दिल्ली के सुल्तानपुरी में एक नेत्रहीन व्यक्ति की हत्या का मामला प्रकाश में आया है। घटना बुधवार (6 अक्टूबर) की है। व्यक्ति की गलती बस ये थी कि उन्होंने एक महिला के साथ होती हिंसा का विरोध किया जिसके बाद उनकी जान ले ली गई। आरोपित अभी फरार है। चश्मदीद की गवाही के बाद पुलिस उसे तलाशने की कोशिश कर रही है।
40 वर्षीय राधेश्याम यूपी के कुशीनगर के निवासी थे और नेत्रहीन थे। वह काफी साल से सुल्तानपुरी बस टर्मिनल पर पान बीड़ी का खोखा चलाते थे। रात में सोते भी वह इसी खोखे पर थे। इसी टर्मिनल पर उनके जैसी एक अन्य नेत्रहीन महिला रहती थी जो 6 अक्टूबर को उनके खोखे के ही पास थी।
इस दौरान एक व्यक्ति आया और उसने महिला के साथ बदसलूकी शुरू कर दी। राधेश्याम ने इसका विरोध किया और युवक को डांटते हुए उसे आपत्तिजनक बातें न कहने को कहा। इतने में ही युवक ने इतनी तेज उठाकर पत्थर मारा कि राधेश्याम वहीं गिरकर बेहोश हो गए। पास में दूसरा खोखा चलाने वाले दिलीप कुमार ने पुलिस को घटना की जानकारी दी और पीसीआर वैन ने राधेश्याम को संजय गाँधी अस्पताल में भर्ती करवाया।
यहाँ इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम करवाकर आरोपित के विरुद्ध हत्या का केस दर्ज कर लिया है। सीसीटीवी कैमरे खंगाले जा रहे हैं ताकि आरोपित गिरफ्तार हो। अब तक की सीसीटीवी जाँच में सामने आया है कि आरोपित मार कर भाग रहा है। उसका चेहरा क्लियर नहीं है। इसलिए पुलिस स्केच तैयार करके उसे पकड़ने में लगी है।
कुछ रिपोर्ट ये भी बता रही है कि महिला जिससे बदलूकी हुई वो फुटपाथ पर लेटी थी और वहीं मौजूद एक आदमी ने उस पर 20 रुपए चोरी का इल्जाम लगाया। महिला ने मना किया और आपसी कहासुनी हो गई। राधेश्याम दुकान से बाहर निकलकर दोनों को समझाने लगे। लेकिन आरोपित ने उन्हें पत्थर मार दिया और उनके बेहोश होते ही वहाँ से फरार हो गया।
क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक व्यक्ति के शरीर से लिपटा धागा भी किसी का जीवन बचा सकता है! सामान्य तौर पर यह बात पचती नहीं। हाँ! आस्थावान हिन्दू जनेऊ के धार्मिक व आध्यात्मिक पहलू से भली भाँति परिचित होता है किन्तु, इसके धारण करने वाले के अलावा किसी अन्य व्यक्ति का जीवन भी इसके माध्यम से बचाया जा सकता है, यह बात जब मैंने सुनी तो लिखने को विवश हो गया। सोचा! किस प्रकार किसी अपरिचित व्यक्ति के जीवन पर आए भयंकर संकट के समय, बिना किसी धार्मिक, आध्यात्मिक या कर्म-कांडीय प्रक्रिया का विचार मन में लाए, उसकी जीवन रक्षा के लिए अपना सर्वप्रिय व पवित्रतम वस्त्र झटके में कैसे त्याग दिया।
यूँ तो सामान्य रूप से देखें तो जनेऊ तीन सूती धागों की मानव शरीर से चिपकी एक शृंखला होती है। किन्तु, सम्पूर्ण शरीर में कान से लेकर कमर तक लटके इन तीन धागों का समुच्चय हिन्दू मान्यताओं में विशेष स्थान रखता है। वास्तव में तो यह एक ऐसा पवित्र बंधन होता है जो कि इसके धारण करने वाले व्यक्ति को ना सिर्फ धार्मिक, सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से नियम बद्ध करता है अपितु, देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण से मुक्ति भी दिलाता है। इसके धारण करने, प्रयोग करने व उतारने की एक निश्चित प्रक्रिया व कठोर नियम होते हैं। मानव-जीवन में यज्ञोपवीत (जनेऊ) का अत्यधिक महत्त्व है। सृष्टि की प्रथम रचना ऋग्वेद में दिए मंत्र ने इसकी बड़ी महिमा बताई है:
पुरोहित द्वारा इस वेद मंत्र के उच्चारण के साथ एक विशेष विधि से किए गए उपनयन संस्कार को सभी संस्कारों में महत्त्वपूर्ण माना गया है।
बात गत 16 सितंबर की, झारखंड की राजधानी राँची से लगभग 100 किमी दूर चांडिल की है। वहाँ पर एक बड़ी स्टील फैक्ट्री है। इसकी मरम्मत के लिए कुछ इंजीनियर कोलकाता से आए हुए थे। शाम का समय था। भोजन के उपरांत इंजीनियर गेस्ट हाउस के बाहर घूम रहे थे। अचानक एक बेहद जहरीला साँप उनमें से एक इंजीनियर को डस कर सामने एक पेड़ के पास जाकर खड़ा हो गया। साँप को देखकर एक स्थानीय व्यक्ति ने समझ लिया कि जिसको डसा है, उसका बचना बेहद मुश्किल है क्योंकि, वह उस क्षेत्र का सबसे जहरीला साँप था। पैर का जहर शरीर के अन्य हिस्सों तक ना पहुँचे, इस हेतु पैर को बाँधने के लिए, किसी ने अपना रुमाल निकाला तो किसी ने कुछ और। किन्तु, दिल्ली से गए एक हरे राम नामक कर्मचारी ने आव देखा ना ताव, अपने शरीर से लिपटे हुए जनेऊ को फुर्ती से निकाला और पीड़ित इंजीनियर के पैर को कसकर बाँध दिया। साथ ही कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधक ने स्थानीय चिकित्सा अधिकारियों को सूचना देते हुए पीड़ित को जमशेद पुर स्थित जिला अस्पताल पहुँचाया।
साँप की प्रकृति की समय पर पहचान, घटना स्थल से अस्पताल पहुँचने के लगभग एक घंटे के मार्ग को आधे समय में तय करने, मरीज के पहुँचने से पूर्व डॉक्टरों व जरूरी इन्जेक्शन की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा मरीज की मनोदशा को निरंतर ठीक रखने के अतिरिक्त आस्थावान हिन्दू– श्री हरे राम द्वारा शीघ्रता से जनेऊ समर्पित कर पैर को बाँधने के कारण उस इंजीनियर के जीवन को तो बचा लिया गया किन्तु, एक प्रश्न जीवंत रह गया कि यदि इस पूरी शृंखला की कोई एक भी कड़ी में कुछ कमजोरी रह जाती तो क्या उस इंजीनियर के जीवन को बचाया जा सकता था? शायद नहीं!
हम जानते हैं कि हिंदू जब एक बार जनेऊ धारण कर लेता है तो सामान्य तौर पर उसे आजीवन त्यागता नहीं है। ऐसे में हरे राम ने जनेऊ को तत्परता के साथ कैसे अपने शरीर से बिना कोई मंत्र पढ़े या कोई पूजा पाठ किए या किसी की धार्मिक अनुमति की प्रतीक्षा किए, एक क्षण में उतार कर एक अनजान के पैर में बाँध दिया। वास्तव में यह हिंदू संस्कार, हिंदू सोच और मानवता के प्रति दर्द की एक अनूठी मिसाल है। हिंदू समाज हमेशा पीड़ित की रक्षा के लिए सक्रिय रहता है। चाहे उसके लिए उसे कुछ भी क्यों ना करना पड़े। हिंदू मान्यता कहती है कि जीवन से बड़ा कुछ नहीं। जनेऊ भी जीवन बचाने मे इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, सामान्य तौर पर अकल्पनीय है। साथ ही, हरि भक्त हरे राम का समर्पण भी वंदनीय है।
(विनोद बंसल: लेखक विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)
उत्तर प्रदेश के बलिया में रविवार (10 अक्टूबर 2021) को आजम खान नाम के 25 वर्षीय एक युवक ने एकतरफा प्यार में एक लड़की के घर में घुसने के बाद देशी तमंचे से गोली मारकर उसकी हत्या कर दी। घटना के बाद खुद को घिरता देखकर आरोपी ने खुद को भी गोली मारकर आत्महत्या कर ली।
घटना बलिया के कोतवाली थाना क्षेत्र के गाँव पिपरा माफी की है। इस गाँव के रहने वाले अलीशेर खान के बेटे आजम खान ने पड़ोस में रहने वाली नूर मोहम्मद की 23 वर्षीया बेटी रवीना खातून को दिन-दहाड़े घर में घुसकर गोली मार दी। पुलिस के अनुसार, दोनों पहले से ही एक दूसरे से परिचित थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये मामला एकतरफा प्यार का है।
मृतका के परिजनों के अनुसार, जब गोली की आवाज सुन कर वो कमरे में गए तब उन्होंने रवीना को खून से लथपथ पाया। आनन-फानन में लड़की को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मृतका रवीना बीएड की तैयारी कर रही थी। रवीना के कुल 5 भाई बहन थे, जिसमें 2 भाई और 1 बहन की शादी हो चुकी थी।
मिली जानकारी के अनुसार, हमलावर आज़म खान मृतका के पास ही तमंचा ले कर खड़ा था जिसे लड़की के परिजनों ने कमरे में बंद कर दिया। खुद को फँसता देख कर उसने गोली मार कर आत्महत्या कर ली। घटना की सूचना पुलिस को दी गई जिसके बाद जिसके बाद घटनास्थल पर एडिशनल एसपी संजय कुमार, सीओ सिटी भूषण वर्मा, इंस्पेक्टर बालमुकुंद मिश्रा, दुबहर एसओ राजकुमार सिंह व फॉरेंसिक की टीम पहुंच गई।
इस घटना पर बयान देते हुए बलिया के अपर पुलिस अधीक्षक ने कहा कि मामले की जानकारी होते ही पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची। लड़के ने लड़की की गोली मार कर हत्या की और बाद में स्वयं को भी गोली मार ली है। मामले में अभियोग पंजीकृत कर आवश्यक विधिक कार्रवाई के साथ इस घटना से जुड़े प्रत्येक बिंदु पर गहनता से जाँच की जा रही है।
मौके पर पहुँचीं पुलिस ने प्राथमिक छानबीन में ये भी बताया कि आज़म का मृतका के घर पहले भी आना-जाना था।
#UP युवती के घर में घुसकर युवक ने मारी गोली चलने की घटना के समय परिजन घर मे थे मौजूद ।मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।युवती और युवक दोनों एक ही गांव के एक ही समुदाय के बताए जा रहे हैं। @balliapolice@dgpup@Uppolice@myogiadityanathpic.twitter.com/1sGhKlRMqZ
पुलिस ने परिजनों से पूछताछ के बाद दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। फोरेंसिक टीम की जांच के दौरान घटनास्थल से सात मोबाइल फोन, चार खोखे, एक कारतूस और एक पिस्टल बरामद की गई है। बताया जा रहा है कि इनमें से दो महंगे मोबाइल हैं।
इस घटना पर अमर उजाला का दावा है कि रवीना की शादी तय होने से आज़म काफी नाराज़ था। आज़म रवीना की शादी कहीं और नहीं होने देना चाहता था। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों के प्रेम-प्रसंग की जानकारी जब लड़की के घर वालों को हुई थी तब रवीना पर काफी कड़ाई कर दी गई थी। आज़म की मौत माथे पर गोली लगने से मौत होना बताया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी किसान हिंसा मामले में भाजपा नेता और केंद्रीय गृह राज्यमत्री अजय कुमार मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष मोनू की गिरफ़्तारी के बावजूद महाराष्ट्र के सत्ताधारी गठबंधन ने सोमवार (11 अक्टूबर, 2021) को बंद का ऐलान किया। बंद के नाम पर शिवसेना कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह सड़कें जाम कर दी और वहाँ टायर जलाए। NCP और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी बंद में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
हालाँकि, भाजपा ने इस बंद का विरोध किया है। विखरोली में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने टायर जला कर ईस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे को ही जाम कर दिया। ठाणे में भाजपा के नगर अध्यक्ष व विधान पार्षद निरंजन डावखरे ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा व्यापारियों और दुकानदारों को कॉल कर के धमकाया जा रहा है कि वो अपना कारोबार बंद रखें। उन्होंने कहा कि पुलिस जबरन दबाव डाल कर कारोबार ठप्प करा रही है।
The Congress-Shiv Sena-NCP alliance has called for a bandh in Maharashtra today to protest the Lakhimpur Kheri violence that claimed the lives of 8 people including 4 farmers
ठाणे में यात्रियों को ले रहा रही ऑटो और कैब्स को भी निशाना बनाया गया और तोड़फोड़ मचाई गई। साथ ही यात्रियों को बीच रास्ते में ही उतरवा दिया गया। नवीं मुंबई के APMC बाजार को भी बंद रखा गया है। उधर BEST की चार सरकारी बसों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया, लेकिन NCP के प्रदेश अध्यक्ष व मंत्री जयंत पाटिल ने कहा कि बंद शांतिपूर्ण है और बसों में तोड़फोड़ करने वालों को चिह्नित कर कार्रवाई की जाएगी।
NCP नेता व मंत्री नवाब मलिक का दावा है कि आज बुलाए गए बंद को सभी ट्रेड यूनियनों और वामपंथी दलों का भी समर्थन मिला है। वहीं कुछेक ऑटो वाले यात्रियों से मनचाहा किराया वसूल रहे हैं। कहीं-कहीं ऑटो वालों ने दोगुना किराया लिया। नासिक में भी सभी APMC बाजारों को बंद कर दिया गया। धारावी, मानखुर्द, शिवाजी नगर, चारकोप, ओशिवारा, देवनार और मलाड में BEST की बसों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।
शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने इस बंद को सफल करार दिया है। ‘फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन’ ने सरकार के आग्रह के बाद बाजारों को बंद रखने का निर्णय लिया। यहाँ तक कि राज्य में ज़रूरी सामग्रियों का ट्रांसपोर्टेशन भी बाधित हुआ है। ठाणे में NCP कार्यकर्ताओं ने रैली निकाली। मुंबई में फल-सब्जी बेचने आए ठेले वालों को पहले ही हटा दिया गया। अधिकतर होटल भी बंद हैं।
मुंबई में राजभवन के बाहर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। ठाणे में ‘आनंद आश्रम’ के सामने शिवसैनिकों ने ऑटो रिक्शा वालों की पिटाई कर के उन्हें वापस जाने को कहा। औरंगाबाद में भी दुकानों को नहीं खुलने दिया गया। मुंबई में कहीं-कहीं पत्थरबाजी भी हुई। चेम्बूर में शिवसैनिकों ने जाम लगाया। भाजपा ने जबरन दुकानें बंद करवाने का विरोध किया है। भाजपा ने कहा कि महाराष्ट्र की समस्याओं को नजरअंदाज कर MVA दूसरे राज्यों के मुद्दे पर बंद बुला रहा है।
मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले में रविवार की छुट्टी पाने के लिए एक सब-इंजीनियर ने अजीबोगरीब लीव एप्लीकेशन लिखा है। उन्होंने लिखा कि उन्हें अपने पिछले जन्म का आभास हुआ है। असदुद्दीन ओवैसी पिछले जन्म में उनके बचपन के दोस्त नकुल थे। सब इंजीनियर ने उस जन्म में मोहन भागवत को शकुनी मामा बताया है। मजेदार बात यह है कि सीनियर ऑफिसर ने भी सब-इंजीनियर के एप्लीकेशन का उन्हीं की भाषा मे जवाब देते हुए हर रविवार ड्यूटी पर रहने का आदेश दिया है।
In Agar Malwa of Madhya Pradesh, a sub-engineer has written a leave application to his superior saying that he gained recollection of his past life and wanted to do Bhagavad Gita paath to know more about his life & also beg alms to erase ego every Sunday pic.twitter.com/qOmMpyZB9j
सुसनेर जनपद में पदस्थ उपयंत्री (सब-इंजीनियर) राजकुमार यादव ने एप्लीकेशन में लिखा कि रविवार को वे जनपद के किसी भी कार्य मे उपस्थित नहीं हो पाएँगे, क्योंकि उन्हें कुछ दिनों पहले आभास हुआ है कि आत्मा अमर होती है। साथ ही उन्हें पिछले जन्म का आभास हुआ है, जिसमें असदुद्दीन ओवैसी उनके पिछले जन्म के सखा नकुल थे और मोहन भागवत शकुनी मामा। इसलिए अपने जीवन को जानने के लिए गीता पाठ करना चाहते हैं। साथ ही अपने अंदर के अहंकार को मिटाने के लिए गेहूँ का दाना घर-घर जाकर भीख माँगेंगे। चूँकि यह उनकी आत्मा का सवाल है इसलिए उन्हें रविवार का अवकाश दिया जाए।
अहंकार मिटाने के लिए रविवार को करें काम
जनपद पंचायत के सीईओ पराग पंथी ने इसका जवाब देते हुए लिखा, “प्रिय उपयंत्री, आप अपना अहंकार मिटाना चाहते हैं यह बहुत प्रसन्नता का विषय है, इसमें हमारा अकिंचन सहयोग भी साधक हो सकता है। यह विचार ही मन में हर्ष उत्पन्न करता है। व्यक्ति प्रायः अहंकार से वशीभूत होकर यह सोचता है कि वह अपने रविवार को अपनी इच्छा से बिता सकता है। इस अहंकार को इसके बीजरूप में नष्ट करना आपकी उन्नति के लिए अपरिहार्य है। अतः आपकी आत्मिक उन्नति की अभिलाषा को दृष्टिगत रखते हुए आपको आदेशित किया जाता है कि आप प्रत्येक रविवार कार्यालय में उपस्थित रहकर कार्य करें। जिससे रविवार को अवकाश मनाने के आपके अहंकार का नाश हो सके। आपकी आत्मिक उन्नति में साधक बनने की प्रसन्नता के साथ, आपका पराग पंथी (सीईओ, सुसनेर)।”
इसके अलावा उन्होंने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि उपयंत्री राजकुमार यादव ने अवकाश का आवेदन दिया है। इसे लेकर जिला पंचायत सीईओ व कलेक्टर को अवगत करवा दिया है। मामले में वरिष्ठ अधिकारियों से प्राप्त निर्देशों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
बताया जा रहा है कि राजकुमार यादव के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। जिसका उन्हें तीन दिन के अंदर जवाब देना है। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी दत्तु सिंह रणदा ने लाइव हिंदुस्तान से बात करते हुए सब-इंजीनियर राजकुमार यादव को साइको बताया। उनका कहना है कि यादव काम नहीं करने को लेकर इस तरह की उल-जुलूल हरकतें करता रहता है। यह पत्र भी उसने काम करने से बचने के लिए लिखा है।
उन्होंने कहा कि जनपद पंचायत सुसनेर में पदस्थ उपयंत्री ने रविवार को अवकाश के लिए जनपद सीईओं को दिए आवेदन में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया है। इस तरह का व्यवहार आचरण नियम के अंतर्गत नही आता है। उक्त कर्मचारी पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। इधर छुट्टी के इस आवेदन के सामने आने के बाद आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है और कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।
मुंबई के ड्रग केस में शाहरुख खान के बेटे की गिरफ्तारी के बाद लिबरल गिरोह के लोगों का दावा है कि ये सब इसलिए हुआ क्योंकि शाहरुख एक मुस्लिम एक्टर हैं। द वायर की वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने भी इस बाबत ट्वीट किया और बताया कि पूरा केस इसलिए नहीं चलाया जा रहा क्योंकि आर्यन ने ड्रग्स लिए बल्कि इसलिए चल रहा है ताकि शाहरुख खान को टारगेट किया जा सके।
आरफा लिखती हैं, “आर्यन खान केस का ड्रग लेने से कोई लेना-देना नहीं है। ये विशु्द्ध रूप से शाहरुख खान को निशाना बनाने की साजिश है। आर्यन के जमानत पाने के मूल अधिकार को स्वतंत्रत देश में खारिज कर दिया गया…शाहरुख खान हमारे समय के सबसे बड़े मुस्लिम सुपरस्टार हैं।”
ये ट्वीट देख कई यूजर ने सवाल खड़ा किया कि शाहरुख खान ‘मुस्लिम सुपरस्टार’ हैं, ये बात उन्हें अब पता चली वरना इससे पहले तो वो उन्हें कलाकार मान रहे थे।
अच्छा, शाहरुख “मुस्लिम सुपरस्टार” है। हमें इतने दिन लगता था कि वो एक कलाकार हैं और कलाकार हमेशा तमाम बंधनों से मुक्त होता है। ऊपर होता है। उनके साथ हो रहा है, इस पर बहस हो सकती है। जैसे रिया के संबंध में हुई।
एक ट्विटर यूजर ने आरफा को कहा, “कहाँ थीं अबतक? इतनी देर लगा दी मुस्लिम कार्ड खेलने में…वही पुराना तेरा बहाना। अब थोड़ी और कहानी बनाओ कि एक बेचारा मुस्लिम बच्चा समुंदर में मछली पकड़ने गया था पर जुल्मी मोदी सरकार ने बेचारे को मुस्लिम होने की वजह से पकड़ कर NCB को पीछे लगा दिया।”
कहाँ थीं अबतक? इतनी देर लगा दी मुस्लिम कार्ड खेलने में….. वही पुराना तेरा बहाना
अब थोड़ी और कहानी बनाओ कि एक बेचारा मुस्लिम बच्चा समुंदर में मछली पकड़ने गया था पर जुल्मी मोदी सरकार ने बेचारे को मुस्लिम होने की वजह से पकड़ कर NCB को पीछे लगा दिया।
बता दें कि पहली बार नहीं हुआ जब इस्लामी पत्रकारिता को समाज में आगे बढ़ाने वालों ने शाहरुख खान को मुस्लिम एक्टर के तौर पर देखा हो। राणा अय्यूब ने भी एक बार शाहरुख को लगातार तीन फिल्में मुस्लिम पहचान के साथ करने के लिए सराहाया था। लेकिन शाहरुख खान ने ऐसे मजहबी प्रलाप पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि उन्हें तो ये भी नहीं याद कि ‘ऐ दिल है मुश्किल’ फिल्म में उनके किरदार का नाम क्या था।
When SRK snapped at Rana Ayyub story who praised him for doing three performances as a Muslim character in a row: pic.twitter.com/OB2TBeGLov
ये मालूम हो कि इस समय कट्टरपंथी और लिबरल गिरोह के लोगों को छोड़कर सोशल मीडिया पर शाहरुख खान का खूब विरोध हो रहा है। हैशटेग ट्रेंड कर रहा है- #शाहरुख_खान_गद्दार_है। इस ट्वीट में आरफा खानुम शेरवानी के मुस्लिम सुपरस्टार वाले ट्वीट को शेयर किया जा रहा है और साथ ही साथ कहा जा रहा है कि शाहरुख खान जाकिर नाइक का फॉलोवर हैं। उनके बेटे ने समाज में गंदगी फैलाने का काम किया है।
इसके अलावा हैशटैग में जैकी चैन और उनके बेटे की फोटो शेयर हो रही है जो 2014 में ड्रग केस में पकड़ा गया था और जैकी चैन ने कहा था कि उन्हें इसके लिए शर्मिंदगी है और वो अपने बेटे को छुड़ाने के लिए कुछ नहीं करेंगे।
गौरतलब है कि 3 अक्टूबर को क्रूज पर ड्रग पार्टी मामले में NCB की टीम ने एक्टर शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को गिरफ्तार किया था। इसके बाद लगातार कुछ अन्य गिरफ्तारियाँ भी हुईं। मीडिया में सामने आया कि सभी आरोपितों के पास से चरस, MDMA, MD और कोकेन समेत अन्य ड्रग बरामद किए गए। खुद आर्यन ने भी इस बात को कबूला था कि वो चरस पीते हैं। लेकिन कट्टरपंथी गिरोह नहीं माना और मुस्लिम कार्ड खेलने लगा।
उन्होंने एजेंडा चलाने के लिए शाहरुख खान की मुस्लिम पहचान को बीच में घसीटा और इस गिरफ्तारी को मुस्लिमों के साथ होती नाइंसाफी दिखाकर पेश किया। कई लोगों ने इस पर आपत्ति जताई लेकिन ट्रेंड जारी है। अब दूसरे पक्ष के लोग भी इसी नजरिए से उन्हें सोशल मीडिया पर गद्दार बताने लगे हैं। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस मुस्लिम पहचान की वजह से कट्टरपंथी आर्यन खान गिरफ्तारी केस में संवेदना बटोरने का प्रयास कर रहे हैं। वही कट्टरपंथी उस समय उन्हें तरह-तरह की गाली देने से और काफिर कहने से नहीं चूँकते, जब वो घर में गणपति पूजन करते हैं या सोशल मीडिया पर किसी हिंदू त्योहार की बधाई देते हैं।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती ने रविवार (10 अक्टूबर 2021) को एक मुस्लिम बच्चे को पकड़कर स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया। उनका दावा है कि यह बच्चा मंदिर में रेकी करने आया था। उन्होंने ट्वीट किया है, “आसिफ के बाद अब अनस। आज रेकी करते हुए मंदिर के अंदर पकड़ा गया। ये मुसलमान के बच्चे ट्रेंड कातिल हैं और सुरक्षा के लिए लगाई पुलिस जाने कहाँ सोती रहती है जो मुसलमान उन्हें नही दिखाई देता है।” हालाँकि गाजियाबाद पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा है कि यह बच्चा धोखे से मंदिर में घुस गया था।
यति नरसिंहानंद ने अपने ट्विटर और फेसबुक एकाउंट से एक वीडियो साझा किया है। इसमें पुलिस एक लड़के को पकड़े हुए दिखाई दे रही है। वीडियो में नरसिंहानंद ने कहा है, “यह एक मुस्लिम लड़का है जो मेरे यज्ञ से उठने के बाद पकड़ा गया। यह रेकी करने आया था। हमने इसे पुलिस को सौंप दिया है। मंदिर परिसर में किसी ने उसे हाथ नहीं लगाया।”
— Yati Narsinghanand Saraswati (@NarsinghUvach) October 10, 2021
मंदिर के महंत ने कहा, “मैं यहाँ के एसएसपी, एसपी RA और अन्य पुलिस कर्मियों को बताना चाहूँगा कि यह हमले की तैयारी है। यह एक बड़े हमले की तैयारी है जिसे आप हल्के में मत लीजिए। यहाँ क्या हुआ था, यह सभी जानते है। फिर भी यह यहाँ आया है। यह रेकी है और हमले की तैयारी है। भले ही पुलिस वाले हमारी बात मानें या न मानें।”
मौके पर मौजूद सब इंस्पेक्टर की नेमप्लेट पढ़ कर यति नरसिंहानंद ने बताया कि दारोगा सुशील कुमार को उन्होंने लड़के को सौंप दिया है। नरसिंहानंद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सम्बोधित करते हुए बताया कि यह मेरी हत्या का प्रयास है। स्थानीय पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा कि यहाँ पुलिस हिन्दुओं पर पूरी दादागीरी दिखाती है, लेकिन फिर भी अनस यहाँ तक पहुँच गया।
पकड़े गए लड़के का कहना है कि वो यही हाल ही में तेजपुर से डासना में शिफ्ट हुआ है और अपने पिता को खोजते हुए वह मंदिर तक पहुँच गया था। इस मामले में गाजियाबाद पुलिस ने बयान जारी करते हुए कहा है कि अनस डासना मंदिर के पास बने सीएचसी अस्पताल में आया था। वह इलाके में नया है इसलिए उसे मंदिर के बारे में पता नहीं था। अनपढ़ होने के कारण अनस मंदिर के द्वार और अस्पताल के गेट में अंतर नहीं समझ पाया और भीड़ के पीछे मंदिर में चला गया। जब उसके बयानों की जाँच की गई तो उसके परिजन अस्पताल में इलाज करवाते पाए गए। साथ ही अनस की तलाशी के दौरान कोई भी आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली।
गाजियाबाद पुलिस के इस बयान पर यति नरसिंहानंद ने असंतोष जाहिर किया है। उन्होंने लिखा है, “डासना के इसी कस्बे मे बएस तोमर की हत्या भी नाबालिग बच्चो ने ही की थी। ये कभी प्यासे होते हैं। कभी भटके हुए और कभी मौका मिलने पर नरेशानंद जी जैसे संतो को सोते हुए में चाकू से गोद जाते हैं। फिर हमारी पुलिस खामोश, क्योंकि घटना होने के बाद इनके पास बताने के लिए कोई कहानी नही होती।”
डासना के इसी कस्बे मे अभी B S Tomar की की हत्या भी नाबालिग बच्चो ने ही कि थी ये कभी प्यासे होते है कभी भटके हुए और कभी मौका मिलने पर नरेशानंद जी जैसे संतो को सोते हुये मे चाकू से गोद जाते है फिर हमारी पुलिस खामोश क्योकि घटना होने के बाद इनके पास बताने के लिए कोई कहानी नही होती h https://t.co/XROhygmVBJ
— Yati Narsinghanand Saraswati (@NarsinghUvach) October 11, 2021
यति नरसिंहानंद सरस्वती का विवादों से पुराना नाता रहा है। मार्च 2021 में आसिफ नाम के एक मुस्लिम लड़के को नरसिंहानंद और उसके साथी ने मंदिर में पकड़ लिया था जिसकी पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। इस घटना के बाद नरसिंहानंद की हत्या का एलान करते कई वीडियो सामने आए। जून 2021 में मंदिर परिसर में कथित तौर पर पुजारी की हत्या करने आए दो अन्य लोगों को पकड़ा गया था। नरसिंहानंद पर हाल ही के एक वायरल वीडियो में महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने का केस दर्ज किया गया था।
भारत की आजादी का जब भी जिक्र होता है तो सबसे पहले और सबसे प्रमुखता से महात्मा गाँधी का भी जिक्र आता है, ऐसे ही जब बात देश की दूसरी आजादी का हो तो इसका सबसे बड़ा श्रेय ‘लोकनायक’ जयप्रकाश नारायण को जाता है। दूसरी आजादी अर्थात देश में कॉन्ग्रेस पार्टी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की ओर से थोपे गए आपातकाल का खात्मा और लोकतंत्र की पुनः बहाली। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को नवजीवन देने वाले, सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद भी जब वे 1974 में ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ के नारे के साथ मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा। ऐसे जयप्रकाश यानी जेपी का जन्म आज ही के दिन 11 अक्टूबर, 1902 को हुआ था।
राजनीतिक इतिहास के कई जानकार बताते हैं कि नेहरू अपने मंत्रिमंडल में जेपी को जगह देना चाहते थे, कुछ जानकारों का कहना है कि गृहमंत्री का पद भी ऑफर किया गया था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। जेपी ने सत्ता से दूर रहना चुना। यहीं से यह बात भी दृढ़ हो जाती है कि जयप्रकाश नारायण को पद और सत्ता का मोह नहीं था शायद यही कारण है कि नेहरू की कोशिश के बावजूद वह उनके मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए। लेकिन वह सत्ता में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहते थे। यही वजह है जब 1973 में देश इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में मँहगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त था। तब उन्होंने आगे बढ़कर ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया। जिसकी शुरुआत गुजरात से हुई तो बिहार में बड़े आंदोलन का रूप ले लिया। तब बिहार में जेपी आंदोलन से भयभीत तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ने गोलियाँ तक चलवा दीं। कहते हैं तीन हफ्ते तक हिंसा जारी रही और अर्द्धसैनिक बलों को बिहार में मोर्चा सँभालना पड़ा था।
नेहरू द्वारा ऑफर सत्ता में भागीदारी को ठुकराकर यद्यपि जेपी सरकार, मंत्रिमंडल तथा संसद का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता बनी रही। इन्होंने ट्रेड यूनियन के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया तथा कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन, पेंशन, चिकित्सा-सुविधा तथा घर बनाने के लिए सहायता जैसे जरूरी मुद्दे लागू कराने में सफल हुए।
सत्ता से दूरी बनाए रखने के लिए ही 19 अप्रैल 1954 को जेपी ने एक असाधारण-सी घोषणा करते हुए बताया कि वह अपना जीवन विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन को अर्पित कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए हजारीबाग में अपना आश्रम स्थापित किया जो कि पिछड़े हुए गरीब लोगों का गाँव था। यहाँ उन्होंने गाँधी के जीवन-दर्शन को आधुनिक पाश्चात्य लोकतन्त्र के सिद्धान्त से जोड़ दिया। इसी विचार की उनकी पुस्तक ‘रिकंस्ट्रक्शन ऑफ इण्डियन पॉलिसी’ प्रकाशित हुई। इसी किताब ने आगे आने वाले कई घटनाक्रमों और जेपी को मैग्सेसे पुरस्कार के लिए चुने जाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
खासतौर से जयप्रकाश नारायण को वर्ष 1977 में हुए ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन के लिए जाना जाता है इसपर बात आगे होगी लेकिन वह इससे पहले भी कई आंदोलनों में शामिल रहे थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस के अंदर सोशलिस्ट पार्टी योजना बनाई थी और कॉन्ग्रेस को सोशलिस्ट पार्टी का स्वरूप देने के लिए आंदोलन भी शुरू किया था। इतना ही नहीं जेल से भाग कर नेपाल में रहने के दौरान उन्होंने सशस्त्र क्रांति भी शुरू की थी। इसके अलावा वह किसान आंदोलन, भूदान आंदोलन, छात्र आंदोलन और सर्वोदय आंदोलन सहित कई छोटे-बड़े आंदोलनों में शामिल रहे और उन्हें अपना समर्थन देते रहे।
इतने आंदोलनों और देश की आजादी में योगदान देकर भी सत्ता से दूरी बनाए रखने वाले जेपी को रूस की गतिविधियों पर नजर बनाए रखने के कारण यह बात समझ में आ गई थी कि कम्युनिज्म भारत के लिए सही राह नहीं है। उनका मानना था हिंसक क्रन्ति हमेशा किसी न किसी रूप में तानाशाही को जन्म देती है। क्रांति के बाद विशेषाधिकार युक्त शासकों और शोषकों का एक नया वर्ग तैयार हो जाता है और आगे चलकर जनता मोटे तौर पर एक बार पुन: प्रजा बनकर रह जाती है।
यही वजह है जब वे इंदिरा गाँधी की निरंकुशता के विरुद्ध आंदोलन के लिए उतरे तो उस समय भी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नाम देने के बावजूद भी उन्होंने शसस्त्र आंदोलन का रास्ता नहीं चुना। जय प्रकाश नारायण, उस समय की परिस्थियाँ और कॉन्ग्रेस की इंदिरा गाँधी सरकार की नीतियों को समझने के लिए थोड़ा पीछे से शुरू करते हैं। जब वर्ष 1971 जयप्रकाश नारायण ने नक्सली समस्या का समाधान निकाल कर तथा चम्बल में डाकुओं के आत्मसमर्पण में अगुवा की भूमिका निभा कर अपने नेतृत्व और संगठन की क्षमता का एक बार पुनः परिचय दिया और 8 अप्रैल 1974 को 72 वर्ष की आयु में एक अदभुत नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करते हुए जब उन्होंने इंदिरा के खिलाफ बिगुल फूँका तो जीत के शंखनाद पर ही विराम लिया।
5 जून 1974 को पटना के गाँधी मैदान के एक जनसभा में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की अवधारणा को समझाते हुए जेपी ने कहा, “यह एक क्रान्ति है, दोस्तो! हमें केवल एक सभा को भंग नही करना है, यह तो हमारी यात्रा का एक पड़ाव भर होगा। हमें आगे तक जाना है। आजादी के सत्ताइस बरस बाद भी देश भूख, भ्रष्टाचार, महँगाई, अन्याय तथा दमन के सहारे चल रहा है। हमें सम्पूर्ण क्रान्ति चाहिए उससे कम कुछ नहीं…”
लोकनायक ने कहा कि संपूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल हैं- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रांति होती है। जेपी के इस संपूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में इंदिरा गाँधी को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। जेपी की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। देखते ही देखते बिहार से उठी संपूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। उस समय जेपी घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे।
आपात काल की पृष्ठभूमि
25 जून 1975, को इंदिरा गाँधी ने जब देश में आपातकाल लगाया तो आजाद भारत के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय की शुरुआत इसी दिन हुई और अगले करीब दो साल तक देश ने इंदिरा के नेतृत्व में निरंकुश सत्ता की हनक और दमन का एक नया रूप देखा जिसने ब्रिटिश राज के पुराने गहरे जख्म को फिर से हरा कर दिया था। आखिर इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाने का फैसला क्यों किया? इस सवाल के जवाब की शुरुआत भी जून 1975 से ही होती है। उस महीने में देश का घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि इतिहास की कई किताबें सिर्फ उन्हीं 30 दिनों के विवरण के आधार पर लिखीं गई हैं। आखिर उस महीने में ऐसा क्या हुआ था?
1971 के चुनाव में इंदिरा गाँधी से हारने वाले राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में केस दायर किया। इंदिरा पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। तब पहली बार कोई प्रधानमंत्री देश की अदालत के भीतर कटघरे में थी। 12 जून 1975 को जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा को दोषी करार दिया। बता दें कि यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। हालाँकि, 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने शर्तो के साथ इस फैसले पर स्टे लगा दिया और इंदिरा को पीएम बने रहने की इजाजत दे दी मगर विपक्ष कुछ सुनने को तैयार नहीं था। फिर इंदिरा गाँधी के विरोध का ऐसा दौर शुरू हुआ जो 25 जून 1975 को अपने चरम पर पहुँच गया था।
कोर्ट के फैसले के बाद, जेपी ने इंदिरा से गद्दी छोड़ने को कहा। 25 जून 1975 की शाम को नई दिल्ली के रामलीला मैदान का नजारा बदला हुआ था। कॉन्ग्रेस के विरोध में लाखों लोग वहाँ जमा थे उस जगह एक साथ इतने लोग इससे पहले कभी नहीं जुटे थे। यही वो जगह थी जब जेपी ने बुलंद आवाज में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर पंक्तियाँ कहीं, “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है…” उस रैली को मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर जैसे कई नेताओं ने भी सम्बोधित किया था। जेपी ने यहीं से इंदिरा से कुर्सी छोड़ने को कहा। जेपी ने सेना और पुलिस से असंवैधानिक और अनैतिक आदेश मानने से इनकार करने का आह्वान भी किया।
वो रैली इतनी विशाल थी कि उसकी गूँज सीधे PM आवास में बैठीं इंदिरा को डरा रही थी। जानकारों की मानें तो इंदिरा को यहाँ तक लगता था कि विदेशी ताकतों की मदद से जेपी देश में आंदोलन चला रहे हैं, जो उनकी कुर्सी छीन सकता है। उस दिन जब यह रैली रात 9 बजे खत्म हुई, तबतक इंदिरा समझ चुकी थीं कि देश का माहौल उनके खिलाफ हो चुका है। सत्ता में बने रहने का कोई और रास्ता न देख उन्होंने आपातकाल लगाने का फैसला किया।
आधी रात से थोड़ी देर पहले, राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। यह इंदिरा की हनक ही थी कि उसी रात आपातकाल लागू करने के आदेश पर हस्ताक्षर करने से पहले भी राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने भी कोई प्रश्न नहीं पूछा। राष्ट्रपति ने आंतरिक गड़बड़ी से देश की सुरक्षा को खतरा बताकर यह इमरजेंसी लागू कर दी थी। इसके लिए सुबह 6 बजे कैबिनेट की बैठक हुई और इमरजेंसी लागू करने की सिफारिश राष्ट्रपति से की गई और एक घंटे के अंदर सुबह 7 बजे राष्ट्रपति ने इमरजेंसी के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए।
अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई। विपक्ष के नेता हिरासत में ले लिए गए। 26 जून की सुबह इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर आपातकाल की जानकारी दी। इमरजेंसी के निडर विरोधियों में जेपी के बाद रामनाथ गोयनका का नम्बर आता है। उस दौरान बहुत से समाचार पत्रों ने भी कॉन्ग्रेस के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था। सिर्फ दो राष्ट्रीय पत्रों- इंडियन एक्सप्रेस एवं स्टेट्समैन ने झुकने से इनकार कर दिया था। 28 जून को अखबारों ने पन्ने खाली छोड़कर अपना विरोध जताया।
इससे पहले 1971 में भी विदेशी ताकतों से खतरे को लेकर इमरजेंसी लगाई गई थी। लेकिन वह पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान से आजाद करवाने का दौर था जिससे बांग्लादेश के रूप में एक नए देश का उदय हुआ। लेकिन 1975 में लागू इमरजेंसी उससे बिलकुल अलग थी। आपातकाल लागू करने के बाद सबसे पहले जेपी को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद दो बजे रात में मोरारजी देसाई को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद तड़के 6.45 बजे कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अशोक मेहता को उनके घर से गिरफ्तार किया गया। फिर तो पूरे देश में दमनचक्र शुरू हो गया और बेंगलुरु से लाल कृष्ण आडवाणी को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
इमरजेंसी के दौरान जिस तरह से नागरिकों के अधिकारों का हनन किया गया, उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इतनी बड़ी संख्या में हुई गिरफ्तारियाँ 1942 में भारत छोड़ों आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश अत्याचारों की याद दिलाती थीं। जेपी की बहादुरी के कारनामों ने उन्हें राष्ट्र नायक, लोकनायक बना दिया था। विपक्ष के चुनौती देने वाले हर व्यक्ति को आन्तरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के अन्तर्गत गिरफ्तार कर लिया गया था। आरएसएस के लोग उनके खास निशाने पर थे। यह पूरा अभियान प्रधानमंत्री आवास पर संजय गाँधी, इन्दिरा गाँधी के विश्वासपात्र, गृह मंत्रालय के गृहराज्यमंत्री ओम मेहता और उनके निजी सचिव आरके धवन की देख रेख में संचालित हो रहा था।
संजय और इंदिरा गाँधी
इमरजेंसी के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को प्रतिबन्धित करने का फैसला इंदिरा गाँधी को बहुत भारी पड़ा। हालाँकि उनका मानना था कि यह संगठन विपक्षी नेताओं का करीबी है तथा इसका बड़ा संगठनात्मक आधार सरकार के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन करने की सम्भावना रखता था। सत्ता का इशारा पाकर पुलिस इस संगठन पर टूट पड़ी और उसके हजारों कार्यकर्ताओं को कैद कर लिया गया। आरएसएस ने प्रतिबंध को चुनौती दी और हजारों स्वयंसेवकों ने प्रतिबंध के खिलाफ और मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ सत्याग्रह में भाग लिया। इसी दौरान एक युवा आरएसएस कार्यकर्ता के रूप में नरेंद्र मोदी भी रेखांकित होते हैं।
जेपी और छह सौ से भी ज्यादा सत्ता विरोधी नेताओं को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया। हिरासत में लिए जाने से पहले जेपी को संस्कृत की एक उक्ति उद्धत करते हुए पाया गया- ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि।’ हालाँकि जेल में जेपी की तबीयत ज्यादा खराब होने लगी, 7 महीने बाद उनको रिहा कर दिया गया। जेल से बाहर आकर भी जेपी ने हार नहीं मानी। तो इंदिरा गाँधी ने भी अगले 21 महीनों तक कई दमनकारी कदम उठाए।
इंदिरा गाँधी से टकराव
इंदिरा गाँधी से इस टकराव का उन्होंने अपनी डायरी में भी वर्णन किया है। कैद में 4 सप्ताह गुजारने के बाद उन्होंने 21 जुलाई से डायरी लिखनी शुरू की थी। उसी दिन प्रधानमंत्री के नाम लिखे उनके पत्र में पश्चाताप का कोई नामो-निशान नहीं था। यह औपचारिक रूप से ‘इन्दु’ (जेपी उन्हें इसी नाम से बुलाते थे।) को ही संबोधित था।
जेपी ने जेल से लिखा इंदिरा को पत्र
“प्रिय प्रधानमंत्री, समाचार पत्रों में आपके भाषणों और साक्षात्कारों की रपट पढ़कर मैं विस्मित हूँ (आपने जो कुछ किया है, उसका औचित्य सिद्ध करने के लिए आपको हर रोज कुछ न कुछ कहना पड़ता है। यही आपके अपराधी मानस का परिचायक है)। समाचार पत्रों का मुँह बन्द कर तथा हर प्रकार की मतभिन्नता पर रोक लगाकर और इस प्रकार आलोचना के भय से सर्वथा मुक्त होकर आप विकृत तथ्यों एवं झूठी बातों का प्रचार कर रही हैं। अगर आप सोचती हैं कि ऐसा करके आप जनता की नजर में खुद को सही साबित कर सकेंगी और विपक्ष को राजनीतिक दृष्टि से खत्म कर सकेंगी, तो आप भारी मुगालते में हैं। यदि आपको कोई संदेह हो तो आपातकाल समाप्त कर, जनता को मौलिक अधिकार और समाचार पत्रों को उनकी आजादी वापस देकर देख लीजिए। और जिन लोगों को आपने बिना किसी अपराध के… क्योंकि उन्होंने अपने देशभक्ति के कर्तव्य को पूरा करने के अलावा कोई अपराध नहीं किया है… बन्दी बना रखा है, उनको रिहा करके इसकी परीक्षा कर लीजिए। नौ साल का समय कम नहीं होता मैडम! जनता की छठी इन्द्रिय शक्ति ने आपको पहचान लिया है। चूँकि मुख्य अपराधी मैं ही हूँ, इसलिए मैं पूरी बात को स्पष्ट करना चाहूँगा। इसमें संभवतः आपकी कोई रूचि नहीं होगी, क्योंकि आपने तो जानबूझकर विकृत तथ्यों और झूठी बातों का प्रचार किया है। परन्तु जो सच है, वह तो लिपिबद्ध हो जाए… आपके शासन में एक बन्दी के रूप में मैं भी सन्तोषपूर्वक मरूँगा।”
इमरजेंसी में देश की स्थिति राजतंत्र जैसी हो गई थी और इसी बीच इंदिरा गाँधी के पुत्र संजय गाँधी ने सितंबर 1976 में देश भर में अनिवार्य पुरुष नसबंदी का आदेश भी लागू कर दिया। इसके अंतर्गत लोगों की इच्छा के विरुद्ध उनके घरों से या राह चलते उठाकर जबरदस्ती नसबंदी कराई गई। इसी दौरान संजय गाँधी की करीबी रुखसाना सुल्ताना का नाम भी उभरा जिन्हें पुरानी दिल्ली के मुस्लिम क्षेत्रों में नसबंदी अभियान के नेतृत्व और बुलडोजर चलवाने में बदनामी मिली।
इसी तरह की तमाम दमनकारी नीतियों के बावजूद हालात बिगड़ते गए भारी दबाव के बीच 18 जनवरी 1977 को इन्दिरा गाँधी ने लोकसभा भंग करते हुए मार्च मे लोकसभा चुनाव की घोषणा की और सभी राजनैतिक बन्दियों को रिहा करने का निर्णय लिया और आखिकार 21 मार्च, 1977 को आधिकारिक रूप से आपातकाल हटा लिया गया। इस प्रकार 1977 में जेपी की अगुआई में इंदिरा गाँधी का किला ढह गया। वे खुद भी चुनाव हार गईं। जनता पार्टी का गठबंधन 345 सीटें जीतकर सत्ता में आ गया। कई मीडिया रिपोर्ट तो यह भी बताते हैं कि जेपी की वजह से ही ‘आयरन लेडी’ कही जानें वाली इंदिरा गाँधी रोने तक पर मजबूर हो गईं थीं।
इस प्रकार जेपी के प्रयासों से देश में पहली बार एक गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार बनी। उस समय जयप्रकाश ने कहा कि जनता पार्टी की यह सरकार मेरी कल्पना की संपूर्ण क्रांति को साकार करने वाली सरकार नहीं है क्योंकि वह परिकल्पना किसी सरकार के बूते साकार नहीं हो सकती है। इसलिए बीमार व बूढ़े जयप्रकाश ने अपनी क्रांति की फौज अलग से सजाने की तैयारी शुरू की और दिल्ली की नई सरकार को एक साल का समय दिया। कहा, इस अवधि में मैं आपकी आलोचना आदि नहीं करूँगा लेकिन देखूँगा कि जनता से हमने जो वादा किया है, आप उसकी दिशा में कितना और कैसे काम कर रहे हैं। एक साल के बाद मैं आगे की रणनीति बनाऊँगा।
इस प्रकार व्यापक स्टार पर देखा जाए तो देश में आजादी की लड़ाई से लेकर वर्ष 1977 तक तमाम आंदोलनों की मशाल थामने वाले जेपी यानी जयप्रकाश नारायण का नाम देश के ऐसे शख्स के रूप में उभरता है जिन्होंने अपने विचारों, दर्शन तथा व्यक्तित्व से देश की दिशा तय की थी। मुलायम सिंह यादव, लालमुनि चौबे, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, दिवंगत रामविलास पासवान, रविशंकर या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता जेपी के उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे। इनमें से कुछ ने आगे चलकर कुछ नए दल बनाए तो कुछ दूसरे स्थापित पार्टियों में शामिल हो गए।
लोकनायक
लोकनायक के शब्द को असलियत में चरितार्थ करने वाले जयप्रकाश नारायण अत्यंत समर्पित जननायक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही इसके साथ-साथ उनकी छवि अत्यंत शालीन और मर्यादित सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की भी है। उनका समाजवाद का नारा आज भी हर तरफ गूँज रहा है लेकिन उसकी धार जाती रही। उनके नारे पर राजनीति करने वाले उनके सिद्धान्तों को भूल गए, क्योंकि उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का नारा एवं आन्दोलन जिन उद्देश्यों एवं बुराइयों को समाप्त करने के लिए किया था, वे सारी बुराइयाँ इन राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं में व्याप्त हैं।
कुल मिलाकर, लोकनायक जयप्रकाश नारायण की समस्त जीवन यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही। उसमें अनेक पड़ाव आए, उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को भी एक नई दिशा दी, नए मानक गढ़े। जैसे- भौतिकवाद से अध्यात्म, राजनीति से सामाजिक कार्य तथा जबरन सामाजिक सुधार से व्यक्तिगत दिमागों में परिवर्तन। वे विदेशी सत्ता से देशी सत्ता, देशी सत्ता से व्यवस्था, व्यवस्था से व्यक्ति में परिवर्तन और व्यक्ति में परिवर्तन से नैतिकता के पक्षधर थे। वे समूचे भारत में ग्राम स्वराज्य का सपना देखते थे और उसे आकार देने के लिए अथक प्रयत्न भी किए। जिसकी बानगी भले ही बीच के सालों में गायब रही लेकिन तमाम योजनाओं और जमीनी कार्यों के माध्यम से मौजूदा मोदी सरकार में उसकी झलक मिलती है।
उनका संपूर्ण जीवन भारतीय समाज की समस्याओं के समाधानों के लिए प्रकट हुआ। उन्होंने भारतीय समाज के लिए बहुत कुछ किया लेकिन सार्वजनिक जीवन में जिन मूल्यों की स्थापना वे करना चाहते थे, वे मूल्य बहुत हद तक देश की राजनीतिक पार्टियों को स्वीकार्य नहीं थे। क्योंकि ये मूल्य राजनीति के तत्कालीन ढाँचे को चुनौती देने के साथ-साथ स्वार्थ एवं पदलोलुपता की स्थितियों को समाप्त करने के पक्षधर थे, राष्ट्रीयता की भावना एवं नैतिकता की स्थापना उनका लक्ष्य था, राजनीति को वे सेवा का माध्यम बनाना चाहते थे न कि भोग और लोलुपता का।
लोकनायक के जीवन की विशेषताएँ और उनके व्यक्तित्व के आदर्श विलक्षण हैं जिसकी वजहसे वे भारतीय राजनीति के नायकों में अलग स्थान रखते हैं। उनका सबसे बड़ा आदर्श था जिसने भारतीय जनजीवन को गहराई से प्रेरित किया, वह था कि उनमें सत्ता की लिप्सा नहीं थी, मोह नहीं था, वे खुद को सत्ता से दूर रखकर देशहित में सहमति की तलाश करते रहे और यही एक देशभक्त की त्रासदी भी रही थी। वे कुशल राजनीतिज्ञ भले ही न हो किन्तु राजनीति की उन्नत दिशाओं के पक्षधर थे, प्रेरणास्रोत थे। वे देश की राजनीति की भावी दिशाओं को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। यही कारण है कि राजनीति में शुचिता एवं पवित्रता की निरंतर वकालत करते रहे।
इमरजेंसी में देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले महान नेता जयप्रकाश नारायण को बीमारी की हालत में जिस तरह से जेल में तनहाई में रखा गया उसने उनके शरीर को और भी जर्जर कर दिया था। उससे कॉन्ग्रेसी सरकार की क्रूरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। गाँधी जी के समान वे भी दुर्बल शरीर के थे और गाँधी जी की ही भाँति उन्होंने भी पाप की शक्तियों पर बड़े शानदार ढंग से पुण्य की शक्तियों को विजय दिलाई।
आन्दोलन के दौरान ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया था। आपातकाल में जेल में बंद रहने के दौरान उनकी तबियत अचानक ख़राब हो गयी और उन्हें रिहा कर दिया गया। मुंबई के जसलोक अस्पताल में जाँच के बाद पता चला की उनकी किडनी ख़राब हो गई थी जिसके बाद वो डायलिसिस पर ही रहे। इस प्रकार दूसरी क्रांति के अग्रदूत जयप्रकाश नारायण का निधन 8 अक्टूबर, 1979 को पटना में मधुमेह और ह्रदय रोग के कारण हो गया।
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में गाय के ऊपर 786 लिखा हुआ देख कर तनाव का माहौल उत्पन्न हो गया। घटना शुक्रवार (अक्टूबर 8, 2021) की है। बागपत के बड़ौत इलाके के बिनौली थाना क्षेत्र के अंगदपुर-जहौरी गाँव में जब स्थानीय निवासियों ने गाय के शरीर पर 786 लिखा हुआ देखा तो वे रोष में आ गए, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया।
अमर उजाला की एक रिपोर्ट के मुताबिक गाँव में कुछ घुमंतू गायें हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ सदस्यों ने दो-तीन घुमंतू गायों को बंधक बना लिया और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए उन पर ‘786’ लिखकर उन्हें छोड़ दिया। 786 इस्लाम में पवित्र संख्या है। अरबी में 786 का अनुवाद ‘बिस्मिल्लाह अल-रहमान अल-रहीम’ है। यह कुरान की एक आयत का संक्षिप्त रूप जिसका अर्थ है- उस अल्लाह के नाम पर (शुरू करता हूँ) जो दयालु और करुणामय है। यह मुस्लिम समुदाय में किसी काम को शुरू करते समय इस्तेमाल किया जाने वाला वाक्य है।
इस घटना से ग्रामीणों में आक्रोश है। उनका कहना है कि हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने के लिए जानबूझकर ऐसा कृत्य किया गया। बता दें कि सनातन धर्म में गाय को एक पवित्र पशु माना जाता है और इसका माँस खाना वर्जित है, जबकि इस्लाम में गायों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है।
जब ऑपइंडिया ने बिनौली थाने के प्रभारी अधिकारी संजय कुमार से संपर्क किया तो उन्होंने घटना की पुष्टि की। संजय कुमार ने ऑपइंडिया को फोन पर बताया, “यह मेंहदी से लिखा गया था जिसे हमने हटा दिया है। इस मामले में कोई FIR दर्ज नहीं कराई गई है। लेकिन हम उन लोगों की तलाश कर रहे हैं जिन्होंने ऐसा किया है और उनके इरादे पता करने की कोशिश कर रहे हैं। बागपत में घुमंतू जानवर एक बड़ी समस्या है। किसान अपनी बूढ़ी गायों को सड़क पर छोड़ देते हैं। हम मामले को लेकर सतर्क और सजग हैं।”
बड़ौत में गायों के साथ क्रूरता कोई नई बात नहीं है। पिछले महीने कोटाना गाँव में एक गाय की कथित तौर पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। एक दूसरी घटना में बड़ौत के बोपुरा गाँव में पुलिस और गौ तस्करों के बीच मुठभेड़ हुई थी। जिसके बाद पुलिस ने नोमन नाम के एक गौ तस्कर को गिरफ्तार किया था।
अपडेट:जयपुर जिला एवं सेशन न्यायालय में सेंट जेवियर्स स्कूल के टीचर निखिल जोस का केस चला। छात्राओं को अश्लील मैसेज भेजने का जो आरोप इस शिक्षक पर लगाया गया था, वो पुलिस अनुसंधान में सही नहीं पाया गया। आरोप लगाने वाले परिवादी ने भी कोर्ट के समक्ष माना कि इस मामले में अब वो कोई कार्रवाई नहीं चाहते हैं। कोर्ट ने इस मामले में नकारात्मक प्रतिवेदन स्वीकार कर लिया।
राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक नामचीन स्कूल के टीचर को पुलिस ने छात्राओं को अश्लील मैसेज भेजने के आरोप में गिरफ्तार किया है। आरोपित जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल में एनसीसी टीचर है। उसका नाम निखिल जोस है। टीचर जोस इंस्टाग्राम के जरिए स्कूल की छात्राओं को अश्लील मैसेज भेजता था। एक छात्रा को अश्लील मैसेज भेज होटल में मिलने के लिए बुलाया। इनकार करने पर उसके फोटो शेयर कर धमका रहा था।
टीचर द्वारा छात्रा को भेजा गया अश्लील मैसेज (साभार: सोशल मीडिया)
बताया जा रहा है कि 10 से अधिक छात्राओं को आरोपित टीचर ने अश्लील मैसेज भेजे थे। जब इसकी जानकारी पूर्व स्टूडेंट्स को हुई तो उन्होंने आरोपित टीचर को सबक सिखाने के लिए सोशल मीडिया पर कैंपेन शुरू किया। इसके बाद टीचर को पुलिस ने अशोक नगर थाने में मिली एक संस्था की तरफ से शिकायत के आधार पर आईटी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया। आरोपित टीचर के अश्लील मैसेज सोशल मीडिया पर अब वायरल हो रहे हैं।
टीचर द्वारा छात्रा को भेजा गया अश्लील मैसेज (साभार: सोशल मीडिया)
अशोक नगर थानाधिकारी सुरेन्द्र सैनी के अनुसार टीचर निखिल जोस के गिरफ्तारी के बाद जब उसका मोबाइल चेक किया गया तो कुछ छात्रों को अश्लील मैसेज भेजने के सबूत मिले। शुरुआती जाँच में पता चला है कि स्कूल में ऑनलाइन क्लास के लिए वॉट्सऐप ग्रुप बनाए गए थे। शिक्षक ग्रुप से ही स्टूडेंट के नंबर लेकर प्राइवेट चैटिंग करने लगा। शुरुआत में स्टूडेंट ने रिस्पॉन्स नहीं दिया। शिक्षक ने बाद में शराब पीने के लिए होटल में मिलने का ऑफर दिया। स्कूल की कई गर्ल्स स्टूडेंट्स को भी रात 10 बजे के आसपास अश्लील मैसेज भेजे। उन्हें स्कूल से बाहर होमवर्क के बहाने मिलने के लिए बुलाया। स्कूल की एक स्टूडेंट ने 27 मिनट 31 सेकेंड का एक वीडियो भी इंस्टाग्राम पर अपलोड किया था।
टीचर द्वारा छात्रा को भेजा गया अश्लील मैसेज (साभार: सोशल मीडिया)
वहीं निखिल ने अपनी गिरफ्तारी को लेकर कहा है कि उसकी इंस्टाग्राम आईडी किसी ने हैक की है और उसने यह मैसेज नहीं किए हैं। इसके साथ ही निखिल ने कहा कि उसे एक दिन ही पहले पता लगा था कि उसकी इंस्टाग्राम आईडी से अश्लील मैसेज भेजे गए हैं।
मामले में स्कूल के वाइस प्रिंसिपल बीजू एमजी का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा कि अभी तक उनके पास इस मामले में शिकायत नहीं आई है। शिकायत आने पर जाँच करवाई जाएगी।