ड्रग्स केस में गिरफ्तार आर्यन खान को जमानत नहीं मिली है। फिलहाल वे आर्थर रोड जेल में बंद हैं। इधर मन्नत पहुँच बॉलीवुड सितारे आर्यन के माता-पिता शाहरुख और गौरी को हौसला दे रहे हैं। बावजूद बेटे की टेंशन में दोनों की नींद उड़ गई है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों बेहद असहाय महसूस कर रहे हैं और उनकी भूख-प्यास, नींद सब कुछ गायब हो गई है। इस घटना से शाहरुख की ब्रांड वैल्यू पर भी संकट बताए जा रहे हैं।
हाल में ही गौरी खान को अपने जन्मदिन पर कोर्ट के बाहर नम आँखों के साथ देखा गया था। गौरी को उम्मीद थी कि उनके बेटे को बेल मिल जाएगी। लेकिन इसके विपरीत कोर्ट ने आर्यन को राहत नहीं दी। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार शाहरुख और गौरी को नहीं लगा था कि ये मामला इतना लंबा चलेगा।
आर्यन की गिरफ्तारी की खबर जैसे ही आई शाहरुख ने तुरंत देश के बेस्ट लीगल एक्सपर्ट्स से सलाह ली थी। सतीश मानशिंदे ने इस केस को अपने हाथों में लिया था। सतीश ने शाहरुख को आश्वासन दिलाया कि आर्यन को जल्द रिहा करवा लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किला कोर्ट ने आर्यन की जमानत अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थीकि उसे जमानत याचिका पर सुनवाई करने का अधिकार नहीं है। अब आर्यन की जमानत पर 13 अक्टूबर को सुनवाई होनी है। रिष्ठ वकील अमित देसाई, जिन्होंने हिट एंड रन केस में सलमान खान की पैरवी की थी वे भी इस मामले को देख रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक गौरी और शाहरुख दिनभर में कई बार कॉल अपने बेटे के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लेते हैं। साथ ही आर्यन के परिवार ने उसे कपड़े और घर का बना खाना देने की रिक्वेस्ट भी की थी।
खतरे में शाहरुख की ब्रांड वैल्यू?
आर्यन खान की गिरफ्तारी का असर शाहरुख खान की प्रोफेशनल लाइफ पर भी पड़ा है। एक्टर ने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘पठान’ के इंटरनेशनल शूटिंग शेड्यूल को भी रद्द कर दिया है और डायरेक्टर एटली की फिल्म की शूटिंग भी स्थगित कर दी है। साथ ही एक एड्यूकेशन ब्रांड BYJU ने भी शाहरुख खान के विज्ञापनों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है।
बायजू किंग खान के लिए सबसे बड़े स्पॉन्सरशिप डील्स में से एक था। बायजू अपने ब्रांड को एंडोर्स करने के लिए अभिनेता को सालाना 3-4 करोड़ रुपए का भुगतान करता है। शाहरुख साल 2017 से इसके ब्रांड एंबेसडर हैं।
इसी तरह अन्य बड़े ब्रांड ने भी अपने विज्ञापन और डील अनिश्चित काल के लिए रोक दिया है। यानी इस फेस्टिव सीजन में शाहरुख को बेटे के केस के कारण आर्थिक झटका भी लगा है। हाल में विमल इलायची ने भी अपन नया ऐड बिना शाहरुख के सिर्फ अजय देवगन के साथ शूट की। D’Decor, Big Basket, LG जैसे ब्रैंड्स को भी शाहरुख एंडॉर्स करते हैं।
वे इस फेस्टिव सीजन पर धमाकेदार वापसी की तैयारी में थे। लेकिन, अब उनकी तैयारियों पर संकट के बदल छा गए हैं और इसके साथ उनकी ब्रांड वैल्यू भी कमजोर होती दिख रही है। बता दें कि शाहरुख की ब्रांड वैल्यू 378 करोड़ बताई जाती है। किंग खान इस समय 40 ब्रांड प्रमोट कर रहे हैं। हर एक ब्रांड एंडॉर्समेंट के लिए वे लगभग 4 करोड़ रुपए लेते हैं। है।
समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियाँ शुरू कर दी हैं और इसके नेता जगह-जगह रैलियाँ कर रहे हैं। इसी क्रम में सपा ने जालौन में रैली का आयोजन किया। सपा की इस जनसभा में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल भी पहुँचे। लेकिन, उनके बयान के कारण पार्टी की ही फजीहत हो गई। उन्होंने अखिलेश यादव पर ही निशाना साध दिया।
बता दें कि अखिलेश यादव सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। जब अन्य नेताओं का भाषण चल रहा था, उस दौरान नरेश उत्तम पटेल मंच पर ही कुर्सी पर बैठे हुए थे। बैठे-बैठे ही वो ऊँघने लगे और फिर सो गए। हालाँकि, कुछ देर बाद उनकी तंद्रा भंग हुई और उन्होंने अपना भाषण दिया। फिर उन्होंने पत्रकारों से बात की। इसी दौरान उन्होंने ऐसा बयान दे दिया जिससे उनकी जम कर किरकिरी हुई। जानिए उन्होंने क्या कहा।
दरअसल, सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल ये कह बैठे कि अखिलेश यादव ने किसानों को तबाह कर दिया है। हालाँकि, कुछ देर बाद उन्हें अपने जुबान फिसलने का एहसास हुआ और फिर उन्होंने अपनी गलती को सुधारा। इस दौरान उन्होंने कहा कि भाजपा के राज में खेती घाटे का सौदा हो गया है और केंद्र की गलत नीतियों के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की तानाशाही के कारण किसानों को उनका हक़ नहीं मिल पा रहा।
उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस और भाजपा में कोई अंतर नहीं है। जो भाजपा है, वही कॉन्ग्रेस है। 45 साल कॉन्ग्रेस ने राज किया। किसानों को तबाह कर दिया। अब घड़ियाली आँसू बहा रहे। किसानों को तबाह कर दिया हमारे नेता अखिलेश यादव जी ने। दो-दो करोड़ रुपए किसानों के परिवारों को देने की बात कही। एक-एक नौकरी देने की बात कही। इस्तीफा मंत्री अजय मिश्रा के बेटे को इस्तीफा देना चाहिए, लेकिन भाजपा उस पर पर्दा डाल रही है और कॉन्ग्रेस मरहम लगा रही है।”
बता दें कि 65 वर्षीय नरेश उत्तम पटेल को जनवरी 2017 में सपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। वो 2006 से ही विधान परिषद के सदस्य भी हैं। वो 1989 में फतेहपुर के जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र से जनता दल के टिकट पर विधायक बने थे। कुर्मी समुदाय से आने वाले नरेश उत्तम पटेल ने कानपुर विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट कर रखा है। मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे नरेश उत्तम पटेल सपा के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।
“हर गुरुवार को, जलाराम बापा मंदिर (Jalaram Bapa Temple) में शाम की आरती होती थी। फिर एक दिन शौकत अली ने मंदिर के ठीक सामने एक घर खरीदा। उसने आरती का विरोध करना शुरू किया। धीरे-धीरे सोसाइटी के 28 घरों को मुसलमानों ने खरीद लिया और अब मंदिर में आरती बंद हो गई है। इतना ही नहीं, मंदिर को अब बेचने की भी तैयारी है।” यह कोई कहानी नहीं है बल्कि भरूच से जुड़ा वह कड़वा सच है जो नाम न छापने की शर्त पर हमारे एक सूत्र ने हमें बताया।
मंदिर बेचने के लिए लगाया गया पोस्टर (साभार- गुजरातवॉच)
उन्होंने आगे बताया, “भरूच के कुछ हिस्सों में 2019 में अशांत क्षेत्र अधिनियम लागू किया गया था, लेकिन प्रशासन सहित कुछ लोगों ने इसमें छिपी खामियों का फायदा उठाते हुए कुछ क्षेत्रों में पूरी जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) ही बदल डाला। अब स्थिति यह हो गई है कि हिंदू केवल भरूच के सोनी फलियो (Soni Faliyo) और हाथीखाना (Hathikhana) क्षेत्रों में रह गए हैं। अब वहाँ भी मुश्किल से कोई 20-25 हिंदू परिवार बचे हैं। और वो भी अब यहाँ से अपने घरों को बेचकर और वह इलाका छोड़ देने का फैसला कर चुके हैं।”
कैसे उन इलाकों में यह पूरा खेल खेला गया। उन्होंने समझाते हुए कहा, “मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। आप और मैं दोनों एक ही रेजिडेंशियल सोसाइटी में रह रहे हैं। आप मकान नंबर 11 में रहते हैं और मैं मकान नंबर 12 में, सामान्य तर्क यह कहता है कि यदि यह क्षेत्र अशांत क्षेत्र अधिनियम के अंतर्गत आता है तो एक रेसिडेंशियल सोसाइटी के सभी घर अशांत क्षेत्र अधिनियम के तहत आएँगे। लेकिन कुछ नौकरशाहों और अन्य लोगों ने उन खामियों का लाभ लेते हुए दावा करते हैं कि एक घर एक टीपी योजना के तहत आता है और दूसरा दूसरे में और इसलिए एक घर अशांत क्षेत्र अधिनियम के तहत आता है जबकि दूसरा नहीं। और यहीं से एक को खरीदने-बेचने का तरीका निकाल लिया जाता है। फिर भी हर कोई इस जनसांख्यिकी परिवर्तन से आँखें मूँदे हुए है।”
स्थानीय मीडिया चैनल गुजरातवॉच द्वारा शूट किए गए इस वीडियो में दिखाया गया है कि कैसे हिन्दू अपने घरों और मंदिरों को बेचने के लिए मजबूर हैं। वहाँ लगे एक बैनर पर लिखा है, “इस चॉल के निवासी हिंदू हैं लेकिन अब यह सब बिकने को है।”
हालाँकि, मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों का यह भी कहना है कि जब वहाँ के निवासियों ने इन खामियों का फायदा उठाकर मुस्लिमों द्वारा संपत्ति पर कब्जा करने का विरोध किया, तो पुलिस और प्रशासन ने उन पर शांति भंग करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ ही मामला दर्ज करने की धमकी दी। उन्होंने कहा, “सरकार हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए चुनी गई थी, यही वजह है कि वे जबरन धर्मांतरण विरोधी कानून, अशांत क्षेत्र अधिनियम जैसे कानून भी लाए, लेकिन इस तरह की खामियों का फायदा उठाया जा रहा है और प्रशासन कुछ नहीं कर रहा है।”
इस सोसाइटी के निवासियों में से एक, गौरांग राणा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि यह एक पूरी कार्यप्रणाली है जहाँ हिंदुओं के घर पहले किसी हिंदू खरीदार द्वारा खरीदे जाते हैं और केवल 2-3 महीनों के भीतर एक मुस्लिम व्यक्ति इसे हिंदू खरीदार से खरीद लेगा। उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या आपने कभी ऐसा लेन-देन देखा है जहाँ एक व्यक्ति घर को बेचने से पहले सिर्फ 2 महीने के लिए उसका मालिक हो? यह सब तब है जब ये घर अशांत क्षेत्र अधिनियम के तहत आते हैं?”
ऑपइंडिया ने पहले भी आपको बताया था कि कैसे इसी तरह का मामला सूरत से भी आया था, जहाँ एक मुस्लिम बिल्डर ने सूरत के अदजान इलाके में जमीन खरीदने के लिए एक अस्थाई हिंदू पार्टनर को आगे करके लाभ उठाया था, वहाँ भी अशांत क्षेत्र अधिनियम लागू था। अधिनियम को दरकिनार करते हुए, एक मंदिर के बगल में एक बिल्डिंग के निर्माण की अनुमति उस अस्थाई हिंदू पार्टनर को आगे करके मुस्लिम व्यक्ति द्वारा प्राप्त कर ली गई थी।
क्षेत्र में बचे हिंदू परिवारों के बढ़ते संकट पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ एक मंदिर है जहाँ आरती-भजन होता है। पहले वे (नए मुस्लिम निवासी) हंगामा करेंगे और स्पीकर के उपयोग पर आपत्ति करेंगे। जब हम फलिया (सामुदायिक क्षेत्र) में बैठते हैं, तो वे (मुस्लिम) हम पर मिसबिहैब करने का आरोप लगाते हैं और हमें झूठे मामलों में फँसाने की धमकी देते हैं। इस तरह हमारे लिए यहाँ रहना अब बहुत मुश्किल हो गया है।”
“हम इस मानसिक प्रताड़ना से तंग आ चुके हैं। हमने प्रशासन के सामने प्रेजेंटेशन दिया है लेकिन उससे कुछ नहीं हुआ। ऑपइंडिया ने भरूच जिले के अधिकारियों से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन अभी बात नहीं हो पाई है।
2 सितंबर, 2021 को गुजरात के मुख्यमंत्री को लिखे गए एक पत्र में यहाँ के निवासियों ने भी अपनी पीड़ा व्यक्त की है। सोनी फलिया के निवासियों ने प्रशासन को लिखे पत्र में मुस्लिम मालिकों को संपत्ति के अवैध हस्तांतरण का आरोप लगाते हुए कहा कि क्षेत्र की जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है और यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बदल गया है। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो वे सार्वजनिक स्थानों पर जानवरों की कुर्बानी करना शुरू कर सकते हैं जो कि हिंदुओं, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के लिए परेशान करने वाला हो सकता है, जो मुख्य रूप से शाकाहारी हैं। इसी तरह यह हिंदू त्योहारों के उत्सवों में भी बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। उन्होंने पहले ही जलाराम बापा मंदिर और इलाके के शिव मंदिर में धार्मिक गीत बजाना बंद कर दिया है।
मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र
यह बताते हुए कि पहले भी इस इलाके में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हुई हैं, निवासियों का यह आरोप है कि मुस्लिम मालिकों को संपत्ति बेचने वाले रमेश प्रजापति (इंतावाला) सांप्रदायिक कलह का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि प्रजापति को मुस्लिमों को संपत्ति बेचने के लिए मोटी रकम मिली है।
हालाँकि, सोसाइटी के लोगों ने बताया कि संपत्ति के इस तरह के हस्तांतरण के लिए एक उच्च स्तरीय जाँच शुरू की गई है। साथ ही यहाँ के निवासियों ने एक बड़ी साजिश का आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि पहले एक या दो मुसलमान ऊँची दर पर हिन्दुओं की संपत्ति खरीदेंगे। ऐसे में क्षेत्र के बाकी हिंदू इस ट्रैप से प्रभावित हो जाते हैं और अपने घर बेच देते हैं। बाद में, जब जनसांख्यिकी बदल जाती है, तो शेष हिंदुओं को जनसांख्यिकी में बदलाव के कारण अपनी संपत्ति कम दामों पर मजबूरन बेचनी पड़ती है। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में यह भी कहा गया है, “बहुत सारे हिंदू क्षेत्र अब मुस्लिम बहुल क्षेत्र बन गए हैं।”
क्या है अशांत क्षेत्र अधिनियम
जिला प्रशासन, सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए, कुछ क्षेत्रों को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकता है, जो जनसांख्यिकी परिवर्तन के लिए अतिसंवेदनशील हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया की आवश्यकता होगी। विक्रेता को आवेदन में यह उल्लेख करना होगा कि विक्रेता अपनी मर्जी से संपत्ति बेच रहा है।
अशांत क्षेत्र अधिनियम की अक्सर गलत व्याख्या की जाती है कि यह वहाँ लागू होता है जहाँ खरीदार और विक्रेता के बीच कम से कम एक पक्ष हिंदू या मुस्लिम होता है। जबकि बात यह है कि ऐसे क्षेत्रों में इस तरह के किसी भी लेन-देन के एक लिए उचित प्रक्रिया का पालन करना होगा। यह उन क्षेत्रों के धार्मिक और सामुदायिक मूल्य और पहचान को संरक्षित करने के लिए है जो जनसांख्यिकीय परिवर्तन के लिए अतिसंवेदनशील हैं।
इस तरह के किसी भी आवेदन के बाद एक कलेक्टर औपचारिक जाँच करेगा और पुलिस और जिला मजिस्ट्रेट को भी जाँच करनी होगी। ऐसे मामलों में, अधिकारियों को खुद उस प्रॉपर्टी पर जाना होता है और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी लेनी होती है। यहाँ तक कि प्रभावित लोगों से लिखित स्वीकृति भी लेनी होती है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो उस विशेष संपत्ति के आस-पास रहते हैं। एक बार प्रक्रिया का पालन करने और कलेक्टर के संतुष्ट होने के बाद ही वह संपत्ति के हस्तांतरण को मंजूरी देगा।
गौरतलब है कि जिले के कलेक्टर पर अपने क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम रखने और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस तरह की गतिविधियाँ आगे न बढ़ें और सांप्रदायिक दंगे न हों, इन नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी भी कलेक्टर की होती है। इस अधिनियम के माध्यम से, सरकार राज्य के संवेदनशील हिस्सों में समुदायों के ध्रुवीकरण पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मानवाधिकार के नाम पर कुछ लोग देश की छवि खराब करने में लगे हैं। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में कुछ लोग मानवाधिकार की व्याख्या अपने-अपने हितों को ध्यान में रखकर अपने-अपने तरीके से करने लगे हैं। एक ही प्रकार की एक घटना में उन्हें मानवाधिकार का हनन दिखता है, लेकिन वैसी ही दूसरी घटना में उन्हीं लोगों को यह नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि इस तरह का सलेक्टिव व्यवहार लोकतंत्र के लिए भी उतना ही नुकसानदायक होता है और मानवाधिकार का सबसे अधिक हनन तब होता है, जब उसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के 28वें स्थापना दिवस पर बोलते हुए उन्होंने मानवाधिकारों और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बीच संबंधों की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि देश में मानवाधिकारों का सम्मान काफी हद तक लंबे स्वतंत्रता संग्राम के कारण है, जिससे राष्ट्र गुजरा। पीएम मोदी ने कहा, “हमने सदियों से अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और एक देश और समाज के रूप में हमेशा अन्याय और अत्याचार का विरोध किया।”
उन्होंने कहा, “जब पूरी दुनिया विश्व युद्ध की हिंसा में झुलस रही है, भारत ने पूरी दुनिया को अधिकार और अहिंसा का मार्ग सुझाया है। बापू को देश ही नहीं, पूरा विश्व मानवाधिकारों और मानवीय मूल्यों के प्रतीक के रूप मे देख रहा है। बीते दशकों में ऐसे कितने ही अवसर विश्व के सामने आए हैं, जब दुनिया भ्रमित हुई है, भटकी है लेकिन भारत मानवाधिकारों के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहा है, संवेदनशील रहा है।”
पीएम मोदी ने कहा कि भारत ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ के महान आदर्शों, संस्कारों और विचारों को लेकर चलने वाला देश है। आत्मवत सर्वभूतेषु यानि जैसा मैं हूँ वैसे ही सब मनुष्य हैं। मानव-मानव में, जीव-जीव में भेद नहीं है।
तीन तलाक का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि बीते वर्षों में देश ने अलग-अलग वर्गों में अलग-अलग स्तर पर हो रहे अन्याय को भी दूर करने का प्रयास किया है। दशकों से मुस्लिम महिलाएँ तीन तलाक के खिलाफ कानून की माँग कर रही थीं और ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनाकर उन्हें नया अधिकार दिया गया।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना 12 अक्टूबर 1993 को की गई थी। इसका उद्देश्य मानवाधिकारों के प्रचार-प्रसार और संरक्षण करना था। इस आयोग के वर्तमान अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा हैं। यह संस्था मानवाधिकारों के किसी भी प्रकार के उल्लंघन का संज्ञान लेती है और उसका उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित उपायों एवं कानूनी कार्रवाई की सिफारिश करती है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में ‘किसान आंदोलन’ के दौरान हुई हिंसा में नारे गए लोगों में से एक नाम श्याम सुंदर निषाद का भी है। आपको वो तस्वीर तो बखूबी याद होगी, जिसमें एक व्यक्ति पर ‘किसान प्रदर्शनकारियों’ द्वारा लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वो बोले कि उसे केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्रा ‘टेनी’ ने किसानों को कुचलने के लिए भेजा है। बार-बार छोड़ देने की गुहार लगाने वाले यही व्यक्ति श्याम सुंदर निषाद थे, जिन्हें मार डाला गया।
दो बच्चियाँ, दो बहनें: गुजर-बसर को लेकर चिंतित हैं श्याम सुंदर निषाद के पिता
श्याम सुंदर निषाद के वृद्ध पिता ने रोते हुए बताया कि उनके परिवार में किसी को मोबाइल फोन के माध्यम से उनके बेटे की मौत की खबर मिली। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसानों ने उनके बेटे को मारा है। उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ से कुछ लोग मिलने आए हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें अब तक किसी प्रकार की मदद नहीं मिली है। श्याम सुंदर निषाद ही पूरा परिवार चलाते थे। उनकी दो छोटी-छोटी बेटियाँ हैं।
साथ ही दो बहनें हैं, जिनकी शादी नहीं हुई है। पिता की चिंता है कि अब परिवार कैसे चलेगा। श्याम सुंदर निषाद की एक बेटी 3 वर्ष की है और एक 7 महीने की। उन्होंने कहा कि श्याम सुंदर निषाद ही घर का पूरा खर्च उठाते थे, भोजन-पानी से लेकर कपड़े-लत्ते तक की चिंता किसी को वो नहीं देते थे। मजदूरी कर के वो घर-बार चलाते थे। पिता ने कहा कि उनकी अब कुछ काम करने की अवस्था नहीं है, ऐसे वो वो कहाँ जाएँगे और बेटियों की शादी कैसे करेंगे।
उनकी चिंता है कि अब परिवार कैसे चलेगा। बेटे के बारे में पूछने पर श्याम सुंदर निषाद के पिता बालकराम रोने लगते हैं। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ने 45 लाख रुपया देने की घोषणा की है। उन्होंने सरकार से माँग की कि किसी तरह उनके दोनों बेटियों की शादी में मदद की जाए। साथ ही कहा कि परिवार पर जो कर्ज का बोझ है, उसे सधाना है। उन्होंने कहा कि वो छोटे किसान हैं। उन्होंने कहा कि सरकार मदद करती है, तभी दोनों बच्चियों का पालन-पोषण हो पाएगा।
श्याम सुंदर निषाद के पिता अपने बेटे को लेकर सवाल पूछने पर ‘हे भगवान! ये क्या हो गया’ कह कर फूट-फूट के रोने लगते हैं। वहीं श्याम सुंदर निषाद की माँ का भी रो-रो कर बुरा हाल है। उन्होंने बताया कि इलाके में हर साल दंगल होता है और सब कोई देखने जाता है, लेकिन गाड़ी वगैरह की सुविधा नहीं है तो एक ‘साहब’ के स्वागत के लिए वो किसी की गाड़ी में बैठ कर गए थे, जहाँ उन्हें मार डाला गया।
उन्होंने कहा कि उनके बेटे से बार-बार जबरन कहलवाने की कोशिश की गई कि उन्हें मंत्री ने भेजा है, लेकिन वो इनकार करते रहे। इसके बाद परिवार को कुछ नहीं पता चला कि क्या हुआ, उन्हें किस अस्पताल में ले जाया गया। लेकिन, रात में खबर मिली कि अस्पताल में उनकी लाश मिली है। फिर थाने की गाड़ी में बैठ कर परिजन वहाँ पहुँचे। माँ ने बताया कि तलवार से उनका हाथ-पाँव तोड़ डाला गया था।
श्याम सुंदर निषाद की माँ ने बताया कि बार-बार माफ़ी माँगने के बावजूद उनके बेटे को नहीं छोड़ा गया। उन्होंने कहा कि वीडियो में लाठी-डंडा लिए हुए लोग हैं, सरदार हैं, उन सब ने ही उन्हें मारा है। उन्होंने कहा कि जान की भीख माँगने के बावजूद उन्हें पीटा गया। उन्होंने कहा कि सभी ने वो वीडियो देखा है, जिसमें वो हाथ जोड़ कर कह रहे हैं कि वो स्वागत कार्यक्रम में जा रहे थे, उन्हें मंत्री ने नहीं भेजा है।
लखीमपुर खीरी: श्याम सुंदर निषाद की पत्नी ने भी बयाँ किया दर्द
उन्होंने बताया कि श्याम सुंदर निषाद फलों की खेती भी करते थे। उनकी 5 साल पहले ही शादी हुई थी। उनकी पत्नी ने भी बताया कि उनके पति हर साल दंगल देखने जाते थे। उन्होंने कहा, “मैं तो उनका वीडियो भी नहीं देख पाई। मुझे घबराहट हो रही है। मैं कैसे आपके सवालों का जवाब दूँ। मैंने अपना पति खोया है। अपनी बच्चियों का बाप खोया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहूँ। हत्यारों को सज़ा मिलना चाहिए।”
उन्होंने कहा, “हमारे घर के सभी सदस्यों की देखभाल रही करते थे। अब सरकार को हमारे गुजर-बसर के लिए मदद करनी चाहिए। हम पढ़े-लिखे तो हैं नहीं तो सरकार से क्या माँगें, लेकिन हमें न्याय मिलना चाहिए। मेरी बेटी की तबीयत खराब है। वो बार-बार पूछ रही है कि पापा कहाँ हैं। वो अपने पापा के बिना नहीं रह पाती। मेरी भी तबीयत ठीक नहीं। मेरी छोटी बच्ची भी पापा-पापा करती है।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और मध्य प्रदेश के इंदौर में दूरी तो काफी है। लेकिन, मजहब छिपाकर हिंदू लड़की को फँसाने और ब्लैकमेल करने की कहानी एक जैसी ही है। ठीक वैसी ही जैसी हम आए दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आने वाले लव जिहाद (Love Jihad) के मामलों में देखते हैं।
गोरखपुर के चिलुआताल थाना क्षेत्र में एक युवक ने मजहब छिपाकर हिन्दू लड़की को प्रेम जाल में फँसाया। बात जब शादी की आई तो अपनी असली पहचान के साथ सामने आया और निकाह का दबाव बनाने लगा। धोखे का एहसास होने पर युवती ने युवक के खिलाफ दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन से संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज कराया। आरोपित हसन रजा को गिरफ्तार कर लिया गया है।
जानकारी के मुताबिक, चिलुआताल थाना क्षेत्र की युवती करीब साल भर पहले कॉलेज आते-जाते वक्त एक युवक के संपर्क में आई। अपनी शराफत से युवक ने उसका दिल जीत लिया। बात शादी तक पहुँच गई। लेकिन इसके बाद जब युवती को युवक की हकीकत पता चली तो अवाक रह गई। दरअसल युवती जिसे गुड्डू समझ रही थी, वह असल में हसन रजा था।
युवती ने पुलिस को तहरीर देकर बताया कि आरोपित युवक हसन रजा उस पर धर्म परिवर्तन कर निकाह के लिए दबाव बना रहा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए चिलुआताल पुलिस ने आरोपित हसन रजा के खिलाफ दुष्कर्म, जबरन घर में घुसना, घुड़की-धमकी और अन्य धाराओं 376, 452, 504, 506 3(5)1 में केस दर्ज कर जेल भेज दिया। पुलिस ने आरोपित को 10 अक्टूबर को उसके घर से गिरफ्तार किया था।
मिहिर बन फँसाया, फिर ब्लैकमेल करने लगा
एक ऐसी ही लव जिहाद की खबर मध्य प्रदेश के इंदौर से सामने आई है। AC, कूलर और फ्रीज ठीक करने वाला मेकेनिक परवेज पठान खुद को मिहिर बताता था। ऑनलाइन गेमिंग और ऐप के जरिए वह लड़कियों और महिलाओं से बातें करता था फिर उनसे दोस्ती करता था। इसके बाद उन्हें प्रेम जाल में फँसाता था और उन्हें धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने के लिए कहता था। इतना ही नहीं, मुस्लिम धर्म न अपनाने पर उसकी प्राइवेट फोटो वायरल करने की धमकी देता था।
मालवीय नगर निवासी 30 वर्षीय युवती ने आरोपित परवेज के खिलाफ केस दर्ज कराई है। पुलिस ने केस दर्ज होने के बाद परवेज को गिरफ्तार कर लिया है और उसका मोबाइल भी जब्त कर लिया है। पुलिस ने उस पर ब्लैकमेलिंग, छेड़छाड़, धमकी और धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है।
महिला के अनुसार, करीब एक साल पहले इंस्टाग्राम पर उसकी दोस्ती परवेज के साथ हुई थी। उसने खुद को हिंदू बताया और कहा था कि उसका नाम मिहिर है। इंस्टाग्राम के बाद दोनों पोगो, ईमो, हेप्पी, शेयर चैट, वीवो टेलिग्राम जैसे ऑनलाइन एप पर बात करने लगे। आरोपित ने माँ की बीमारी और कई कारण बता कर उसे इमोशनल ब्लैकमेल कर उससे बातचीत बढ़ाई। उसके बाद लड़की को उसने प्यार में फँसाया और फिर उसे ब्लैकमेल करने लगा।
पाँच फरवरी को जब वह सो रही थी तो उसने वीडियो कॉल किया और प्राइवेट फोटो खींच लिए। बाद में जब महिला को परवेज की असलियत पता चली तो उसने बातचीत करनी बंद कर दी। इसके बाद परवेज ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया। उसने फोटो वायरल करने की धमकी देते हुए कहा कि पति से तलाक नहीं लिया तो उसको भी बता देगा। परवेज ने कहा मुस्लिम बन जाओ। मुस्लिम दो शादियाँ भी कर सकते हैं। बता दें कि परवेज पहले से ही शादीशुदा है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा में जो लोग मारे गए, उनमें से एक हरिओम मिश्रा भी है। पेशे से ड्राइवर हरिओम मिश्रा भाजपा के कार्यकर्ता भी थे। वो काफी गरीब घर से आते थे और उनके जाने के बाद अब परिवार बेसहारा हो गया है। उनका एक टूटा-फूटा सा घर है। उनके वृद्ध पिता की तबीयत काफी खराब रहती है। घाव व अन्य बीमारियों की वजह से उनका पाँव भी सीधा नहीं हो पाता।
गरीबी से जूझ रहा लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए हरिओम मिश्रा का परिवार
हरिओम मिश्रा के घर का वीडियो देखने पर पता चलता है कि उसमें उनके वृद्ध पिता लेटे रहते हैं और उनके लिए एक विशेष लकड़ी की कुर्सी बनवाई गई है, जिस पर बैठा कर उन्हें स्नान व शौच करवाया जाता है। उनकी शारीरिक स्थिति काफी दयनीय है। कुछ ही दिनों पहले हरिओम मिश्रा अपने बीमार पिता के लिए एक गद्दा लेकर आए थे, जिस पर उन्हें लिटाया जाता था। दो कमरों वाले टूटे-फूटे और अस्त-व्यस्त इस घर में हरिओम मिश्रा की माँ भी रहती हैं।
हाँ, एक गाय ज़रूर है जिसे घर में ही रखा जाता है और उसकी सेवा-सुश्रुवा की जाती है। हरिओम मिश्रा के भाई ने अपने घर की इस दयनीय हालत पर वीडियो बनाया है। घर में पानी के लिए चापाकल है, नल की सुविधा नहीं है। मृतक के भाई ने बताया कि नेता लोग भी उनसे अब तक मिलने नहीं आए हैं, जबकि वो लोग भी तो किसान हैं। उन्होंने बताया कि भाजपा के कुछ नेता ज़रूर वहाँ आए हैं।
उनकी एक कुँवारी बहन भी हैं, जिनकी शादी में बड़ा खर्च है। हरिओम मिश्रा की माँ ने बताया कि वो उनकी और अपने पिता की खूब चिंता करते थे और दवाइयों का ख्याल रखते थे। उन्होंने बताया कि जब हिंसा की खबर आई तो वो भगवान से प्रार्थना कर रही थीं कि उनका बेटा कुशल वापस आ जाए, लेकिन अगले दिन उनकी लाश आई। उन्होंने बताया कि वो लोग छोटे किसान हैं, जिनकी रोजी-रोटी कोटा में मिलने वाले राशन से चलती है।
गरीबी और बेटे के जाने का गम: हरिओम मिश्रा की माँ का छलका दर्द
उन्होंने बताया कि हरिओम मिश्रा घर का सारा कामकाज खुद चलाते थे और बाकी लोगों को पता भी नहीं था कि वो किस तरह कमा कर कैसे सब कुछ चलाते थे। उनकी माँ ने बताया कि हरिओम मिश्रा के पिता को काफी देखभाल की ज़रूरत है और इसके लिए पैसा तक नहीं है। उन्होंने कहा कि पूरा परिवार यही सोच रहा है कि अब गुजारा कैसे होगा। उन्होंने बताया कि अपने बेटे को भी उन्होंने काफी गरीबी में पाला है।
पीड़ित माँ ने बताया कि बचपन में उनके बेटे के पास खाने के लिए रोटी तक नहीं होती थी और दूध भी नहीं होता था, जिससे वो काई कमजोर हो गए थे। हरिओम मिश्रा के वृद्ध पिता को होश नहीं है और उन्हें पता तक नहीं है कि उनके बेटे की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि उनका बेटा ‘श्रवण कुमार’ की तरह था, जो अब दुनिया से चला गया। अपने पिता की सेवा करने के लिए उन्होंने 25,000 रुपए की नौकरी भी छोड़ दी थी।
परिजनों का कहना है कि किसी तरह कर्ज लेकर वो इस घर को चला रहे थे। कृषि के अलावा कुछ सहारा नहीं था। उन्होंने कहा कि उनके बेटे को कैसे मारा गया, ये भी अब तक नहीं बताया गया है। गाँव में उनका किसी से न कोई लड़ाई-झगड़ा था। वो कहते थे कि वो किसी पार्टी के समर्थक नहीं, बल्कि जहाँ थोड़े-बहुत पैसे की कमाई हो जाती है वहाँ रहते हैं। गाँव के बच्चे भी उन्हें खोजते हुए आते थे।
हरिओम मिश्रा की माँ ने बताया कि उनके बेटे अपने कपड़े भी खुद ही साफ़ कर लेते थे और उन पर काम का बोझ नहीं देते थे। उनकी चिंता ये है कि अब कर्ज कैसे चुकाया जाएगा। साथ ही उनके पिता के इलाज में भी काफी खर्च है। कई जगह उन्हें दिखाने भी ले जाया गया था। हरिओम मिश्रा ही अपने पिता को शौच करवाया करते थे, वो खुद से उठ-बैठ नहीं सकते। उनकी मौत के बाद से पिता का इलाज भी बंद है।
‘क्या हम किसान नहीं हैं?’ – हरिओम मिश्रा के परिवार का सवाल
हरिओम मिश्रा की माँ ने बताया कि उनके बेटे हमेशा उन्हें दिलासा देते थे और उनके खाने-पीने को लेकर भी सजग रहते थे। साथ ही वो अपनी बहन के लिए लड़का भी देख रहे थे। हरिओम मिश्रा की माँ ने पूछा कि क्या सिर्फ भाला-बरछी लेकर मारने वाले ही किसान हैं, हम किसान नहीं हैं? उन्होंने कहा कि न सपा वाले आए हैं न ही राहुल गाँधी उनसे मिलने आए। उन्होंने पूछा कि हम खेत में काम करते हैं, तो क्या हम किसान नहीं हैं?
उनका दुःख इस बात को लेकर छलका कि हिंसा करने वालों के परिवार को डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपए मिल रहे हैं और उन्हें कोई अब तक पूछने तक नहीं आया, लेकिन वोट माँगने सब आते हैं। उन्होंने कहा कि उनका बेटा तो मजदूर था। उन्होंने कहा कि किसान को हथियार की क्या जरूरत है, उसके पास तो कुदाल और हसिया होता है, तलवार-भाला नहीं। उन्होंने कहा कि उनके घर में कोई हथियार नहीं है।
उन्होंने कहा, “क्या सिर्फ सिख और सरदार ही किसान होते हैं? ब्राह्मण मर जाए, फिर भी उसे कुछ नहीं मिलता। ये लोग ब्राह्मण समाज को नष्ट कर देना चाहते हैं। कुछ तो हमारी फ़िक्र करो। हम तो मेहनत कर के चार पैसे कमाने वाले लोग हैं, ताकि बच्चों को खाना मिल सके। हम भगवान के सहारे हैं। बेटा चला गया, पति बीमार हैं, एक बेटी अस्पताल में है। हमारी सहायता के लिए कोई नहीं है।”
जम्मू-कश्मीर से एक बड़ी खबर आ रही है। केंद्र शासित प्रदेश के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के सलाहकार रहे बसीर अहमद खान के ठिकानों पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने मंगलवार को छापेमारी की। पूर्व सलाहकार बसीर खान पर बंदूक का फर्जी लाइसेंस देने के रैकेट में शामिल रहने का आरोप है। इस सिलसिले में एजेंसी ने 40 ठिकानों पर रेड डाली है। इन ठिकानों में बाग बागत स्थित बसीर का घर भी शामिल है। छापेमारी में सीबीआई के साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस भी शामिल थी।
सीबीआई को जानकारी मिली थी कि फर्जी लाइसेंस बाँटने के रैकेट में बसीर खान बंदूक की भी संलिप्तता है। इसके बाद एजेंसी ने मामले की जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय को दी। इस सूचना के बाद मंत्रालय ने पिछले सप्ताह उन्हें सलाहकार के पद से हटा दिया था। इसके बाद पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैसल के सलाहकार बनने की खबरें सामने आई थीं। हालाँकि, बाद में ऑपइंडिया से बात करते हुए एक सरकारी सूत्र ने इस खबर का खंडन किया था।
बता दें कि बसीर खान जम्मू-कश्मीर के वर्तमान उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के सलाहकार रहने के साथ ही वे प्रदेश के पूर्व उप-राज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू के भी थे। वहीं, गृह मंत्रालय से हरी झंडी मिलते ही सीबीआई ने पदोन्नत आईएएस अधिकारी खान के ठिकानों पर छापेमारी शुरू कर दी। एजेंसी ने घाटी स्थित उनके अलावा के नई दिल्ली और मध्य प्रदेश समेत देश के अन्य हिस्सों में 40 जगहों पर छापेमारी की।
CBI, probing fake gun license scam, conducted a search at the residence of former IAS officer and former advisor to J&K LG, Baseer Ahmad Khan. He was relieved of his duties recently.
इसी मामले में पिछले साल आईएएस अधिकारी राजीव रंजन और जम्मू-कश्मीर कैडर के एक वरिष्ठ अधिकारी इतरत हुसैन रफीक को सीबीआई ने घाटी के कुपवाड़ा जिले में डिप्टी कमिश्नर के रूप में अपने आधिकारिक पद के दुरुपयोग के लिए गिरफ्तार किया था।
भारत के सबसे बड़े फर्जी बंदूक लाइसेंस रैकेट माने जा रहे इस मामले में जम्मू-कश्मीर के बाहर रहने वाले लोगों को भी बंदूक के लाइसेंस जारी किए गए थे। इसके लिए तत्कालीन लोक सेवकों ने रिश्वत ली थी। माना जा रहा है कि बंदूकों के कुल ढाई लाख से अधिक फर्जी लाइसेंस जारी किए गए।
इस घोटाले का राजस्थान आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने 2017 में इस घोटाले का खुलासा किया था और अवैध रूप से शस्त्र लाइसेंस जारी करने में संलिप्तता के आरोप में 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया था। एटीएस के अनुसार, कथित रूप से सेना के जवानों के नाम पर 3,000 से अधिक परमिट दिए गए थे। एटीएस के निष्कर्षों के आधार पर जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल एन एन वोहरा ने मामले की जाँच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा था।
पंजाबी अखबार में हिंदू देवी के लिए आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने के बाद कुछ सिखों ने शनिवार (अक्टूबर 9, 2021) की रात पंजाब के रूपनगर में सनातन धर्म रामलीला समिति द्वारा आयोजित रामलीला में बाधा पहुँचाई। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, पंडाल में रामलीला चल रही थी, तभी कुछ सिख लाठी-डंडों के साथ पहुँचे और हिंदू देवताओं, आयोजकों को गाली देनी शुरू कर दी। खालिस्तानी मानसिकता वाले अराजक तत्वों ने जमकर उपद्रव किया।
मुख्य निदेशक राकेश सहगल और समिति के अध्यक्ष मनोहर लाल कपूर ने दैनिक जागरण को बताया कि समिति के सदस्यों ने सिख समूह को शांत करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने एक न सुनी और उपद्रव जारी रखा। सिख लोगों ने कथित तौर पर समिति पर ‘बीजेपी समर्थक’ होने का आरोप लगाया और भगवान राम सहित हिंदू देवताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करते रहे। इससे वहाँ मौजूद भक्तों की भावना को ठेस पहुुँची। इन अराजक तत्वों की धमकियों और उपद्रव के चलते कई घंटों तक रामलीला रोकनी पड़ी। आयोजकों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद पुलिस ने इन ‘गुंडों’ के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया। आयोजकों ने पुलिस की कार्रवाई को निराशाजनक बताया।
उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने माँ चिंतपूर्णी के दरबार में माथा टेका था। इसे लेकर ‘रोजाना पहरेदार’ के संपादक ने लेख में विवादित टिप्पणी की थी। इस खबर का शीर्षक था, “अपने पेओ नूं छड सुखबीर पहुँचेआ बेगानी माँ के दरबार।” माता चिंतपूर्णी के लिए ‘बेगानी माँ’ शब्द का इस्तेमाल करने पर हिंदू संगठनों ने रोष जताया। संपादक को गिरफ्तार न करने को लेकर प्रदर्शन किया और जगराओं को बंद रखा।
खालिस्तान समर्थकों के पैर पसारने से बढ़ रहा तनाव?
हालिया घटनाओं पर गौर करें तो हमारे सामने कई ऐसे उदाहरण हैं जो पंजाब के साथ-साथ विदेशों में भी खालिस्तान समर्थक संगठनों के पैर पसारने की तरफ इशारा करते हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) को 2017 के पंजाब चुनावों के दौरान और उससे पहले भी अपने राजनीतिक लाभ के लिए खालिस्तानी तत्वों को भड़काने की कोशिश करते देखा गया था।
वहीं कई खालिस्तान समर्थक संगठनों ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले AAP के लिए अपना समर्थन जताया था। AAP के प्रमुख नेता और लोकसभा उम्मीदवार जरनैल सिंह को लंदन में खालिस्तान समर्थक रैलियों को संबोधित करते देखा गया था।
हाल की बात करें तो आम आदमी पार्टी के नेता और पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुखपाल सिंह खैरा ने 2018 में खालिस्तान के समर्थन में ट्वीट किया था। उन्होंने पंजाब में ‘खालिस्तान’ बनाए जाने को लेकर साल 2020 में जनमत संग्रह कराने की बात कही थी। खैरा ने कहा था कि वे साल 2020 में होने वाले जनमत संग्रह के मतदाता नहीं हैं, लेकिन उन्हें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि बँटवारे के बाद सिखों के साथ भेदभाव, उत्पीड़न, दरबार साहिब पर हमले और साल 1984 में हुए हत्याकांड की वजह से यह सब कुछ हुआ है।
इस बयान के बाद उनकी चौतरफा आलोचना होने लगी। सुखपाल खैरा की कड़ी आलोचना करते हुए AAP संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी निशाना साधा गया और खैरा को पार्टी से बर्खास्त करने की माँग की। आम आदमी पार्टी, पंजाब ने रेफरेंडम-2020 पर खैरा के बयानों को उनकी निजी राय बताते हुए पल्ला झाड़ लिया।
हाल के ‘किसान विरोध’ में AAP ने ग्रेटा टूलकिट में दिए गए निर्देशों का पालन किया था। खालिस्तान समर्थक तत्वों का उपद्रव उस समय चरम पर था, जब गणतंत्र दिवस 2021 पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अनादर किया गया।
जैसे-जैसे ‘किसान विरोध’ के इर्द-गिर्द की राजनीति मुखर होती जा रही है, खालिस्तानी समर्थकों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है। भारत और विदेशों में कई खालिस्तानी समर्थक समूह ‘किसान विरोध’ में शामिल रहे हैं और जैसे-जैसे पंजाब चुनाव नजदीक आ रहे हैं, खालिस्तानी तत्वों का खुले तौर पर हिंदू विरोधी पक्ष भी स्पष्ट होता जा रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा और मोदी सरकार का विरोध करने के लिए पाकिस्तान समर्थित खालिस्तानी तत्व अब हिंदुओं के खिलाफ नफरत फैलाने का काम करते दिख रहे हैं।
कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान की राजधानी है जयपुर। जयपुर जिले के विराटनगर का एक छोटा सा गाँव है सूरजपुरा। ज्यादा पुरानी बात नहीं है, इसी साल अप्रैल में खबर आई थी कि पहली बार इस गाँव में कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढ़ा। ऐसी खबरें बेहद सुकून देती हैं, क्योंकि ऐसी हर खबर मुस्लिम-अंग्रेजी दासता के दौरान हिंदुओं को विभाजित करने के नाम पर समाज में घुसेड़ी गई गंदगी के खिलाफ स्वच्छता अभियान का हिस्सा हैं।
देश के स्वतंत्र होने के बाद कॉन्ग्रेसी और वामपंथी गिरोह ‘ब्राह्मणवादी/सवर्ण मानसिकता’ का नाम देकर ऐसी गंदगी को खाद देने का काम करते रहे हैं। मसलन 2018 में स्वयंभू दलित मसीहा दिलीप मंडल ने बीबीसी में बकायदा एक लेख लिखकर पूछ भी लिया था- ‘दलितों के घोड़ी पर चढ़ने से सवर्णों को कष्ट क्यों है?’
बीबीसी के लिए लिखा गया दिलीप मंडल का लेख
अब ऐसा लगता है कि अपने हिंदूफोबिक करतूतों को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाला पेटा इंडिया भी ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रसित है। यदि ऐसा नहीं होता तो सूरजपुरा की खबर के चंद महीने बाद ही पेटा को यह कहने की क्या जरूरत थी, “शादी समारोहों में घोड़ी का उपयोग करना अपमानजनक और क्रूर है।”
Using horses at wedding ceremonies is ABUSIVE and CRUEL.
पेटा यानी पीपल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स ने सोमवार (11 अक्टूबर 2021) को शाम के करीब 7 बजे यह ट्वीट किया था। इसका विरोध किया जाना चाहिए था और सोशल मीडिया में लोग कर भी रहे हैं। पेटा इंडिया पर प्रतिबंध की माँग रही है।
पूर्व आईपीएस अधिकारी एम नागेश्वर राव ने बताया है कि चैरिटेबल संस्था पेटा हिंदू और भारत विरोधी है। उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को टैग करते हुए कंपनीज एक्ट की धारा-8 के तहत इसका पंजीकरण तुरंत रद्द करने की अपील की है। कुछ और यूजर्स की प्रतिक्रिया पर नीचे गौर करिए;
PETA ko agar pet bhar ke galiya naa mile then this is very ABUSIVE and CRUEL ! https://t.co/qmmq2yk5ac
आर्यन शुक्ला नाम के यूजर ने लिखा है, “जानवरों को मार कर खाना सही है, क्योंकि खाने की आजादी है। क्या जानवरों का भक्षण करने वालों का पेटा पालतू है? घोड़ी पर बैठना अपमानजनक और क्रूर है? जानवरों को मार कर खाने वाले सही हैं?”
जानवरो को मार कर खाना सही है? क्योंकि खाने की आजादी है इसलिए मात्र , peta is pet of who eating animals? घोड़े पर बैठना ही ABUSIVE AND CRUAL हैं? जानवरो को मार कर खाने वाले सही है?
एक यूजर ने लिखा है, “पोलो के लिए घोड़ों की सवारी करना अच्छा है! दौड़ प्रतियोगिता के लिए घोड़ों की सवारी करना कुलीन है! पुलिस के लिए घोड़ों की सवारी करना सिविल है! लेकिन… शादी के लिए घुड़सवारी करना क्रूर है! यदि कट्टरता को संस्थागत रूप दिया गया, तो इसे ‘पेटा’ के रूप में जाना जाएगा।”
पोलो के लिए घोड़ों की सवारी करना अच्छा है! दौड़ प्रतियोगिता के लिए घोड़ों की सवारी करना कुलीन है!पुलिस के लिए घोड़ों की सवारी करना सिविल है! लेकिन.. शादी के लिए घुड़सवारी करना क्रूर है! यदि कट्टरता को संस्थागत रूप दिया गया, तो इसे “पेटा” के रूप में जाना जाएगा,
सपना मदान नाम की एक यूजर ने ट्वीट कर रहा है कि घोड़ी का इस्तेमाल क्रूरता है। लेकिन त्योहारों पर जानवरों को काटना क्रूर नहीं है। मैं खुश हूँ कि मैंने बहुत पहले पेटा को डोनेट करना बंद कर दिया था।
घोड़ों से इतनी मोहब्बत है peta ko पर बकरो और ऊट से नफरत क्यू हैं ।उन्हें जब कुर्बानी के नाम पे मारते हैं लोग तो peta को बहुत अच्छा लगता हैं।इस डरपोक संस्था को बंद करो इसका कोई महत्व नहीं है।सभी डरते हैं ।इनका टारगेट सिर्फ हिंदू हैं।
एक यूजर ने ट्वीट किया है, “घोड़ों से इतनी मोहब्बत है पेटा को पर बकरों और ऊँट से नफरत क्यों है। उन्हें जब कुर्बानी के नाम पे मारते हैं तो पेटा को बहुत अच्छा लगता है। इस डरपोक संस्था को बंद करो इसका कोई महत्व नहीं है। सभी डरते हैं। इनका टारगेट सिर्फ हिंदू हैं।”
पेटा के इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए यूजर्स ने उसके हिंदू विरोधी चरित्र को भी उजागर किया है। खुद को जानवरों के हित और अधिकारों का पैरोकार बतातने वाली पेटा ने पिछले साल रक्षाबंधन पर्व के लिए चमड़ा मुक्त अभियान (लेदर फ्री कैम्पेन) चलाया था। जबकि इसका किसी भी सूरत में इस पर्व से कोई लेना-देना नहीं है। वैसे पेटा कैसा ‘पशु प्रेमी’ है इसे आप इस बात से भी समझ सकते हैं कि उसे बूचड़खानों (कानूनी) में गायों के कटने से दिक्कत नहीं। लेकिन आपके दूध और पनीर से है। हिंदू त्योहारों पर प्रकृति प्रेमी, जीव प्रेमी हो जाने वाला पेटा बकरीद जैसे मौकों पर जब हजारों की संख्या में खुलेआम जानवर काटे जाते हैं तब चुप हो जाता है।