भारत में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते हैं। आजकल गाँव के चुनाव से लेकर राज्यों तक के चुनाव परिणाम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की हार-जीत पर कड़ा विश्लेषण किया जाता है। कॉन्ग्रेस तो वैसी भी डूबती हुई पार्टी है, लेकिन गाहे-बगाहे कभी एकाध सीट जीत कर मीडिया को ये चलाने का मौका दे देती है कि राहुल गाँधी ‘लौट आए’ हैं। आइए, ताज़ा उपचुनाव के परिणामों को देखते हैं और इसका विश्लेषण करते हैं कि किसको खुश होना चाहिए और किसे दुःखी।

उत्तर पूर्व: असम सहित 4 राज्यों में भाजपा और उसकी सहयोगी दलों का क्लीन स्वीप

असम में पिछले मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल का कार्यकाल भी अच्छा रहा था और अब फायरब्रांड नेता के रूप में हिमंता बिस्वा सरमा अपनी विश्वसनीयता व लोकप्रियता साबित कर रहे हैं। असम में 5 सीटों पर उपचुनाव हुए और उन सभी पर भाजपा व उसकी सहयोगी पार्टी को जीत मिली है। कॉन्ग्रेस के लिए यहाँ से काफी बुरी खबर आई है, क्योंकि वो सभी सीटों पर लड़ी थी और पिछली बार के मुकाबले इस बार हर सीट पर जीत का अंतर ज्यादा रहा। पूर्वी असम कभी उसका गढ़ हुआ करता था, आज वहाँ भी दुर्गति हुई। मुख्यमंत्री सरमा ने भी कहा है कि लोकसभा चुनवोंसे भी ज्यादा अंतर से इस बार जीत मिली है।

भाजपा ने तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसकी सहयोगी पार्टी ‘यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (UPPL)’ ने 2 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। बोडोलैंड प्रदेश में उसे दो सीटें लड़ने के लिए दी गई थीं। भाजपा के जिन तीन उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, वो तीनों किसी अन्य दल से आए थे। इनमें से दो कॉन्ग्रेस छोड़ कर आए थे तो एक ने ‘ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ छोड़ कर कमल छाप का दामन थामा था। जोरहाट जिले मरियानी सीट पर रूपज्योति कुर्मी ने 62.38% वोट पाए, जो इस चुनाव का सर्वाधिक है।

ये नागालैंड की सेमा पर ही स्थित इलाका है, ऐसे में इस जीत का असर वहाँ भी पड़ेगा। इसी जिले के थौरा से सुशांता बोरगेहेन ने 61.99% वोट पाए। कोकराझार के भवानीपुर में फणीधर तालुकदार को 56.41% मत प्राप्त हुए। मरियानी और थौरा – ये दोनों ही सीटें पूर्वी असम में हैं। थौरा में तो कॉन्ग्रेस मात्र 6.65% वोटों पर सिमट गई। पश्चिमी असम के तमलपुर विधानसभा क्षेत्र में भी 5.41% वोटों के साथ कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन धड़ाम से गिरा। गोसाईगाँव में वो 20.58% वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।

अब 126 सदस्यीय असम विधानसभा में भाजपा की 62 सीटें हो गई हैं और उसकी सहयोगी UPPL की 7 सीटें। मेघालय में पहले मॉरिंगकैंग (Mawryngkneng) और राजबाला विधानसभा सीटों पर कॉन्ग्रेस का कब्ज़ा था, लेकिन पार्टी ने अब ये दोनों गँवा दिए हैं। मौफ्लँग सीट पर भी उसे हार का सामना करना पड़ा। एउजेनेसन लिंगदोह यहाँ से विजयी हुए, जो भारत के लोकप्रिय फुटबॉलर रहे हैं। वो UDP विधायक इसके सन्न के बेटे हैं, जिनके निधन से ये सीट खली हुई थी।

इस तरह अब वहाँ NPP के पास 23 और UDP के पास 7 विधायक हैं। ये दोनों ही भाजपा के गठबंधन का हिस्सा हैं। मिजोरम के ट्युइरियल सीट पर MNF ने कब्ज़ा जमाया। कॉन्ग्रेस यहाँ तीसरे स्थान पर रही। पहले इस सीट पर जोरम्स पीपल्स मूवमेंट का कब्ज़ा था। इसी तरह नागालैंड के शमतोर-चेस्सोर विधानसभा सीट पर बिना चुनाव के ही भाजपा की सहयोगी पार्टी NDPP की जीत हुई थी। इस तरह उत्तर-पूर्व अब पूरी तरह ‘कॉन्ग्रेस मुक्त’ होने की ओर अग्रसर है।

तेलंगाना में भाजपा का शानदार प्रदर्शन, दक्षिण में मजबूत

इसी तरह तेलंगाना में भाजपा और सत्ताधारी TRS के बीच दिन भर काँटे की टक्कर चली। अंत में करीमनगर के हुजुरबाद विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के एटला राजेंद्र ने जीत दर्ज की। उन्होंने अपनी पत्नी जमुना के साथ काउंटिंग सेंटर जाकर जीत का सर्टिफिकेट प्राप्त किया। वो कभी मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के करीबी और उनकी सरकार में मंत्री रहे हैं। ये लड़ाई दोनों के कद के बीच एक टक्कर भी थी। 22 राउंड की गिनती के बाद TRS के गिल्लू श्रीनिवास यादव को उन्होंने 23,855 वोटों से हराया।

भाजपा उम्मीदवार को जहाँ 1,06,780 वोट मिले, TRS को 82,712 मत प्राप्त हुए। उत्तर पूर्व की तरह यहाँ भी कॉन्ग्रेस की बात न ही की जाए तो अच्छा है, जो तीसरे स्थान पर रही। पार्टी को 3012 वोटों से संतोष करना पड़ा और उसकी जमानत जब्त हो गई। इससे न सिर्फ ये पता चल रहा है कि राज्य में मुख्यमंत्री KCR की सरकार के विरुद्ध असंतोष बढ़ रहा है, बल्कि हुजुरबाद में कभी नगण्य रही भाजपा के कैडर में भी अब इजाफा होने लगा है।

इससे पहले करीमगंज की सभी 7 सीटों पर TRS ने कब्ज़ा जमाया था। 2018 में जब विधानसभा चुनाव हुए थे तो इसी सीट पर भाजपा को मात्र 1683 वोट मिले थे। ये नोटा को मिले 2867 वोटों से भी कम था। हालाँकि, 119 सदस्यीय विधानसभा में 103 सीटें लेकर सत्ता में TRS पर इस हार-जीत से कोई गणितीय फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन, भाजपा अब जनता के मन में ये बताने में कामयाब रहेगी कि राज्य में मुख्य विपक्ष वही है, कॉन्ग्रेस पार्टी नहीं। इसी तरह पिछले साल नवंबर के डुबक्का उपचुनाव में भाजपा के माधवेनेनी रघुनन्दन राव ने जीत दर्ज की थी।

उससे भाजपा को काफी प्रोत्साहन मिला था। ये चुनाव भाजपा और उसके उम्मीदवार के कद, दोनों का था। कॉन्ग्रेस ने 2018 के चुनाव में इस सीट से 61,000 वोट प्राप्त किए थे, लेकिन उसके उम्मीदवार ने पाला बदल कर TRS ज्वाइन कर लिया और यहाँ उसे ढंग का उम्मीदवार तक नहीं मिल पाया। TRS ने अपने छात्र विंग के मुखिया श्रीनिवास यादव को यहाँ उतारा था, लेकिन लड़ाई राजेंद्र और KCR – दो चेहरों के बीच थी। इस साल जून में भाजपा में शामिल हुए राजेंद्र 2003 से ही TRS में थे और 6 बार विधायक रहे थे।

‘जय भीम’ में हिंदी बोलने पर प्रकाश राज ने बुजुर्ग को मारा थप्पड़, कहा- तमिल में बोलो, सोशल मीडिया पर भड़के लोग

ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर ‘जय भीम’ फिल्म को आज (2 नवंबर 2021) पाँच भाषाओं में रिलीज कर दिया गया है। साउथ सुपरस्टार सूर्या इस फिल्म में लीड रोल में हैं। वहीं, प्रकाश राज ने भी फिल्म में अहम भूमिका निभाई है। खास बात यह है कि ‘जय भीम’ को तमिल भाषा में शूट किया गया है, लेकिन इसे तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी में डब करके रिलीज किया गया है।

दरअसल, अभिनेता प्रकाश राज का ‘जय भीम’ का एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस क्लिप में दिखाया गया है कि अभिनेता को हिंदी भाषा से कितनी नफरत है। प्रकाश राज वीडियो में एक बुजुर्ग शख्स के हिंदी में बात करने पर भड़क जाते हैं और अपना आपा खो बैठते हैं। यही नहीं, अभिनेता ने अपने रसूखदार होने का फायदा उठाते हुए उस व्यक्ति को थप्पड़ मारकर कहा, “तमिल में बोलो।”

फिल्म के तेलुगु और तमिल दोनों संस्करणों में हिंदी विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया गया है। इन दोनों संस्करणों में, राज हिंदी में बात करने वाले बुजुर्ग व्यक्ति को थप्पड़ मारते हैं और उसे तेलुगु और तमिल में बोलने के लिए कहते हैं। हालाँकि, फिल्म के हिंदी डब में दिखाया गया है कि राज उस व्यक्ति को झूठ बोलने के लिए थप्पड़ मारते हैं और सच बोलने के लिए कहते हैं।

वहीं सोशल मीडिया पर यूजर्स राज की फिल्म ‘जय भीम’ का वीडियो इंटरनेट पर वायरल होने के बाद से उनसे खासा नाराज हैं, क्योंकि इसमें उन्हें हिंदी बोलने वालों के खिलाफ हिंसा और नफरत को बढ़ावा देने वाले के रूप में दिखाया गया है।

सोशल मीडिया यूजर्स ने प्रकाश राज और ‘जय भीम’ की खिंचाई की

एक यूजर ने कहा कि हिंदुस्तान में हिंदू और हिंदी भाषी होना अपराध है।

एक अन्य यूजर ने कहा, “इस तरह के वीडियो तमिलनाडु में रहने वाले उत्तर भारतीयों के लिए खतरा हैं, क्योंकि यह हिंदी बोलने वालों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है।” यूजर ने यह भी कहा कि कैसे तमिल भाषी व्यक्ति को तमिलनाडु कार्यालय में हिंदी बोलने वाले व्यक्ति को जानबूझकर थप्पड़ मारते हुए दिखाया गया है, ताकि वे हिंदी विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दे सकें।

एक और यूजर ने अभिनेता को फटकार लगाते हुए कहा, ”प्रकाश राज कितने बेशर्म हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में पैसों के लिए काम किया।”

एक ट्विटर यूजर ने मनसे (MNS) को टैग करते हुए पूछा कि क्या वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रकाश राज जब भी मुंबई में हों तो मराठी बोलें।

आपको बता दें कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो क्लिप तमिल फिल्म ‘जय भीम’ का है। यह फिल्म 1990 के दशक में तमिलनाडु में हुई वास्तविक जीवन की घटना पर आधारित है, जहाँ एक वकील ने एक आदिवासी महिला को न्याय दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी थी।