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दीवाली पर पटाखे का सद्गुरु ने किया समर्थन, अनिल कपूर की ‘लिबरल बेटी’ को कंगना ने लताड़ा

ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने दिवाली के मौके पर पटाखों पर प्रतिबंध लगाने का विरोध किया है। इसको लेकर बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने भी अपनी सहमति जताई है। दरअसल, सद्गुरु ने पटाखे फोड़ने से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने का सिंपल फॉर्मूला दिया है। धार्मिक गुरु ने ट्विटर पर कहा, ”वायु प्रदूषण की चिंता कोई ऐसा कारण नहीं है कि बच्चों को पटाखे फोड़ने की खुशी से वंचित किया जाए। अगर आप उनके लिए कुछ करना चाहते हैं तो तीन दिन पैदल अपने ऑफिस जाएँ और बच्चों को पटाखों का आनंद लेने दें।”

कंगना रनौत ने पटाखों पर बैन लगाने पर अपनी असहमति व्यक्त करते हुए सद्गुरु का एक वीडियो अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज पर साझा किया है। उन्होंने कहा, ”पर्यावरण की रक्षा के लिए लोगों को कुछ दिनों के लिए कारों का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।”

कंगना ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज पर लिखा, “सद्गुरु वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने लाखों पेड़ लगाने का विश्व रिकॉर्ड बनाया है। दिवाली के मौके पर सभी पर्यावरण को दूषित होने से बचाएँ और तीन दिनों तक अपनी कार का इस्तेमाल न करें। पैदल ही अपने ऑफिस जाएँ।”

साभार: इंस्टाग्राम

वहीं, इस बीच, अभिनेता अनिल कपूर की बेटी और ‘वीरे दी वेडिंग’ की निर्माता रिया कपूर ने दिवाली पर पटाखे फोड़ने की परंपरा पर निराशा व्यक्त ​की है। उन्होंने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज पर लिखा, “पटाखे फोड़ना लापरवाह और गैर जिम्मेदाराना है। इसे करना बंद करो।”

साभार: इंस्टाग्राम

बता दें कि सद्गुरु ने दिवाली के मौके पर सभी को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि इस दिवाली अपनी मानवीयता को पूरे गौरव से रोशन करें। सद्गुरु ने कहा, ”इस दीवाली पर मानवता को अपनी पूरी गरिमा में उजागर कीजिए। प्रेम व आशीर्वाद।”

श्रीलंका ने चीन के खाद को हानिकारक बताकर वापस लौटाया, भारत से शुरू की खरीद

जैविक खाद के सौदे को लेकर श्रीलंका और चीन के बीच तनाव पैदा हो गया है। चीन के खाद को हानिकारक मानते हुए श्रीलंका ने उसे वापस कर दिया है। श्रीलंका का कहना है कि चीन का खाद जहरीला है। इसके बाद चीन ने अपनी उर्वरक कंपनी को फिर से टेस्ट करने का ऑर्डर दिया। हालाँकि, इस बीच श्रीलंका ने जैविक खाद की खरीद अब भारत से शुरू कर दी है।

श्रीलंका ने कहा है कि चीनी जैविक उर्वरक को उसकी जमीन पर उतारने की अनुमति नहीं दी जाएगी। श्रीलंका के प्लांट प्रोटेक्शन ऑर्डिनेंस के अनुसार, किसी भी प्रोडक्ट में कीटाणु नहीं होने चाहिए, लेकिन चीनी सैंपल्स पर किए गए परीक्षणों और विश्लेषण के बाद थोक परमिट की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि सैंपल्स पर किए गए दोनों टेस्ट से पता चला कि यह हानिकारक कीटाणुओं से भरा हुआ है।

श्रीलंकाई परीक्षण अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं होने के आरोप पर कृषि महानिदेशक डॉ. अजंता डी सिल्वा ने कहा कि दुनिया भर में टेस्ट प्रक्रिया और स्टैंडर्ड में काफी हद तक एक समान हैं और एक देश में किया गया टेस्ट दूसरे देश में आसानी से स्वीकार्य है। श्रीलंका ने पहले ही इस संबंध में चीन को एक रिपोर्ट भेज दी है, जिसमें कहा गया है कि श्रीलंका ने उर्वरक की चीन द्वारा भेजी गई खेप को अनुमति नहीं दी है।

गौरतलब है कि कुछ समय पहले श्रीलंका ने चीन की जैविक खाद बनाने वाली एक कंपनी को खाद सप्लाई करने का ऑर्डर दिया था। हालाँकि, जाँच के दौरान पता चला कि चीनी कंपनी ने जिस खाद की सप्लाई श्रीलंका को की थी, वो दूषित था। उसके बाद श्रीलंका के अधिकारियों ने कार्रवाई करते हुए चीन से आए खाद को वापस कर दिया। वहीं, लेटर ऑफ क्रेडिट के अनुसार श्रीलंका के बैंक ने चीन की कंपनी को पैसों का भुगतान करने से भी मना कर दिया। इससे गुस्साए चीन ने श्रीलंका की सरकारी बैंक को ही ब्लैकलिस्ट कर दिया।

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने उर्वरक खाद के एक ऑर्डर के संबंध में लेटर ऑफ क्रेडिट ‘डिफॉल्ट’ का हवाला देते हुए श्रीलंका के सरकारी बैंक को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। मामले में तनाव तब बढ़ा जब पीपुल्स बैंक ने चीन की कंपनी क्विंग्डाओ सीविन बायोटेक को भुगतान रोक लिया। चीनी कंपनी से जैविक खाद की खरीद श्रीलंका की सरकारी कंपनी सीलोन फर्टिलाइजर ने की थी। इस मामले को लेकर सीलोन फर्टिलाइजर कमर्शियल मामलों के हाईकोर्ट में गई थी।

हाईकोर्ट ने 22 अक्टूबर को आदेश जारी कर चीनी कंपनी को भुगतान पर रोक लगा दी। बैंक द्वारा भुगतान रोके जाने के बाद कोलंबो स्थित चीनी दूतावास ने पीपुल्स बैंक को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया। चीन के दूतावास ने कहा कि खाद का भुगतान रोके जाने से चीनी कंपनी को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। भेजी गई खाद को खराब बताने का फैसला गलत था। मामले में पीपुल्स बैंक का कहना था कि उसने हाईकोर्ट के आदेश के चलते भुगतान रोका है।

पैसों के हेर-फेर के लिए अनिल देशमुख चला रहे थे 27 कंपनियाँ, इनमें कई फर्जी: ED की जाँच में खुलासा

महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख 6 नवंबर तक प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की हिरासत में हैं। उन्हें 100 करोड़ रुपए की वसूली मामले और मनी लॉन्ड्रिंग केस में 1 नवंबर को करीब 12 घंटे की पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया था। अब आगे की पड़ताल में पता चला है कि देशमुख अलग-अलग नामों से 27 कंपनियाँ चला रहे थे। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन 27 कंपनियों में से 13 कंपनियाँ ऐसी थीं जो राज्य के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख, उनके बेटे सलिल और ऋषिकेश के सीधे कंट्रोल में थीं। लेकिन, 14 ऐसी कंपनियाँ हैं, जो अनिल देशमुख के करीबियों के कंट्रोल में संचालित हो रही थीं।

ईडी ने बताया कि इन कंपनियों के बीच में लगातार लेन-देन हुआ है। इनका इस्तेमाल देशमुख ने गलत ढंग से कमाए पैसों के लिए किया था। पूरे केस में फॉरेन एंगल को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा बैलेंस शीट और बैंक अकॉउंट चेक करने पर पता चला कि हकीकत में कुछ कंपनियाँ तो वास्तव में किसी व्यवसाय को भी नहीं कर रहीं। उनका उपयोग सिर्फ पैसा घुमाने के लिए किया जा रहा था। 

जाँच में यह बात भी सामने आई कि पैसे को एक शेल कंपनी के नाम पर ट्रांसफर किया गया और फिर उसे नागपुर स्थित एक चैरिटेबल ट्रस्ट श्री साईं शिक्षण संस्था के नाम पर ट्रांसफर कर दिया गया, जिसे देशमुख के परिवार द्वारा संचालित किया जा रहा था।

मालूम हो कि इसी लेन-देन को ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग माना है और देशमुख की गिरफ्तारी के साथ उनकी पत्नी और बेटे को भी समन किया है। ये दोनों अभी तक पेश नहीं हुए हैं, लेकिन मामले के खुलासे के बाद से ईडी की कार्रवाई चल रही है। पिछले 15 दिनों में देशमुख और उनके परिवार की 4.2 करोड़ रुपए की संपत्ति को जब्त किया गया है। इसके अलावा देशमुख की उस याचिका को भी रद्द किया गया है जिसमें उनके द्वारा ईडी का समन रद्द करने की माँग की गई थी। इस मामले में देशमुख के पीए संजीव पलांडे औ पीएस कुंदर शिंदे को गिरफ्तार किया गया था।

बता दें कि मंगलवार को महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री व एनसीपी नेता अनिल देशमुख को 100 करोड़ रुपए की वसूली केस और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तारी के बाद PMLA विशेष अदालत ने 6 नवंबर तक प्रवर्तन निदेशालय की हिरासत में भेज दिया था। उनकी गिरफ्तारी 12 घंटे पूछताछ के बाद सोमवार को हुई थी। उन्हें प्रीवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की धारा 19 के तहत गिरफ़्तार किया गया था।

धनतेरस पर ₹75000 करोड़ का बिका सोना, 15 टन गहने-सिक्कों का हुआ कारोबार: वापस लौटी Gold की चमक

धनतेरस पर सोना सस्ता क्या हुआ एक दिन में लोगों ने 15 टन सोना, सोने के आभूषण और सिक्कों के रूप में खरीद डाले और इस तरह से गोल्ड की खोई चमक वापस पाते हुए सोने के आभूषणों और सिक्कों की बिक्री कोविड-पूर्व के स्तर पर पहुँच गई। धनतेरस पर देशभर में लगभग 75,000 करोड़ रुपए की लगभग 15 टन सोने की बिक्री हुई

कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने बताया कि खुशी की बात है कि आभूषण उद्योग कोरोना महामारी की वजह से आयी मंदी से उबर रहा है और सोने की कीमतों में आगे अच्छी बढ़त होने के संकेत हैं।

कैट (CAIT) ने अपने एक बयान में कहा, “धनतेरस पर देशभर में लगभग 75,000 करोड़ रुपए की 15 टन सोने के आभूषणों की बिक्री हुई है।” कैट के मुताबिक इसमें दिल्ली में 1,000 करोड़ रुपए, महाराष्ट्र में करीब 1,500 करोड़, उत्तर प्रदेश में करीब 600 करोड़ की अनुमानित बिक्री भी शामिल है। वहीं दक्षिण भारत में, लगभग 2,000 करोड़ रुपए की बिक्री होने का अनुमान है।

कैट के अनुसार, दुकानों में और ऑनलाइन बिक्री तेज होने के साथ सोने की कीमतों के अगस्त के 57,000 रुपए प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर की तुलना में अपेक्षाकृत नरम होने के साथ धनतेरस को खरीदारी में वृद्धि हुई, विशेष रूप से हल्के वाले सोने के आभूषणों की बिक्री में तेजी आई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सोने की कीमत को राष्ट्रीय राजधानी में 46,000-47,000 रुपए प्रति 10 ग्राम (टैक्स को छोड़कर) के दायरे में थीं, जो इस साल अगस्त में 57,000 रुपए से अधिक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई थी। हालाँकि, सोने की दर अभी भी धनतेरस, 2020 के भाव 39,240 रुपए प्रति 10 ग्राम की तुलना में 17.5 प्रतिशत अधिक है।

गौरतलब है कि आभूषणों की दुकानों में उपभोक्ताओं की बढ़ी हुई भीड़ देखी गई जिससे ऑफलाइन खरीदारी के फिर से बढ़ने का पता चलता है। एक साल पहले की तुलना में दुकान पर जाकर खरीदारी करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या में भी 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

बिहार ने फिर बताया लालू का लालटेन नहीं विकल्प: गंगा के दोनों तरफ RJD की दुर्गति, कॉन्ग्रेस-कन्हैया पर भारी चिराग

बिहार में दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए – तारापुर और कुशेश्वर स्थान। जहाँ तारापुर मुंगेर में स्थित है, वहीं कुशेश्वर स्थान दरभंगा में। एक गंगा के इस पार है और दूसरा गंगा के उस पार। राजद के लिए दोनों पार से बुरी खबर आई है। इस विधानसभा उपचुनाव में उसे दोनों ही सीटों पर हार झेलनी पड़ी। दोनों सीटें सत्ताधारी जदयू की झोली में गई। राजद के संस्थापक-अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने 3 साल बाद चुनाव प्रचार किया, लेकिन उनकी पार्टी के लिए नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।

कुशेश्वर स्थान के नतीजे: जदयू ने युवा कंधा + राजनीतिक घराना पर जताया भरोसा

सबसे पहले आँकड़ों की बात कर लेते हैं। कुशेश्वर स्थान ने जदयू ने युवा अमन भूषण हजारी पर भरोसा जताया था। 26 वर्ष के अमन भूषण हजारी युवा ज़रूर हैं, लेकिन इलाके के एक मजबूत राजनीतिक घराने से आते हैं। उनके पिता शशि भूषण हजारी ने इस सीट पर जीत की हैट्रिक लगाई थी। जुलाई 2021 में उनके निधन के बाद ये सीट खाली हुई थी। टिकट उनकी पत्नी को दिया जाना था, लेकिन उनका भी असामयिक निधन हो गया। जदयू ने युवा कंधों पर भरोसा जताया।

मतगणना की शुरुआत से ही यहाँ जदयू ने बढ़त बनाए रखी। लोगों का कहना है कि अमन भूषण हजारी को सहानुभूति वोट भी खूब मिले। उन्हें 59,887 (45.72%) वोट प्राप्त हुए, जबकि राजद उम्मीदवार गणेश भारती को 47,192 (36.02%) वोटों से ही संतोष करना पड़ा। लोजपा और कॉन्ग्रेस के वोटों को मिला भी दें तो ये 11,225 वोट होते हैं, जो इस सीट पर जीत के अंतर 12,698 से भी कम है। 2020 विधानसभा चुनाव में उनके पिता के जीत का अंतर से ये ज्यादा है।

जदयू ने बिहार के जल संसाधन और सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री संजय झा को कुशेश्वर स्थान विधानसभा सीट की जिम्मेदारी सौंपी थी, जो पड़ोसी जिले मधुबनी के रहने वाले हैं। लालू यादव का यहाँ आना और पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का कैम्प करना भी बेअसर साबित हुआ। इस सीट पर मुस्लिम, यादव और ब्रह्मा बड़ी भूमिका निभाते हैं, ऐसे में राजद को अपने परंपरागत माई समीकरण के अलावा मुसहर जाति के उम्मीदवार के कारण उनके समुदाय के वोटों की भी अपेक्षा थी, जो नहीं हुआ।

राजपूत, कुर्मी, पासवान और रविदास समुदाय की भी इस सीट पर अच्छी-खासी संख्या है। राजद और कॉन्ग्रेस के बीच दरार आई। लालू यादव ने कॉन्ग्रेस नेता के लिए ‘भकचोन्हर’ शब्द का प्रयोग कर दिया। बाद में बयान आया कि सोनिया गाँधी से उनकी बात हो गई है और गठबंधन जारी रहेगा। इससे जनता और कन्फ्यूज्ड हो गई। 2020 में महागठबंधन में कॉन्ग्रेस ने यहाँ से चुनाव लड़ा था। इस बार सीट राजद ने कॉन्ग्रेस को नहीं दी। फिर फोनों अलग-अलग लड़े।

तेजस्वी यादव ने मुसहर जाति से उम्मीदवार बना कर इसे भुनाने की अच्छी-खासी कोशिश की थी और इससे वो वहाँ यादव-मुसहर गठजोड़ बनाना चाहते थे। राजद ने मुस्लिम-यादव उम्मीदवार न देकर दोनों सीटों पर एक प्रयोग किया था, जिसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। CM नीतीश कुमार, भाजपा के सुशील मोदी, तारकिशोर प्रसाद और संजय जायसवाल, HAM के जीतनराम माँझी और VIP के मुकेश सहनी ने अपने-अपने समीकरणों के हिसाब से चुनाव प्रचार किए।

तारापुर विधानसभा क्षेत्र: मुंगेर में भी फेल हुआ तेजस्वी यादव का गणित

मुंगेर के तारापुर विधानसभा क्षेत्र पर भी राजद ने पूरा जोर लगाया था। यहाँ टक्कर काँटे की जरूर हुई, लेकिन अंत में जदयू उम्मीदवार ने बाजी मारी। जदयू के राजीव कुमार सिंह को 79,090 (46.62%) मत प्राप्त हुए, जबकि राजद के अरुण कुमार को 75,238 (44.35%) वोट मिले। जैसा कि आप देख सकते हैं, 3852 (2.27%) वोटों से हार-जीत का फैसला हुआ। कॉन्ग्रेस और जदयू मिला कर 8954 वोट ही ला पाए। कॉन्ग्रेस को नोटा से लगभग एक हजार वोट अधिक आए।

राजद ने जहाँ वैश्य समाज से उम्मीदवार उतारा था, वहीं जदयू ने अपने परंपरागत कुशवाहा समाज से उम्मीदवार दिया। हाँ, जीत का अंतर जरूर पिछली बार के मुकाबले घट गया। लेकिन, राजीव कुमार सिंह इससे पहले अन्य चुनावों में हारते ही रहे थे। वर्ष 2020 में तारापुर विधानसभा क्षेत्र से जदयू प्रत्याशी मेवालाल चौधरी ने 7256 मतों के अंतर से अपने निकटतम प्रतिद्वंदी राजद प्रत्याशी सह पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश यादव की पुत्री दिव्य प्रकाश को हराया था

राजद की हार के साथ ही मुंगेर के मुख्य बाजार असरगंज स्थित उसके दफ्तर में सन्नाटा छा गया। लोगों में ऐसी चर्चा होने लगी कि जाति के भरोसे चुनाव लड़ने वाले राजद के उम्मीदवार को उनकी अपनी ही जाति का समर्थन नहीं मिला। वर्ष 2000 में भी अरुण कुमार भाजपा नेता अश्विनी कुमार चौबे के विरुद्ध चुनाव लड़े थे, लेकिन तब जीत का अंतर इससे कम रहा था। इसके बाद वो भागलपुर में राजद के नगर अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे थे और असरगंज को ही गढ़ बनाया था।

इस क्षेत्र में यादव 65 हजार, कुशवाहा 58 हजार, अति पिछड़ा 48 हजार, वैश्य 40 हजार, सवर्ण 40 हजार, SC 35 हजार, मुस्लिम 22 हजार अन्य 9 हजार कुल 3 लाख 17 हजार मतदाता हैं। तेजस्वी यादव ने वैश्य और माई समीकरण के भरोसे अपना अंकगणित लगाया था। लेकिन, अब साफ़ हो गया है कि ये फिट नहीं बैठा। तारापुर में जदयू ने दिवंगत विधायक मेवालाल चौधरी के परिवार से किसी को नहीं उतारा। बताया जाता है कि तेजस्वी यादव ने हर पंचायत के लिए विधायकों को जिम्मेदारी दी थी।

तारापुर विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी जदयू ने मंत्री अशोक चौधरी को सौंपी थी। दोनों सीटों पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो दिनों तक चुनाव प्रचार किया। राजद ने रणविजय साहू के नेतृत्व में राजद के वैश्य विधायकों को मैदान में उतारकर माहौल भी बनाया था। अशोक चौधरी ने जदयू और भाजपा के नेताओं के बीच सामंजस्य बिठाने और चुनाव प्रचार की रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने न तो कहीं कैम्प किया, न ही चुनाव प्रचार में ज्यादा दिन खपाए।

तारापुर और कुषवेश्वर स्थान: राजद और जदयू के लिए अब आगे क्या?

बिहार विधानसभा में राजद के 75 विधायक हैं। ये संख्या छोटी नहीं है। सबसे बड़ी बात तो ये कि लालू यादव की गैर-मौजूदगी में 2020 विधानसभा चुनाव में राजद को इतनी सीटें आईं। ये भी गौर कीजिए कि उस दौरान पोस्टरों-बैनरों से लेकर नारों तक से लालू यादव का नाम और तस्वीरें हटा दी गए थीं। तेजस्वी यादव ने खुद पर ध्यान केंद्रित रखा था और मुस्लिम-यादव गठजोड़ को ही भुनाया था। ऐसे में सवाल ये हो सकता है कि क्या लालू यादव के मैदान में उतरने से उलटा नुकसान ही हो गया?

इसके लिए संजय झा का बया याद कीजिए। लालू यादव के जब रैली करने की खबर आई थी तो संजय झा ने राहत की साँस लेते हुए कहा था कि राजद ने अब जदयू का काम आसान कर दिया है, क्योंकि लोगों को अब राजद के जंगलराज की याद नहीं दिलानी पड़ेगी। उनका कहना था कि जनता लालू यादव को देखते ही जंगलराज की यादें ताज़ा कर लेगी। जाहिर है, फायदा जदयू को होगा। 2005 से पहले का शासन कैसा था, लालू का चेहरा देखते ही जनता को याद आ जाता है।

लालू यादव ने जिस तरह नीतीश कुमार के ‘विसर्जन’ की बात की और पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री ने उन्हें गोली मरवाए जाने की आशंका जताई, ये खासा चर्चा में रहा। तेज प्रताप यादव का भी अब बयान आ गया है। उनका कहना है कि  प्रदेश अध्यक्ष जगादनंद सिंह, कोषाध्यक्ष सुनील सिंह और तेजस्वी यादव के रणनीतिकार संजय यादव ने चुनाव हरवाया है। उन्होंने कहा कि सबको साथ लेकर नहीं चला गया और बीमार पिता से भी चुनाव प्रचार करवाया गया।

तेजस्वी यादव और तेज प्रताप का झगड़ा आज से नहीं चल रहा। चुनाव से पहले भी दोनों के बीच दूरी बनी रही। लालू यादव ने तेज प्रताप को मनाने की कोशिश की। लेकिन, उन्हें चुनाव प्रचार करने से रोक दिया गया। वो तो कॉन्ग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार करना चाहते थे, लेकिन किसी तरह उन्हें मनाया गया। तारापुर में तेजस्वी ने मछली पकड़ते फोटो खिंचवाई तो तेज प्रताप ने ये कहा कि किसी जीव को यूँ तड़पाना ठीक नहीं, बच्चों को पढ़ाई की चीजें देते तो बेहतर रहता।

ऐसे प्रदर्शन के बाद कॉन्ग्रेस की बात तो नहीं ही की जानी चाहिए, लेकिन उसने जो दमखम दिखाने की कोशिश की थी वो कहीं नजर नहीं आया। चुनाव से पहले कन्हैया कुमार को गाजे-बाजे के साथ पार्टी में एंट्री कराई गई। 2019 लोकसभा चुनाव में लगभग सवा 4 लाख वोटों से हारने वाले कन्हैया कुमार को वैसे भी मीडिया द्वारा ऐसे पेश किया जाता रहा है, जैसे वो बहुत बड़े नेता हों। पटना में उन्होंने लालू यादव के विरुद्ध बयान भी दिया था, लेकन फिर चुपके से निकल लिए।

उनके दो अन्य साथियों जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल कहाँ थे और क्या कर रहे थे, कोई थाह-पता नहीं चला। शायद कॉन्ग्रेस के नेताओं को पता था कि मेहनत करने या न करने से कोई फायदा नहीं होने वाला, क्योंकि जनता उनका नाम भी नहीं सुनना चाहती। कॉन्ग्रेस के नेता चुनाव प्रचार के लिए कब आए और कब गए, किसी को नहीं मालूम। महज 3% वोट शेयर में सिमटी कॉन्ग्रेस दोनों सीटों पर जमानत भी न बचा पाई। दोनों जगह वो चौथे स्थान पर रहे, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) से पीछे।

CPI नेता और JNU छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने दोनों ही सीटों पर तीन-तीन दिन चुनाव प्रचार किया, इसीलिए ये पार्टी के साथ-साथ उनकी भी विफलता मानी जाएगी। बिहार में नीतीश कुमार के विरुद्ध तमाम असंतोष के बावजूद लोगों का मानना है कि विकास के लिए जदयू-भाजपा को ही वोट देना होगा और राजद अब कभी विकल्प नहीं बन सकती है। नीतीश कुमार की ‘विकास पुरुष’ की छवि बची हुई है और राजद का नाम नकारात्मकता का पर्याय बना हुआ है।

गुरुग्राम का पाठ रट लो हिंदुओ, लड़ोगे-डटे रहोगे तभी रुकेगा ये मजहबी तुष्टिकरण

स्थानीय हिंदुओं द्वारा कई दिनों तक लगातार किए गए विरोध के बाद गुरुग्राम प्रशासन ने कई सार्वजनिक स्थलों पर नमाज के लिए दी गई अनुमति को वापस ले लिया है। प्रशासन के इस फैसले से स्थानीय लोगों ने यह सोचते हुए राहत की साँस ली होगी कि उनकी तत्परता और संघर्ष ने प्रशासन को नमाज के लिए दी गई अपनी अनुमति वापस लेने के लिए बाध्य कर दिया। दूसरी ओर प्रशासन के इस फैसले को लेकर मुस्लिम समाज की संभावित प्रतिक्रिया क्या होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। जाहिर है, उनके लिए प्रशासन का यह कदम सुखद नहीं होगा।

स्थानीय हिंदुओं का यह कदम अन्य शहरों में लोगों को अपने आस-पास के सार्वजनिक स्थलों को बचाने और उनकी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहने को प्रेरित करेगा।

सार्वजनिक स्थलों पर नमाज़ पढ़ने को लेकर जो भी विरोध और विवाद हुआ, क्या वह होना चाहिए था? यह प्रश्न जितना सरल है उसका उत्तर भी उतना ही सीधा है। पर पता नहीं क्यों प्रशासन ने विवाद को इतने दिनों तक चलने दिया। एक दिन तो प्रशासन को नमाज के समय पुलिस बुलानी पड़ी। इस कार्रवाई के पीछे प्रशासन की मंशा भले ही कानून-व्यस्था सुनिश्चित करने की रही हो पर आम तौर पर लोगों के बीच यह सन्देश गया कि प्रशासन और सरकार पुलिस के देख-रेख में नमाज करवाना चाहती है। नमाज के समय यदि प्रशासन पुलिस बुलाती है तो जनता को ऐसी धारणा बनाने से नहीं रोक सकती कि सरकार पुलिस बुलाकर नमाज सुनिश्चित करना चाहती है।

प्रशासन का न केवल यह कदम अतार्किक था, बल्कि यह कहना भी सही नहीं लगा कि दोनों समुदाय के लोगों ने आपस में मिलकर यह तय किया है कि इन सार्वजनिक स्थलों पर नमाज पढ़ी जाएगी। किन सार्वजनिक स्थलों नमाज पढ़ी जाएगी, यह तय करना प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी है या स्थानीय लोगों की? ऐसे में प्रशासन यदि ऐसा कहकर एक न्यूनतम पारदर्शिता से कन्नी काटता रहे तो इन स्थलों पर नमाज का विरोध कर रहे हिंदुओं के मन में प्रशासन की ईमानदारी को लेकर शंका उत्पन्न क्यों न होगी? प्रतिक्रिया के रूप में धारणाएँ और शंकाएँ किसी न किसी क्रिया का ही परिणाम होती हैं। ऐसे में प्रशासन यह शिकायत करके भी पल्ला नहीं झाड़ सकता कि उसे गलत समझा गया।

इसका परिणाम यह होता है कि असामाजिक तत्वों, एजेंडा चलाने वालों तथा अन्य लोगों के लिए यह शोर मचाना आसान हो जाता है कि हिंदू समुदाय तो नमाज के विरुद्ध है।

वर्तमान शासन व्यवस्था में अपने मन से सार्वजनिक स्थलों पर किसी भी तरह का मजहबी कार्य शुरू कर देना कितना सरल या कठिन है, यह ऐसा प्रश्न है जिसे आए दिन पूछा जाना चाहिए। गुरुग्राम में हिंदुओं द्वारा नमाज का जो विरोध हुआ वह एक दिन की नमाज का परिणाम नहीं था। नमाज पढ़ने वालों के सामने समूह में खड़े होकर विरोध के पहले निश्चित तौर पर व्यक्तिगत स्तर पर शिकायत की गई और उचित परिणाम न दिखने पर ही सामूहिक विरोध का फैसला लिया गया।

ऐसे में गुरुग्राम में हुई घटनाएँ अन्य शहरों में न केवल लोगों के लिए बल्कि स्थानीय प्रशासन के लिए एक केस स्टडी की तरह होनी चाहिए। सार्वजनिक स्थलों पर इस तरह के मजहबी कार्यकलाप, दीर्घकाल में सामाजिक समरसता के लिए सही नहीं हैं।

मजहबी कार्यक्रमों के लिए सार्वजनिक स्थलों के उपयोग किए जाने को लेकर पारदर्शिता स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है। प्रशासन जितनी अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा, विवाद की आशंका उतनी ही कम रहेगी। समुदायों को यह समझने की आवश्यकता है कि सदियों/दशकों से आयोजित हो रहे सांस्कृतिक, सार्वजनिक या धार्मिक कार्यक्रमों को आगे रखकर नए मजहबी कार्यक्रम करने की माँग के लिए आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में स्थान सीमित है। ऐसे में हर सप्ताह नमाज जैसे कार्यक्रमों के लिए सार्वजनिक स्थलों की माँग न केवल सरकार और प्रशासन के लिए बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है।

इन सब के ऊपर, कुछ मजहबी रिवाज ऐसे हैं जिनके पालन के लिए रत्ती भर समझौता न करना आधुनिक सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध जाता है। ऐसी घटनाओं को लेकर विभिन्न शहरों का प्रशासन कितना सतर्क रहता है यह बात तो भविष्य के गर्भ में है पर यह सीमित संसाधनों से परेशान आधुनिक सरकारी और प्रशासनिक व्यवस्था के हित में है कि वह सतर्क रहे। दूसरी ओर अन्य शहरों के स्थानीय लोगों के लिए भी इसमें एक पाठ है कि सतर्क रहना आवश्यक क्यों है। स्वच्छंदता, स्वतंत्रता, स्वाधीनता और सांस्कृतिक लड़ाई, सबकी कीमत होती है और कीमत जितनी छोटी रहे उतना अच्छा।

जंतर-मंतर पर मुस्लिम विरोधी नारे: दिल्ली पुलिस ने दाखिल की चार्जशीट, रिपोर्ट में दावा- अश्विनी उपाध्याय को क्लीनचिट

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर भड़काऊ नारे लगाने के मामले में चार्जशीट दाखिल की है। टाइम्स नाउ के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय को क्लीन चिट देते हुए उन खबरों को खारिज कर दिया, जिनमें वकील को भड़काऊ भाषण देने का जिम्मेदार ठहराया गया था।

चार्जशीट में पुलिस ने कहा कि भाजपा के पूर्व प्रवक्ता ने औपनिवेशिक युग के कानूनों के खिलाफ रैली का आयोजन किया था। चार्जशीट में कहा गया ​है कि डांस टीचर से स्थानीय दक्षिणपंथी नेता बनने वाले गाजियाबाद निवासी उत्तम उपाध्याय ने जंतर-मंतर पर सांप्रदायिक नारे लगाए थे।

मालूम हो कि इस मामले में हिंदू रक्षा दल प्रमुख पिंकी चौधरी का नाम भी शामिल है। पिंकी चौधरी ने 31 अगस्त को दिल्ली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद उन्हें 30 सितंबर को जमानत दे दी गई थी। वहीं, अश्विनी उपाध्याय को 10 अगस्त को गिरफ्तार कर 11 अगस्त को जमानत दे दी गई थी। इस मामले में विनोद शर्मा, दीपक सिंह, विनीत बाजपेयी, प्रीत सिंह और दीपक कुमार को भी गिरफ्तार किया गया है। इससे पहले, एक ट्रायल कोर्ट ने चौधरी द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि “हम तालिबान नहीं हैं।”

गौरतलब है कि इस साल अगस्त में दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद बड़ी कार्रवाई करते हुए भाजपा नेता व सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय को गिरफ्तार कर लिया था। उन पर आरोप था कि उनके ‘भारत जोड़ो आंदोलन’ में मुस्लिम विरोधी नारे लगाए गए। उपाध्याय से पुलिस ने लगभग 6 घंटे तक पूछताछ की थी। इस विरोध प्रदर्शन में हजारों लोग शामिल हुए थे।

यूपी में नेता, नीति, संगठन और कार्यकर्ता विहीन कॉन्ग्रेस, इसलिए प्रियंका खेल रही हैं ‘घोषणाबाजी’ का सियासी जुआ

फरवरी 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा पर दाँव लगाया है। स्वयं प्रियंका इस चुनावी वैतरणी से पार उतरने के लिए ‘घोषणाबाजी’ की लोक-लुभावन राजनीति का जुआ खेल रही हैं। उन्होंने पिछले एक-डेढ़ महीने में लोक-लुभावन घोषणाओं की झड़ी लगाकर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की है।

उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों पर 40 फीसद महिला उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा के साथ इसकी शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस की सरकार बनने पर किसानों के कर्ज और और बिजली बिल माफ करने की घोषणा की। तीसरी बड़ी घोषणा लड़कियों को स्मार्टफोन और स्कूटी देने की और चौथी घोषणा नागरिकों को 10 लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा देने की है।

उन्होंने महिलाओं के लिए तीन रसोई गैस सिलेंडर और बस पास मुफ्त देने और बिजली बिल आधा करने जैसी घोषणाएँ भी की हैं। शिक्षा, रोजगार, व्यापार के सम्बन्ध में भी वे बहुत जल्द ऐसी कुछ लोक-लुभावन घोषणाएँ करने वाली हैं। लेकिन इन घोषणाओं के बारे में आम मतदाताओं और अधिकांश चुनाव विश्लेषकों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया यह है कि ‘न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी’, अर्थात् न तो कॉन्ग्रेस की सरकार बनेगी, और न ही इन हवा-हवाई घोषणाओं को पूरा करने की नौबत आएगी।

ऐसा नहीं है कि स्वयं प्रियंका या उनकी पार्टी इस सच्चाई से अवगत नहीं हैं। फिर यह प्रश्न उठता है कि वे यह जुआ क्यों खेल रही हैं? दरअसल, यूपी में मरणासन्न कॉन्ग्रेस की जान बचाए रखने के लिए उनके पास इस तरह का जुआ खेलने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। लेकिन जुए की तरह इस दाँव का खतरा यह है कि ‘छब्बे बनने चली कॉन्ग्रेस कहीं दुबे’ बनकर न रह जाए!

प्रियंका गाँधी की इन घोषणाओं से एक सवाल यह भी उठता है कि उनकी पार्टी यह घोषणाएँ पंजाब, उत्तराखंड, गोवा या मणिपुर जैसे अन्य चुनावी राज्यों में क्यों नहीं कर रही है? क्या वहाँ की महिलाओं, किसानों और गरीबों को इसकी जरूरत नहीं है? जरूरत तो है लेकिन वहाँ कॉन्ग्रेस चुनावी गुणा-गणित में है। इसलिए जुआ खेलने से परहेज कर रही है।

यूपी में कॉन्ग्रेस की दुर्दशा जगजाहिर है। इसीलिए जुआ खेला जा रहा है। यह सवर्ण मतदाताओं को फुसलाकर भाजपा को कमजोर करने की सुचिंतित रणनीति भी है। उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस के परंपरागत वोट बैंक रहे सवर्ण मतदाता 1989 में उसके क्रमिक अवसान के बाद भाजपा की ओर चले गए हैं। भाजपा के उभार में हिंदुत्ववादी राजनीति और सवर्ण जातियों के ध्रुवीकरण की निर्णायक भूमिका रही है।

उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की बैसाखी के सहारे कॉन्ग्रेस 7 सीट और 5 फीसद मत प्राप्त कर सकी थी। इस बार समाजवादी पार्टी ने उसे झटक दिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ सोनिया गाँधी चुनाव जीत सकी थीं। तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी तक कॉन्ग्रेस परिवार की परम्परागत सीट से बड़े अंतर से चुनाव हार गए थे। इस तरह के निराशाजनक चुनाव परिणामों के बावजूद कॉन्ग्रेसियों द्वारा पिछले 4-5 साल में जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने या फिर जनता के बीच जाने की जहमत नहीं उठाई गई।

पार्टी की इसी निष्क्रियता और किंकर्तव्यविमूढ़ता से त्रस्त होकर जितिन प्रसाद जैसे बड़े नेता कॉन्ग्रेस से किनारा करके सत्तारूढ़ भाजपा की नैया पर सवार हो गए हैं। कॉन्ग्रेस के निराशाजनक वातावरण के चलते कॉन्ग्रेस के अनेक छोटे-बड़े नेता अपने भविष्य की चिंता में अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर खिसक रहे हैं। वे सब अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति आशंकित हैं।

आज यूपी में कॉन्ग्रेस की हालत यह है कि उसके पास न तो नेता है, न नीति है, न संगठन है, न ही कार्यकर्ता है। लल्लू के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस आज भाजपा, सपा, बसपा जैसी पार्टियों के बाद दूरस्थ चौथे स्थान पर है। राष्ट्रीय लोकदल, आम आदमी पार्टी, पीस पार्टी और एआईएमआईएम जैसे छोटे दल आगामी चुनाव में उससे आगे निकल कर चौथे स्थान पर आने की फिराक में हैं। इस परिस्थिति में प्रियंका के पास ‘घोषणाबाजी’ के जुए के अलावा विकल्प ही क्या बचता है?

प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा की जा रही इन घोषणाओं के वास्तविक मायने क्या हैं? दरअसल, किसी जमाने में दक्षिण भारत से शुरू हुई लोक-लुभावन घोषणाओं और मुफ्तखोरी की यह राजनीति आज दिल्ली तक पैर पसार चुकी है। वोट के बदले फ्री साड़ी, टीवी, फ्रीज और बिजली-पानी देने की रणनीति यदा-कदा और यत्र-तत्र सफल भी हुई है। संभवतः प्रियंका की प्रेरणा भी यही है। 

प्रियंका ने महिलाओं को लुभाने के लिए उन्हें 40 फीसदी पार्टी टिकट देने का जो दाँव खेला है, उससे न तो महिलाओं का भला होने वाला है, न ही कॉन्ग्रेस पार्टी को कुछ लाभ मिलने वाला है। कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए चुनाव लड़ सकने वाली 161 महिला प्रत्याशियों का जुगाड़ करना टेढ़ी खीर साबित होने वाली है। जो पार्टी ‘न तीन में है, न तेरह में है’, उसके टिकट पर चुनाव लड़ कर कोई महिला अपने राजनीतिक भविष्य को भला क्यों कर स्वाहा करेगी!

यह घोषणा खाना-पूर्ति से अधिक कुछ नहीं है। विडम्बनापूर्ण ही है कि जिस मंच से उन्होंने यह घोषणा की थी, उस पर मौजूद 15 लोगों में प्रियंका सहित कुल तीन ही महिलाएँ थीं। अगर कॉन्ग्रेस पार्टी महिला सशक्तिकरण के प्रति वास्तव में गंभीर थी तो उसने यूपीए सरकार के 10 साल के कार्यकाल में महिला आरक्षण विधेयक पास क्यों नहीं किया? या फिर सांगठनिक पदों की नियुक्तियों में महिलाओं की भागीदारी क्यों नहीं बढ़ाई? अगर ऐसा किया होता तो आज उन्हें 161 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए दमखम वाली प्रत्याशियों का टोटा न पड़ता!

उत्तर प्रदेश मंडल और कमंडल की कोख से निकली जातिवादी और हिंदुत्ववादी आधारित राजनीति की प्रयोगशाला है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों और पिछले विधानसभा चुनाव में जाति का जादू नहीं चला। लोगों ने विकास और बदलाव के लिए मतदान किया। यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी विधान-चुनाव में उत्तर प्रदेश का मतदाता फिर से विकास और सुशासन के लिए मतदान करता है या फिर जातिवादी राजनीति की ओर वापसी करता है।

वर्तमान परिदृश्य में कॉन्ग्रेस के साथ न तो कोई जाति जुड़ती दिखती है और न ही उनके पास विकास एवं बदलाव का कोई विश्वसनीय मॉडल है। प्रियंका को यह समझने की आवश्यकता है कि यूपी में कॉन्ग्रेस शून्य है और उसे किसी निर्णायक भूमिका में आने के लिए दूरगामी नीति और लम्बे संघर्ष की आवश्यकता है। क्या प्रियंका के पास उतना धैर्य, समय और इच्छाशक्ति है? दो-चार महीने मीडिया और सोशल मीडिया में सक्रिय रहने मात्र से उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य में चुनाव जीतने के मंसूबे ख्याली पुलाव पकाने से अधिक कुछ नहीं हैं।

महज जबानी जमा खर्च से न तो जनता को लुभाया जा सकता है, न ही भरमाया जा सकता है। प्रियंका इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सपा अखिलेश यादव और बसपा मायावती के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। यह जानते हुए भी वे अपने चुनाव लड़ने के सवाल पर कन्नी काट रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे स्वयं आगामी चुनाव में होने वाले कॉन्ग्रेस के हश्र से आशंकित हैं। नेतृत्वविहीन कॉन्ग्रेस भला क्या चुनाव लड़ेगी? इसलिए प्रियंका हारते हुए जुआरी की तरह ‘घोषणाबाजी’ का दाँव खेल रही हैं।  

चुनाव लड़ने-न लड़ने को लेकर प्रियंका का ‘दोचित्तापन’ उनके वादों और दावों को संदिग्ध बनाता है। इससे उनकी चुनावी रणनीति कमजोर पड़ती है। उन्हें जल्दी से जल्दी निर्णय लेकर या तो खुद के चुनाव  लड़ने की स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए या फिर सपा-बसपा जैसी किसी पार्टी की पूँछ पकड़कर यह चुनावी वैतरणी पार करने का जतन करना चाहिए। प्रियंका के इस ‘दोचित्तेपन’ और सियासी जुए के चलते साख-संकट से जूझती कॉन्ग्रेस शून्य पर सिमट जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए।  

पटाखों और ऑक्सीजन पर विलाप करती रोशनी अली ने टीवी शो में किया ‘नागिन डांस’

कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका डालकर पश्चिम बंगाल में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की माँग करने वाली तथाकथित ‘कार्यकर्ता’ रोशनी अली एक न्यूज चैनल पर डिबेट के दौरान ‘नागिन डांस’ करने लगी। रिपब्लिक बांग्ला पर एक पैनल में शामिल अली को जब अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला तो उन्होंने डांस करना (31:50 मिनट पर) शुरू कर दिया। जैसे ही कई पैनलिस्टों ने एक साथ बोलना शुरू कर दिया तो रोशनी अली ने उनका ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए ‘नागिन डांस’ करना शुरू कर दिया।

अली ने पटाखों पर प्रतिबंध की जरूरत के बारे में बताते हुए कहा, “कुछ महीने पहले हम ऑक्सीजन के लिए परेशान थे और ऑक्सीमीटर पर अपने ऑक्सीजन के स्तर की जाँच कर रहे थे।” वह हवा की गुणवत्ता के साथ महामारी के दौरान मेडिकल ऑक्सीजन की आवश्यकता को आपस में लिंक कर रही थीं। हालाँकि, पैनल में शामिल अन्य लोगों ने उन्हें बीच में ही रोक दिया, तभी वह डांस करने लगीं।

उल्लेखनीय है कि अली पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध को खारिज करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नाराज हैं। उन्होंने कहा कि वह फिर से पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील करने वाली हैं। इसकी जानकारी उन्होंने एक इंस्टाग्राम वीडियो के जरिए दी। इसमें अली ने कहा था, “जैसा कि आप देख सकते हैं कि मैं कलकत्ता हाईकोर्ट में हूँ। लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। मैं एक अपील करने जा रही हूँ और अभी भी अपने साँस लेने के अधिकार के लिए लड़ूँगी। यह सिर्फ पर्यावरण को लेकर नहीं है, बल्कि यह हमारे व्यक्तिगत स्वास्थ्य को लेकर है जो इस तरह के फैसले से दाँव पर लगा है। यह सिर्फ कलकत्ता नहीं, बल्कि पूरा देश देख रहा है।”

मंगलवार (2 नवंबर 2021) की देर रात रोशनी अली ने फेसबुक पर एक पोस्ट अपलोड किया, जिसमें अली ने लोगों से कहा कि जो कोई भी उनसे इंटरव्यू, ऑनलाइन शो या इंस्टाग्राम लाइव के लिए बुलाना चाहते हैं, वो उन्हें ईमेल कर सकते हैं। रोशनी ने पोस्ट में अपनी ईमेल आईडी शेयर की है।

रोशनी अली का फेसबुक पोस्ट

अपने मामले को मजबूत करने और निष्पक्ष दिखाने के लिए अली ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जी-20 जलवायु शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण को भी शेयर करती रही हैं।

‘विक्टिम कार्ड और कार्यकर्ता’

अली ने विक्टिम कार्ड खेलते हुए ‘ TheQuint‘ को दिए अपने इंटरव्यू में आरोप लगाया कि उनका सरनेम ‘अली’ होने के कारण ‘घृणा’ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया, “यह बहुत ही सांप्रदायिक मामला बन गया है और मेरे अली सरनेम को नफरत के मुख्य कारण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह मजहब के बारे में नहीं है। हम एक वैश्विक जागरूक समुदाय का हिस्सा हैं और जलवायु परिवर्तन हमारी वास्तविकता का एक हिस्सा है।”

हालाँकि, जब अली से पूछा गया कि क्या उन्होंने मस्जिदों में लाउडस्पीकर द्वारा दिये जा रहे अज़ान पर प्रतिबंध लगाने के लिए समान सक्रियता और सामाजिक जागरूकता दिखाईं, तो उन्होंने दावा किया कि ‘यह मजहब के बारे में नहीं है।’

‘पटाखे ऑक्सीजन की मात्रा को कम करते हैं’

पटाखों के पीछे पड़ने पर अली ने कहा, “ग्रीन क्रैकर्स या अन्य पटाखे, वे बहुत अधिक ऑक्सीजन सोखते हैं। हम मुश्किल समय में जी रहे हैं, हमारे फेफड़े पीड़ित हैं। हमें ऐसे त्योहारों की आवश्यकता क्यों हैं, चाहे वह हिंदू, मुस्लिम, सिख, नया साल हो… जो हमारे फेफड़ों को मारता है…? हम अपनी धार्मिक पहचान से कहीं बढ़कर हैं।”

रोशनी अली ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद G24 ऑवर के साथ एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि उन्हें “एलर्जी” है। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने दिवाली से तीन दिन पहले ऐसा कहा था। बता दें कि रोशनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने शुक्रवार (29 अक्टूबर, 2021) को दीवाली/काली पूजा के दौरान पूरे पश्चिम बंगाल में सभी प्रकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। हालाँकि, सोमवार (1 नवंबर 2021) को सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के इस फैसले को रद्द कर दिया

‘बच्चों के दिमाग पर पड़ेगा बुरा असर’: NCERT को बाल आयोग का नोटिस, लड़का-लड़की के लिए अलग टॉयलेट्स पर खड़ा किए थे सवाल

NCERT में जेंडर को लेकर की गई अजीबोगरीब बातों के बाद ‘राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (NCPCR)’ ने संस्था के निदेशक को नोटिस भेजा है। NCPCR को ड्राफ्टिंग कमिटी के ‘टीचर्स ट्रेनिंग मैन्युअल’ के खिलाफ शिकायत मिली थी। इसमें कहा गया है कि जेंडर की संवेदनशीलता पढ़ाने के नाम पर स्कूली छात्रों को एक बुरा अनुभव दिया गया। इसके बादल बच्चों के अधिकार के हनन के मामले में NCPCR ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। ये शिकायत ‘इन्क्लूजन ऑफ ट्रांसजेंडर चिल्ड्रन इन स्कूल एजुकेशन: कन्सर्न्स एन्ड रोडमैप’ नामक चैप्टर को लेकर है।

NCPCR ने लिखा है, “इसके टेक्स्ट में बच्चों के लिए जेंडर न्यूट्रल इंफ्रास्ट्रक्चर की बात की गई है, जो जेंडर की वास्तविकता और उनकी जरूरतों के अनुरूप नहीं है। सबके बायोलॉजिकल ज़रूरतें अलग-अलग हैं और सबके लिए एक ही व्यवस्था करने से उनके समान अधिकारों का हनन होगा। इससे बच्चों को घर और विद्यालय में विरोधाभासी माहौल मिलेगा, जिससे उनके दिमाग पर असर पड़ेगा। इसमें बच्चों के साथ पुबर्टी ब्लॉकर्स और उनकी किशोरावस्था के बारे में बात करने की सलाह भी दी गई है।”

NCPCR ने अपनी नोटिस में लिखा है कि ड्राफ्टिंग कमिटी के सदस्यों के बैकग्राउंड और उनकी योग्यताओं की पुष्टि नहीं की गई थी। इसीलिए, NCERT के निदेशक को इस सम्बन्ध में उचित कार्रवाई करने के लिए लिखा गया है। NCPCR को भेजी गई शिकायत में इसे एक आपराधिक षड्यंत्र करार दिया गया था। इसमें कहा गया था कि जेंडर बायोलॉजिकल है, और ये प्राकृतिक एवं आर्गेनिक प्रक्रिया है, जो व्यक्ति के साथ अंत तक पहचान के रूप में जुड़ी रहती है।

इसमें कहा गया है कि हम ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए अलग से टॉयलेट्स व अन्य फैसिलिटीज विकसित कर सकते हैं, सबके लिए समा इंफ्रास्ट्रक्चर की बजाए। बताया गया है कि ड्राफ्टिंग कमिटी के सदस्यों का बैकग्राउंड संदिग्ध है और उनमें से एक ने CAA विरोधी अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। CAA विरोधी दंगों के कैदियों और राजनीतिक बंदियों को छुड़ाने की माँग करने वाले व्यक्ति को इसमें जगह मिल गई। साथ ही उस सदस्य द्वारा NRC को कूड़ा बताते हुए दिल्ली दंगों के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहराया गया था।

बता दें कि

नेशनल काउंसिल ऑफ एड्युकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) द्वारा जेंडर और ट्रांसजेंडर विषय पर शिक्षकों के लिए जारी किया गया विवादित मैनुएल अब साइट से गायब है। 115 पेज का मैनुएल डॉ पूनम अग्रवाल, प्रोफेसर, जेंडर स्टडीज विभाग पूर्व अध्यक्ष और कई शिक्षकों ने मिलकर तैयार किया था। मैनुएल की अजीब बात ये थी कि इसमें ट्रांस्जेंडर्स के साथ होते भेदभाव के पीछे ये कारण दिया गया था कि स्कूलों में जो अलग-अलग शौचालय बनाए जाते हैं उससे ये लिंग भेद बढ़ता है।

अब इसी प्रोग्राम के एक सेक्शन में एक बेहद अजीबोगरीब मुद्दा भी उठाया गया था। लिंग विविधता पर बात करते हुए इसमें कहा गया था कि ज्यादातर स्कूलों में दो तरह के टॉयलेट होते हैं जिनका उद्देश्य ये बताना होता है कि दुनिया में सिर्फ दो सेक्स हैं- पुरुष और महिला। प्रोग्राम के दस्तावेज के अनुसार, “ढाँचागत सुविधा के रूप में टॉयलेट का इस्तेमाल बच्चों को दो लिंगों में बदलने के लिए किया जाता है। लड़कियों को इस तरह से समझाया जाता है कि वो गर्ल्स टॉयलेट में जाएँ और लड़कों को बताया जाता है कि वो लड़के वाले टॉयलेट में ही जाएँ।”